18 मई 2013

रूबरू : सत्यजित रे - मैं एक ऑब्जर्वर की भूमिका में रहा हूँ

अनुवाद व प्रस्तुति : संदीप मुद्गल


सत्यजित रे के सिने जगत में अगर ‘अपु त्रयी’ का स्थान सबसे ऊपर है तो 1970 के दशक की शुरुआत में ‘कलकत्ता त्रयी’ ने उनकी राजनीतिक विचारधाराओं को स्पष्ट किया था। यह समय नक्सलवादी हिंसा का था और अनेक फिल्मकार और अन्य रचनाकार अपने-अपने तरीके से तत्कालीन राजनीतिक उथल-पुथल के सिरे पकड़ने का प्रयास कर रहे थे।

सत्यजित रे पर यूँ भी उनके समकालीनों द्वारा राजनीतिक तौर पर ‘प्रतिबद्धता’ न दर्शाने के आरोप लगते रहे थे, जिनका जवाब उन्होंने कलकत्ता त्रयी के माध्यम से बहुत ही सशक्त तरीके से दिया था। प्रस्तुत साक्षात्कार इसी त्रयी के निर्माण के दौरान दिया गया था जो पहली बार 'साइट एंड साउंड' 42, अंक-1 (1975) में प्रकाशित हुआ था। 


उल्लेखनीय यह है कि 1975 आई उनकी फिल्म ‘जन अरण्य’ को कलकत्ता त्रयी का तीसरे स्तंभ के रूप में अपनाया गया था, परंतु इस साक्षात्कार में ‘अरण्येर दिनरात्रि’ को इस त्रयी के पहले स्तंभ के तौर पर माना गया है। दरअसल, जन अरण्य के बाद कलकत्ता त्रयी का स्वरूप पूर्ण होता है। परंतु यहां एक वृहद परिप्रेक्ष्य में अरण्येर दिनरात्रि को त्रयी के एक शुरुआती संकेतरूपी अंश के तौर पर अपनाया जा सकता है क्योंकि सत्यजित रे इस बहाने एक ऐसी फिल्म पर बात करते हैं, जिसे हमारे देश में बहुत कम समझा और जाना गया है।


कलकत्ता त्रयी की असली पहचान ‘प्रतिद्वंद्वी’, ‘सीमाबद्ध’, ‘जन अरण्य’ के रूप में ही है, जिनमें राजनीतिक हालात दर्शाते हुए भी, निजी मानवीय दृष्टिकोण की पुरजोर हिमायत करने वाले एक ईमानदार रचनाकार की आवाज पूरी गूँज के साथ सुनाई देती है। अपनी कुछ अन्य फिल्मों पर भी यहां सत्यजित रे बात करते हैं। पाठक देखेंगे कि इस साक्षात्कार में विमर्श के दौरान आए कई संदर्भ आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने चालीस वर्ष पहले थे।




क्रिस्टेन ब्राड थॉमसन : क्या आपने जान-बूझकर इस विचार के साथ शुरुआत की थी कि अरण्येर दिनरात्रि, प्रतिद्वंद्वी और सीमाबद्ध एक नई त्रयी के रूप में सामने आएगी ?

सत्यजित रे : मैंने पहली दो फिल्मों के निर्माण तक यह नहीं सोचा था। अरण्येर दिनरात्रि मैंने इसलिए बनाई क्योंकि मुझे कहानी पसंद आई थी, और प्रतिद्वंद्वी, वह मैंने इसलिए बनाई थी क्योंकि कलकत्ता में हालात बहुत तनावपूर्ण थे। विद्यार्थी बहुत सक्रिय थे और शहर में काफी हिंसा हो रही थी और यदि ऐसे में मैं एक और फिल्म बनाता तो उसे कलकत्ता शहर और उसके युवाओं पर ही होना चाहिए था। फिर 1971 में मैंने सीमाबद्ध उपन्यास पढ़ा और मुझे तभी लगा कि यह बहुत महत्वपूर्ण थीम है।


प्रतिद्वंद्वी में नौकरी की तलाश करते एक युवा को दिखाने के बाद यह जरूरी हो गया था कि मैं ऐसे लोगों को भी दिखाता जिनका नौकरियों पर कब्जा है, यानी नया उच्चवर्ग, वह वर्ग जो आजादी के बाद से अस्तित्व में आया है। आप जानते हैं कि एक तरह से ब्रिटिश ने बहुत ज्यादा...


थॉमसन : इस नई त्रयी से आपने एक राजनीतिक संचेतना भी प्राप्त की है जो इससे पहले आपकी फिल्मों में उतनी मुखर होकर नहीं आई थी।

सत्यजित रे : संभव है, लेकिन राजनीति खुद पिछले तीन या चार वर्षों में अधिकाधिक सतह पर आ चुकी है। आप इसे कलकत्ता के रोज के जनजीवन में देख सकते हैं: न केवल बम धमाके वगैरह, बल्कि लोगों से मिलना और सड़क पर चलते हुए दीवारों पर लगे पोस्टर्स आदि देखना। 


मैं कभी राजनीति से अनजान नहीं रहा, लेकिन मैंने पहले राजनीतिक मुद्दों को अपनी फिल्मों में इसलिए नहीं दिखाया क्योंकि मेरे ख्याल से भारत में राजनीति एक बहुत अस्थिर चीज है। राजनीतिक दल बहुत जल्दी टूट जाते हैं और मेरा आज के वाम धड़े में उतना यकीन भी नहीं रहा। आज भारत में तीन कम्युनिस्ट पार्टियां हैं और मुझे इसका मतलब समझ नहीं आता।

थॉमसन  : भारत में तीनों फिल्मों को किस तरह लिया गया ?


सत्यजित रे : प्रतिद्वंद्वी से पहले मेरी गैर-राजनीतिक कहकर आलोचना की जाती थी। फिल्म के आने के बाद उन्हें लगा कि मैं राजनीतिक तौर पर प्रतिबद्ध हूं और फिल्म बहुत सफल रही थी।


प्रतिद्वंद्वी में एक क्रांतिकारी पात्र है, जिसकी मौजूदगी आम दर्शकों के लिए बहुत थी। उन्हें फिल्म की गहराई से मतलब नहीं, केवल इतना कि उसमें राजनीति का कुछ जिक्र है। परंतु मेरी पिछली फिल्म अरण्येर दिनरात्रि को भारत में नहीं समझा गया था। उसकी ऊपरी कथावस्तु के कारण वह उन्हें सतही नजर आई, और उसके कथानक में छिपे निहितार्थ वह नहीं समझे, जो मेरी राय में उसे मेरी सबसे अच्छी फिल्म बनाते हैं। वह सात प्रमुख चरित्रों वाली एक जटिल फिल्म है और उसका प्रारूप मुझे बहुत संतोषप्रद लगता है।

थॉमसन : मैं आपकी बात से इत्तेफाक रखता हूं कि वह आपकी सबसे अच्छी फिल्मों में से है। परंतु क्या उसमें एक स्पष्ट कहानी की कमी नहीं है जो उसे दर्शकों के लिए कठिन बनाती है ?


सत्यजित रे : यह फिल्म मूलतः संबंधों पर आधारित है जिसका ढांचा बहुत जटिल है। हमारे देश में लोग कहते रहे कि यह किस बारे में है, कहानी कहां है, थीम वगैरह ? जबकि समस्या यह है कि फिल्म बहुत सी चीजों के बारे में है। लोगों को केवल एक थीम चाहिए होता है, जिसका सिरा वह थाम सकें।


मैं यह फिल्म बनाने को इसलिए प्रेरित हुआ था क्योंकि लोगों को उनके रोजमर्रा के परिवेश से बाहर ले जाने का पक्ष अपने आप में बहुत रोचक होता है और किस तरह रोजाना के दोहराऊ हालात से बाहर उनके चरित्र नया रूप लेते हैं। कंचनजंघा भी इसी तरह की फिल्म है जिसे नहीं समझा गया था। यह भी बहुत जटिल है और मेरी नजर में एक बहुत खूबसूरत फिल्म है।

उसमें करीब आठ या नौ चरित्र हैं, छुट्टियों पर आया हुआ एक परिवार, जो एक दोपहर टहलने निकला है, और यह समय दो घंटे के करीब का है। परंतु उस दौरान बहुत कुछ होता है। दो बेटियां हैं, जिसमें से एक शादीशुदा है और उसकी अपने पति से काफी तनातनी चल रही है, बात तलाक तक जा पहुंची है, लेकिन वह केवल अपनी बच्ची के कारण इस रिश्ते में है। 


छोटी बेटी को इन छुट्टियों में एक व्यक्ति मिला है जो उसे इसी रोज शादी का प्रस्ताव पेश करना चाहता है। वह एक एग्जीक्यूटिव है जिसका भविष्य उज्ज्वल है, परंतु उसके जीवन मूल्य लड़की के पसंद के नहीं हैं। पिता को उम्मीद है कि लड़की हां कह देगी, परंतु उसके परिवार में यह पहला मौका है जब कोई उसकी इच्छा के विरुद्ध जाता है। वहीं कलकत्ता का एक आम मध्यवर्गीय युवा है जो लड़की की सोच को भाता है, और वहां एक इशारा आता है कि दोनों का भविष्य में साथ हो सकता है।

एक छोटा भाई है जो रसिक मिजाज और पूरी तरह व्यर्थ चरित्र है, जिसका उन दो घंटों के दौरान एक लड़की से अलगाव होता है दूसरी भी उसे तुरंत ही मिल जाती है।

परंतु मुझे कंचनजंघा में छोटी बेटी और उसके नए दोस्त के चरित्र सबसे रुचिकर लगते हैं, जिसे एकबारगी महसूस होता है कि यदि वह लड़की के रईस पिता को खुश कर सके तो शायद उसे एक नौकरी मिल सकती है। 


पिता, जिसकी पांच कंपनियां है, उसके साथ अतीत की बात करता है, अंग्रेजों के जमाने की बातें, उन बेवकूफ आतंकियों की जो जेल में बंद मर गए और वह आज सफल है, और वह लड़के को एक नौकरी की भी पेशकश करता है। लेकिन लड़का उस प्रस्ताव को ठुकरा देता है। वह लड़की को बताता है कि यदि ऐसा कलकत्ता की किसी इंटरव्यू के दौरान होता तो वह उसे अपना लेता, परंतु यहां पहाड़ और बर्फ के बीच उसे अपना कद बहुत ऊंचा लग रहा है। वह खुश है कि उसने ना कहा है। मेरे लिए कंचनजंघा अपनी सीमाओं से बाहर आ रहे लोगों की खोज है और इस राजनीतिक त्रयी का उचित पूर्वालाप है।

कंचनजंघा और अरण्येर दिनरात्रि के यही पक्ष मुझे पसंद है: लोगों को उनके रोजमर्रा के परिवेश से बाहर लाकर उनके आवरणों के पीछे के सच की खोज करना, यह जानना कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है। फिल्मों में पैसे और मूल्यों और सुरक्षा व अपने अनैतिक क्रियाकलापों के दम पर अपने सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति की पैरवी करने के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है।


थॉमसन : इस त्रयी के दूसरे भाग प्रतिद्वंद्वी पर कुछ यूरोपियन आलोचकों की ठंडी प्रतिक्रिया आई थी, जिनका कहना था कि स्टाइलिस्टिक पक्ष से यह कुछ झिझकती हुई और आपके पिछले कार्यों की अपेक्षा ढांचागत तौर पर अधूरी दिखती है। आपने बहुत से फ्लैशबैक्स, स्वप्न दृश्यों और नेगेटिव दृश्यों का इस्तेमाल किया है। स्टाइल में ऐसा परिवर्तन क्यों ?

सत्यजित रे : मैंने जो कुछ भी किया, सोच-समझ कर किया था। मेरा मानना है कि एक फिल्म के स्टाइल को उसके प्रमुख पात्र निर्धारित करते हैं, और विशेषकर इस फिल्म के मामले में, जहां आप उस युवा के साथ पूरी तरह जुड़ते हैं, यह और भी जरूरी हो जाता है।


वह एक झिझकता हुआ सा पात्र है, जिसमें कई अंदरूनी द्वंद्व और शक और समस्याएं हैं, और जब वह फिल्म का केंद्रीय पात्र है तो मैं अपने कथित ‘क्लासिकल’ स्टाइल में कहानी कह ही नहीं सकता था। स्क्रीनप्ले लिखते समय मैं यही सोचता रहा था कि यदि यह एक सीधी रेखा में और पारंपरिक स्टाइल में चला तो यह गलत हो सकता है। इसीलिए मैंने ऐसे स्टाइलिस्टिक पक्ष इस्तेमाल किए जो मेरे कार्य में नए थे।

उदाहरण के लिए फिल्म की शुरुआत युवा के पिता की मृत्यु से होती है, जिसे निगेटिव में दिखाया गया है, और ऐसा करने के कई कारण थे। उस सीन में ऐसे व्यक्ति की मृत्यु दिखाई गई है जिसे आप नहीं जानते, जो फिल्म का एक पात्र नहीं है।


यह एक पूर्णतया अवैयक्तिक मृत्यु दृश्य है, और मृत्यु को स्क्रीन पर दिखा पाना बहुत कठिन होता है। यदि उसे पॉजीटिव में दिखाया जाता तो सभी उसमें जीवन के अंश ढूंढ़ने का प्रयत्न करते क्योंकि वह मृत पात्र के साथ भावनात्मक तौर पर नहीं जुड़े थे। और ऐसा नहीं होना चाहिए था: थीम का दर्शकों के साथ उसी समय जुड़ना बहुत जरूरी होता है। इसलिए मैंने निगेटिव से शुरुआत की थी, और चूंकि मैंने इसे एक बार किया तो सोचा कि एक बार और क्यों नहीं। ड्रीम सीक्वेंस के लिए भी मुझे यह तरीका सटीक लगा; एक अन्य ऐसे सीक्वेंस में भी इस्तेमाल जो पॉजीटिव में भी उतना ही असरकारी लगता।

वह दृश्य है जब युवक का दोस्त उसे एक वेश्या के पास ले जाता है, जहां से वह घिन्न खाकर भाग निकलता है। एक दृश्य में जब वह वेश्या निर्वस्त्र होने लगती है और केवल अपनी ब्रा में है और सिगरेट जलाती है। आमतौर पर बंगाली लड़कियां पब्लिक में नहीं पीतीं, और भारत में दर्शक बहुत पारंपरिक किस्म के हैं, इसलिए इस असर को कम करने के लिए मैंने निगेटिव का इस्तेमाल किया था।

प्रतिद्वंद्वी के नायक की समस्या यह है कि उसके दिमाग में एक साथ बहुत सी चीजें चल रही हैं, और अपने दिल की बात साझा करने के लिए उसके पास कोई नहीं है। उदाहरण के लिए वह अपनी बहन के बॉस से मिलने जाता है और अचानक - ठांय-ठांय-ठांय - वहां वह रिवॉल्वर से बॉस को गोली मार देता है। और फिर आपको पता चलता है कि यह केवल उसके दिमाग में चल रहा था। दरअसल, वह वहां बहुत विनम्र और नर्वस दिखता है, तो मैं कैसे बता सकता था कि वह सचमुच बॉस को मारना ही चाहता था ? इसलिए इस काल्पनिक दृश्यावली के अलावा इसे नहीं बताया जा सकता था।


कुछ लोगों को मेरी फिल्मों में एक खास किस्म के क्लासिकल स्टाइल को देखने की आदत सी पड़ गई है, इसलिए मुझे मालूम था कि आलोचना होगी। यदि यह किसी नवोदित निर्देशक का काम होता तो आलोचक उसे हाथोंहाथ लेते। परंतु मुझे आलोचना की परवाह नहीं है, और संभवतः पांच या छह वर्ष बाद वह उसे पुनरावलोकन के तौर पर देखेंगे तो उन्हें फिल्म सही लगेगी। मैं इस स्टाइल के प्रति स्पष्ट होना चाहता था कि यह मेरी पहली पॉलिटिकल फिल्म है, मेरे पिछले कार्यों से सर्वथा भिन्न।


थॉमसन : इसके बावजूद, आपने एक ऐसे युवक पर फिल्म बनाई है जो समाज में अपने स्थान को लेकर संशय में है, जबकि उसका भाई, जो एक क्रांतिकारी है, वह पृष्ठभूमि में रहता है। यदि आप सचमुच एक राजनीतिक फिल्म बनाना चाहते थे, तो आपने उस युवक को क्रांतिकारी क्यों नहीं बनाया ?


सत्यजित रे : ऐसा इसलिए क्योंकि जो व्यक्ति पूरी तरह से राजनीतिक हो चुका है, वह मनोवैज्ञानिक तौर पर कम रोचक होता है। क्रांतिकारी हमेशा अपने ही बारे में नहीं सोचते रहते। मेरी रुचि ऐसे युवक में थी जिसकी राजनीतिक विचारधारा बहुत स्पष्ट नहीं है और उसे एक नौकरी की जरूरत है, फिर चाहे किसी भी पार्टी का शासन हो। वह अपने बारे में सोच रहा है और इसीलिए प्रताड़ित भी हो रहा है। इसके अलावा, वह अपने निजी स्तर पर एक विरोध करता है, जो मेरी नजर में बेहतरीन है क्योंकि वह अपने अंदर बहुत गहरे से आती है और किसी राजनीतिक विचारधारा का नतीजा नहीं है।



थॉमसन : सीमाबद्ध में भी पृष्ठभूमि में एक क्रांतिकारी पात्र है। असल में हम उसे कभी देख ही नहीं पाते, परंतु हमें पता चलता है कि वह नायक की साली का मित्र है, एक ऐसा पात्र जो जाहिर है कहानी में नैतिकता की धुरी है।

सत्यजित रे : हां, परंतु एक तरह से नायक की साली का वह पात्र एक त्रासद स्थिति में हैं, क्योंकि वह सफलता की तलाश में कलकत्ता आई है और यह देखने कि उसकी बड़ी बहन का अपने एग्जीक्यूटिव पति के साथ जीवन कैसा चल रहा है। जो उसे दिखता है उससे वह हताश तो होती है, परंतु वहीं दूसरी ओर उसे इस बात का भी यकीन नहीं है कि वह वापस जाकर अपने क्रांतिकारी मित्र से शादी कर सकती है या नहीं। 


उसे अपने उस संबंध की गहराई का अंदाजा नहीं है। उसका जीजा उससे पूछता है कि उसने अपने उस पुरुष मित्र के बारे में उसे पहले क्यों नहीं बताया। जवाब में वह कहती है ‘यदि ऐसा कुछ होता तो मैं आपको बता देती।’ वह कलकत्ता इसलिए आई है क्योंकि वह अपनी किशोरावस्था से अपने जीजा को पसंद करती थी। 

वह उससे छह-सात वर्षों से नहीं मिली है और अब चूंकि वह एक सफल व्यक्ति है, वह उसके हालात को जानना चाहती है कि क्या वह पूरी तरह बदल चुका है या अभी भी उसमें कुछ बुनियादी इनसानी गुण बाकी हैं।

वह देखना चाहती है कि उसके हालात में क्या एक साधारण इनसान की तरह रहा जा सकता है। इसलिए वह यहां आती है और पहले पहल सबकुछ ठीक लगता है। लेकिन उसके बाद फैक्टरी की समस्याएं शुरू होती हैं, और वह टूट जाता है। स्पष्ट है कि वह केवल अपनी सफलता के बारे में ही सोच सकता है, चाहे कुछ भी हो जाए उसका करियर आगे बढ़ता रहना चाहिए।

थॉमसन  : परंतु क्या इस लड़की के पात्र के जरिए, जिसका एक क्रांतिकारी से संबंध है, से आपकी मंशा फिल्म को सचमुच उस नैतिक राजनीतिक पक्ष देने की थी जो यहां दिखता है ?


सत्यजित रे : मेरी राय में उसके हालात भी कुछ ऐसे ही हैं जैसे कि प्रतिद्वंद्वी के नायक के हैं। वह उलझन में है, हालांकि फिल्म के अंत में वह शायद उसी क्रांतिकारी मित्र के पास चली जाएगी क्योंकि उसने अपने से विपरीत हालात के जीवन की झलक देख ली है। परंतु यह जरूरी था कि अपना फैसला करने से पहले वह इस जीवन को भी देखती। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि किसी समस्या पर कोई फैसला लेने से पहले आपको उसके दोनों पक्षों का अंदाजा होना चाहिए। उसके बाद ही आप कोई सख्त फैसला ले सकते हैं जो, जैसे कि प्रतिद्वंद्वी में दिखता है, किसी विचारधारा पर आधारित फैसला नहीं होता, परंतु वह मूलतः आपके अपने मानवीय अनुभव के आधार पर लिया जाता है।


थॉमसन : यह आपकी राजनीतिक फिल्मों का एक अन्य रोचक पहलू कि वह...


सत्यजित रे : ...कि वह गोदार या ग्लॉबेर रोशा और अन्य की फिल्मों जैसे नहीं दिखते ? नहीं, बिल्कुल नहीं, क्योंकि मैं व्यक्ति और उसके निजी विचारों में किसी भी वृहद राजनीतिक विचारधारा से अधिक विश्वास रखता हूं। ऐसी विचारधाराएं हमेशा वक्त के साथ बदलती रहती हैं।


थॉमसन : राजनीतिक धरातल पर आपकी फिल्में एग्जीक्यूटिव वर्ग का कड़ी आलोचना करती हैं, परंतु फिल्मों के लिए यह जरूरी होता है कि आप उस वर्ग के सदस्यों की मानवीय परख भी करें।

सत्यजित रे : बेशक। यहां तक कि ब्रिटिश काल में भी ऐसा ही था, क्योंकि भारत का बौद्धिक मध्यवर्ग ब्रिटिश शासन की ही उपज रहा था। उपनिवेशवाद और ब्रिटिश शिक्षा के बिना सशस्त्र क्रांति नहीं होती। अंग्रेजों ने बंगालियों को उदारवादी शिक्षा दी थी, जिस कारण अंततः वह क्रांतिकारियों के रूप में तब्दील हुए। और यह एक तरह की त्रासदपूर्ण स्थिति ही थी कि अंग्रेजों ने अपने दुश्मन खुद बना लिए थे। वह भी करीब सौ वर्ष पहले और उसके विकास की प्रक्रिया को ‘चारुलता’ में दर्शाया गया है, जहां वह समाचार पत्रों के जरिए अंग्रेजी शासन पर सवाल उठाते हैं। और बीसवीं सदी की शुरुआत में आपको ब्रिटिश के खिलाफ पहला सशस्त्र आंदोलन भी दिखता है। उसे किसानों या मजदूर वर्ग का सहयोग नहीं था। वह एक छोटा सा बौद्धिकों का समूह था, जिनके लीडर गैरीबाल्डी और अन्य का क्रांतिकारी साहित्य पढ़ते थे। वह अंग्रेजों से छुटकारा चाहते थे, इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न उन पर बम फेंके जाएं ? उससे हालांकि कुछ हासिल नहीं हुआ, और वह केवल एक संवेदनशील प्रक्रिया थी। परंतु ऐसी संवेदनशील प्रक्रियाएं मुझे अन्य विचारधारात्मक प्रक्रियाओं से अधिक रोमांचित करती हैं।


थॉमसन : सीमाबद्ध में आप यह कितनी गहराई तक बता रहे हैं कि उसका प्रमुख पात्र खुद बुरा होने की बजाय, अपने गलत हालात का शिकार है ?

सत्यजित रे : यह सिस्टम ही है जिसने उसे वैसा बनाया है। वह एक नौकरशाही और व्यावसायिक व्यवस्था का हिस्सा है, जहां निजता के लिए कोई स्थान नहीं। यदि आप समाज में रहना चाहते हैं तो जल्दी ही उसके ढांचे का हिस्सा बन जाते हैं, और वह आपको एक ऐसे रूप में बदल देता है जो आप शुरुआत में नहीं थे। इस व्यक्ति के साफतौर पर दो पक्ष हैं: उसकी अपनी निजी भावनाएं और आत्मा है, परंतु सिस्टम उसे उन्हें एक ओर रखने को कहता है और चाहता है कि वह केवल समाज और विकास के लिए सोचे। परंतु यह एक खुले विचारों वाली फिल्म है और कोई अंतिम वक्तव्य नहीं देती।


थॉमसन : इसके बावजूद, यदि आपको कोई अंतिम वक्तव्य देना हो कि लोगों को विखंडित कर देने वाले सिस्टम को कैसे तोड़ा जाए, तो आपका निष्कर्ष क्या होगा ? वैसे आपका क्रांतिकारी व्यवस्था में अधिक विश्वास नहीं रहा है।


सत्यजित रे : मैं माओ की क्रांति को समझ सकता हूं, जिसने चीन में संपूर्ण परिवर्तन किया था और एक खास कीमत चुकाकर - गरीबी और अशिक्षा का उन्मूलन किया था। परंतु मुझे नहीं लगता कि चीन जैसे स्थान में मेरे लिए कोई जगह है, क्योंकि मैं वैयक्तिक अभिव्यक्ति में गहराई से विश्वास रखता हूं। अपने अनुभव से मैंने जाना है कि कला एक कलात्मक व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होती है और मेरा उन कुछ नई थ्योरीज में कोई यकीन नहीं जो कहती हैं कि कला को नष्ट कर देना चाहिए और उसका स्थायी होना जरूरी नहीं है।


मैं स्थायी मूल्यों में विश्वास रखता हूं। यही मेरी संपूर्ण बौद्धिक बुनावट है और मुझे इस बारे में अपने आप से पूरी तरह ईमानदार रहना होगा। इसका यह मतलब भी नहीं कि मुझे युवाओं से हमदर्दी नहीं है, परंतु साथ ही यह भी दिखता है कि जब लोग एक खास आयुवर्ग को पार कर जाते हैं तो उनके अपने शक बढ़ते जाते हैं। यदि अठारह से पच्चीस वर्ष की आयु तक आप कुछ अतिवादिता के शिकार होते हैं, तो ठीक है। यदि नहीं, तो उम्र बढ़ने के साथ-साथ आपका मोहभंग होता जाता है।

थॉमसन : क्या आपकी पृष्ठभूमि भी यही रईस, उच्चवर्गीय है जिसे आपने कलकत्ता त्रयी में दिखाया और उसकी आलोचना की है ?


सत्यजित रे : नहीं, मैंने हमेशा इस तरह के वर्ग से दूरी बनाकर रखी है। मैं एक ऑब्जर्वर की भूमिका में रहा हूँ, बहुत ही एकांतवासी। जो लोग मेरी फिल्मों में मेरे साथ काम करते हैं, मेरे नजदीक हैं, परंतु मैं ऐसे किसी समूह का हिस्सा नहीं रहा हूं, जिन्हें मैंने पर्दे पर दिखाया है। फिल्में बनाने से पहले जब मैं एडवरटाइजिंग के क्षेत्र में था, तो उस समय मेरे कुछ मित्र थे जो राजनीतिक तौर पर बहुत सक्रिय थे और सोवियत यूनियन के हिमायती थे, परंतु बाद के वर्षों में मैंने देखा कि वह अब एडवरटाइजिंग फर्मों में बड़े ओहदों पर हैं।


वह 1940 के दशक के अपने राजनीतिक रुझान पर बात नहीं करते, और यदि करते भी हैं तो इस सिस्टम में अपने करियर के विकास को सही ठहराते हुए। मैं बतौर एक कलाकार सक्रिय था, जो मेरे लिए काफी है, हालांकि लोग कहते हैं कि मैं प्रतिबद्ध नहीं हूं। प्रतिबद्धता किसके साथ ? मैं अपने वक्तव्य देने के लिए इनसानों के लिए खुद को प्रतिबद्ध मानता हूं, और मेरी समझ में इतनी प्रतिबद्धता अपने आप में काफी है।

थॉमसन  : सीमाबद्ध में जिस बम धमाके की खबर सुनी जाती है, क्या वह कोई वामपंथी समूह करता है?


सत्यजित रे : हां, और दुख यही है कि अक्सर यह वाम विरुद्ध वाम हो जाता है। त्रासदी यह है कि वाम बहुत से समूहों में तब्दील हो गया है और वह अपने आप में ही एक दूसरे के दुश्मन बन गए हैं। वह उदारवादियों और पुरातनपंथियों से नहीं लड़ते। वह असली निशानों पर हमला नहीं करते, जैसे कि बड़े पूंजीपतियों पर, क्योंकि उन्हें हारने का डर होता है। इसके विपरीत, वह एक दूसरे पर हमले करते हैं।


थॉमसन : आपने  ग्लॉबेर रोशा के सिनेमा का जिक्र किया, जिसे आमतौर पर सिनेपर्दे पर तीसरी दुनिया की राजनीतिक अभिव्यक्ति कहा जाता है। आप उनकी फिल्मों के बारे में क्या सोचते हैं ?


सत्यजित रे : मैंने अभी तक उनकी कोई फिल्म नहीं देखी क्योंकि वह हमारे देश में नहीं दिखाई गई हैं। लेकिन मैं उन्हें जरूर देखना चाहूंगा, क्योंकि मुझे लगता है कि वह बहुत सशक्त और मुखर हैं। दि यंग ब्लड ऑफ सिनेमा। गुड!



*इस लेख के प्रकाशन के लिए  अनुवादक की सहमति आवश्यक है.

14 मई 2013

चल दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर

मुसलसल बेकली दिल को रही है
मगर जीने की सूरत तो रही है
मैं क्यूँ फिरता हूँ तन्हा मारा-मारा
ये बस्ती चैन से क्यों सो रही है
चल दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर
ये नगरी आज ख़ाली हो रही है
न समझो तुम इसे शोर-ए-बहाराँ
ख़िज़ाँ पत्तों में छुप के रो रही है
हमारे घर की दीवारों पे "नासिर"
उदासी बाल खोले सो रही है

नासिर काज़मी


8 मई 2013

कौन घूँघट उठाएगा सितमगर कह के

ज़िन्दगी को न बना दें वो सज़ा मेरे बाद
हौसला देना उन्हें मेरे ख़ुदा मेरे बाद

कौन घूँघट उठाएगा सितमगर कह के
और फिर किस से करेंगे वो हया मेरे बाद

हाथ उठते हुए उनके न देखेगा
किस के आने की करेंगे वो दुआ मेरे बाद

फिर ज़माना-ए-मुहब्बत की न पुरसिश होगी
रोएगी सिसकियाँ ले-ले के वफ़ा मेरे बाद

वो जो कहता था कि 'नासिर' के लिए जीता हूं
उसका क्या जानिए, क्या हाल हुआ मेरे बाद

नासिर काज़मी

7 मई 2013

दीवाना है दीवाने के मुँह न लगो तो बेहतर है

"नासिर" क्या कहता फिरता है कुछ न सुनो तो बेहतर है 
दीवाना है दीवाने के मुँह न लगो तो बेहतर है 

कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जायेगा 
रूखी-सूखी जो मिल जाये शुक्र करो तो बेहतर है 

कल ये ताब-ओ-तवाँ न रहेगी ठंडा हो जायेगा लहू 
नाम-ए-ख़ुदा हो जवाँ अभी कुछ कर गुज़रो तो बेहतर है 

क्या जाने क्या रुत बदले हालात का कोई ठीक नहीं 
अब के सफ़र में तुम भी हमारे साथ चलो तो बेहतर है 

कपड़े बदल कर बाल बना कर कहाँ चले हो किस के लिये 
रात बहुत काली है "नासिर" घर में रहो तो बेहतर है

नासिर काज़मी

6 मई 2013

तबीयत में न जाने ख़ाम ऐसी कौन सी शै है


बढ़ाता है तमन्‍ना आदमी आहिस्‍ता आहिस्‍ता
गुज़र जाती है सारी जि़ंदगी आहिस्‍ता आहिस्‍ता

अज़ल से सिलसिला ऐसा है गुंचे फूल बनते हैं
चटकती है चमन की हर कली आहिस्‍ता आहिस्‍ता

बहार-ए-जि़ंदगानी पर खज़ां चुपचाप आती है
हमें महसूस होती है कमी आहिस्‍ता आहिस्‍ता

सफ़र में बिजलियां हैं आंधियां हैं और तूफ़ां हैं
गुज़र जाता है उनसे आदमी आहिस्‍ता आहिस्‍ता

परेशां किसलिए होता है ऐ दिल बात रख अपनी
गुज़र जाती है अच्‍छी या बुरी आहिस्‍ता आहिस्‍ता

तबीयत में न जाने ख़ाम ऐसी कौन सी शै है
कि होती है मयस्‍सर पुख्‍़तगी आहिस्‍ता आहिस्‍ता

इरादों में बुलंदी हो तो नाकामी का ग़म अच्‍छा
कि पड़ जाती है फीकी हर खुशी आहिस्‍ता आहिस्‍ता

ये दुनिया ढूंढ़ लेती है निगाहें तेज़ हैं इसकी
तू कर पैदा हुनर में आज़री आहिस्‍ता आहिस्‍ता

तख़य्युल में बुलन्‍दी और ज़बां में सादगी 'रहबर'
निखर आई है तेरी शायरी आहिस्‍ता आहिस्‍ता

हंसराज रहबर


दीदा-ए-तर : नम आंखें, नमूद-ए-जाहिरी : ऊपरी दिखावा, शफ़क - ऊषा की लालिमा, आज़री - थयानी कला में पारंगत आजर का प्रसिद्ध मुर्तिकार, तख़य्युल : कल्‍पना