4 जनवरी 2015

थरूर के नेहरू और 'भारत का आविष्कार' !

रंगनाथ सिंह

जवाहरलाल नेहरू (1889-1964)
डिप्लोमेट शशि थरूर ने यह किताब तब लिखी जब भाजपा सरकार केंद्र में थी और ख़ुद थरूर अभी कांग्रेस के सांसद नहीं बने थे. किताब की शुरुआत में थरूर ने बहुत सी साफगोई से लिखा है कि यह किताब कोई मौलिक अकादमिक कार्य नहीं है, न ही इसमें किसी नए ऐतिहासिक दस्तावेज का प्रयोग किया गया है. 

थरूर ने भूमिका में स्पष्ट किया है कि उनकी किताब भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर पहले से प्रकाशित किताबों और लेखों पर आधारित है. जाहिर है इन किताबों में ख़ुद जवाहरलाल नेहरू की लिखी किताब भी शामिल है. थरूर ने इन ज्ञात दस्तावेजों के सहारे नेहरू के निजी और राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन किया है.

नेहरू परिवार के संक्षिप्त परिचय में उन्होंने बताया है कि नेहरू परिवार को मूल उपनाम कौल था. उनके पूर्वज 18वीं सदी में कश्मीर से दिल्ली आकर बसे.

उस वक़्त शहर में कौल उपनामवाले कई नामी परिवार थे इसलिए नेहरू के पूर्वजों ने अपने नाम के आगे कौल-नेहरू लिखना शुरू किया क्योंकि उनका परिवार एक नहर के किनारे रहता था. एक अन्य संभावना यह है कि नेहरू उपनाम कश्मीर के बडगाम ज़िले के नारू गाँव से आया हालांकि इस बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती है.

मोतीलाल नेहरू को यकीन था उनका बेटा एक दिन महान आदमी बनेगा! लेकिन जवाहरलाल बचपन से लेकर कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने तक एक औसत छात्र ही बने रहे. कहीं भी और किसी भी क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं किया.

मोतीलाल अंग्रेजों और अंग्रेजी दोनों से बहुत ज़्यादा प्रभावित थे. 1885 में इंडियन कांग्रेस का जन्म हुआ और 1889 में नेहरू का. थरूर के मोतीलाल ने 1890 के दशक में एक बार अपने घर में यह नियम बना दिया कि घर में अंग्रेजी के अलावा कोई भाषा नहीं बोली जाएगी. लेकिन वो भूल गए कि घर के किसी भी महिला  सदस्य को अंग्रेजी शिक्षा नहीं प्राप्त थी! मोतीलाल चाहते थे कि उनका बेटा आरसी मजूमदार जैसा शख्स बने. मजूमदार 1899 में इंडियन कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे और वो उन शुरुआती भारतीयों में एक थे जिन्होंने इंडियन सिविल सर्विस(आईसीएस) की परीक्षा पास की थी.

पेशे से वकील मोतीलाल इलाहाबाद के धनी व्यक्तियों में गिने जाते थे. हर अंग्रेजी और आधुनिक चीज़ से उन्हें प्यार था. आज से करीब 100 साल पहले इलाहाबाद के उनके घर में स्विमिंग पूल, टेनिस कोर्ट, बिजली और नल के पानी जैसी सुविधाएँ उपलब्ध थीं. वो पहले इलाहाबादी थे जिसने कार ख़रीदी थी. जवाहरलाल को लालन-पालन बहुत ही रईसाना माहौल में हुआ. मोतीलाल चाहते थे कि उनका बेटा अंग्रेजों साहबों जैसा ही बने इसलिए उन्होंने उसे ब्रिटेन के प्रसिद्ध हैरो स्कूल और फिर ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ाया. जवाहरलाल का अकादमिक प्रदर्शन ऐसा नहीं था कि वो आईसीएस की परीक्षा पास कर सकें. 1905 से लेकर 1912 तक ब्रिटेन में रहने के बाद जवाहरलाल नेहरू भारत लौटे और वकालत के काम में अपने पिता का  हाथ बंटाने लगे. लेकिन इस काम में भी वो औसत साबित हुए.

भारत आने के बाद जवाहरलाल के अगले कुछ साल साधारण ही रहे. मोतीलाल इंडियन कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे. कांग्रेस की स्थापना ही  स्कॉटिश एओ ह्यूम ने इसलिए की थी ताकि भारत के अंदर अंग्रेजी शासन के खिलाफ उठ रहे प्रतिरोध के लिए एक सेफ्टी वॉल्व तैयार किया जा सके. ह्यूम की योजना के तहत ही  कांग्रेस में वही भारतीय शामिल हुए जिनके लिए भूरे अंग्रेज विशेषण का प्रयोग किया जाता है. कांग्रेस के शुरुआती सदस्य वही भारतीय थे जो अंग्रेजी शासन के दौरान भी लाभ के पदों पर थे. अपने पिता और गॉडमदर सरीखकी एनी बेसेंट के कांग्रेस से जुड़े होने के कारण जवाहरलाल का कांग्रेस की गतिविधियों में शामिल होना स्वाभाविक था.

जवाहरलाल 1912 में भारत आए थे और मोहनदास करमचंद गांधी 1915 में. मोहनदास भारत आने से पहले दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के ख़िलाफ़ अपने आंदोलन के कारण देश के शिक्षित वर्ग में जाने जाने लगे थे. 1915 में मोहनदास के राजनीतिक गुरु और कांग्रेस के अग्रणी नेता गोपालकृष्ण गोखले का मात्र 48 वर्ष की आयु में निधन हो गया. 1920 में कांग्रेस के एक अन्य बड़े नेता बाल गंगाधर तिलक का देहांत हो गया. इन दो बड़े नेताओं के निधन के बाद कांग्रेस का मुख्य नेतृत्व मोहनदास के हाथ में आ गया. थरूर के दिए ब्योरों से जाहिर होता है कि मोतीलाल नेहरू का मोहनदास गांधी से काफ़ी अच्छे संबंध थे. लेकिन ख़ुद जवाहरलाल का गांधी जी से लव-हेट रिलेशन था. नेहरू एक रूमानी भावुक और अतिउत्साही किस्म के नौजवान थे. उनके जीवन के ब्योरों से लगता है कि वो किसी भी काम में बस कूद पड़ते थे लेकिन निर्णायक मौकों पर अपने पिता मोतीलाल और पिता-तुल्य गांधी जी की बात मान लिया करते थे.

मोतीलाल अपने बेटे के भविष्य को लेकर अतिसचेत थे. जवाहरलाल के उज्जवल भविष्य के लिए वो जो भी कर सकते थे वो करते थे. जवाहरलाल अपने रूमानी भाषणों और युवासुलभ क्रांतिकारी भाषणों के कारण कुछ हद तक लोकप्रियता पाने में भी सफल रहे थे लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व की क़तार में काफ़ी जूनियर थे. लेकिन उनके पिता ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था. मोतीलाल 1928 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे. उन्होंने गांधी जी को इस बात के लिए राजी कर लिया कि 1929 में कांग्रेस के अध्यक्ष जवाहरहाल होंगे. जाहिर है कांग्रेस में बहुमत इसके पक्ष में नहीं था लेकिन कांग्रेस को गांधी जी की इच्छा के आगे झुकना पड़ा और नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बन गए.

नेहरू जब भी अपने जीवन में कांग्रेस अध्यक्ष बने और उन्हें ये पद कांग्रेस में बहुमत के ख़िलाफ़ गांधी जी की हठधर्मी के कारण मिला. 1946 में 15 प्रदेश कांग्रेस कमेटियों में से 12 ने वल्लभभाई पटेल के नाम अध्यक्ष पद के लिए भेजा था. लेकिन गांधी जी नेहरू को अपना उत्तराधिकारी चुना और जिसके फलस्वरूप वो भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. थरूर ने प्रधानमंत्री बनने तक के पहले के नेहरू का बहुत ही रोमांटिक खाका खींचा है. वो जवाहरलाल की सीमाओं का जिक्र तो करते हैं लेकिन उनका जोर इस बात पर ज़्यादा रहा है कि वो जवाहरलाल ने होते तो न जाने भारत का क्या हो जाता!! जबकि इस किताब में दिए गए विवरण ही जवाहरहाल की काबिलियत पर सवाल खड़ते नज़र आते हैं.

जवाहरलाल अपनी पीढ़ी के श्रेष्ठ अंग्रेजी लेखकों में एक थे. उनके लेखन और भाषणों में फैली रूमानियत ने बहुतों को उनकी  ओर आकर्षित किया. 1929 में पूर्ण स्वराज का नारा देकर उन्होंने देश के हजारों नौजवानों को दिल जीत लिया था. अपने भाषणों से उन्होंने अपनी छवि कांग्रेस में मौजूद एक विद्रोही वामपंथी युवा नेता की बनाई थी लेकिन ज़मीनी स्तर पर वो गांधीवादी थे. व्यावहारिक राजनीति में जवाहरहाल उतने परिपक्व नहीं प्रतीत होते जितने किसी ऐसे नेता के होने की उम्मीद की जाती है जिसके हाथ में 25 करोड़ लोगों का भविष्य हो.

थरूर के अनुसार भारत को चार प्रमुख चीज़ें, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, गुट-निरपेक्ष विदेश नीति और समाजवादी आर्थिक नीति जवाहरलाल नेहरू की देन है. थरूर के अनुसार विदेश नीति और समाजवादी आर्थिक नीति के मामले में नेहरू पूरी तरह विफल रहे. उनकी दूरदृष्टि की सीमा के कारण भारत अपेक्षित विकास नहीं कर सका. थरूर लंबे समय तक संयुक्त राष्ट्र में रहे हैं इसलिए विदेश नीति पर उनकी राय ज़्यादा काबिले-गौर है. थरूर ने इशारा किया है कि विदेशी कूटनीति के मामले में पाकिस्तान और चीन ने भारत से बेहतर प्रदर्शन किया. जवाहरलाल नेहरू दुनिया के नेताओं में काफ़ी लोकप्रिय थे लेकिन भारत को उनकी लोकप्रियता का कितना कूटनीति लाभ मिला, यह विवाद का विषय है.

थरूर ने नेहरू की सीमाओं के रूप में इस बात का भी जिक्र किया है कि वो किस तरह ख़ुद बेहत ईमानदार और शुचितावादी होने के बावजूद अपने क़रीबी लोगों के अनुचित कामों के प्रति अनभिज्ञ बने रहते थे. उनके परिवार के सदस्यों समेत उनके करीबी मंत्री और सलाहकार तक बड़े विवादों में घिरे लेकिन नेहरू ने उन्हें कभी अपने से दूर नहीं किया. लाइसेंस-कोटा-परमिट राज में जिस तरह का भाई-भतीजावाद और मठाधीशी फैली उसके लिए भी कहीं न कहीं भारत के पहले प्रधानमंत्री को कुछ हद तक जिम्मेदार माना जा सकता है.

जवाहरलाल नेहरू को भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की मजबूत नींव रखने वाला नेता माना जाता है. थरूर ने भी नेहरू के इस पक्ष पर  जोर दिया है. थरूर नेहरू को देश को तकनीकी औरर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश को उचित दिशा में ले जाने का श्रेय देते हैं. थरूर मानते है कि नेहरू ने विक्रम साराभाई और होमी भाभा जैसे काबिल वैज्ञानिकों को देश में विज्ञान का भविष्य तय होने के लिए चुना और दोनों ही उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे. हालांकि थरूर को इस मामले में भी थोड़ी शिकायत है कि नेहरू के विज्ञानप्रेम और प्रोत्साहन के बावजूद देश की स्थिति ऐसी थी कि आज़ादी के बाद विज्ञान का नोबेल जीतने वाले दो वैज्ञानिकों हरगोविंद खुराना(1968) और एस चंद्रशेखर(1983) को अमरीका में जाकर बसना पड़ा, जहाँ उन्हें नोबेल मिला.

थरूर ने पूरी किताब में नेहरू को एक महान नेता के रूप में चित्रित किया है जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी. किताब पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि थरूर भी मानते हैं कि "मानवता का इतिहास कुछ महान मनुष्यों का इतिहास है."  और आज़ाद भारत का आविष्कार(इनवेंशन) जवाहरलाल नेहरू ने किया है. नेहरू की विदेश नीति और अर्थ नीति की थरूर ने सौम्य आलोचना की है, लेकिन वो भी शायद उसी सीमा तक जहाँ नेहरू का बचाव संभव ही नहीं. 

20 नवंबर 2014

हम लोग

दिल के ऐवाँ में लिये गुलशुदा शम्ओं की क़तार
नूरे-ख़ुर्शीद से सहमे हुए उकताए हुए
हुस्ने-महबूब के सय्याल तसव्वुर की तरह
अपनी तारीकी को भींचे हुए, लिपटाये हुए

ग़ायते-सूदो-ज़ियाँ सूरते-आग़ाजो मआल
वही बेसूद तजस्सुस वही बेकार सवाल
मुज़्महिल साअते-इमरोज़ की बेरंगी से
यादे-माज़ी से ग़मी दहशते-फ़र्दा से निढाल

तश्ना अफ़कार जो तस्कीन नहीं पाते हैं
सोख़्ता अश्क जो आँखों में नहीं आते हैं
इक कड़ा दर्द के: जो गीत में ढलता ही नहीं
दिल के तारीक शिग़ाफों से निकलता ही नहीं
और इक उलझी हुई मौहूम-सी दरमाँ की तलाश
दश्तो-ज़िंदाँ की हवस, चाके-गरेबाँ की तलाश

- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गुलशुदा शम्ओं की कतार- बुझे हुए दियों की पंक्ति
नूरे-ख़ुर्शीद - सूरज की रोशनी
सय्याल तसव्वुर - तरल कल्पना
ग़ायतो-सूो-ज़ियाँ - लाभ-हानि की वजहें
सूरते-आग़ाजे मआल- दुनिया के आदि-अंत का स्वरूप
बेसूद तजस्सुस- व्यर्थ की जिज्ञासा
मुज़्महिल - क्लांत, पीड़ाभरा
साअते-इमरोज़- आज के क्षण
यादे-माज़ी से गमी - अतीत की यादों से दुखी
दहशते-फ़र्दा - भविष्य का डर
तश्ना अफ़कार - प्यासे विचार
तस्कीन - संतुष्टि
सोख़्ता अश्क - सूखे हए आँसू
शिग़ाफों- दरारों
दरमाँ - सांत्वना
दश्तो-ज़िंदाँ - जंगल और जेल 

14 नवंबर 2014

सोचता हूँ, बाबर ज़्यादा काबिल था या नेहरू?

(1889-1964)
पहली बार इस साल नवंबर की आहट के साथ ही मेरे मन में एक भोली इच्छा ने जन्म लिया कि इसबार सभी बच्चों के चाचा कहे जाने वाले जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन पर कुछ लिखूँगा.

दिक्कत यह हुई कि नेहरू के बारे में जितनी भी अच्छी बातें हो सकती हैं वो सब हमें स्कूल की किताबों और निबंध-भाषण प्रतियोगिताओं के जरिए बताया जा चुकी हैं.

और जब मेरे सिर के बाल नेहरू स्टाइल में होने के आए हैं, मन बार-बार पूछता है कि देश के पहले कर्णधार ने देश को कौन सी दिशा दी.

ज़हन में सवाल उठता है कि बाबर ज़्यादा काबिल था या नेहरू. हुमायूँ की तुलना इंदिरा से संभव है,. क्या राजीव गांधी अकबर बन सकते थे? क्या नेहरू वंश में कोई जहाँगीर न होगा...राहुल गाँधी भरी जवानी में बहादुर शाह जफर बन जाएंगे?

मन में सवाल उठा कि क्या जवाहरलाल ने भारत की नियति से भेंट (tryst with destiny) अंग्रेज़ी में न कराकर हिन्दुस्तानी में करायी होती तो इस देश का मुस्तकबिल कुछ और होता. क्या वो कमालअतातुर्क जैसे कुछ हो गए होते?

नागार्जुन की कविता याद आती रही...आओ रानी हम ढोएंगे पालकी...यही हुई है राय जवाहरलाल की...

जब मेरे बाल दिवस थे तब तो लड्डू से मन बहल जाता था लेकिन अब मन सोचता है कि एशिया को जो मुल्क हमारे साथ या हमारे बाद आज़ाद हुए उनकी तुलना में भारत कहाँ है?

जिन देशों के पास नेहरू न थे उनका भविष्य कैसा रहा?

नेहरू रुमानी थे, जीवन में भी राजनीति में भी. लेकिन क्या उनकी रूमानियत देवदास जैसी आत्महंता सिद्ध हुई?

नेहरू न होते, पटेल होते जैसी बातों पर मुझे यकीन नहीं. यूँ होता तो क्या होता....का कोई अंत नहीं.

लेकिन जो हुआ....वो क्या हुआ..कैसे हुआ उसी को समझने की कोशिश है...

और हुआ यही कि नेहरू हुए, करोड़ों भारत के मुस्तकिबल हुए.

नेहरू की 125वीं जयंति पर मीडिया में जो छप रहा है उसमें रामचरितमानस की गंध आती है.

इसलिए आख़िरी फ़ैसला यह किया कि नेहरू पर कुछ लिखने से पहेल, कोई अंतिम राय बनाने से पहले...साल-दो साल नेहरू केंद्रित अध्ययन किया जाए.

लिखने का तो ये है कि जीते रहे तो इस देश में उनकी 126वीं, 127वीं, 128वीं जयंतियाँ आती ही रहेंगी और उनके साथ ही उनपर लिखने के बहाने भी मिलते रहेंगे.


2 नवंबर 2014

गांधी की कलम से - गोर्की

मैक्सिम गोर्की(1868-1936)
मोहनदास करमचंद गांधी ने समय-समय पर अपने समकालीनों पर लिखा करते थे. उन्होंने कई बार उन इतिहास पुरुषों पर भी लिखा जिनसे वो प्रेरित हुए थे. नेशनल बुक ट्रस्ट ने नवजीवन ट्रस्ट से साभार गांधी के ऐसे ही लेखों का संकलन प्रकाशित किया था. जिसका संकलन और संपादन यूएस मोहन राव ने किया. 

इसी संग्रह से कुछ लेखों को हिन्दी अनुवाद में ब्लॉग पर प्रकाशित करने का इरादा है. पेश है पहला लेख रूस के अग्रणी साहित्यकार मैक्सिम गोर्की पर -  रंगनाथ सिंह

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मोहनदास करमचंद गांधी

एक सीमा तक भारत और रूस के लोगों के बीच तुलना की जा सकती है. जैसे हम ग़रीब हैं, रूसी लोग भी ग़रीब हैं. सरकार के कामकाज़ में हमारी कोई नहीं सुनता और हमें बिना किसी हीलहुज्जत के टैक्स देने होते हैं, रूसी लोगों के साथ भी यही होता है. 

ऐसे शोषण को देखकर कुछ रूसी समय-समय पर इसके विरोध के लिए सामने आते रहे हैं. कुछ समय पहले ही रूस में एक विद्रोह हुआ था और उसमें भाग लेने वाले प्रमुख लोगों में थे लेखक गोर्की. 

उनका बचपन बेहद ग़रीबी में बीता था. उन्होंने पहले एक जूते बनाने वाले की दुकान पर काम किया, जिसने उन्हें काम से निकाल दिया था. उसके बाद कुछ समय तक उन्होंने सैनिक के रूप में काम किया. 

सेना में नौकरी के दौरान ही उनके मन में शिक्षा के प्रति लालसा जगी लेकिन ग़रीब होने के कारण वो किसी अच्छे स्कूल में प्रवेश नहीं ले सकते थे.

उसके बाद उन्होंने एक वकील के यहाँ नौकरी की और अंततोगत्वा वो एक ब्रेड बनाने वाली दुकान में हॉकर का काम करने लगे. इन सभी कामों के दौरान वो निजी प्रयासों से ख़ुद को शिक्षित करते रहे.

मोहनदास करमचंद गांधी (1869-1948)
1892 में लिखी उनकी पहली ही किताब इतनी अच्छी थी कि वो जल्द ही मशहूर हो गए. उसके बाद उन्होंने बहुत सारी चीज़ें लिखीं हैं और जहाँ तक सम्भव है, उनके सारे लेखन का एक ही मक़सद है, लोगों को उस शोषण के ख़िलाफ़ जगाना जिसमें वो जी रहे हैं, शासन को चेतावनी देना और समाज की सेवा करना. 

पैसे कमाने की चिंता किए बग़ैर वो इतने तीखे और जोरदार ढंग से लिखते हैं कि सरकारी अधिकारियों की उनपर कड़ी नज़र रहती है.

लोगों की सेवा करने के लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा है लेकिन वो ऐसे काम के लिए जेल जाने को सम्मान की बात समझते हैं. ऐसा माना जाता है कि इस वक़्त यूरोप में जनता का पक्ष लेने वाला उनके जैसा दूसरा कोई लेखक नहीं है.


इंडियन ओपिनियन, 01-07-1905 (मूल गुजराती में)


29 अक्तूबर 2014

रेहाना जब्बारी का माँ के नाम आख़िरी संदेश और वसीयत



रेहाना जब्बारी (1988-2014)

रेहाना जब्बारी के बारे में दुनिया को पहली बार 2007 में पता चला. तब उनकी उम्र महज 19 साल थी. उन्हें हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. रेहाना का कहना था कि ईरान के ख़ुफ़िया मामलों के मंत्रालय के  पूर्व कर्मचारी 47 वर्षीय मुर्तज़ा अब्दुलाली सरबंदी ने उनका बलात्कार करने की कोशिश की थी और वो अपना बचाव भर कर रही थीं.

रेहाना को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपील की गई. प्रयास किए गए. सोशल मीडिया पर उन्हें मौत की सज़ा से बचाने के लिए अभियान चलाया गया. लेकिन सब बेअसर रहा. ईरान सरकार पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा.

ईरान के क़िसास क़ानून के अनुसार जिस परिवार के व्यक्ति की हत्या हुई है वो चाहे तो हत्या के अभियुक्त की फांसी माफ़ कर सकता है. ऐसे में संबंधित व्यक्ति को कारावास की सज़ा होती है या अन्य प्रकार का हर्जाना देना होता है. मृतक के परिवार का मानना है कि रेहाना ने ये हत्या साजिशन की थी. ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयतुल्लाह ख़ुमैनी भी रेहाना का मृत्युदंड माफ कर सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

2007 से 2014 तक चले इस मुक़दमे के बाद शनिवार, 25 अक्टूबर, 2014 को रेहाना को तेहरान की एक जेल में फांसी दे दी गई. माना जा रहा है कि रेहाना ने कुछ महीने पहले अपनी माँ के नाम एक ऑडियो संदेश भेजा था जिसे उन्होंने अपनी वसीयत भी बताया था.  नेशनल काउंसिल ऑफ़ रेज़िसटेंस ऑफ ईरान ने उस संदेश का अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध कराया है. यह हिन्दी अनुवाद उसी के आधार पर किया गया है. - रंगनाथ सिंह

पढ़ें, रेहाना जब्बारी का संदेश उनकी माँ के नाम


प्यारी शोले

मुझे आज पता चला कि अब मेरी क़िसास की बारी आ गई है. मुझे इस बात कि दुख है कि आपने मुझे यह क्यों नहीं बताया कि मैं अपनी ज़िंदगी की किताब के आख़िरी पन्ने तक पहुँच चुकी हूँ. आपको नहीं लगता कि मुझे ये जानना चाहिए था? आप जानती हैं कि मैं इस बात से कितनी शर्मिन्दा हूँ कि आप दुखी हैं. आपने मुझे आपका और अब्बा का हाथ चूमने का मौक़ा क्यों नहीं दिया?


दुनिया ने मुझे 19 बरस जीने का मौक़ा दिया. उस अभागी रात को मेरी हत्या हो जानी चाहिए थी. उसके बाद मेरे जिस्म को शहर के किसी कोने में फेंक दिया जाता, और कुछ दिनों बाद पुलिस आपको मेरी लाश की पहचान करने के लिए मुर्दाघर ले जाती और वहाँ आपको पता चलता है कि मेरे साथ बलात्कार भी हुआ था. मेरा हत्यारा कभी पकड़ा नहीं जाता क्योंकि हमारे पास उसके जितनी दौलत और ताक़त नहीं है. उसके बाद आप अपनी बाक़ी ज़िंदगी ग़म और शर्मिंदगी में गुज़ारतीं और कुछ सालों बाद इस पीड़ा से घुट-घुट कर मर गई होतीं और ये भी एक हत्या ही होती.


लेकिन उस मनहूस हादसे के बाद कहानी बदल गयी. मेरे शरीर को शहर के किसी कोने में नहीं बल्कि कब्र जैसी एविन जेल, उसके सॉलिटरी वार्ड और अब शहर-ए-रे की जेल जैसी कब्र में फेंका जाएगा. लेकिन आप इस नियति को स्वीकार कर लें और कोई शिकायत न करें. आप मुझसे बेहतर जानती हैं कि मौत ज़िंदगी का अंत नहीं होती.

आपने मुझे सिखाया है कि हर इंसान इस दुनिया में तजुर्बा हासिल करने और सबक सीखने आता है. हर जन्म के साथ हमारे कंधे पर एक ज़िम्मेदारी आयद होती है. मैंने जाना है कि कई बार हमें लड़ना होता है. मुझे अच्छी तरह याद है कि आपने मुझे बताया था कि बघ्घी वाले ने उस आदमी का विरोध किया था जो मुझपर कोड़े बरसा रहा था लेकिन कोड़ेवाले ने उसके सिर और चेहरे पर ऐसी चोट की जिसकी वजह से अंततः उसकी मौत हो गयी. आपने मुझसे कहा था कि इंसान को अपने उसूलों को जान देकर भी बचाना चाहिेए.
  
जब हम स्कूल जाते थे तो आप हमें सिखाती थीं कि झगड़े और शिकायत के वक़्त भी हमें एक भद्र महिला की तरह पेश आना चाहिए. क्या आपको याद है कि आपने हमारे बरताव को कितना प्रभावित किया है? आपके अनुभव ग़लत थे. जब ये हादसा हुआ तो मेरी सीखी हुई बातें काम नहीं आयीं. अदालत में हा़ज़िर होते वक़्त ऐसा लगता है जैसे मैं कोई क्रूर हत्यारा और बेरहम अपराधी  हूँ. मैं ज़रा भी आँसू नहीं बहाती. मैं गिड़गिड़ाती भी नहीं. मैं रोई-धोई नहीं क्योंकि मुझे क़ानून पर भरोसा था.


लेकिन मुझपर ये आरोप लगाया गया कि मैं जुर्म होते वक़्त तटस्थ बनी रही. आप जानती हैं कि मैंने कभी एक मच्छर तक नहीं मारा और मैं तिलचट्टों को भी उनके सिर की मूँछों से पकड़कर बाहर फेंकती थी. अब मैं एक साजिशन हत्या करने वाली कही जाती हूँ. जानवरों के संग मेरे बरताव की व्याख्या मेरे लड़का बनने की ख़्वाहिश के तौर पर की गयी. जज ने ये देखना भी गंवारा नहीं किया कि घटना के वक़्त मेरे नाख़ून लंबे थे और उनपर नेलपालिश लगी हुई थी.


जजों से न्याय की उम्मीद करने वाले लोग कितने आशावदी होते हैं! किसी जज ने कभी इस बात पर सवाल नहीं उठाया कि मेरे हाथ खेल से जुड़ी महिलाओं की तरह सख्त नहीं हैं, ख़ासतौर पर मुक्कबाज़ लड़कियों के हाथों की तरह. और ये देश जिसके लिए आपने मेरे दिल में मुहब्बत भरी थी, वो मुझे कभी नहीं चाहता था. जब अदालत में  मेरे ऊपर सवाल-जवाब का वज्र टूट रहा था और मैं रो रही थी और अपनी ज़िंदगी के सबसे गंदे अल्फ़ाज़ सुन रही थी तब मेरी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया. जब मैंने अपनी ख़ूबसूरती की आख़िरी पहचान अपने बालों से छुटकारा पा लिया तो मुझे उसके बदले 11 दिन तक तन्हा-कालकोठरी में रहने का इनाम मिला.


प्यारी शोले, आप जो सुन रही हैं उसे सुनकर रोइएगा नहीं. पुलिस थाने में पहले ही दिन एक बूढ़े अविवाहित पुलिस एजेंट ने मेरे नाखूनों के लिए मुझे चोट पहुँचायी. मैं समझ गयी कि इस दौर में सुंदरता नहीं चाहिए. सूरत की ख़ूबसूरती, ख़्यालों और ख़्वाबों की ख़ूबसूरती, ख़ूबसूरत लिखावट, आँखों और नज़रिए की ख़ूबसूरती और यहाँ तक कि किसी प्यारी आवाज़ की ख़ूबसूरती भी किसी को नहीं चाहिए.

मेरी प्यारी माँ, मेरे विचार बदल चुके हैं और इसके लिए आप ज़िम्मेदार नहीं है. मेरी बात कभी ख़त्म नहीं होने वाली और मैंने इसे किसी को पूरी तरह दे दिया है ताकि जब आपकी मौजूदगी और जानकारी के बिना मुझे मृत्युदंड दे दिया जाए तो उसके बाद इसे आपको दे दिया जाए. मैं आपके पास अपने हाथों से लिखी इबारत धरोहर के रूप में छोड़ी है.


हालाँकि, मेरी मौत से पहले मैं आपसे कुछ माँगना चाहती हूँ, जिसे आपको अपनी पूरी ताक़त और कोशिश से मुझे देना है. दरअसल बस यही एक चीज़ है जो अब मैं इस दुनिया से, इस देश से और आपसे माँगना चाहती हूँ. मुझे पता है आपको इसके लिए वक़्त की ज़रूरत होगी. इसलिए मैं आपको अपनी वसीयत का हिस्सा जल्द बताऊँगी. आप रोएँ नहीं और इसे सुनें. मैं चाहती हूँ कि आप अदालत जाएँ और उनसे मेरी दरख़्वास्त कहें. मैं जेल के अंदर से ऐसा ख़त नहीं लिख सकती जिसे जेल प्रमुख की इजाज़त मिल जाए, इसलिए एक बार फिर आपको मेरी वजह से दुख सहना पड़ेगा. मैंने आपको कई बार कहा है कि मुझे मौत की सज़ा से बचाने के लिए आप किसी से भीख मत माँगिएगा लेकिन यह एक ऐसी ख़्वाहिश है जिसके लिए अगर आपको भीख माँगनी पड़े तो भी मुझे बुरा नहीं लगेगा.


मेरी अच्छी माँ, प्यारी शोले, मेरी ज़िंदगी से भी प्यारी, मैं ज़मीन के अंदर सड़ना नहीं चाहती. मैं नहीं चाहती कि मेरी आँखे और मेरा नौजवान दिल मिट्टी में मिल जाए. इसलिए मैं भीख माँगती हूँ कि मुझे फांसी पर लटकाए जाने के तुरंत बाद मेरे दिल, किडनी, आँखें, हड्ड्याँ और बाक़ी जिस भी अंग का प्रतिरोपण हो सके उन्हें मेरे शरीर से निकाल लिया जाए और किसी ज़रूरतमंद इंसान को तोहफे के तौर पर दे दिया जाए. मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग मिलें उसे मेरा नाम पता चले, वो मेरे लिए फूल ख़रीदे या मेरे लिए दुआ करे. मैं सच्चे दिल से आपसे कहना चाहती हूँ कि मैं अपने लिए कब्र भी नहीं चाहतीं, जहाँ आप आएँ, मातम मनाएँ और ग़म सहें. मैं नहीं चाहती कि आप मेरे लिए काला लिबास पहनें. मेरे मुश्किल दिनों को भूल जाने की आप पूरी कोशिश करें. मुझे हवाओं में मिल जाने दें.


दुनिया हमें प्यार नहीं करती. इसे मेरी ज़रूरत नहीं थी. और अब मैं इसे उसी के लिए छोड़ कर मौत को गले लगा रही हूँ. क्योंकि ख़ुदा की अदालत में मैं इंस्पेक्टरों पर मुक़दमा चलावाऊँगी, मैं इंस्पेक्टर शामलू पर मुक़दमा चलवाऊँगी, मैं जजों पर मुक़दमा चलवाऊँगी और देश के सुप्रीम कोर्ट की अदालत के जजों पर भी मुक़दमा चलवाऊँगी जिन्होंने ज़िंदा रहते हुए मुझे मारा और मेरा उत्पीड़न करने से परहेज नहीं किया. दुनिया बनाने वाली की अदालत में मैं डॉक्टर फरवंदी पर मुक़दमा चलवाऊँगी, मैं क़ासिम शाबानी पर मुक़दमा चलवाऊँगी और उनसब पर जिन्होंने अनजाने में या जानबूझकर मेरे संग ग़लत किया और मेरे हक़ को कुचला और इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि कई बार जो चीज़ सच नज़र आती है वो सच होती नहीं.


प्यारी नर्म दिल शोले, दूसरी दुनिया में मैं और आप मुक़दमा चलाएंगे और दूसरे लोग अभियुक्त होंगे. देखिए, ख़ुदा क्या चाहते हैं. ..मैं तब तक आपको गले लगाए रखना चाहती हूँ जब तक मेरी जान न निकल जाए. मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ.

रेहाना
01, अप्रैल, 2014