19 जून 2014

आलोकधन्वा: दो पग कम चलना पर चलना मटक के


मोनिका कुमार 

प्रश्नोत्तर शैली में लिखा गया यह लेख पाखी पत्रिका के आलोकधन्वा विशेषांक के लिए लिखा गया है. पत्रिका ने किंचित संपादित रूप में इसे प्रकाशित किया है. तो पढ़ें, सवाल पाखी के और जवाब मोनिका कुमार के.

1) आलोकधन्वा को समकालीन कवियों में आप कहां पाती हैं?

समकालीनता को आधार बनाते हुए की/दी समीक्षा/तुलना/उपमा इस खतरे से खाली नहीं कि ये अवलोकनार्थ कवियों को आलोचना के रूढ़ मुहावरे में बलपूर्वक खींचने की चेष्टा करती है, समकालीन विश्लेषण इस बात को पहले से मानता है कि एक ही समय में विचरण करने वाले मनुष्यों में तमाम असहमतियों और विसंगतियों के बावजूद उनके आस पास के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों ने निर्मित कुछ ऐसी ज़मीन या आधार है जिसे किन्हीं सूत्रों से समझा जा सकता है. काल-सजगता इतिहास के लेखन के लिए अनिवार्य है, साहित्य को ऐतिहासिक दृष्टि से देखना ज़रुरी है, इतिहास के बगैर भविष्य की कल्पना क्या और चूंकि कविता कहीं ना कहीं सामाजिक सन्दर्भों में स्थापित होती है इसलिए इन सूत्रों पर आधारित आकलन  पत्रिकायों, पाठ्यक्रम और स्टडी सर्कल्स की ज़रूरत है, समकालीन अवलोकन अकादमिक ज़रूरत है, आलोचकों और बुद्धिजीवियों की ज़रूरत है वरना कविता के शौक़ीन और सौदाई तो आलोकधन्वा की दो पंक्तियाँ उद्धृत करके भी कहेंगे ‘कमाल है’, आलोचक जिम्मेवार भाषा में कमाल शब्द के अतिशय और छलांग को नियंत्रित करते हुए कहेंगे यह कवि समकालीन कवियों से ‘अलग है’. आलोकधन्वा को समकालीन कवियों में कहाँ पाने से पूर्व कुछ तथ्यों का संज्ञान लेना महत्वपूर्ण होगा.

आलोकधन्वा का जन्म 1948 में हुआ, पहली कविता ‘जनता का आदमी’ 25 वर्ष की उम्र में
1972 में ‘वाम’ पत्रिका में प्रकाशित होती है. संग्रह रूप में कविताएं 1998 में प्रकाशित होती है. 40-50 के शतक में जो महत्वपूर्ण कवि ( सूची के मुक्कमल होने का कोई दावा नहीं ) हुए उन में गोरख पाण्डेय (1945), अदम गोंडवी (1945), मंगलेश डबराल (1948), अशोक वाजपेयी (1941) , राजेश जोशी (1946) और नवीन सागर (1948) हैं. कुल मिला कर यह देश के आज़ाद होने के बाद का परिदृश्य है जिस में इन कवियों ने अपनी काव्य सामर्थ्य और अंतर्दृष्टि से कवितायों में व्यक्त किया . आलोकधन्वा अपने समकालीनों से कैसे ‘अलग’ हैं, इसका उत्तर अगले प्रश्न के उत्तर में.

2 ) प्रतिरोध और गहरे सरोकार से तप्त उनकी कविताएं क्या इसलिए प्रभावशील और महत्वपूर्ण बन गई क्योंकि वह एक सामाजिक आंदोलन से निकले हुए कवि हैं ?

ये कविताएं इसलिए प्रभावशील और महत्वपूर्ण बन गयी क्यूंकि आलोकधन्वा की कवितायों का स्वर मात्र किसी सामाजिक कार्यकर्ता-कवि की तरह वस्तुनिष्ठ नहीं अपितु बहुत निजी, आशीष नंदी के शब्दों में कहें तो ‘इंटिमेट’ लगता है, ‘इंटिमेट एनिमी’ के विरुद्ध ‘इंटिमेट’ प्रतिरोध, आलोकधन्वा की पहली कविता तब आती है जब देश को आज़ाद हुए 26 वर्ष हो चुके हैं और देश का बुद्धिजीवी वर्ग अचूक ढंग से देख रहा है  लोकतन्त्र को कैसे नए शासकों ने अपने अनुकूल कर लिया है. उस दौर से सभी प्रगतिशील कवि समाजवाद का सपना बुन रहे हैं,1936 से विकसित हो रहे प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य भी प्रतिरोध दर्ज करने में सक्रिय हैं. इस दौर को कुछ कवियों ने यथास्थिति को कुछ ऐसे बयान किया है

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

                                 ( दुष्यंत (जन्म 1931) )

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
                                    (अदम गोंडवी)

अविचल रहती है कुर्सी
माँगों और शिकायतों के संसार में
आहों और आँसुओं के
संसार में अविचल रहती है कुर्सी
पायों में आग
लगने
तक।
                       ( गोरख पाण्डेय )
मूल प्रश्न पर लौटते हुए यहाँ यह बताना ज़रुरी है कि उपरोक्त जिन समकालीन कवियों को उद्धृत किया गया, उन्होंने प्रभावशाली ढंग से  गम-ए-दौरां अभिव्यक्त किया और आलोकधन्वा की कविता समाजवाद का सपना किन कारणों से गौण हो रहा है इसे समझने का शऊर देती है , प्रतिनिधि प्रजातंत्र में ‘इंटिमेट एनिमी’ को कैसे बेनकाब किया जाए, उसे कैसे पहचाना जाए,उसके कुछ गुर और युक्तियाँ भी देती है, डेमोक्रेसी और ब्यूरोक्रेसी की जुगलबंदी से जो देश चलता है - इसे समझने की कुंजी भी देती है.

एजाज़ अहमद महत्वपूर्ण लेख ‘ द पॉलिटिक्स ऑफ लिटररी पोस्ट कोलोनियलटी’ में सलमान रश्दी पर फतवा लगने के मसले पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हैं कि ‘मोनार्की की तानाशाही और क्लर्कों के फाशिस्ज्म में भेद करना बहुत जरुरी है’ क्यूंकि इनके दमन और शोषण की मशीनरी तानाशाह जैसी नहीं है, यह जिलाधीश है जो निर्जन में नहीं पला, जिसने राजा की तरह आभूषण नहीं पहने और वेशभूषा भी राजसी नहीं है, एक देश जिसका साक्षरता स्तर बहुत कम है, जिसमें राजनैतिक चेतना नहीं है, जिसने अंग्रेजों की बस्ती बनने से पूर्व राजा या राजा के अधिकारियों का राज देखा है, यहाँ आलोकधन्वा यह असानियत लाने की कुवत रखते हैं, उस इंटिमेट एनिमी की शिनाख्त के लक्षण बताते हैं, जनता प्रजातंत्र की आदि नहीं है इसलिए ब्यूरोक्रेसी के फरेब समझने में भूल कर सकती है,

यह दूर किसी किले में - ऐश्वर्य की निर्जनता में नहीं
हमारी गलियों में पैदा हुआ एक लड़का है
यह हमारी असफलताओं और गलतियों के बीच पला है
यह जानता है हमारे साहस और लालच को
राजाओं से बहुत ज़्यादा धैर्य और चिन्ता है इसके पास

आजादी की स्पिरिट की अनुपस्थिति जिसे आलोकधन्वा के समकालीन बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत करते हैं, आलोकधन्वा एक कदम आगे बढकर इसके कारणों को लक्षित करने का प्रयास करते हैं जो उनकी कविता की विलक्षण उपलब्धि है.

आंदोलन से जुडना निश्चित ही अधिक मकबूलियत का कारण हो सकता है गौरतलब है कि आलोकधन्वा की मकबूलियत मात्र प्रतिरोध के मुखर स्वर की वजह से नहीं है, जिन कवितायों में जिलाधीश नहीं है, गोली-पोस्टर नहीं है  वहाँ बकरियां, पतंग, कोयल,आलुओं, बेरों और पानी,कपड़ों के जूतों, तरबूज,जैसी नरम उपस्थितियाँ हैं, उन स्त्रियों का वैभव हैं जिन्होंने कवि को चौक पार करना सिखाया, उन लड़कियों की बहादुरी है जिन्हें पता है उनके लिखे पत्र, आबनूस और शीशा भी छुपा दिया जायेगा पर वे तब भी चिठ्ठी छोड़ कर भाग जाती हैं, इन विषय वस्तुओं का संसार जिलाधीश के क्षेत्राधिकार से अलग नहीं है, आलोकधन्वा की संवेदना व्याप्त और समृद्ध है,उनके पास खोजी दिमाग ही नहीं बल्कि विश्व के महान रोमांटिक कवियों की तरह ऐसी नज़र, वही फकत नज़र भी है जो अपने चौगिर्दे को सूक्ष्मता और बेहद लगाव से देखती है. 

कुल मिला कर कवि के पास एकांत है तजदीद के लिए, सक्रियता है, सरोकार है समाज से सहज रूप से जुड़ने के लिए. इस कवि की एकाग्रता विलक्षण है, यह लेख लिखने से पूर्व इन्टरनेट पर कवि के शुरूआती जीवन के बारे में पढ़ने के लिए सामग्री ढूँढने की कोशिश की तो कुछ नहीं मिला, एकमात्र पुस्तक में ब्लर्बनुमा भी कुछ नहीं है, जन्मोपरांत सीधा सन 1972 है जब कवि की पहली कविता प्रकाशित और चर्चित हुई. कवि की सक्रियता का उल्लेख है. कोई विशेष साक्षात्कार नहीं है, कोई डायरी लेखन नहीं है, शायद अपने समकालीन राजेश जोशी से इस विधा के ढब को समझ लिया हो क्यूंकि डायरी लिखते वक्त ‘सारी सच्चाई किसी न किसी रूपक में बदल जाती है’. आलोकधन्वा के बचपन को उन्हीं की कवितायों में पढ़ना होगा .बचपन, पढाई लिखाई, माँ-बाप, स्कूल-कालिज जैसे विवरण और विधिवत सीवी की अनुपस्थिति में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण को काफी जगह मिलती है, जैसे मुझे यह कविताएं पढ़कर लगता है जैसे आलोकधन्वा ने किसी जिज्ञासु बच्चे की तरह इंटेंस बचपन जिया होगा, बेशक मेरे पास आलोकधन्वा की कुल 55 कविताएं  और एक घटना का उल्लेख है जो प्रश्नमाला में ‘ किसी कवि के जीवन में आई ढलान क्या उसे उसकी कविता के क्षरण की ओर ले जाती है ?’ जैसे प्रश्न को शामिल करता है.

3 ) आज आंदोलन उस तरह से नहीं हैं, तब क्या उनकी कविताएं कहीं कमजोर हो गई हैं ?

मुझे नहीं लगता आम जनता जिलाधीश को, उसके ‘पब्लिक सर्वेंट’ होने के लबादे को समझ गई है जो ‘सीखने’ का आग्रह आलोकधन्वा ने ‘जिलाधीश’ में किया है, ऐसा भी नहीं मालूम पड़ता कि ‘किसी सही आदमी के लिए जेल उड़ा देने वाली कविताएं पैदा हो गई है’ ‘भागी हुई लडकियां’ क्या समाज में स्वीकार्य हो गई हैं ?, क्या आज भी उनकी ‘संभावना की तस्करी’ नहीं होती ? क्या हत्या और आत्महत्या में फर्क कर लेना सीख लिया गया है ? अपितु आज के भारत में जो वैकल्पिक राजनीति की संभावना प्रकट हुई है, आम आदमी को केन्द्र में रखते हुए, इस आम आदमी को अपनी शक्ति की पहचान कराने के लिए आलोकधन्वा की कविताएं  माकूल हो सकती हैं

जिसे आप मामूली आदमी कहते है;
क्योंकि वह किसी भी देश के झंडे से बड़ा है।
इस बात को वह महसूस करने लगा है,
महसूस करने लगा है वह
अपनी पीठ पर लिखे गये सैकड़ों उपन्यासों,
अपने हाथों से खोदी गयी नहरों और सड़कों को

दूसरी ओर आलोकधन्वा की जो और कविताएं हैं, उस में निहित जो चिंताएं हैं, आज उनकी प्रसंगिकता और भी बढ़ी है.

4 ) किसी कवि के जीवन में आई ढलान क्या उसे उसकी कविता के क्षरण की ओर ले जाती है ?
जीवन में आई ढलान कवियों को कविता के उत्कर्ष तक भी ले जाती है इसलिए जीवन में आई ढलान उसे कहाँ ले जाती है, इस बारे में निश्चित रूप से कुछ कहना सरलीकरण के दुष्प्रभावों से रहित ना होगा, कविता की उर्वरता कवि के निजी जीवन के सुख-दुःख से स्वतंत्र भी हो सकती है, इस विमर्श को आगे बढाने में यह संकट निहित है कि हम कविता लिखने को रहस्यपूर्ण प्रक्रिया के रूप में स्थापित कर दें जबकि हमारे पास सैंकडों तथ्य है जहाँ लोगों ने लिखने का सजगता से किसी प्रयोजन हेतु प्रयोग किया, हर कवि जानता है कि लिखने की प्रक्रिया में कुछ मेटाफिजिक्स है भी और नहीं भी, लोग जीवन से बेज़ार हुए, सामाजिक जीवन को लगभग खत्म करके एकांत में सतत लिखने में अपने अस्तित्व को पुख्ता करने की कोशिश की, लोगों ने तमाम कारोबार और शोर-ओ-गुल के मध्य लिखा, दफ्तर में क्लर्क की नौकरी करते हुए लिखा, जेल में, घर की बरसातियों में लिखा, सुरक्षित परिवार में रहते हुए लिखा, यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरान ने वातानुकूलित कमरे में लिखा, पूरा वक्ती लेखक बनने की चाह में रेजीडेंसी प्रोग्राम के तहत, सरकारी वजीफों की मदद से लिखा, किसी ने जिंदा रहने के लिए, किसी ने समाज के दमनकारी ताकतों के प्रतिरोध में अपनी अस्मिता के दावे के रूप में लिखा, किसी ने मौत से पहले वक्त काटने के लिए प्रतीक्षा में लिखा, लिखने को जीने का पर्याय मानने वाले भी बहुत लोग हैं, संत्रास को आस बना कर लिखा, किसी ने लिखने को अमर बेल की प्रोक्सी रूप में चखा, कवि की प्रेरणाएं अथाह हो सकती हैं और प्रेरणा बगैर भी लिखना संभव है, अभाव में लोगों ने शाहकार पैदा किये, समृद्धि में भी किये, लिखने का शायद न्यूनतम मेटाफिजिक्स यह है कि लिखना ऐच्छिक है. 

लिखने की उपयोगिता और नैतिकता विवादास्पद रहेगी. बहुत बार लोग अपनी कृतियों की सफलता से खुद हिरासाँ हुए, असहज हुए हैं, असफलतायों से परेशां और पशेमां भी. आलोकधन्वा की माने तो संग्रह में संकलित कविताएं पढ़कर लगता है कि इन्हें कवि और कविता की शक्ति पर गहन भरोसा है. कपड़े के जूते जो समय से बाहर झूल रहे हैं और जिन्हें मृत्यु भी पहनना नहीं चाहेगी लेकिन कवि उन्हें पहनता है और शताब्दियाँ पार करता है, कवि का ऐसा तेवर आभास नहीं देता कि उन्हें कोई जीवन की ढलान क्षरण की ओर ले जा सकती है पर अगर ऐसा है भी तो क्षरण के कारणों के प्रति मुझे दुःख है.


5 ) शोषित नागरिक के लिए व्यवस्था से गोली दागने का अधिकार मांगने वाला कवि आज उसी व्यवस्था के साथ है। कवि का सत्ता से जुड़ाव बुरा है तो क्यों ?

मुझे पूरी जानकारी नहीं है कि कवि किन क्षमताओं से उसी व्यवस्था के साथ हैं जिनका विरोध उन्होंने अपने शुरूआती दौर और लंबे अरसे तक किया है. कवि का सत्ता से जुड़ाव इसलिए बुरा हो सकता है क्यूंकि सत्ता अपने से इतर समाज में जो भी शक्ति,ऊर्जा और प्रभाव के स्रोत हैं, अपनी सुविधा और स्वार्थ पूर्ति के इनका संधान करना चाहती है. उस इस्तेमाल से जनता आहत और फ़सुर्दा होती हैं क्यूंकि सत्ता का जो स्वरूप आजादी के बाद, लोकतंत्र के बावजूद, समक्ष आया है, उसने जनता के प्रति बस्तीवादी आकायों जैसा रूखापन और बेपरवाही ही दिखाई है, ऐसे में कवि यां और कलाकार जो बहुत बार अप्रत्याशित ढंग से लोगों की निराशा, हताशा, उम्मीद और अकांक्षायों की आवाज़ बन कर प्रतिरोध को स्पष्ट स्वर और दिशा देते हैं इससे जनता का रिवर्स सशक्तीकरण है जिसका सोता संविधान और इसकी कार्यपालिका नहीं अपितु ये कवि-एक्टिविस्ट है, अगर वही लोग उन ‘इंटिमेट ऐनिमिज़’ से जा मिले तो बार बार यह धोखा होने पर भी वही सनातन दुःख होता है. बकौल ग़ालिब ‘कोई हमें रुलाए तो’, दुःख चाहे सरकार से मिले या प्रेम के बिछोह से, मन अवसन्न होता है और इस अवसन्नता से बचने के प्रयास अक्सर निष्फल हुए हैं. 

आलोकधन्वा ने इतनी अच्छी कविताएं लिखी हैं कि अभी भी उन्हें उन्हीं की कविता से यह याद दिलाना चाहती हूँ कि रेल जो अभी तक यां तो अंग्रेजी हुक्मरानों की ( भले अपने ही किसी स्वार्थ हेतु ) याद का चिन्ह थी जिसे मिटाना मुमकिन नहीं और हित में भी नहीं या फिर ऐसी सवारी जिससे किसी को उतार दिया जाए तो वह अपमान से स्वाभिमान की कड़ी यात्रा पर निकल जाता है लेकिन किसी आम ‘भले आदमी’ का रेल पर मालिकाना हक आपकी कविता से भी आया है. यह आपकी कविता है जहाँ रेल केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं लगती जिसपे कोई सरकार इतराए ( इन्फ्रास्ट्रक्चर जो मूलतः जनता से ही वित्तपोषित होता है ) बल्कि भारत के लाखों भले लोगों की सुरक्षित घर पहुंचाने वाली रेल लगती है और आप ज़रूर यह जानते होंगे कि 26 जनवरी और 15 अगस्त को जब रेल उड़ाने की धमकियों के डर से जब इन भले आदमियों की जेबें और बस्ते टटोले जाते हैं तो वे रेल से डर भी जाते हैं.

6) एक रचनाकार के जीवन और लेखन के बीच की फांक को आप किस रूप में देखते हैं ?

जीवन और लेखन के बीच सौ फीसदी पारदर्शिता के आग्रह के बिना, उसकी निजी स्वतंत्रता और पसंद-नापसंद को अनिवार्य रूप से पब्लिकस्फीयर में लाने की मांग किये बिना उस फांक को अपनी मनुष्यता के ही विस्तार की तरह देखना चाहती हूँ, यह फांक अगर अक्षम्य हो, चूक अगर दूसरों के अधिकारों का हनन करती हो और ‘ला ऑफ द लैंड’ का उल्लंघन करती हो तो हमारी घरेलू,नुक्कड़ और सोशल मीडिया की अदालतों में हमारे समय की विशेष जल्दबाजी किये बिना उन्हें फेयर ट्रायल का अवसर मिलना चहिये. विचार(धारा) परिवर्तन की स्थिति में भाषा के पारंगत व्यंग, वक्रोक्ति आदि  साहित्यिक यंत्रों की सहायता से बहुत सारा ऐसा साहित्य लिख सकते हैं और लिखते भी है जो फांक को बहुत बार जीवन और लेखन दोनों से बड़ा बना देता है.  खुशवंत सिंह जब अखबार के स्तंभ को  ‘विद् मैलिस टुवर्ड वन एंड आल’ और आत्मकथा को ‘ ट्रुथ, लव एंड अ लिटल मैलिस’ कहते हैं तो वह अपने पाठकों को फांक के लिए तैयार करते हैं सो फांक का झटका उन रचनाकारों के संदर्भ में अधिक लगता है जो ‘मैलिस’ को प्रेम की तरह स्वाभाविक इमोशन नहीं मानते.

7) क्या आपको यह उम्मीद है कि आलोकधन्वा फिर से अपनी कविता का उत्कर्ष पाएंगे ?

मेरी कवि से ऐसी कोई उम्मीद नहीं कि वह फिर से अपनी कविता का उत्कर्ष पाएँगे, मुझे ऐसा नहीं लगता कि इस दुनिया में कोई भी कवि किसी की उम्मीद पूरी करने के लिए सतत कविता लिख सकता है और उत्कर्ष की चाह में खुद से कविताएं लिखवा सकता है.

8) किसी कवि के आलोकधन्वा होने का मतलब क्या है ?

आलोकधन्वा की कविता पर लौटना होगा इस जवाब के लिए

भारत में जन्म लेने का
मैं भी कोई मतलब पाना चाहता था
अब वह भारत भी नहीं रहा
जिस में जन्म लिया

चूंकि ‘मतलब’,‘अर्थ’, ‘अभिप्राय’, ‘व्याख्या’ और ‘विश्लेषण’ के बिना हम अभी जीना नहीं सीख पाए हैं और सिग्निफिकेशन तो संस्कृति का आधार है और कवि सांस्कृतिक परिघटना सो आलोकधन्वा होने का मतलब है बहुत प्यारा कवि होना, आस पास की छोटी छोटी चीज़ों में सौंदर्य और उत्साह ढूँढने वाला कवि, दुनिया के सबसे स्वादिष्ट ‘कम्फर्ट फ़ूड’ आलुओ को अलिहदा ख़ूबसूरती से लक्षित करने वाला कवि, अपनी माँ को ग्राम-कवि कहने वाला, बकरियों और गडरियों के संसार को जानने वाला जिज्ञासु, चतुर कवि जो जिलाधीश की भाषा के फरेब में नहीं आता, निर्मोही किसी लड़की को ‘जैसे तुम इतनी बड़ी हुई बगैर इस शहर के’ जैसा मीठा उलाहना देता हुआ कवि, ‘कविता के अजायबघर को’ क्रुद्ध होकर ताकता हुआ, दिन में संसद के असहनीय मौन पर तंज करता शरद की रातों की वनस्पति और धरा को निहारता हुआ निशाचर, पाश के गांव तलवंडी सलेम तक जाता हुआ विद्रोही जिसे लगता है दुनिया कोई दे दी गई जगह नहीं बल्कि रोज बनने वाली नगरी है और फिर उसके बाद का आलोकधन्वा का मतलब जानने के लिए मेरे पास ज्यादा स्रोत उपलब्ध नहीं हैं.

9 ) रचनाओं की संख्या महत्वपूर्ण है या उनका स्तर ?

चंडीगढ़ सैक्टर दस में आर्ट्म्यूज़ियम है जहाँ किसी शिला पर पंजाबी में बहुत सुन्दर पंक्तियाँ खुदी देखी है मैंने जिसे हिंदी में ऐसे कह सकते हैं, 

दो पग कम चलना
पर चलना मटक के साथ

10 ) इन प्रश्नों से इतर भी आप आलोकधन्वा के बारे में क्या सोचते हैं बताएं ?  

आलोकधन्वा ने हिंदी कविता को नया स्वर, नई संभावना, नई विधि दी अपने आस पास घटित हो रहे जीवन को गहरी संवेदना और लगाव से देखने की और ऐसी भाषा हस्तगत की जो उस घटित हो रहे को उसके यथार्थ आकार में अभिव्यक्त करते हुए भी उसे आलोक से भर देती है. कहीं कहीं कविताएं फ़्लैट सी भी दिखती हैं जिसकी सार्थकता देखने के लिए उन्हीं के समकालीन कवि मंगलेश डबराल  की कविता ‘संगतकार’ पढ़नी चाहिए, ऐसी अतिभावुकता को ‘उसे विफलता नहीं मनुष्यता समझा जाना चाहिए’, कई बार यह संगतकार बाहर नहीं भीतर भी होता है जो हर क्षण आत्म आश्वस्त और बुलंद आवाज़ नहीं होता. प्रगतिशील और विद्रोही स्वर के लिए तो आलोकधन्वा चर्चित रहे ही हैं लेकिन पूँजीवाद की तानाशाही के कुप्रभाव में अपने पर्यावरण, स्थानीयता और पारिस्थितिकी से बेगाने होते मनुष्य के लिए उस खोये हुए से जुड़ने के लिए बहुत कुछ अर्थपूर्ण है और शोधार्थी आलोकधन्वा के काव्यजगत में इको-क्रिटिसिज्म की कई संभावनाएं देख सकते हैं.


29 मई 2014

एफडीआई: नई सरकार, पुरानी चिंता

लीना मेहेन्दले

खुदरा-बिक्री का क्षेत्र विदेशी निवेशक के लिये खुला करने के अर्थात उसमें FDI लानेके मुद्देपर राजकीय मत दो हिस्सों में बँटा है - हर पार्टी में और सामान्य जनता में भी एक पक्ष कहता है कि यह विदेशी फाँस को आमंत्रण है और दूसरा पक्ष कहता है कि यही एकमेव उद्धारकर्ता है।

किसान कहता है -- हमें सदा से दबाया जा रहा है - भाव नहीं मिल रहे - इसका उत्तर दो।

ग्राहक कहता है, जीने के लिये भरपेट खाना अत्यावश्यक है, वह धन-धान्यादि कृषि-उत्पाद ही महँगा हुआ तो हम क्या करेंगे।

खुदरा विक्रेता कहता है -- हमारे 4 करोड़ परिवार आर्थात  16-20 करोड़ लोग इसी खुदरा बिक्री का रोजगार करके रोज अपना पेट भरते हैं, हमसे यह रोजी-रोटी मत छीनो ।

हर कोई कहता है कि दलाल और बिचौलिये सारी मलाई खा जाते हैं। खुदरा विक्रेता जो एक ठेलेवाला है या रास्तेपर सब्जी बेचनेवाला है - वह कहता है - देखो, मुझे दलालों में मत गिनो - और वह सही है। यह दलाल हैं जो देशी पुंजी-निवेशक हैं या फिर विदेश से आ सकते हैं। और जरूरी नहीं कि वे सब मलाईखोर भ्रष्टाचारी हों। 

इस प्रकार एक ओर यहां उत्पादक के सम्मुख ग्राहक है और खुदरा विक्रेता, राजनेताओं को अपनी पड़ी है कि उस खुदरा व्यवस्था को तोड़कर हम दूसरी लायेंगे तो हमें ये मिलेगा- लेकिन कहेंगे कि जनता को वो मिलेगा। फिर आयात-निर्यात की ऐसी गलत नीतियां बनायेंगे कि उत्पादक और ग्राहक दोनों में हाहाकार मचे और फिर ये कह सकें कि अब हम तुम्हारे भले के लिये देखो विदेशी मेहमानों को ले आये। फिर इसमें हमारी न्याय और दंड व्यवस्था भी कारगर नहीं रहेगी क्योंकि कानून ही ऐसे सुराखों वाले हैं। इसलिए पहले यह अंतर समझना होगा कि मलाई खाने वाले दलाल कौन हैं?

यहां भंडारण व्यवस्था का महत्व सामने आता है। बिना अच्छी भंडारण व्यवस्था के कोई भी दलाल या व्यापारी अपना काम नहीं कर सकता। इसलिए मुनाफाखोरी रोकनी हो तो पारदर्शक, और कार्यक्षम भंडारण व्यवस्थापन होना चाहिए साथ ही उसे मुनाफाखोरी से भी बचना पड़ेगा। ऐसी भंडारण व्यवस्था लाने के लिए सरकार ने कुछ प्रयास अवश्य किए। आज भी सर्वाधिक भंडारण सरकारी क्षेत्र में या सरकार की सहायता से होता है। उदाहरणस्वरूप फूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया है, या वेयर हाउसिंग कार्पोरेशंस हैं, या नाफेड है।

और ऐसा भी नहीं कि पहली बार-यह काम सरकारी क्षेत्र में हो रहा हो। सदियों से चली आ रही राज्य व्यवस्था में हर राजा का कर्तव्य होता था कि वह अपने राज्य के लिए अनाज के भंडार-घर बनवाए और कोषागार। पटना में आज भी एक अति विशाल 'गोलघर' मौजूद है। जहां कई सदियों पहले हजारों मन अनाज सुरक्षित रखने की व्यवस्था थी।

बाजारों के लिए चबूतरे बनवाना और वहीं से थोक व खुदरा व्यापार की व्यवस्था करना भी अच्छे राज्य का प्रतीक माना जाता था।  मुझे आज भी याद आते हैं बचपन में छोटे गांवों में देखे हुए साप्ताहिक बाजार। मेरे अपने जन्मगांव में ऐसे दो स्थान नियत थे। एक रोजाना बाजार के लिए जहां एक बड़े क्षेत्रफल में फर्श लगवाई हुई थी जाने किस जमाने से - ताकि धान्य, अनाज, शाक, भाजी, फल इत्यादि सीधे उसी पर उड़ेल कर रखे जा सकें। दूसरी-जगह थी जहां साप्ताहिक बाजार के लिए दूर-दूर गांवों से लोग आते थे। यही दृश्य कमोबेश हर बड़े गांव में, तहसीलों में देखने को मिलता। फिर भी इन बाजारों में आने वाले नाशवंत वस्तुओं की बरबादी हो ही जाती थी। साथ ही किसान या अन्य उत्पादकों को बहुत घूमना पड़ता था।

उनके लिए दूसरा पर्याय यही होता कि अपना उत्पाद कम दाम पर ऐसे व्यापारी या आढ़तिया को बेचें जिसके पास भंडारण के संसाधन हों।यहां से हम आते हैं कृषि उत्पाद-बाजारों पर। महाराष्ट्र का उदाहरण देखें तो एमएपीएम(आर) एक्ट अर्थात् कृषि उत्पाद बाजार नियंत्रण का कानून 1963 में पारित हुआ और 1987 में इसमें कुछ बड़े संशोधन किए गए। आज की तारीख में ऐसे 295 मुख्य बाजार और 609 उप बाजार हैं, जिनमें से केवल 100 मुख्य बाजार ही ए श्रेणी में अर्थात् 1 करोड़ रुपए से अधिक का व्यापार (एक वर्ष में) करते हैं। 

साथ ही इन बाजारों की कार्यक्षमता, भ्रष्टाचार या ईमानदारी इत्यादि गुणात्मक विवेचना कभी भी नहीं हुई। यदि इन बाजारों की संरचना देखें तो हरेक बाजार के भौगोलिक क्षेत्र में बसने वाले सारे किसान, उस इलाके के पंचायत सदस्य और साथ ही जिन्हें एजेंसी बांटी गई, ऐसे सारे एजेंट इस बाजार के सदस्य माने जाते हैं। लेकिन प्रत्यक्षत: वस्तुस्थिति यही है कि पूरे एपीएमसी पर केवल एजेंटों का अर्थात् मुनाफाखोरों का वर्चस्व रहा है। और यह मुनाफाखोर व एजेंट भी अंतत: राजकीय नेताओं के पिछलग्गू ही रहे हैं। इस प्रकार अच्छे उद्देश्य से बने एपीएमसी भ्रष्टाचार के सत्ताकेन्द्र बन गए और किसान को उनसे वह सुविधा, फायदा और उचित दाम नहीं मिले जिसकी अपेक्षा इस कानून में की गई थी।

पिछले पचास वर्षों में सहकार क्षेत्र की महाराष्ट्र में दुर्गति हुई है। सत्तर और अस्सी के दशक में आश्वासक दिखने वाली सहकार नीति भ्रष्टाचार में ऐसी धंसी कि बड़ी-बड़ी संस्थाएं ध्वस्त हो गईं। महाराष्ट्र की प्राय: सभी सहकारी चीनी मिलें, सूत-और जिनिंग की मिलें, सहकारी बैंक और एपीएमसी जैसी संस्थाएं तेजी से बनीं, चलीं, विकास की आशा का निर्माण किया और भ्रष्टाचार के तूफान में दम तोड़ दिया। उधर सरकार की अपनी जो भंडारण और वितरण की व्यवस्था थी, अर्थात् वेअर हाउसिंग, एफसीआई या फिर रेशनिंग अर्थात् पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम, वहां भी जमकर भ्रष्टाचार हुआ। 

एफसीआई का गत दस वर्षों का इतिहास देखकर ऐसा लगता है मानो ये बियर कम्पनियों के लिए आरक्षित रखा गया हो। हजारों टन अन्न सड़ाया जाता है ताकि बियर और अन्य शराब बनाने वाली कम्पनियां इसे सस्ते में खरीद कर मुनाफा कमा सकें। ऐसे आर्थिक दुर्व्यवहार की न ही जल्दी कोई सुनवाई होती है और न ही उन्हें कोई कड़ी सजा देने का प्रावधान किसी कानून में है।

कुछ समय पहले, नीरा यादव जो कभी उत्तर प्रदेश की मुख्य सचिव रह चुकी हैं और जिनकी भ्रष्ट सम्पत्ति दो से तीन हजार करोड़ के घर में आंकी जाती है, उस पर भ्रष्टाचार का आरोप सिध्द हुआ तो सजा हुई केवल 3 वर्ष की। और यह भी कहीं न्यूज में नहीं आया कि उसकी संपत्ति का क्या हुआ! क्या उसे सरकारी खजाने में जमा कराया गया? 

हमारे देश के किसान तीन प्रकार के हैं- अल्प-भू-धारक, अत्यल्प-भू-धारक और खेत-मजूरी करने वाले एक तरफ। मंझोले किसान जिनकी जमीन पांच एकड़ से पन्द्रह एकड़ के बीच है-जो खा-पीकर संतुष्ट हैं, लेकिन कृषि के चढ़ाव-उतार का असर भी झेलते हैं- वे एक तरफ। और बड़े किसान तीसरी तरफ।पहली व दूसरी श्रेणी के किसान ऐसे हैं जिन्हें अपने उत्पाद का उचित मूल्य तुरंत चाहिए होता है। उनकी ऐसी क्षमता नहीं होती कि उत्पाद को रोक कर रखे या बिक्री के बगैर भी महीनों तक काम चला ले। उनके पास बेचने लायक उत्पादन भी कम होता है। लेकिन जो भी है, वही उनकी पूरे वर्ष की पूंजी है। इसीलिए वह तत्काल मूल्य चाहता है और उचित मूल्य भी और वह दोनों का हकदार भी है। लेकिन उसे उचित मूल्य बिना देर के मिले इसके लिए आवश्यक है कि देश में पणन व्यवस्था का अच्छा-खासा विकेन्द्रीकरण हुआ हो। प्रोक्यूअरमेंट संबंधी नीतियां व खरीद की व्यवस्था कार्यक्षमता व पारदर्शिता के साथ हों। ऐसे विकेन्द्रीकरण में हम कहां किस कारण से असफल रहे हैं?

इसका एक उदाहरण मैं देना चाहती हूं। महाराष्ट्र में यदा-कदा नीति घोषित की जाती है कि इस वर्ष हम रेशम-व्यापार बढ़ाने के लिए कुछ करेंगे। इसमें किसान की एक अहम् भूमिका होती है। अब यदि महाराष्ट्र में सरकार चाहती है कि किसान रेशम कोष की पैदावार करे तो दो प्रमुख काम करने पड़ेंगे। किसान से रेशम कोष खरीद के जो केन्द्र खोजे जाएं वहां तत्काल भुगतान की व्यवस्था हो- वर्तमान में फाइलों को घूम-फिरकर आने में तीन महीने लग जाते हैं। दूसरी आवश्यक बात यह कि ऐसे खरीद-केन्द्र पर छोटी क्वेंचिंग मशीन भी रखी जाए और उसी केन्द्र के कर्मचारियों को जरा सी ट्रेनिंग देने की आवश्यकता होती है कि ठीक तरह से रेशम कोष को कैसे पकाते हैं- वह ट्रेनिंग दी जाए। इसी प्रकार मैंने देखा कि जहां भी विकेन्द्रीकरण की बात आती है, वहां थोड़ी सी नई तकनीक, थोड़ा सा नया ट्रेनिंग और व्यवस्थापन की अच्छी प्रणाली (इस उदाहरण में तत्काल भुगतान के अधिकार खरीद-केन्द्र-प्रमुख को देने की व्यवस्था) आवश्यक होती है। सरकार विकेन्द्रीकरण की बात तो करती है। लेकिन इन तीन आवश्यकताओं पर ध्यान नहीं देती और विकेन्द्रीकरण फेल हो जाता है।

दूसरे भी कई क्षेत्रों में जहां सिंगल विण्डो सिस्टम की बड़ाई गाई जाती है और सिर धुना जाता है कि क्यों हमारे यहां सिंगल विण्डो सिस्टम नहीं है, वहां भी इन्हीं तीन बातों की कमी अक्सर देखी गई है। पणन व्यवस्था के विकेन्द्रीकरण में यह कमी भी रही। अर्थात् दो कमियां- व्यवस्था न बना पाने की एक कमी और नियत में खोट की दूसरी कमी (मसलन एफसीआई द्वारा अनाज सड़ाया जाना)। एमपीएमसी के व्यवस्थापन में भी यही कमियां रहीं और सरकार ने उन्हें सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया। उलटे महाराष्ट्र में तो कई वर्षों तक एकाधिकार खरीद की व्यवस्था चलवाई।

  1.  कपास-एकाधिकार खरीद- किसान सरकार के अलावा अन्य को कपास नहीं बेच सकता।
  2. वनोपज-एकाधिकार खरीद- आदिवासी अपने वनोपज ट्रायफेड के सिवा किसी और की नहीं बेच सकता।
  3. गन्ना-एकाधिकार खरीद- किसान अपना गन्ना केवल उस चीनी-मिल को बचे सकता है जो उस गांव के गन्ने के लिए नीयत हो।
  4. एपीएमसी किसान अपनी खेती उत्पाद केवल उन्हीं दलालों को बेच सकता है जिन्हें एमपीएमसी के क्षेत्र में आढ़त लगाने का ठेका मिला हो।

इन सबसे अलग-थलग एक सफल प्रयोग मैंने देखा कर्नाटक सिल्क एक्सचेंज का। जहां सदियों से चली आ रही दलालों की लूट को एकाधिकार के तहत रोका गया- लेकिन सूझबूझ के साथ। यहां एकाधिकार का अर्थ बहुत संकुचित रूप में अपनाया गया- बस इतना ही कि रेशम कोष की हर उपज और काते हुए रेशम सूत की हर खेप केवल और केवल सिल्क एक्सचेंज में ही बेची जा सकती है। लेकिन वहां खरीद का हक केवल सरकारी मोनोपोली नहीं होगा जैसा महाराष्ट्र कॉटन मोनोपोली पर्चेस एक्ट में था, या जैसा ट्रायफेड का एकाधिकार वनोपज के लिए है। यहां भी एपीएमसी की तरह बाहरी व्यापारी नीलामी में बोली लगा सकता है। लेकिन एपीएमसी की तुलना में दो बातें अलग हैं- पहली यह कि इनमें से कोई व्यापारी आढ़तिया या परमानेंट लाइसेंसी नहीं है जैसा एपीएमसी में होता है। किसी भी नए व्यापारी को छोटी फीस वाली टेम्पररी मेंबरशिप लेकर उस-उस दिन की नीलामी में खरीदारी का हक होता है।

दूसरी अलग बात यह है कि हर दिन की नीलामी में सरकार कार्पोरेशन केएसआईसी पहली बोली लगाएगा जो सपोर्ट प्राइज की तरह काम करता है और हर दिन आने वाली उपज का पन्द्रह से चालीस प्रतिशत उपज केएसआईसी द्वारा खरीदी जाती है। इसका अर्थ हुआ कि सरकारी कॉम्पिटीशन द्वारा दलालों का बैलेंस किया जाता है। साथ ही उपज लाने वाले किसान या कारीगर को नाममात्र शुल्क पर पणन की सुविधा और नाममात्र ब्याज पर ऋण की तत्काल सुविधा भी है ताकि किसान दो-तीन दिन इंतजार कर सके। अर्थात् जब सरकार ने मोनोपोली भी नहीं चलाई और ठेकेदारों की भी न चलने दी और पणन से संबंधित कई सुविधाएं उत्पादक को दीं- तब जाकर सिल्क एक्सचेंज की कल्पना ऐसी सफल रही कि पिछले तीस वर्षों में उसने बंगलोर को विश्व का सबसे बड़ा और उत्तम सिल्क-केन्द्र बना दिया है।

इस प्रकार मैं देखती हूं कि एपीएमसी की दुर्दशा रोकने के लिए ऐसे उपाय किए जा सकते हैं। लेकिन वास्तव में नहीं किए जाते। इसी कारण किसान की भावना है कि एपीएमसी में भी उसे उचित न्याय-उचित मूल्य नहीं मिलता। फिर वह इस एपीएमसी एक्ट से बचकर निकल भागने का प्रयास करता है। यही कारण था कि अभी छ:-आठ महीने पहले महाराष्ट्र सरकार को एक नोटिफिकेशन के जरिए करीब 30 प्रकार के कृषि-उत्पादों को एपीएमसी की सूची से हटाना पड़ा। कुल मिलाकर चित्र यही निकलता है कि विकेन्द्रीकरण के लिए आवश्यक तीन बातों का प्रबंध न कर पाना, पणन-भण्डारण में भ्रष्टाचार, और सारी व्यवस्था पर दलालों के माध्यम से नेताओं का कब्जा, सहकारिता क्षेत्र में नेताओं का भ्रष्टाचार- ऐसे कुछ कारण हैं जिनसे किसान को राहत देने में सरकार असफल रही।

पिछले साठ वर्षों में इन बातों को दुरुस्त करने के लिए सरकार कम पड़ गई। और इसका उपाय ढूंढा गया-विदेशी पूंजी। विदेशी व्यापारियों को सहूलियत देकर यहां बसाओ और उन्हें बड़ा सत्ता-केन्द्र बनने दो। फिर चूंकि वे अत्यंत ईमानदार और कार्यक्षम होते हैं- अतएव हमारे देश में भी खुशहाली आएगी। यह है सरकारी तर्क। इस तर्क में चार अहम मुद्दे हैं और मुझे वे चारों गलत दिखते हैं। पहला मुद्दा है- चूंकि रिटेल व्यापार के मार्फत उत्पादक और ग्राहक के बीच की दूरी को कम करने में सरकार व दलाल दोनों कम पड़ गए, सो विदेशी, पूंजी लाओ यही तर्क अपनाया तो जो मैं पिछले कई वर्षों से बुजुर्गों के मुंह से सुनती आ रही हूं उसे सही मानना पड़ेगा। वे कहते थे कि इनसे तो अंग्रेज सरकार अच्छी थी। क्यों न उन्हीं को वापस बुलाया जाय?

दूसरा मुद्दा है कि हम फिर से विकेंद्रीकरण समाप्त कर रहे हैं और केन्द्रीकृत व्यवस्था ला रहे हैं, साथ ही इस केन्द्रीकृत व्यवस्था के सत्ता केन्द्रों पर विदेशियों को विराजमान कर रहे हैं।

तीसरा मुद्दा यह है कि जो विदेशी पूंजी निवेशक यूरोप-अमरीका में बडी ईमानदारी दिखाते हैं, वे यहां आकर वैसा नहीं करते क्यों कि हमारे कानून अक्सर उनके विरूध्द निष्प्रभ हो जाते हैं। यहां आकर चाहे जितनी गलती, लूट, मनमानी वे कर लें- हम उन्हें सजा नहीं दिलवाते, पकड़ नहीं पाते, इसके उदाहरण हैं एनरॉन, भोपाल गैस कांड वाले यूनियन कार्बाइड, सिटी बैंक द्वारा जबरन ऋण वसूली के मामले इत्यादि। इसलिए उनके द्वारा हमारे साथ बेईमानी खिलवाड़ और शोषण नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। सरकार कहती थी कि कि हमारे पास कारगर उपाय हैं- तो क्यों नहीं अब तक भोपाल गैस कांड में सजा हुई? क्यों मुआवजा नहीं दिया गया?

अब तो यह बात भी खुलकर सामने आ गई है कि वॉलमार्ट या एनरॉन जैसी कम्पनियों को घूस से कोई परहेज नहीं है। केवल उसे नाम कुछ अच्छा सा दिया जाना चाहिए-- बस! सो उसे घूस नहीं, बल्कि मत परिवर्तन कहते हैं। इसके अंतर्गत वॉलमार्ट ने खुद अमरीकी सीनेट की कमिटी के सामने कबूल किया कि भारतीय राजकीय नेताओं का मत परिवर्तन करने के लिए पिछले चार वर्षों में 125 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसके कुछ दस वर्ष पहले एनरॉन के विरूध्द एक मामला अमरीका कोर्ट में चला जिसमें आरोप था कि उन्होंने अपने अमरीकी शेयर होल्डरों के साथ धोखाधड़ी की थी। उसकी सुनवाई के समय एनरॉन के भारतीय प्रोजेक्ट की कर्ता-धर्ता रेबेका मार्क ने अमरीकी कोर्ट को बताया कि भारत के उच्च पदस्थ नौकरशाह व मंत्रियों के प्रबोधन के लिए 800 करोड़ के आसपास खर्च किया है।अब मान लो हमारी सरकार घूस के खिलाफ कड़ा कानून करती है और वे कहते हैं- हमने तो 'उनका जीवन स्तर बढ़ाने पर खर्च किया है' तो फिर तो हमारी सरकार उन पर मुकदमा भी नहीं करेगी।

यदि क्षमता है तो आज ही की तारीख में वॉलमार्ट को बाहर का रास्ता दिखाइए-और यह भी बताइए कि किस-किस का मत परिवर्तन इन चार वर्षों में हुआ। अर्थात् सरकार का यह कहना कि हम कड़े कानूनों द्वारा अपने हितों की रक्षा करेंगे-यह एक ढकोसला है। ऊपर से तुर्रा यह कि केवल वॉलमार्ट ही नहीं, हमारे प्रधानमंत्री तो चीन को भी कह आए थे कि आपके देश का पूंजी निवेश हमारे देश में बहुत कम है, सो आइए और अपनी पूंजी लगाइए। उधर रक्षा-सलाहकार भले ही चीखते रहें कि अपना ओएफसी का जाल बिछाने का काम चीनियों को न सौंपा जाए- लेकिन विदेशी पूंजी के लिए उसे भी अनसुना किया जा सकता है।

चौथा मुद्दा भी सोचने लायक है। कहीं यह विदेश पूंजी बनाम स्वदेशी पूंजी का झगड़ा तो नहीं है? नहीं- इसे पूंजी बनाम विकेन्द्रीकरण के रूप में देखना होगा। यदि विदेशी वॉलमार्ट अच्छा नहीं है तो क्या रिलायंस फ्रेश अच्छा है? दोनों स्थितियों में सत्ता केन्द्र बनने का मामला है जो अंतत: शोषण की ओर ले जाता है।