22 मई 2015

तनु वेड्स मनु रिटर्न्स: दत्तो बडी ही कूल छोरी है

रंगनाथ सिंह

साल 2011 में तनुजा चतुर्वेदी और मनु शर्मा की शादी में जो लोग भी शामिल हुए थे उनके पास फिर से बारात करने का मौक़ा आ गया है क्योंकि तनु और मनु रिटर्न हो गए हैं और क्या खूब रिटर्न हुए हैं. हिन्दी में किसी फ़िल्म का सीक्वेल अक्सर पहली फ़िल्म के हिट टाइटल को भुनाने के लिए ही बनाए जाते हैं. ऐसा बहुत ही कम होता है कि सीक्वेल में सचमुच कहानी आगे बढ़ती हो. लेकिन तनु वेड्स मनु के चार साल बाद आयी तनु वेड्स मनु रिटर्न्स सचमुच ही तनु(कंगना रनोट) और मनु(आर माधवन) की शादी के चार सालों के बाद की कहानी कहती है.

एक अजीबो-ग़रीब उठापटक वाले प्रेम विवाह के बाद तनु और मनु चार सालों में इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि वो एक-दूसरे के लिए फिट नहीं है. दोनों एक-दूसरे पर इसका दोष मढ़ते हैं. लड़ते-झगड़ते हैं और आखिरकार अलग हो जाते हैं. इसके बाद जो कुछ होता है उस कहानी को बुनने के लिए फ़िल्म के लेखक हिमांशु शर्मा बधाई के पात्र हैं.

फ़िल्म में पुरानी तनु और नई दत्तो(कंगना रनोट) दोनों के कैरेक्टर को हेमंत ने अच्छी तरह डेवलप किया है. तनु कैसी है ये दर्शक सीक्वेल के पहले पार्ट में देख ही चुके हैं. इस पार्ट में तनु के साथ-साथ वो दत्तो से भी रूबरू होंगे. दत्तो का किरदार जैसा लिखा गया है और कंगना ने उसे जिस ख़ूबसूरती से निभाया वो दर्शकों का दिल जीत लेगा.

स्टोरी को जोड़ने वाली कुछ फ़िल्मी ट्रिक, क्लाइमेक्स और कुछेक छोटी-मोटी कमियों को छोड़ दिया जाए तो फ़िल्म की कहानी और उसके उतार-चढ़ाव बहुत ही मनोरंजक हैं. फ़िल्म दर्शकों को अंत तक गुदगुदाती रहती है.

फ़िल्म के राइटर हिमांशु शर्मा ने हर कैरेक्टर को प्रभाव छोड़ने का मौका दिया है. तनु और दत्तो फ़िल्म की मेन लीड हैं लेकिन मनु(माधवन), पप्पी(दीपक डोबरियाल), चिंटू(जीशान अयूब), पायल(स्वरा भाष्कर), राजा(जिम्मी शेरगिल समेत सभी किरदार अपना असर छोड़ने में सफल रहे हैं. सबने बहुत अच्छी एक्टिंग की है.

फ़िल्म के निर्देशक आनंद एल राय ने अपनी पहली दोनों फ़िल्मों में भी लॉजिक की बहुत फिक्र नहीं की थी, इस फ़िल्म में भी कई चीज़ें दर्शकों को लॉजिक से परे लगेंगी लेकिन आनंद का प्राइम टार्गेट एंटरटेनमेंट रहा है. 

इस फ़िल्म में भी तनु वेड्स मनु और रांझणा के निर्देशक की छाप साफ़ दिखेगी जिसे तीन सफल फ़िल्मों के बाद उनका सिग्नेचर स्टाइल माना जा सकता है, जिसमें मिडिल क्लास कैरेक्टर, मिडिल क्लास मोरैलिटी के साथ कॉमेडी, रोमांस और कुछ हिट सॉन्ग का काकटेल होता है.  तनु वेड्स मनु के गीतकार राज शेखर ने ही रिटर्न्स के लिए गीत लिखे हैं जो फ़िल्म की रिलीज़ से पहले से हिट हो चुके हैं.

लब्बोलुआब ये फ़िल्म गंभीर समीक्षकों को विश्लेषण के लिए बहुत कुछ भले न उपलब्ध कराती हो, दर्शकों को ये फुल एंटरटेन करेगी और दत्तो उन्हें लंबे समय तक याद रहेगी क्योंकि दत्तो बडी ही कूल छोरी है...

13 फ़रवरी 2015

ROY: अच्छी फ़िल्म होते-होते रह गई...

रंगनाथ सिंह

रॉय, एक सफल फ़िल्म हो सकती थी लेकिन.....एक अच्छे स्टोरी आइडिया और सटीक क्राफ़्ट और रणबीर कपूर जैसे स्टार के बाद भी अगर ये फ़िल्म सफल नहीं होगी इसके लिए पूरी तरह इसके डायरेक्टर-राइटर विक्रमजीत सिंह जिम्मेदार होंगे. अगर वो थोड़ा ख़तरा उठाते तो ये फ़िल्म एक बेहतर फ़िल्म होती और रणबीर कपूर की मदद से शायद ज़रूरत भर के पैसे भी कमा लेती. अगर उन्होंने जैकलीन फर्नाडिंज जैसी नई आई कैंडी की जगह किसी अभिनेत्री को लिया होता, अर्जुन रामपाल जैसे माचो लुक वाले एक्टर की किसी ऐसे एक्टर को लिया होता जो 80इमोशनल फ़िल्म में दर्शकों से कनेक्ट कर पाता. और सबसे बड़ी बात फ़िल्म को ढाई घंटे तक खींचने के बजाय थोड़ा टाइट पेस के साथ पेश किया जाता है तो ये फ़िल्म अपनी मौजूदा हाल से बेहतर हालत में होती.

फ़िल्म को इसके भ्रामक प्रमोशन से भी नुकसान पहुँचेगा. हॉल में आए ज़्यादातर दर्शक एक क्राइम थ्रिलर देखने आए थे जिसमें चाकलेटी रणबीर कपूर एक बड़े चोर बने हैं. रणबीर कपूर ने फ़िल्म में ठीक काम किया है और दर्शक इस क़रीब ढाई घंटे लंबी फ़िल्म को 'रणबीर फिर कब आएँगेके इंतज़ार में ही देख सकेंगे. रणबीर कपूर की उनकी एक्टिंग से अलग इस बात के लिए भी तारीफ़ करनी होगी कि एक स्टार होते हुए भी उन्होंने इस फ़िल्म में सेकेण्ड लीड करना स्वीकार किया. कुछ उसी तरह जैसे टॉम क्रूज ने स्टार होते हुए भी बैरी लेविंसन की फ़िल्म 'रेन मैन'(1988) में सेकेण्ड लीड करना स्वीकार कर लिया था ताकि फ़िल्म बन सके और बिक सके. लेकिन विक्रमजीत सिंह ने ये मौका गवाँ दिया है. रेन मैन ने तो साल की सबसे अच्छी फ़िल्म का ऑस्कर जीता था. विक्रमजीत शायद बेस्ट डेब्यू टाइप कुछ पा जाएँ.

फ़िल्म एक रोमांटिक थ्रिलर है जिसे देखकर जॉन कैम्पेला की 'द सिक्रेट इन देयर आइज़'(2009) याद आती है. विक्रमजीत ने अगर द सीक्रेट इन देयर आइज़ न देखी हो तो ज़रूर देखना चाहिए. ऐसी आइडियाज़ को टाइट स्क्रिप्ट के साथ रिकार्डो डैरिन और सोलेदाद विलामिल जैसे अभिनेता चाहिए होते हैं, न कि अर्जुन रामपाल जैसे माचो हीरो और जैकलीन फर्नाडीज जैसी आई कैंडी.

रॉय, चाकलेटी रणबीर कपूर और क्राइम थ्रिलर की उत्तेजना की तलाश में आए दर्शकों को काफ़ी निराश करेगी. लेकिन सेंसिटिव और क्रिएटिव दर्शकों को फ़िल्म ठीक-ठाक वन-टाइम वॉच लगेगी. क्योंकि हर क्रिएटिव आदमी के जीवन में कोई न कोई रॉय होता ही है और हर सेंसिटिव आदमी अपनी तमाम कमियों के बावजूद भी 'कवि क्या कहना चाहता हैइसे महसूस कर ही लेता है.   

फ़िल्म का संगीत अच्छा है. मीत ब्रदर्स अंजान और कनिका कपूर का चिट्टियाँ कलाइयाँथिरकते पैरों को भाएगावहीं अंकित तिवारी 'सुन रहा है न तू', 'तेरी गलियाँ…' के बाद एक बार फिर टूट हुए दिलों की आवाज़ बनकर, 'तू है कि नहीं...ले कर आएँ हैं...जिसका सेंटी मूड सेंटी लोगों को पसंद आएगा. 

9 फ़रवरी 2015

शमिताभ देखिए 'मज़ा' लीजिए....

रंगनाथ सिंह

(ये समीक्षा उनके लिए है जो  शमिताभ देख चुके हैं)

शमिताभ देखने के बाद मेरे ज़हन में पहला ख़्याल ये आया कि किसी अभिनेता की आवाज़ अमिताभ बच्चन जैसी न हो तो भी वो दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनन्द, बलराज साहनी, राजकुमार, संजीव कुमार, राजेश खन्ना, अनिल कपूर, सन्नी देओल, आमिर ख़ान या सलमान ख़ान हो सकता है. आवाज़ किसी अभिनेता को ख़ास पहचान देती है लेकिन ये उसके फ़न का सबसे ज़रूरी हिस्सा तो नहीं ही है. जिसे अभिनय आता है, जिसे संवाद अदायगी आती है उसके करियर पर इस बात को ज़्यादा असर नहीं पड़ता कि उसकी आवाज़ नाभि से निकलती है या गले से या मुँह से.


मुझे दूसरा ख़्याल यह आया कि ये तो बस वक़्त-वक़्त ही बात है वरना दुनिया का अबतक का सबसे बड़ा ग्लोबल स्टार चार्ली चैप्लिन बेआवाज़ ही था, जिसकी नकल आने वाले कई दशकों तक कई सवाक अभिनेता करते रहे. 

तीसरा ख़्याल यह आया कि अगर श्रीदेवी उधार की हिन्दी आवाज़(डॉयलॉग डबिंग) के साथ हिन्दी फ़िल्मों की सबसे बड़ी हिरोइनों में से एक बन सकती हैं तो दानिश क्यों नहीं? जो डबिंग कलाकार दूसरे हीरो-हीरोइनों के लिए सालों से आवाज़ देते आए हैं उनके अंदर भी वैसा आत्मसंघर्ष होता है जैसा शमिताभ में अमिताभ के अंदर होता दिखाया गया है? या क्या हिन्दी फ़िल्मों में हीरो के लिए बॉडी डबल की भूमिका करने वाले कलाकारों के मन में भी किसी फ़िल्म में अपने कंट्रिब्यूशन की पहचाने जाने की इच्छा होती है? क्या किसी दिन कोई बॉडी डबल किसी कुतुबमिनार पर चढ़कर चिल्लाकर ये कहेगा कि सलमान या आमिर का वो डेंजर वाला स्टंट मैंने किया था!!

शमिताभ, पूरी तरह से अमिताभ बच्चन के लिए बनाई गई फ़िल्म है जिसे फ़िल्म  कहना इसकी तारीफ़ करना ही होगा. अगर सही तरीके से कहा जाए तो यह अमिताभ बच्चन और बॉलीवुड का दो घंटे से ज़्यादा लंबा विज्ञापन है. या इसे कई ऑडियो-विज़ुअल चुटकुलों का कलेक्शन कहा जा सकता है. ये फ़िल्म बस दर्शकों को वहीं पसंद आती है जहाँ कोई कॉमिक सीन है. ये अलग बात है कि ज़्यादातर कॉमिक सीन फ़िल्म में जुगाड़ से फिट किए गए लगते हैं.

दो घंटे की फ़िल्म में अगर चार-पाँच मज़ेदार कॉमिक सीन हों उस फ़िल्म को देखने के बाद दर्शक फ़िल्म के प्रति इतनी उदारता ज़रूर बरतते हैं कि उसे 'वन टाइम वाच'  कहके उसकी इज़्ज़त बचा लें. वरना, घर जाकर कोई ये सोचे कि फ़िल्म थी क्या और किस बारे में थी तो उसे लगेगा कि उसका कोई सिर-पैर ही नहीं था.

अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ ख़ान की तरह ख़ुद अपनी ही फ़िल्म में अपनी पुरानी फ़िल्मों को श्रद्धांजलि देते दिखते हैं. फ़र्क बस इतना है कि अमिताभ अपना लेवल शाहरुख़ के लेवल तक नहीं गिराते. फ़िल्म के निर्देशक का फ़िल्म बनाने के पीछे क्या मक़सद था ये तो वो जानें लेकिन फ़िल्म देखकर ये लगा कि उन्होंने अमिताभ की आवाज़ और अभिनय को ट्रिब्यूट देने, लाइफ़ब्वॉय और किंडल जैसे प्रोडक्ट के विज्ञापन दिखाने, धनुष को दूसरी हिन्दी फ़िल्म में कथित अभिनय का मौक़ा देने और अक्षरा हासन को करियर ब्रेक देने के लिए फ़िल्म बनाई है. 

रामगोपाल वर्मा ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि फ़िल्म के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ स्क्रिप्ट है लेकिन आजकल फ़िल्में पैकेजिंग से बनती हैं. शायद आर बाल्की का भी कुछ ऐसा ही दर्शन हो. अब ये अलग बात है कि रामू ये दर्शन देने से पहले शिवा और सत्या जैसी मार्डन क्लासिक बना चुके थे. बाल्की शायद भूल गए कि फ़ीचर फ़िल्म कोई एड फ़िल्म नहीं होती जो आधे-एक मिनट के किसी क्लिकिंग आइडिया के दम पर चल निकले. फ़िल्मों में किसी आइडिया को घंटे-दो घंटे तक क्लिक करते रहना होता है.

अमिताभ बच्चन तो अमिताभ बच्चन हैं, उन्हें सत्तर पार की उम्र में पर्दे पर अललटप्पू कहानी में बढ़िया अभिनय करते देखना राहत की बात है. हिन्दी सिनेमा के इतिहास में वो पहले अभिनेता हैं जिसे केंद्र में रखकर फ़िल्म बन रही है. इस श्रेणी में दिलीप कुमार की विधाता, क्रांति और सौदागर जैसी फ़िल्में ही याद आती हैं. लेकिन दिलीप साहब ने चीनी कम, निःशब्द, पा या शमिताभ जैसी फ़िल्में तो नहीं ही की थीं. 

फ़िल्म में धनुष को बेमिसाल अभिनय प्रतिभासम्पन्न अभिनेता दिखाया गया है. ये सच है कि फिल्म में उन्होंने सलमान ख़ान से बेहतर अभिनय किया है लेकिन ये भी सच है कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में अभी तक एक ही बस कंडक्टर सुपरस्टार बना है और वो हैं उनके ससुर रजनीकांत. और ये शायद रजनीकांत का स्टारडम ही है कि धनुष  को अपना जो भी है, जैसा भी है वो अभिनय दिखाने का मौक़ा मिल रहा है. बहरहाल, उनकी अभिनय प्रतिभा कितनी है ये तो आने वाले कुछ सालों में पता चल ही जाएगा. 

कमल हासन की छोटी बेटी अक्षरा हासन के बारे में इससे ज़्यादा कुछ नहीं जा सकता है कि वो फ़िल्म में स्वीट लगी हैं. पहली फ़िल्म में तो स्वीट लगने से काम निकल सकता है लेकिन उसेक बाद क्या होगा?

फ़िल्म में अमिताभ बच्चन और धनुष को दुनिया के महानतम अभिनेताओं और निर्देशकों के पोस्टरो से घिरा हुआ दिखाया गया है. फ़िल्म देखकर समझ नहीं आया कि बाल्की उनके माध्यम से हिन्दी फ़िल्मों की दरिद्रता पर व्यंग्य कर रहे हैं या अपने दोनों कलाकारों को प्रेरणा देने की कोशिश कर रहे हैं. बाल्की ने एक जगह तो अमिताभ को बहुत ही हास्यास्पद बना दिया है जब वो शराब के नशे में रॉबर्ट डी नीरो को चुनौती देते नज़र आते हैं. जाहिर उनकी पीढ़ी या उनके  बाद की पीढ़ी का कोई बॉलीवुड अभिनेता डी नीरो को ऐसी चुनौती होशो-हवाश दुरुस्त रहते हुए नहीं दे सकता.

शमिताभ जैसी फ़िल्मों की गंभीर समीक्षा करने को कोई भी कोशिश बचकानी है क्योंकि ऐसी फ़िल्में किसी तरह की गंभीरता को प्रश्रय नहीं देतीं. अगर हिन्दी फ़िल्म के डायरेक्टर किसी वन लाइन आइडिया, कुछ हीरो-हीरोइन, डांस-म्यूज़िक-सॉन्ग, फ़न एंड फ़ाइट को जोड़कर एक ऐसा प्रोडक्ट बना सकते हैं जिससे दर्शकों को 'मज़ा' आए तो इन फिल्मों पर लिखते समय समीक्षकों को भी 'मज़ा' ही लेना चाहिए.


5 फ़रवरी 2015

हॉलीवुड का प्यारा 'अमरीकी हत्यारा'

रंगनाथ सिंह

अमीरकन स्नाइपर एक असली स्नाइपर क्रिस काइले की कहानी है. मीडिया में काइले की ख्याति कथित तौर पर सबसे अधिक हत्याएँ करने वाले स्नाइपर के रूप में है. फ़िल्म का विषय निर्देशक क्लिंट ईस्टवुड के अनुकूल ही है. ईस्टवुड की ज़्यादातर सफल फ़िल्में किसी न किसी के जीवन-चरित्र पर आधारित हैं. उन्होंने मिस्टिक रीवर, इनविक्टस, ग्रैंड टॉरिनो, मिलियन डॉलर बेबी, चेंजलिंग जैसी सफल और संवेदनशील फ़िल्में बनाई हैं. लेकिन यह फ़िल्म एक ऐसे परिघटना के बारे में है जिसके हम सब गवाह रहे हैं. इसलिए इस फ़िल्म को देखकर इसकी पटकथा, अदाकारी, निर्देशन इत्यादि से ज़्यादा ज़हन में इसके एकांगी और छल भरे होने का अहसास होता है.

काइले इराक में अमरीकी हमले के दौरान इराकियों को मारते थे. काइले को लगता था कि वो अपने देश की इराक से रक्षा कर रहे हैं! काइले तो एक सैनिक थे उन्हें शायद नहीं पता रहा हो लेकिन र्ईस्टवुड जैसी संवदेनशील और राजनीतिक रूप से जागरूक फिल्मकार को ये याद रखना चाहिए था और दर्शकों को बताना चाहिए था कि इराक़ से अमरीका को कभी कोई ख़तरा नहीं था.

अमरीका ने यह कहकर इराक़ को एक ख़तरे के रूप में पेश किया कि इराक़ के पास व्यापक विनाश कर सकने वाले रासायनिक हथियार हैं. बाद में ये दावा झूठा निकला लेकिन तब तक इराक़ एक देश के रूप में धूलधूसरित हो चुका था. विभिन्न आंकड़ों के अनुसार डेढ़ से दो लाख इराक़ी अमरीकी हमले में मारे गए हैं. जिनमें आधे से ज़्यादा आम नागरिक थे. मरने वालों के अलावा अमरीकी हमलों के कारण लाखों लोगों को विकलांग, बेघर और बर्बाद होना पड़ा. लेकिन क्यों? इसका जवाब न काइले के पास है, न ही ईस्टवुड के पास. 

अमरीकी विद्वान नॉम चॉमस्की ने अमरीकी मीडिया में इस फ़िल्म की वाहवाही की कड़ी आलोचना की है. चॉमस्की मानते हैं कि इराक़ पर अमरीका का हमला दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जा सकता है. चॉमस्की ने सही रेखांकित किया है कि यह अमरीकी प्रशासन की एक प्रोपगैंडा फ़िल्म है. हो सकता हो कि ईस्टवुड ने सीधे तौर पर ऐसा न किया हो लेकिन अब यह बात छिपी नहीं है कि सीआईए अमरीकी प्रोपगैंडा को बढ़ावा देने के लिए फ़िल्मों में पैसा लगाता रहा है.

अमरीकी स्नाइपर बार-बार इराक़ियों को सैवेज कहता है. शायद उसे पता ही नहीं कि जबकि अमरीका को कोई जानता नहीं था तब इराक़ी सभ्य थे. पूरी फ़िल्म में कहीं भी इस बात का ज़िक्र नहीं है कि जिन इराक़ियों की हत्या की जा रही है वो अपनी ज़मीन, अपने परिवार को बचाने के लिए लड़ रहे हैं. अगर इराक़ में कोई हमलावर है तो वो अमरीकी सैनिक हैं, न कि कोई इराक़ी. आश्चर्य नहीं कि ब्रितानी बिस्मिल, अशफ़ाक, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु जैसों को आतंकी कहते थे. जिसे भारतीय आज़ादी की पहली लड़ाई कहते हैं, उसे अंग्रज 1857 का विद्रोह कहते हैं.

फ़िल्म में अमरीकी स्नाइपर को एक बेहद संवेदनशील और पारिवारिक व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है. हो सकता है कि इसमें सच्चाई हो लेकिन फ़िल्म यह दिखाना भूल जाती है कि ये स्नाइपर दुनिया के सबसे ताक़तवर सेना के हमलावर दस्ते का एक अंग था. उसने दो सौ से ज़्यादा लोगों को चुन-चुन कर मारने का दावा किया है और वो उस हमले का साझेदार था जिसमें डेढ़ लाख से ज़्यादा लोग मारे गए और कई लाख विकलांग और बेघर हुए होंगे. स्नाइपर की पत्नी को इस बात का तनाव है कि उसके बच्चों को पिता के बिना बचपन गुजारना पड़ रहा है लेकिन ईस्टवुड को इस बात से जरा भी तनाव नहीं हुआ कि इस स्नाइपर और उसके सैनिक साथियों को वजह से लाखों इराक़ी बच्चों को आजीवन अपने माता-पिता के बग़ैर जीवन गुज़ारना पड़ेगा. वो भी ऐसे देश में जिसकी सभी बुनियादी सुविधाओं को अमरीकी ने बर्बाद कर दिया.

फ़िल्म में अमरीकी स्नाइपर ह्मूमनाइज(मानवीय) करने की बार-बार कोशिश की गई है. अमरीकी स्नाइपर एक बार एक बच्चे को महज इसलिए गोली मार देता है क्योंकि वो अमरीकी टैंक पर बम फेंकने की कोशिश करता है. स्नाइपर एक दूसरे बच्चे को गोली नहीं मारता है कि क्योंकि वो बच्चा अंतिम समय पर अमरीकी सैनिकों पर ताना हुआ रॉकेट फेंक कर भाग जाता है. ईस्टवुड ने स्थापित करने की कोशिश की है कि स्नाइफर बेहद मानवीय है और यह उसके काम की बाध्यता है कि उसे एक बच्चे को मारने पड़ता है, जो अमरीकी सैनिकों को लिए ख़तरा बन सकता था. लेकिन उसने उस बच्चे को नहीं मारा जो अमरीकी सैनिकों के लिए 'ख़तरा' नहीं बना. एक शर्मनाक स्थापना है. जो दर्शक अमरीकी नहीं होंगे और अपने दिमाग़ पर जरा भी जोर देंगे उन्हें दोनों बच्चे स्नाइपर से बहादुर प्रतीत होंगे. भारतीयों को ऐसे बच्चे खुदीराम बोस जैसे लगेंगे. जो बच्चे रोज अमरीक सैनिकों के हाथों अपने घर-परिवार, यार-दोस्तों, पास-पड़ोस के लोगों को मारे जाते देखेंगे क्या उनके मन में अमरीकी सेना के लिए बेइंतहा नफ़रत नहीं होगी!

ईस्टवुड अमरीका के हमलावर विदेश नीति के आलोचकों में माने जाते हैं लेकिन उन्होंने एक ऐसी फ़िल्म बनाई है जो उन सैकड़ों फ़िल्मों से बिल्कुल अलग नहीं है जिनमें अमरीकी अपराधों को महिमामंडित करके दिखाया जाता है. विभिन्न देशों में हुए तख्तापलटों में अमरीकी प्रशासन और ख़ुफ़िया एजेंसियों की खूनी भूमिका को छिपाया जाता है. दो देशों के बीच लड़ाई में एक देश का शहीद दूसरे देश का खलनायक हो सकता है लेकिन एक कलाकार से राजनीतिज्ञों से ज़्यादा नैतिक होने की उम्मीद की जाती है. अफ़सोस है कि ईस्टवुड इस उम्मीद पर खरे नहीं उतरे हैं.

इस फ़िल्म को 87वें एकैडमी अवार्ड में छह वर्गों में नामांकन मिला है. हॉलीवुड के प्यारे 'अमरीकी हत्यारे' को कितने ऑस्कर मिलेंगे ये तो अगले कुछ दिनों में पता चलेगा लेकिन अमरीकी जनता और मीडिया का दिल वो पहले ही जीत चुका है क्योंकि वो 'मोस्ट लेथल स्नाइपर इन अमरीकन मिलिट्री हिस्ट्री' है. अमरीकी मीडिया और जनता इस वक़्त इस्लामिक स्टेट की आतंकी कार्रवाइयों के प्रति हैरत और ग़ुस्सा जाहिर करने में व्यस्त है. लेकिन थोड़ी फुरसत निकालकर उसे यह भी सोचना चाहिए कि आख़िकार एक ऐसे व्यक्ति, जो घोषित तौर पर अमरीका के सैन्य इतिहास का सबसे जानलेवा हत्यारा कहा जा रहा है, उससे अमरीकी इतना प्यार क्यों करते हैं!
  

28 जनवरी 2015

एक सफल अभिनेता की विफल आत्मकथा

जन्म- 11 दिसंबर, 1922
रंगनाथ सिंह

जब आप दिलीप कुमार जैसे लीजेंडरी अभिनेताओं की आत्मकथा पढ़ना शुरू करते हैं तो आपको उससे बहुत ज़्यादा उम्मीद होती है.  ज़्यादा उम्मीद का अर्थ है, उसके पूरा न होने पर निराशा भी काफ़ी ज़्यादा होगी. दिलीप कुमार जिनके बारे में हमने बचपन में ही जान लिया था कि वो फल बेचते थे और एक दिन देविका रानी की उनपर नज़र पड़ी और उन्होंने उन्हें यूसुफ़ ख़ान से दिलीप कुमार बना दिया. हम इस बात पर हैरान होते रहते थे कि कोई फल बेचने वाला, जिसे हम अक्सर अपनी कॉलोनी में आवाज़ देते हुए देखते थे, रातों-रात फ़िल्मी स्टार कैसे बन सकता है!

उसके बाद बढ़ती उम्र के साथ क़िस्से भी बढ़ते गए. मधुबाला जैसी अप्रतिम सुंदरी दिलीप कुमार से प्यार करती थी. मधुबाला के 'लालची बाप'  के कारण दोनों एक नहीं हो सके. मुगले-आजम के प्रेम दृश्य तब शूट हुए जब दोनों के बीच सामान्य हाय-हैल्लो भी नहीं होती थी.

दिलीप कुमार हो या कोई दूसरा फ़िल्म स्टार आम भारतीय जनता में उनको लेकर हज़ारों सवाल हमेशा कुलबुलाते रहते हैं. पिछले साठ साल-सत्तर सालों में जिस एक चीज़ ने पूरे भारतीय जनमानस को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है वो है सिनेमा.  एक फ़िल्म स्टार इस देश में भाषा, जाति और धर्म की दीवारों से परे अपना रसूख रखता है.  दिलीप कुमार के प्रशंसकों में भी भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर एक आम ग़रीब तक शामिल थे. लेकिन जिस दिलीप कुमार के आम और ख़ास सिनेमाप्रेमी चाहते हैं वो एक सिनेमाई छवि है, न कि सच. वो पर्दे पर निभाया गया एक किरदार है जो बार-बार भेष बदलकर आता है.

फ़िल्मी हीरो यूसुफ़ ख़ान कोई सआदत हसन मंटो या मनोहर श्याम जोशी नहीं जिसने फ़िल्मी दुनिया की भीतरी सतरों जगजाहिर करने के लिए कलम उठाई है. न ही वो रूसो है जो इसलिए आत्मकथा लिख रहा है कि उसके पास ऐसा कोई सच जिसे वो हर क़ीमत पर दुनिया के सामने ले आना चाहता है. यूसुफ़ ख़ान ने इसलिए आत्मकथा लिखवाई है क्योंकि दिलीप कुमार के लाखों चाहने वालों उसके बारे में छोटी से छोटी बात जानना चाहते हैं. लेकिन इस आत्मकथा से दिलीप कुमार ने अपने कट्टर चाहने वालों को भी निराश ही किया होगा.

दिलीप साहब की आत्मकथा का शीर्षक 'द सब्सटैंस एंड द शैडो' काफ़ी हद तक वाजिब प्रतीत होता है. बस अफ़सोस इस बात का है कि किताब में सब्सटैंस(कथ्य) कम है और शैडो(परछाई) काफ़ी ज्यादा.

किताब का पहला हिस्सा पठनीय है जिसमें दिलीप कुमार ने अविभाजित भारत के पेशावर (वर्तमान पाकिस्तान में) गुज़ारे अपने बचपन का विस्तार से जिक्र किया है. दिलीप कुमार किशोरावस्था में जब अपने फल कारोबारी पिता के साथ फ्रंटियर मेल से पेशावर से मुंबई आए उसी समय से ये किताब पटरी से उतरने लगती है. आम पाठक जिस दिलीप कुमार के बारे में ज़्यादा जानना चाहता है दिलीप कुमार ने उसी के बारे में सबसे कम बताया है. अंग्रेजी के जुमले का प्रयोग करें तो किताब उसके बाद से बहुत स्केची हो जाती है. यह दिलीप कुमार के जीवन के बारे में ऊपर-ऊपर की जानकारियाँ देती हुई एक सफल अभिनेता की विफल आत्मकथा के रूप में ख़त्म हो जाती है.

इस किताब में दिलीप कुमार के बारे में शायद ही ऐसी कोई नई जानकारी हो जो उनके इंटरव्यू या दूसरे हवालों से पहले से सार्वजनिक न हो. अधिक से अधिक इसका प्रयोग किसी मसले पर दिलीप कुमार का आधिकारिक पक्ष जानने के लिए किया जा सकता है. हालांकि उसमें भी थोड़ी दिक्कत पेश आ सकती है, मसलन दिलीप कुमार ने 1970 के दशक में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि उनके पास फ़िल्मी नाम चुनने के लिए तीन विकल्प दिए गए, दिलीप कुमार, वासुदेव और यूसुफ़ ख़ान तो उन्होंने अपने पिता के डर से कह दिया को चाहे जो नाम रख लो, यूसुफ़ ख़ान छोड़कर. बाद में फ़िल्म के पोस्टरों से उन्हें पता चला कि उनका नाम दिलीप कुमार रखा गया है. वहीं इस किताब में दिलीप साहब ने लिखा है कि बॉम्बे टॉकिज की मालकिन और उन्हें फ़िल्मों में मौक़ा देने वाली देविका रानी ने उन्हें एक दिन अपने दफ़्तर में बुलाकर कहा था कि वो उनका नाम दिलीप कुमार रखना चाहती हैं. तब दिलीप साहब ने देविका रानी से एक दिन बाद सोचकर अपनी राय बताने के लिए कहा. अगले दिन उन्होंने इस नाम को यह सोचकर हामी दे दी कि इससे उनके पिता जी को उनके फ़िल्मों के काम करने के बारे में नहीं पता चलेगा.

दिलीप कुमार की जो मीडिया में छवि है और जो छवि इस किताब से उभरती है, उसके मद्देनज़र ये महसूस होता है कि दिलीप साहब ऐसे आदमी नहीं है जो अपनी निजी जीवन को सार्वजनिक करें. शायद वो भी मानते हों कि एक कलाकार या रचनाकार के निजी जीवन का सबके सामने आना ज़रूरी नहीं है. उसका जो भी जीवन या पहचान है वो उसकी कला या बौद्धिक कर्म में पहले से मौजूद है. उसे वहाँ रेखांकित किया जा सकता है. उसका मूल्यांकन भी उसी के आधार पर करना चाहिए.  लेकिन ऐसे में यह भी याद रखना होगा कि ऐसा जीवन-दर्शन रखने वाले कलाकार आत्मकथाएँ भी नहीं लिखा करते.