बुन कर गहन षड़यंत्र
खोद कर गहरे गड्ढे गबड़े गह्वर
ढँक कर पत्तों से पुआलों के छलावे से
हरी घास से लीप पोत कर
बैठा है ताक में बहेलिया बन कर
जो सभ्य समाज
फाँस लेता है मुझे
गरिष्ठ लौह जालों में
पीट कर भालों से, चाबुकों से सोंट कर
पालतू बना देता है मुझे
बाँध कर दीर्घ वृत्तों में
भीमकाय लौह स्तंभों के गिर्द
सामंतों के खलिहानों में
मंदिरों के प्रांगणों में
बना देता है तमाशे की चीज
चुपचाप सहता हूँ मैं
उनकी लाठियाँ उनके बरछे उनकी गालियाँ
वो बताते हैं कि यह अनुशासन है
यही नियमन है ऐसे ही न्याय हैं
कि मैं सभ्य बनूँ
संयमित रहूँ
अनुशासित बनूँ
नियमों में ढलूँ
पर मैं भी कहना चाहता हूँ अपनी बात
कि मैं स्वतन्त्र विचरण करता था
जंगलों में बीहड़ों में
मेरा भी परिवार है कहीं फूलों की घाटियों में
मुझमें भी उठते हैं कामना के ज्वार
मैं भी पाना चाहता हूँ
प्रियतमा का प्यार
पीना चाहता हूँ सत्ता रूपसी की छाँव
कभी कभी बढ़ाना चाहता हूँ कदम
इस बंधी हुई परिधि के पार
मैं भी कहना चाहता हूँ अपनी बात अपनी आह पुकार
पर वो कहते हैं कि
मेरे पास एक सभ्य भाषा नहीं है
जीने का कोई ढांचा, सलीका नहीं है
मैं अनगढ़ हूँ मेरे पास वो संस्कृति नहीं है
कि मैं रूढ़ हूँ ,ढक हूँ
बहने लगता है कानों से मेरे पिघला हुआ गुबार
आँखों में बहती है वेदना की मोटी धार
तब तोड़ देता हूँ मैं बंधी हुई सारी बेड़ियाँ सदियों की
छेद देता हूँ परम्पराओं की भोथरी ढाल
भटकता हूँ उन्मथित व्यथित अतिक्रांत क्रुद्ध हो कर
अपनी स्वतंत्रता की खातिर
नहीं सहन कर पाते हैं जो सत्ता सामंत
छोड़ देते हैं मुझ पर कुलीन कुलक लम्बग्रीव ऊँट
जो चबा डालते हैं मेरे कान
पालतू कुत्तों की टोलियाँ
भून्कती है बाजारों में मुझ पर
लुलकारते हैं बैठे चाटुकार
चुनौती देता है मुझको यह तंत्र
परखता चाहता है मेरा संबल मेरी सहिष्णुता मेरी जिजीविषा
फिर क्रुद्ध हो निरुपचार
उखाड़ लेता हूँ वो हाथ
जो भोंकते हैं नुकीले गजबांक
मगज के गहनतम तहों तक
बन कर ढीठ सत्ता के पीलवान
घुस कर संस्कृति के परिसरों में, सरोवरों में, मंदिरों में
रौंद देता हूँ सारे खिले हुए कमल
विजयी मुद्रा में
देख कर नीला निरभ्र आकाश
मुस्काता हूँ
बुनता हूँ नए स्वप्न भविष्य के
बैठा है ताक में बहेलिया बन कर
जो सभ्य समाज
फाँस लेता है मुझे
गरिष्ठ लौह जालों में
पीट कर भालों से, चाबुकों से सोंट कर
पालतू बना देता है मुझे
बाँध कर दीर्घ वृत्तों में
भीमकाय लौह स्तंभों के गिर्द
सामंतों के खलिहानों में
मंदिरों के प्रांगणों में
बना देता है तमाशे की चीज
चुपचाप सहता हूँ मैं
उनकी लाठियाँ उनके बरछे उनकी गालियाँ
वो बताते हैं कि यह अनुशासन है
यही नियमन है ऐसे ही न्याय हैं
कि मैं सभ्य बनूँ
संयमित रहूँ
अनुशासित बनूँ
नियमों में ढलूँ
पर मैं भी कहना चाहता हूँ अपनी बात
कि मैं स्वतन्त्र विचरण करता था
जंगलों में बीहड़ों में
मेरा भी परिवार है कहीं फूलों की घाटियों में
मुझमें भी उठते हैं कामना के ज्वार
मैं भी पाना चाहता हूँ
प्रियतमा का प्यार
पीना चाहता हूँ सत्ता रूपसी की छाँव
कभी कभी बढ़ाना चाहता हूँ कदम
इस बंधी हुई परिधि के पार
मैं भी कहना चाहता हूँ अपनी बात अपनी आह पुकार
पर वो कहते हैं कि
मेरे पास एक सभ्य भाषा नहीं है
जीने का कोई ढांचा, सलीका नहीं है
मैं अनगढ़ हूँ मेरे पास वो संस्कृति नहीं है
कि मैं रूढ़ हूँ ,ढक हूँ
बहने लगता है कानों से मेरे पिघला हुआ गुबार
आँखों में बहती है वेदना की मोटी धार
तब तोड़ देता हूँ मैं बंधी हुई सारी बेड़ियाँ सदियों की
छेद देता हूँ परम्पराओं की भोथरी ढाल
भटकता हूँ उन्मथित व्यथित अतिक्रांत क्रुद्ध हो कर
अपनी स्वतंत्रता की खातिर
नहीं सहन कर पाते हैं जो सत्ता सामंत
छोड़ देते हैं मुझ पर कुलीन कुलक लम्बग्रीव ऊँट
जो चबा डालते हैं मेरे कान
पालतू कुत्तों की टोलियाँ
भून्कती है बाजारों में मुझ पर
लुलकारते हैं बैठे चाटुकार
चुनौती देता है मुझको यह तंत्र
परखता चाहता है मेरा संबल मेरी सहिष्णुता मेरी जिजीविषा
फिर क्रुद्ध हो निरुपचार
उखाड़ लेता हूँ वो हाथ
जो भोंकते हैं नुकीले गजबांक
मगज के गहनतम तहों तक
बन कर ढीठ सत्ता के पीलवान
घुस कर संस्कृति के परिसरों में, सरोवरों में, मंदिरों में
रौंद देता हूँ सारे खिले हुए कमल
जो पीकर रक्त पंकिल मिट्टी का
इठलाते हैं उन्ही पर
रच कर स्वांग ढोंग पवित्रता का
चिढाते हैं मुझे अघोर कह कर
दलित कह कर
दमित बना कर
उठा कर सूंढ़ अपनी हवाओं मेंरच कर स्वांग ढोंग पवित्रता का
चिढाते हैं मुझे अघोर कह कर
दलित कह कर
दमित बना कर
विजयी मुद्रा में
देख कर नीला निरभ्र आकाश
मुस्काता हूँ
बुनता हूँ नए स्वप्न भविष्य के
गढ़ने को नए उपमान संस्कृति के
नए समाज की नींव के लिए
नए इतिहास के लिए ....... नए समाज की नींव के लिए
दीपांकर कौंडिल्य











