20 नवंबर 2014

हम लोग

दिल के ऐवाँ में लिये गुलशुदा शम्ओं की क़तार
नूरे-ख़ुर्शीद से सहमे हुए उकताए हुए
हुस्ने-महबूब के सय्याल तसव्वुर की तरह
अपनी तारीकी को भींचे हुए, लिपटाये हुए

ग़ायते-सूदो-ज़ियाँ सूरते-आग़ाजो मआल
वही बेसूद तजस्सुस वही बेकार सवाल
मुज़्महिल साअते-इमरोज़ की बेरंगी से
यादे-माज़ी से ग़मी दहशते-फ़र्दा से निढाल

तश्ना अफ़कार जो तस्कीन नहीं पाते हैं
सोख़्ता अश्क जो आँखों में नहीं आते हैं
इक कड़ा दर्द के: जो गीत में ढलता ही नहीं
दिल के तारीक शिग़ाफों से निकलता ही नहीं
और इक उलझी हुई मौहूम-सी दरमाँ की तलाश
दश्तो-ज़िंदाँ की हवस, चाके-गरेबाँ की तलाश

- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गुलशुदा शम्ओं की कतार- बुझे हुए दियों की पंक्ति
नूरे-ख़ुर्शीद - सूरज की रोशनी
सय्याल तसव्वुर - तरल कल्पना
ग़ायतो-सूो-ज़ियाँ - लाभ-हानि की वजहें
सूरते-आग़ाजे मआल- दुनिया के आदि-अंत का स्वरूप
बेसूद तजस्सुस- व्यर्थ की जिज्ञासा
मुज़्महिल - क्लांत, पीड़ाभरा
साअते-इमरोज़- आज के क्षण
यादे-माज़ी से गमी - अतीत की यादों से दुखी
दहशते-फ़र्दा - भविष्य का डर
तश्ना अफ़कार - प्यासे विचार
तस्कीन - संतुष्टि
सोख़्ता अश्क - सूखे हए आँसू
शिग़ाफों- दरारों
दरमाँ - सांत्वना
दश्तो-ज़िंदाँ - जंगल और जेल 



14 नवंबर 2014

सोचता हूँ, बाबर ज़्यादा काबिल था या नेहरू?

(1889-1964)
पहली बार इस साल नवंबर की आहट के साथ ही मेरे मन में एक भोली इच्छा ने जन्म लिया कि इसबार सभी बच्चों के चाचा कहे जाने वाले जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन पर कुछ लिखूँगा.

दिक्कत यह हुई कि नेहरू के बारे में जितनी भी अच्छी बातें हो सकती हैं वो सब हमें स्कूल की किताबों और निबंध-भाषण प्रतियोगिताओं के जरिए बताया जा चुकी हैं.

और जब मेरे सिर के बाल नेहरू स्टाइल में होने के आए हैं, मन बार-बार पूछता है कि देश के पहले कर्णधार ने देश को कौन सी दिशा दी.

ज़हन में सवाल उठता है कि बाबर ज़्यादा काबिल था या नेहरू. हुमायूँ की तुलना इंदिरा से संभव है,. क्या राजीव गांधी अकबर बन सकते थे? क्या नेहरू वंश में कोई जहाँगीर न होगा...राहुल गाँधी भरी जवानी में बहादुर शाह जफर बन जाएंगे?

मन में सवाल उठा कि क्या जवाहरलाल ने भारत की नियति से भेंट (tryst with destiny) अंग्रेज़ी में न कराकर हिन्दुस्तानी में करायी होती तो इस देश का मुस्तकबिल कुछ और होता. क्या वो कमालअतातुर्क जैसे कुछ हो गए होते?

नागार्जुन की कविता याद आती रही...आओ रानी हम ढोएंगे पालकी...यही हुई है राय जवाहरलाल की...

जब मेरे बाल दिवस थे तब तो लड्डू से मन बहल जाता था लेकिन अब मन सोचता है कि एशिया को जो मुल्क हमारे साथ या हमारे बाद आज़ाद हुए उनकी तुलना में भारत कहाँ है?

जिन देशों के पास नेहरू न थे उनका भविष्य कैसा रहा?

नेहरू रुमानी थे, जीवन में भी राजनीति में भी. लेकिन क्या उनकी रूमानियत देवदास जैसी आत्महंता सिद्ध हुई?

नेहरू न होते, पटेल होते जैसी बातों पर मुझे यकीन नहीं. यूँ होता तो क्या होता....का कोई अंत नहीं.

लेकिन जो हुआ....वो क्या हुआ..कैसे हुआ उसी को समझने की कोशिश है...

और हुआ यही कि नेहरू हुए, करोड़ों भारत के मुस्तकिबल हुए.

नेहरू की 125वीं जयंति पर मीडिया में जो छप रहा है उसमें रामचरितमानस की गंध आती है.

इसलिए आख़िरी फ़ैसला यह किया कि नेहरू पर कुछ लिखने से पहेल, कोई अंतिम राय बनाने से पहले...साल-दो साल नेहरू केंद्रित अध्ययन किया जाए.

लिखने का तो ये है कि जीते रहे तो इस देश में उनकी 126वीं, 127वीं, 128वीं जयंतियाँ आती ही रहेंगी और उनके साथ ही उनपर लिखने के बहाने भी मिलते रहेंगे.


2 नवंबर 2014

गांधी की कलम से - गोर्की

मैक्सिम गोर्की(1868-1936)
मोहनदास करमचंद गांधी ने समय-समय पर अपने समकालीनों पर लिखा करते थे. उन्होंने कई बार उन इतिहास पुरुषों पर भी लिखा जिनसे वो प्रेरित हुए थे. नेशनल बुक ट्रस्ट ने नवजीवन ट्रस्ट से साभार गांधी के ऐसे ही लेखों का संकलन प्रकाशित किया था. जिसका संकलन और संपादन यूएस मोहन राव ने किया. 

इसी संग्रह से कुछ लेखों को हिन्दी अनुवाद में ब्लॉग पर प्रकाशित करने का इरादा है. पेश है पहला लेख रूस के अग्रणी साहित्यकार मैक्सिम गोर्की पर -  रंगनाथ सिंह

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मोहनदास करमचंद गांधी

एक सीमा तक भारत और रूस के लोगों के बीच तुलना की जा सकती है. जैसे हम ग़रीब हैं, रूसी लोग भी ग़रीब हैं. सरकार के कामकाज़ में हमारी कोई नहीं सुनता और हमें बिना किसी हीलहुज्जत के टैक्स देने होते हैं, रूसी लोगों के साथ भी यही होता है. 

ऐसे शोषण को देखकर कुछ रूसी समय-समय पर इसके विरोध के लिए सामने आते रहे हैं. कुछ समय पहले ही रूस में एक विद्रोह हुआ था और उसमें भाग लेने वाले प्रमुख लोगों में थे लेखक गोर्की. 

उनका बचपन बेहद ग़रीबी में बीता था. उन्होंने पहले एक जूते बनाने वाले की दुकान पर काम किया, जिसने उन्हें काम से निकाल दिया था. उसके बाद कुछ समय तक उन्होंने सैनिक के रूप में काम किया. 

सेना में नौकरी के दौरान ही उनके मन में शिक्षा के प्रति लालसा जगी लेकिन ग़रीब होने के कारण वो किसी अच्छे स्कूल में प्रवेश नहीं ले सकते थे.

उसके बाद उन्होंने एक वकील के यहाँ नौकरी की और अंततोगत्वा वो एक ब्रेड बनाने वाली दुकान में हॉकर का काम करने लगे. इन सभी कामों के दौरान वो निजी प्रयासों से ख़ुद को शिक्षित करते रहे.

मोहनदास करमचंद गांधी (1869-1948)
1892 में लिखी उनकी पहली ही किताब इतनी अच्छी थी कि वो जल्द ही मशहूर हो गए. उसके बाद उन्होंने बहुत सारी चीज़ें लिखीं हैं और जहाँ तक सम्भव है, उनके सारे लेखन का एक ही मक़सद है, लोगों को उस शोषण के ख़िलाफ़ जगाना जिसमें वो जी रहे हैं, शासन को चेतावनी देना और समाज की सेवा करना. 

पैसे कमाने की चिंता किए बग़ैर वो इतने तीखे और जोरदार ढंग से लिखते हैं कि सरकारी अधिकारियों की उनपर कड़ी नज़र रहती है.

लोगों की सेवा करने के लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा है लेकिन वो ऐसे काम के लिए जेल जाने को सम्मान की बात समझते हैं. ऐसा माना जाता है कि इस वक़्त यूरोप में जनता का पक्ष लेने वाला उनके जैसा दूसरा कोई लेखक नहीं है.


इंडियन ओपिनियन, 01-07-1905 (मूल गुजराती में)


29 अक्तूबर 2014

रेहाना जब्बारी का माँ के नाम आख़िरी संदेश और वसीयत



रेहाना जब्बारी (1988-2014)

रेहाना जब्बारी के बारे में दुनिया को पहली बार 2007 में पता चला. तब उनकी उम्र महज 19 साल थी. उन्हें हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. रेहाना का कहना था कि ईरान के ख़ुफ़िया मामलों के मंत्रालय के  पूर्व कर्मचारी 47 वर्षीय मुर्तज़ा अब्दुलाली सरबंदी ने उनका बलात्कार करने की कोशिश की थी और वो अपना बचाव भर कर रही थीं.

रेहाना को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपील की गई. प्रयास किए गए. सोशल मीडिया पर उन्हें मौत की सज़ा से बचाने के लिए अभियान चलाया गया. लेकिन सब बेअसर रहा. ईरान सरकार पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा.

ईरान के क़िसास क़ानून के अनुसार जिस परिवार के व्यक्ति की हत्या हुई है वो चाहे तो हत्या के अभियुक्त की फांसी माफ़ कर सकता है. ऐसे में संबंधित व्यक्ति को कारावास की सज़ा होती है या अन्य प्रकार का हर्जाना देना होता है. मृतक के परिवार का मानना है कि रेहाना ने ये हत्या साजिशन की थी. ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयतुल्लाह ख़ुमैनी भी रेहाना का मृत्युदंड माफ कर सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

2007 से 2014 तक चले इस मुक़दमे के बाद शनिवार, 25 अक्टूबर, 2014 को रेहाना को तेहरान की एक जेल में फांसी दे दी गई. माना जा रहा है कि रेहाना ने कुछ महीने पहले अपनी माँ के नाम एक ऑडियो संदेश भेजा था जिसे उन्होंने अपनी वसीयत भी बताया था.  नेशनल काउंसिल ऑफ़ रेज़िसटेंस ऑफ ईरान ने उस संदेश का अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध कराया है. यह हिन्दी अनुवाद उसी के आधार पर किया गया है. - रंगनाथ सिंह

पढ़ें, रेहाना जब्बारी का संदेश उनकी माँ के नाम


प्यारी शोले

मुझे आज पता चला कि अब मेरी क़िसास की बारी आ गई है. मुझे इस बात कि दुख है कि आपने मुझे यह क्यों नहीं बताया कि मैं अपनी ज़िंदगी की किताब के आख़िरी पन्ने तक पहुँच चुकी हूँ. आपको नहीं लगता कि मुझे ये जानना चाहिए था? आप जानती हैं कि मैं इस बात से कितनी शर्मिन्दा हूँ कि आप दुखी हैं. आपने मुझे आपका और अब्बा का हाथ चूमने का मौक़ा क्यों नहीं दिया?


दुनिया ने मुझे 19 बरस जीने का मौक़ा दिया. उस अभागी रात को मेरी हत्या हो जानी चाहिए थी. उसके बाद मेरे जिस्म को शहर के किसी कोने में फेंक दिया जाता, और कुछ दिनों बाद पुलिस आपको मेरी लाश की पहचान करने के लिए मुर्दाघर ले जाती और वहाँ आपको पता चलता है कि मेरे साथ बलात्कार भी हुआ था. मेरा हत्यारा कभी पकड़ा नहीं जाता क्योंकि हमारे पास उसके जितनी दौलत और ताक़त नहीं है. उसके बाद आप अपनी बाक़ी ज़िंदगी ग़म और शर्मिंदगी में गुज़ारतीं और कुछ सालों बाद इस पीड़ा से घुट-घुट कर मर गई होतीं और ये भी एक हत्या ही होती.


लेकिन उस मनहूस हादसे के बाद कहानी बदल गयी. मेरे शरीर को शहर के किसी कोने में नहीं बल्कि कब्र जैसी एविन जेल, उसके सॉलिटरी वार्ड और अब शहर-ए-रे की जेल जैसी कब्र में फेंका जाएगा. लेकिन आप इस नियति को स्वीकार कर लें और कोई शिकायत न करें. आप मुझसे बेहतर जानती हैं कि मौत ज़िंदगी का अंत नहीं होती.

आपने मुझे सिखाया है कि हर इंसान इस दुनिया में तजुर्बा हासिल करने और सबक सीखने आता है. हर जन्म के साथ हमारे कंधे पर एक ज़िम्मेदारी आयद होती है. मैंने जाना है कि कई बार हमें लड़ना होता है. मुझे अच्छी तरह याद है कि आपने मुझे बताया था कि बघ्घी वाले ने उस आदमी का विरोध किया था जो मुझपर कोड़े बरसा रहा था लेकिन कोड़ेवाले ने उसके सिर और चेहरे पर ऐसी चोट की जिसकी वजह से अंततः उसकी मौत हो गयी. आपने मुझसे कहा था कि इंसान को अपने उसूलों को जान देकर भी बचाना चाहिेए.
  
जब हम स्कूल जाते थे तो आप हमें सिखाती थीं कि झगड़े और शिकायत के वक़्त भी हमें एक भद्र महिला की तरह पेश आना चाहिए. क्या आपको याद है कि आपने हमारे बरताव को कितना प्रभावित किया है? आपके अनुभव ग़लत थे. जब ये हादसा हुआ तो मेरी सीखी हुई बातें काम नहीं आयीं. अदालत में हा़ज़िर होते वक़्त ऐसा लगता है जैसे मैं कोई क्रूर हत्यारा और बेरहम अपराधी  हूँ. मैं ज़रा भी आँसू नहीं बहाती. मैं गिड़गिड़ाती भी नहीं. मैं रोई-धोई नहीं क्योंकि मुझे क़ानून पर भरोसा था.


लेकिन मुझपर ये आरोप लगाया गया कि मैं जुर्म होते वक़्त तटस्थ बनी रही. आप जानती हैं कि मैंने कभी एक मच्छर तक नहीं मारा और मैं तिलचट्टों को भी उनके सिर की मूँछों से पकड़कर बाहर फेंकती थी. अब मैं एक साजिशन हत्या करने वाली कही जाती हूँ. जानवरों के संग मेरे बरताव की व्याख्या मेरे लड़का बनने की ख़्वाहिश के तौर पर की गयी. जज ने ये देखना भी गंवारा नहीं किया कि घटना के वक़्त मेरे नाख़ून लंबे थे और उनपर नेलपालिश लगी हुई थी.


जजों से न्याय की उम्मीद करने वाले लोग कितने आशावदी होते हैं! किसी जज ने कभी इस बात पर सवाल नहीं उठाया कि मेरे हाथ खेल से जुड़ी महिलाओं की तरह सख्त नहीं हैं, ख़ासतौर पर मुक्कबाज़ लड़कियों के हाथों की तरह. और ये देश जिसके लिए आपने मेरे दिल में मुहब्बत भरी थी, वो मुझे कभी नहीं चाहता था. जब अदालत में  मेरे ऊपर सवाल-जवाब का वज्र टूट रहा था और मैं रो रही थी और अपनी ज़िंदगी के सबसे गंदे अल्फ़ाज़ सुन रही थी तब मेरी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया. जब मैंने अपनी ख़ूबसूरती की आख़िरी पहचान अपने बालों से छुटकारा पा लिया तो मुझे उसके बदले 11 दिन तक तन्हा-कालकोठरी में रहने का इनाम मिला.


प्यारी शोले, आप जो सुन रही हैं उसे सुनकर रोइएगा नहीं. पुलिस थाने में पहले ही दिन एक बूढ़े अविवाहित पुलिस एजेंट ने मेरे नाखूनों के लिए मुझे चोट पहुँचायी. मैं समझ गयी कि इस दौर में सुंदरता नहीं चाहिए. सूरत की ख़ूबसूरती, ख़्यालों और ख़्वाबों की ख़ूबसूरती, ख़ूबसूरत लिखावट, आँखों और नज़रिए की ख़ूबसूरती और यहाँ तक कि किसी प्यारी आवाज़ की ख़ूबसूरती भी किसी को नहीं चाहिए.

मेरी प्यारी माँ, मेरे विचार बदल चुके हैं और इसके लिए आप ज़िम्मेदार नहीं है. मेरी बात कभी ख़त्म नहीं होने वाली और मैंने इसे किसी को पूरी तरह दे दिया है ताकि जब आपकी मौजूदगी और जानकारी के बिना मुझे मृत्युदंड दे दिया जाए तो उसके बाद इसे आपको दे दिया जाए. मैं आपके पास अपने हाथों से लिखी इबारत धरोहर के रूप में छोड़ी है.


हालाँकि, मेरी मौत से पहले मैं आपसे कुछ माँगना चाहती हूँ, जिसे आपको अपनी पूरी ताक़त और कोशिश से मुझे देना है. दरअसल बस यही एक चीज़ है जो अब मैं इस दुनिया से, इस देश से और आपसे माँगना चाहती हूँ. मुझे पता है आपको इसके लिए वक़्त की ज़रूरत होगी. इसलिए मैं आपको अपनी वसीयत का हिस्सा जल्द बताऊँगी. आप रोएँ नहीं और इसे सुनें. मैं चाहती हूँ कि आप अदालत जाएँ और उनसे मेरी दरख़्वास्त कहें. मैं जेल के अंदर से ऐसा ख़त नहीं लिख सकती जिसे जेल प्रमुख की इजाज़त मिल जाए, इसलिए एक बार फिर आपको मेरी वजह से दुख सहना पड़ेगा. मैंने आपको कई बार कहा है कि मुझे मौत की सज़ा से बचाने के लिए आप किसी से भीख मत माँगिएगा लेकिन यह एक ऐसी ख़्वाहिश है जिसके लिए अगर आपको भीख माँगनी पड़े तो भी मुझे बुरा नहीं लगेगा.


मेरी अच्छी माँ, प्यारी शोले, मेरी ज़िंदगी से भी प्यारी, मैं ज़मीन के अंदर सड़ना नहीं चाहती. मैं नहीं चाहती कि मेरी आँखे और मेरा नौजवान दिल मिट्टी में मिल जाए. इसलिए मैं भीख माँगती हूँ कि मुझे फांसी पर लटकाए जाने के तुरंत बाद मेरे दिल, किडनी, आँखें, हड्ड्याँ और बाक़ी जिस भी अंग का प्रतिरोपण हो सके उन्हें मेरे शरीर से निकाल लिया जाए और किसी ज़रूरतमंद इंसान को तोहफे के तौर पर दे दिया जाए. मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग मिलें उसे मेरा नाम पता चले, वो मेरे लिए फूल ख़रीदे या मेरे लिए दुआ करे. मैं सच्चे दिल से आपसे कहना चाहती हूँ कि मैं अपने लिए कब्र भी नहीं चाहतीं, जहाँ आप आएँ, मातम मनाएँ और ग़म सहें. मैं नहीं चाहती कि आप मेरे लिए काला लिबास पहनें. मेरे मुश्किल दिनों को भूल जाने की आप पूरी कोशिश करें. मुझे हवाओं में मिल जाने दें.


दुनिया हमें प्यार नहीं करती. इसे मेरी ज़रूरत नहीं थी. और अब मैं इसे उसी के लिए छोड़ कर मौत को गले लगा रही हूँ. क्योंकि ख़ुदा की अदालत में मैं इंस्पेक्टरों पर मुक़दमा चलावाऊँगी, मैं इंस्पेक्टर शामलू पर मुक़दमा चलवाऊँगी, मैं जजों पर मुक़दमा चलवाऊँगी और देश के सुप्रीम कोर्ट की अदालत के जजों पर भी मुक़दमा चलवाऊँगी जिन्होंने ज़िंदा रहते हुए मुझे मारा और मेरा उत्पीड़न करने से परहेज नहीं किया. दुनिया बनाने वाली की अदालत में मैं डॉक्टर फरवंदी पर मुक़दमा चलवाऊँगी, मैं क़ासिम शाबानी पर मुक़दमा चलवाऊँगी और उनसब पर जिन्होंने अनजाने में या जानबूझकर मेरे संग ग़लत किया और मेरे हक़ को कुचला और इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि कई बार जो चीज़ सच नज़र आती है वो सच होती नहीं.


प्यारी नर्म दिल शोले, दूसरी दुनिया में मैं और आप मुक़दमा चलाएंगे और दूसरे लोग अभियुक्त होंगे. देखिए, ख़ुदा क्या चाहते हैं. ..मैं तब तक आपको गले लगाए रखना चाहती हूँ जब तक मेरी जान न निकल जाए. मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ.

रेहाना
01, अप्रैल, 2014

8 अक्तूबर 2014

हैदर: हुआ तो क्यों हुआ या हुआ भी कि नहीं...

हैदर एक ऐसी फ़िल्म है जिसे एक बार ज़रूर देखा जाना चाहिए. दोबारा देखने लायक इसमें कुछ है भी नहीं.

हैदर को सिनेमा के पैरामीटर पर तौला जाए तो यह एक औसत फ़िल्म है.

इस फ़िल्म की तारीफ़ सिर्फ और सिर्फ इसलिए की जानी चाहिए कि इसने कश्मीर में होने वाले मानवाधिकार हनन के मामलों की तरफ़ ध्यान खींचा है.

इंटरनेशनल मीडिया भी इस फ़िल्म को केवल इसीलिए और इसी एंगल से सराहा है. मैं भी इसके लिए विशाल की बार-बार तारीफ़ करूँगा.

विशाल ने राजनीतिक मुद्दों को फ़िल्म में बरतने के नए दरवाज़े खोले हैं. फ़िल्म में आर्म्ड फ़ोर्सेज़ (स्पेशल पॉवर) एक्ट 1958 (अफ़्सपा) की आलोचना, भारतीय फ़ौज द्वारा हिरासत में लेकर बग़ैर किसी एफआईआर के कश्मीरियों को लापता एवं प्रताड़ित करने के दृश्य, लापता कश्मीरियों की गुमनाम सामूहिक कब्रें और भारतीय सेना द्वारा चरमपंथियों के मुक़ाबले पूर्व चरमपंथियों का गुट खड़ा करने के सच को दिखाना काबिले तारीफ़ है.


लेकिन बकौल माइकल मूर फ़िल्म को राजनीतिक भाषण या उपदेश तो होती नहीं. फ़िल्म का पहला काम है फ़िल्म होना, बाक़ी काम उसके बाद. इंटरवल के थोड़ी देर बाद से मैं फ़िल्म ख़त्म होने के इंतज़ार करता रहा.

बावजूद इसके कि विशाल भारद्वाज ने कश्मीर की समस्या के एक पक्ष को दिखाकर साहस का काम किया है, कोई यह सोचकर फ़िल्म देखने गया कि उसे कश्मीर का मुद्दा समझने में मदद मिलेगी तो उसे भारी निराशा होगी.

फ़िल्म समीक्षक शेखर ने बिल्कुल सही लिखा है, "ये एक मुख्यधारा की हिंदी फ़िल्म है." इस फ़िल्म को "रियल सिनेमा" वही लोग कह सकते हैं जिन्होंने केवल हिन्दी की मसाला फ़़िल्में देखी हों.

विशाल भारद्वाज ने हैदर के रिलीज़ के बाद अपने एक इंटरव्यू में कहा कि वो मासेज(भीड़) के लिए फ़िल्म नहीं बनाते. वो बुद्धिजीवियों, फ़िल्म समीक्षकों और फ़िल्म रसिकों के लिए सिनेमा बनाते हैं.

उनके इस बयान पर इंडियन एक्सप्रेस में छपा हैदर का रिव्यू याद आता है जिसमें फ़िल्म समीक्षक शुभ्रा गुप्ता ने  लिखा है, "यह एक बहुत ख़ूबसूरत(गॉर्जियस) लेकिन कटीफटी(चॉपी) फ़िल्म है."

विशाल ने हैदर में कश्मीर में होने वाले मानवाधिकार हनन के मामलों को दिखाकर साहस का काम किया है लेकिन उन्हें शायद यह बात भूल गयी वो जिस वर्ग के लिए फ़िल्म बनाने का दावा कर रहे हैं वह वर्ग कश्मीर को लेकर औसत भारतीयों से ज़्यादा मालूमात रखता है. और शायद यही वजह है कि विशाल की फ़िल्म कश्मीर के मामलों में रुचि रखने वाले किसी भी दर्शक की समझ में कोई नया इज़ाफ़ा नहीं करती.

यह फ़िल्म कश्मीर की राजनीति और इतिहास को जरा भी नहीं छूती. न ही कश्मीर के अलगाववाद या भारतविरोध के किसी भी अंतरविरोध या फॉल्टलाइन को उजागर कर पाती है.

फ़िल्म 'आज़ादी' और 'इंतकाम' शब्दों के बीच कुछ इस तरह घालमेल कर देती है कि केदारनाथ सिंह की कविता याद आ जाती है,

जहाँ लिखा है तुमने प्यार
वहाँ लिख दो
सड़क
फ़र्क़ नहीं पड़ता
मेरे युग का मुहावरा है
फ़र्क़ नहीं पड़ता.

फ़िल्म में 'आज़ादी' शब्द का काफ़ी दुरुपयोग किया गया है.  फ़ैज़ की ग़ज़लों, नज़्मों और तरानों का दुरुपयोग तो किया ही गया है. अगर फ़िल्म को बदले की कहानी में ही बदलना था तो फ़ैज़ के साथ चुत्सपा करने की क्या ज़रूरत थी.

भरे चौराहे पर आज़ादी-आज़ादी गाता हुआ फ़िल्मी हैदर आखिरकार गैंग ऑफ़ वासेपुर के फ़ैसल में बदलता नज़र आता है. बस फर्क इतना है कि वहाँ अम्मा को उम्मीद थी कि "सबका बदला लेगा हमरा फैसल" यहाँ अब्बा को तड़प है बदले की (दोनों आँखों में गोली मारना). बस वहाँ अम्मा अनपढ़ थी, यहाँ अब्बा डॉक्टर हैं और बहलाने के लिए फ़ैज़ के कलाम गाते हैं.

फ़िल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी है फ़िल्म की पटकथा. विशाल ने हैमलेट का आमलेट बनाकर कश्मीर की तश्तरी में सजा दिया है. जाहिर है कि यह फ़ैसला उनके लिए दुस्साहसभरा रहा होगा.

उन्होंने यह ख़तरा उठाया और इसका उन्हें फ़ायदा भी मिल रहा है. इस फ़िल्म को मीडिया में व्यापक चर्चा सिर्फ़ इसीलिए मिल रही है कि फ़िल्म ने कश्मीर के ज़मीनी हालात को लेकर हिन्दी सिनेमा की चुप्पी को तोड़ा है.

लेकिन मुझे पूरी उम्मीद है कि इस फ़िल्म को देखकर कोई आम कश्मीरी ज़्यादा ख़ुश नहीं होगा. किसी को यह भी लग सकता है कि विशाल ने अपनी फ़िल्म के लिए कश्मीर के मुद्दे को भुना लिया है. और फ़िल्म के क्लाइमेक्स में मोहनदास करमचंद गाँधी के वाक्य के आप्त वचन, " आँख के बदले आँख लेने से पूरी दुनिया अंधी हो जाएगी" से प्रेरणा लेते हुए "आज़ादी" की माँग को "इंतकाम" बताने की  .

दर्शक समझ नहीं पाते कि हैदर को या उसके अब्बा को चाहिए क्या थी "आज़ादी" या "इंतकाम." अगर हैदर को इंतकाम ही लेना था तो वो एक गोली का काम था. अब्बा की मौत की सच का पता चलने, उस सच पर यक़ीन हो जाने और हाथ में पिस्टल होने के बावज़ूद हैदर दर्शकों के साथ देर तक चुत्सपा करता रहता है.

अंततोगत्वा बेहद फ़िल्मी तरीके से ज़ारों गोलियाँ चलाकर, लाशेें बिछाकर और चौंकाने की कोशिश करने वाले अंत (माँ का सुसाइड बम बन जाना) पर ख़त्म होती है.

फ़िल्म के कथानक में तमाम कुछ तथ्यात्मक भूले हैं जिसकी तरफ़  कश्मीर में काम कर चुके एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने ध्यान दिलाया है.

मुझे लगता है कि विशाल का इरादा भी नहीं था कि वो कश्मीर का सच दिखाएँ. उनका उद्देश्य वास्तविकता का टच देना था, न कि वास्तविकता दिखाना. उन्हें तो बस अपनी शेक्यपीयर त्रयी पूरी करनी थी.

विशाल ने अख़बारों में बड़ बोल बोलते हुए कहा कि विदेश में यहूदी नरसंहार और प्रथम विश्वयुद्द पर कितनी फ़िल्में बनती हैं हमारे यहाँ नहीं बनतीं.

विशाल ने जिन दोनों वैश्विक घटनाओं का ज़िक्र किया है अगर उनपर बनी दुनिया की 50 चर्चित फ़िल्मों के देखने के बाद  विशाल की हैदर देखी जाए तो वो उसे 'बैंग बैंग' नज़र आने लगेगी.

विशाल के हैमलेट उर्फ़ हैदर की कहानी मनमोहन देसाई की फ़िल्मों की तरह आगे बढ़ती है. अगर हिरोईन के बाप के मरवाना है तो हैदर का मफलर वहाँ गिरा दो जहाँ वो अपनी माँ से मिल रहा है. जबकि उसका मफलर वहाँ पाया जाना चाहिए था जहाँ वो दोनों सलमानों से अपने बंधे हाथ खुलवाता है.

अगर हैदर को अपनी माँ से मिलवाना हो तो उसे अर्शी के डायरी में पड़ा रूहजाद का नंबर दिलवा दो.

गोलियों से छलनी रूहजाद की जान झेलम के ठण्डे पानी से बच जाती है लेकिन हैदर के पिता की नहीं बचती क्योंकि झेलम को पता है कि वो हैदर के पिता हैं.

हैदर ख़ुद हिन्दी फ़िल्मों के हीरो की तरह बग़ैर किसी प्रशिक्षण के अचूक निशाने के साथ दुनिया का कोई भी हथियार चला सकता है. यकीन मानिए, हैदर कवि न भी होता तो उसका निशाना अचूक ही होता.

फ़िल्म में चरमपंथी कुछ हद तक भले लोग नज़र आते हैं. वैसे भी इरफ़ान ख़ान जैसा अभिनेता अगर शैतान का भी रोल करेगा तो शैतान ख़ुदा नज़र आने लगेगा. रूहजाद तो महज़ आईएसआई का एजेंट और चरमपंथी है.

पुलिस के एक बड़े अधिकारी की हत्या के बाद जिस कब्रिस्तान में हमारा हीरो हैदर एक स्वप्न दृश्य में कुछ स्वीट चरमपंथी बूढों के संग मृत्यु, मिट्टी और प्याले का दर्शन दे रहा है उसी में हिरोइन को दफ़न करने के लिए ले जाया जाता है.

हाईफाई चरमपंथी रूहजाद हैदर के ठिकाने तक उसकी  माँ को आत्मघाती बम पहनाकर ड्राप कर देता है लेकिन वो अपने साथ चार आदमी नहीं लाता कि वो हैदर को निकाल सके.

फ़िल्म के अंत में फ़िल्म का खलनायक ख़ुर्रम नायक हैदर पर भारी पड़ जाता है. आत्मघाती बम बनी हुई ग़ज़ाला की तरफ़ वो हैदर से पहले दौड़ पड़ता है.  और इस प्रयास में हैदर का तो बाल भी बांका नहीं होता लेकिन वो अपनी टांगें गँवा बैठता है. उस त्रासद क्षण में वो अपने भाई को याद करता है जिसकी मौत का कारण जाने-अनजाने वो बन बैठा. फ़िल्म के क्लाइमेक्स में से इतना तो साबित  हो जाता है कि खुर्रम का प्रेम सच्चा था.

फ़िल्म में संवाद अदायगी भी बहुत ख़राब है. मैंने आज तक जितने भी कश्मीरियों से बात की उन्हें ख़ुशज़ुबान पाया है. लेकिन इस फ़िल्म में एक पत्रकार और वकील को हास्यास्पद ज़ुबान बोलते हुए दिखाया गया है. उर्दू या कश्मीरी लहजे का कोई पुट किसी भी पात्र की ज़ुबान में नज़र नहीं आया.

फ़िल्म में गाने भी बेवजह ठूँसे हुए लगे. स्वतंत्र रूप से सारे गाने ठीक-ठाक हैं लेकिन फ़िल्म की कहानी में वो क्या कर रहे थे पता ही नहीं चला. बदले के लिए घर वापस आया हैदर, प्रेमिका को देखते ही गाने गाने लगता है. एक मर्मांतक त्रासदी से जूझता हैदर, प्रेमिका के संग संभोग कर सकता है लेकिन गाना गाएगा कि नहीं यह विशाल ही बता सकते हैं.

एक गाना गाने के बाद हैदर का आत्मविश्वास बढ़ चुका है इसलिए उसने एक और गाना गाया. क्यों गाया ये बस विशाल को पता है. क्या कश्मीर में ऐसा होता है ! गाने में भी वो बस वही कहानी सुनाता है जो फ़िल्म के अंदर काम कर रहे सभी पात्रों को और फ़िल्म देख रहे सभी दर्शकों को पता थीं. पता नहीं हैदर ने अलीगढ़ में ऋषि कपूर की फ़िल्म 'कर्ज़' देखी थी कि नहीं? लगभग एक ही उद्देश्य और तकनीक के साथ रचे गए दोनों दृश्यों की तुलना करने पर विशाल के रियल सिनेमा का दृश्य हल्का नज़र आता है. भारी-भरकम बोल, सेटअप और अजीबोग़रीब परिधान से कोई दृश्य बढ़िया नहीं हो जाता.

कश्मीरी पंडित इस बात अब सवाल उठा रहे हैं कि विशाल ने मार्तंड मंदिर (सूर्य मंदिर) पर इस गाने को फ़िल्माकर हिन्दू धर्म का अपमान किया है. जाहिर है कि जिनका अपमान हुआ है वो पेशेवर आहत लोग हैं, जिनकी भावनाएँ आहत मोड में ही रहती हैं.

अगर उस मंदिर पर शादी के बाद मुस्लिम परिवार ऐसा नाच गाना करते हैं तो ठीक है. लेकिन नहीं करते तो फ़िल्म के प्रति कलावादी आग्रह रखने वाला कोई भी व्यक्ति पूछ सकता है कि क्या यह कलात्मक ईमानदारी है ?  

प्रेमचंद ने लिखा है कि रचनाकार के पास ईश्वर जैसी शक्ति होती है. वो जैसे चाहे वैसे पात्र और घटनाएँ रच सकता है. लेकिन ईश्वर के पास एक सुविधा है कि उसे अपने किए का जवाब नहीं देना होता. जबकि लेखक को उसकी रचना में हर किए-हुए का जवाब पाठक को देना होता है कि ऐसा हुआ तो क्यों हुआ.

बेहतर होता कि विशाल इस साहसिक फ़िल्म के लिए कोई मौलिक कहानी चुनते. बेवजह शेक्सपीयर को कश्मीर की सैर कराने की कोशिश में उनकी फ़िल्म में ढेरों चुत्सपा हो गए हैं. फ़िल्म देखकर दर्शकों के ज़हन में ढेरों सवाल उठते हैं जिनका जवाब फ़िल्म नहीं दे पाती.