14 फरवरी 2012

अपनी स्वतंत्रता की खातिर

बुन कर गहन षड़यंत्र
खोद कर गहरे गड्ढे गबड़े गह्वर 
ढँक कर पत्तों से पुआलों के छलावे से 
हरी घास से लीप पोत कर
बैठा है ताक में बहेलिया बन कर
जो सभ्य समाज
फाँस लेता है मुझे
गरिष्ठ लौह जालों में
पीट कर भालों से, चाबुकों से सोंट कर
पालतू बना देता है मुझे
बाँध कर दीर्घ वृत्तों में
भीमकाय लौह स्तंभों के गिर्द
सामंतों के खलिहानों में
मंदिरों के प्रांगणों में
बना देता है तमाशे की चीज


चुपचाप सहता हूँ मैं
उनकी लाठियाँ उनके बरछे उनकी गालियाँ
वो बताते हैं कि यह अनुशासन है
यही नियमन है ऐसे ही न्याय हैं
कि मैं सभ्य बनूँ
संयमित रहूँ
अनुशासित बनूँ
नियमों में ढलूँ


पर मैं भी कहना चाहता हूँ अपनी बात
कि मैं स्वतन्त्र विचरण करता था
जंगलों में बीहड़ों में
मेरा भी परिवार है कहीं फूलों की घाटियों में
मुझमें भी उठते हैं कामना के ज्वार
मैं भी पाना चाहता हूँ
प्रियतमा का प्यार
पीना चाहता हूँ सत्ता रूपसी की छाँव


कभी कभी बढ़ाना चाहता हूँ कदम
इस बंधी हुई परिधि के पार
मैं भी कहना चाहता हूँ अपनी बात अपनी आह पुकार
पर वो कहते हैं कि
मेरे पास एक सभ्य भाषा नहीं है
जीने का कोई ढांचा, सलीका नहीं है
मैं अनगढ़ हूँ मेरे पास वो संस्कृति नहीं है
कि मैं रूढ़ हूँ ,ढक हूँ


बहने लगता है कानों से मेरे पिघला हुआ गुबार
आँखों में बहती है वेदना की मोटी धार
तब तोड़ देता हूँ मैं बंधी हुई सारी बेड़ियाँ सदियों की
छेद देता हूँ परम्पराओं की भोथरी ढाल
भटकता हूँ उन्मथित व्यथित अतिक्रांत क्रुद्ध हो कर
अपनी स्वतंत्रता की खातिर


नहीं सहन कर पाते हैं जो सत्ता सामंत
छोड़ देते हैं मुझ पर कुलीन कुलक लम्बग्रीव ऊँट
जो चबा डालते हैं मेरे कान
पालतू कुत्तों की टोलियाँ
भून्कती है बाजारों में मुझ पर
लुलकारते हैं बैठे चाटुकार
चुनौती देता है मुझको यह तंत्र
परखता चाहता है मेरा संबल मेरी सहिष्णुता मेरी जिजीविषा


फिर क्रुद्ध हो निरुपचार
उखाड़ लेता हूँ वो हाथ
जो भोंकते हैं नुकीले गजबांक
मगज के गहनतम तहों तक
बन कर ढीठ सत्ता के पीलवान


घुस कर संस्कृति के परिसरों में, सरोवरों में, मंदिरों में
रौंद देता हूँ सारे खिले हुए कमल
जो पीकर रक्त पंकिल मिट्टी का 
इठलाते हैं उन्ही पर
रच कर स्वांग ढोंग पवित्रता का
चिढाते हैं मुझे अघोर कह कर
दलित कह कर
दमित बना कर
उठा कर सूंढ़ अपनी हवाओं में
विजयी मुद्रा में
देख कर नीला निरभ्र आकाश
मुस्काता हूँ
बुनता हूँ नए स्वप्न भविष्य के 
गढ़ने को नए उपमान संस्कृति के
नए समाज की नींव के लिए 
नए इतिहास के लिए .......


दीपांकर कौंडिल्य

7 फरवरी 2012

पांगी

आशीष पाण्डेय

हिमालय की बर्फीली चोटियों से हर रोज सूरज निकलता है पांगी घाटी को देखने के लिए। सूरज की मखमली छूवन और बर्फ की ठंड़ी हवाओं से गुनगुनाती-गाती पांगी घाटी कुदरत का करिश्मा है। वर्षों से खुद को सहेजे-खुद को समेटे ये पांगी घाटी आज भी अपने जीवन को ऐसे जी रही है, मानो भूत, भविष्य और वर्तमान एक ही जगह मिल गए हो- ये पंगवालों की पांगी घाटी है।

हिमाचल प्रदेश के 12वें जिले के रूप में चंबा अपनी खास पहचान रखता है। चंबा को हिमाचल के ताज में लगे नगीने के रूप में जाना जाता है। इस जिले की लम्बाई और चौड़ाई दक्षिण-पश्चिम से उत्तर पूर्व में 70 मील और चौड़ाई  दक्षिण से उत्तर पश्चिम में 50 मील है। चंबा जिले की निचली घाटी दो छोटी घाटियों में बँटी है। रावी घाटी में बसी है मनमोह पांगी जबकि चेनाब घाटी में चंबा लाहौल। हिमालय को तीन बर्फीली श्रेणियों में बाटा गया है, जिसमें पहली श्रेणी है बाहरी हिमालय यानी धौलाधार श्रेणी, इसे चंबा परिक्षेत्र भी कहा जाता है। दूसरी श्रेणी मध्य हिमालय यानी पांगी परिक्षेत्र और तीसरी श्रेणी यानी आंतरिक हिमालय इसे जांस्कार श्रेणी भी कहा जाता है।

पंगवालों की यह धरती जाड़े के 4-5 महीने पूरी दुनिया से कटी रहती है। मौसम की तमाम दुश्वारियों  के बावजूद पंगवाल यहां सदियों से रहते चले आये हैं। चंबा जिले के इस छोटे से उत्तरी परिक्षेत्र पांगी में जीवन कितनी कठिनाइयों से गुजरता है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुराने समय में चंबा राज्य के जिन कर्मचारियों की नियुक्ति इस क्षेत्र में होती थी, उन्हें वेतन के अलावा अंतिम क्रिया-कर्म का विशेष खर्च भी दिया जाता है।

ऐसा इसलिए क्योंकि राज्य प्रशासन का मानना था कि जो भी व्यक्ति पांगी प्रशासनिक कार्यों के लिए जाता था, उसके जीवित वापसी की उम्मीद कम ही रहती थी। ठीक उसी  तरह पांगी को यातना क्षेत्र के तौर पर भी जाना जाता था, और यही वजह थी कि पुराने जमाने में भयंकर अपराधियों के साथ-साथ राजनैतिक अपराधियों को बतौर सजा पांगी भेज दिया जाता था, यह क्षेत्र बिल्कुल वैसे ही था जैसे काले पानी की सजा के लिए अंडमान-निकोबार द्वीप समूह। पांगी जब चंबा राज के अधीन क्षेत्र हुआ करता था, तो उसमें चंबा से पांगी चिठ्ठी पंहुचने वाले डाकिये को बतौर पारिश्रमिक एक अशर्फी  दी जाती थी, डाकिये को अशर्फी की अदायगी उसके कठिन परिश्रम और हिम्मत के लिए दी जाती थी।

किसी भी समाज में धर्म आस्था और विश्वास से जुड़ा महत्वपूर्ण पहलू होता है। पांगी के पंगवालों का समर्पण हिन्दू सभ्यता-संस्कृति में है। दसवीं शताब्दी में महाराजा वर्मन के काल में चंबा विष्णु का प्रभाव नगण्य था। पंगवाल मुख्यतः शिव की पूजा करते हैं। शिव के रूद्र रूप और लिंग रूप की पूजा करने वाले पंगवालियों का इतिहास भी प्रभु शिव के साथ जुड़ा हुआ है। 700.पू. में महाराजा मेरूवर्मन ने कई शिव मंदिरों का निर्माण कराया, जिनमें मनिमहेष शिव का मंदिर प्रमुख है। प्रभु शिव की पूजा पंगवालियों के दिनचर्या में शामिल है, परन्तु रविवार को प्रभु शिव  की पूजा विशेष तौर पर की जाती है।


पंगवालियों की पांरपरिक पूजा में नाग देवता का प्रमुख स्थान है। पांगी घाटी में लगभग हर जगह हर गांव में नाग देवता के मंदिर पाये जाते हैं। पत्थर पर उकेर कर बनाये गये नाग देवता के आस-पास सर्पों की आकृति बनी होती है और उनके पास ही प्रभु शिव  का प्रतीक त्रिशूल भी होता है। इन मंदिरों के आगे शेर की मूर्तियाँ स्थापित होती हैं।

हिन्दु धर्म के विभिन्न देवी-देवताओं के साथ-साथ पंगवालियों में प्रकृति पूजन का भी विशेष महत्व है। वर्षा के देवता स्वरूप इंद्र और जल स्वरूप प्रभु वरूण के अलावा नाग वर्षा के देव स्वरूप की पूजा की जाती है। इनके अलावा पंगवालों के हर घर के अपने कुलदेवता भी होते हैं। इन्हें कुलजकहते हैं। इन कुलदेवताओं के पूजा-पाठ की पद्धती पंगवालियों की अपनी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति पर आधारित है। धूप के धुंए में...नागाड़ों की थाप पर घंटियों की आवाज और इन सबके बीच शंख का नाद इनके पूजा में शामिल आवश्यक भाग है। पंगवालियों के पूजन विधि में पशुओं की बली के साथ-साथ शराब को भी प्रसाद के तौर पर चढ़ाया जाता है।

पंगवाली समाज में जातिगत व्यवस्था हिन्दूमान्यताओं के अनुसार है। पंगवालियों में ब्राहम्ण, क्षत्रिय, हाली, लोहार, डाकी, मेघ और अर्या से लेकर कई अगड़ी और पिछड़ी जातियां पायी जाती हैं। पांगी घाटी में मुख्यतः ब्राहम्ण, क्षत्रिय के साथ-साथ पिछड़ी जातियों का समावेश दिखाई पड़ता है, परन्तु वैष्य जाति जो कि मुख्य रूप से व्यवसाय या व्यापार पर आश्रित रहने वाली होती है। पांगी घाटी में नहीं है। इसकी मुख्य वजह यह है कि पंगवालियों का व्यवसाय से सीधा कोई जुड़ाव नहीं था। हिन्दू मान्यताओं के आधार पर वंशानुगत जातिव्यवस्था का प्रभाव पांगी घाटी में पूर्णतः प्रचलित अवधारणा है। भाषाई आधार पर पंगवालों की विकास यात्रा ने तमाम पड़ावों को पार किया है। इनकी यह  भाषाई यात्रा संस्कृत से शुरू होती है और बाद में हिन्दी, ऊर्दू और अंग्रेजी भाषाएँ इसमें मिलकर ऐसा संगम बनाती है, जिसमें पहाड़ी असर के साथ-साथ गंगा-जमुनी सभ्यता भी नजर आती है। पंगवाली घाटी में क्षेत्रीय स्तर पर धाली, मुंशी और बुनोशी जैसी भाषाओँ का व्यापक प्रभाव है। समय परिवर्तन के साथ जैसे-जैसे सभ्यताएं बदलती रहीं वैसे-वैसे भाषाओँ में बदलाव आते रहें। परिवर्तन प्रकृति का नियम है और शायद यह बात पंगवाली सदियों से जानते आ रहे हैं।

भौगोलिक संरचना के आधार पर पंगवालियों के गांव पहाड़ियों के आस-पास ही बसे होते हैं। घाटी के निचले क्षेत्रों में जहां गांवों की बसावट सघन होती है, वहीं पहाड़ों की ढ़लानों पर घरों की संख्या सीमित हो जाती हैं। पंगवालियों के घर दो से तीन मंजिले के होते हैं। इन घरों में भूतल का प्रयोग पहाड़ी परिपति के आधार पर पशुओं के रहने के लिए और उनके चारे-पानी रखने के लिए किया जाता है। इस भूतल को कोठ कहते हैं।

घर की पहली मंजिल का प्रयोग पंगवाली परिवार अपने रहने के लिए करते हैं। इनके घरों में पहली मंजिल के छत के साथ बरामदा भी होता है। पहली मंजिल को पंगवालियों ने बुखारी का नाम दिया है। आमतौर पर इसके घरों में खिड़कियों का अभाव होता है, लेकिन रसोई के धुएं की निकासी के लिए चिमनियां जरूर बनी होती हैं। पंगवाली अपने घरों के निर्माण के लिए पत्थरों का प्रयोग करते हैं और घरों की दीवारें काफी मोटी होती है, ताकी भारी हिमपात के स्थिति में भी घरों की मजबूती बनी रहे। घर को सीलन से बचाने के लिए और घरों को जलरोधी बनाने के लिए भोजपत्रों को छत पर बिछाने की परंपरा पंगवालियों को अपने अतीत से मिली है।

घरों का निर्माण शुभ मुहूर्त में किया जाता है। यह शुभ मुहूर्त ब्राहम्ण के बताये दिनों के अनुसार होता है। घर के शिलान्यास से लेकर उसको बनाने के लिए आवश्यक लकड़ियों के इंतजाम तक पंगवाली विषेश मुहूर्त में करते है। इस दौरान उत्साह के साथ-साथ उत्सव का माहौल रहता है। यह उत्साह और उत्सव का माहौल रहता है। यह उत्साह और उत्सव इसलिए होता है कि इनके समाज में एक नया घर जुड़ रहा होता है।

शिलान्यास को पंगवाली भाषा में मन्याद रखना कहते हैं। मन्याद रखने के समय भवन की नींव में सोना, चांदी, फूल और सरसों के दाने के साथ लुचि के टूकड़े को कटोरे में भरकर नींव में रखा जाता है। जंगल से लकड़ियों की चुनाई के रस्म को नियास कहते हैं। नियास के दौरान ग्रामीणों का समूह जंगल जाता है और घरों में प्रयोग होने वाली लकड़ियों को काट कर लाता है। मकान के गृहप्रवेश को बधाई मनाना कहते हैं। इस दिन पंगवाली परिवार नये घर रहने के लिए प्रवेष करता है। इस मौके पर नाच गाने के साथ पीने-पिलाने का लम्बा दौर चलता है।

विकास की बहती बयार अब पांगी घाटी तक भी पहुंचने लगी है और इसी असर है कि पांगी घाटी के दुर्गम इलाकों तक बिजली पहुंच चुकी है। मगर फिर भी घरों को रौशन करने के लिए पंगवाली देवदार के सूखे तैलीय हिस्से को जलाते हैं। इसे जगनी कहते हैं।

पंगवाली जनजाति में परिवारिक संरचना भी हिन्दू मान्यताओं के अनुसार ही होती है। परिवार का मुखिया पिता को माना जाता है। संयुक्त परिवार की अवधारणा लिए पंगवाली परिवार एक ही छत के नीचे अपनी जिंदगी गुजारते हैं और एक ही चूल्हे का पका खाना खाते हैं। परिवार में छोटे-बड़ों का स्नेह सम्मान और प्यार ही पंगवाली परिवार की मजबूत नींव है, जिसके आधार पर ही इसकी पारिवारिक संरचना टिकी रहती है। परिवार के किसी भी फैसले में पिता का निर्णय अंतिम और प्रधान होता है परन्तु पिता के फैसले में घर वालों की रजामंदी भी शामिल रहती है।

उत्तराधिकार के मामले में पंगवाली जनजाति पैतृक आधार को प्रमुखता देते हैं। पंगवालियों में उत्तराधिकार मामला दो प्रमुख स्थितियों में सामने आता है। पहला- जब पिता का देहान्त हो जाए, इस स्थिति में परिवार के बड़े पुत्र को मालिकाना हक चला जाता है। दूसरा जब पिता वृद्ध हो और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाता हो। उत्तराधिकार की इन सारी स्थितियों में पिता के अधिकार बड़े पुत्रों के हाथों में चले जाते हैं। हिन्दु मान्यताओं के अनुसार संयुक्त परिवार की अवधारणा लिए पंगवाली परिवार सुख-दुख को एक ही छत के नीचे गुजारते हैं। 

पंगवाली परिवार में दादा यानी पिता के पिता को दादू, दादी को दादी, ताऊ यानी पिता के बड़े भाई को बड़बाऊ, चाचा यानी पिता के छोटे भाई को मधबाऊ, पोते यानी बेटे के बेटे को पोत्रू, पोती यानी बेटे के बेटी को पोत्री, बुआ यानी पिता की बहन को फूफी और फूफी के पति को फुफेर आदि कहा जाता है।
पंगवाली जनजाति में विवाह की कई पद्धतियां प्रचलित हैं। उन पद्धतियों में मुलागी विवाह, पिथ-चुक विवाह, मोडयाली विवाह, सता-बता विवाह और कमाश विवाह प्रमुख हैं। मुलागी विवाह, वर और कन्या पक्षों की रज़ामंदी से होता है और इसे सामाजिक विवाह का दर्जा प्राप्त है। वहीं पिथ-चुक विवाह लड़के और लड़की के आपसी सहमती से अपहरण द्वारा होता है। इसे प्रेम विवाह की संज्ञा दी जाती है। इस विवाह में लड़का, लड़की का छद्म अपहरण कर लेता है और बाद में दोनों वैवाहिक बंधन में बंध जाते हैं। वहीं मोडयाली विवाह में वर कन्या से विवाह करने के लिए कन्या के पिता को धन देता है। समाजिक दृष्टि से मोडयाली विवाह को सम्मानजनक स्थिति तो नहीं प्राप्त है, परन्तु पंगवाली समाज में इस विवाह का भी चलन है। पंगवालियों में ही होने वाला सता-बता विवाह, ऐसा विवाह  है जिसमें वर को कन्या से विवाह के लिए कन्या के पिता के यहां सेवा-कार्य करना पड़ता है। सता-बता विवाह और कमाश विवाह मुख्यतः पंगवालियों की अपनी परंपरा की उपज है। पंगवालियों में विवाह की बुनियादी सहमती को पिल्लम सगाई को फिक्की और गठबंधन को क्षाकी कहते हैं। विवाह की सारी रीतियां लगभग हिंदू विवाह के समान ही हैं। विधवा विवाह को भी पंगवाली समाज में मान्यता प्राप्त है, ऐसे विवाह को टोपी लाना कहते हैं। पति की मृत्यु के एक वर्ष बाद उसकी विधवा स्त्री को किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह करने की स्वतंत्रता होती है।

पंगवाली समाज में स्त्री और पुरुष को समान अधिकार हैं। महिलाओं की स्थिति इस समाज में सम्मानजनक है। महिलाएं घर की आधारशिला होती है, घरेलू कामों के अलावा कृषि संबंधी कार्यों में भी महिलाओं की विशेष भागिदारी होती है। घर के फैसलों में महिलाओं की सहमती का भी विशेष ख्याल रखा जाता है। गहनों से पंगवाली महिलाओं को खासा प्रेम है गहने सस्ते हो या महंगे गहने बेशकीमती होते हैं, क्योंकि गहने रूप की सुंदरता को और भी निखारते हैं। पंगवाली महिलाओं के ज्यादातर गहने चांदी के बने होते हैं। इसके अलावा कुछ गहने पत्थरों और सिक्कों से भी बने होते हैं। पंगवाली महिलाओं में सिर और पैरों में गहने पहनने की न तो परम्परा है और न ही चलना इस समाज में महिलाएं ज्यादातर गहने कान, नाक, गले और हाथों में ही पहनती हैं। कानों में कारू पहना  जाता है, यह बालीनुमा बनी है, और इसकी संख्या 8 से 10 तक होती है। कानों में ही संगली भी पहनी जाती है जो जंजिरनुमा होती है, वहीं कर्णफूल भी कानों की षोभा बढ़ाते हैं। पंगवाली महिलाएं नाम कुरू पहनती हैं और गले में मोतीदाना, डोडदाना के साथ-साथ जंतर भी पहनती हैं।

पंगवाली महिलाएं और पुरुष दोनों ही हाथों में अंगुठियों और कानों में मुरकियां पहनते हैं। अंगुठियों और मुरकियों के अलावा पुरुषों में गहनों का कोई खास चलन नहीं है। पंगवाली  पुरुषों का पहनावा इनके सभ्यता और संस्कृति का परिचायक है। पंगवाली पुरुष घुटनों तक लम्बे कोट के साथ पत्तू से बने पायजामें पहनते हैं। यह कमर पर कमरबन्द जैसा फटका भी बांधते हैं जिसे भम्मिन कहते हैं। पैरों में पुआल के जूते ठंड से इनके पैरों की रक्षा करते हैं। वहीं महिलाएं पूरी बांह की कमीज पहनती है, जिसे कामेरी कहते हैं, और इस कामेरी के साथ पायजामें पहनती हैं, जिसे चालन कहते है। महिलाएं भी पैरों में पुआल से बने जूते पहनती हैं, भीषण ठंड से बचने के लिए महिलाएं कंबल को एक खास अंदाज से ओढ़ती हैं, जिसे जोली कहा जाता है।

पंगवाली दिन में तीन बार भोजन करते हैं, जिन्हें कलेऊ, रिहानी और बेहल कहते हैं। कलेऊ यानी सुबह का नाश्ता, रिहानी यानी दोपहर का भोजन और बेहल यानी रात का खाना। भौगोलिक वातावरण में कड़ाके की ठंड की वजह से पंगवाली लोग शाकाहार के बजाय मांसाहार को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। मगर दिन के भोजन यानी रिहानी में मांसाहार का प्रयोग कम ही करते हैं। सुबह के नाश्ते कलेऊ में पंगवाली लोग जौ के सत्तू को बिना भूने या पकाये ही, छांछ की तरह पानी घोल कर पीते हैं। दोपहर के भोजन यानी रिहानी में रोटी सब्जियों के साग या मांस के साथ खाया जाता है। पंगवाली भाषा में रोटी को घोघा के नाम से पुकारते हैं, सब्जियों का उपयोग रोजमर्रा की जिंदगी में होता है, इसलिए पंगवाली अपने घर के आस-पास ही सब्जियों की खेती कर लेते हैं। इन सब्जियों में फूलगोभी, पत्तागोभी, गाजर और फली जैसी सब्जियां शामिल हैं। रात के खाने में पंगवाली लोग रोटियों के साथ मांस या फिर सब्जियां ही पसंद करते हैं, परन्तु रात की सब्जियां या मांस को शोरबेदार तरीके से पकाया जाता है। खाना पकाने के लिए यह घलेल या अखरोट के तेल का प्रयोग करते हैं।

पंगवालियों में  चाय का शौक भी बड़े जोरदार तरीके का है, इसके साथ ही वह चोगा पेड़ की छाल से बना काढ़ा भी बड़े शौक से पीते हैं। यह चाय और काढ़ा नमकीन भी हो सकते हैं और मीठे भी। पंगवालियों की परंपरा में शराब पीने का दस्तूर भी शामिल है, शराब का चलन स्त्रियों और पुरुषों में समान रूप से है। पंगवाली रोजमर्रा की जिंदगी में पीने-पिलाने का शौक तो रखते ही है, लेकिन पर्व-त्योहार, शादी और अन्य मौकों पर भी शराब का चलन बहुतायत है। पंगवाली अपने पीने के लिए शराब, बियर, अराक खुद घर में ही बनाते हैं, इसके लिए ये गेहूं, जौ, इलो आदि का प्रयोग करते हैं।

पंगवालियों के रसोईघरों में प्रयोग होने वाले बर्तन धातु से बने होते हैं, इनमें तवा, कढ़ाई, लहेथ, कलछुल आदि प्रमुख हैं। इसके साथ ही इनके रसोई में पीतल की तसलू भी होती है, पंगवाली घरों में मिट्टी के बर्तनों का भी प्रयोग होता है, पानी रखने के लिए या दूध रखने के लिए पंगवालियों की पहली पसंद है मिट्टी के बर्तन। पुराने समय में पंगवाली लकड़ी के बर्तनों का भी प्रयोग करते थे, जो आज से समय में इतिहास बनते जा रहे हैं, इन बर्तनों में चान, चबुंगर और दुहान जैसे बर्तन प्रमुख हैं। चंबुगर बांस से बनता है, जबकि चान बकरे की खाल से बनता है और यह लकड़ी के फ्रेम से मढ़ा होता है। बदलते दौर के साथ पंगवाली रसोई में आधुनिक तरीके के बर्तन भी अपनी दखल बना चुके हैं।
          
कृषि कार्य और अन्न उपज के मामले में भी पंगवालियों  ने काफी प्रगति की है। भौगोलिक नजरिये से पांगी घाटी पहाड़ी और पथरीली है, लिहाजा खेती के लायक जमीन की तो कमी है, परन्तु मेहनती पंगवाली लोग कम जमीन में अच्छी उपज पैदा करते हैं। पंगवाली पैदा की फसलों को बेचते नहीं बल्कि उसे संग्रहित कर खाने-पीने में प्रयोग लाते हैं। गेहूं और मक्का यहां मुख्य फसले हैं, इसके साथ ही जौ, चीन, फुल्लन, कुथ, आलू, तम्बाकू, बे्र, सुइल और कोद्रा की खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है। खेती के मामले में पंगवाली गहरी सोच समझ रखते हैं। पंगवालियों के कृषि कार्यक्रम चरणबद्ध तरीके से चलते हैं। जाड़े के दिनों में पांगवाली गेहूं के साथ अन्य फसलों की भी पैदावार करते हैं। कृषि कार्यक्रमों में पंगवाली प्राकृतिक विधि का प्रयोग करते हैं, जैसे भूमि की उर्वरा क्षमता बढ़ाने के लिए यह पशुओं के लीद को प्रयोग में लाते हैं, इससे भूमि की उपज क्षमता भी बनी रहती है और पैदावार भी अच्छी रहती है। खेत जोतने से लेकर फसलों की कटाई तक सारी विधियां पंगवालियों की पारंपरिक है और आज भी उनकी कृषि पद्धति चलती आ रही है।

पंगवालियों में पशुपालन की तीन मुख्य वजहें है- पहला खेतों की जुताई और उनके लिए खाद के इंतजाम, दूसरा दूध और मांस के लिए और तीसरा ठंड से बचने के लिए ऊन की आवष्यकता होती है, जो पशुओं से ही प्राप्त होती है, याक और बैल के मेल से संकर प्रजाति के चूरू का उपयोग खेतों की जुताई और लीद के लिए किया जाता है, भेड़ और बकरी इनके लिए दूध, मांस और ऊन की कमी पूरी करते हैं। इसके अलावा पंगवालियों में मधुमक्खी पालन का खासा रिवाज है, इसके लिए पंगवाली घर के आस-पास की जगह चुनते हैं। मधुमक्खी को पालने और उनसे शहद प्राप्त करने की विधी पंगवालियों की अपनी परंपरा से मिली है, शहद से औषधि और सौंदर्य प्रसाधन की कई सामग्रियों का निर्माण होता है, पांगी घाटी कई बहुमूल्य औषधि वनों की खान है, और इन  औषधियों को पहचानने की क्षमता पंगवालियों की पैतृक है। तिला, धूप, कुथ, कारू से शिलाजीत तक मिलने वाली जड़ी-बूटियां भी पंगवालियों के आय का महत्वपूर्ण साधन हैं।

बुनकरी की कला पंगवालियों में पारंपरिक रूप् से घर-घर में होती है, स्त्री-पुरुष दोनों ही बुनकर की कला में माहिर होते हैं। लगभग सभी घरों में हथकरघा जरूर होता है। पंगवाली भेड़ों से ऊन उतारकर उन्हें कात कर धागा बनाते हैं, इसके बाद उन धागों की रंगाई-सुखाई करके करघे पर चढ़ाया जाता है। भेड़ों से ऊन निकालने और उनकी रंगाई-सुखाई गर्मियों के मौसम में ही कर लिया जाता है, क्योंकि जाड़े के दिनों ये कार्य संभव नहीं होते। जाड़े में तो सिर्फ इनकी बिनाई होती है क्योंकि जाड़े के दिनों में भारी बर्फबारी की वजह से पांगी घाटी जीवन बिल्कुल ठहर सा जाता है। पंगवाली अपने घरों में कैद हो जाते है, और समय का सदुपयोग करने के लिए हथकरघे पर बिनाई का काम करते हैं। इस दौरान पंगवाली कम्बल से लेकर पत्तूपट्टी और अन्य ऊनी कपड़े बनाते हैं।

चित्रकारी भी पंगवालियों की विषेश कला है। चित्रकारी की यह कला विषेश रूप से महिलाओं के हाथों का हुनर है, जाड़े के समय मनाया जाने वाले जुकरू पर्व तो खासकर चित्रकारी से ही संबंधित है, इस अवसर पर घरों की महिलाएं दीवार के एक कोने में रख कर उनकी पूजा करती हैं।

पांगी घाटी की भौगोलिक परिस्थितियां इतनी विकट है कि यहां बसने वाले पंगवाल लोग बाकी दुनिया से कटे रहने के लिए मजबूर है। लिहाजा अपने मन-बहलाव के लिए इन्होंने तरह-तरह के तरीके को इजाद किया है। मेला उनका ऐसा ही तरीका हे, जिसे वे जात्रा कहते हैं। पंगवालियों में एक लोकनृत्य भी है, जिसे वे जात्रा कहते है, परन्तु यह नाम भी जात्रा मेले के कारण पड़ा है। अधिकतर जात्रा मेले का आयोजन देवताओं के नाम पर किया जाता है। इनमें त्रिलोकनाथ, देवी, शक्ति, मलसाना, बलीन सिंहवान और नाग प्रमुख हैं।

नये जमाने में भी पंगवाली लोकगीतों की मिठास वैसी है, जैसे वर्षों पहले रही होगी। पांगी घाटी का चप्पा-चप्पा इन लोकगीतों से गूंजता रहता है। पंगवालियों को केवल मौका मिले और मनमोहक वादियों में गूंजने लगते हैं, लोकगीतों के सुर। पंगवाली इन लाकगीतों को समूह में भी गाते हैं और अकेले भी। त्योहारों और पर्वों पर तो ये लोकगीत वाद्ययंत्रों के साथ गाये जाते है, परन्तु रोजमर्रा की जिंदगी में पंगवाली बिना साज के इन लोकगीतों को गुनगुनाते हैं। मानव मन की शायद ही ऐसी कोई भावना हो, जिसे पंगवाली लोकगीतों में जगह न मिली हो। आम आदमी के सुख-दुख, प्यार-वियोग, आशा-निराशा सब कुछ इन लोकगीतों में मौजूद है।

जात्रा में लोगों का एक-दूसरे से मिलना-मिलाना, खाना-पीना, नाचना और झूमना तो होता ही है, साथ ही यह एकता और सौहार्द का भी प्रतीक माना जाता है। कुछ जात्राएं बड़े स्तरों पर आयोजित होती हैं, जैसे फूल जात्रा, उनोनी जात्रा, ईवान जात्रा और दैखन जात्रा। इनमें फूल जात्रा विशेष है क्योंकि इसमें फूल यानी आपसी मेल-मिलाप को बढ़ावा दिया जाता है। पंगवालियों में समय-समय पर पर्व और त्योहार भी मनाया जाता है और वह भी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार। पंगवाली जन्माष्टमी और शिरवाल यानी शिवरात्रि जैसे पर्व बड़े धूमधाम से मनाते हैं। पंगवालियों के पर्व त्योहार बहुत कुछ हिन्दुओं के जैसे ही हैं, परन्तु इसके साथ परंपरा और क्षेत्रीयता का अद्भुत संगम भी देखने को मिलता है।

पंगवालियों में जन्म से लेकर मृत्यु तक कई कर्मकांड और रीतियां प्रचलित हैं। बच्चे के जन्म के पहले, तीसरे, पांचवें, सातवें और नौवे महीने में होने वाला नामकरण संस्कार हिन्दू मान्यताओं के अनुसार ही होता है, इसके अलावा मुंडन संस्कार को भी पंगवालियों में आवश्यक माना जाता है। मृत्यु संस्कार में भी पंगवाली हिन्दू विधि-विधान के कर्मकांडो को मानते दिखाई पड़ते हैं। मृत व्यक्ति को जमीन पर लिटा कर उसके मुंह में गंगाजल डालने की रीति हिन्दू सभ्यता की ही देन है।

जिस तरह से पंगवाली लोकगीत पंगी घाटी में गूंजते रहते ठीक वैसे ही इनके लोकनृत्य की थिरकन से सारी पांगी घाटी झूमने लगती है। पंगवाली लोकनृत्यों में विविधता तो नहीं है, परन्तु इनके नृत्यों में तरह-तरह के परिधानों और महिलाएं दोनों ही नृत्यों में भाग लेते हैं। पंगवालियों में एकल और सामूहिक दोनों प्रकार की नृत्य शैलियाँ प्रचलित हैं। अक्सर नृत्य का गायन भी होता है, और वाद्ययंत्रों से संगीत की झनकार भी गूंजती है। जात्रा और धूरे ही कुछ ऐसे ही लोकनृत्य है जो कि इन्सान को सम्मोहित कर लेते हैं।

12 जनवरी 2012

‘द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्ड’

संदीप मुदगल

गत सदी शीत युद्ध के नाम थी। दुनिया के पूंजीवादी और वामवादी धड़ों में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से जो खींचतान देखने को मिली थी, उसका अस्तित्व सोवियत संघ के विघटन तक रहा था। वैसे चीन जैसी महाशक्ति, वियतनाम, क्यूबा और उत्तर कोरिया में आज तक वाम सरकारों का राज है जो पूंजीवादी विश्व की आंखों की किरकिरी हैं।

बीसवीं सदी में पश्चिम के उन्मुक्त समाज में शीत युद्ध पर लिखने वाले लेखकों की भी बाढ़ सी आ गई थी, जिनकी अधिकांश किताबों में पश्चिम का मुक्त समाज सौ फीसदी सही और कम्युनिस्ट जगत सौ फीसदी गलत होता था। इसी बीच एक लेखक और आए, जॉन ली कैर्र। एक जमाने में वह इंग्लैंड की गुप्तचर एजेंसी एमआई-6 के एजेंट हुआ करते थे और यह वही वक्त था जब एक रूसी एजेंट किम फिल्बी एमआई6 के शीर्षस्थ अधिकारी की कुर्सी पर जा बैठा था। बरसों उसके इस पद पर रहने के बाद जब इस राज का खुलासा हुआ तो फिल्बी रातोंरात रूस पलायन कर गया था और इंग्लैंड सहित समूचा पश्चिमी जगत रूस के इस पैंतरे पर सन्न रह गया था!

कैर्र ने फिल्बी के अधीन काम किया था। अपने तमाम साथियों की तरह वह भी इस घटना के बाद सकते की हालत में थे! बरसों बाद जब कैर्र की ख्याति एक विश्व प्रसिद्ध लेखक की बनी तो फिल्बी ने उन्हें अपने यहां आने का न्योता भी दिया था, लेकिन कैर्र ने उसे ठुकरा दिया था।

बहरहाल, अपने लेखकीय जीवन की शुरुआत में  जॉन ली कैर्र ने शीत युद्ध को केंद्र में रखकर कलम चलाई थी। उनमें और अन्य थ्रिलर लेखकों में बुनियादी फर्क यह है कि वह तटस्थ दृष्टि से शीत युद्ध का ब्योरा देते रहे हैं और बड़ी बात यह है कि आज उम्र के आठवें दशक में भी वह रचनारत हैं। ‘द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्ड’ उनका शुरुआती उपन्यास था जिसके आते ही उन्होंने जासूसी जीवन को अलविदा कहा और लेखन में रम गए थे।

कैर्र की लेखन कला से जुड़ी एक और खास बात यह भी है कि वह अन्य थ्रिलर लेखकों से इतर, बहुत इत्मीनान से कहानी कहते हैं। घटनाओं को प्रेषित करते हुए वह रोमांचकारी मानदंडों के अनुसार भागते नहीं। उनके कथा लेखन में शास्त्रीयता का ठहराव जैसा है। घटनाएं अपनी गति से आगे बढ़ती हैं। ‘द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्ड’ इसी शैली का उपन्यास है, जिसमें एक तरह से समूचे शीतयुद्ध का विवेचन भी दिखता है। इसका कारण यह कि यह लेखक का पहला उपन्यास था और उससे पूर्व लेखक जासूसी के क्षेत्र में तमाम तरह का ‘फील्ड वर्क’ कर चुका था, वही अनुभव कथा रचना समय उसके काम आया था।

‘द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्ड’ एक ऐसे जासूस की कहानी है जो जीवन की अधेड़ावस्था में प्रवेश कर चुका है और अपने देश (इंग्लैंड) के लिए आज भी पूर्वी जर्मनी (तात्कालिक कम्युनिस्ट राज्य) के खिलाफ जोड़-तोड़ में व्यस्त है। कथानक से पूर्व मुख्य भूमिका में महान अभिनेता रिचर्ड बर्टन पर कुछ शब्द। समीक्षकों के अनुसार एलेक लीमस की भूमिका बर्टन के सबसे बेहतरीन सिनेमाई अभिनय में से है। बर्टन शेक्सपीयराना अभिनय शैली के सबसे बड़े नामों में से एक थे।  लौरेंस  ओलिवियर,  जॉन गीलगुड, एलेक गिनिस और पाॅल स्कोफील्ड के साथ उनके नाम का शुमार होता है। यह सभी अभिनेता मूलतः रंगमंच प्रेमी थे और सिनेमा अभिनय को, ओलिवियर के शब्दों में जब तब ‘आवश्यक बुराई’ सरीखी संज्ञाएं देते रहते थे!

बर्टन संभवतः इनमें कुछ अलग थे। वह एक असाधारण अभिनेता के साथ सिनेमा के सुपरस्टार साबित हुए थे। एलिजाबेथ टेलर के साथ उनका रोमांस और दो बार विवाह सुर्खियां बने। स्वयं टेलर उन्हें शेक्सपीयर का सिनात्रा (मशहूर गायक-अभिनेता फ्रेंक सिनात्रा की तर्ज पर) कहती थीं। बर्टन कुल जमा एक ऐसे स्टार-अभिनेता थे जिन्होंने बहुत दुर्लभ सीमाएं लांघी थी, और कहना न होगा कि अपने सिनेमाई अभिनय जीवन के शीर्ष पर ही उन्होंने जीवन रूपी रंगमच से भी विदा ली थी।

तो ‘द स्पाई...’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें राजनीतिक तौर पर सही और गलत की व्याख्या को सापेक्षिक नजरिए से देखा-परखा गया है। फिल्म पर बात करते हुए इसके कथानक की जानकारी देनी जरूरी हो जाती है। एलेक लीमस ब्रिटिश इंटेलिजेंस का जासूस है और पहले दृश्य में वह कड़कती ठंडाती रात में (शीतलहर कथा का एक भी चरित्र है) पूर्वी जर्मनी की सीमा के बाहर अपने एक खबरी का इंतजार कर रहा है। वह खबरी पूर्वी जर्मनी से आएगा और लीमस को कुछ जरूरी सूचना देगा। खबरी आता है और उसके सीमा पार करने से कुछ ही पहले सायरन की जोरदार आवाज होती है और पूर्वी जर्मनी के सिपाही गोलियां चलाकर उसकी जीवनलीला समाप्त कर देते हैं। लीमस सीमा के उस पार सन्न खड़ा यह देखता रहता है और कुछ नहीं कर पाता।

लीमस को लंदन वापस बुलाया जाता है जहां ‘कंट्रोल’ (गुप्तचर विभाग में लीमस का शीर्ष अधिकारी) उससे तमाम बातें करता है और कहता है कि शीत युद्ध के इस खेल में सबके हाथ खून से सने हैं, चाहे वह पूंजीवादी समाज हो या वामवादी। इसके बाद लीमस अब एक बेरोजगार व्यक्ति है और वह रोजगार कार्यालय के चक्कर काटता रहता है। आखिरकार उसे एक पुस्तकालय में नौकरी मिलती है, जहां काम करने वाली एक युवती से उसका गहरा लगाव हो जाता है। वह युवती एक वामपंथी कार्यकर्ता भी रही है और युद्ध विरोधी अभियानों में शिरकत कर चुकी है। दोनों की बातों-मुलाकातों में लीमस इस विषय पर तटस्थ सा रहते हुए कहता है कि पूंजीवादी समाज हो या वामवादी, खामियाजा हमेशा मजबूरों और बेबस लोगों को ही भुगतना पड़ता है। 

नई महिला मित्र के संसर्ग के बावजूद लीमस व्यथित है, कुछ न कर पाने की मजबूरी से। वह सौदा खरीदते समय एक दुकानदार को पीट देता है और जेल जाता है, जहां से उसकी महिला मित्र उसे छुड़ाती है। वह फिर बेकार है और ऐसे में एक व्यक्ति उसे मिलता है और कहता है कि वह बेकारों की एक संस्था का प्रतिनिधि है और उसका एक मित्र लीमस से मिलना चाहता है। लीमस उसकी बुलाई जगह जाता है। उससे मिलने की इच्छा दर्शाने वाला व्यक्ति एक न्यूज एजेंसी का मालिक है जो उससे कुछ दिनों के लिए विदेश जाने के नाम पर कुछ पैसा देने का वादा करता है। लीमस शर्त कबूल कर लेता है।

यह सब जानकारी कंट्रोल को है और लीमस उससे एक अन्य जासूस के घर मिलता है। कंट्रोल कहता है कि मुंड्ट (पूर्वी जर्मनी का एक शीर्ष गुप्तचर अधिकारी) अपना जाल फेंक चुका है और लीमस को उसे खत्म करना होगा। इस काम के लिए उसे पूर्वी जर्मनी जाना होगा, जहां एक शीर्ष गुप्तचर यहूदी अधिकारी फीडलर उसकी मदद करेगा। लेकिन इससे पूर्व लीमस न्यूज एजेंसी के मालिक (मुंड्ट के एजेंट) की ओर से हाॅलैंड जाता है और उसकी नजरों में धूल झोंकने के लिए कुछ तैयारियां करता है। इसके बाद अब लीमस पूर्वी जर्मनी में है, मुंड्ट का सिर कलम करने के लिए। फीडलर उसके साथ हरदम रहता है और उससे कई जानकारियों का आदान-प्रदान करता है। एक रात दोनों के अपने क्वार्टर लौटने पर मुंड्ट वहां पहले से मौजूद रहता है और लीमस पर जोरदार वार करता है। होश आने पर लीमस खुद को बेड़ियों में जकड़ा हुआ पाता है और अब वह मुंड्ट के रहमोकरम पर है। लीमस एक विदेशी जासूस है, वह मुंड्ट पर ‘डबल एजेंट’ (ब्रिटेन और जर्मनी दोनों के लिए जासूसी करने वाला) होने का आरोप लगाता है। इस तथ्य की पैरवी के लिए एक गुप्त अदालत बैठती है। लीमस की पैरवी फीडलर करता है और मुंड्ट अपना बचाव खुद करता है।

अदालती बहस लीमस के लंदन में बेकारी के दिनों तक जा पहुंचती है, जब उसे बमुश्किल पुस्तकालय की नौकरी मिली थी। लीमस सभी आरोपों से इनकार करता है, तो मुंड्ट उसकी पुस्तकालय वाली महिला मित्र को सामने लाकर खड़ा कर देता है। अब लीमस को अपने सभी गुनाह कबूलने पड़ते हैं। उसकी मदद करने के आरोप में फीडलर को भी जेल होती है। लीमस जेल में है, लेकिन उस रात उसकी कोठरी का दरवाजा खुला होने पर वह भाग निकलता है। बाहर पहुंचने पर मुंड्ट उसे मिलता है और उसके साथ होती है वह लड़की। मुंड्ट कहता है कि वह सचमुच डबल एजेंट है, और लीमस से बंदूकधारी पहरेदारों से बचकर बर्लिन की दीवार लांघ जाने को कहता है। लेकिन क्या लीमस और उसकी महिला मित्र बर्लिन की दीवार लांघ कर सुरक्षित पश्चिम जर्मनी लौट पाते हैं....?

पुराना कथन  है कि जासूसी की दुनिया में कोई किसी का नहीं होता। आधुनिक राष्ट्र राज्यों की इस दुनिया में तो इस कथन का दायरा और भी विस्तृत हो चुका है। राजनीतिक गठजोड़ के ढकोसले भी इस कड़वे सच से बहुत दूर रहते हैं। कहने को शीत युद्ध के कितने ही तथ्य अभी तक उजागर नहीं किए गए हैं जहां पूंजीवादी देशों ने अपने मित्र राष्ट्रों या वामवादी देशों ने अन्य वामराज्यों के खिलाफ जासूसी मोर्चे खोले थे। राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में इस तथ्य पर विश्वास करना बहुत कठिन होता है, परंतु मुंड्ट के खिलाफ अदालती नौटंकी आखिरकार किसलिए रची जाती है ? पूर्वी जर्मनी में भी मुंड्ट पर एक व्यक्ति को डबल एजेंट होने का शक है, जिसका खुलासा लीमस अपनी महिला मित्र को पलायन के दौरान करता है। वह कहता है कि जासूस उसके जैसे ही थके-मांदे और मजबूर लोग होते हैं। फीडलर को मुंड्ट के दोहरे चरित्र पर शक हो गया था और लीमस को असल में फीडलर की ही बलि दिलाने के लिए पूर्वी जर्मनी भेजा गया था, ताकि मुंड्ट के जरिए पूर्वी जर्मनी प्रशासन में ब्रिटिश गुप्त सूचना प्राप्ति का कार्य व्यापार यथावत चलता रहे। स्पष्ट है कोई बदनाम व्यक्ति (यदि वह अपने पक्ष में है) भी तब तक पाकसाफ है जब तक वह काम आ रहा है। यही है अंतरराष्ट्रीय जासूसी की दुनिया का नंगा सच!!!

जॉन ली कैर्र के कथानक में ऐसा एक भी अंश नहीं जिस पर यकीन न किया जा सके!! शायद जिंदा मौत के ऐसे  तांडव के वह चश्मदीद गवाह रहे हों!!! हकीकत जो भी हो, फिल्म जितने बड़े सच को दर्शाती है, उससे भी अधिक यथार्थवादी शैली से इसका निर्माण किया गया है। मार्टिन रिट्ट को एक समय अमेरिका के सबसे प्रतिभाशाली निर्देशकों में शामिल किया गया था। उनकी बनाई लगभग अधिकांश फिल्मों का मूल तत्व - बड़ी ताकतों के समक्ष छोटे-छोटे चरित्रों का सघन संघर्ष रहा है। इसका भी एक कारण है।

मार्टिन रिट्ट एक बहुत सुशिक्षित व्यक्ति थे। अपनी युवावस्था के दिनों में उनका रुझान वामपंथ की तरफ हुआ था। हाॅलीवुड की 1940 के दशक की प्रगतिशील ‘राजनीति’ में उनकी कुछ शिरकत रही थी, जिसका खामियाजा उन्हें 1950 में गति पकड़ने वाले मैकार्थीवाद के दौरान चुकाना पड़ा था। उस समय समूचे अमेरिका के बौद्धिक वर्ग में से चुन-चुनकर वाम रुझानों वाले व्यक्तियों को हाशिए पर लाया गया था। उनकी नौकरियां छीनकर उन्हें बेघर कर दिया गया था। हाॅलीवुड के कई लेखक, निर्देशक और कुछ अभिनेता भी इस शिकंजे में आए थे। रिट्ट हालांकि उस समय युवावस्था में थे, लेकिन उन्हें भी ‘सीलिंग’ का शिकार होना पड़ा था। निर्देशक के तौर पर उनकी पारी पचास के दशक के अंतिम वर्षों में ही शुरू हो सकी थी, जब मैकार्थीवाद का जोर कम पड़ने लगा था। फिर भी रिट्ट ने मुख्यधारा सिनेमा में रहते हुए कई ऐसी फिल्मों का निर्माण किया था जो शोषक-शोषित वर्गों के खूनी संघर्ष को स्पष्ट दिखाती थीं।

‘एज्ज आॅफ द सिटी’ उनकी पहली फिल्म थी। इसका नायक भी बहुत कुछ लीमस की तरह का है। वह माता-पिता का घर छोड़ चुका है और अपनी पहचान की तलाश में भटक रहा है। एक बंदरगाह में वह मजदूरी करने लगता है। वहां उसकी दोस्ती एक अन्य मजदूर से होती है। उस मजदूर की दुश्मनी एक अन्य व्यक्ति से है, जो अंततः उसे मार डालता है। अपने दोस्त की मौत का बदला लेने के लिए नायक अंत में उस व्यक्ति से भिड़ जाता है। कथानक बेहद सरल है, और पूरी तरह मजदूर वर्ग पर केंद्रित है, लेकिन खलनायक बंदरगाह माफिया और मालिकों का एजेंट है, जिसके साथ अंत में नायक की दहला देने वाली मारपीट होती है। रिट्ट की फिल्में और उनमें से झांकती उनकी आत्मा, पूर्णतः शोषित वर्ग के पक्ष में खड़ी रहती हैं।

‘द स्पाई...’ के मूल कथ्य में बेशक रिट्ट का निर्देशक (बौद्धिक) कुछ तटस्थ भूमिका लिए नजर आता है। फिल्म का नायक लीमस बेशक सबसे बड़े दुनियावी राजनीतिक खेल का एक मामूली सा प्यादा है, परंतु अपने और इस दुनिया के बारे में कुछ निर्णय ले चुका है। उसे इसी दुनिया (राजनीतिक जासूसी) में रहना है, और वह जानता है कि इस दुनिया में सही या गलत जैसा कुछ भी नहीं है, जो कुछ हो रहा है वह एक निरंतर चल रही प्रक्रिया का बेहद छोटा सा हिस्सा है। वह यह भी जानता है कि दुनिया की धुरी तय कर रही राजनीति (राजनेताओं) का असली मकसद अपने हित साधना होता है, फिर चाहे इस राह में उन्हें कितने ही सिर कलम करने पड़ें! लीमस अपनी इस मजबूरी से अच्छी तरह से वाकिफ है और वह अपना अंजाम भी जानता है, इसके बावजूद, वह जब-तब कथित सभ्य समाज के सीमा में रहने वाले कानून तोड़ता रहता है और उसकी सजाएं भुगतता रहता है। इसलिए जीवन में प्रेम की आकांक्षा और मृत्यु के डर से वह एक तरह से ऊपर उठ चुका है। फिर भी अचानक मिलने वाला प्रेम उसे अपनी ओर खींचता है, जिसे वह ठुकरा नहीं पाता। वहीं उसकी प्राथमिकता भी उसके सामने खड़ी है, जिसे अंजाम देने के लिए वह आगे बढ़ता है, और जब उस अंधेरे रास्ते का घना साया उसके प्रेम पर भी पड़ता है तो उसकी रक्षा के लिए वह पूरी ईमानदारी से खड़ा हो जाता है। लीमस का चरित्र कोई अबूझ पहेली नहीं है, वह सबकी तरह अपने हालात का शिकार है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके हालात ने उसकी भावनाओं को ठंड की घनी चादर में कैद कर दिया है। बर्टन का लगभग चेतनाहीन बर्फीला चेहरा फिल्म की धुरी है, लेकिन मौत को करीब आता देख कुछ पल ऐसे भी होते हैं जब यही चेहरा हर तरह के भावों की उठापटक करने वाले मुखौटों की अंतहीन श्रंखला बन जाता है।

मार्टिन रिट्ट के निर्देशन पर कुछ शब्द कहे बिना बात पूरी नहीं हो सकती। फिल्म श्वेत-श्याम चित्र है। बतौर निर्देशक रिट्ट ने कभी अपनी एक विशिष्ट शैली विकसित नहीं की थी। उनकी फिल्मों में कैमरा सीधे-सीधे कहानी कहता है। उनकी फिल्मों में छायांकन जैसे तकनीकी अवयवों का इस्तेमाल बहुत न्यूनतम होता दिखता है। वह पात्रों और कथानक को उकेरने वाले निर्देशक रहे हैं। इस दृष्टि से कोई भी निर्देशक रहा हो, वह यदि अपने पात्रों और कथानक के प्रति उदासीनता दिखाता है तो उसका सिनेमाई प्रयास हमेशा असफल रहता है। दुनिया के सभी बड़े फिल्म निर्देशक मानवीय संवेदनाओं के छोटे-बड़े तूफानों से जूझते रहे हैं। रिट्ट का भी यही प्रयास रहता था। कुछ सबसे कठिन समीक्षकों (उदाहरणार्थ एंड्रयू सैरिस) ने रिट्ट को अमेरिका के सबसे होनहार निर्देशकों में शुमार किया था। कारण..., वह रिट्ट की फिल्मों के ‘गहरे कथातत्व’ को पसंद करते थे। रिट्ट अपने प्रमुख पात्रों (कुछ सहायक पात्रों की भी) की चारित्रिक जटिलताओं को कथानक के बहाव में बहुत खूबी से दर्शा ले जाते थे। उनका सिनेमा हमेशा राजनीतिक छटा लिए रहा। गुरु गंभीर विषय उनकी फिल्मों की पहचान थे। संभवतः उनका व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही था। अपने कथानायकों और नायिकाओं के लिए वह एक ओर असीम सांत्वना का माहौल भी गढ़ते थे, जिससे कोई भी संवेदनशील दर्शक अलग नहीं रह सकता था।

रिट्ट के निर्देशकीय कौशल की दूसरी खासियत यह है कि वह स्त्री-पुरुष के संबंधों की भी गहरी पड़ताल करते थे। चूंकि वह अधिकांशतः निम्न मध्यवर्ग को अपने कथानकों में उकेरते हैं, इसलिए उनकी कथानायिकाएं भी हाड़तोड़ संघर्ष करती दिखती हैं। उनकी एक फिल्म ‘नाॅर्मा रे’ (शीर्षक चरित्र में सैली फील्ड का आॅस्कर पुरस्कार विजित अभिनय) की नायिका छोटे से कस्बे की फैक्टरी मजदूर है जो अपने परिवार का पेट पालने के लिए कभी-कभार वेश्यावृत्ति भी करती है। जाहिर है स्त्री हो या पुरुष निर्देशक रिट्ट दोनों को समाज में आजीविका कमाने के जघन्य संघर्ष का अटूट अंश मानते थे। दोनों वर्ग विभेद झेल रहे हैं। उनकी फिल्मों में हिंसात्मक दृश्यों में भी स्त्रियां पीछे नहीं रहतीं। वह अगर हिंसा सहित सबकुछ झेलती हैं तो कुछ दृश्यों में शोषक के तौर पर भी दिखती हैं। सत्ता के इस क्रूर सत्य को दिखाने में रिट्ट कभी पीछे नहीं रहे। अपने महिला पात्रों के प्रति वह बेवजह कोमल भावनाएं नहीं रखते, वह उन्हें जीवनसंघर्ष में पिसते हुए देखना अधिक पसंद करते हैं। 

‘साउंडर’ जैसी फिल्म में अधिकांश पात्र समाज के सबसे निचले दर्जे की नीग्रो महिलाएं हैं। इसके कथानक में महिलाएं ही ‘पुरुष’ भी हैं, यहां तक कि फिल्म में पुरुष पात्र की जरूरत भी नहीं दिखती। कहना न होगा कि रिट्ट के सिनेजगत में महिलाएं भी पुरुषों की तरह अपने विरोधाभासों से जूझती दिखती हैं। वह रूमानी भावों को उकेरने वाले फिल्मकारों की नायिकाओं की तरह नायक के जख्मों पर जब-तब मरहम रखती नहीं दिखतीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर उसे दुत्कार भी देती हैं या उस पर गोली भी चला देती हैं। रिट्ट का यथार्थवादी निर्देशक ऐसे दृश्यों में अपने चरम पर होता है। वह तब एक अन्य कड़वी सच्चाई दिखाता है जब उसका नायक या कोई अन्य पुरुष उसके महिला पात्रों को दिल खोलकर अपशब्द कहता है। ‘नाॅर्मा रे’ के कुछ दृश्य इसकी पैरवी करते हैं। ऐसे दृश्यों मे निर्देशक रिट्ट के कैमरे के स्थान पर दर्शक खुद को वह दृश्य साक्षात देखता हुआ महसूस करता है।

मार्टिन रिट्ट ठोस यथार्थवादी निर्देशक रहे हैं। उनके सिनेमा के समग्र आकलन पर उनकी राजनीतिक सोच में धीरे-धीरे आती जा रही परिपक्वता का भी आभास होता है। ‘द स्पाई...’ तक उनका विचारक फिल्मकार एक सापेक्ष नजरिए से राजनीति का आकलन करता दिखता है, हालांकि वह उसके बाद अपनी प्राथमिकताओं से कभी विमुख नहीं होता। वह सही और गलत का भी फैसला नहीं करता क्योंकि यह फैसला करने का अधिकार किसी के पास नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि राजनीतिक जगत में सही और गलत के मानदंड हमेशा तात्कालिक होते हैं, उनके अमल में आने के साथ ही उन पर नए सिरे से बहस की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। ‘द स्पाई...’ की निर्देशकीय शैली बेशक यथार्थवादी है और इसमें कुछेक ही पात्रों को गहराई से उकेरने की जरूरत महसूस होती है। कहना न होगा कि शायद यही कारण था जिसके चलते एंड्रयू सैरिस जैसे प्रबुद्ध समीक्षकों ‘द स्पाई...’ को एक कमजोर निर्देशित फिल्म कहा था। इसके अतिरिक्त निर्देशकीय दृष्टि के एक दूसरे कोण से फिल्म की पटकथा और पात्रों का उभार समांतर रेखा में नजर आता है।

वर्ष 1990 में मृत्यु से एक वर्ष पूर्व तक रिट्ट कार्यरत रहे थे। अंतिम फिल्म ‘स्टैनले एंड आइरिस’ में वह एक बार फिर निम्न मध्यवर्ग के संघर्षशील पात्रों के पास लौटते हैं और बहुत ही संवेदनशील ढंग से उनके भीतर पछाड़ें मार रही सुसुप्त भावनाओं को पर्दे पर दिखाते हैं। अकारण नहीं कि उनकी सिनेमाई कथा कहने की खूबी के कारण पिछले दिनों उनकी फिल्मों पर पुनः विवेचन शुरू किया गया था। इसी श्रंखला में रिट्ट के सिनेमा पर उनके चाहने वालों ने एक पुस्तक प्रकाशित की है जिसे पाठक गूगलबुक्स पर पढ़ सकते हैं।

फिल्म ‘द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्ड’ में रिट्ट ने अगर एक बार फिर राजनीतिक धरातल को परखा था तो वहीं वह राजनीतिक जगत के छुपे हुए खेल पर से भी एक ही बार में पर्दा खींचकर उसका असली चेहरा दिखा देते हैं। फिल्म जहां एक ओर जीवन का यथार्थवादी दस्तावेज है, तो दूसरी ओर वह राजनीतिक जगत का कच्चा चिट्ठा भी है।

3 जनवरी 2012

आत्म-रिक्त आत्म-क्षत आत्म-च्यूत आत्म-छ्ली राजराक्षस

संध्या जब होती जाती सघन
गहन घन उदास
लेटी रहती शाखों पर यामिनी
बिखेर कर उलझे कुंतल जाल
और तपती है यह देह
अबूझ सी उष्णा में
पानी नदी का चढ़ आता पहाड़ों पर
स्याह आसमान में
उग आयी सांवली बदरिया
पीले चाँद का झुमका पहन कर
और पसीजता जाता आसमान
मंद मंथर
ऐंठता फिर झंकृति बन रागिनी
बहता मेरुओं में
बन कर उत्तप्त आर्द्र स्वर
जलती ज्वाला ज्वाला के अन्दर
उठती लपटें तीव्र उर्ध्व
चूम कर सारे दीप्त पर्ण
लपकती गहन शून्य ओर
पिघल कर बह जाता मैं
दूर तक जाता पसर
चीर कर नींदों के अंतर

बहती है एक नदी
नदी के अन्दर ही अन्दर
उठते हैं मीठे स्वप्न हौल
भुबक भुबक भुभक भुभक
रेंगते तिरते फिसलते
मखमली अमराई में
रेशमी परदों में लिपटे
निष्पंद देह में
उठते डूबते समस्त उद्दीपन
तैलचित्रों में लरजते
स्वर्णिम अमरत्व के सिंहासन
चुभते तारों के बीच
चिरयौवना आकाशगंगा में
उठता है एक आदमी
आदमी के अन्दर
नयी चेतना लिए
नया शरीर धरे
साँसों की ठंढी छाया में नहा कर
सूजे हुए सपने लेकर
पानी की सीढ़ियों पर पग रख
उतर आता है धीरे धीरे
अबूझ अनदेखे अकल्पित तिलिस्म में
मूक दीवारें जहाँ खड़ी मौन, अविचल
बंद हैं परछाईयों में
गुप्त गहन राज यंत्र
दीवारों में दबी हुई कुंजियाँ संदूकों की
सिसकती हैं बाहर आने को
दबे हुए फरसे सुबकते हैं
नया धार पाने को
नयी सान के पानी के लिए चिहुँकते हैं
दीवारों में चिने हुए सारे कंकाल
खांसते हैं पेडुओं की खांचों से
गहरे ढीठ पीत खंखार
चाटते हैं पालतू सरीसृप
सूंघते हैं दरारों से
रिसती जिन्दा ताजी गंध
आतुर बैठे घात लगाये
लपलपाते जीभ लम्बी
पीने को उष्ण रूधिर
दहाड़ते हैं गहन नाद

घिग्घियाँ बाँध कर सिकुड़े सिमटे
शैवालों की झुरमुटों के पीछे छिपे
झींगुरों के कृष्ण भीत झुण्ड
कराहते हैं दारुण राग
सूख जाते हैं प्राण 
लरजते हैं भयावह तिक्त बधिर मूक स्वप्न 

सहसा सरसराती तृण गुल्मों में
दामिनी की चपलता सी
गुज़र गयी जो कृतछाया
सपनों के ऊपर से मेघों के पार
मुरझा गयीं लाजवंती की शिराएँ
उमेठ कर सारे भय भुजंग
जगा गयी कच्ची नींद से
सिहरन सी हड्डियों में उलीच कर
उपह गयी जो रहस्यमय छाया
ग्रस गयी अंतरतम गहनतर
वह मधूलिका माया

चल कर फिर नींदों में ही उन्मन
उठ कर नदी के कूल से
छोड़ कर सारे मंदिर बगीचे
खेतों की पगडंडिया पकड़ कर
लौट आता हूँ घर की ओर
सहसा जब रुद्ध हो जाते हैं पग द्वंद्व
सुन कर सुदीर्घ फुत्कार
भरे हुए चिंगार मोटी आँखों में
प्रश्नात्मक भंगिमा में टीले सा
खड़ा है बड़े डील वाला
काला कठोर महिष

डर कर सहम कर
भित्तियां वीथियों की पकड़ कर
चल रहा चुपचाप मैं
सांस रोके जमा हुआ खून लिए नसों में

भित्तियों के पीछे से
कुंहकती है कोई, ठुनक ठुनक कर
रोती है राग बांध कर
एक बायमत
टोकती है उलझे उद्विग्न स्वरों में
सुन कर पदचाप मेरे
पूछती है कई तीखे प्रश्न गहन

तेज सधे क़दमों से
भटकता भागता गिरता पड़ता
सँकरी कोलियों में गाँवों के
अनजाने अचीन्हे मोड़ पर
सूत की गांती बाँधे
बैठी है जो दंतटुटी भकोल
मार देती है टोना
खोल देती है पहेलियों की पोटली
देती है सियाल-सिंघी पिलपिली सी
साहिल के काँटों से
गोध देती है हाथों में
तंत्र गुप्त राज-चिन्ह
भर देती है सम्मोहन आँखों में, तारों में, रात में

मूक सन्न निरुत्तरित हो
लौट आता हूँ आँगन कर चौखट पार
लिए कोई गहन अंतर्द्वंद्व
लादे पीठ पर कोई अगोचर छाया-बोझ
दीये की पीली रोशनी में
बुन रहा संत्रास नये
उन्माद-ग्रस्त सा अवचेतन
पर बंडेरियों पर अटकी है
जो मीठी सी नींद परी
फुसलाती है रच कर
स्निग्ध स्वप्न बिम्ब
शुष्क शरीर में उठती गिरती
गीली रागिनियाँ फेनिल उर्मियाँ
उठते हैं जाग्रत ज्वलंत सुसुप्तावस्था के
अदम्य आदिम इच्छाप्रेत
अजरा के मधुर स्वर्णिम स्वप्न
कट जाती है रात नींद स्वप्न धुंध
मरियल कांतिहीन क्लांत सा
दिन चढ़ता है आँखों पर
पीली सी परछाई लिए
हुलकता है नयनतारा कोटरों से
देखने को आईने में आत्मबिम्ब

उधर पिघलती हुई दोपहर में
उठते हैं रिक्त खलिहानों में
धूल के प्रगल्भ हौल
इधर कोई भोंकता है पंजरियों में मेरे
लोहे के मोटे भोथरे सुए
अथाह दर्द में टूटता जाता है यह शरीर
क्षीण होती जाती है काया
संदिग्ध सा अस्तित्व लिए
खुद को ही खाने लगती है यह देह
और पीली होती जाती है मेरी छाया

तब करने को गहन पड़ताल
खोजने को वह अतीन्द्रिय अनुभूति
छूने को वह प्रेत आत्म बिम्ब
भटकता हूँ पहाड़ों पर चीड़ों की घाटियों में
झीलों में झरनों में झांकता हुआ
खोजता वह गुरुतर आत्मद्वन्द्व
आवेशित सा चलता उन्मन
विपुल विक्षोभ मथते मन अंतःकरण
चुभते हैं पैरों में ईर्ष्या पाषाण
डँसते हैं समस्त जुगुप्सा सरीसृप
जमीन में दबे हुए कच्छप किल्विष
कुंठा के कवच पहने सर उठा कर रेंकते हैं
उभरे हुए वल्मीकों के नुकीले ढूह फोड़ कर
उड़ रही हैं दीमकों की टोलियाँ
बुझ रही है हवा नदी के कूल पर
जल रही है मूक मिट्टी
उड़ती आती चिरायंध सी गंध
आसमान साधे है
एक स्तब्ध-गहन-अगड़-धत्त सा मौन
देखती है नदी चुपचाप
रूंधे गले से बह रहा है पवन मौन
मूक मिट्टी देखती अवसन्न
गीली चांदनी बैठी ओस की पीठ पर
छनती है खूब महीन
नदी मुझे पुकारती है, डंसती है
मैं देखता हूँ उसकी गहरी नाभि में
अपना नीला चिरयुवा बिम्ब
एक सूरज प्रचंड सा नदी में गहरी डुबकी लगाता है
छपाक घुप्प बुडूप बुडूप
एक बुलबुला बुदबुदा गया
और रात मुरझा जाती है

दबे रह गए समस्त विद्रोह के स्वर
गुम्फित रह गए समस्त सारे विचार आरोह
छोड़ कर सारे स्वप्न इसी धरा पर
उड़ जाती है आत्मा तज कर यह देह
यम-न्याय-नियम-दंड के सोंटों से पिट कर
बंधी हुई अभिशप्त यह आत्मा
जा बैठती है पुराने बड़हड विटप पर
बसते यक्ष किन्नर प्रेत पिशाच जहाँ पर
अधमुये आत्मा वाले अधकटे शरीरों वाले
लूले लंगड़े पंगु
गले हुए ठूंठ अंगों वाले
ढूंढते विटप की कोटरों में
रौरव नरक द्वार

रेंग कर पंकिल सुरंगों से
चला आता हूँ अनूठे लोक में
समय के बहाव से अक्षुण
देश की परिधि के पार
सभ्यता के इस पार भटक आता हूँ
देखता हूँ गूढ़ रहस्य संस्कृति के
समाज के अनगढ़ जटिल यंत्र
जाज्वल्य भास्वर प्रश्न

मंदिरों के पिछवाड़े में
खोदता नुकीली खान्तियों से
गहरे खंदक दफ़नाने को
कई जिन्दा मिथक, जाग्रत इतिहास
घोर घनघोर अधोर पीठ में
होते गहन मंत्रोच्चार
बैठे ब्रम्हराक्षस हजार
देते हवन अंगूठों का
ध्वजा गाड़ कर प्राचीरों पर
गुरुकुलों के अन्दर प्रांगणों में
हो रही है कीमियागरी
गढ़ रहे हैं तत्व, तथ्य, नया मनगढ़ंत व्याकरण
रच रहे धर्मसूत्र ध्यानलीन बटुकराक्षस

भक भव्य सुवर्णाभ राज प्रसादों में
अटके हैं नीले मेघ गवाक्षों पर
मखमली परदों के पीछे सज रहे हैं रंगमहल
मांझे हुए रेशम से बुने हुए ऐन्द्रजालिक अन्तःपुर
हो रहे हैं द्धयूत चौसर रस काम क्रीड़ा विहार
बैठे सिंहासनों पर गरबीले रोबदार कटपूतन
रच रहे हैं नये सत्ता सूत्र संतरण
सज रहे हैं खड्ग फरसे बरछे भाले ढाल
बुन रहे हैं युद्धों के नये भूतजाल

अलंकृत हो रही है रजनी कर अधुनातन श्रृंगार
हाटों के चाकचिक्य में
रत्न जटित देह बैठे हैं बिकने को तैयार
गुलाबी अट्टालिकाओं की दमकती गद्दियों पर
लेटे, खोदते खुजलाते अपनी देह
गिनते सुवर्ण पणक बंद कर दीवारों में कागजात
मीठी नींद में उंघते उतराते प्रवर मैत्राक्ष

जोत रहे हैं धूसर बंजर खेत पथार
काट रहे हैं मिट्टी चटियल टीलों से
रीन्ध कर अपने स्वेद कणों से
तपाकर कर आंच में अपनी पका रहे मृदभांड
ढो रहे हैं चुप चाप भारी पालकी में
बोझिल सदियों की परम्पराएँ  वृषभ स्कंधों पर
भून रहे हैं सूखे धान
गर्म तपती रेत में उदरों के
धो रहे हैं देह अपनी काली भैंसों के साथ
बढे हुए केशों वाले टेढ़े नाखूनों वाले चैलाशक

खा रहे हैं जो दाने बीन कर लीदों से
नोंच कर चूहों के रोम गुर्दे जिगर
उधेड़ कर चमड़ी मरी हुई गायों की
ओढ़ कर हिकारत की मैली चादर
मार कर आत्मा अपनी
ढो रहे हैं माथे पर पंकिल पुरीष
बांध कर कमर में ढोल झाड़ू
पीट रहे हैं आत्मा अपनी
चाटते जूठे पत्तल पंचकीलक

कूट रही है ढेंकी रात भर
धान में मिला कर अपने भाग्य
बाँध कर पीठ से भुतहे अंकुर
खौलाती है नादों में बगावत के धान 
ठोक रही गोयठे बूढ़ी दीवारों पर 
उल्टे पैरों वाली कीच्चिन

फिर थक कर कोसती है
अपनी योनि अपना यौवन
बैठ कर इनारों के काईदार मुंडेरों पर
खींचती है रात भर जल कलश
जम्हाईयाँ लेती बासी बेमजा जिन्दगी पर
जो झल रही है चंवर
वह बायमत
कर रही हमाली रात दिन
पाने को अपना सौभाग्य
अपना आभरण

मांग रही है सूनी गोद भरने को
बिलखते हुए भटकती है
सिसकती है सुबकती है
भूसों से भरी अटारियों पर
मलगुजी घूंघट खींचे
खखनती है कोई बाँझ भकोल

दबी सारी हूकें दबे सारे स्वप्न
जागती जलती चिनकती नींदों में
उठते हैं दुरूह सशंकित प्रश्न बिम्ब
पूछते हैं उलटबंसियाँ
शिरीष की टहनियों से लटके बूढ़े बेताल

कुढ़ कर उस इतिहास बोध पर
ढो रहा जो मरी हुई जाहिल परम्पराएँ
अपनी झुकी हुई पीठ पर लादे
गहरी सत्ता का आतंक
मार गया है काठ जिसकी आत्मा को
घिस रहा है देह अपनी
चौखटों पर मंदिरों के
मौत के सन्नाटे वाली
अधमरी नींदों में कर रहा जो
सतत प्रदक्षिणा प्रतिमाओं की
समझे हुए सच का वह अनजाना दबाव
हीरक बना गया ऋत तरल मति मेरी

लेटी हैं रूढ़ियाँ अधमुई सी
मंदिरों की सीढ़ियों पर
लांघे उन्हें कौन
कौन बदले मूर्तियाँ गर्भ गृहों की
कैसे गढ़े नये देवता
प्रश्न गुरुतर कार्य दुष्कर
बेड़ियाँ पहने जो हैसियत है मेरी
छटपटा कर खीज कर अपने ऊपर
घुट कर खदक कर
खोजती है जड़ें अपनी
खोदती है प्राक-इतिहास की मरी हुई शिराएँ
नये समीकरण नए आयाम नयी विमायें

कब तक उतारूँ ऋण
उस एहसान का
भरता रहूँ कब तलक वह सूद
रिश्तों का उलझनों का
सहता रहूँ कब तक वह पारंपरिक गर्व बोध
लटकता रहूँ कहाँ तक
जिन्दा गोश्त की बोरियों सा

चल रही जो क्रांति की धारा कोई
लेकर चल रहे मशाल तेज झंझावातों में जो
फूंक कर प्राण मिट्टी में भी
बढ़ रहे हैं जो जिन्दा जुलूस
तोड़ कर अचेतन के भयावह कारागार
दे रहे दीर्घ पुकार
मुक्त हो अपने चेतना मोहन-गृह से
अभय हो जाता हूँ मैं भी
उस लोकगंगा में नहा कर

एक अज्ञात छाया टुकड़ी
खोज रही जो गुप्त द्वार
दुर्भेद्य दुर्गों के
छिप कर अंतर-वीथियों से
पैठ जाती है राज-प्रासाद में
अनभिज्ञ प्रहरी बेसुध द्वारपाल
अन्तःपुर की दीवारों से रिसते हैं षड्यंत्रों के अंतर्श्राव
सुन कर समझ कर समस्त यंत्र-तंत्र
मोहन मारण उच्चाटन मंत्र
आन्तरिकाओं में भूलता भटकता
उतर आता हूँ ताहखानों में

ढेर सारे प्रेत पिशाच
सड़ रहे हैं सदियों से जो बंदीगृहों में
भोग रहे हैं राजद्रोह राजदंड
बरसों से जल रही जो आग है
लिख रही है ज्वलंत गीत आँखों के गूमड़ों में
काल कोठरी की दीवारों पर
छन रही है रात भर स्मृति चिन्ह

ललकार कर शौर्य अपना
धिक्कार कर सत्ता की प्रभुता
विच्छिन्न कर सारी लौह श्रृंखलाएं
फूंक कर आजन्म परम्पराएँ
जीत लाते हैं समस्त दिशाएं

बढ़ता जाता है जुलूस
और बढती जाती है क्रांति की भागीदारी
सत्ता की हिस्सेदारी में
पड़ जाती है दरार
रचे जाते हैं नये न्याय नियम संगठन
होता है जीर्णोधार
मिलती है मुक्ति कलंकित इतिहास से

पर अतृप्त रह जाता हूँ मैं
पारितोषिकों को मान कर प्रारब्ध
खा कर संतोष मोदक
राज्य सेवा धर्म लीन
बना रह गया मैं
गुरुसेवक राजसेवक स्वयंसेवक
घिस रहा यह आत्मा फिर किसी अज्ञात मुक्ति के लिए

अतृप्त रह गया कोई और छाया झुण्ड
जो बुन रहा षड़यंत्र है
किसी नयी अंतर क्रांति का
महलों से दूर
पहाड़ी मंदिरों की ओट में
रच जा रहे हैं पुनर्जागृति के गीत
फंस कर रह गयी जो राज-लिप्सा आत्मा में
खोजती है नये गुप्त द्वार गुफा मंदिरों में

किसे कहें विश्वासघात
उस महात्वाकांक्षा को जो सच की पक्षधर है
जो बिफर उठती है अन्याय देख कर
जो देखती है स्वप्न महलों के
नये इतिहास के लिए पुलकती है
तड़पती है नए आदर्शों के लिए
याकि चुकाते रहें सूद उपकार का
बैठ कर उकडू सत्ता के बुलबुले के अन्दर
कोसते रहें अपना भाग्य
भव्य राज-प्रसादों के चाक-चिक्य में
विन्यस्त है एक गहन दबाव
बौनी हो जाती है मेरी प्रतिभा
सत्ता का एक धीमा प्रभुत्व
एक सधी हुई दबिश, रक्त के धब्बे
और एक शैतानी साजिश
रचते हैं कूट संकेत चिन्ह
टूटती जाती है यह आत्म संघर्ष रत आत्मा
कि कोई पीटता है सांकल अंतरपट के  

अंतर्मन का कवच भेद कर
चली आती है वह सत्ता की देवी
सजा कर स्वर्णिम स्वप्न पलकों पर
गूंथ कर कीर्ति अलकों में
झाँक कर मेरी राज हवस में
चुरा लेती है मेरा मन
अग्निगर्भा वह ग्रस लेती है चिंतन
रात के पिछले प्रहर में
लिए रुनझुन पायलों की झंकार
लांघ जाती है स्वप्नों को वह मोहिनी
छू कर गुलाबी नाखूनों को
दिखाती है श्वेत धवल बक चिन्ह
बताती है मेरी गहरी हथेली का रंग
समझाती है करतल में
ग्रहों के पर्वतों का विस्तार
इंगित करती है रेखाओं पर
उगे वृत्त वलय त्रिकोण
बिंदु मेखलाओं के संकेत चिन्ह
पकड़कर मणिबंधों की हरी शिराएँ
उतर आती है रूधिर में
नदी की लहर चाल सी उठती गिरती
बहा ले जाती है स्वप्न वाटिकाओं में
गिनती है रात भर मेरी दाहिनी ओर के तिल
लेप कर त्रिवलियों में चन्दन
खोजती है नाभि में वामावर्त शंख चिन्ह
सोंट कर शरीर स्निग्ध ताप में
कानों में कुछ कह कर
लगा कर गांठें अंतर्मन पर
लुप्त हो जाती है वह विपथगामिनी

नींदों में गिरते चढ़ते बार बार
उकसा जाती है फिर वही
अस्मिता के तीव्र प्रश्न
वर्चस्व के धीमे समीकरण
स्वर्णाक्षरों में नामांकन
बलिदान का मूल्यांकन

भींच कर मुट्ठियाँ अपनी
होकर दृढ प्रतिज्ञ स्थित प्रज्ञ
पकड़ कर इतिहास वलय
लेकर खड्ग रज्जु, नवदल के संग
प्रविष्ट कर प्रांगणों में मंदिरों के
फांद कर अलंकृत तोरण द्वार
उतर कर गलियारों में
लपक कर लांघ जाता चोटियाँ
उखाड़ लाता हूँ स्वर्ण कलश
हर्मिका पर लगे छत्र ध्वज
खोद कर गर्भ गृहों को
निकाले जाते हैं स्थापित देवता
और गला कर बेड़ियाँ दासता की
पिघला कर सारे इतिवृत्त अयस्क
गढ़े जाते हैं नये देवता

राज प्रासादों के भव्य आहातों में
गलियारों में पकड़ कर कीर्ति स्तंभों
के गढ़े हुए मोखे माप कर जोख कर
एक एक कदम घुस आता हूँ
रंग शयन कक्ष में
रत्न खचित दीवारें, झीने महीन परदे
सुलगा जाते हैं अंतर के समस्त आकांक्षा द्वार
लेटा हुआ वर्तमान ओढ़ कर
सुखद भविष्य की नींदों में लीन
वह निश्छल गूढ़ सत्तारूढ़
हनता हूँ जिसे आँखें मूँद कर
अपनी आत्मा को समझा कर
नया भविष्य गढ़ने
नया इतिहास रचने
एक ही झटके में
कर धड़ से अलग सर
खींचता हूँ दीर्घ नीरवता के उसांस
अपनी अधमरी आत्मा में
झांकता है सरकटा चाँद
संकीर्ण वातायनों से
क्षेत्रकों में दूर तक उठते हैं
अग्नि के भीषण हौल व्याल
उद्धत हैं गढ़ने को नये प्रमेय
समस्त परिवर्तनकामी छायाकृतियाँ
अन्दर ही अन्दर भारी सा हुआ मैं
गीली नमक की बोरियों सा रिसता हुआ
उतर आता हूँ खोखले चबूतरों पर
बैठ कर रक्त रंजित सीढ़ियों के सिंहासन पर
जलती हुई आत्मा लिए
गंदली पीली छाया लिए
बोझल देवत्व लिए
बन जाता हूँ मैं
गुरुहंता राजहंता चक्रमस्तक
ग्लानिभक्षक गजलोचन  राजराक्षस

अनगढ़ विमाओं में छीलता रीन्धता
नये न्याय नियम उदाहरण
करता झूठी प्रभुता का प्रदर्शन
बनवाकर नये कीर्ति स्तम्भ
खुदवाकर नये कीलाक्षर वृत्तखंडों में
बंधी हुई आत्मा लिए
खोदता हूँ उखड़ती साँसों में
अपनी बू अपनी घिन निरंतर

कहाँ छू पाता हूँ वो आदर्श जिनके लिए
बदल डाला यह प्रारब्ध तोड़ डाले सारे नियम
रच दिए नए व्याकरण
कब उठ पता हूँ अपनी नज़रों में
जिनके लिए बुन डाले समस्त जाल गहन
पीस डाले अस्थि पिंजर
पिघला कर यह देह अपनी
बना डाले स्वर्ण आभरण

कूंथता हुआ अपनी ही जिद में
अपने भंवर में अपनी लहर में
भटकता अनंत योनियों में निरंतर
रगड़ता भाल बलिवेदियों पर
खोजता फिर नये अर्थ जीवन के
खोजता फिर नये मार्ग मुक्ति के
गाता नये मुक्तक आत्मा के
भवचक्र में फंसा रह गया फिर
बन गया मैं
आत्म-रिक्त आत्म-क्षत आत्म-च्यूत
आत्म-छ्ली राजराक्षस 

- दीपांकर

24 दिसम्बर 2011

लाहौल

आशीष पाण्डेय
पर्वतों पर दूर तक फैली धुंध.....ठंण्डी हवाओं के झोंके और सूरज के धूप की गर्माहट सदियों से लाहौल घाटी में आंख मिचैली खेल रही है। लाहौल घाटी हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले का वह हिस्सा है जहां लाहौली जनजाती के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने इतिहास को जीते चले आए हैं। तमाम कठिनाईयों के बावजूद लाहौलियों के चेहरे पर न तो शिकन है, न कोई थकान। अपनी माटी से गहरे लगाव ने इनके चेहरे पर मुस्कान बिखेरी और अपने हौसले की बदौलत यह कदम-दर-कदम जिंदगी के सफर को तय कर रहे हैं।

सन् 1960 में पंजाब के कांगड़ा जिले से कुछ हिस्सों को अलग करके उन्हें लाहौल-स्पीति के नाम से नये जिले के रूप में हिमाचल प्रदेश से मिला दिया गया। 1991 की जनगणना के अनुसार 13835 वर्ग किमी0 में फैले इस जिले की जनसंख्या 31294 है और जनसंख्या घनत्व 2 व्यक्ति वर्ग किमी0 है।

प्राचीन समय में महाराजा हर्ष की मृत्यु के बाद भारतीय राज सत्ता बिखरने लगी और लाहौल में सामंती व्यवस्था का उदय हुआ। उस समय लाहौल पर कोलोंग, गुमरांग, घांेडला और बारबोग नाम से चार जमिंदार परिवार शासन किया करते थे। इतिहासकारों के अनुसार लगभग 1000 ईसा पूर्व में कोलोंग परिवारों ने तीन-चार सौ वर्षों तक लाहौल पर शासन किया। परन्तु कोलोंग परिवार का वह शासन स्पीति राजा के अधीन हुआ करता था और बाद में लाहौल  भी स्पीति की तरह लद्दाख सल्तनत से जुड़ गया।

बदलते वक्त के साथ सत्ता के कई पड़ावों से गुजरते हुए 1947 में देश की आजादी के वक्त लाहौल का शासन संबंधी काम नायब तहसीलदार देखा करते थे और शासन का मुख्यालय हुआ करता था कोलांग। जब लाहौल-स्पीति को जिला बनाया गया तो कोलोंग को तहसील का दर्जा दिया गया।

लाहौल, हिन्दु और बौद्ध धर्म की सभी विरासत को समेटे सदियों से एकता की अद्भुत मिसाल रहा है। जहां बौद्ध धर्म तिब्बत से आया वहीं दूसरी तरफ हिन्दू धर्म पंजाब के प्रभाव से लाहौल की आबोहवा में घुल गया। लाहौल की पट्टन घाटी में हिन्दु आस्था से जुड़े लोग रहते हैं, जबकि रंगोली और गारा घाटियों में बौद्ध मंत्र गुंजते हैं। पट्टन घाटी में लाहौली जनजाति के लोग शिव और दुर्गा यानी शक्ति  की पूजा में विश्वास रखते हैं। लाहौल का अतीत तिब्बत से जुड़ा है और यही वजह है कि इस घाटी में बौद्ध सभ्यता और संस्कृति फलती-फूलती नजर आती है। लाहौली जनजाति के लोगों में बौद्ध धर्म मुख्यतः तीन संप्रदाय प्रचलित है- पहला- न्योंग्मापा, दूसरा- कग्युद्पा और तीसरा- गेलुग्पा। न्यींग्मापा संप्रदाय सबसे प्राचीन है। गेलुग्पा संप्रदाय बौद्ध समाज में पीत संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें लामा लोग पीली टोपी पहनते हैं। कग्युद्पा संप्रदाय भी लाहौली जनजाति के लोगों के लिए आस्था और विश्वास से जुड़ा ज्ञान मूल मंत्र है।

इसके अलावा लाहौलियों की प्रकृति के साथ अद्भुत जुड़ाव है। नतीजन लाहौली जनजाति के लोग प्रकृति की पूजा भी करते हैं। सब्दगके रूप में जहां ये पर्वतीय चट्टानों की पूजा करते हैं, वहीं गुफाओं की पूजा यह व्राॅग्मों के रूप में करते हैं। इनकी परम्परा में पेड़-पौधों को भी सम्मानीय स्थान दिया गया है। फालाएक ऐसा ही पेड़ है, जो लाहौली जनजाति में देवता की तरह पूजा जाता है। इनके अलावा लाहौली जनजाति के लोगों के अपने कुल देवता भी होते हैं। यह कुल देवता इनके घर के किसी कोने में पत्थर या खम्भे के रूप में स्थापित होते हैं। अन्य समाजों की तरह लाहौली जनजाति के लोगों में अपने धर्म की मान्यताएं जीवन का सार्वभौमिक सत्य भी है, और आधार भी।

लाहौली जनजाति समाज में जाति व्यवस्था का प्रचलन पुरातन समय से चला आ रहा है। धार्मिक आस्था के लिहाज से लाहौली हिन्दू और बौद्ध परंपरा के अनुयायी है, और इन्हीं दोनों मान्यताओं के अनुसार यहां जाति व्यवस्था का प्रचलन है। यहां जातियों के वर्गिकरण का आधार वंशावली पद्धति यानी उच्च और निम्न जाति व्यवस्था के आघार पर की गई है। उच्च जाति के ताल्लुक रखने वाले ठाकुर, स्वांगला और ब्राह्मण लोग खान-पान  और शादी-विवाह जैसे संबंध अपनी ही जाति में बनाते हैं। इन उच्च जातियों में ब्राह्मण  वर्ग केवल पट्टन घाटी तक सीमित है और शेष लाहौल में इनकी उपस्थिति  नाम मात्र की भी नहीं है। पिछड़ी जातियों में वर्गीकरण का निर्धारण उनके पेशे के आधार पर हुआ है। लाहौली जनजाति समाज में लोहार लोगों को डोम्बाबुनकरों को बेडाऔर बारारस। धरकार को वालरसकहते हैं। उच्च जनजातियों के खेतों पर मजदूरी करने वाले भूमिहीन मजदूरों को हेस्सीका नाम दिया गया है।

लाहौली जनजाति में अनेक तरह की भाषाओं का चलन है। बौद्ध और हिन्दू संस्कृति के मुहाने पर बसी लाहौल घाटी की जुबान में भी मिली-जुली खुशबु आती है। करीब आधा दर्जन बोलियों के जरिये अपनी बातों को कहने वाले लाहौली जनजाति के लोगों की प्रमुख भाषाएं भोटी और चिनाली या डोम्बाली हैं। भोटी भाषा, पर तिब्बती भाषा का प्रभाव है वहीं चिनाली या डोम्बाली संस्कृत भाषा की उपज लगती है। इन भाषाओं का प्रभाव भी क्षेत्रीय स्तर पर अलग-अलग दिखाई पड़ता है। भोटी भाषा लाहौली की रंगोली और गारा घाटियों में बोली जाति हैं। वैसे इन इलाकों में और बोलियां प्रचलित हैं, जैसे पुनान, हिनान और चिनाली। पट्टन घाटी में मनचाड़ का प्रचलन बहुतायत है।

लाहौल घाटी में घरों का निर्माण और इनकी शैली काॅलोनी की तरह होती है। मकानों का समूह, ब्लाक के जैसा होता है, ताकि बर्फबारी के दिनों में लोगों का जुड़ाव एक-दूसरे से बना रहे। लाहौली जनजाति के लोगांे का घर तीन मंजिल तक बने होते हैं। घर के भूतल का प्रयोग पशुओं के रहने के लिए किया जाता है और इन्हीं कमरों का प्रयोग पशुओं के चारा रखने के लिए भी किया जाता है। घर की उपरी मंजिल का प्रयोग लाहौली परिवार अपने रहने के लिए करते हैं। उपरी मंजिल पर एक भीतरी कमरा होता है, जिसका प्रयोग जाड़े के दिनों ठंड से बचने के लिए होता है। बौद्ध संप्रदाय को मानने वाले लाहौली लोगों के मकानों के उपरी मंजिल पर इनके पूजा का कमरा होते है, जिसे चोखंाग के कहते हैं। लाहौल घाटी के निचले हिस्सों में मकान के निर्माण की शैली लगभग समान होती है, लेकिन इन मकानों में रहने के उपरी घाटी के मकानों की अपेक्षा बड़े, खुले और हवादार होते हैं और इन मकानों  में रौशनी के भी बेहतर इंतजाम होते हैं, जो उपरी मंजिल के मकानों में उपरी मंजिल पर बरामदे का होना भी बड़ा जरूरी माना जाता है। इन घरों पर चूने से सफेदी की जाती है और कहीं-कहीं रंगों का प्रयोग भी दिखाई देता है। घर के भीतरी हिस्सों की सजावट लाहौली जनजाति के लोग अपनी परंपरा के अनुसार करते हैं। कमरों की साज-सज्जा में पूजा घर यानी चोखागका विशेष स्थान है। चोखागमें बुद्ध के जीवन और दर्शन से संबंधित तमाम पेंटिगों के साथ-साथ थंका पेंटिग की मौजूदगी अवश्य रहती है।

लाहौली समाज में संयुक्त परिवार की अवधारणा प्राचीन समय से चलती आ रही है। चाहे वह हिंदू समाज हो या बौद्ध समाज। उच्च जनजाति हो या निम्न जनजाति से। सभी परिवार एक ही छत के नीचे रहते हैं। लाहौल के रंगोली और गारा घाटियों में संयुक्त  परिवार का प्रचलन हैं। परिवार में न केवल माता-पिता, पुत्र-पुत्री बल्कि दादा-दादी, चाचा-चाची  और उनके बच्चे भी एक साथ रहते हैं। पट्टन घाटी में पारिवारिक संरचना थोड़ी अलग सी है।  यह परिवार में बड़े लड़के की शादी के बाद पिता घर से संन्यास ले लेता है, और उस घर को त्याग कर दूसरे घर में रहने चला जाता है। संपति उत्तराधिकार के मामले में लाहौली जनजाति भारतीय सभ्यता के काफी करीब नजर आते हैं। लाहौली जनजाति में पिता की मृत्यु के बाद सम्पति को सभी बेटों में बराबर-बराबर बांट दिया जाता है। यदि कोई पुत्रहीन हो तो उसकी मृत्यु के बाद संपति को अन्य भाईयों में बाट दिया जाता है, परन्तु मृत व्यक्ति की पत्नी है तो मृतक की संपत्ति पर उसका अधिकार होता है।

लाहौली जनजाति में सगोत्रीय विवाह नहीं होते परन्तु सजातीय विवाह को सामाजिक मान्यता प्राप्त है। लाहौल की पट्टन घाटी में ब्राह्मण मौसेरी, ममेरी और फुफेरी बहनों से वैवाहिक संबंध नहीं बनाते, लेकिन अन्य जातियों में ऐसे भी विवाहों को मान्यता है। लाहौली जनजाति में तीन प्रकार के विवाह प्रचलित हैं- पहला-मोथे विवाह, दूसरा-कोवांची विवाह और तीसरा-कुंची विवाह। मोथे और कोवांची विवाह लगभग एक जैसे होते हैं और दोनों में माता-पिता की मंजूरी होती है। मोथे विवाह केवल  भव्यता के आधार पर कोवांची से भिन्न होता है। कुंची विवाह अन्य घाटियों की अपेक्षा गारा और रंगोली में ज्यादा प्रचलित है। कुंची आधुनिक समाज के प्रेम विवाह के जैसा है, जिसमें लड़का और लड़की एक दूसरे को पसंद करते हों। इसके बाद लड़का, लड़की की सहमती से उसका छद्म अपहरण कर लेता है। बाद में दोनों पक्षों की रजामंदी से लड़के और लड़की का विवाह होता है, जिसे कुंची विवाह कहा जाता है।

विवाह की विधि चाहे मोथे हो या कुंची हो, इनकी पारंपरिक पेय छंग और अराक इसमें जरूर शामिल रहता है। कोवांची विवाह लाहौली समाज का ऐसा विवाह है, जिसमें ज्यादा ताम-झाम नहीं होता। इस विवाह में बहुत ही कम लोग शामिल होते है, और यहां तक की इस विवाह में दूल्हा तक अपनी बारात में नहीं जाता। दूल्हे की जगह उसकी छोटी बहन बारात लेकर जाती है, और शादी के बाद दुल्हन की विदाई करा कर चली आती है। लाहौली समाज में महिलाओं की स्थ्तिी पुरूषों के समकक्ष ही है। महिलाएं केवल घरेलू कामों तक ही नहीं सिमटी होती है, बल्कि यह पुरूषों के साथ खेती-बाड़ी में भी बखूबी साथ देती है और घर के सभी फैसलों में महिलाओं की राय बड़ी मायने रखती है। प्रायः सभी समाज में महिलाओं को गहनों से बेहद लगाव होता है और इस मामले में लाहौली महिलाएं भी कम नहीं होती हैं। किरकिस्टीइनका खास गहना होता है, जो सोने या चांदी का बना होता है। यह किरकिस्ती इनके सिर की शोभा बढ़ाता है, वैसे सिर पर पहनने वाला एक और गहना इनके बीच काफी लोकप्रीय है, जिसे पोशाल कहते हैं। लाहौली महिलाएं गले में चांदी की जंजीर पहनती है, जिसे 'न्यान्ग्थांग' कहते हैं। इसके अलावा इन नाक और कानों की सुंदरता बढ़ाते हैं फुलीऔर अलोंग।

लाहौली पुरूष भी उंगलियों में अंगूठी, कानों में मुरकी और गले में क्यांटी पहनने का शौक रखते हैं। लाहौली पुरूषों का पारंपरिक परिधान इनके भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार बना है। ऊनी कपड़े का पायजामा, कपड़े का ही गाउन की तरह का कोट, कमरबन्द जैसा पटका, ऊनी  सदरी, मोजे, पुआल के जूते और सिर पर गिलगिट जैसी टोपी। लाहौली महिलाएं पायजामा और कुर्ता पहनती हैं। कुर्ते के ऊपर गाउन की तरह डुग्पोपहनती है, जिसकी लंबाई घुटनों तक होती है और इनके किनारों पर बारीक कढ़ाई होती है। महिलाएं डुग्पोंको कसा रखने के लिए कमर पर पटका भी बांधती है। पैरों में ऊनी मोजे और पुआल के बने जूते होते हैं। जिसे पुलकहते हैं। भोटी महिलाओं को छोड़कर स्वांग्ला, शिप्पी और लोहार जनजाति की महिलाएं गोल टोपी पहनती हैं।

लाहौली जनजाति के खान-पान में भी भारतीय और तिब्बती परंपरा के असर दिखाई देते हैं। लाहौली लोगों के सुबह के नाश्ते को शेमाकहते हैं, जिसमें थुंग्पानामक व्यंजन खाया जाता है। थंग्पा जौ के भुने हुए आंटे से बनता है। यह शाकाहारी और मांसाहारी दोनों विधियों से बनाया जाता है, फर्क सिर्फ एक है, एक में सब्जी मिली होती है और दूसरे में मांस। लाहौलियों के दोपहर के भोजन को छिक्किनकहते हैं। छिक्किनमें जौ के भुने हुए आंटे की रोटियों के साथ आलू की सब्जी होती है। आलू लाहौलियों का पारंपरिक खाना नहीं है, लेकिन गुजरते वक्त के साथ आलू ने भी लाहौली थाली में अपना स्थान बना लिया है। छिक्किन खत्म होने के बाद बारी आती है छांछ की। छांछ लाहौली लोगांे के दोपहर के जरूर शामिल होती है। रात के खाने को लाहौलियों ने यंग्स्किन नाम दिया। रात का यह खाना छिक्किन यानी दोपहर के खाने की तरह ही होता। इसमें केवल छांछ को नहीं शामिल किया जाता है। जाड़े के दिनों में इन्हें मांस मिलने में कठिनाई नहीं हो, इसके लिए ठंड आने से पहले ही मांस को सुखा कर रख लेते हैं। मांस के संरक्षण की यह विधि लाहौलियों के परंपरा की विशेषता है।

इसके अलावा इनके खान-पान में दो और महत्वपूर्ण चीजें शामिल होती हैं, जो इनके दैनिक जीवन का हिस्सा तो है ही , साथ ही मेहमानवाजी के लिए भी बखूबी  इस्तेमाल होती है मक्खन की नमकीन चाय और जौ से बनी इनकी अपनी बीयर यानी छंग और अराक। मक्खन की नमकीन चाय के साथ-साथ छंग और अराक पीने का कोई निश्चित समय नहीं होता। दिल जब करे बैठ जाए, हाथों में प्याला.....मक्खन की चाय...या छंग ...या अराक।

लाहौलियों की रसोई के बर्तन भी इनके अतीत से वर्तमान तक के सफर दास्तां बयां करते हैं। पुराने समय में लाहौली जनजाति के लोग पत्थरों के बर्तन का प्रयोग करते थे। उन बर्तनों में कुंपडअपनी विशेष पहचान रखता था। समय के साथ-साथ बर्तनों में भी परिर्वतन आने शुरू हुए और बर्तनों ने पत्थर की बजाय लकड़ी की शक्ल ले ली। लकड़ी के ऐसे ही बर्तनों में 'डांगमों' का प्रयोग नमकीन और मक्खनियां चाय बनाने के लिए किया जाता है।

आज बर्तनों को वर्तमान स्वरूप पत्थर और लकड़ी को छोड़कर धातु  का रूप ले चुका है। दुनिया के रंग ढंग में ढलते हुए लाहौली रसोई में भी कांसे, पीतल, अल्यूमिनियम और स्टील के बर्तन दाखिल हो चुके हैं, जो किसी भी घर के लिए सामान्य हैं। परन्तु लाहौली जनजाति के लोगों ने अपनी जीवटता और मेहनत के बल पर पत्थरों से अन्न उपजाया है। लाहौल घाटी में आलू, होय, कुथ, जौ, मेथी और गेहूं की खेती प्रमुखता से की जाती है। लाहौल में केवल बीस फीसदी जमीन ही कृषि कार्यों के लिए है। उनमें जमीनों को भी दो भागों में बाटा गया है। एक तो वह जहां सिंचाई हो सके और दूसरी जहां सिंचाई की सुविधा नहीं है। लाहौल के लिए मौसम भी एक बड़ी चुनौती है और इस चुनौती का डटकर मुकाबला करते हुए लाहौली एक मौसम में एक ही फसल पैदा कर पाते हैं। खेती के जी तोड़ मेहनत में भी लाहौली गाना-गुनगुनाना नहीं भूलते हैं। फसलों की बुआई हो या कटाई लाहौली झूमते हैं....गाते हैं....और जश्न मनाते हैं।

पशुपालन लाहौली जनजाति का हिस्सा है। लाहौली लोग याक याक, खच्चर, गाय, भेड़ और बकरे -बकरियों का पालन करते हैं। इन पशुओं में भेड़ और बकरियों का प्रयोग मांस प्राप्त करने के लिए किया जाता है। ठंड भरे जाड़े के दिनों में लाहौली जनजाति के लोग जब घरों से बाहर नहीं निकलते, तो उनका पसंदीदा काम होता है कपड़ो की बुनाई। लगभग हर लाहौली घर में हथकरघों पर बुनाई होती है। भेड़ के ऊन से लाहौली लोग अपने पहनावे के लिए गरम कपड़े तैयार करते है।परंपरागत शैली के कपड़े इनकी सभ्यता के भी परिचायक हैं। मनोरंजन और खेलकूद हर किसी समाज का अहम हिस्सा होता है। लाहौली लोगों  के मनोरंजन की अपनी खास विधाएं है। इनके खेलों पर भारतीय और तिब्बती परंपरा की विशेष छाप दिखाई देती है। शतरंज की तरह खेले जाने वाला 'त्सोग्बे' लाहौलियों का पसंदीदा खेल है। शतरंज की तरह ही इस खेल में राजा वजीर सिपाही से दिमागी कसरत की जाती है। त्सोग्बे की तरह ही गोटों खेल भी लाहौलियों को खूब रास आता है। पत्थरों की गोटियों से खेले जाने वाला यह खेल भी शतरंज की तरह खेला जाता  है।
             
इंसानी जिंदगी में खुशियों के रंग भरते हैं मेले और त्योहार। लाहौलियों का सबसे पसंदीदा मेला है लदर्चा। यह वार्षिक मेला अपने विविध आयोजनों मसलन पशुव्यापार, नृत्यसंगीत और पारंपरिक वस्तुओं के खरीद-बिक्री का महत्वपूर्ण माध्यम है। भगवान शिव के त्रिलोकनाथ मंदिर के समीप पोरीमेला आस्था और विश्वास की अमिट छाप लिए हुए है। वहीं सिससुमेले में बौद्ध मान्यताओं के दर्शन होते हैं। इसके अलावा  फागलीऔर हालदापर्व भी लाहौली जनजाति के प्रमुख मेलों में शामिल हैं।

लाहौली समाज में लोग तमाम मुश्किलों को झेलते हुए भी खुश रहना जानते हैं। नृत्य और संगीत से लाहौली जनजाति का लगाव सदियों पुराना है। खुशी का कोई भी अवसर बिना नृत्य और संगीत के अधूरा होता है। लाहौली समाज में स्त्री और पुरूष दोनों ही नृत्य की विधा में पारंगत होते हैं। छंग और अराक, नृत्य संगीत का ऐसा समां बांधता है कि सारी दुश्वारियों को भूल लाहौली लोग नाचते और झूमते हैं। बांसुरी की धुन और नगाड़ो की छाप पर पुरूष और महिलाएं अलग-अलग समूह में शेहनीनृत्य करते हैं।

लाहौली जनजाति में बौद्ध मान्यता पर आधारित  छमनृत्य भी अपनी खास पहचान बनाये हुए हैं। छमनृत्य मुखौटा लगा कर किया जाता है। यानी नृत्य करने वाले मुखौटों के द्वारा दूसरे का रूप धारण करके छमको जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं।

इसके अलावा लाहौलियों में धुरेनृत्य भी खासा प्रचलित है। इस नृत्य में नर्तक अर्द्धगोलाकार और गोलाकार घेरा बना कर आकर्षक नृत्य की प्रस्तुती करते हैं। यह नृत्य मुख्य रूप से गायन पर आधारित है और इसमें वाद्ययंत्रों के संगीत अभाव होता है। इस नृत्य में गायन की शैली इतनी प्रभावशाली होती है कि संगीत नहीं भी होने पर असर नहीं पड़ता धुरेनृत्य में रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों पर नाट्य नृत्यों की प्रस्तुती की जाती है।