12 अप्रैल 2014

एडिथ पियाफ़: अच्छी और बुरी यादें, दोनों एक ही तो हैं

ये गीत मैंने करीब सात साल पहले आई फ़िल्म La Vie en Rose में सुना था. तब से अब तक ये दार्शनिक स्तर पर मेरे लिए सबसे मानीखेज गीतों में से रहा है. इस गीत के बोल बेहद सरल हैं लेकिन इन सरल बोल का अर्थ भी अनुवाद में कहीं खो सा गया है. मुझे फ्रांसीसी आती नहीं. इंटरनेट पर मौजूद तमाम अंग्रेजी अनुवादों, शब्दकोशों को देखने के बात कुछ-कुछ इस अनुवाद तक पहुंचा हूँ. जाहिर है गीत में जो प्रभाव है वो इस अनुवादित बोल में नहीं हैं.

नहींकिसी बात का नहीं,
मुझे कोई पछतावा नहीं 
न उन भली बातों का जो मेरे संग हुईं हैं
न बुरी बातों कादोनों एक ही तो हैं

नहींकिसी बात का नहीं
मुझे कोई पछतावा नहीं

जो मेरे साथ हुआ, उसकी क़ीमत मैं अदा कर चुकी हूँवह बीत चुका है, उसे मैं भूला चुकी हूँ
उन बीती हुई बातों की मुझे कोई परवाह नहीं

अपनी तमाम स्मृतियों को, मैं जला चुकी हूँ
मेरे दुखमेरी ख़ुशियाँ, मुझे अब उनकी कोई ज़रूरत नहीं

मेरे सारे प्यार, और उनसे उठने वाली भंवरें मिट चुके हैं
हमेशा के लिए ख़त्म हो चुके हैं, मैं फिर से, बिल्कुल शुरू से शुरू कर रही हूँ 

नहींकिसी बात का नहीं,
मुझे कोई पछतावा नहीं 
न उन भली बातों का जो मेरे संग हुईं हैं
न बुरी बातों कादोनों एक ही तो हैं

नहींमुझे किसी बात का पछतावा नहीं
मुझे किसी बात का पछतावा नहीं
क्योंकि मेरी ख़ुशीमेरी ज़िंदगी
आज से, अब से, तुमसे शुरू हो रही है

गायक- एडिथ पियाफ़, गीत-संगीत - चार्ल्स डमांट और माइकल वाकेयर

10 अप्रैल 2014

आज फिर जीवन शुरू हुआ.

आज फिर शुरू हुआ जीवन
आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी
आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा

जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया

आज एक छोटी-सी बच्ची आई, किलक मेरे कन्धे चढ़ी
आज मैंने आदि से अन्त तक पूरा गान किया
आज फिर जीवन शुरू हुआ.

- रघुवीर सहाय

27 मार्च 2014

शोर था इस मकाँ में क्या-क्या कुछ

रौनकें थीं जहाँ में क्या-क्या कुछ
लोग थे रफ़्तगाँ में क्या-क्या कुछ
अबकी फ़स्ल-ए-बहार से पहले
रंग थे गुलसिताँ में क्या-क्या कुछ
क्या कहूँ अब तुम्हें खिज़ाँ वालो
जल गया आशियाँ में क्या-क्या कुछ
दिल तिरे बाद सो गया वरना
शोर था इस मकाँ में क्या-क्या कुछ

- नासिर काज़मी

26 मार्च 2014

हमज़ाद के कर्म-कुकर्म ही जिसकी पूँजी है

खिलंदड़ गद्य लिखने में मनोहर श्याम जोशी का कोई जोड़ नहीं. गर्हित मुद्दों को बरतने का शऊर भी उन जैसा हिन्दी में दुर्लभ है.

जोशी जी की सबसे ख़ास बात है कि वो ख़ुद पर हँस सकते हैं, लेखक होते हुए भी. वरना बाज लेखक तो गंभीरता के लिहाफ से निकलने में कांपने लगते हैं.

हमज़ाद जोशी जी के बम्बई के दिनों के अनुभवों से निकली एक मजेदार रचना है. कहानी का खुलासा हाल यूँ है कि एक फ़िल्म निर्माता का प्रौढ़ अवस्था में देहांत हो जाता है. उसके मरते ही उसके हमसाया यार-चमचा-राज़दार अनाथ हो जाता है.

इस अनाथ ने अपने जीवन में कुछ कमाया नहीं. वो बस अपने दोस्त-मालिक-रकीब के करतबों का चश्मदीद है. बाक़ी की ज़िंदगी चलाने के लिए उसके पास एक ही पूँजी है, अपने दोस्त-मालिक-रकीब के कर्म-कुकर्म.

जोशी जी ने फ़िल्मी दुनिया के छिलकों को बड़ी बारीकी से उकीला है. पता नहीं चलता कि कहां सच है और कहाँ गल्प. बस, मनोरंजन हर जगह है.

शराब और शबाब में डूबे रहने वाले फ़िल्म निर्माता की क़िस्सों से जोशी जी ने हमारी मध्यवर्गीय नैतिकता को भी तार-तार करते चलते हैं. कौटुम्बिक अनाचार के बारे में इतना मुखर किंतु सहज गद्य हिन्दी में शायद ही किसी और ने लिखा हो.

असमान्य प्रेम संबंधों और देह संबंधों को लेकर उर्दू लेखक जितने मुखर रहे हैं, हिन्दी लेखक नहीं रहे हैं. जोशी जी इसके अपवाद माने जा सकते हैं.

हमज़ाद, हरिया हरक्यूलीज़ की हैरानी, कसप, क्याप जैसी किताबें के शिल्प और कथ्य पर विस्तार से बात करने के लिएअलग से एक फुर्सती लेख लिखना होगा.

फ़िलहाल तो यही कहूँगा कि मनोरंजन और ज्ञानरंजन के बीच जैसा संतुलन जोशीजी बनाते हैं वो अद्भुत है.

नारायण दत्त तिवारियों के समय में जोशी जी के हमज़ाद और हरिया हरक्यूलीज़ की हैरानी जैसे नॉवेला पढ़ना इस बात की तस्दीक करता है कि हिन्दी समाज में नारायण दत्तों की संख्या बड़ी रही है लेकिन वो लेखकों की कलम से फिसल जाते रहे हैं.

रंगनाथ सिंह

24 मार्च 2014

एक मुद्दत से वो मिज़ाज नहीं

बेकली, बेख़ुदी, कुछ आज नहीं
एक मुद्दत से वो मिज़ाज नहीं

हमने अपनी सी की बहुत, लेकिन
मर्ज़-ए-इश्क़ का कोई इलाज नहीं

शहर-ए-ख़ूबी को ख़ूब देखा, मीर
जिन्स-ए-दिल का, कोई रिवाज़ नहीं

मीर तक़ी मीर

मर्ज़-ए-इश्क़= इश्क़ का रोग, शहर-ए-ख़ूबी = सुंदरता का शहर, जिन्स-ए-दिल = दिल जैसी चीज़