2 जून 2012

परिहासिनी

'भारतेंदु' हरिश्चंद्र   


खुशामद
एक नामुराद आशिक से किसी ने पूछा, “कहो जी, तुम्हारी माशूका तुम्हें क्यों नहीं मिली?”बेचारा उदास होकर बोला, “यार, कुछ न पूछो, मैंने इतनी खुशामद की कि उसने अपने को सचमुच परी समझ लिया और हम आदमजाद से बोलने में भी परहेज किया.


अद्भुत संवाद
"ए, जरा हमारा घोड़ा तो पकड़े रहो.
यह कूदेगा तो नहीं?”
कूदेगा! भला कूदेगा क्यों? लो संभालो.
यह काटता है?”
नहीं काटेगा, लगाम पकड़े रहो.
क्या इसे दो आदमी पकड़ते हैं तब सम्हलता है?”
नहीं !
फिर हमें क्यों तकलीफ देते हैं? आप तो हई हैं.


तीव्रगामी
एक शख्स ने किसी से कहा कि अगर मैं झूठ बोलता हूँ तो मेरा झूठ कोई पकड़ क्यों नहीं लेता.
उसने जवाब दिया कि आपके मुँह से झूठ इस कदर जल्द निकलता है कि कोई उसे पकड़ नहीं सकता.

असल हकदार
एक वकील ने बीमारी की हालत में अपना सब माल और असबाब पागल, दीवाने और सिड़ियों के नाम लिख दिया. लोगों ने पूछा, ‘यह क्या?’तो उसने जवाब दिया कि, “यह माल ऐसे ही आदमियों से मुझे मिला था और अब ऐसे ही लोगों को दिये जाता हूँ.


एक से दो
एक काने ने किसी आदमी से यह शर्त बदी कि, “जो मैं तुमसे ज्यादा देखता हूँ तो पचास रूपया जीतूँ.और जब शर्त पक्की हो चुकी तो काना बोला कि, “लो, मैं जीता.दूसरे ने पूछा, “क्यों?”इसने जवाब दिया कि, “मैं तुम्हारी दोनों आँखें देखता हूँ और तुम मेरी एक ही.


सच्चा घोड़ा
एक सौदागर किसी रईस के पास एक घोड़ा बेचने को लाया और बार-बार उसकी तारीफ में कहता, “हुजूर, यह जानवर गजब का सच्चा है.रईस साहब ने घोड़े को खरीद कर सौदागर से पूछा कि, “घोड़े के सच्चे होने से तुम्हारा मतलब क्या है?”सौदागर ने जवाब दिया, “हुजूर, जब कभी मैं इस घोड़े पर सवार हुआ, इसने हमेशा गिराने का खौफ दिलाया, और सचमुच, इसने आज तक कभी झूठी धमकी न दी.


न्यायशास्त्र
मोहिनी ने कहा, “न जाने हमारे पति से, जब हम दोनों की एक ही राय है तब, फिर क्यों लड़ाई होती है? … क्योंकि वह चाहते हैं कि मैं उनसे दबूँ और यही मैं भी.


गुरु घंटाल
बाबू प्रहलाददास से बाबू राधाकृष्ण ने स्कूल जाने के वक्त कहा, “क्यों जनाब, मेरा दुशाला अपनी गाड़ी पर लिए जाइएगा?”उन्होंने जवाब दिया, “बड़ी खुशी से. मगर फिर आप मुझसे दुशाला किस तरह पाइएगा?”राधाकृष्ण जी बोले, “बड़ी आसानी से, क्योंकि मैं भी तो उसे अगोरने साथ ही चलता हूँ.


अचूक जवाब
एक अमीर से किसी फकीर ने पैसा मांगा. उस अमीर ने फकीर से कहा, “तुम पैसों के बदले लोगों से लियाकत चाहते तो कैसे लायक आदमी हो गये होते.फकीर चटपट बोला, “मैं जिसके पास जो कुछ देखता हूँ, वही उससे मांगता हूँ.


पेटू
एक ने एक से कहा कि एकादशी का व्रत करके द्वादशी को व्रत का पारण करना.
उसने व्रत तो नहीं किया पर पारण किया.
जब उसने पूछा कि कहो, व्रत किया था? तब वह बोला कि भाई, व्रत तो नहीं कर सका, पर तुम्हारे डर के मारे पारण कर लिया कि जो बन सके सोई सही


31 मई 2012

राम कुमार की कला और माया का यथार्थ


शैलेन्द्र साहू

"जो भी प्रकृति से प्यार करता है, उसे प्रकृति कभी निराश नहीं करती."  विलियम वर्डस्वर्थ     
                                                                   

देखो, सोचो मत, कुछ भी मत सोचो, सिर्फ देखो, इसके गवाह बनो एक मूक तटस्थ दर्शक के जैसे... और इस तरह हम सचमुच ही राम कुमार के चित्रों का इशारा समझने लगते हैं, उसमे खो जाते हैं. राम कुमार मेरे पसंदीदा चित्रकारों में से हैं तो इसका सीधा सम्बन्ध शायद मेरा अपना परिवेश भी है जंहा मेरा बचपन बीता. चारों ओर पहाड़ों से घिरा गाँव, दूर-दूर तक फैली धान की हरी फसलें, नदी, जंगल, धूसर मिट्टी और सर के ऊपर फैला अनंत नीला आकाश और यही सब मै राम कुमार के चित्रों में भी देखता हूँ, संयोग से उनका बचपन भी पहाड़ों पर ही बीता ,शिमला में. ये वही छवियाँ हैं जो उनके भीतर थीं और जिन्हें कैनवास तक पंहुचने में एक लम्बा सफ़र तय करना पड़ा. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक लेखक के रूप में की और रंगों की दुनिया में शामिल हो गए. एक तरफ वो चित्र बनाते रहे तो दूसरी तरफ अपनी कहानियों में भी जीवन की त्रासदियों से उनकी  मुठभेड़ें होती रहीं . 

प्रकृति में हर रंग मौजूद है ,राम कुमार के यंहा भी रंगों की अपनी ही एक दुनिया है ,उनके चित्रों में जैसे प्रकृति स्वंय ही प्रविष्ठ होती है ,इसके लिए उन्हें किसी तरह की कोई कोशिश नहीं करनी होती. रंगों की उनकी अपनी ही एक भाषा है ,जो सिर्फ उनकी अपनी है . एक जगह अपने साक्षात्कार में वो कहते हैं - " लाल रंग भी उदास हो सकता है ." और इस तरह राम कुमार अपने कैनवास में रंगों को अपनी ही एक अलग भाषा में अनूदित करने लगते हैं, जो न केवल दर्शकों को प्रभावित करता है बल्कि दर्शक इन चित्रों में अपने गाँव ,घर,नदी,पहाड़,जंगल सब पहचान सकता है. अपने चित्रों में वे कभी उदास नज़र आते हैं तो कभी प्रकृति की  फड़फड़ाहट  को उसकी पूरी जीवन्तता और  मांसलता के साथ पकड़ते हैं और कभी तो वो हमें सिर्फ तटस्थ से दिखाई पड़ते हैं किसी ध्यानमग्न योगी की तरह . उनके चित्र हमें चमत्कृत नहीं करते  न ही हमें कुछ ढूँढने या जानने के लिए बाध्य करती  हैं बल्कि वो हमें अपने में ही शामिल कर लेती हैं और हमारी ऊंगली थामकर उन छूपे हुए कोनों तक लेकर जाती हैं जंहा कोहरे से ढंके पहाड़ हैं या जंगलों के बीच से गुज़रती पतली पगडंडियाँ  या पहाड़ी झरने का चुपचाप सा बहना . इन चित्रों को देखते हुए लगता है मानो हम समय और आकारों से परे किसी और ही दुनिया में हैं जिसकी प्रमाणिकता और ईमानदारी असंदिग्ध और अक्षुण है .


आज़ादी से पैदा हुए मोहभंग ने लगभग सभी कलाकारों ,लेखकों और बुद्दिजीवियों को प्रभावित किया था जिससे राम कुमार भी अछूते नहीं रहे थे शायद यही कारण है कि उनके शुरू के चित्रों में हमें उजाड़ ,उदास औए ऊबे ,तपे हुए असहाय चेहरे दिखाई देते हैं ,इन चित्रों में वो टूटा हुआ सपना था ,जो हज़ारों युवाओं ने आज़ादी को लेकर बुना था और ये चेहरे इन टूटे हुए सपनों  की बानगी ही था .उनके आरंभिक चित्रों में भारतीय माध्यम वर्ग, विचलित संत्रस्त  बेरोजगार युवा पीढ़ी ,शोषित शापित मज़दूर, उजाड़ मकानों के सामने खड़े बेघर लोग, नाउम्मीदी से भरी खिड़कियाँ, जीर्ण शीर्ण दरवाज़े और बेहद उदास शहर नज़र आता है और इन चित्रों के आगे खड़े हम भी उतने ही असहाय हो जाते हैं जितने इन चित्रों में उभरते चेहरे ,पर राम कुमार कभी भी दर्शकों से इन असहाय चेहरों के लिए कुछ मांगते नहीं सिर्फ इस अंधेपन के खिलाफ कैनवास पर उन्हें चित्रित करते हैं आखिर ये उनके स्वंय का भोगा हुआ यथार्थ भी था. इस दौर कि रचनाओं में दया और करुणा का भाव कभी भी बीमार किस्म  की चिपचिपी भावुकता से ग्रस्त नहीं हुआ बल्कि उनमे एक ख़ास किस्म का तीखापन है जो दर्शकों के भीतर दुःख,अपराधबोध और गुस्से का मिलाजुला भाव पैदा करते हैं.


"यह काफी नहीं कि तुम इस दुनिया को एक माया कि तरह अनुभव कर सको, तुम्हे माया के यथार्थ को भी जानना होगा. वास्तव में इन दोनों सत्यों को - यथार्थ कि माया और माया के यथार्थ को एक साथ और एक समय में पकड़ने  की कोशिश करनी चाहिए. तभी यह संभव हो सकेगा कि हम दुनिया के साथ पूरी तरह जुड़कर भी पूरी तरह निस्संग रह सकें ."


राम कुमार के भाई और प्रख्यात कथाकार निर्मल वर्मा कि डायरी के ये अंश मुझे राम कुमार के चित्रों के सन्दर्भ में बेहद सटीक जान पड़ता है.जंहा एक ओर वे अपने शुरुआती चित्रों में " यथार्थ कि माया " को पकड़ते हैं तो वंही दूसरी ओर १९६० में बनारस कि यात्रा ने जैसे " माया के यथार्थ " से उनकी मुलाक़ात करा दी . 

१९६० में जब राम कुमार बनारस जाते हैं तो अचानक ही उन्हें अपने चित्रों के लिए एक नई उर्वर  ज़मीन देखने को मिलती है. गायों कि धूल उड़ाती झुण्ड, मंदिर कि घंटियाँ,घाट पर अधनंगे नहाते साधू-सन्यासी,सामान्यजन और उनकी तर्कातीत श्रद्धा,और पाप और पुण्य का लेखा-जोखा,पुराने मकान और गलियां,विधवाएं और मणिकर्णिका के घाट, जलते हुए शवों पर विलाप करते हुए परिजन और पार्श्व में चुपचाप बहती गंगा. ये जैसे उनके लिए जीवन और मृत्यु की सीमा रेखा थी . एक अनूठा मायालोक जंहा गंगा और उसके घाट और शहर और उसमे बसते लोगों की दिनचर्या सब आपस में ऐसे घुली मिली थीं की उन्हें एक दुसरे से अलग करके देखना असंभव था ,जंहा हर दृश्य अपने में एक कम्पोजिसन ,रंगों और रेखाओं का अनूठा रचना संसार था. यंहा राम कुमार अपने अनुभवों की गहराई में जाकर देखने की एक नई ही भाषा ईजाद करते हैं ,जिस तरह राजस्थान ने हुसैन के रंगों में प्राण फूंके कुछ इसी तरह बनारस के अनुभव ने राम कुमार को एक नई उर्जा दी.

वे स्वंय एक जगह लिखते हैं - "मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह मेरे लिए इतना महत्वपूर्ण होगा ,सिर्फ एक कलाकार के रूप में ही नहीं बल्कि एक मनुष्य होने के नाते भी. इसकी छाया एक लम्बे अरसे तक मेरे मन पर बनी रही ." उन्होंने १९६०-64 के बीच बहुत से बनारस के सिटीस्केप्स बनाए और थोड़े थोड़े अंतरालों में अक्सर वो बनारस भी जाते रहे ,हम अब तक उनके लैंडस्केप्स में बनारस कि छवियों को ढूंढ सकते हैं . बनारस पर वो निरंतर काम करते रहे जाने के बाद भी बार-बार लौटकर बनारस आते रहे , शायद यही " माया का यथार्थ " है . 


राम कुमार का व्यक्तित्व दुसरे कलाकारों की  भांति कभी विवादस्पद नहीं रहा ,वे बहुत ही संकोची स्वभाव के हैं और अपने बारे में या अपनी रचना के बारे में ज्यादा नहीं कहना चाहते. अपने चित्रों के सन्दर्भ में रामकुमार कहते हैं - " जब कभी उनके(चित्रों) विषय में कुछ प्रश्न पूछे जाते हैं, तो ईमानदारी के साथ कुछ भी कहना मुझे लगभग असम्भव सा जान पड़ता है. जब मै स्वंय ही इनके बारे में कुछ नहीं जानता तो दूसरों को क्या बतला सकता हूँ ,सिवाय इसके कि इसकी  रचनाप्रक्रिया क्या थी ? "

निर्मल वर्मा के शब्दों में, " प्रकृति का कोई अर्थ नहीं है वह या उसका अर्थ उसकी अनिवार्यता में निहित है ,जो है वही उसका अर्थ है. जब कोई कलाकृति इस अनिवार्यता को उपलब्ध कर लेती है तो वह इतने सम्पूर्ण रूप से अर्थवान हो जाती है कि उसे अर्थहीन भी कहा जा सकता है ."

राम कुमार की कला प्रकृति  की तरह ही अपनी अनिवार्यता को  उपलब्ध कर पाने में सक्षम रही है. निसंदेह वे एक महान कलाकार हैं तथा आज भी कलाकार के रूप में सक्रिय हैं , हमारी पीढ़ी के लिए वो एक दिशा-निर्देशक  की  तरह हैं . उनका स्वास्थ्य हमेशा इसी तरह अच्छा बने रहे इसके लिए हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं.


30 मई 2012

आज इक ख़ामोश मातम-सा हमारे दिल में है

अपने दिल का हाल यारो, हम किसी से क्या कहें;
कोई भी ऎसा नहीं मिलता जिसे अपना कहें।

हो चुकी है जब ख़त्म अपनी ज़िन्दगी की दास्ताँ
उनकी फ़रमाइश हुई है, इसको दोबारा कहें !

आज इक ख़ामोश मातम-सा हमारे दिल में है:
ख़ाब के से दिन हैं, वर्ना हम इसे जीना कहें।

यास! दिल को बांध, सर पर जल्द साया कर, जुनूँ
दम नहीं इतना जो तुमसे साँस का धोका कहें।

देखकर आख़ीर वक़्त उनकी मौहब्बत की नज़र
हम को याद आया वो कुछ कहना जिसे शिकवा कहें।

उनकी पुरहसरत निगाहें देख कर रहम आ गया
वर्ना जी में था कि हम भी हँस के दीवाना कहें।

काफ़िले वालो, कहाँ जाते हो सहरा की तरफ़,
आओ बैठो तुमसे हम मजनूँ का अफ़साना कहें।

मुश्कबू-ए-जुल्फ़ उसकी, घेर ले जिस जा हमें,
दिल ये कहता है, उसी को अपना काशाना कहें।

शमशेर बहादुर सिंह

26 मई 2012

कुछ भी गलत नहीं था !!

भागकर जाने के लिए बहुत सी जगहें थीं जहाँ कभी भी जाया जा सकता था इसलिए इस बात से कोई तसल्ली नहीं मिलती थी कि   कहीं जाया जा सकता है. तसल्ली के लिए मरे हुए लोग थे और बहुत लंबी दुपहरें, जिसमे सारी शिकायतें झूठी लगती थीं और एक असली बात को स्वीकारने से पहले बहुत सी नकली बातों को फिर-फिर दुहराना होता था....इसीलिए वो अपने कमरे में बैठा रहता था, लिखने की मेज़ पर आधा जागते और आधा सोते हुए. यंहा मई की दुपहरें इतनी चुप होती थीं की कुत्ते भी सड़क पर से बिना भौंके ही गुज़र जाते थे और खिड़की के बाहर खड़े पेड़ हम जिंदा हैं कहने भर के लिए बीच-बीच में अपना सिर हिला देते थे. बस इतना ही...

बेटा- आप?
बाप- हाँ मै, क्यूँ...हैरान से लग रहे हो?
बेटा- नहीं तो, मैंने कल ही आपको सपने में देखा था.
बाप- मै तुम्हे रोज ही देखता हूँ.
बेटासपने में?
बाप- नहीं वैसे भी.
बेटा- मै यकीन नहीं करता?
बाप- तुमने कभी नहीं किया.

सचमुच उसने अपने बाप पर कभी यकीन नहीं किया उसे लगता था की किसी दिन भी वो सोकर उठेगा और वे उसे और उसकी माँ को छोड़कर जा चुके होंगे. और होता भी यही था अचानक एक दिन वो सुबह सोकर उठता और माँ बतातीं की पिताजी पंजाब के किसी शहर चले गए जंहा दूर दूर तक सरसों के खेत होते हैं और शायद कुछ दिनों बाद हम भी वो खेत देखें. खेतों से उसे बचपन के दिन याद आते थे और चिथडे काले कपड़ों में लिपटे बिजूका जो खेत और दोपहर के सन्नाटे में अकेले उदास खड़े रहते थे, जिनसे उसे तब बहुत डर लगता था.

बेटा- बचपन में करता था, तब आप से डरता भी बहुत था.
बाप- सुनकर मुझे खुश होना चाहिए?
बेटा- अपनी खुशी छुपाना आता है आपको.
बाप- पर तुम्हे अपना डर छुपाना नहीं आता, तुम हमेशा से ही डरपोक थे.
बेटा- आप मर चुके हैं और एक भूत की बातों का मै बुरा नहीं मानता वैसे मैंने तो अपने आस पास के जिंदा लोगों की बातों पर भी ध्यान देना बंद कर दिया है..
बाप- हा हा हा... तुम बिलकुल अपनी माँ की तरह हो, हर बात की सफाई देते हो, बोलते हुए भी मिनमिनाते हो.
बेटा- क्या हम कुछ और बात नहीं कर सकते??
बाप- नाटक बंद करो, जिस बात के लिए बुलाया है वही बात कर रहा हूँ...

कौन सी बात?? वो सोचने लगता, पिछली बार हम कहाँ अटक गए थे कंहा रुक गए थे. वो रसोई में चला आता, नल खोलते ही गरम पानी की धार, दरअसल गर्मी के दिनों में दोपहर होते तक छत के ऊपर लगे टंकी का पानी गर्म हो जाता था वो नल से मुह लगाकर पानी पीता और आकर बिस्तर पर लेट जाता. कौन सी बात ?? हाँ मुझे एक सुराही लाना है बाज़ार से ताकि ठंडा पानी पी सकूँ. वो सोचता और ठन्डे पानी से उसे माँ की याद आती. माँ को वो बहुत कम याद करता था, उसने हमेशा अपने पिता के बारे में ही सोचा जब वो जिंदा थे तब भी और उनके मरने के बाद भी. उसे कभी कभी लगता था की वो सचमुच थोडा बहुत अपनी माँ की तरह है. माँ को शायद बहुत सी शिकायतें रही हों पर वो उनके साथ ही मर गई उन्होंने कभी नहीं कहा की उन्हें इस या उस बात से कोई शिकायत है.
 
बाप- उसका बोलना, होना, करना, जीना सब कुछ माफ़ी मांगने जैसा था, मुझे उसके लिए शर्म आती थी.
बेटा- और मुझे आपके लिए अब तक आती है...
(चुप्पी)
वो आप से प्यार करती थीं.

(ये शब्द कहते ही उसे अजीब सी शर्म आई.)

बाप- प्यार??? ज़रा ध्यान से इस शब्द को सुनो, तुम्हे ये बहुत सस्ता सा सुनाई नहीं पडता. अगर तुम्हारे पास है तो तुम बेशर्मी से इससे इंकार कर सकते हो, ये मोडेस्टी है. और अगर नहीं है तो कविताएँ लिखो इस पर, कहानिया बुनो या बेकार ही उन लोगों के लिए रोने का दिखावा करो जो किसी फालतू के दंगों में मर रहे हैं या भूख से आत्महत्या कर रहे हैं...

दिखावा ?? क्या सचमुच वो सब दिखावा था, वो सोचते हुए मेज़ के पास की अपनी कुर्सी खींचकर बैठ जाता. खिडकी से बाहर देखता, अभी जामुन के फल कच्चे हैं , बारिश आने में वक्त है..
 
बाप- तुम्हे याद है तुम अपने फाइनल ईयर की छुट्टियों में घर आए थे और सारा दिन घर से बाहर शहर की सड़कों पर भटकते थे और फिर रात गए तक छत पर. तुम सारा दिन बौखलाए हुए से रहते थे. जाने से एक रात पहले तुमने अपनी माँ से झगडा भी किया था झगडे की वजह थी मेरे  दूसरी औरतों के साथ सम्बन्ध. हाँ.... मैंने भी इसे इसी तरह से समझा ,मेरे दूसरी औरतों के साथ सम्बन्ध….

बेटा- बेकार में भूमिका क्यूँ बाँध रहे हैं,सीधे पॉइंट पर आइए
बाप- ठीक है तो सुनो, मुझसे तुम्हारे नफ़रत की वजह एक बेटे के तौर पर कभी थी ही नहीं, तुम जलते थे उस आदमी से जिसके घर में एक बीवी है जो उस आदमी की हर बात मान लेती है वो पचास की उम्र का है और घर से बाहर वो किसी दूसरी औरत के साथ सोता है उसका एक बेटा है २४ साल का जो कंही बाहर पढता है और जिसमे इतनी हिम्मत नहीं की वो अपने पिता से सामने खड़े रहकर सवाल कर सके क्यूंकि वो सामाजिक सन्दर्भ में कहें तो विनम्र है या शायद कायर है . तुम उस आदमी को देखकर हैरान रह जाते हो तुम समझ नहीं पाते की आखिर तुम मे क्या कमी थी तुम्हे क्यूँ ठुकरा दिया गया आखिर तुम भी उसी आदमी का ही हिस्सा हो जो पचास की उम्र में भी तुम्हारी समझ से कहूँ तो ऐश कर रहा था, तुम चाहते थे उस आदमी के भीतर गिल्ट हो एक खराब पिता और कमीना पति होने के लिए तुम चाहते थे की..

बेटा- बस बहुत हो गया, आप मुझसे इस तरह बात नहीं कर सकते.

किस तरह की बात?? वो सोचने लगता, वो सोचता बहुत था. क्या माँ भी बहुत सोचती थीं?? नहीं.. चुप रहने का मतलब सोचना नहीं होता. पर वो बहुत सोचता था इसीलिए उसे गुस्सा भी आता था और शर्म भी और बाद में पछतावा भी फिर उसे जलन होती थी उन लोगों से जो नहीं सोचते थे या कम सोचते थे वो सारे लोग उसे अपने पिता की तरह लगते थे जो खुद पर कभी शक नहीं करते थे वे बस मान लेते थे की चलो ये तुम्हारा सच है और ये मेरा वाला सच है अब गाना गाते है.

बेटा-  हाँ ये सच है, मै थोडा बहुत माँ की तरह हूँ मै प्यार नहीं कर सकता, तब मै बौखलाया हुआ था हताश था शायद वो मेरी उम्र थी अगर मेरी समझ से कंहू तो मै सिर्फ आपकी तरह ऐश करना चाहता था पर मै आपकी तरह भी नहीं होना चाहता था की सब कुछ दिखावा है कहते हुए टीवी बंद कर सकूँ. आपका अकेलापन मुझे डराता था दूसरी तरफ माँ के ठंडेपन से मुझमे ऊब पैदा होती थी.
(चुप्पी)

जब मुझे उस दूसरी औरत के बारे में पता चला तो सबसे पहले जो ख़याल आया वो ये था की वो देखने में कैसी होगी और सच कंहू तो वो इतनी भी खूबसूरत नहीं थी की मुझे आपसे जलन होती. हाँ ये सच है की तब आपसे कुछ शिकायतें थीं...
बाप- और अब??
बेटा- अब??
बाप- हाँ, इतने सालों बाद अब तुम क्या सोचते हो, अब तो तुम्हारी माँ भी नहीं जो मासूमियत से ये कहे की टीवी पर चलते न्यूज़ रील ने तुम्हे परेशान कर रखा है.
बेटा- आपको याद है आप अक्सर कहते थे की गोली मारने से पहले शिकार की आँखों में देखना होता है इससे उसकी तकलीफ कम हो जाती है और अपने जीने के लिए उम्मीद बंधता है.
बाप- वो मेरे मिलिट्री के अनुभव थे.
बेटा- हाँ पर इस बात को मैंने बहुत बाद में समझा. आपके मरने के बाद. हर बार ऐन वक्त पर मै अपनी आँखे फेर लेता था, अपनी उस आदिम भूख को झुठलाते हुए जिसमे कुछ भी गलत नहीं था...
बाप- कुछ भी गलत नहीं था !!
बेटा- मै अकेले रहता हूँ, शादी नहीं की अब तक. हिम्मत भी नहीं होती, आप अपनी नौकरी के लिए शहर बदलते थे मै अपनी सुविधा से या कह लें दुविधा में शहरें बदलता हूँ...
बाप- और औरतें भी.
(लंबी चुप्पी)

बेटा- अपने आखिरी दिनों में माँ सारा सारा दिन आपके स्टडी रूम में बैठी रहती थीं कई बार वंही सोफे पर सो जाती थीं. मुझे उन दिनो समझ में आया की प्यार जैसी कोई चीज़ नहीं होती आदतें होती हैं, ऊब होता है, आप खाते हैं पीते  हैं हगते हैं मुतते हैं काम पर जाते हैं घर आते हैं लोगों से मिलते हैं शहर बदलते हैं और इंतज़ार करते रहते हैं किसका ये बहुत ज्यादा मायने नहीं रखता क्यूंकि आखिर में तो मरना ही है और एक दिन माँ मर गई वंही स्टडी रूम में सोफे पर जंहा आप बैठते थे मुझे लगता है वो बहुत सुकून से मरीं.

उसे सचमुच ऐसा ही लगता था की माँ बहुत सुकून से मरीं. उसने माँ के अकेलेपन के बारे में कभी नहीं सोचा. कुछ लोग अपने अकेलेपन में इतने पूरे होते हैं की आप उन्हें देखकर रो भी नहीं सकते.

बाप- एक बार हम एक रेस्त्राँ में बैठे थे मै और तुम्हारी माँ. ऐसा बहुत कम ही होता था की हम एक साथ कभी कंही बाहर जाएँ. मैंने उससे पूछा तुम क्या खाओगी आर्डर करो और उसने कहा जो भी आप कहो. मुझे गुस्सा आया और मै उसे वंही छोडकर बाहर चला आया, उसके बाद मै पछताता रहा फिर जब इस बात के लिए मैंने उससे माफ़ी मांगी तो जानते हो उसने क्या कहा..
बेटा- क्या?
बाप- यही की मुझे इस बात को भूल जाना चाहिए और वो मुझसे बिलकुल भी नाराज़ नहीं.
(चुप्पी)

बेटा- ठीक है मै आपको समझ रहा हूँ पर क्या उनके सच कहने से बात बदल जाती.
बाप- हाँ बदल जाती और तुम मुझसे इतनी नफ़रत नहीं करते.
(चुप्पी)

बेटा- मुझे नहीं मालूम था की आप माँ को इतना चाहते थे.
बाप- पर उसे मालूम था, शायद यही उसके नफ़रत की वजह थी.
बेटा- आप उनसे मिले थे ?
बाप- नहीं. पर तुम मिल सकते हो.
बेटा- वो कैसे?
बाप- जैसे मुझसे मिल रहे हो.
बेटा- हम्म
(चुप्पी)

बाप- अब मुझे जाना चाहिए.
बेटा- पर आप तो बहुत पहले ही जा चुके हैं अब जाने के लिए कौन सी जगह है.
बाप- इस कहानी और दोपहर के बाहर बहुत सी दूसरी जगहें हैं जंहा मै जा सकता हूँ.

दूसरी जगहें हमेशा लौटने के लिए होती हैं इसीलिए आप बार बार लौटकर उस एक दोपहर में आतें हैं जंहा बहुत साल पहले आपने किसी को खो दिया था, आप उनसे कहना चाहते थे कि आपको भी फर्क पड़ता है. पर ऐसी दुनिया में जंहा किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था ऐसा सोचना भी कहानी लिखने जैसा हो जाता था. पर कहानी कभी पूरी नहीं होती थी इसीलिए दुपहरें फिर दुपहरों की तरह ही बार बार लौट आती थीं जिसमे कुत्ते ऊंघते थे और पेड़ बीच बीच में भौंककर फिर सो जाते थे.


शैलेन्द्र की अन्य रचनाएँ पढने के लिए इस लिंक पर जाएँ।   

23 मई 2012

अब मैं 85 का हो चुका हूं...

कुछ  महीनों पहले स्वीडिश लेखक  यान मिर्डल अपनी नई किताब के लोकार्पण के लिए भारत आये थे. वो करीब महीनेभर भारत में रहे. इसके बाद पिछले हफ्ते भारत सरकार के एक मंत्री ने संसद में जैसा बयान दिया उससे ऐसी आशंका जाहिर हुयी है कि भारत सरकार उनपर प्रतिबन्ध लगाने की मंशा रखती है जिससे वो आगे से कभी भारत न आ सकें ! इसी सम्बन्ध में मिर्डल ने स्वीडेन के विदेश मंत्री को एक पत्र लिखा. पत्र से जाहिर है कि ८५ साल का यह यह वृद्ध वर्तमान कांग्रेसी सरकार से ज्यादा साहसी है.

               
श्री कार्ल बिल्
विदेश मंत्री

 मेरा यह पत्र आपको निजी नहीं है बल्कि आपके स्वीडेन का विदेश मंत्री होने के नाते है। ऐसे पत्र ''सूचना की स्वतंत्रता के कानून'' के दायरे में नहीं आते। चूंकि इस पत्र में वही सूचना मौजूद है जो सार्वजनिक दायरे में है, या होनी चाहिए, इसलिए मैं इसे भारत में भी प्रकाशित होने दूंगा। मैं ऐसे मामलों में वही करता हूं जो गुन्नार मिर्डल किया करते थे और बिल्कुल सीधी भाषा में लिखता हूं।

मुझे अपेक्षा है कि दिल्ली में हमारे दूतावास को उच्च सदन में गृह राज् मंत्री जितेंद्र सिंह द्वारा मेरे बारे में दिए गए भाषण की प्रति प्राप्त  हो गई होगी। मुझे उसकी एक प्रति चाहिए जिससे मैं सिर्फ अखबारी आलेखों के भरोसे रह जाऊं। मैं उम्मीद करता हूं कि दूतावास मुझे यह भेज सकता है। इसके अलावा, अखबारी रिपोर्ट के आखिरी वाक्य में जितेंद्र सिंह के हवाले से कहा गया है, ''सरकार करीब से हालात पर नज़र रखे हुए है। ऐसे मसले नियमित तौर पर संबद्ध देशों के साथ कूटनीतिक स्तर पर उठाए जाते हैं।''  क्या इसका मतलब यह हुआ कि भारत सरकार मेरे बारे में स्वीडेन के दूतावास से पूछताछ कर चुकी है?

मैंने अपनी नई किताब (रेड स्टार ओवर इंडिया) के भारत में लोकार्पण के लिए कॉन्फ्रेंस वीज़ा हेतु आवेदन किया था और यह मुझे मिल भी गया (जो काफी महंगा था) वीज़ा आवेदन के साथ मेरे स्वीडिश प्रकाशक (स्टॉकहोम में लियोपर्ड) की ओर से लिखित में एक आर्थिक गारंटी तथा कोलकाता के मेरे प्रकाशक (सेतु प्रकाशन) कोलकाता पुस्तक मेले की ओर से आमंत्रण भी नत्थी था। कोलकाता में मेरे आगमन के बाद मेरे प्रकाशक से कहा गया कि वह मेरे रहने की जगह और भारत में सार्वजनिक उपस्थिति की जगहों की सूचना प्रशासन को देता रहे। उसने वैसा ही किया। 

किताब का लोकार्पण कोलकाता, हैदराबाद, लुधियाना और दिल्ली में विभिन् संगठनों ने अलग-अलग बैठकों में किया। मैंने जो कुछ कहा, वह छपा और/या नेट पर आया।

आप देख सकते हैं कि गृह राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने  राज्यसभा में मेरे बारे में जो कुछ कहा और 20 मई 2012 को जी न्यूज के मुताबिक गृह मंत्रालय की प्रवक्ता इरा जोशी ने जनवरी/फरवरी 2012 के मेरे भारत दौरे के बारे में बताया, वह तथ्यात्मक रूप से गलत है। दूसरे शब्दों में कहें तो जो है ही नहीं, उसे वे ''राजनीतिक वजहों'' से कह रहे हैं।

तो आखिर इसकी राजनीतिक वजहें क्या हैंइन्हें समझने के लिए कोलकाता से छपने वाले टेलीग्राफ का 18 मई का अंक पढ़ा जाना चाहिए जिसमें निम् छपा है:

"Maoist spam in PC mailbox

NISHIT DHOLABHAI

New Delhi, May 17: When faxes don’t work, blitz the home minister’s email from abroad.

P. Chidambaram’s email ID has been bombarded with messages from the West, calling for the release of an activist and an alleged Maoist sympathiser, provoking curiosity about the foreign appeal for something so 'local'."

ज़ाहिर है, भारत सरकार भारतीय मामलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रही जानकारी और दिलचस्पी से बहुत परेशान है। 

पिछले साल 12 जून को मैंने और अरुंधती रॉय ने लंदन में भारतीय जनता के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की ज़रूरत पर बात की थी। हम दोनों ने भारत में खबरों को अजीबोगरीब तरीके से दबाए जाने पर बात रखी। भारत में जो बहस-मुबाहिसे चल रहे हैं, वे हमारे पश्चिमी मीडिया में नहीं पाते। ऐसा नहीं कि यह भारत में किसी सरकारी सेंसरशिप के चलते है (जैसा द्वितीय विश् युद्ध के दौरान ब्रिटिश ने किया था) यह हमारे मीडिया के संपादकीय ''चौकीदारों'' की सेंसरशिप के कारण है (और भारत में हमारे पत्रकारों की खुद पर लगाई सेंसरशिप के कारण भी)

इसमें कुछ भी नया नहीं है। हाल ही में स्वीडन में ''ओरिएंटल सोसायटी'' के एनिवर्सरी अंक में मैंने लिखा था कि कैसे तटस् स्वीडन के भीतर भारत से जुड़ी खबरें (यहां तक कि ''भारत छोड़ो आंदोलन'', बंगाल का नरसंहारक अकाल और ''इंडियन नेशनल आर्मी'' की खबरें भी) दबा दी गई थीं। ये आपके पैदा होने से पहले की बातें हैं, इसलिए मैंने आगामी अंक में जो लिखा है वो आपको पढ़ना चाहिए। (मैंने एडम वॉन ट्रॉट ज़ू सोल्ज़ के बारे में भी लिखा है जब वे मेरे पिता से मिलने जून 1944 में हमारे घर आए थे, तो दरवाज़ा मैंने खोला था। वह 20 जुलाई की योजना के बारे में मेरे पिता की मदद से स्वीडन में मौजूद अमेरिकी और सोवियत सुरक्षा प्रतिनिधियों को सूचित करना चाहते थे। ये सब आपके विदेश विभाग की फाइलों में दर्ज है, आप जान सकते हैं उनसे कि मित्र राष्ट्रों ने मदद करने से इनकार क्यों कर दिया। आपने हालांकि ये नहीं सोचा होगा कि आखिर ब्रिटिश एमआइ6 ने एडम की ''सुपारी'' क्यों ली थी- ठीक वैसे ही जैसे उसने सुभाष चंद्र बोस के साथ किया जब वे भारत से भाग गए थे।

सभी देशों में भारत की जनता के साथ बढ़ती एकजुटता के आंदोलन ने वहां के बारे में सूचनाओं के प्रवाह को तेज़ किया है। मैं सलाह दूंगा कि आप, या कम से कम दूतावास ही सही, नेट पर indiensolidaritet.org को फॉलो करे। इस पर भारत के बारे में खबरों की व्यापक और निष्पक्ष कवरेज होती है (और व्यापक बहुपक्षीय नज़रिये की अंतरराष्ट्रीय ज़रूरत पर विभिन् सदस्यों के बीच ठोस मुक् बहस भी) इसे देख कर आपको पचास साल पहले वियतनाम के लिए एकजुटता आंदोलन की याद ताज़ा हो आएगी कि कैसे उसने पचास के दशक के अमेरिकापरस् प्रभुत्ववादी मीडिया को बीस साल बाद ज्यादा मुक् और उदार नीति वाले मीडिया में तब्दील करने का काम किया। (याद करें कैसे बड़े अखबारों जैसे Dagens Nyheter में बदलाव आए- और ध्यान रहे कि जिस तरीके से यह सूचना तंत्र नीचे से काम करता है सरकारी शराब के ठेकों के बाहर बुलेटिन बेचने जैसे काम इत्यादि- इसने आखिरकार स्वीडन की विदेश नीति तक को बदल डाला)

मैं दिल्ली के दूतावास में किसी को नहीं जानता। मैं अब हालांकि उनके दादा की उम्र का भी तो हो चला हूं। लेकिन मुझे आशंका है कि वे स्वीडिश पत्रकारों के आग्रहों-दुराग्रहों को साझा करते हैं। हमारे देश के लिए यह बेहतर होगा यदि वे कहीं ज्यादा व्यापक और दीर्घकालिक नज़रिया अपनाते। भारत में सूचनाएं मौजूद हैं। यह देश तानाशाही दौर वाले चिली या सोवियत संघ जैसा नहीं है।

मेरे खिलाफ भारत सरकार की मौजूदा प्रतिक्रिया सामान् लेकिन अतार्किक है- यह वैसी ही प्रतिक्रिया है जैसी अन् देश करते हैं जब उनके खिलाफ सही सूचाओं पर आधारित अंतरराष्ट्रीय राय पैदा होती है। हालांकि भारत सरकार के इस सनक भरे व्यवहार की एक और वजह है। मुझे उम्मीद है कि दूतावास इस पर निश्चित ही ध्यान दे रहा होगा। यदि आप तीस साल पहले मेरे लिखे को देखें तो पाएंगे कि उसके मुकाबले हालात अब बदल रहे हैं। उस वक् नक्सलबाड़ी से प्रेरित राजीतिक आंदोलन, वाम, तेलंगाना के संघर्ष और अन् जनप्रिय उभार आपस में गहरे बंटे हुए थे और बाद में इन आंदोलनों में और बंटवारे हुए। (इसकी ठोस वजहें थीं, मैंने इस पर लिखा भी है) आज हालात जुदा हैं। मुख् माओवादी पार्टी और समूहों ने मिल कर अखिल भारतीय पार्टी सीपीआई(माओवादी) बना ली है। इतना ही नहीं, विभिन् विचारधारात्मक अंतर्विरोधों के बावजूद अन् समूह भी आज भारतीय जनता के समक्ष खड़े बड़े सवालों पर सहमत हो रहे हैं। सामाजिक अंतर्विरोध भी ऐसे हैं कि छात्रों का एक बड़ा तबका और ''मध्यवर्ग'' लोकतांत्रिक सामाजिक बदलाव चाह रहा है। 

एक ठोस उदाहरण लें। हैदराबाद में मैं 1980 के दौर के अपने कुछ पुराने दोस्तों से मिला। उस दौर में जब हम भूमिगत होकर आंध्र प्रदेश में सशस्त्र दलों से मिलने गए थे, तो ''प्रतिबंधित इलाकों'' में स्थित उनके घरों में रुके थे। अब वे प्रतिबंधित नहीं, कानूनी हैं। वे चुनाव में हिस्सा लेते हैं। इस तरह उनके और सीपीआई(माओवादी) के बीच काफी गहरे विचारधारात्मक और राजनीतिक मतभेद हैं। उनमें गर्म बहसें होती हैं, लेकिन वे दुश्मन नहीं हैं। जनरल सेक्रेटरी गणपति के साथ साक्षात्कार में आप देख सकते हैं कि उन्होंने कैसे इन सब चीज़ों पर बात की (ये बात, कि मैंने अपने भारतीय मित्रों को इस बारे में कुछ ''सुझाव'' दिए, इतना मूर्खतापूर्ण है कि उस पर हंसी भी नहीं आएगी)

(यही तस्वीर आपको  सीपीआई के भी बड़े हिस्से में देखने को मिलेगी। यह अनायास नहीं है कि भारत पर मेरे काम और मेरी पुस्तक के बारे में सबसे ज्यादा यदि यूरोप के किसी अखबार ने लिखा है तो वो है "Neues Deutschland", आखिर क्योंसोवियत संघ के आखिरी वर्षों में मैं उस अखबार से जुड़ा हुआ था। अब यूरोप की तस्वीर बदल चुकी है और फिलहाल जर्मनी के "Linke"के- जो कि "Neues Deutschland" के काफी करीब है- सीपीआई के साथ पार्टीगत रिश्ते हैं।)

भारत सरकार ने मुझे ''प्रतिबंधित'' कर दिया है, यह बहुत अहमियत नहीं रखता। पहले भी मुझे कई सरकारों ने प्रतिबंधित किया है (याद करिए मॉस्को मुझे किस नाम से पुकारता था) मेरी फाइलों को देखिएगा तो पता चलेगा कि 1944 (मैंने वाईसीएल की कांग्रेस पर बोला था जिसके बाद मुझे प्रवेश नहीं करने दिया गया था) के बाद से अमेरिका ने बार-बार मुझे प्रतिबंधित किया है और बाद में खुद आधिकारिक स्तर पर न्योता भी दिया। अब मैं 85 का हो चुका हूं, लिहाज़ा ऐसा देखने के लिए मेरे पास उम्र बची नहीं, हालांकि यह बात कोई बहुत मायने नहीं रखती।

ज़रूरी बात यह है कि स्वीडेन  के राष्ट्रीय हित में आपको यह सुनिश्चित करना है कि दक्षिण एशिया के विदेश कार्यालयों में काम कर रहे आपके अफसर स्वीडिश  मीडिया की मौजूदा तंग सोच को छोड़ कर एक व्यापक व्यापक नज़रिया अपनाएं।

 आपका
 यान मिर्डल
 20 मई 2012
अनुवाद - अभिषेक श्रीवास्तव,  (जनपथ से साभार).