16 अगस्त 2009

यह तमाशा......किसके लिए ?



हम आजाद हैं। आजाद होने की खुशी लफ्जों में बयां नहीं की जा सकती। तो चलो करोड़ो रूपए खर्च करके इंडिया गेट से लाल किला तक परेड कराई जाए। अपनी जेब से तो पैसा जाना नहीं है। तो खर्च करो ,जम कर खर्च करो। पिछली सरकार के वक़्त जैसा तमाशा हुआ था उससे अच्छा होना चाहिए। उससे शानदार होना चाहिए। भाई यह तो सोच हुई अपने नेताओं की ।लेकिन आप और हम ?
हम तो आम इंसान हैं। मैंगो पिपुल। हमारी कमाई कई साल से पानी की तरह बहाई जा रही है और हम हैं की टीवी पर प्रदेशों की झाकियां देख कर खुश हैं.

एक देश एक परिवार होता है जहाँ हर किसी को एक दूसरे के दुःख को समझना चाहिए। क्या परिवार में यही होता है की कोई सदस्य भूख से मर रहा हो और बाकी सदस्य पार्टी एन्जॉय कर रहे हो ? मुल्क के किसान खुदकुशी कर रहे हैं, पूरा-पूरा परिवार पानी में ज़हर मिला कर पी जाता हैं। क्यूंकि गरीबी सही नहीं जाती।. न जाने कितने लोग इलाज न मिलने के कारण दम तोड़ देते हैं। कितने लोग दवाई न मिलने की वजह से मौत को गले लगा लेते हैं। हजारों बच्चे मिड-डे मील का खाना खाकर बीमार पड़ रहे हैं। कितने ही बच्चे कुपोषित जिस्म लेकर सड़कों पर नज़र आते हैं। इन सबके बावजूद राष्ट्रीय धन कोष का एक बहुत बड़ा हिस्सा १५ अगस्त और २६ जनवरी के सेलेब्रेशन में खर्च होता है. कई लोगों का मानना है कि ये राष्ट्रीय गौरव की बात है, झांकियों का निकलना, जवानों का परेड करना ये सब देश की तरक्की को दर्शाता है !!

भई, जिन जवानों को देख कर गर्व होता है उनकी बुनियादी ज़रूरतों के बारे में सोचो। जिन प्रदेशों की झाकियां देख कर सर ऊँचा हो जाता है उनके यहाँ पानी और बिजली की सुविधाओं के बारे में सोचो। और जिन बच्चों को परफोर्म करते देख ख़ुशी से फूले नहीं समाते, कम से कम उनके भविष्य के बारे में ही सोच लो।

हर साल १५ अगस्त के मौके पर दिल्ली पुलिस की 196 कंपनियां, सेंट्रल पैरामिलिटरी फोर्सेस की 55 कंपनियां, तकरीबन 800 कमान्डोज और तकरीबन 35 हज़ार पुलिस के नौजवान व्यस्त रहते हैं यानी उस वक़्त वो सिर्फ १५ अगस्त के सेलेब्रेशन की तैयारी करते हैं. इतना झमेला, इतना पैसे की बर्बादी किसलिए ?

अपनी नाक बचाने के लिए ? या जनता को उलझाने के लिए ?

मैंगो पिपुल तो इस तामझाम को टीवी पर देख पाता है। आधी से ज्यादा आबादी के पास तो टीवी ही नहीं है। जिनके पास टीवी है उनमें से आधे के पास बिजली नहीं है। अब बताइए जनता यह तमाशा कहाँ देखेगी ? चुनांचे कहीं देख भी ले तो......
तो क्या सोचेगी ?


- फौजिया रियाज

5 टिप्‍पणियां:

  1. ...देखकर तो सचमुच अफसोस होता है। बार-बार एक ही सवाल मन में उठते हैं कि ऐसा करने के पहले देश को इसक नैतिक आधार खोजने चाहिए।.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सवाल करने वालों को डराने के लिये…

    उत्तर देंहटाएं
  3. काश हम आजादी का मतलब समझ पाते.. हैपी ब्लॉगिंग

    उत्तर देंहटाएं
  4. काश हम आजादी का मतलब समझ पाते.. हैपी ब्लॉगिंग

    उत्तर देंहटाएं
  5. १८५७ की याद के सरकारी तमाशे पर भी बड़ा खर्च हुआ था. असद ज़ैदी की पंक्तियाँ-

    1857 की लड़ाइयां जो बहुत दूर की लड़ाइयां थीं
    आज बहुत पास की लड़ाइयां हैं

    ग्लानि और अपराध के इस दौर में जब
    हर गलती अपनी ही की हुई लगती है
    सुनायी दे जाते हैं ग़दर के नगाडे और
    एक ठेठ हिन्दुस्तानी शोरगुल
    भयभीत दलालों और मुखबिरों की फुसफुसाहटेँ
    पाला बदलने को तैयार ठिकानेदारों की बेचैन चहलकदमी

    हो सकता है यह कालांतर में लिखे उपन्यासों और
    व्यावसायिक सिनेमा का असर हो

    पर यह उन 150 करोड़ रुपयों के शोर नहीं
    जो भारत सरकार ने `आजादी की पहली लड़ाई' के
    150 साल बीत जाने का जश्न मनाने के लिए मंज़ूर किये हैं
    उस प्रधानमंत्री के कलम से जो आजादी की हर लड़ाई पर
    शर्मिंदा है और माफी मांगता है पूरी दुनिया में
    जो एक बेहतर गुलामी के राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए कुछ भी
    कुर्बान करने को तैयार है

    उत्तर देंहटाएं