जनसत्ता में एक छोटी सी खबर आई है। खबर महत्वपर्ण है। जेरे बहस है। उम्मीद है ब्लाग दुनिया इसपर कोई बहस चला सकेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केन्द्र से कहा कि दंडात्मक कार्रवाई से विश्व के सबसे पुराने पेशे पर पाबंदी लगाना अगर व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं हो तो क्या वह वेश्यावृत्ति को वैध बना सकता है। न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी और न्यायमूर्ति ए के पटनायक की पीठ ने सालीसीटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम से कहा-जब आप कहते हैं कि यह विश्व का सबसे पुराना पेशा है और जब आप कानून से उसपर पाबंदी लगाने में सक्षम नहीं हैं तो आप उसे वैध क्यों नहीं बना देते।
शीर्ष अदालत ने कहा कि महिलाओं की तस्करी को रोकने के लिए यौन व्यापार को वैध बनाना एक बेहतर विकल्प होगा। उसने कहा कि दुनिया में कहीं भी दंडात्मक उपायों से उसपर पाबंदी नहीं लगाई जा सकी। न्यायालय ने कहा कि यौन व्यापार किसी न किसी रूप में चल रहा है। दुनिया में कहीं भी वे कानून से उसपर अंकुश लगाने मे सक्षम नही हो सके हैं। कुछ मामलों में इसका संचालन छद्म रूप से हो रहा है।
महेन की कविता बेहतरीन है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंयह खबर हिंदुस्तान में भी आई थी... और सरकार इस पर स्वीकृति भी दे देगी... यह भी बड़ी खबर थी... वाकई दुनिया की सबसे पुरानी व्यवसाय है यह ! इस दिशा में और सोचने की जरुरत है लेकिन कोई अच्छा जवाब नहीं दे सकूँगा...
प्रत्युत्तर देंहटाएंlegalizing will at least reduce corruption
प्रत्युत्तर देंहटाएंसमस्या गंभीर है पर इलाज कैसा आये यह
प्रत्युत्तर देंहटाएंयह चुनौतीपूर्ण है .. कुछ कह पाना कठिन ..
इस तरह की सामाजिक समस्याओं के लिए कानून हमेशा नाकाफी रहा है , बल्कि पेचीदिगयाँ और भ्रस्टाचार अनाचार को बढ़ावा ही मिला है . पुलिस भी अपना रिकॉर्ड बनाने के लिए गंभीर अपराधों को छोड़कर इस तरह के सामाजिक अपराधों को पकड़ने में ज्यादा दिलचस्पी लेती है . रिकॉर्ड भी ठीक और जेब भी गरम . ये सामाजिक कानून उसी तरह के हैं, जैसे पहले मदिरा बेचने का license दो और फिर पीने वाले को जेल में बंद कर दो .
प्रत्युत्तर देंहटाएंसमस्या तो यह है ही नहीं,न कभी थी यह तो समाज में शुरू से ही एक solution के रूप में रही है...
प्रत्युत्तर देंहटाएंरहा सवाल पेशा का तो इस बाज़ार में हर किसी को अपनी वस्तु बेचने का अधिकार है...जिसके पास जो है वह बेच रहा है...तो फिर इसपे पाबन्दी कैसी, कानूनी मंज़ूरी मिल जाने से इसकी आर में होने वाले शोषण शाएद बंद हो जाये...किसी को उसकी वाजिब कीमत मिले
-आलोकधन्वा की एक कविता याद आती है...
" लड़की भागती है
जैसे सफ़ेद घोड़े पर सवार
लालच और जुए के आर-पार
जर्जर दुल्हों से
कितनी धूल उठती है!
तुम
जो
पत्निओं को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्निओं से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है
dhundhtee हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नीओं
और प्रेमिकाओं में !
अब वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में भी
जहाँ प्रणय एक पूरा काम होगा पूरा का पूरा! "
समस्या तो यह है ही नहीं,न कभी थी यह तो समाज में शुरू से ही एक solution के रूप में रही है...
प्रत्युत्तर देंहटाएंरहा सवाल पेशा का तो इस बाज़ार में हर किसी को अपनी वस्तु बेचने का अधिकार है...जिसके पास जो है वह बेच रहा है...तो फिर इसपे पाबन्दी कैसी, कानूनी मंज़ूरी मिल जाने से इसकी आर में होने वाले शोषण शाएद बंद हो जाये...किसी को उसकी वाजिब कीमत मिले
-आलोकधन्वा की एक कविता याद आती है...
" लड़की भागती है
जैसे सफ़ेद घोड़े पर सवार
लालच और जुए के आर-पार
जर्जर दुल्हों से
कितनी धूल उठती है!
तुम
जो
पत्निओं को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्निओं से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है
dhundhtee हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नीओं
और प्रेमिकाओं में !
अब वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में भी
जहाँ प्रणय एक पूरा काम होगा पूरा का पूरा! "
सुधांशु ने बिलकुल ठीक कहा - समाधान के तौर पर रही है यह व्यवस्था शुरु से । न्यायालय का प्रश्न वाजिब है ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंकानून बनना सेक्स कर्मियों के हित में होगा ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुप्रीम कोर्ट का यह सोचना सही है.पर एक वर्ग यह दलील भी देता रहा है कि इसके वैध हो जाने से पुरुष सत्ता निरंकुश हो जाएगी.औरत के पास कोई काम न हो तो पति या संरक्षक बनकर उससे यह तो करवाया ही जा सकेगा.इसे भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.भिक्षावृत्ति के साथ क्या हुआ?विकलांग बनाने का यह उद्योग-व्यापार कितनी ही जिंदगियाँ बरबाद कर रहा है.वेश्यावृत्ति के पीछे जो कारण हैं उनमें ये भी तो है एक के लिए स्वच्छंद यौन जीवन दूसरे को एक अदद विवाह भी नहीं.खैर,अच्छा विषय चुना आपने.आपसे परिचय की इच्छा थी.यहां आकर अच्छा लगा.
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