18 दिसंबर 2009

ग्राहकों को सजा हो

जब तक देह का भोग करने वालों पर शिकंजा नहीं कसा जाएगा,यह अमानवीय व्यापार जारी रहेगा। मौजूदा कानूनी ढांचा तो मजबूर औरतों पर ही अपना शिकंजा कसता है। जबकि असली दोषी तो इस व्यापार की मांग करने वाला है। अगर उन पर शिकंजा कसा जाए तो मांग कम होगी और इसमें जबरन धकेली जानी वाली या ग्लैमर के प्रभाव से इसमें लिप्त होने वाली महिलाओं की संख्या घटेगी। स्वीडन में जब तक ग्राहक को सजा देने का प्रावधान नहीं था तब तक यौन व्यापार में लोग ज्यादा सक्रिय थे। मांग ज्यादा थी लिहाजा मुनाफे के लालच में दलाल औरतों की गरीबी और जातीय मजबूरी का फायदा उठा कर उन्हें यौन व्यापार में धकलते रहते थे। कई बार नौकरी का झांसा देकर या आगे बढ़ने के बहाने भी वे औरतों को बरगला कर इस व्यापार में धकेलते रहते थे। आर्थिक रूप् से मजबूत लड़कियों को ग्लैमर की चकाचैंध में फंसा कर और इसके लिए देह व्यापार को आसान तरीका बता कर भी उलझाया जाता रहा है।

(नई दिल्ली में 12 जनवरी 2009 की प्रेस कांफ्रेस में दिए गए व्यक्तव्य का अंश।)

9 टिप्‍पणियां:

  1. जनाब रंगनाथ सिंह जी,

    अनुनाद पर मेरी एक टिप्पणी पर जनाब शिरीष मौर्य की टिप्पणी में 'रंग' नाम से ज़रूर आपका ही ज़िक्र है. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. पिछली पोस्ट्स भी पढ़ीं. देह व्यापार पर यहाँ लगातार बहस चल रही है. निजी तौर पर ही कहूँगा पर ये बहस एक कठिन बहस है. कठिन इस अर्थ में कि इसका सीधा सम्बन्ध नारीवादी विचारों या फेमिनिज्म से भी है. स्त्रियों के शोषण के लिए ही इस देह व्यापार को वैध बनाने वाले क़ानून का इस्तेमाल दुनिया भर में होता रहा है और भारत में भी हुआ तो ऐसा ही होगा. पुरानी मुसीबतें ही कम नहीं औरतों पर और अब यह नया षड्यंत्र...तौबा तौबा.

    आपका तल्ख़ ज़बान

    उत्तर देंहटाएं
  2. तल्ख जुबान जी

    मुझे भी लगता है कि शिरीष जी ने मेरा ही जिक्र किया है। इस मुद्दे के संदर्भ में आपकी बातें वाजिब हैं। कोशिश रहेगी कि इस पर कुछ अन्य दृष्टिकोण भी प्रस्तुत कर सकूँ। सस्नेह।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बिल्कुल सज़ा ग्राहकों को ही मिलनी चाहिये और पीडितों को पुनर्वास।
    वैसे यह पूरा सवाल ही पितृसत्तात्मक मानसिकता से जुडा है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. I fail to understand the hypocrisy being displayed by people on the issue. On one hand everyone wants to have sex with the first female in hand which he may easily obtain while on the other hand the false face of fake statements. What would you say to the fact of young girls and boys having sex without any strings or one night stands. Of course the profession of sex gives easiest money and there are people who would like to be prostitutes for the money. Legalising money would also help the sex hungry to quench their thirst. It is the demand of time that prostitution be legalised and in doing so we will not be the only country to do so. There are many other countries that have done the same and we are not doing something never done before.

    उत्तर देंहटाएं
  5. अरे भाई लगता नहीं...तुम ही हो....तुम्हारे अलावा मैं और किसे इतने तपाक से "रंग" कहूँगा?

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपके दृष्टिकोण को इंतजार है। बहस कभी-कभी गलत रुख ले लेती है इसे साधने के लिये आपकी टिप्पणी आना जरूरी भी है। इसे पेशे के अनेक पहलू हैं, सभी दृष्टियों से इस पर न तो पूर्णतः लगाम लगाई जा सकती है न किसी एक वर्ग या पक्ष को पूरा उत्तरदायित्व दिया जा सकता है। हमारा विचार - क्षेत्र रोजी-रोटी के लिये किये जाने वाले पेशे और राज्य की भूमिका तक ही सीमित रहे तो कुछ तार्किक परिणिति प्राप्त कर सकता है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. @ शिरीष जी... आभार।
    @ प्रीतीश जी...आपकी बातें सही हैं। मैं शीघ्र ही अपना स्टैण्ड जेरे-बहस प्रस्तुत करूंगा।

    उत्तर देंहटाएं
  8. भारत सरकार को राष्ट्र हित में राष्ट्रीय वैश्यावृति शिक्षण केंद्र कि स्थापना करनी चाहिए |
    क्या फर्क है ?
    सरकार ने पहले से ही बहुत सी मानसिक वैश्यावृति सीखने के संस्थान खोल रखे हैं
    दैहिक वैशावृति मानसिक वैश्यावृति से कहीं श्रेष्ठ है
    इससे incredible इंडिया थाईलैंड को पीछे छोड़ सकता है
    इसमें देह के दलालों और घूसखोर पुलिस वालों को छोड़ कर बाकि सबका हित है

    उत्तर देंहटाएं