24 दिसंबर 2009

दो व्यस्क स्त्री-पुरूष किन-किन शर्तों पर शारीरिक संबंध बना सकते हैं ?

रंगनाथ सिंह


दो व्यस्क स्त्री - पुरूष किन-किन शर्तों पर शारीरिक संबंध बना सकते हैं ? निश्चय ही यह प्रश्न कानून की सीमारेखा से बाहर है। उनके बीच का जोड़ धन से बना है या यश से या ख्याति से या विवाह से या प्यार से इससे किसी तीसरे व्यक्ति या कानून का कोई वास्ता नहीं होना चाहिए।

यदि किसी स्त्री या पुरूष ने धन के बदले अपना शरीर उपलब्ध कराया तो इसे कानूनी अपराध मानना अनुचित है। इसलिए इस कृत्य के डिक्रिमीलाइेशन की जरूरत है। एक व्यक्ति के स्तर पर धन के बदले शरीर उपलब्ध कराने को मैं कभी भी कानूनी अपराध की श्रेणी में नहीं रखना चाहुंगा। क्योंकि ऐसा करने पर बहुत सी ऐसी औरतें/पुरूष इस कानून की जद में आ जाएंगे जो रेडलाइट एरिया में नहीं रहते।

कई विवाहित औरतें/पुरूष भी 'काफ्काई ट्रायल' के बाद इस कानून की तहत सजा पाने से बच न पाएंगे। यदि कोई स्त्री या पुरूष ऐसा करता है तो यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है। लेकिन  पुरानी कहावत है कि आप की स्वतंत्रता वहीं खत्म हो जाती है जहाँ दूसरे की नाक शुरू होती है।

जाहिर है वेश्यावृत्ति जब तलक दो लोगों के बीच चलती है उसे वेश्यावृत्ति नाम भी नहीं दिया जाता। जब यह परिघटना एक संगठित व्यवसाय के रूप में सामने आती है तभी ही इसे वेश्यावृत्ति माना जाता है। किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत स्तर पर धनलाभ के लिए शरीर बेचना और संगठित रूप से वेश्यावृत्ति करना/करवाना दोंनो दो चीजें हैं। जो औरतें या पुरूष संस्थागत रूप से वेश्यावृत्ति को अपनाते हैं समाज में उन्हें ही वेश्या कहा/माना है।

वेश्यावृत्ति को इतिहास का सबसे पुराना पेशा बताना हास्यपस्द है। ऐसे लोगों के ऐतिहासकि स्रोत क्या हैं यह अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है सो इसपर ज्यादा नहीं कहुँगा। मैं ऐसा नहीं कह सकता कि यह विश्व का सबसे पुराना पेशा है। वेश्यावृत्ति का इतिहास सीधे-सीधे नगरीकरण के इतिहास से जुड़ा हुआ है।

भारत में भी वेश्यालयों के जितने भी उदाहरण दिए जाते हैं वो ऐसे क्षेत्रों को हैं जहाँ पर धनिकों और वणिकों का संकेद्रण रहा है। भारत कृषि-प्रधान देश है। इस बात का सर्वेक्षण किया जा सकता है। कितने सौ गाँवों के बीच एक वेश्यालय स्थित है। कितने कस्बों में वेश्यालय स्थित है। और कितने वाणिज्यिक केन्द्र बने महानगरों में वेश्यालय स्थित है।

 ऐसे सर्वेक्षण के बाद वेश्यावृत्ति को सर्वव्यापी परिघटना मानने वालो को अपना पक्ष सुनिश्चित करने में सुविधा होगी। जाहिर है उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी।

वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देने या  देने की बहस का केन्द्रिय प्रश्न यह है कि क्या धनिकों को पैसे के बदले औरत खरीदने की खुली छूट दी जाए या नहीं ? अब इसे प्रस्तुत यूँ किया जा रहा है कि क्या औरतों को पैसे के बदले अपना शरीर बेचने की आजादी दी जाए कि नहीं ? यदि यह मामला औरत की आजादी का है तो फिर वेश्यालय बनाने की या उसे मान्यता देने की कोई जरूरत नहीं है।

सरकार घोषणा करवा दे कि सम्पूर्ण भारत में कोई भी औरत/पुरूष कहीं भी रहकर धन की आवश्यक्ता होने पर अपने शरीर का विक्रय कर सकते हैं। ऐसा करने पर उन्हें किसी तरह के सामाजिक शोषण या बहिष्कार का शिकार नहीं होना पड़ेगा।

सरकार की तरफ से उन्हें कानूनी संरक्षण दिया जाएगा। गर भारत सरकार और विश्व की अन्य कई सरकारें यह सोचती है कि ऐसा धन के बदले शरीर देने वाली औरतों को एक अलग इलाकों में रहना होगा। तो यह एक तरह का घेटोआइजेशन  है।

यदि आप इसे पेशा मानते हैं तो आपको अन्य पेशवरों की तरह उन्हें अपनी इच्छा से अपना आफिस खोलने का अधिकार देना होगा। उनका सामाजिक सम्मान सुनिश्चित करना होगा।

फिलवक्त जितने भी रेडलाइट एरिया हैं उनमें औरत का शरीर मुर्गी के माँस से भी सस्ता बिकता है। इन रेडलाइट एरिया की लाइफलाइन दो ही प्रमुख वर्ग हैं। एक वह प्रवासी कामगार वर्ग जो आंतरिक विस्थापन का शिकार है। दूसरा सेना या अन्य सुरक्षा बलों के अधिकारी वर्ग से नीचे के कर्मचारी। ऐसा नहीं है कि सेना के अधिकारी वर्ग के कर्मचारी इस सुख से सर्वथा वंचित रहते हैं। जम्मु-कश्मीर और पूर्वोत्तर में उनके किए की गूँज पूरे देश में सुनाई दी।

जम्मू-कश्मीर में जिस रैकेट का पर्दाफाश हुआ उसमें तो सेना और अन्य सुरक्षाबलों के आला दर्जे के अधिकारियों की गर्दन फँसती नजर आई। इन तथ्यों के मद्देनजर वेश्यावृत्ति  सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्न बन जाता है।

वेश्यावृत्ति के ग्राहकों के साथ ही वेश्याओं के वर्गीकरण की भी जरूरत है। तथाकथित रेडलाइट इलाको में फँसी ज्यादातर स्त्रियाँ या तो किसी अत्यंत पिछड़े या गरीब इलाके से आती हैं या फिर मुश्किल से गुजरबसर करते हुए परिवार से दलालों के सब्जबाग में फँसा कर लाई हुई होती हैं।

गरीबी/बदहाली/सामाजिक संकट से वेश्यावृत्ति से सीधा संबंध है। अमरीका के अफगानीस्तान पर हमले के बाद अफगानीस्तान में जो कुछ चीजें सस्ती रह गई थीं उनमें औरतें प्रमुख थीं। (यहाँ जबरन बलत्कृत की जाने वाली स्त्रियों के अतिरिक्त तथाकथित स्वेच्छा से अपना शरीर बेचने वाली महिलाओं की ही बात की जा रही है। बलत्कृत स्त्रियों को शामिल कर लिया जाए तो स्थिति और भी भयावह होगी। )

स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति स्वीकार करने का तर्क आमतौर पर उन्ही वेश्याओं के लिए दिया जाता है जो एलीट होती हैं। क्योंकि इसी वर्ग में ऐसे ग्राहक उपलब्ध होते हैं जो एक बार सहवास के लिए इतना पैसा दे सकें जो किसी सरकारी बाबू की महीने या सालभर की तनख्वाह से ज्यादा हो और किसी स्त्री को मनुष्य के लिए उपलब्ध सर्वाधिक प्रगाढ़ और अंतरंग सुख का सौदा करने को प्रेरित कर सके।

 पुलिस के शोषण की बात और कानून द्वारा नियंत्रण न कर पाने की निश्चय ही हास्यपद है। इस तर्क से फिर किसी भी अपराध को कानूनी मान लेना चाहिए। क्योंकि ऐसा कोई अपराध नहीं है जिसका पुलिस और कानून उन्मूलन करने का दावा कर सकें। जब वेश्यावृत्ति गैर-कानूनी है तो पुलिस के ऊपर के जिम्मेदारी आती है कि ऐसा सब चलता था तो आप कहाँ थे ?

जब यह कानूनी हो जाएगा तो पुलिस के पास कानून की घूँघट होगी जिसकी आड़ में सबकुछ छिपाया जा सकेगा। वेश्यावृत्ति एक वन-वे है जिसमें जाने का रास्ता तो है लेकिन वापस आने का नहीं। इसलिए मूल प्रश्न वेश्याओं के पुनर्स्थापना का है जिससे सरकार मुँह चुरा रही है। वेश्याएं पेशा छोड़ कर जाएं तो जाएं कहाँ ?

नोट- सारी बहस के साथ इस पड़ताल की भी जरूरत है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने के पीछे कहीं वैसा ही कोई खेल तो नहीं जैसा धारा 377 के पीछे था ? (देखें अभिषेक श्रीवास्तव का लेख, 377 के दुश्मन कौन हैं ?, समयांतर,अगस्त,2009) अभिषेक के लेख की कड़ी में ही देखें गीताश्री का लेख कि किस तरह केरल में पुरूष वेश्यावृत्ति फलफूल रही है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. Is is raquired to be seen that though the demand for banning prostitution has been advanced, there is no blue print for rehabilitation for the prostitutes. Even if they leave the profession, where option do they have? Unless the whole issue involving the matter are debated and a solution pronounced, there cannot be any talk of banning the trade. In a country where almost 30% of population can't manage a square meal, one can't ban a profession that does provides existence to some.

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  2. विचारणीय बिंदु -अगर बिना धन की चाहत के दो विवाहित वयस्क आपसी सहमति से यह अन्तरंग सुख प्राप्त करें तो क्या यह किसी क़ानून का उल्लंघन है ?

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  3. कोई बात कहने मे कितनी अच्‍छी लगती है,स्‍वेक्ष्‍छा से कोई अपनी हत्‍या करवाता है तो उसे सजा नही मिलनी चाहिये ?

    आपके इस लेख का इतना समथन किया जा सकता है कि आज के दौर मे सेक्स एक सामान्‍य बात है, विवाह की आयु बढ़ने के साथ ही साथ यौनेच्‍छा भी बढ़ी है, इस कारण यह घटना हो सकती है।

    जहाँ तक मेरा मानना है कि आपसी सहमति से सेक्‍स किया जा सकता है, किन्‍तु उसको प्रमाणित करने का मोहर लगना गलत है, आपसी विचार से आप ठीक कर रहे हो किन्‍तु सामाजिक रूप से यह गलत है, आपसी सहमति आपसी ही रहे, अगर सामाजिक बनाने का प्रयास गलत है।

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