हर विश्वविद्यालय की तरह काशी हिन्दु विश्वविद्यालय में भी हर सत्र में कुछ ऐसे लड़के आते हैं जिनके बारे मे सभी टीचरों की एक राय होती थी कि ये लड़के अपने जीवन में कुछ नहीं करेंगे।
मामला एक तरफा नहीं होता, टीचरों के बारे में इन लड़को की एक राय होती है कि हमारे यूनिवर्सिटी के नब्बे फीसद टीचर विश्वविद्यालय के चतर्थ श्रेणी के कर्मचारी बनने के भी योग्य नहीं है। और अगर यही लोग प्रोफेसर के योग्य हैं तो विश्वविद्यालय के सभी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को प्रोफेसर बनने का हक है।
जब हम पढ़ते थे तो भी यही हाल था। किसी भी योग्य स्टुडेंटस के पास यह सच्चाई समझने के लिए सिर्फ एक साल का समय होता था। दूसरे वर्ष में पहुँचते-पहुँचते हर छात्र को प्रोफेसर बनाम चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की क्लासिक थिसिस पता हो जाती थी।
कुछ लोग थे जिनकी पुरानी पीढ़ीयां भी बीएचयू में शिक्षा की घास चर चुकी थीं। ऐसे लोगों को यह पता होता था कि कौन श्रीमान जी किस कारण से आज बीएचयू की तनख्वाह उठा रहे हैं।
उन कारणों में तमाम कारण थे जिनमें से कुछ ऐसे थे, एक साहब के बारे में अफवाह थी कि वो विज्ञान संकाय के एक विभाग के खानसामा थे, उनके खाने बनाने के गुण से खुश होकर विद्वान प्रोफुसर साहब ने उन्हें लेक्चरर बना दिया। इस तथ्य की रौशनी में तमाम लड़के खाना बनाना सीख गए।
दूसरे साहब के बारे में ऐसी ही अफवाह कपड़ा धोने की थी। वो अपने गुरू-जी का कपड़ा इतना साफ धोते थे कि गुरू-जी को उनके सिवा किसी और के हाथ का धुला कपड़ा पहनना अच्छा नहीं लगता था। सो गुरू-जी भी क्या करते, किसी ने पहले ही कह रखा था कि, सफाई का गुण दैवीय गुण के बाद सर्वश्रेष्ठ है( क्लीन्लीनेस इज नेक्सट टु गाॅड्लीनेस !!), ज्ञान की पुरानी कहावत और अपने वर्तमान जरूरत को देखते हुए गुरूजी ने उन साहब को अपने विभाग में ही लेक्चरर बनवा दिया।
हम सभी ज्ञान के परंपरागत हस्तांतरण में यकीन रखते थे। इसलिए सभी नए छात्रों को यह ब्रह्म ज्ञान बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध कराया जाता था। कोई नया छात्र किसी तरह की जिज्ञासा रखे तो उसका पूर्णतः उन्मुलन किया जाता था।
एक बार एक छात्र ने बी एच यू के इतिहास के ऊपर दिये जा रहे महत्वपूर्ण वक्तृता के बीच में टोक दिया और पूछा कि कोई सिर्फ कपड़ा धो कर या खाना बना कर लेक्चरर कैसे बन सकता है उसके लिए न्यूनतम डिग्री तो चाहिए ?
वहां उपस्थित वरिष्ठ साथी ने उस नवछे से रहस्मयी मुस्कान के साथ पूछा, तो बंधु आपने उन महाशय की क्लास की है ? लड़के ने कहा, हाँ कि है।
सीनियर ने पूछा, आप को क्या लगता है उसे सब्जेक्ट के बारे में कुछ पता है ?
उसने कहा, लगता तो नहीं कि उन्हें कुछ आता है !
सीनियर बोला, चलिए आप मेरी आधी बात से सहमत है कि उसे कुछ नहीं आता ?
नवछे ने कहा ,ये तो लगता है, मगररर.....
सीनियर बोला,बंधु आप महीने दो महीने से कैम्पस में हैं इसलिए ज्यादा अगर-मगर मत कीजिए !!
और चुपचाप सोचिए कि जो आदमी खाना बना कर , कपड़ा धो कर लेक्चरर बन सकता है, उसे बीएससी और एमएससी पास करने से कौन रोक लेगा ??
जुनियर के पास इस यक्ष प्रश्न का कोई जवाब नहीं था। वह भी परंपरा के अनुरूप ही इस सत्य से सहमत हो गया !!