27 अगस्त 2009

सत्रह साल बाद

दीपांकर की डायरी का यह अंश आपके सामने प्रस्तुत है - रंगनाथ


आज मुझे एहसास हुआ की मैं अब बड़ा हो गया हूँ. शायद उम्र के सवाल पर या शायद अपने तल्ख़ जवाबों के फलसफे में. उथली सड़कों पर सफ़र कर के मेरी कमर में दर्द उखड़ आया है और पीठ पर थकन की झाडियाँ उग आयी हैं. धूल की परतें मेरे अधपके बालों को मुरझा रहीं हैं. कच्चे रास्तों पर चल कर ऐसा लगता है जैसे मैं अब तक ऐसे ही चलता रहा हूँ, हिचकोले खाते और सत्रह साल बीत गए. जोते हुए खेत और भरे हुए खलिहानों के बीच से चलता हुआ मैं अपने घर के पास आता हूँ. वो गलियां अब भी वैसी ही हैं पर मेरे लिए शायद यह अंतराल बहुत बड़ा है.

मैं पिछवाडे से घर के अंदर घुसता हूँ. मुझे लगता है जैसे मैंने अफीम खा रखी है, मेरी यादास्त जैसे कुंद हो गयी है, और सूरज जैसे सिर्फ़ मेरी ही आखों में झांक रहा है. पपीते के पेंड़ बौने हो गए हैं और आँगन छोटा हो गया है पर कुछ पलों के बाद मुझे अहसास होता है कि चाची हाथों में छेना लिए खड़ी है और बूढी दादी अब मुझे पहचान नही पा रही है.शायद उसकी छोटी आँखों में मैं बहुत बड़ा हो गया हूँ. उसकी आखों में जैसे आँगन के शीशम के पेंड भी सत्रह सालों में बहुत बड़े हो गए हैं. उसकी आखों में आज एक चमक है ,उगते हुए सूरज की चमक ,चेहरों पर झुर्रियां हैं पर मुझे लगता है जैसे आँगन के मिट्टी में अपराजिता के नील फूल मुरझा गए हैं . चाहरदीवारी पर उग आयी झाडियां इस बात की मिसाल हैं कि कोने वाला बड़हड़ का पेड़ अब बूढा हो गया है और उस पर बसने वाले परिंदों की अब दूसरी पुश्तें चल रही हैं . जंगली नीम्बू का पौधा अब और फ़ैल गया है और अछूत पड़े कुएं में झांक कर कभी-कभी उससे उसकी वासोख्त्गी के बारे में पड़ताल करता है. मैं उस कुएं के पास चला आता हूँ धीमे क़दमों से पर मुझे लगता है की अब मैं बड़ा हो गया हूँ , क्योंकि मुझे याद आता है की बचपन में हमलोग उसके पास फटकते से भी डरते थे क्योंकि उसमे गिर पड़ने का भय था पर अब कोई डर नही है . अब मैं उसकी पेंदे तक जाना चाहता हूँ जो नम और खामोश है. मैं उसके पास जा कर झांकता हूँ उसका पानी अब काला हो गया है और उसकी सतह पर मेढक सर उठाये आसमान देख रहे हैं... दीवारों पर काई की एक मोटी परत है. कुएँ से एक अजीब सी गंध उठती है और नीम्बू के पतों से छू कर आकाश में कहीं दूर उड़ जाती है.

मुझे याद आता है की मेरे कंचें की कई गोलियां उस कुएं में गिर गयी थी ,अब इतने अरसे के बाद भी जबकि मैं बहुत बड़ा हो गया हूँ मैं उसे कुएं की कीचड़ वाली तहों से नहीं ढूढ़ पाउँगा और उसमे बनी अनोखी तस्वीरों को फ़िर से नही देख पाऊंगा. मैं यही सोच कर अपने पर खीज कर वहाँ से चला आता हूँ.

बिना खिड़की वाले दो अंधेरे कमरे अब भी वैसे ही हैं, दादी का लकड़ी का संदूक वैसे ही रखा है और उसमे एक ज़ंग लगा टला लटका है उसकी कुंजी दादी अब भी अपने पास ही रखती हैं अपने गले में लटका कर. अँधेरी कोठरी की दीवारों पर बनी आकृतियाँ और मेरे कुलदेवता का भित्तिचित्र, जिन्हें मैं टार्च की रोशनी में देखता हूँ. लोग मुझे बताते हैं कि इसी अँधेरी कोठरी में मेरा जन्म हुआ था. इसी अँधेरी कोठरी में, दीये की रोशनी में, मैं दुनिया में आया था. मैं स्पंदित होता हूँ उस मिट्टी की गंध से जो सालों से वहीं बैठी है... अब भी जब मैं उस अंधेरे में झांकता हूँ मेरी आंखों में एक शांत शीतलता छा जाती है. मिटटी की कोठी पर लगता है जैसे दिए जलते हैं, मैं फ़िर वहीं बैठ जाता हूँ फ़िर केवल अँधेरा मेरे कन्धों पर लटका रहता है और मैं देर तक उस दीये की ओर देखता रहता हूँ . बाहर निकल कर मैं देखता हूँ कि फूस के छप्पर और नीचे हो गए हैं ,बैलों वाले घर के दीवार अब ढह चुकी है और दूरे की दहलीज में दीमक लग गया है. बांस के पारंपरिक सीढ़ी से मैं उपर चढ़ आता हूँ . यह कभी भूसा वाला घर हुआ करता था.

मुझे याद आता है की चाचा ,चुनावों के मौसम में देसी कट्टे ,भूसें में कैसे छुपा कर रखते थे और मैं उनके प्राणिविज्ञान के किताबों से सांप की तस्वीरें काट लिया करता था......अब मेरा छोटा भाई वहाँ पढ़ रहा है ,पुआल पर दरी बिछी है और अंग्रेजी अनुवाद की एक किताब वहाँ पड़ी है. मैं कुछ पल वहीं बैठ जाता हूँ और वह मुझसे रंग बिरंगे वाक्यों का अनुवाद पूछता है... मैं देखता हूँ चुपचाप, ढहती दीवारों को, झड़ती मिटटी की परतों को, छप्पर में उग आए दरारों को और ताड़ के मोटे मोटे कांडों को.

मुझे लगता है कि मैं अनुवाद करने के लिए अब उमरदराज हो गया हूँ पर जैसे एक कहानी है जिसका अनुवाद बचा हुआ है. और एक अनुवाद बचा है ,इन मिट्टी की दीवारों की भाषा का, धंस गयी जमीन का, परित्यक्त कुएं का, चहारदीवारी पर उगी घास का, नीम्बू के पतों पर जमी धूल का, कुएं से उठती गंद का, दादी की झुर्रियों का, मां के खुरदरे हाथों का और झुकी हुई छत का. आज मुझे रात का इन्तजार है. मैं देखना चाहता हूँ की रात के धुंधले अंधेरे में गांव कैसा दीखता है, घरों से उठती धुएं की लकीरें आख़िर कहाँ जाती हैं और लोग कब सोते हैं... नहर का पानी रात में कैसा दीखता है और मुए वहाँ कितना बालू तौलते हैं . बाजार कब चुप्पी साध लेता है और ठाकुरबाड़ी का कीर्तन कब बंद हो जाता है. किस पहर कुत्ते ज्यादा भौंकते हैं और कब बाजार से गुजरने वाली सड़क पर दौड़ती ट्रकों की आवाज सन् के कौंध कर दूर हो जाती है .खेतों में नीलगाय कब आती है और पीपल के पेंड़ पर प्रेत कब उल्टे लटकते हैं ,गलियों में उल्टे पैरों वाली किचीन कब तक टहलती है और अपने बच्चे को सुलाती है.
मैं देखना चाहता हूँ की यहाँ सुबह कब होती है और औरतें किस पहर में मैदान जाती हैं . बच्चे सुबह उठ कर कैसे बासी खाने की जिद करते हैं, सुबह के चूल्हे से उठने वाली गंध कैसी होती है,भैंस की दूध से उठती भाप कितनी मिठास लिए होता है और घोंड़े दुल्लती कब मरते हैं. मुझे लगता है की जैसे मैं कोई मीठा सपना देख रहा हूँ पर मेरे चेहरे पर सूरज चमकता है और चाची मुझे बताती हैं की मेरी आखों में कीचड़ जमा हो गया है. मुझे लगता है की मुझे रोना चाहिए ताकि मेरे आखों की जलन और जमा हुआ कीचड़ दोनों कहीं दूर बह जाएं पर मेरी निगाह उस खपड़े पर अटक जाती हैं जो शायद कुछ ही पलों में गिरने वाला है. मैं उसे एकटक देखता हूँ पर वह गिरता नही है बस यूं ही लटका रहता है. मैं चौकी पर बैठा रहता हूँ, इतने में सेमल का एक बिरवा अपने पंखों के सहारे तिरता हुआ मेरी आखों के सामने से गुजर जाता है. मैं उसे पकड़ने के लिए उठता हूँ पर हवाओं की सीढियां चढ़ कर वो कोने वाले शीशम पर बैठ जाता है.

मुझे लगता है कि जैसे जिन्दगी में बहुत सारी चीजें यूं ही मेरे सामने से गुजर गयीं और मैं यूं ही ठगा सा देखता रहा मेरी मुठ्ठियाँ खुली की खुली रहीं. मैं अनमना सा खड़ा हो कर चाहरदीवारी पर उग आए घासों को देखता हूँ. दीवार से लगा बड़हड़ पूरे मौज में खड़ा है उसपर कुछ पंडुक बैठे हैं जो मुझे बड़ी अचरज से देखते हैं, शायद मैं इस आँगन में नया परिंदा हूँ जो चार पलों के लिए यहाँ आया है फ़िर न जाने कहाँ के लिए उड़ जाएगा मुझे पंडुकों की टोली याद दिलाती है कि सूरज अब डूबने वाला है.

मैं चाचा के साथ बाजार के लिए निकलता हूँ, देहरी से सर झुका कर बाहर आते ही मैं देखता हूँ की खलिहान अब खेत बन चुके हैं पर खलिहान के बीच का वो खम्भा अब भी वहीं खड़ा है और उस पर कोई नीलकंठ नही बैठा है. अब पुआल के ढेर भी वहाँ नही हैं, न हैं मेरी भैंसे और मेरा झूमना बैल. मैं उदास हो कर एक पगडंडी पकड़ कर चाचा के पीछे हो लेता हूँ . मेरे पास कोई प्रश्न नही है अगर कुछ है तो सिर्फ़ देखने के लिए गांव और सत्रह सालों में बड़ा हुआ आँगन के कोने का शीशम. बाजार जाने के लिए नहर पार करना होगा. मैं अंग्रेजों के ज़माने के पुल पर बीच में ठहर जाता हूँ... नीचे पानी काफी कम हो गया है मुझे लगता है की अब वहाँ मुए नही रहते हैं पर वो आख़िर गए कहाँ होंगे ? पानी मुझे दूर दूर तक नही दिखता है शायद वो मेरे मामा के गांव भाग गए होंगे जहाँ पुनपुन की धारा है. मेरा मन करता है की नहर का किनारा पकड़ कर बेसुध चलता जाऊं कहीं तो नदी जरूर मिलेगी ..... पुनपुन जिसमे ढेरों बालू है पर जिसकी धारा, सुना है कभी सूखती नही. मुझे प्यास लगी है मेरा जी करता है की अंजुली में भर कर दो -चार घोंट नदी का पानी पी लूँ पर नदी अभी काफी दूर है. मैं सुबह की पहली किरण के साथ रेत पर चमकते अबरख के टुकड़ों की चमक देखना चाहता हूँ और इसलिए मैं चलता रहता हूँ. गाँव की सीमायें ख़त्म होती हैं फ़िर नए खेत शुरू हो जाते हैं. कटे हुए धानों के ऊँचे टीले दीखते हैं और दीखती है एक नदी जिस पर बांस का पुल हैं. मैं समझता हूँ की मुझे उस पार जाना है मेरे अपनों के पास, एक लंबे अरसे के बाद, मैं बेजार हो जाता हूँ. सूरज की लाली फ़ैल चुकी है और मैं पुल के बीचों बीच खड़ा हूँ. नीचे पुनपुन की अजस्र धरा है पतली पर तेज. मैं चाहता हूँ की पानी को छू लूँ पर मुझे डर होता है कि पानी में छुपे मुए मुझे कहीं पकड़ न लें. मैं सधे क़दमों से पुल पार करता हूँ.

सुबह की धूप अब खिल चुकी है. मैं किनारे पहुँच कर अपनी मुठ्ठियों में पानी भरता हूँ और कुछ बूंदों को पकड़ कर रखता हूँ. अमरुद के बागीचे से होता हुआ मैं आँगन में चला आता हूँ . मामा के आँगन में तुलसी का एक पौधा है और चारपाई बिछी है जिसकी सुतें अब जमीन तक छूती हैं मैं उसी चारपाई में धंस जाता हूँ और पीने का पानी मांगता हूँ. भरे हुए लोटे में झांक कर देखते हीं, मुझे लगता है की मेरी आंखों में गांजे की लाली छाई है और फ़िर सबकुछ अचानक से पिघल जाता है. एक बेचैनी जिसे लेकर मैं गाँव से आया था वो यहाँ आकर बह जाती है, एक कहानी जो मेरे साथ कहीं बड़ी हो रही थी, शायद आज उसका ब्याह था, एक सपना जो कहीं पल रहा था, आज फूट कर बह गया था और अनुराग की पहाड़ी नदी आज बरसाती बन कर कूल तोड़ मैदानों में बह आयी थी. मुझे लगा जैसे ये सब एक नशे के आगोश में हो गया पर मैं महसूस करता हूँ की ये सब एक हकीकत था.

अब मैं वापस लौट रहा हूँ. गांव से शहर की ओर, बडे शहरों की ओर, महानगरों की सीमाओं में... मेरे सत्रह साल मेरे साथ ही बीत चुके हैं और वो गुमनाम से एहसास लेकर अब मैं बड़ा हो गया हूँ, बोध की एक नहर पार कर चुका हूँ और चेतना की एक नदी के मंझधार में घुटने भर पानी में खड़ा हूँ . लोग मुझसे इसका अनुवाद पूछते हैं पर मुझे लगता है की कोई मुआ मेरे पैर खींच रहा है और पनकौओ का एक झुंड उस नदी के बालू के द्वीप पर बैठा है. मैं इस नदी को पार कर जिन्दगी का एक अहम् मुकाम पा लूँगा फ़िर मुझे कोई टीले पर खड़े होने का अनुवाद नही पूछेगा. कुएँ की जगत पर घड़े में रखा कछुआ अब भी वहीं पड़ा होगा, निस्पंद सिर्फ़ अपनी सांसें गिनते हुए और मेरा इन्तजार करेगा. तब तक दीवारों की एक तह और पतली हो जायेगी, चहारदीवारी पर घास और ऊँचे हो जायेंगे और कछुए का बच्चा और बड़ा हो जाएगा........पर कोठे की छप्पर पर अटका खपड़ा अब भी वैसे ही अटका है...आज भैंसे खलिहान में नही बैठी हैं जिन पर मैं नंगे बैठा करता था, उनकी पीठ कितनी गर्म थी मुझे अब एहसास होता है, और पुआल के ढेरों पर लोटने के बाद सी एक चुन्चुनी मेरे पूरे बदन में काटने लगती है. मामा के कांपते हाथों से खाने की थाली गिर जाती है और मैं देखता रहता हूँ, छोटे बच्चे मुझे देखते हैं और जमीन पर लोट लगाते हैं. गाँव की औरतें मुझे देखती हैं, दीवारों की ओट से छुप कर, मेरी मां के किस्से कहती हैं, मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी और मेरे बिखरे हुए अधपके बाल, मेरी लाल लाल आखें, उनके लिए किसी नयी कहानी का बीज बन जाएगा .., पर मुझे रह रह कर चुभती है .... धंसती हुई चारपाई, आँगन की तुलसी और पुनपुन की चमकती रेत, उसकी बहती हुई अनंत धारा, कुएं का बेजान पानी, घड़े मे रखा कछुआ, बांस का पुल और उदास पड़े नाद का रंग...

मुझे एहसास होता है की आँगन की इस मिटटी में कितने सपने दबे पड़े हैं और मैं उनके सामने कितना छोटा. मैं अपने गाँव से काफ़ी दूर निकल आया हूँ शायद सत्रह साल की दूरी पर लेकिन दीये अब भी जल रहे हैं, अंधेरे कमरे में, मिट्टी की कोठी पर, कुलदेवता की तस्वीर टार्च की रोशनी में यूं ही चमकती है. आँगन कि मिट्टी रात भर खुले आसमान के नीचे सपने देखती है, उथले रास्तों पर मील के पत्थर पीछे छूट रहे हैं और मैं बेचैन हो कर अपने दिल पर एक और गाँठ लगा लेता हूँ.

(सनद रहे कि दीपांकर अपनी कविता या डायरी को कोई शीर्षक नहीं देता। मैं रवायत के असर में उन्हें शीर्षक देता हूँ।)

26 अगस्त 2009

मैं शब्द चुराता हूँ ....

मैं शब्द चुराता हूँ ....
अँधेरी रातों में दबे पांव ...
पेशानी पर रेंगने वाले खाबों की परछाइयों से ..
मीनारों से लटके अबाबील के घोसलों से ...
गलियों में चलनेवाले अंधेरे सायों के जुलूस की फुसफुसाहटों से ..
बेचारगी का बोझ लिए जीस्त की कसक से ..
अफसुर्दा चाँद की बोझल हँसी रिसती है ..
नदी के उस पार एक थक चुकी रात कुछ गुनगुनाती है ....
जिंदगी के गीत ....सपनों के गीत ...
दूर रेगजार में सारंगी पर दर्दीली तान कौंधती है ...
मुट्ठियों में रेत भीचें मैं आधी नींद से जागता हूँ ...


मैं शब्द चुराता हूँ ...
मेहराबों के पार गहरे समंदर में सीपियाँ कुछ छुपा कर रखती हैं ..
सागर की पीठ पर लरजते हवाओं के गीत
मैं लाया हूँ वो गीत चुराकर ...बाजारों में बेचने अपने सपने की भाप ...
रूह में धँसी हुई वो दीमक की लकीर रंदा करती है ..
और जंगली फूलों की अल्पना बनाती है...
मैं वो फूल चुराता हूँ ..

मैं शब्द चुराता हूँ ....
बिना नींद वाली आखों के कोनों में दुबके बूंदों से ...
जेठ में रिक्शा खीचते बूढे की पीठ की घमौनियों से ...
सोन के बालू पर बिखरे छोटे छोटे शंखों से उगती हलकी वर्तुल स्वर लहरियों से ...
गांवों के फूस के छप्परों पर उगने वाली अमरबेल की पीली शिराओं से ....
सिलबट्टे पर माँ मुझे पीसती जाती है ...खूब कूटती है ...
अंग दर अंग .. बहुत महीन ...
मैं गूंथाता जाता हूँ ....
मैं शब्द चुराता हूँ ....


मैं चुराता हूँ शब्द क्योंकि मुझे बेचनी हैं अपने सपनों की तासीर ..
उमस और धुँए से भरे कमरों में जालों से लटके जिन्दगी से सपनों से बू टपकती है रात भर ...
दारू की बास में सपने गंधाती है ...नींद की वही गाढ़ी चादर जिसमें गांजे का प्रेत बैठा है ...
सपने मरोड़ खाकर तड़पते हैं ..लम्बी साँस भरकर मैं लेट जाता हूँ ..
हथेलियों पर सपनों का बीज लिए ....निस्पंद अधमरा सा...
रात भर एक उल्लू देखता रहता है ..
अपनी साँस रोक कर ...
जोड़ता है एक एक कर ...टूटे हुए सपनों के शब्द ....

- दीपांकर

नोट
 :  हिन्दी कविता के पाठकों के सामने आज मैं एक नए रचनाकार को प्रस्तुत कर रहा हूँ।  दीपांकर का सामाजिक परिचय यह है कि वो एक अतिप्रतिष्ठित संस्थान में एटामिक एण्ड आप्टिकल फिजिक्स विभाग में शोध छात्र हैं। हिन्दी,संस्कृत एवं अंग्रेजी भाषा के अच्छे जानकार हैं। भौतिकी,दर्शन,साहित्य,राजनीति में उन्हें समान रूप से गहरी रूचि है। लेकिन वो खुद राजनीति ही को अपना असली पैशन बताते हैं। उनका शेष परिचय उनकी रचनाओं के माध्यम से समय-समय पर पाठकों को मिलता रहेगा।

24 अगस्त 2009

चम्पू-काव्य और काडवेल

कुछ शैलियाँ या शिल्प खास तरह की प्रवृत्तियों की वाहक होती हैं। इतिहास के एक खास समय में उपन्यास का जन्म हुआ। युगांतकारी सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों के दौर में छंद की बेड़ी तोड़ने की जरूरत पड़ी। मेरी राय में रचना का शिल्प उसकी वैचारिकी से स्वंतत्र नहीं होता। हो सकता है रचनाकार की वैचारिकी ही शिल्प के बारे में अंतिम निर्णय लेती हो। यह भी हो सकता है कि रचनाकार की वैचारिकी ही शिल्प के निर्धारण की निर्णायक उत्प्रेरणा बनती हो। हो सकता है कि शिल्प को समझना रचनाकार के वैचारिकी को समझना हो।
खैर इन शास्त्रीय प्रश्नों के बारे में विचारते हुए मुझे एक पुराने शिल्प और एक पुरानी वैचारिकी की याद आ गई। दोनों को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।

चम्पू संस्कृत काव्य में रचना की एक मृत विधा है। इसके संदर्भ में सस्कृत काव्य-शास्त्रों के आचार्यों के कुछ उद्धरण लगा रहा हूँ। मुझे संस्कृत नहीं आती। सीख रहा हूँ। इसलिए फिलहाल उसे हिन्दी अनुवाद की मदद से ही पढ़ता हूँ। जैसी कोई लैटिन,हिब्रु में लिखे शास्त्रों को पढ़ता होगा।
गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते

(विश्वनाथ, साहित्यदर्पण,6/336)

गद्यपद्यमयी काचिच्चरिम्पूरित्यभिधीयते

(दण्डी,काव्यादर्श,1/31)

अब मै चम्पू के बारे में संस्कृत के आधुनिक विद्वानों का मत रखुँगा।
चम्पू में वर्णनात्मक अंश के लिए गद्य और अर्थ गौरव वाले अंशो के लिए पद्य का प्रयोग किया जाता है। (कपिल देव द्विवेद्वी, संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास,601)

चम्पू मे वर्णन में गद्य और भाव पूर्ण भाग के लिए पद्य का प्रयोग होता है। (डा. उमाशंकर शर्मा ऋषि, सस्कृत साहित्य का इतिहास, 414)

अतः ऐसे काव्य प्रबंध जिसमें कुछ हिस्सा गद्य में लिखा जाए और कुछ हिस्सा पद्य में तो उसे चम्पू कहा जाता है। स्पष्ट है कि चम्पू काव्य में गद्य वाला हिस्सा अलग और पद्य वाला हिस्सा अलग होता है। संस्कृत के विद्वानों का मानना है कि हम चम्पू में गद्य और पद्य को अलग-अलग पहचान सकते हैं।
आधुनिक समय में हिन्दी में किसी कवि ने चम्पू-काव्य प्रबंध लिखा हो इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है। खैर मुझे अचानक इस चम्पू की याद आ गई। सो आप सबसे साझा कर लिया। हो सकता है मेरे काव्योलचना की शुरूआत चम्पू-काव्य से ही शुरू हो।

आज ही मैंने क्रिस्टोफर काडवेल की क्लासिक किताब इल्युजन एण्ड रिअलिटी पढ़ी। उस किताब के काडवेल के लिखे इंट्रोडक्शन की शुरूआती पंक्तियां भी आप से साझा करना चाहुँगा। अंग्रेजी से अनुवाद मैंने ही किया है,

यह किताब सिर्फ कविता के बारे में नहीं है। यह किताब कविता के स्रोतों के बारे में भी है। कविता भाषा की सहायता से लिखी जाती है। इसलिए यह किताब भाषा के स्रोतों के बारे में भी है। भाषा एक सामाजिक उत्पाद है। भाषा वह औजार है जिसके माध्यम से मनुष्य संवाद करता है और अपनी बात रखता है। इसलिए कविता के स्रोतों के अध्ययन को समाज के अध्ययन से अलगाया नहीं जा सकता।
(Christopher Caudwell , Illusion and reality, p. ¡x)

मैंने यह दोनों उदाहरण इसलिए सामने रखें कि गर कोई रचनाकार अपनी रचना को चम्पु की पंरपरा में रखना चाहे (हालांकि आज के रचनाकार काव्य प्रबंध लिखना बंद कर चुके हैं) और कोई आलोचक उसके रचना को समझना चाहे तो वह क्या करे ? वह सिर्फ रचना को समझे या रचना और उसके स्रोत दोनों को समझे ? क्या वो ऐसी रचनाओं के सैद्धातिंकी के स्रोतों को समझे ? ऐसी रचनाएं लिखे जाने के कारणों को समझने का प्रयास करे ? या फिर ऐसी रचनाओं में कही बातों के अर्थों को खोले ?
उन अर्थों को जिन्हें समझने के लिए सचमुच नई तमीज की जरूरत होती है। अफसोस जो पुराने लोगों के पास कमोबेश नहीं होती है। कभी-कभी संदेह होता है कि नई तमीज के ध्वजावाहक पुराने लोग कहीं किसी मुगालते में तो नहीं जी रहे हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि वैदिक काल में लुप्त हो चुकी सरस्वती की अंतरधारा में खडे़ हो कर उसे नई धारा मान रहे हों ? कहीं ऐसा तो नहीं कि उनकी नई तमीज हिन्दी में सबसे प्रभावी पुरानी मुक्तिबोधीय तमीज से मुक्ति की अंतःप्रेरणा से उपजी हो ?

कविता प्रेमियों कभी-कभी इन प्रश्नों पर विचार करने को जी करता है। मैं सिर्फ प्रश्न रख रहा हूँ क्योंकि कई बार हमारे पास सिर्फ प्रश्न होते हैं। और उन प्रश्नों के जवाब खोजने की उत्कंठा और अकुलहाट होती है। सुना है बांटने से पीड़ा कम होती है सो मैंने आपसे बाँट लिया।


21 अगस्त 2009

इलियट की एक कविता-पंक्ति है : बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाए?

अशोक वाजपेयी, वही जो कभी-कभार लिखते हैं, जिसे मैं भी कभी-कभार ही पढ़ता हूं। लेकिन उनकी एक किताब कवि कह गया है को मैं अक्सर पढ़ता हूं। उस किताब को पढ़ कर पता चलता है कि हर लेखक की तरह उनकी भी जवानी आयी थी और तब उन्होंने भी चिरयुवा लेख लिखे थे। इसी जवानी की भूल-गलती खाते में उन्होंने सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय और सुमित्रानंदन पंत को केंद्र में रख कर एक लेख बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाए? लिखा था।

 

सरकारी उम्र के हिसाब से तब उनकी उम्र छब्बीस साल थी। उनके लेख की पहली पंक्ति को ही मैंने इस लेख का शीर्षक बनाया है। इसमें मेरा अपराध सिर्फ चुनाव का है, हिंदी में इसे लाने का अपराध अशोक वाजपेयी का है। इस शीर्षक पर नैतिकता के का सोटा बरसाने को तैयार बैठे तमाम खलिहल बुज़ुर्गवार अशोक वाजपेयी को पहले सज़ा दें, उसके बाद मुझे भी दें। मैंने यह शीर्षक इसलिए चुना है कि फिलहाल हिंदी में तमाम बूढ़े गिद्ध अपना पंख फैलाये बैठे हैं। इसके आगे जो लिखूंगा, उसके लिए सिर्फ मेरे गर्दन की माप ली जाए।

जब किसी युवा ने कभी भी किसी भी तरह के परिवर्तन की बात की होगी, उसके घर के दलान में ज़‍िंदगी के लंबे अनुभव की चीलम फूंकते-खांसते एक बूढ़े बाबा ज़रूर बैठे रहे होंगे। उस नौजवान ने जब भी कोई ऐसी बात की होगी, जो बाबा के चरम शाकाहारी परपंरावादी संस्कारी मन को नागवार गुजरे, तब-तब इन बुज़ुर्गवार ने नैतिकतावाद-सार्थकतावाद-आदर्शवाद-सत्कर्मवाद-सदुपयोगवाद के बौद्धिक पंच-गोद्रव्यां से बने चरणामृत को ज़बरदस्ती इन युवकों के गले में बुज़ुर्गियत की ढरकी से ढकेलना चाहा होगा। जिसके मूल में एक ही खटराग होता है कि, नैतिक तरीके से जीवन का सदुपयोग किया जाए, तो बड़ी ही काम की चीज है।

 

किसने अपने जीवन का कैसा उपयोग किया, इसका फैसला इतिहास करता है। किसी विचारधारा के बोधिवृक्ष के नीचे धूनी रमाये बैठे बाबा लोग नहीं तय करते कि किसके जीवन का प्राप्य क्या रहा है। न ही बाबा लोग बताएंगे कि नौजवानों को क्या करना चाहिए। लेकिन हिंदी के बाबाओं का दिल है कि मानता ही नहीं। एक बाबा कहता है वैज्ञानिक मार्क्सवाद पढ़ो जैसे मैं जीवनभर कागज पर क्रांति लाता रहा उसी तरह तुम भी लाओ! दूसरा बाबा कहता है कि चैरासी लाख योनियों बाद मनुष्‍य जन्म मिला है, इसे व्यर्थ के कामों में मत बर्बाद करो, मेरे साथ मोक्ष प्राप्त करने के लिए हिमालय चले चलो। तीसरा बाबा कहता है कि रोटी-भात की चिंता छोड़ो, मेरे संग कपालभाती करो, डैम-फिट हो जाओ।

लाल-पीले-नीले-केसरिया तरह-तरह के बाबाओं से हिंदुस्तान पट गया है। हिंदुस्तान के नौजवानों की प्रतिभा बाबावादी हाथियों के पैरों तले कुचल के रह गयी है। ये बाबा युवकों की पीठ पर उपदेशों का पहाड़ लाद देते हैं। नतीजन हिंदुस्तानी युवकों की कमर भरी जवानी में ही कमान बन जाती है।

 

आजकल इनकी संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है। चुनांचे ऐसे बाबा पहले भी रहे है। और ऐसे उपदेशवादी प्रवचनकर्ता बाबाओं से नौजवान हमेशा त्रस्त रहे हैं। लेकिन नौजवानी भी क्या शय है कि शरीर में खून की जगह लावा बहता है। करीब सौ साल पहले एक अमरीकी युवक ने बाबाओं से एक बात कही थी। उस युवक का नाम था, विंडेल फिलिप्स। विंडेल के कथन को भारत में युवा प्रतिरोध के प्रतीक बन चुके भगत सिंह ने अपने जेल नोट बुक में लिख रखा था। उसी नोट बुक से ले कर लिख रहा हूं – वह कथन क्या है, पाठक खुद देख लें,

यदि कोई ऐसी चीज़ है जो मुक्त चिंतन बर्दाश्‍त नहीं कर सके, तो वह भाड़ में जाए।

इन उपदेशक बाबाओं से दुनिया कभी खाली नहीं रही है तो क्या दुनिया में इनको चुनौती देने वाले युवाओं की भी कमी नहीं रही है। न आज है। जब युवा मार्क्स ने बूढ़े हेगेल के शीर्षासन में खड़े सिद्धांतों को सीधा कर दिया होगा, तब हेगेल ने भी मार्क्स को सिरफिरा बदतमीज ही कहा होगा। हालांकि न हमारे बुज़ुर्गवार हेगेल बन सके न हमारे बीच कोई मार्क्स है। हमारे देश में एक गांधी हुए थे, एक भगत थे। भगत सिंह ने मोहनदास गांधी के संदर्भ में क्या लिखा है, उसे देखें, फिर आगे बात होगी,

“ …क्योंकि महात्मा जी महान हैं, अतः किसी को उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए। चूंकि वह ऊपर उठ गये हैं, अतः हर बात जो कहते हैं – चाहे वह राजनीति के क्षेत्र की हो अथवा धर्म, अर्थशास्त्र अथवा नीतिशास्त्र के – सब सही है। आप चाहे आश्‍वस्त हों अथवा नहीं, आपको कहना चाहिए, हां यही सच है। ऐसी मानसिकता विकास की ओर नहीं ले जा सकती। यह तो स्पष्‍ट रूप से प्रतिक्रियावादी है।“

 

एक तेईस साल के युवक के एक इकसठ साल के बुज़ुर्ग के बाबावाद के प्रति किये गये प्रतिरोध की चिंगारी को इन पंक्तियों में साफ देखा जा सकता है।
ऐसा नहीं है कि बाबाओं का अत्याचार नया है। एक अज्ञात रीतिकालीन कवि की पंक्तियां देखिए और सोचिए कि ये किनके लिए कही गयी हैं,

जानत जे हैं सुजान तुम्हैं तुम आपने जान गुमान गहे हो।
दूध औ पानी जुदे करिबे को जु कोऊ कहै तो कहा तुम कैहो।
सेत ही रंग मराल बने हौ पै चाल कहौ जु कहां वह पैहो।
प्यार सों कोऊ कछू हू कहै बक हौ बक हौ झख मारत रैहो।

ऐसे ही सदाचारी उपदेशक बाबाओं से तंग आकर दिविक रमेश ने एक बाल कविता लिखी थी। उसकी कुछ पंक्तियां देखिए,

आओ बच्चो मिलकर कह दें
बच्चे को बच्चा रहने दो
हम ऐसे ही छोटे अच्छे
नहीं चाहिए सीख बड़ों की।

जहिर है बालक-बूढ़ों का यह संघर्ष पुराना है और कमोबेश चिरंतन है। न जाने कैसे ये सारे बाबा भूल जाते हैं कि व्यावहारिक दुनिया की तरह वैचारिक दुनिया में भी नयापन नौजवानों के माध्यम से आता है। इन्हें चाहिए कि ये युवाओं से संवाद करें तो ये उन्हें उपदेश-प्रवचन देने लगते हैं। इनसे पूछने का मन करता है कि ओ बाबा तुम्हारे विचार इतने ही सार्थक होते तो युवक तुमको खुद न सुनते। जैसे वो भगत सिंह को सुन रहे हैं। जैसे वो मार्क्स को सुन रहे हैं। जैसे वो गांधी को सुन रहे हैं। जैसे वो लोहिया को सुन रहे हैं। जैसे वो विवेकानंद को सुन रहे हैं। इन बाबाओं को समझ नहीं आता कि इन खुशफहम वृद्धों की खामखयाली से कुछ नहीं होता। अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने से काम नहीं चलता। अपन की नज़र में तो तोता भी बहुत सार्थक ढंग से पहले से कही-कहायी बातों को रट कर हर राहगीर को प्रवचन देता रहता है। तो क्या नौजवान हर तोते से दीक्षा लेने लगें? मैं बाबाओं से साफ कह दूं कि ओ बाबा, युवा अपनी सोच के हिसाब से उन सभी लोगों को सुनता है, जिन्होंने उसकी नज़र में कुछ सुनने लायक कहा है। पहले तुम कुछ ऐसा कहो तो कि जिसे कोई सुनना चाहे। उसके बाद प्रवचन झाड़ना। उसके बाद उपदेश देना।

कई बुज़ुर्गवार को लगता है कि हर नौजवान सिर्फ अपना नाम चमकाने को लिखता है। जैसे नवयुवकों का नाम न हो गया कि किसी बुज़ुर्ग के पैर का नौ नंबरी जूता हो गया, जिसे किसी बड़े लेखक के धतकरमों की आलोचना की पॉलिश लगा के घिस-घिस कर चमकाया जा सकता है। ऐसा लगता है जैसे इन सारे बुज़ुर्गवार ने अपनी जवानी में इसी तरीके से अपना नाम चमका कर अपनी दुकान चलायी थी। शालीनता की शॉल ओढ़े उपदेश देने वाले बाबा न जाने क्यों अमूर्त में विचरते रहते हैं। संभवतः इसीलिए ये लोग कालांतर में बाबा बन जाते हैं और गली-गली घूम कर बिगड़े बालकों को सुधारवादी प्रवचन देते हैं। जो बालक इनकी बात नहीं सुनते, उन पर नैतिकता के का और सार्थकता के का हंटर बरसाने लगते हैं।

अगर हम खांटी हिंदी की बात करें, तो जनवाद लाने के लिए सालों साल से कलम घिस-घिस कर कई टन काग़ज़ बरबाद कर देने के बाद भी इन हिंदी बुद्धिजीवियों की क्या छवि है – इसके बारे में कवि कात्यायनी के विचार देखिए,
"हिंदी प्रदेश के जनवादी मूल्य पंगु और मरियल हैं। दावा तो गरुड़ की तरह उड़ने का करते हैं, लेकिन आंगन की मुर्गी की तरह फुदक कर रह जाते हैं। "

हिंदी के बुद्धिजीवी इतने ढीठ हो चुके हैं कि ये इनसे पूछे सवालों का या इनके ऊपर लगाये आरोपों का जवाब भी नहीं देते। ये पद्मासन लगा कर सार्थकतावाद के परमध्यान में लीन हो जाते हैं। किसी बहस से इनका कोई सरोकार नहीं। ये तो बस बीच बीच में उपदेश देने आ जाते हैं। अगर ये बाबा पेशे से मास्टर हुए, तो फिर इसे कोढ़ में खाज समझिए। इनके पास तो बाबावाद के साथ-साथ हाथ में सदाचारवाद का हंटर भी होता है। ये बालकों पर हंटर चलाएंगे, लेकिन किसी बहस में अपना पक्ष नहीं रखेंगे। बस हंटर चलाएंगे। ऐसे ही बाबाओं के बारे मे कालीदास ने कहा है,

लब्धास्पदोस्मीति विवादभीरोस्तितिक्षमाणस्य परेण निन्दाम्।
यस्यागमः केवलजीविकायै तं ज्ञानपण्यं वणिजं वदन्ति।। -
(मालतिकाग्निमित्रम,1/17)

(जो अध्यापक नौकरी मिलने के बाद बहस से भागता है, दूसरों के आरोप लगाने पर चुप रह जाता है ओर केवल पेट पालने के लिए विद्या पढ़ता है, उसे अध्यापक न समझिए। वस्तुतः वह ज्ञान बेचने वाला बनिया है।)

कालीदास तो पुराने हैं। बाबा बन चुके अध्यापकों के बारे में बीसवीं सदी के कवि ब्रेख्‍त के विचार देखिए,

अध्यापक,
अक्सर मत कहो कि तुम सही हो,
छात्रों को उसे महसूस कर लेने दो खुद-ब-खुद
सच को थोपो मत।:
यह ठीक नहीं है।
सच के हक में बोलते हो जो, उसे सुनो भी।


हिंदी के बाबा अध्यापकों को इंटरनेट पर लिखी जा रही भाषा पर एतराज़ है। जबकि मुझ जैसे युवाओं को लगता है कि हिंदी बौद्धिक संसार की वर्तमान स्थिति को धूमिल की भाषा और तमीज की सख्त ज़रूरत है। अफसोस कि हममें कोई धूमिल जैसा गद्य लेखक नहीं है, जो साफ कह सके कि,

बाबू जी (हमारे संदर्भ में पढ़ें बाबा जी) ! सच कहूं … मेरी निगाह में
न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है
मेरे लिए, हर आदमी एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने
मरम्मत के लिए खड़ा है
और असल बात तो यह है कि
वह चाहे जो है
जैसा है, जहां कहीं है
आजकल
कोई आदमी जूते की नाप से
बाहर नहीं है…
… सबकी अपनी-अपनी शक्ल है
अपनी-अपनी शैली है…

मुझे पूरी उम्मीद है कि गद्य में जो भी धूमिल बनेगा, उसे भी आज नहीं तो कल प्रगतिशीलता, जनवाद और जनसंस्कृति से जुड़े तमाम कलमघिस्सु सम्मान देने को मजबूर होंगे। जीते जी न दे सके, तो मरने के बाद देंगे। ठीक उसी तरह जैसे धूमिल को साहित्य अकादमी सम्मान मरने के बाद दिया था। और इन बाबाओं के लिए यही बेहतर है कि वो स्नो व्हाइट की सौतेली मां जैसा बनने से बचें, जो अपने ही रूप पर मुग्ध रहती थीं। बाबा लोग अपने सार्थक विमर्श रूपी जादुई आईने की बात सुनें लेकिन उस सौतेली मां की तरह स्नो व्हाइट की हत्या के कुत्सित प्रयास न करें बल्कि अपनी असलियत स्वीकार करें। बाबा बनना बंद करें। अपने पंख फैलाना बंद करें। नैतिकतावाद का सोटा लगाना बंद करें। हम जो होना चाहते हैं, हमें वही होने दें। अपने उपदेश अपने पास रखें।

अंत में पिंक फ्लॉयड का एक प्रसिद्ध गीत याद आ रहा है, जिसके बोल कुछ इस तरह थे…

We don't need no education
We don't need no thought control
No dark sarcasm in the classroom
Teachers, leave them kids alone
Hey, Teachers, leave those kids alone

All in all its just another brick in the wall
All in all you're just another brick in the wall


20 अगस्त 2009

साहित्यिक समझ को बकरी चर गई ?


आउटलुक पत्रिका ने एक बार फिर पुराना तमाशा आयोजित किया है। इस तमाशे को देख मुझे जूता भिगो कर मारने वाली कहावत याद आ गई। पाठकों यह जूता असली जूता नहीं है। यह साहित्यिक जुता है। इस साहित्यिक जुते यानि आउटलुक टाप तीन सर्वे को बाल्टी में भिगो दिया गया है। इस सर्वे का परिणाम ही इस जूते की मार होगी। जिस मार से हिन्दी के आउटलुक टाप तीन को छोड़ बाकि बचे सभी कथाकार कराह उठेंगे।
ठीक इसी नाप और माप की जूती कवियों को भी मारी जाएगी। मैं कथाकारों के हवाले से अपना पक्ष रखुंगा। कथाकारों के माध्यम से जो बात रखुंगा वही बात कवियों पर सौ फीसद फिट बैठती है। उम्मीद है पाठक इस बाकी बची बात को खुद बैठा लेंगे।

माना कि आज हर दुकान पर हर सामान के आगे टाप तीन की सूची टँगी मिलती है। टाप तीन नेता, टाप तीन अभिनेता, टाप तीन खिलाड़ी टाप तीन अखबार, चैनल, कार, बाईक, टीवी, फ्रिज, एसी, से लेकर नील-टिनोपाल,साबुन,सर्फ तक की टाप तीन की सूची टंगी रहती है। इस हफ्ते की टाप तीन फिल्में,गाने, धारावाहिक आदि-इत्यादि। कई बार तो हमने टाप तीन कुँवारों की भी सूची देखी है। टाप तीन कुँवारियों की सूची मेरी आँखों के सामने से कभी नहीं गुजरी।

बस कमी रह गई थी तो साहित्य की दुनिया में। इस कमी को भरने का बीड़ा आउटलुक न उठा लिया है। आउटलुक की तरफ से गीताश्री ने सुधी सह्दय पाठकों से उनकी राय माँगी है। कोई कह सकता है कि संबोधन से स्पष्ट है कि वो आप से या आप जैसों से नहीं मुखातिब हैं। गर ऐसा हो तो भी, सवाल तो उठता ही है कि इस रायशुमारी का का अंजाम क्या होगा ?

कृष्ण बलदेव वैद,कृष्णा सोबती,अमरकांत जैसे बुजुर्गवार टाप तीन में आने से रह गए तो इस उम्र में उन पर यह बड़ा जुल्म होगा। उनके फूटे करम की उनका नाम गीताश्री के जबान पर था। इसके बाद तो वो ये भी न कह सकेंगे कि कबीर, तुलसी, गालिब और शेक्सपीयर को भी समकालीनों ने वाजिब महत्व नहीं दिया था। उनका नाम तो सूची में चमक रहा है। उनका जो हश्र होगा लोकतांत्रिक पद्धति से होगा। वही लोकतंात्रिक पद्धति जिसकी इन सभी ने ताउम्र वकालत की है। जब कोई साहित्यकार एक वोट से पिछड़ कर सुकरात की नियति को प्राप्त होगा उसका मुँह देख लायक होगा। जो दो या ज्यादा वोट से पिछड़ेगा वो छोटा सुकरात ठहरेगा सो उसकी की क्या बात। मोहल्लालाइव पर आई कुछ टिप्पणियों से जाहिर है कि जो मत सीधे गीताश्री के मेल बाक्स के बजाए जनता दरबार में खुलेंगे उनका रूझान क्या है।

तमाम विज्ञजन मिल कर हमें समझाएं कि लेखकों,कलाकारों,बुद्धिजीवियों,वैज्ञानिकों इत्यादि के बीच इस तरह के एक-दो-तीन की तख्ती टँागना किस स्तर के बौद्धिक समझ को दर्शाता है। मेरी समझ में तो साहित्यकारों के बीच इस तरह का सर्वे उनका सरासर अपमान है। कालिदास,शेक्सपीयर,वाल्मिकी,होमर, कबीर,तुलसी,इब्सन,बनार्ड शा में कौन है एक कौन है दो और कौन है तीन ? रूमी,फिरोदौसी,हाफिज,गालिब,मीर,इकबाल,नेरूदा,पुश्किन में किसका क्या नम्बर है ? मोहन राकेश,कमलेश्वर,धर्मवीर भारती,राजेन्द्र यादव, निर्मल वर्मा, में किसका नम्बर क्या है ? मुक्तिबोध,निराला,प्रसाद,धुमिल,नागार्जुन में कौन किस नम्बर पर है ? यह फौरी उदाहरण तो बात समझाने के लिए दिए जा रहे हैं। आउटलुक चाहे तो मैं विस्तृत विवरण प्रस्तुत कर दूँगा। गीताश्री समेत आउटलुक की पूरी टीम को यह समझ नहीं है कि इस तरह से टाप तीन चुनना एक बचकानी हरकत है। यह सर्वे जीवित लोगों के बीच किया जाए तब तो इसका दंश सीधा साहित्यकारों को झेलना पड़ता है।आउटलुक वालों को यह तो पता होना ही चाहिए कि टाप तीन का फण्डा सिर्फ उन्हीं चीजों पर लागू होता है जो बाजारू हैं। यानि जो बेचने के लिए ही तैयार की जाती हैं। साहित्य की दुनिया तो गालिब के उसूलों से चलती है ,

न सताइश की तमन्ना न सिले की परवाह
नहीं मानी मेरे अशआर में नहीं न सही

पाप्युलर स्वाद और माँग से हटकर अपने रचनात्मक आग्रहों के लिए लिखने वालों के लिए तो इस तरह के सर्वे एक गहरे अवसाद का कारण बनेंगे। कोढ़ में खाज यह कि यह सर्वे सिर्फ समझ का मामला नहीं है। इस सर्वे मे थोड़ी वस्तुनिष्ठता होती तो कोई एक बार को इसे बर्दाश्त भी कर लेता। लेकिन ऐसा है नहीं। जिस तरह से इस सर्वे का विचार पक्ष खोखला है उसी तरह इसका व्यवहार पक्ष भी दुषित है। उठाने-गिराने के इस खेल के पीछे के कार्य-कारण सम्बन्ध की पड़ताल खोजी पत्रकार ही कर सकते हैं। फिलावक्त हम जो जाहिर है उस पर बात करेंगे।

गीताश्री खुद कथाकार हैं इसलिए आप सब पहले एक नजर उनकी पसंद को देख लें,
कथाकारों की सूची

राजेंद्र ,यादव मन्नू भंडारी, ,अमरकांत कृष्णा ,सोबती कृष्ण बलदेव ,वैद उदय ,प्रकाश ज्ञान ,रंजन मृदुला गर्ग, असगर ,वजाहत अब्दुल बिस्मिल्लाह ,ओमप्रकाश वाल्मीकि, मैत्रेयी पुष्पा
इस सूची को बनाते वक्त गीताश्री ने हर तरह के आरक्षण का पूरा खयाल रखा है। फिर भी ? ध्यान रहे यह सूची कथाकारों की है। तिस पर कथाकार गीताश्री अपनी लिखती हैं,

आपकी सुविधा के लिए हमने समकालीन कवियों और कथाकारों के चुनिंदा नामों की अलग.अलग सूची बना दी है ताकि आप नामों की भूलभुलैया में खो न जाएं।

इस सादगी पर कौन न मर जाए ए खुदा.....गीताश्री कहती हंै कि हमने आप की सुविधा के लिए.....चुना है। वो यह लिखना भूल गई कि आप की सुविधा के लिए..... हमने अपनी सुविधा से चुना है......नामों की भूलभुलैया से पाठकों को बचाने की इस भोली कोशिश के क्या कहने !

गीताश्री ने तुरूप का पत्ता अपने पास रखा है। उनका कहना है कि पाठक चाहें तो सूची के बाहर के नाम भी हमें भेज सकते हैं। इस तुरूप के इक्के के दम पर गीताश्री ने जो किया है उसके आगे सारे तर्क असहाय हो जाएंगे। सामान्य पाठक गीताश्री के परोसे गए नामों के अतिरिक्त अन्य नामांे का स्मरण करना जरूरी समझे या न समझे उनकी समस्या है। वैसे हिन्दी पट्टी में सामने परोसी थाली को छोड़ भण्डारगृह की तरफ लपकने वाले लोग कम ही होंगे। एकाध पाठक सामने परोसे नामो की बजाए अपनी यादाश्त पर जोर डाल कर कोई नाम लिख दे तो भी बहुमत के परोसे गए नामों किए गए भारी मतदान के आगे उनका वोट टें बोल जाएगा।

एक सवाल यह है कि जब सूची बनाई जा रही होगी तो लेखकों को चुनते वक्त कोई तो प्रतिमान सामने रखा गया होगा। या ऐसी ही अललटप्पु........
इस चुनाव का एकमात्र जाहिर प्रतिमान है समकालीनता। समकालीनता से गीताश्री के क्या मायने हैं ये वहीं जानें। उनकी सूची से तो लगता है कि दो लेखकों को समकालीन मानने का उनका एकमात्र आधार लेखक का जीवित होना है। गर ऐसा नहीं है तो फिर किस आधार पर दशकों पहले कहानी लिखना छोड़ चुके राजेन्द्र यादव या ज्ञानरंजन को समकालीन कथाकारों की सूची में ससम्मान रखा गया है। सुधी पाठको को यह समझने में अत्यंत कठिनाई होगी कि राजेन्द्र यादव कमलेश्वर,मोहन राकेश, निर्मल वर्मा धर्मवीर भारती इत्यादि के समकालीन हैं या उदय प्रकाश,अब्दुल बिस्मिल्लाह, या ओम प्रकाश वाल्मिकी के। कुछ ऐसे ही सवाल ज्ञानरंजन तथा अन्य को लेकर भी पूछे जा सकते हैं। समकालीनता की छोड़िए साहित्यिक योगदान की ही बात करते हैं। इन दोनों लेखकों ने कथा साहित्य में आखिरी शफा कौन सा रचा था इसके बारे में गीताश्री इनसे ही पूछ लें तो बेहतर होगा। आखिरी इनका वह कौन सा शाहकार है जो इन्हें विजयदान देथा,शेखर जोशी,स्वयं प्रकाश,संजीव जैसे लेखकों को पीछे धकेलकर इस सूची में ले आता है। रचनाकारों के चुनाव से पहले गीताश्री ने कुछ तो मानदण्ड बनाया होगा।

अगर बात लोकप्रियता या आंकड़ो की है तो मैं प्रेमचंद बनाम गुलशन नंदा की क्लासिक थिसिस की याद दिलाना चाहुँगा। लल्लु और वर्दी वाला गुण्डा के बिक्री संख्या के सामने तो बड़े-बड़े पानी भरने लगेंगे। इसलिए मुझे पूरा विश्वास है कि गीताश्री भी ऐसे आंकड़ों को गंभीरता से नहीं लेती होंगी। फिर भी साहित्यिक कृतियों की बिक्री का सही आंकड़ा जानना हो तो गीताश्री को प्रकाशकों से पूछना चाहिए। उनकी सूचना ज्यादा प्रमाणिक होगी। मुझे पूरा विश्वास है प्रकाशकों से किताबों की बिक्री की सही संख्या जानने की जिद्द दिखाने पर खुदा गीताश्री की किताबों का छपना मुश्किल हो जाएगा। जहाँ तक पत्रिकाओं के पाठकों की बात है तो यह याद दिलाना चाहुँगा कि सरस सलिल सालों से हिन्दी की कई स्वनामधन्य पत्रिकाओं को पाठक संख्या के आधार पर धूल चटा रही है। सरस सलील में लिखने वाले कहानीकारों की पाठक संख्या गीताश्री या अन्य किसी भी युवा लेखक की पाठक संख्या से बहुत ज्यादा है। गीताश्री ध्यान दें कि इस आधार पर तो हिन्दी के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले कहानीकारों की पूरी सूची ही बदलनी पड़ेगी। अतः इस तरह का कोई भी सर्वे तथाकथित जनमत के दुष्प्रयोग से निहित स्वार्थों के लिए किया गया प्रोपगैण्डा ही साबित होता है।
गीताश्री ने सूचीकरण की प्रक्रिया में एक रचनाकार पर जाने-अनजाने बड़ा ही मारक और तीखा व्यंग्य कर दिया है। इसके मासूम शिकार बने हैं विनोद कुमार शुक्ल। हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चित और प्रशंसित लेखकों में एक विनोद का नाम कवियों की सूची में है लेकिन कथाकारों के बीच से गायब है। नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे, दीवार में एक खिड़की रहती थी के लेखक विनोद कुमार के बारे में विष्णु खरे के विचार देखिए,

“....उनका यह तीसरा उपन्यास दीवार में एक खिड़की........यह साफ कर देता है कि अब हिन्दी साहित्य का कोई भी मूल्यांकन उन्हें हिसाब में लिए बिना विकलांग तथा अविश्वसनीय रहेगा.....”
विष्णु खरे के हिसाब से गीताश्री की कथाकारो ंकी प्रस्तुत सूची विकलांग और अविश्वसनीय है। गर विष्णु खरे ने गलत कहा हो तो गीताश्री पाठकों को अपनी राय से जरूर अवगत कराएं। एक पल के लिए कोई मान भी ले कि विजयदान देथा, शेखर जोशी, स्वयं प्रकाश,संजीव,उषा प्रियंवदा जैसांे का नाम राजेन्द्र यादव या ज्ञानरंजन या इस सूची के कुछ अन्य ऐसे ही नामों के आगे नहीं टिक सका। या यह भी मान लें कि इन नामों के चुनाव के लिए हुए बात-विचार में शामिल किसी शख्स को इनका नाम ध्यान नहीं आया। लेकिन बगल में ढुलकी कवियों की सूची में चमकता विनोद कुमार शुक्ल के नाम का मामला सिर्फ उनकी यादाश्त का नहीं है। असल मामला क्या है इस आउटलुक जाने या गीताश्री जानें !

हम तो इतना ही जानते हैं कि साहित्यकारों के बीच इस तरह की टाप तीन सर्वे की कवायद किसी लेखक के साहित्यिक महत्व के बारे में थोथी समझ का परिचायक है। और ऐसी समझ वालों के हाथ लोकतांत्रिक दिखने वाले जालसाज तरीकों से अपने साहित्यकारों का अपमान होते देखना हिन्दी प्रेमियों के लिए त्रासदीपूर्ण है।




18 अगस्त 2009

बाल श्रम


गौरैए का बच्चा गौरैए को दाना नहीं चुगाता
चूजा मुर्गी को चुग्गा नहीं कराता
बिल्ली का बच्चा बिल्ली के लिए चूहे नहीं मारता
यह महानता तो सिर्फ मनुष्य को नसीब है।
हम सबसे बुद्धिमान, सबसे बलवान नस्ल हैं
हम काबिले तारीफ हैं।
एकमात्र जिन्दा प्राणी
जो जीता है अपने बच्चों की मेहनत पर।

- शार्लोट पर्किन्स गिलमैन

16 अगस्त 2009

यह तमाशा......किसके लिए ?



हम आजाद हैं। आजाद होने की खुशी लफ्जों में बयां नहीं की जा सकती। तो चलो करोड़ो रूपए खर्च करके इंडिया गेट से लाल किला तक परेड कराई जाए। अपनी जेब से तो पैसा जाना नहीं है। तो खर्च करो ,जम कर खर्च करो। पिछली सरकार के वक़्त जैसा तमाशा हुआ था उससे अच्छा होना चाहिए। उससे शानदार होना चाहिए। भाई यह तो सोच हुई अपने नेताओं की ।लेकिन आप और हम ?
हम तो आम इंसान हैं। मैंगो पिपुल। हमारी कमाई कई साल से पानी की तरह बहाई जा रही है और हम हैं की टीवी पर प्रदेशों की झाकियां देख कर खुश हैं.

एक देश एक परिवार होता है जहाँ हर किसी को एक दूसरे के दुःख को समझना चाहिए। क्या परिवार में यही होता है की कोई सदस्य भूख से मर रहा हो और बाकी सदस्य पार्टी एन्जॉय कर रहे हो ? मुल्क के किसान खुदकुशी कर रहे हैं, पूरा-पूरा परिवार पानी में ज़हर मिला कर पी जाता हैं। क्यूंकि गरीबी सही नहीं जाती।. न जाने कितने लोग इलाज न मिलने के कारण दम तोड़ देते हैं। कितने लोग दवाई न मिलने की वजह से मौत को गले लगा लेते हैं। हजारों बच्चे मिड-डे मील का खाना खाकर बीमार पड़ रहे हैं। कितने ही बच्चे कुपोषित जिस्म लेकर सड़कों पर नज़र आते हैं। इन सबके बावजूद राष्ट्रीय धन कोष का एक बहुत बड़ा हिस्सा १५ अगस्त और २६ जनवरी के सेलेब्रेशन में खर्च होता है. कई लोगों का मानना है कि ये राष्ट्रीय गौरव की बात है, झांकियों का निकलना, जवानों का परेड करना ये सब देश की तरक्की को दर्शाता है !!

भई, जिन जवानों को देख कर गर्व होता है उनकी बुनियादी ज़रूरतों के बारे में सोचो। जिन प्रदेशों की झाकियां देख कर सर ऊँचा हो जाता है उनके यहाँ पानी और बिजली की सुविधाओं के बारे में सोचो। और जिन बच्चों को परफोर्म करते देख ख़ुशी से फूले नहीं समाते, कम से कम उनके भविष्य के बारे में ही सोच लो।

हर साल १५ अगस्त के मौके पर दिल्ली पुलिस की 196 कंपनियां, सेंट्रल पैरामिलिटरी फोर्सेस की 55 कंपनियां, तकरीबन 800 कमान्डोज और तकरीबन 35 हज़ार पुलिस के नौजवान व्यस्त रहते हैं यानी उस वक़्त वो सिर्फ १५ अगस्त के सेलेब्रेशन की तैयारी करते हैं. इतना झमेला, इतना पैसे की बर्बादी किसलिए ?

अपनी नाक बचाने के लिए ? या जनता को उलझाने के लिए ?

मैंगो पिपुल तो इस तामझाम को टीवी पर देख पाता है। आधी से ज्यादा आबादी के पास तो टीवी ही नहीं है। जिनके पास टीवी है उनमें से आधे के पास बिजली नहीं है। अब बताइए जनता यह तमाशा कहाँ देखेगी ? चुनांचे कहीं देख भी ले तो......
तो क्या सोचेगी ?


- फौजिया रियाज

15 अगस्त 2009

सुबहे आजादी


ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर
वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं

ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आख़री मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज् का साहिल
कहीं तो जा के रुकेगा सफ़िना-ए-ग़म-ए-दिल
जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों से
चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े
दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से
पुकरती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे
बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन
बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन
सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी दबी थी थकन

सुना है हो भी चुका है फ़िरक़-ए-ज़ुल्मत-ए-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम
बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर
निशात-ए-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाब-ए-हिज्र-ए-हराम
जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन
किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं
कहाँ से आई निगार-ए-सबा, किधर को गई
अभी चिराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं
अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई
नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई
चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई
- फैज

14 अगस्त 2009

हैप्पी स्वतंत्रता दिवस



राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।



मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।


पूरब-पश्चिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा,उनके
तमगे कौन लगाता है।

कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।

- रघुवीर सहाय

12 अगस्त 2009

एक पँक्ति ……..


हम पाठकों के सामने चरणदास चोर’ नाटक की हबीब तनवीर लिखित भूमिका का वह अंश रख रहे हैं जिसको लेकर कुछ लोगों को आपत्ति है। इस भूमिका के इस अंश से जाहिर हो जाएगा कि हबीब तनवीर सतनामी संप्रदाय के प्रति क्या भाव रखते थे। सतनामी संप्रदाय के सामने इस नाटक के मंचन के अपने अनुभव का इस भूमिका में जिक्र करते हुए हबीब कहते हैं कि,


"मुझे दर्शकों की राय मिल गई थी। उन्होंने नाटक के अपनी कच्ची शैली और बाकि सभी कमजोरयों के बावजूद पसंद कर लिया था। दर्शकों में सभी लोग पंथी थे और पंथियों का बुनियादी उसूल है:सत्य ही ईश्वर है, ईश्वर ही सत्य है। यही उसूल उनके रोजमर्रा के पारंपरिक गीत में भी है, और उसी गीत पर हमने नाटक को खत्म किया था। बस ये सब देख-सुनकर उनकी भावुकता उबल पड़ी थी। इस भावुकता का एक कारण यह भी हो सकता है कि उन्हीं के पंथ का एक व्यक्ति इस नाटक का नयक थ् जिसे नाटकों में पहले कभी नहीं देखा गया था। पंथ की स्थापना से पहले गुरू घासीदास स्वयं एक डाकू थे। शूद्र वर्ग के लोगों ने सतनामी धर्म अपनाया तो उन्होंने समाज में उनकी आत्महीनता दूर करने के लिए उन्हें जनेऊ पहनने का आदेश दिया। इन तमाम चीजों के बावजूद आजतक उनका मुकाम गाँव के बाहर है। उनका कुआँ,उनका पानी समाज से अलग है। इन्हीं कारणों से सतनामियों में अपने धर्म के प्रति जोश होता है। वे अपनी सुरक्ष के लिए लाठी चलाने में भी निपुण होते हैं और जहाँ तक अपने अधिकारों के लिए लड़ने का संबंध है तो इतिहास सैकड़ों साल से उनके आंदोलनों ,उनके संघर्ष से भरा पड़ा है।"

नोट- अतः यह मामला इतिहास और मिथक के गुँथे-बिंधे होने के कारण हुई चूक का है। या फिर मतांतर का है। इस एक पँक्ति के ऊपर आपत्ति होने से अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका पर रोक लगानी की कोशिश का कोई औचित्य नहीं बनता। आपत्ति-अनापत्ति की बात करनी ही है तो उस एक पँक्ति पर होनी चाहिए न कि पूरी भूमिका या पुस्तक पर। इस भूमिका में हबीब तनवीर ने 'चरणदास चोर' नाटक के ऐतिहासिक विकास को प्रस्तुत किया है। इस नाटक को देखने-पढ़ने वालों को लिए इस भूमिका का अत्यधिक महत्व है। इस पूरे अंश और खास कर आखिरी पँक्तियों से साफ जाहिर है कि हबीब तनवीर के मन में सनातनी लोगों के लिए अत्यधिक प्रशंसा का भाव था।

11 अगस्त 2009

फिर फांसी पर लटका चरणदास चोर


राजेश अग्रवाल, रायपुर से रविवार डॉट कॉम के लिए

छत्तीसगढ़ी रंगमंच की अनमोल धरोहर पद्मविभूषण हबीब तनवीर का चरणदास चोर इन दिनों कटघरे में है। बीते 5 दशकों से दुनिया भर में हजारों मंचनों के जरिये राज्य की लोककला, सामाजिक स्थिति व संस्कृति को पहचान दिलाने वाली इस कालजयी कृति को जिस तरह सरकार और रंगकर्म के झंडाबरदारों ने मिलकर विवादों के घेरे में ला दिया है, उससे निकट भविष्य में इस नाटक को हबीब की कर्मभूमि छत्तीसगढ़ में निर्विघ्न खेला जाना मुश्किल हो गया है। इस विवाद के बीच किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि न तो छत्तीसगढ़ सरकार ने चरणदास चोर किताब को प्रतिबंधित किया है और ना ही नाटक को। विरोध-प्रदर्शन और उस पर सरकार की चुप्पी ने मामले को अनावश्यक रूप से उलझा दिया है।

बखेड़ा तब शुरू हुआ जब सतनामी समाज के एक धर्मगुरु बालदास ने मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह से मुलाकात कर वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित हबीब तनवीर की किताब चरणदास चोर पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। स्कूली बच्चों में किताबों पर रुचि जगाने के लिए छत्तीसगढ़ में हर साल पुस्तक वाचन सप्ताह का आयोजन किया जाता है, इनमें सामूहिक रूप से किताबें पढ़ी जाती हैं। वाणी प्रकाशन की यह किताब भी उन पुस्तकों की सूची में शामिल थी, जिन्हें पढ़ने के लिए स्कूलों में भेजा गया। गुरु बालदास ने शिकायत की थी कि किताब में बताया गया है कि सतनामी पंथ की स्थापना से पहले बाबा घासीदास डकैत थे। यह बात आधारहीन है और इससे गुरु घासीदास व समाज का अपमान हो रहा है। आनन-फानन में शिक्षा संचालनालय ने इस किताब को पुस्तक वाचन से हटाने का निर्देश दे दिया और यह भी चेतावनी दी कि यदि किसी स्कूल में किताब को पढ़ते हुए पाया गया तो जिम्मेदार शिक्षक पर कार्रवाई की जाएगी।

छत्तीसगढ़ में सतनामी समाज अनुसूचित जाति का दर्जा रखता है। अरसे से समाज का यह तबका शोषण का शिकार रहा है, लेकिन राज्य की राजनीति में इनका काफी महत्व है। दोनों ही प्रमुख राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा इनके वोट बैंक अपने पास रखने के लिए तमाम उपाय करते हैं। सतनामी समाज के नेताओं व गुरुओं को राजनेता साधने में लगे रहते हैं।
गुरु बालदास सतनामी समाज में काफी प्रभाव है। वे तब खासे चर्चित हुए जब पिछले साल जुलाई माह में बिलासपुर जिले के बोड़सरा में एक निजी स्वामित्व की भूमि बाजपेयी बाड़ा पर उन्होंने समाज का हक जताया और कहा कि यह उनके गुरु अघनदास की कर्मभूमि है। इसे हासिल करने के लिए सतनामी समाज के हजारों लोग एक मेले में इकट्ठे हुए। भीड़ के हिंसक हो जाने के बाद पुलिस ने गुरु बालदास समेत दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया। इसके बाद विधानसभा में इस मुद्दे पर लगातार हंगामा हुआ। कांग्रेस गुरु बालदास की रिहाई मांगती रही, जबकि सरकार अपने बचाव में लगी थी।

कांग्रेस के सभी गुटों के नेता गुरु बालदास के पक्ष में हो गए थे। कुछ दिनों बाद ही राज्य में चुनाव होने वाले थे। यह नाराज़गी भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। राज्य सरकार ने घोषणा कि बोड़सरा बाड़ा की को अधिग्रहित किया जाएगा और वहां एक स्मारक बनाया जाएगा। राजनैतिक विश्लेषकों ने माना कि सरकार ने यह फैसला अपनी पार्टी के नफे-नुकसान को ध्यान में रखते हुए लिया। हालांकि राज्य सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और अधिग्रहण की घोषणा पर अभी तक आगे की कार्रवाई नहीं की जा सकी है। लेकिन इस मामले ने मीडिया और समाज में गुरु बालदास को चर्चित तो कर ही दिया।
पुस्तक वाचन सप्ताह में किताब को पढ़ने से रोकने के लिए राज्य सरकार की तरफ से जारी आदेश में गुरु बालदास के इस प्रभाव का ही असर दिखाई दे रहा है। बोड़सरा आंदोलन में संयम का अभाव था, वहीं चरणदास चोर के मुद्दे पर गुरु बालदास संयमित रहे। उन्होंने विरोध दर्ज कराने का शांतिपूर्ण व लोकतांत्रिक तरीका अपनाया। लेकिन राज्य सरकार ने फैसला घबराहट में ले लिया।

सतनामी समाज में बाबा घासीदास पर आस्था व्यक्त करने के लिए पंथी नृत्य का चलन है। बाबा घासीदास सत्य के पुजारी थे। चरणदास चोर नाटक का नायक भी सत्य निष्ठा की शपथ लेता है। पंथी नृत्य तथा पद्मश्री देवदास बंजारे को चरणदास चोर में शामिल किए गए नृत्य से अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली। हबीब तनवीर का प्रत्येक सृजन छत्तीसगढ़ के शोषितों, दलितों व आदिवासियों की विषमताओं का आईना और समृध्द लोक व शिल्प कलाओं का प्रतिबिम्ब है। उनका अपना जीवन, उनके कलाकार और उनका रंगकर्म सामाजिक सौहार्द्र को बढ़ाने और गरीबों, पिछड़ों को महत्व दिलाने के लिए समर्पित रहा।
दरअसल चरणदास चोर नाटक के किसी भी अंश में सतनामी समाज के ख़िलाफ कोई टिप्पणी ही नहीं है। विवाद वाणी प्रकाशन की किताब की भूमिका को लेकर है। भूमिका में एक दो वाक्य विवादास्पद हैं, जिस पर सतनामी समाज का विरोध भी जायज है। गुरु बालदास का दावा है कि उन्होंने सन् 2004 में ही वाणी प्रकाशन की किताब में शामिल भूमिका को लेकर आपत्ति दर्ज करा दी थी।

संभवतः उस समय दर्ज कराए गये उनके विरोध को नौकरशाहों व सरकार ने महत्व इसलिए नहीं दिया कि वे गुरु बालदास के प्रभावों से परिचित नहीं थे। इसलिये उस समय उनका ज्ञापन किसी फाइल में धूल खाने के लिए छोड़ दिया गया होगा। वाणी प्रकाशन की भूमिका को या कम से कम उस अंश को हटा दिये जाने के बाद भी चरणदास चोर नाटक कहीं प्रभावित नहीं होता।
इस बार जब पुस्तक वाचन सप्ताह के लिए उसी किताब को खरीद कर मंगा लिया गया। 2004 में जो हिस्सा छपा था, 2009 में भी वह यथावत आ गया है। मतलब यह कि जो किताबें पढ़ने के लिए बच्चों को दी जा रही है, उस पर खुद अफसर नज़र नहीं डालते। यदि यहां पर गलती हो भी गई तो उसे पुस्तक वाचन में प्रतिबंधित करने के दौरान फिर दोहरा दिया गया। शिक्षा विभाग पूरे किताब पर प्रतिबंध लगाने के बजाय उन दो विवादित वाक्यों को न पढ़ने का आदेश जारी कर सकती थी। बच्चों को किताबें देने से पहले इन दो वाक्यों को विलोपित भी किया जा सकता था। पर पूरी की पूरी किताब को प्रतिबंधित करने और यह स्पष्ट नहीं करने से कि नाटक को लेकर किसी को कोई आपत्ति नहीं है, मामला उलझ गया।

नतीजा यह निकला है कि सरकारी आदेश के बाद चरणदास चोर नाटक ही कटघरे में दिखाई देने लगा है।स्कूल शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने प्रतिबंध लगने वाले दिन ही बयान दिया था कि किताब से विवादित हिस्से को हटाया जाएगा उसके बाद पठन-पाठन के लिए भेजा जाएगा। लेकिन फोकस केवल यही बात हुई है कि सरकार ने चरणदास चोर पर पाबंदी लगा दी है। देशभर में बुध्दिजीवी, रंगकर्मी और साहित्यकार सरकार के फैसले की आलोचना इसी आधार पर कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में तो कुछ कला प्रेमियों ने तख़्तियां लेकर संस्कृति विभाग के सामने प्रदर्शन भी कर डाला। अफसोसजनक है कि इन सब गतिविधियों से सरकार अभी तक आंख मूंदे बैठी हुई है। हबीब तनवीर की प्रतिष्ठा और उनकी कृति को इससे कितनी क्षति पहुंच रही है इसका वह अनुमान भी नहीं लगाना चाहती। यह रवैया पुस्तक को वाचन से हटाए जाने से भी ज्यादा खतरनाक है।
राज्य सरकार के पास ऐसे संवेदनशील मामलों से निपटने के लिए अनुभवी अफसरों की कमी दिखाई दे रही है। राज्य को तत्काल साफ करना चाहिए कि नाटक में कोई आपत्तिजनक बात नहीं है और न ही इसके प्रदर्शन पर कोई पाबंदी है। इस चुप्पी के चलते एक गुट नाटक के पक्ष में खडा़ हो रहा है जबकि दूसरे गुट में इस नाटक के ख़िलाफ भीतर ही भीतर आक्रोश पनपने का खतरा दिखाई दे रहा है।

पूरे नाटक का कोई छोटा सा भी हिस्सा विवाद के घेरे में नहीं है, फिर भी ताजा हालात यह है कि राजधानी से लेकर गांव-देहात तक जिस चरणदास चोर के मंचन ने कला के रसिकों को तृप्त किया है, उसका मंचन होने पर विरोध में झंडे-डंडे निकल सकते हैं और जिस सामाजिक मेल-मिलाप के लिए हबीब तनवीर और उनकी टीम ने अपना सर्वस्व होम किया, उसी को क्षति पहुंचेगी। नाटक के पात्र चरणदास चोर ने अपने वचन और सच की लड़ाई लड़ी और फांसी पर चढ़ना मंजूर किया था। एक बार फिर यह बेकसूर नाटक उसी फंदे पर चढ़ता नज़र आ रहा है।

(रविवार डॉट कॉम से साभार)

9 अगस्त 2009

शर्म तुमको मगर नहीं आती.....सरकार !!


तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की
ये एहतियात जरूरी है इस बहर के लिए दुष्यंत कुमार


इस खबर को पढ़ते वक्त मन में जो भाव उठें उन्हें खुल कर अभिव्यक्त करते हुए पढ़ें।

“इस देश की छत्तीसगढ़ सरकार ने रंगकर्मी हबीब तनवीर द्वारा मंचित अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति और प्रतिष्ठा प्राप्त क्लासिक नाटक “चरणदास चोर” को प्रतिबंधित कर दिया है।“


सवाल यह है कि सरकार राज में सत्ता का सारा जोर विनायक सेन,तस्लीमा नसरीन,आशीष नंदी और चरणदास चोर पर ही क्यों चलता है ?

सवाल यह भी है कि, इन तथाकथित सरकारों के मन में संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों का भय इस कदर क्यों व्याप्त रहता है ?

इन सवालों के साथ ही,

हम छत्तीसगढ़ सरकार के इस कृत्य की घोर निंदा करते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार के इस दमघोंटु फासीवादी हिटलरी फर्मान की हम खुली और पुरजोर मुखालफत करते हैं।

पुनश्चः -

रविवार डॉट कॉम पर आई राजेश अग्रवाल की रिपोर्ट के बाद स्पष्ट हुआ कि चरणदास नाटक पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा है। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मुझ तक यह खबर जनसत्ता में अशोक वाजपेयी के कभी-कभार कालम से पहुँची। अपना फौरी लिखित प्रतिरोध दर्ज कराने के लिए ब्लाग खोला तो कबाड़खाना पर प्रणय कृष्ण का पत्र छप चुका था जिससे इस गलत खबर की गलत पुष्टी हुई। मैं यह स्पष्ट कर दुँ कि इस पूरे मामले में मेरी जिम्मेदारी ही प्रमुख है। मैंने इस ब्लाग पर एक गलत खबर के आधार पर पोस्ट लगाई। इसके लिए सभी पाठकों से क्षमाप्रार्थी हूँ। मुझे खेद है कि मैंने उनके लिखे पर भरोसा किया और मेरे इस अंध-विश्वास के कारण कई पाठकों तक इस खबर का मिथ्या-भाष्य प्रेषित हुआ। अंत में इन्हीं शब्दों के साथ मैं इस संदर्भ में अपना आधारविहीन निंदा-प्रस्ताव वापस लेता हूँ।

6 अगस्त 2009

हिन्दी साहित्य में आदि-वासी कहाँ है ?



अश्विनी कुमार पंकज -
2009 की 31 जुलाई के एक दिन बाद जब सारे हिंदी साहित्यकार प्रेमचंद जयंती आयोजनों की थकावट दूर कर चुके होंगे, मैं अपना यह सवाल उनके सामने रखना चाहता हूं कि प्रेमचंद और प्रेमचंद की परंपरा में आदिवासी समाज कहां हैं? मेरा सवाल प्रेमचंद के बहाने प्रेमचंद की परंपरा से ज्यादा है । यह आदिवासी विषय पर सक्रिय एक विद्यार्थी की जिज्ञासा है।


ध्यान देने की बात है कि बीसवीं सदी की शुरुआत में समाज, राजनीति और साहित्य में सक्रिय सभी लोगों ने दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के हितों की बात तो की, लेकिन किसी ने भी आदिवासियों के बारे में सोचने की ज़हमत नहीं उठायी। समाज सुधारक, लेखक और राजनीतिज्ञ, किसी ने भी उन लोगों की सुध लेने की आवश्यकता नहीं महसूस की, जिनकी बेदखली, लूट और नरसंहारों पर नये औद्योगिक भारत की नींव रखी जा रही थी। स्वतंत्रता के पहले भी और स्वतंत्रता के बाद भी।


कोयला, लोहा, बाक्साइट, लकड़ी और अन्य सभी प्राकृतिक संसाधन जहां से आ रहे थे, इन संसाधनों के जो नैसर्गिक स्वामी थे, उनके साथ क्या हो रहा था, यह जानने की कोशिश ही नहीं की गयी। क्यों हमारी दृष्टि चार वर्णों तक ही संकुचित है। हमें अपनी ही तरह बलशाली दूसरे धर्म-संप्रदाय तो दिखते हैं, लेकिन वह प्रकृति पूजक एवं आदि धर्मानुयायी आदिवासी नहीं दिखता है। जिसकी आवश्यकताएं सबसे न्यूनतम है और जो सर्वाधिक भाषाओं व संस्कृतियों के बीच बिना किसी टकराव या रक्तरंजित साम्राज्यवादी खेल के आनंद से जीता है। चूंकि अपनी संख्या बल और रिहाइश के आधार पर दलित एवं अल्पसंख्यक समुदाय वोट की राजनीति को प्रभावित करते हैं, इसीलिए उनको अनदेखा नहीं किया जा सका। बाबा साहेब आंबेडकर की उपस्थिति और दमदार दलित आंदोलनों के कारण भी शासक वर्ग को दलितों की बात सुननी पड़ी। यह अलग बात है कि आज तक व्यवहार में उसका क्या हश्र हुआ।


हम सभी जानते हैं कि फूले, आंबेडकर, राजा राम मोहन राय और गांधी जी जैसे समाज सुधारकों और विचारकों ने दलित, अल्पसंख्यक एवं स्त्री मुक्ति के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समाज को आंदोलित किया। चाहे जिसकी जैसी भी जातीय-धार्मिक सीमा या राजनीतिक नीयत रही हो। पर सबने इन शोषित-वंचित समुदायों के लिए कुछ न कुछ कहा। कुछ न कुछ किया। लेकिन आदिवासी समुदायों के बारे में एक लंबी चुप्पी इतिहास से वर्तमान तक अजगर की तरह पसरा हुआ है। दुर्गम क्षेत्रों में अपने निवास स्थलों और नगरीय जीवन से अलगाव के कारण आदिवासी आज भी दलितों-अल्पसंख्यकों की तुलना में भारतीय राजनीति पर दवाब डालने की स्थिति में नहीं हैं, पर निःसंदेह वे भारतीय विकास की रीढ़ हैं। उनके संसाधनों पर कब्ज़ा करके ही आधुनिक भारत का विकास संभव हो सका है।


सभी लोग यह स्वीकार करते हैं कि भारत में सबसे ज़्यादा खोने और सबसे कम पाने वाला समाज आदिवासियों का ही है। इतिहास में मुक्ति की सबसे ज़्यादा लड़ाइयां आदिवासी समुदायों ने ही लड़ी हैं। उन्होंने भारत के किसी भी समुदाय से सबसे ज़्यादा त्याग और बलिदान किया है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट और दोहन के लिए वे औपनिवेशिक काल में भी मारे जा रहे थे और आज के स्वतंत्र भारत में भी मारे जा रहे हैं। कोयलकारो, नेतरहाट, कलिंग नगर, सिंगूर, नंदीग्राम और लालगढ़ इक्कीसवीं सदी के सबसे नये आदिवासी मृत्यु क्षेत्र हैं। लेकिन उनकी चर्चा न तो भारतीय मुख्यधारा के समाज में है, न इतिहास में है। हिंदी साहित्य में तो है ही नहीं। जो है, वह ‘सॉरी’ बोलने लायक जितना भी नहीं है।


यह आदिवासी जिज्ञासा प्रेमचंद से ज़्यादा उन लोगों से है, जो अपने आपको उनकी परंपरा का वाहक बताते हैं। जो प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री, प्रेमचंद के साहित्य में दलित, प्रेमचंद के साहित्य में अल्पसंख्यक, प्रेमचंद के साहित्य में किसान आदि-आदि विषय सामने लाते हैं और उन्हें भारतीय समाज का सबसे प्रमुख प्रतिनिधि साहित्यकार घोषित करते हैं। प्रेमचंद से छूट गया आदिवासी आज भी उनकी परंपरा से क्यों बहिष्कृत है? प्रेमचंद की परंपरा के लोगों को ‘प्रेमचंद के साहित्य में आदिवासी’ भी लिखना चाहिए। आदिवासी भारत को बहिष्कृत कर कोई कैसे संपूर्ण भारतीय समाज का प्रतिनिधि कहला सकता है? अगर प्रेमचंद की परंपरा और आज के भारतीय साहित्य, समाज और राजनीति में आदिवासी समाज के लिए कोई स्थान नहीं है, फिर तो देश भर के आदिवासी इलाके जिन्हें पूरी तरह से माओवादियों या नक्सलियों के नियंत्रण में बताया जा रहा है, जहां पिछले तीन सौ वर्षों से आदिवासी अपने अस्तित्व-अधिकार की अंतिम निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं, वे आपके साहित्य, समाज और राजनीति को क्यों नहीं खारिज कर दें।


दुनिया के आदिवासी समाजों ने अपनी लड़ाईयां खुद ही लड़ी हैं। इतिहास में भी और आज भी। दुनिया भर की विभिन्न भाषाओं में रचित लाखों टन क्रांतिदर्शी व मार्गदर्शी साहित्य के शब्दों ने उनकी कोई मदद नहीं की है। वे आज भी अलिखित समाज हैं। विश्वास न हो तो सरकार के आंकड़ें उठा कर देख लीजिए उनकी साक्षरता दर क्या है। वे स्वावलंबी जीवन जीते हैं। हमारी तरह नहीं कि उनके संसाधनों को लूट लेने के बाद भी उनके नाम पर पिछले साढ़े छः दशक से विकास का पैसा खा रहे हैं।
9 नवंबर 1947 को ही यह तय हो गया था कि भारत आदिवासियों, दलितों ओर कमजोर लोगों का देश नहीं है, जब नेहरू-पटेल के साथ जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में झारखंडी समूह की वार्ता टूट गई थी। भारतीय संविधान बनने के पहले हुई इस वार्ता में जयपाल सिंह मुंडा ने कहा था,

‘संविधान तुम्हारा है, सीमाएं तुम्हारी हैं, संप्रभुता तुम्हारी है, झंडा तुम्हारा है। हमारा क्या है? क्या है तुम्हारे प्रस्तावित संविधान में जो आदिवासियों और मुख्यधारा, दोनों के लिए एकसमान है।’ कैसी विडंबना है भारत के आदिवासी समुदाय को आज भी यही सवाल करना पड़ रहा है। भाषा तुम्हारी है। साहित्य तुम्हारा है। अकादमियां तुम्हारी हैं। पत्रा-पत्रिकाएं तुम्हारी हैं। लेखक तुम्हारे हैं। मान-सम्मान और पुरस्कार तुम्हारा है। हमारा क्या है?

इंटरनेट पर ‘झारखंड’ सर्च मारिए। महेन्द्र सिंह धौनी मिलेंगे। जयपाल सिंह मुंडा नहीं। जिन्होंने 1928 के आलंपिक में भारतीय हाॅकी की कप्तानी की थी और स्वर्ण जीतकर लाए थे। बाजार के उन्मादी ‘भारतीय’ देशी हाॅकी की शान जयपाल सिंह मुंडा को नहीं जानते हैं। वैसे ही हिंदी में प्रेमचंद की परंपरा के माठाधीश आदिवासियों को नहीं जानते हैं। उनकी इतिहास की लड़ाईयों को और आज के संघर्षों को नहीं जानते हैं। यूनेस्को के अनुसार देश की 196 जन भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है। इनमें अधिकाशं भारत की आदिवासी भाषाएं हैं। उनकी चिंता किसी को नहीं है। भारत की दो करोड़ से भी जयादा आबादी नगरीय सज्जनों को सुख-सुविधा देने की एवज में ग्रामीण-आदिवासी नक्शे से ‘डीलीट’ हो चुकी है, इंडिया को क्या फर्क पड़ता है। नहीं जानना बुरा नहीं है। जान कर नहीं जानना सबसे बुरा है। मुख्यधारा का हिंदी साहित्य यही कर रहा है। साहित्य यदि बाजार के लिए नहीं है मनुष्य और मनुष्यता के लिए है, तो हिंदी साहित्य की प्रस्तुति आदिवासी समाज के बगैर क्यों है?
अंत में नवंबर 1947 में हुई वार्ता के दौरान पटेल ने नेहरू ओर मौलाना आजाद से क्या कहा था, इसे जरूर जान लेना चाहिए।
पटेल ने कहा था,

"we don’t fight the tribals. These people fought wars of independence years before 1857. They are the original nationalists"

(मोहल्लालाइव से साभार)

5 अगस्त 2009

निगाहे शौक सरे बज्म बे-हिजाब न हो

निगाहे शौक सरे बज्म बे-हिजाब न हो
वे बेखबर ही सही इतने बेखबर भी नहीं

फैज

विनीत भाई आपका जवाबी पत्र पढ़ा। इसे पढ़ कर पुरानी कहावत याद आई कि,

गाल देइबै बजाए
सास जइहैं लजाए

विनीत भाई आपने बहुत लंबी- लंबी बातें की हैं। लेकिन मूल मुद्दे पर कुछ कहा ही नहीं। आपसे मैंने अपने पत्र में कई प्रश्न पूछे थे जिनमें से किसी का भी आपने सीधा जवाब नहीं दिया। आप आहत हैं कि मैंने आपको ‘राजेन्द्र यादव की आदमी’ बताने की कोशिश की है। जबकि मैंने ऐसा कही नहीं कहा है। गर फिर भी आप को लगता है कि आप सही हैं तो

आप मुझे और सभी को बताएं कि मैंने अपने पत्र में किस जगह आपको ‘राजेन्द्र यादव का आदमी’ बताने की कोशिश की है ??

आापको मेरे और आपके बीच शुरू हो गयी बहस में भी व्यक्तिवाद की गंध आने लगी है। पहले यह गंध आपको नामवर सिंह के भाषण में आई थी। भाई आप एक बार मेरी तसल्ली के लिए स्पष्ट कर दें के कहीं ऐसा तो नहीं कि यह गंध आपके नाक में ही बसी हुई हो और कस्तुरी कुण्डली बसै....की तर्ज पर आप इसके पीछे इधर-उधर भाग रहे हैं।

दो व्यक्तियों के बीच चली बहस के महत्व को लेकर आपको जो भ्रम हैं, उसके लिए इस वक्त सिर्फ दो बहसों का जिक्र करूँगा, ब्रेख्त और लुकाच के बीच चली बहस तथा लेनिन और रोजा लक्जमबर्ग के बीच चली बहस। जरूरत पड़ी तो और शेष उदाहरण फिर कभी....यह तो उन व्यक्तियों पर निर्भर है कि वो किन सारोकारों के तहत बहस कर रहें हैं।

आप व्यापकता की बार-बार दुहाई देते हैं। हालाँकि मैं तो मुक्तिबोध के निबंध ‘डबरे पर सूरज का बिंब’ का ही कायल हूँ। फिर भी गर आपको सारोकारों की व्यापकता की इतनी ही चिंता है तो मैंने उस पत्र के बहाने जिस मुद्दे को उठाने की कोशिश की है उस पर कुछ लिखिए तो बहस अपने आप महत्वपूर्ण हो जाएगी। आप भूल चुके होंगे या जानबूझ कर भूलना चाहते हैं इसलिए याद दिला दूँ कि, वह मुद्दा है,

“एंचोर पाका.....साहित्यिक चमचे और चमचों के आका”

विनीत भाई, आपने निहायत ही व्यक्तिगत स्तर पर उतरते हुए मुझ पर नाम चमकाने की कोशिश का भद्दा आरोप लगाया है। मुझे सूप और चलनी वाली पुरानी कहावत याद आ गई।

भाई, आप तो हिन्दी विभाग में शोध-रत हैं, वहीं पढ़े हैं, संभवतः वहीं पढ़ाएंगे भी। नामवर सिंह के पक्ष या विपक्ष में मोर्चा खोलने से आपको तो कोई फायदा हो भी सकता है लेकिन मुझे नहीं। गर हो सकता है तो मुझे बताएं। मैंने अपने पत्र में आपके ऊपर कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाया है। मैंने अपने पत्र का आधार आपके लेख में लिखी बातों को बनाया है। न कि आपकी तरह मण्डी हाउस में खाए गए समोसे या छत्तीसगढ़ के अनदेखे जंगल को।

मैंने अपने चार साल के दिल्ली प्रवास में सिर्फ दो साहित्यिक समारोह में शिरकत की है। जिनमें हंस का समारोह ही दूसरा समारोह था। मैं कहानी,कविता भी नहीं लिखता की हिन्दी साहित्य के माफियाओं के आशीर्वाद की मुझे जरूरत पड़े। मैं जिस सेंटर में हूँ वहाँ हिन्दी साहित्य का इकलौता पृष्ठपेषक मैं ही हूँ। जिस दुनिया में मेरे सारोकार हैं वहाँ कोई नामवर सिंह या सुधीश पचौरी कोई वजूद नहीं रखता। उस दुनिया में हम सबका एक ही नाम है, ‘हिन्दी वालाज्‘। इस अपमानजनक जुमले की चोट खाकर मुझमें नान-हिन्दीवालाज् (मैंने उन्हें यही नाम दिया है) का सामना करने की हिम्मत बढ़ती है, घटती नहीं। लेकिन हिन्दी की दुनिया के मेरे अतिलघु कटु अनुभव के बाद मुझे आप से उसी हिम्मत के साथ यह कहना जरूरी लग रहा है कि आप मुझ पर लगाए नाम चमकाने के अपने चमकाऊ आरोप का स्पष्टीकरण जरूर दें।

आपको अरंधती राय के कहे एक जुमले ‘ रिप्लेसिंग द मीनिंग ऑफ द वर्ड ‘ के रूप में संभवतः वह चकमक पत्थर मिल गया है जिसे घिसकर आप थोथे शब्दाडम्बर को भी महत्वपूर्ण विचार में बदल देना चाहते हैं।

आपके लिए एक जुमला मैं भी दे रहा हूँ, ‘रिप्लेसिंग द् रिफ्रेंस एन कंटेक्सट आॅफ द् डिबेट‘ कुछ शब्दाडम्बरों को इससे भी रगड़िए। क्योंकि यही काम आपने अपने पहले लेख में किया जिसके प्रतिवाद में मैंने अपना पत्ररूपी लेख दिया।

आप फिर से वही करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा न हो इसके लिए, मैं सही था या गलत था इस विवाद को किनारे हटा कर, मैं आप समेत सभी पाठकों से शपथपूर्वक कहता हूँ कि,

”मेरे जाने विनीत कुमार का हंस से कोई छिपा या जाहिर संबध नहीं है। न ही वो राजेन्द्र यादव के खेमे के हैं।”

विनीत भाई जिस एक संदेह के कारण आपने इतना लंबा पोथन्ना लिखा है उसके मूलाधार मेरे इन पंक्तियों के बाद खत्म हो जाना चाहिए। अतः अब आप मेरे पत्र में प्रस्तुत दूसरे मुद्दो “एंचोर पाका.....साहित्यिक चमचे और चमचों के आका” पर अपना पक्ष रखें। आप नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव सहित किसी को भी, किसी के भी गिरोह को न बख्शें। मैं पीछे हटुँ .....तो कहें !!

आपकी स्वघोषित कोरी-कोरी पीठ के सदके फैज का कहा याद आ रहा है,

न पूछो अहदे उल्फत की,बस इक ख्वाबें परीशाँ था ।
न दिल को राह पे लाए, न दिल का मुद्दआ समझे ।।


मेरी पीठ को एमसीडी की दीवार मत बनाइए प्‍लीज़!

भाई रंगनाथ,

इतनी गंभीरता से पोस्ट पढ़ने के लिए शुक्रिया। मुझे इस बात की आशंका लिखने के पहले से ही थी कि हंस की संगोष्ठी में जो कुछ भी हुआ और नामवर सिंह ने जो बातें हमलोगों के सामने रखीं, अगर मैं उससे असहमत होते हुए कुछ लिखता हूं, तो लोग (जिसमें कि अब आप शामिल हैं) मेरे ऊपर हंस और राजेंद्र यादव का आदमी होने का लेबल लगा देंगे। इन सबके बावजूद मैंने इस पर लिखा, क्योंकि मुझे पता है कि इस तरह के स्टीगर हवा और पानी के संपर्क में आते ही बहुत जल्द ही उखड़ जाते हैं।

मुझे बहुत अफ़सोस नहीं है कि मैं अपनी बात जिस संदर्भ में करना चाह रहा हूं, आपने उससे ठीक उलट अर्थ लिया बल्कि लिया ही नहीं, अर्थ ही थोप डाला जिसे कि अरुंधति रिप्लेसिंग द मीनिंग ऑफ द वर्ड कह रही थीं। इसमें आपका कोई दोष भी नहीं है क्योंकि जिस परिवेश और औजार से हम निर्मित हुए, साहित्य की समझ जिस ढंग से हमारी बनी है, उसमें व्यापक संदर्भ के आते ही हम घबरा जाते हैं। हमारे हाथ में अभी तक तोड़ती पत्थर वाली साइज़ की छेनी और हथौड़ा है जबकि अब हमें आये दिन पहाड़ों से टकराना पड़ जाता है और हम तब निरस्त हो जाते हैं। कहने को तो हमारी साहित्यिक समझ और बौद्धिकता का विकास प्रकृति, मानवीय संवेदना और दुनिया के तमाम विचारों को लेने से हुआ है, जिसका कि कैनवास बहुत बड़ा है लेकिन सच्चाई ये है कि हम एक बड़े जंगल में एक ऐसा मचान बना कर रह रहे हैं, जहां कुछ ही लोग उस पर बैठे हैं, दिन-रात गप्प-शप करते हैं, हुक्का-सुक्का पीते हैं और बीहड़ जंगल में रहने के महानताबोध से अकड़े रहते हैं। दुनिया को बताते फिरते हैं कि हम जंगल में रहते हैं और कितना रिस्क कवर करते हैं। जबकि मेरी तरह इतना तो आप भी जानते होंगे कि जिस सेफ ज़ोन में रहकर हिंदी के हम जैसे अधिकांश लोग काम कर रहे हैं, वो खुशफहमी के अलावा कुछ भी नहीं है। हमने प्रकृति, जंगल और मानवीय संवेदना से भरे साहित्य के इस बड़े कैनवास को कितना छोटा कर लिया है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि नामवर सिंह को बोले चार दिन हो गये और अभी तक हम उसी को पकड़ कर बैठे हैं। ऐसा लगता है जैसे सचमुच हमारे पास कोई दूसरा काम नहीं है।

मुंबई और नोएडा फिल्म सिटी में काम करनेवाले मेरे दोस्त मेरी इस हालत पर अब हंस रहे हैं। मुझे तो कभी-कभी लगता है कि साहित्यिक बहसें करने और रचने के नाम पर साहित्य का एक बड़ा हिस्सा व्यक्तिगत स्तर की लल्लो-चप्पो और हील-हुज्‍ज़तों में जाया कर दिया गया है, जिसका कि एक समय के बाद कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इस नजरिए से अगर हम साहित्य को देखना शुरू करें, तो हमें अफ़सोस भी होगा।

कहने को तो साहित्य की इतनी बड़ी दुनिया, जिसमें इंद्रसभा से लेकर अमेरिका का साम्राज्यवाद तक समा जाए, लेकिन सच्चाई देखिए। महज दो सौ से ढाई सौ चेहरों के बीच पूरा का पूरा हिंदी साहित्य सिमट कर रह गया है। हम इन्हीं लोगों की बातों और गतिविधियों के बीच फंसे रह जाते हैं। इसमें बिडंबना है कि इतनी बड़ी दुनिया होने पर भी हम छत्तीसगढ़ के भीतर घुस नहीं पाते, जाकर कुछ लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। दिल्ली में बैठ कर चार दिन तक नामवर सिंह के पक्ष-विपक्ष में कबड्डी खेलना पसंद करते हैं लेकिन भोपाल, पटना में मर रहे किसी रचनाकर्मी को देख आने का जज्बा पैदा नहीं कर पाते। अपनी पोस्ट में मैं यही तो बताना चाह रहा था कि साहित्य के नाम पर हम कितने व्यक्तिवादी हो जाते हैं। नामवर सिंह जैसा आलोचक युवा का मतलब राहुल का मुहावरा इस्तेमाल किये बिना समझ नहीं पाते और युवा रचनाकार का मतलब सिर्फ अजय नावरिया से लगा लेते हैं। मैं अपनी उसी मानसिकता पर तो बात कर रहा था, जहां हिंदी समाज एक बड़े संदर्भ को कैसे संकुचित करता जाता है। अरुंधति राय ने भाषा के सवाल पर जो बात कही, उसकी चर्चा न करते हुए हम आलोचक नामवर सिंह की चुटकुलेबाज़ी में फंस कर रह जाते हैं क्योंकि उसमें हमारी व्यक्तिगत स्तर पर की जानेवाली चुगली का सार्वजनिक रूप दिखायी दे रहा था, हमें मज़ा आ रहा था। क्या हम साहित्य पढ़ते हुए चुगलखोर होते चले जाते हैं।

रंगनाथ भाई, विश्वविद्यालय सहित अब तक मैंने लिखने-पढ़ने के स्तर पर जितना भी समय बिताया है, उस आधार पर इतनी समझदारी तो बन ही गयी है कि हिंदी समाज में जीने-खाने और बने रहने के लिए आपको अपनी पीठ पर किसी न किसी का तो लेबल लगाना ही होगा। बहुत लंबे समय तक आपकी पीठ कोरी नहीं रह जाएगी। मेरी पीठ अब तक कोरी है, तो इसका मतलब कतई नहीं है कि मैं कोई महान किस्म का लिटरेचर प्रैक्टिसनर हूं। बल्कि सच बात तो ये है कि अब तक मैंने इसकी शिद्दत से ज़रूरत महसूस नहीं की है। जिस दिन करूंगा, उस दिन ज़रूर लगा लूंगा। इस बीच आप जैसे लोगों से बातचीत होती रही, तो ज़रूरत पड़ने पर आपसे राय भी लूंगा। लेकिन क्या मैं आपसे पूछ सकता हूं कि मेरे ऊपर राजेंद्र यादव और हंस से जुड़े लोगों का लेबल लगाने का अधिकार किसने दिया। क्या साहित्य में हम इश्तहारों, लेबलों, स्टीकरों से अटी-पड़ी पीठ देखने के इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि हमें कोरी पीठ आंखों में चुभने लग जाती है।

क्या नामवर सिंह या फिर किसी भी दूसरे आलोचक की बात से असहमत होने के लिए हंस, राजेंद्र यादव या किसी दूसरे संस्थान और व्यक्ति का लेबल लगाना अनिवार्य है। बिना इसके हम अपनी बात नहीं कर सकते और अगर सचमुच नहीं कर सकते जिसकी घोषणा आपने अपनी पोस्ट में सरोगेट रूप में कर दी है तो क्या हमें इसके विरोध में कुछ काम नहीं करने चाहिए। बजाय इसके कि हम एक पोस्टर के लगने और दूसरे पोस्टर के उखड़ने का इंतज़ार करते रहें और हम अपनी इसी भूमिका को साहित्यिक भूमिका मान कर बौद्धिक होने और कहलाने का क्लेम करने लग जाएं, जैसा कि अधिकांश लोग करते आये हैं। आज आपको सुविधा हो गयी कि मैंने नामवर सिंह से असहमति जतायी नहीं कि दूसरी तरफ मेरी पीठ पर राजेंद्र यादव का लेबल चिपकाने के लिए मौक़ा मिल गया। संभव हो ये सुविधा आपको हमेशा मिलती रहे, क्योंकि कोई न कोई तो आयोजक होगा और जब हमें असहमति होगी, मैं लिखूंगा ही। इस हिसाब से आपको भविष्य में भी मुझे संघी, व्यक्तिवादी, कुंठित, फ्रस्ट्रेड और भी बहुत तरह के लेबल लगाने को मिल जाएंगे। लेकिन एक स्थिति ऐसी भी बनती है कि जब नामवर सिंह एक ऐसी किताब पर बोलने आते हैं, जिसे कि उन्होंने पढ़ा ही नहीं है। केवल इतनी-सी जानकारी के आधार पर 25 मिनट तक उस पर बोल जाते हैं कि इस किताब को दिल्ली की झुग्गियों में रहनेवाले अंडर मैट्रिकुलेशन के बच्चों ने मिल कर लिखी है। नामवर सिंह को किताब के शीर्षक पर आपत्ति होती है, उन्हें ये नाम धुंधला-धुंधला सा-नज़र आता है। आलोचक फिर भाषा पर बात करते हैं, इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कि इसे किस बैग्ग्राउंड के बच्चों ने कितनी शिद्दत से लिखा है। मैंने लोकार्पण के पांच घंटे बाद ही दीवान (सराय, सीएसडीएस के मेलिंग ग्रुप) पर लिखा, नामवर सिंह से घोर असहमति। बच्चे एक बुजुर्ग के मुख से भाषा-वाषा पर गंभीर बात सुनकर अवाक हो गये थे। रंगनाथ भाई, मैंने उस समय भी नामवर सिंह के रवैय पर असहमति जतायी। बताइए, आप होते तो कौन सा लेबल लगाते। ये भी संभव है कि हवा-पानी से ये लेबल और स्टीगर उखड़ते चले जाएं और आप नया लगाते चले जाएं। आप बिल्कुल नहीं थकें। लेकिन मैं आपसे अपील करता हूं कि प्लीज़ आप मेरी पीठ को एमसीडी की दीवार मत बनाइए। ऐसा करना आपके लिए जितना सुविधाजनक है, मेरे लिए उतनी ही तक़लीफ़देह और शायद हिंदी के नाम पर होनेवाले विमर्श के लिए ख़तरनाक भी।

देखिए न, ये कितनी बड़ी विडंबना है कि हममें से दोनों लोग व्यक्तिवाद के विरोध में लिख रहे होते हैं। हमें नामवर सिंह में व्यक्तिवाद की भनक लगी और आपको हंस में बोलनेवाले कुछ लोगों में। लेकिन अब जब हम लिख रहे हैं तो आप अपनी चिठ्ठी के लगभग हर पैरे में विनीत और विनीत कुमार लिख रहे हैं और मैं रंगनाथ भाई, रंगनाथ भाई किये जा रहा हूं। इससे अधिक और व्यक्तिवादी कैसे हुआ जा सकता है? हम क्यों साहित्य जैसे तालाब पर विमर्श के लिए जुटते हैं और अंत तक आते-आते उसमें मौजूद पानी, उसकी सड़ांध और पहलनेवाले लोगों के बारे में बात करने के बजाय अपने-अपने हिस्से का कुंआ घेरने में लग जाते हैं। क्या हम इस बात की गुंजाइश पैदा नहीं कर सकते कि हम बेबाक तरीके से अपनी बात रख सकें, मेरी पीठ कोरी रह जाए और आपको बार-बार स्टीगर चिपकाने से मुक्ति मिल जाए। मुश्किल तो है लेकिन कोशिश करने में क्या हर्ज है।

बहुत हो गया। जिस तरह से अपन लोग बात कर रहे हैं, ये बहुत ही पर्सनल मामला बनता जा रहा है। इसे पढ़नेवाले जो लोग हमें जानते हैं, वो ज़रूर गरिआएंगे – स्साला, यहां दिखाने के लिए एक दूसरे पर पिल पड़े हैं जबकि मंडी हाउस में एक-दूसरे के पैसे से समोसे खाने के लिए खींचतान करेंगे। ये इनहाउस विज्ञापन हो जाएगा रंगनाथ भाई, कोशिश करते हैं कि हम औरों की तरह इससे बचें और अपना नाम चमकाने के बजाय मुद्दों को व्यापक और सही संदर्भ में समझें… है कि नहीं।

- विनीत कुमार

(मोहल्लालाइव से साभार)

3 अगस्त 2009

एंचोर पाका, साहित्यिक चमचे और चमचों के आका


जो नहीं जानते वो नहीं जानते लेकिन जो जानते हैं वो जानते हैं कि बौद्धिक दुनिया में विट क्या महत्व है ?

आस्कर वाइल्ड और जार्ज बर्नार्ड शा को अमरता दिलाने में उनके विट का बड़ा योगदान है। कार्ल मार्क्स तो अपने दर्शन विषयक गंथों में भी विट का प्रयोग करने से नहीं चूकते थे। हिन्दी साहित्य के सबसे बूढ़े आलोचक नामवर सिंह ने प्रेमचंद जयंती पर हिन्दी के बौद्धिक समाज से गायब होते विट का ऐवाने-गालिब सभागार में बेजोड़ प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने विट के कौशल से ऐवाने-गालिब सभागार को हँसी और ताली से गुँजा दिया।

लेकिन अजीब बात है कि इसी विट के एक दूसरे युवा महारथी विनीत कुमार को नामवर सिंह का विट अखर गया। उन्होंने नामवर सिंह के विट को रिडिक्यूल समझा और दूसरों को भी यही समझाना चाहा।
(http://http//mohallalive.com/2009/08/02/ewane-ghalib-namwar-singh-n-launda-discourse/)

जानने वाले जानते हैं कि विट और रिडिक्यूल में फर्क होता है। विट का आधार ठोस विचार होते हैं जबकि रिडिक्यूल का आधार हीनभावना और कुंठा होती है। विनीत कुमार के कामन सेंस और विट का मैं फैन हूँ। जिन्हें मैं जानता हूँ उनमें विनीत के विट की कोई दूसरी मिसाल मेरे सामने नहीं है।

विनीत जानते हैं कि विट का सबसे घोर शत्रु शब्द है चमचई। कल ऐवाने-गालिब में भी इस सबसे बूढ़े आलोचक ने अपने विट से तैल-संप्रदाय की लंका लगा दी। इस विट के एक धनी विनीत कुमार ने विट के दूसरे धनी के विट प्रदर्शन का जो गलत भाष किया है उसी संदर्भ में मैं यह पत्र लिख रहा हूँ। विनीत ने अपने भाष में जो सबसे बड़ी भूल की है उस पर ध्यान दिलाने के बाद शेष बाते होंगी। विनीत को लगता है कि नामवर सिंह ने युवाओं पर तंज किया ! यह बात पूरी तरह गलत है।

नामवर सिंह युवाओं के खिलाफ नहीं, हिन्दी में बढ़ते चमचावाद और चमचाप्रमोशनवाद के खिलाफ बोले। नामवर सिंह ने युवाओं को नहीं बल्कि उस सभागार मे उपस्थित साहित्यिक चमचों और इन चमचों के आकाओं को लताड़ा और लतियाया। नामवर सिंह ने राजेन्द्र यादव को मंच पर सार्वजनिक रूप से कहा कि गर अयोग्य भस्मासुरों को भोलेभण्डारी बन कर मनचाहा वर देते फिरोगे तो यही भस्मासुर एक दिन तुम्हारी जान के पीछे पड़ जाएंगे, तुम्हारा ही हाथ काट लेंगे !!

रविन्द्रनाथ ठाकुर और बंगाल में उनके खिलाफ उठी युवाओं आवाजों के संदर्भ में बोलते वक्त नामवर सिंह ने एक बांग्ला मुहावरे 'एंचोर पाका’ का प्रयोग किया। 'एंचोर पाका’ ऐसे लोगों के प्रतीक है जो बाहर से जवान दिखते हैं लेकिन अंदर से बूढ़े होते हैं।

नामवर सिंह के विट के निशाने पर यही एंचुर पाका, सहित्यिक चमचे और इन चमचों को प्रमोट करने वाले आका लोग थे !!

विनीत आपने अपने लेख में व्यक्तिवाद नामक शब्द का खुल कर प्रयोग किया है। व्यक्तिवाद क्या है फिलहाल इस पर बहस नहीं करूँगा लेकिन जिस एक व्यक्ति का नामवर सिंह ने मंच से कई बार नाम लिया,मेरी समझ से नामवर सिंह उसकी समूचे हिन्दी जगत फूलत-फलते तैल-संप्रदाय के युवा प्रतिनिधी के रूप में मंच पर विराजमान होने के कारण आलोचना की। गर गाँधी अहिंसा के प्रतीक,भगत सिंह प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में स्वीकार किए जा सकते हैं तो किसी को तैल-संप्रदाय के प्रतीक के रूप में स्वीकार करने में मुझे कोई अपत्ति नहीं है। प्रतीकों के सहारे बात रखना आसान हो जाता है। खैर, मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्नाः
अब पाठकों के सामने वह पत्र रखुँगा जिसे व्यक्तिवादी साबित करना ज्यादा आसान होगा।

विनीत जी

आपके लेख में कुछ वैचारिक चूक है और साथ ही ’विट’की प्रतिभा का बड़ा अपमान है। आप ने नामवर सिंह के भाषण का जो अर्थ निकाला है उससे ’विट’की प्रतिभा का अपमान होता है। साथ ही नामवर सिंह के भाषण के वैचारिक पहलू के साथ भी आपने न्याय नहीं किया है। किसी एक ही परिघटना को लेकर मतांतर होना स्वाभाविक है। अतः मैं अपनी असहमतियों को आपके सामने रख रहा हूँ।

आपने नामवर सिंह के भाषण को उसके संदर्भ अलग करके विश्लेषित कर पाठकों को भ्रमित करने की असफल कोशिश की है। आप को अपना लेख लिखने से पहले ध्यान रखना था कि ऐवाने-गालिब में उपस्थित श्रोताओं और चुनावी सभाओं में पैसे देकर जुटाई गयी भीड़ के बीच जमीन-आसमान का अंतर था जिस अंतर को आप भूल गए। आपके बारे में इस ब्लाग पर जो परिचय लिखा है उसे ध्यान में रखते हुए भी कहुँगा की आप भले ही युवा,तीक्ष्ण और मशहूर हों लेकिन ऐवाने-गालिब में उपस्थित शेष लोग निपट-निरक्षर नहीं थे। आप के लेख से ध्वनि आती है कि वहाँ उपस्थित लोगों में एक ही समझदार व्यक्ति बैठा था जिसका नाम विनीत कुमार था। ये अलग बात इन विनीत कुमार ने हंस के इन-हाउस लेखकों जितनी ही समझदारी दिखायी। हंस के इन-हाउस लेखकों की कुढ़न को शब्दों में ढाल कर मोहल्ले में चिपका दिया। जो काम हंस के इन-हाउस करना चाहते थे उसे आपने कर दिया।

विनीत, क्या आप हमें बताएंगे कि वहाँ उपस्थित लोगों में नामवर सिंह के भाषण के समर्थन में ताली बजाने के पीछे एक मात्र कारण यही था कि वहाँ उपस्थित युवा श्रोता बोदे थे या कि नामवर सिंह मंच से बोलते वक्त पीसी सरकार की तरह श्रोताओं पर नजरबंदी का जादू कर देते हैं। गर ताली बजाने वाले बकौल विनीत कुमार बोदे थे तो इन बोदे लोगों ने अरूंधती के भाषण में कई बार ताली बजाने की नासमझी क्यों दिखायी। विनीत कुमार भी सहमत हैं कि अरूंधती ने बहुत उम्दा भाषण दिया। अरूधंती के उम्दा भाषण की जिनमें समझ थी वही लोग नामवर सिंह के भाषण पर ताली बजाने के बाद विनीत कुमार को सैडिस्टिक लतखोर क्यों नजर आने लगे ??

विनीत आप को समझना चाहिए कि उस समारोह में दो तरह के युवा उपस्थित थे। एक वह जो ढपोरशंख होने के बावजूद साहित्यिक माफियाओं द्वारा बड़े-बड़े मंचो पर चढ़ा दिए जाते हैं, जो पूरी तरह अयोग्य होने के बावजूद विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों में शतरंज की गोटियों की तरह फिट कर दिए जाते हैं जिससे विरोधी को मात दी जा सके।

उसी सभा में दूसरी तरह के युवा भी थे जो युवापन और चमचापन के बीच के फर्क बनाए रखने की कीमत चुकाते हैं। ये युवा जब लेखन में अपनी जवानी दिखाते हैं तो सत्तर साला स्वघोषित युवा उन्हें प्रतीभाविहीन घोषित कर देते हैं। इन युवाओं में किसी नामी पत्रिका में छपने के लिए लड़की और दारू के चकरोड से होकर गुजरने की शर्त पर सख्त एतराज है। ये लोग ही असल युवा हैं न कि वो चमचे जिनके बारे में नामवर सिंह ने कहा कि, अंदर से टटोलकर देखना चाहिए कि बाहर से युवा दिखने वाला अंदर से सड़ा हुआ तो नहीं है ? ’एंचुर पाका तो नहीं है ?

जिन युवाओं पर कोई राजेन्द्र यादव प्रमोट करने या प्रमोटेड संपादक बनाने की कृपा नहीं करता उनके पास अपना प्रतिरोध जताने का काई विकल्प नहीं होता। इन युवकों को लिखने-पढ़ने की दुनिया में ही रहना है इसलिए वो खुल कर किसी के मुँह पर यह नहीं कह पाते कि महोदय आप सठिया गए हैं और अपनी जिद वश कौव्वों को हंस बनाने पर तुले हुए हैं ?

विनीत आप को बड़ी भारी चिंता है कि अधिकांश युवाओं ने नामवर सिंह के खिलाफ आवाज उठाने के बजाए उनके पक्ष में ताली बजाने को ओछा काम क्यों किया ?

आप की महत्वपूर्ण राय है कि उस सभा में नामवर सिंह के खिलाफ प्रतिरोध के स्वर फूटने चाहिए थे !!
आप बताएंगे कि प्रेमचंद जयंती और हंस पत्रिका के वार्षिकोत्सव के नाम पर भीड़ जुटा कर ऐवाने-गालिब में शुरूआती दो घण्टे में मंच पर जो कुछ हुआ उसके खिलाफ सभागार में उपस्थित युवाओं को क्या करना चाहिए था ??

आप बताएंगे कि प्रेमचंद जयंती पर आयोजित सभा में नामवर सिंह कि अलावा अन्य किसी वक्ता ने प्रेमचंद का एक बार, जी हाँ एक बार, भी नाम क्यों नहीं लिया ??
विनीत आपने ध्यान नहीं दिया,उस सभागार में लोग सिर्फ ताली नहीं बजा रहे थे बल्कि जोर-जोर से ताली बजा रहे थे। उनके तालियों की तीव्रता उनके प्रतिरोध की उग्रता को दर्शा रही थी जिसे अन्य परिस्थितियों मे दबा कर रहना पड़ता है। जो बात उस सभागार में उपस्थित युवाओं के मन में घुमड़ रही थी वही बात एक बूढ़े ने मंच पर जाकर कह दी तो पूरा सभागार उन युवाओं की तालियों रूपी प्रतिरोध से गुँज उठा।
विनीत हंस के युवा अंक के बारे में आप खुद अपने विचार देख लें जो आप ने इस लेख में लिखे हैं,

“वैसे अंक देख कर एकबारगी तो ज़रूर लगता है कि साहित्य के नाम पर चश्मा गोला साबुन के विज्ञापन लिखने वाली भाषा की ज़रुरत क्यों पड़ गयी।”

आप ने जो कहा वही बात नामवर सिंह ने मंच से आपसे बेहतर तरीके से कह दी तो क्या बुरा किया ?
आप अपनी इसी लेख में दी गई अपनी एक और राय देखिए,

“बहुत संभव है कि अजय नावरिया ने हंस के जिस युवा विशेषांक का संपादन किया हैए वो अधकचरे साहित्य और मीडिया वेस्टेज की रिसाइकिल करके कोई नई चीज़ पेश करने की कोशिश भर हो।“

आप पाठकों को बताएं कि यह आपको हंस के नए विशेषांक में ऐसी संभावनाएं क्यों दिखीं ?
विनीत आप ने माना है कि अजय नावरिया के भाषण के सतहीपन के बारे में वहाँ उपस्थित लोगों में सहमति थी। आपने अपने लेख में नावरिया के बोले सफेद झूठ को मासूम वजह बताया है, नावरिया ने श्रोताओं से कहा कि उन्हें एक्सटेंपोर बोलने की तैयारी का मौका नहीं मिला इसलिए श्रीमान जी करीब घण्टे भर लंबा पकाऊ भाषण लिख कर लाए थे। नावरिया को अंग्रेजी का कितना ज्ञान है मुझे नहीं पता लेकिन उन्हें यह तो पता होना चाहिए था कि एक्सटेंपोर का अर्थ ही होता है कि बिना किसी पूर्व तैयारी के बोलना। नावरिया को ढेंरो उद्धरण बटोर कर लंबा सा भाषण लिखने की फुर्सत थी लेकिन बिना तैयारी के बोलने की फुरसत न थी।

विनीत आपने नामवर सिंह के बारे में कहा है कि,
“कहने और समझने के बीच कोई फर्क न होने की वजह से ही लंबे समय से हम जैसे लोग उनके मुरीद रहे हैं।“

आपको ऐसा कहते वक्त तो इसका ध्यान रखना ही चाहिए था कि नामवर सिंह में कुछ तो बात होगी ही कि विनीत जैसे युवा कल शाम तक उनके मुरीद थे। उस सभा में कई लोग ऐसे थे जो कह रहे थे कि कल बहुत दिनों बाद नामवर सिंह अपनी रंगत में थे। वरना पिछले कई समारोहों से तो वो लोगों को आर्शीवचन ही देते आ रहे थें। किसी को जयशंकर प्रसाद तो किसी को संजय बताते आ रहे थे। कल उन्होंने सभागार में उपस्थित युवाओं के क्षोभ को आवाज दी तो सभागार में उपस्थित युवाओं ने उन्हें सिर आँखो पर बैठाया।

विनीत गर आपको तालियों से ही एतराज है तो पाठकों के सामने यह स्पष्ट करें कि जब अरूंधती ने नावरिया को काँग्रेस के गुणगान को लेकर लताड़ लगायी और श्रोताओं ने जमकर तालियाँ बजायी उस वक्त आप कहाँ थे ?
गर आप उस वक्त सभागार में थे तो आपने अपने लेख में उन तालियों पर ऐतराज क्यों नहीं जताया है ?
विनीत उस सभागार में बहुत से ऐसे लोग थे जो नामवर सिंह के भाषण के वक्त ताली भी बजा रहे थे और ठठा-ठठा कर हँस भी रहे थे।
किसी ने नामवर सिंह के भाषण के बीच हि यह फिकरा कसा कि जो हँस नहीं रहे हों समझ लो हंस के हैं !!

वहाँ कुछ लोग ऐसे भी थे जो अंदर तो खूब हँसे-ताली बजाए लेकिन बाहर निकलने के बाद शिकायत करने लगे कि नामवर सिंह ने उनसे ताली बजवा दी, नामवर सिंह ने भरम गेनवा फेंक कर उन्हें फँसा लिया और हँसा दिया...., नहीं तो बात तो रोने या प्रतिरोध करने वाली थी !!
(जिन्हें भरम गेनवा नहीं पता वो अजंता मेंडिस की गेंदबाजी देखा करें, जान जाएंगे )

अफसोस, कि जिन्हें पता था कि नामवर सिंह की बात का सभागार में ही प्रतिरोध करना चाहिए था उन्होंने भी ऐसा नहीं किया !!