दीपांकर की डायरी का यह अंश आपके सामने प्रस्तुत है - रंगनाथ
आज मुझे एहसास हुआ की मैं अब बड़ा हो गया हूँ. शायद उम्र के सवाल पर या शायद अपने तल्ख़ जवाबों के फलसफे में. उथली सड़कों पर सफ़र कर के मेरी कमर में दर्द उखड़ आया है और पीठ पर थकन की झाडियाँ उग आयी हैं. धूल की परतें मेरे अधपके बालों को मुरझा रहीं हैं. कच्चे रास्तों पर चल कर ऐसा लगता है जैसे मैं अब तक ऐसे ही चलता रहा हूँ, हिचकोले खाते और सत्रह साल बीत गए. जोते हुए खेत और भरे हुए खलिहानों के बीच से चलता हुआ मैं अपने घर के पास आता हूँ. वो गलियां अब भी वैसी ही हैं पर मेरे लिए शायद यह अंतराल बहुत बड़ा है.
मैं पिछवाडे से घर के अंदर घुसता हूँ. मुझे लगता है जैसे मैंने अफीम खा रखी है, मेरी यादास्त जैसे कुंद हो गयी है, और सूरज जैसे सिर्फ़ मेरी ही आखों में झांक रहा है. पपीते के पेंड़ बौने हो गए हैं और आँगन छोटा हो गया है पर कुछ पलों के बाद मुझे अहसास होता है कि चाची हाथों में छेना लिए खड़ी है और बूढी दादी अब मुझे पहचान नही पा रही है.शायद उसकी छोटी आँखों में मैं बहुत बड़ा हो गया हूँ. उसकी आखों में जैसे आँगन के शीशम के पेंड भी सत्रह सालों में बहुत बड़े हो गए हैं. उसकी आखों में आज एक चमक है ,उगते हुए सूरज की चमक ,चेहरों पर झुर्रियां हैं पर मुझे लगता है जैसे आँगन के मिट्टी में अपराजिता के नील फूल मुरझा गए हैं . चाहरदीवारी पर उग आयी झाडियां इस बात की मिसाल हैं कि कोने वाला बड़हड़ का पेड़ अब बूढा हो गया है और उस पर बसने वाले परिंदों की अब दूसरी पुश्तें चल रही हैं . जंगली नीम्बू का पौधा अब और फ़ैल गया है और अछूत पड़े कुएं में झांक कर कभी-कभी उससे उसकी वासोख्त्गी के बारे में पड़ताल करता है. मैं उस कुएं के पास चला आता हूँ धीमे क़दमों से पर मुझे लगता है की अब मैं बड़ा हो गया हूँ , क्योंकि मुझे याद आता है की बचपन में हमलोग उसके पास फटकते से भी डरते थे क्योंकि उसमे गिर पड़ने का भय था पर अब कोई डर नही है . अब मैं उसकी पेंदे तक जाना चाहता हूँ जो नम और खामोश है. मैं उसके पास जा कर झांकता हूँ उसका पानी अब काला हो गया है और उसकी सतह पर मेढक सर उठाये आसमान देख रहे हैं... दीवारों पर काई की एक मोटी परत है. कुएँ से एक अजीब सी गंध उठती है और नीम्बू के पतों से छू कर आकाश में कहीं दूर उड़ जाती है.
मुझे याद आता है की मेरे कंचें की कई गोलियां उस कुएं में गिर गयी थी ,अब इतने अरसे के बाद भी जबकि मैं बहुत बड़ा हो गया हूँ मैं उसे कुएं की कीचड़ वाली तहों से नहीं ढूढ़ पाउँगा और उसमे बनी अनोखी तस्वीरों को फ़िर से नही देख पाऊंगा. मैं यही सोच कर अपने पर खीज कर वहाँ से चला आता हूँ.
बिना खिड़की वाले दो अंधेरे कमरे अब भी वैसे ही हैं, दादी का लकड़ी का संदूक वैसे ही रखा है और उसमे एक ज़ंग लगा टला लटका है उसकी कुंजी दादी अब भी अपने पास ही रखती हैं अपने गले में लटका कर. अँधेरी कोठरी की दीवारों पर बनी आकृतियाँ और मेरे कुलदेवता का भित्तिचित्र, जिन्हें मैं टार्च की रोशनी में देखता हूँ. लोग मुझे बताते हैं कि इसी अँधेरी कोठरी में मेरा जन्म हुआ था. इसी अँधेरी कोठरी में, दीये की रोशनी में, मैं दुनिया में आया था. मैं स्पंदित होता हूँ उस मिट्टी की गंध से जो सालों से वहीं बैठी है... अब भी जब मैं उस अंधेरे में झांकता हूँ मेरी आंखों में एक शांत शीतलता छा जाती है. मिटटी की कोठी पर लगता है जैसे दिए जलते हैं, मैं फ़िर वहीं बैठ जाता हूँ फ़िर केवल अँधेरा मेरे कन्धों पर लटका रहता है और मैं देर तक उस दीये की ओर देखता रहता हूँ . बाहर निकल कर मैं देखता हूँ कि फूस के छप्पर और नीचे हो गए हैं ,बैलों वाले घर के दीवार अब ढह चुकी है और दूरे की दहलीज में दीमक लग गया है. बांस के पारंपरिक सीढ़ी से मैं उपर चढ़ आता हूँ . यह कभी भूसा वाला घर हुआ करता था.
मुझे याद आता है की चाचा ,चुनावों के मौसम में देसी कट्टे ,भूसें में कैसे छुपा कर रखते थे और मैं उनके प्राणिविज्ञान के किताबों से सांप की तस्वीरें काट लिया करता था......अब मेरा छोटा भाई वहाँ पढ़ रहा है ,पुआल पर दरी बिछी है और अंग्रेजी अनुवाद की एक किताब वहाँ पड़ी है. मैं कुछ पल वहीं बैठ जाता हूँ और वह मुझसे रंग बिरंगे वाक्यों का अनुवाद पूछता है... मैं देखता हूँ चुपचाप, ढहती दीवारों को, झड़ती मिटटी की परतों को, छप्पर में उग आए दरारों को और ताड़ के मोटे मोटे कांडों को.
मुझे लगता है कि मैं अनुवाद करने के लिए अब उमरदराज हो गया हूँ पर जैसे एक कहानी है जिसका अनुवाद बचा हुआ है. और एक अनुवाद बचा है ,इन मिट्टी की दीवारों की भाषा का, धंस गयी जमीन का, परित्यक्त कुएं का, चहारदीवारी पर उगी घास का, नीम्बू के पतों पर जमी धूल का, कुएं से उठती गंद का, दादी की झुर्रियों का, मां के खुरदरे हाथों का और झुकी हुई छत का. आज मुझे रात का इन्तजार है. मैं देखना चाहता हूँ की रात के धुंधले अंधेरे में गांव कैसा दीखता है, घरों से उठती धुएं की लकीरें आख़िर कहाँ जाती हैं और लोग कब सोते हैं... नहर का पानी रात में कैसा दीखता है और मुए वहाँ कितना बालू तौलते हैं . बाजार कब चुप्पी साध लेता है और ठाकुरबाड़ी का कीर्तन कब बंद हो जाता है. किस पहर कुत्ते ज्यादा भौंकते हैं और कब बाजार से गुजरने वाली सड़क पर दौड़ती ट्रकों की आवाज सन् के कौंध कर दूर हो जाती है .खेतों में नीलगाय कब आती है और पीपल के पेंड़ पर प्रेत कब उल्टे लटकते हैं ,गलियों में उल्टे पैरों वाली किचीन कब तक टहलती है और अपने बच्चे को सुलाती है.
मैं देखना चाहता हूँ की यहाँ सुबह कब होती है और औरतें किस पहर में मैदान जाती हैं . बच्चे सुबह उठ कर कैसे बासी खाने की जिद करते हैं, सुबह के चूल्हे से उठने वाली गंध कैसी होती है,भैंस की दूध से उठती भाप कितनी मिठास लिए होता है और घोंड़े दुल्लती कब मरते हैं. मुझे लगता है की जैसे मैं कोई मीठा सपना देख रहा हूँ पर मेरे चेहरे पर सूरज चमकता है और चाची मुझे बताती हैं की मेरी आखों में कीचड़ जमा हो गया है. मुझे लगता है की मुझे रोना चाहिए ताकि मेरे आखों की जलन और जमा हुआ कीचड़ दोनों कहीं दूर बह जाएं पर मेरी निगाह उस खपड़े पर अटक जाती हैं जो शायद कुछ ही पलों में गिरने वाला है. मैं उसे एकटक देखता हूँ पर वह गिरता नही है बस यूं ही लटका रहता है. मैं चौकी पर बैठा रहता हूँ, इतने में सेमल का एक बिरवा अपने पंखों के सहारे तिरता हुआ मेरी आखों के सामने से गुजर जाता है. मैं उसे पकड़ने के लिए उठता हूँ पर हवाओं की सीढियां चढ़ कर वो कोने वाले शीशम पर बैठ जाता है.
मुझे लगता है कि जैसे जिन्दगी में बहुत सारी चीजें यूं ही मेरे सामने से गुजर गयीं और मैं यूं ही ठगा सा देखता रहा मेरी मुठ्ठियाँ खुली की खुली रहीं. मैं अनमना सा खड़ा हो कर चाहरदीवारी पर उग आए घासों को देखता हूँ. दीवार से लगा बड़हड़ पूरे मौज में खड़ा है उसपर कुछ पंडुक बैठे हैं जो मुझे बड़ी अचरज से देखते हैं, शायद मैं इस आँगन में नया परिंदा हूँ जो चार पलों के लिए यहाँ आया है फ़िर न जाने कहाँ के लिए उड़ जाएगा मुझे पंडुकों की टोली याद दिलाती है कि सूरज अब डूबने वाला है.
मैं चाचा के साथ बाजार के लिए निकलता हूँ, देहरी से सर झुका कर बाहर आते ही मैं देखता हूँ की खलिहान अब खेत बन चुके हैं पर खलिहान के बीच का वो खम्भा अब भी वहीं खड़ा है और उस पर कोई नीलकंठ नही बैठा है. अब पुआल के ढेर भी वहाँ नही हैं, न हैं मेरी भैंसे और मेरा झूमना बैल. मैं उदास हो कर एक पगडंडी पकड़ कर चाचा के पीछे हो लेता हूँ . मेरे पास कोई प्रश्न नही है अगर कुछ है तो सिर्फ़ देखने के लिए गांव और सत्रह सालों में बड़ा हुआ आँगन के कोने का शीशम. बाजार जाने के लिए नहर पार करना होगा. मैं अंग्रेजों के ज़माने के पुल पर बीच में ठहर जाता हूँ... नीचे पानी काफी कम हो गया है मुझे लगता है की अब वहाँ मुए नही रहते हैं पर वो आख़िर गए कहाँ होंगे ? पानी मुझे दूर दूर तक नही दिखता है शायद वो मेरे मामा के गांव भाग गए होंगे जहाँ पुनपुन की धारा है. मेरा मन करता है की नहर का किनारा पकड़ कर बेसुध चलता जाऊं कहीं तो नदी जरूर मिलेगी ..... पुनपुन जिसमे ढेरों बालू है पर जिसकी धारा, सुना है कभी सूखती नही. मुझे प्यास लगी है मेरा जी करता है की अंजुली में भर कर दो -चार घोंट नदी का पानी पी लूँ पर नदी अभी काफी दूर है. मैं सुबह की पहली किरण के साथ रेत पर चमकते अबरख के टुकड़ों की चमक देखना चाहता हूँ और इसलिए मैं चलता रहता हूँ. गाँव की सीमायें ख़त्म होती हैं फ़िर नए खेत शुरू हो जाते हैं. कटे हुए धानों के ऊँचे टीले दीखते हैं और दीखती है एक नदी जिस पर बांस का पुल हैं. मैं समझता हूँ की मुझे उस पार जाना है मेरे अपनों के पास, एक लंबे अरसे के बाद, मैं बेजार हो जाता हूँ. सूरज की लाली फ़ैल चुकी है और मैं पुल के बीचों बीच खड़ा हूँ. नीचे पुनपुन की अजस्र धरा है पतली पर तेज. मैं चाहता हूँ की पानी को छू लूँ पर मुझे डर होता है कि पानी में छुपे मुए मुझे कहीं पकड़ न लें. मैं सधे क़दमों से पुल पार करता हूँ.
सुबह की धूप अब खिल चुकी है. मैं किनारे पहुँच कर अपनी मुठ्ठियों में पानी भरता हूँ और कुछ बूंदों को पकड़ कर रखता हूँ. अमरुद के बागीचे से होता हुआ मैं आँगन में चला आता हूँ . मामा के आँगन में तुलसी का एक पौधा है और चारपाई बिछी है जिसकी सुतें अब जमीन तक छूती हैं मैं उसी चारपाई में धंस जाता हूँ और पीने का पानी मांगता हूँ. भरे हुए लोटे में झांक कर देखते हीं, मुझे लगता है की मेरी आंखों में गांजे की लाली छाई है और फ़िर सबकुछ अचानक से पिघल जाता है. एक बेचैनी जिसे लेकर मैं गाँव से आया था वो यहाँ आकर बह जाती है, एक कहानी जो मेरे साथ कहीं बड़ी हो रही थी, शायद आज उसका ब्याह था, एक सपना जो कहीं पल रहा था, आज फूट कर बह गया था और अनुराग की पहाड़ी नदी आज बरसाती बन कर कूल तोड़ मैदानों में बह आयी थी. मुझे लगा जैसे ये सब एक नशे के आगोश में हो गया पर मैं महसूस करता हूँ की ये सब एक हकीकत था.
अब मैं वापस लौट रहा हूँ. गांव से शहर की ओर, बडे शहरों की ओर, महानगरों की सीमाओं में... मेरे सत्रह साल मेरे साथ ही बीत चुके हैं और वो गुमनाम से एहसास लेकर अब मैं बड़ा हो गया हूँ, बोध की एक नहर पार कर चुका हूँ और चेतना की एक नदी के मंझधार में घुटने भर पानी में खड़ा हूँ . लोग मुझसे इसका अनुवाद पूछते हैं पर मुझे लगता है की कोई मुआ मेरे पैर खींच रहा है और पनकौओ का एक झुंड उस नदी के बालू के द्वीप पर बैठा है. मैं इस नदी को पार कर जिन्दगी का एक अहम् मुकाम पा लूँगा फ़िर मुझे कोई टीले पर खड़े होने का अनुवाद नही पूछेगा. कुएँ की जगत पर घड़े में रखा कछुआ अब भी वहीं पड़ा होगा, निस्पंद सिर्फ़ अपनी सांसें गिनते हुए और मेरा इन्तजार करेगा. तब तक दीवारों की एक तह और पतली हो जायेगी, चहारदीवारी पर घास और ऊँचे हो जायेंगे और कछुए का बच्चा और बड़ा हो जाएगा........पर कोठे की छप्पर पर अटका खपड़ा अब भी वैसे ही अटका है...आज भैंसे खलिहान में नही बैठी हैं जिन पर मैं नंगे बैठा करता था, उनकी पीठ कितनी गर्म थी मुझे अब एहसास होता है, और पुआल के ढेरों पर लोटने के बाद सी एक चुन्चुनी मेरे पूरे बदन में काटने लगती है. मामा के कांपते हाथों से खाने की थाली गिर जाती है और मैं देखता रहता हूँ, छोटे बच्चे मुझे देखते हैं और जमीन पर लोट लगाते हैं. गाँव की औरतें मुझे देखती हैं, दीवारों की ओट से छुप कर, मेरी मां के किस्से कहती हैं, मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी और मेरे बिखरे हुए अधपके बाल, मेरी लाल लाल आखें, उनके लिए किसी नयी कहानी का बीज बन जाएगा .., पर मुझे रह रह कर चुभती है .... धंसती हुई चारपाई, आँगन की तुलसी और पुनपुन की चमकती रेत, उसकी बहती हुई अनंत धारा, कुएं का बेजान पानी, घड़े मे रखा कछुआ, बांस का पुल और उदास पड़े नाद का रंग...
मुझे एहसास होता है की आँगन की इस मिटटी में कितने सपने दबे पड़े हैं और मैं उनके सामने कितना छोटा. मैं अपने गाँव से काफ़ी दूर निकल आया हूँ शायद सत्रह साल की दूरी पर लेकिन दीये अब भी जल रहे हैं, अंधेरे कमरे में, मिट्टी की कोठी पर, कुलदेवता की तस्वीर टार्च की रोशनी में यूं ही चमकती है. आँगन कि मिट्टी रात भर खुले आसमान के नीचे सपने देखती है, उथले रास्तों पर मील के पत्थर पीछे छूट रहे हैं और मैं बेचैन हो कर अपने दिल पर एक और गाँठ लगा लेता हूँ.
(सनद रहे कि दीपांकर अपनी कविता या डायरी को कोई शीर्षक नहीं देता। मैं रवायत के असर में उन्हें शीर्षक देता हूँ।)
मुझे एहसास होता है की आँगन की इस मिटटी में कितने सपने दबे पड़े हैं और मैं उनके सामने कितना छोटा. मैं अपने गाँव से काफ़ी दूर निकल आया हूँ शायद सत्रह साल की दूरी पर लेकिन दीये अब भी जल रहे हैं, अंधेरे कमरे में, मिट्टी की कोठी पर, कुलदेवता की तस्वीर टार्च की रोशनी में यूं ही चमकती है. आँगन कि मिट्टी रात भर खुले आसमान के नीचे सपने देखती है, उथले रास्तों पर मील के पत्थर पीछे छूट रहे हैं और मैं बेचैन हो कर अपने दिल पर एक और गाँठ लगा लेता हूँ.
(सनद रहे कि दीपांकर अपनी कविता या डायरी को कोई शीर्षक नहीं देता। मैं रवायत के असर में उन्हें शीर्षक देता हूँ।)










