30 सितंबर 2009

सुसंस्कृत

अबूतालिब एक बार मास्को में थे। सड़क पर उन्हें किसी राहगीर से कुछ पूछने की आवश्यकता हुई। शायद यही कि मंडी कहा है। संयोग से कोई अंग्रेज ही उनके सामने आ गया। इसमें हैरानी की तो कोई बात नहीं- मास्को की सड़कों पर तो विदेशियों की कुछ कमी नहीं है।

अंग्रेज अबुतालिब की बात न समझ पाया और पहले तो अंग्रेजी, फिर फ्रांसिसी, स्पेनी और शायद दूसरी भाषाओं में भी पूछ-ताछ करने लगा।

अबु तालिब ने शुरू में रूस, फिर लाक, अवार , लेजगीन ,दार्गिन, और कुमीन भाषाओं में अपनी बात समझाने की कोशिश की।

आखिर में एक दूसरे को समझे बिना वो दोंनो अपनी-अपनी राह चले गए। एक बहुत ही सुसंस्कृत दागिस्तानी ने जो अंग्रेजी भाषा के ढाई शब्द जानता था, बाद में अबूतालिब को उपदेश देते हुए यह कहा-

"देखा, संस्कृति का क्या महत्व है। अगर तुम कुछ अधिक सुसंस्कृत हाते, तो अंग्रेज से बात कर पाते। समझे न ?"

"समझ रहा हूँ," अबूतालिब ने जवाब दिया। मगर अंग्रेज को मुझसे अधिक सुसंस्कृत कैसे मान लिया जाए ? वह भी तो उनमें से एक भी जबान नहीं जानता था, जिनमें मैंने उससे बात करने की कोशिश की ?

रसूल हमजातोव, मेरा दागिस्तान
अनुवाद - मदनलाल मधु

28 सितंबर 2009

भगत सिंह और उनके साथी अमर रहें


आज भगत सिंह का जन्मदिन है। किसी भारतीय को यह बताने की जरूरत नहीं है कि भगत सिंह कौन थे। आज मीडिया ने भगत सिंह को कितना याद किया मुझे नहीं पता। खैर भगत सिंह कोई गाँधी नहीं है कि जिनके विचार को बाजार और सरकार सुविधापूर्वक प्रचार कर सकें।

मैंने कल भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का लिखा एक पत्र लगाया था। उस पत्र से यह बात साफ होती है कि भगत सिंह और उनके साथियों की विचारधारा क्या थी। उनके बारे मे फैली कुछ भ्रांतियां भी इस पत्र से दूर होती हैं। उस पत्र पर पाठकों की प्रतिक्रिया देख कर ऐसा नहीं लगा कि ब्लाग जगत में भी भगत सिंह को ज्यादा तवज्जो दी गई। खैर कोई बात नहीं।

भगत सिंह के लिखे एक-एक शब्द को पढ़ते वक्त हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह सब तेईस साल या उससे भी कम उम्र में लिखा गया है। इतनी कम उम्र में वैचारिक स्तर पर ऐसी उत्कृष्टता के उदाहरण कम ही मिलेंगे। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के लिखे लेखों की परिपक्वता देख कर किसी को भी उन पर नाज होगा। कम से कम नौजवानो को तो उनको जरूर पढ़ना चाहिए।
भगत सिंह के जन्मदिन के अवसर पर मैं उन्हें और उनके सभी साथियों को विनम्र श्रद्धां‍जलि देता हूँ।

27 सितंबर 2009

इन्कलाब जिन्दाबाद क्या है ?


श्री सम्पादक जी, माडर्न रिव्यू ।

आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसम्बर, 1929 के अंक में एक टिप्पणी ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ शीर्षक से लिखी है अैर इस नारे को निरर्थक ठहराने की चेष्टा की है। आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशस्वी सम्पादक की रचना में दोष निकालना तथा उसका प्रतिवाद करना, जिसे प्रत्येक भारतीय सम्मान की दृष्टि से देखता  है, हमारे लिए एक बड़ी धृष्टता होगी। तो भी इस प्रश्न का उत्तर देना हम अपना कर्त्तव्य समझते हैं कि इस नारे से हमार क्या अभिप्राय है।

यह आवश्यक है,क्योंकि इस देश में इस समय इस नारे को सब लोगों तक पहुंचाने का कार्य हमारे हिस्से में आया है। इस नारे की रचना हमने नहीं की है। यही नारा रूस के क्रांतिकारी आन्दोलन में प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध समाजवादी लेखक अप्टन सिंक्लेयर ने अपने उपनसों ‘बोस्टन’ और ‘आईल’ में यही नारा कुछ अराजकतावादी क्रांतिकारी पात्रों के मुख से प्रयोग कराया है। इसका अर्थ क्या है ? इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सशस्त्र संघर्ष सदैव जारी रहे और कोई भी व्यवस्था अल्प समय के लिए भी स्थाई न रह सके। दूसरे शब्दों में, देश और समाज में अराजकता फैली रहे।

दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है, जो सम्भव है भाषा के नियमों एवं कोष के आधार पर इसके शब्दों से उचित तर्कसम्मत रूप में सिद्ध न हो पाए, परन्तु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारों को पृथक नहीं किया जा सकता, जो इसके साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ के द्योतक हैं, जो एक सीमा तक उनमें उत्पन्न हो गए हैं तथा एक सीमा तक उनमें निहित हैं।

उदाहरण के लिए हम यतीन्द्रनाथ जिन्दाबाद का नारा लगाते हैं। इससे हमारा तात्पर्य यह होता है कि उनके जीवन के महान आदर्शों तथा उस अथक उत्साह को सदा-सदा के लिए बनाए रखें, जिसने इस महानतम बलिदानी को उस आदर्श के लिए अकथनीय कष्ट झेलने एवं असीम बिलदान करने की प्रेरणा दी। यह नारा लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिए अचूक उत्साह को अपनाएं। यह वह भावना है, जिसकी हम प्रशंसा करते हैं। इसी प्रकार हमें ‘इन्कलाब’ शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना चाहिए। इस शब्द का उचित एवं अनुचित प्रयोग करने वाले लोगों के हितों के आधार पर इसके साथ विभिन्न अर्थ एवं विभिन्न विशेषताएं जोड़ी जाती हैं। क्रांतिकारी की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है। हमने इस बात को ट्रिब्यूनल के सम्मुख अपने वक्तव्य में स्पष्ट करने का प्रयास किया था।

इस वक्तव्य में हमने कहा था कि क्रांति (इन्कलाब) का अर्थ अनिवार्य रूप में सशस्त्र आन्दोलन नहीं होता। बम और पिस्तौल कभी-कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन मात्र हो सकते हैं। इसमें भी सन्देह नहीं है कि कुछ आन्दोलनों में बम एवं पिस्तौल एक महत्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं, परन्तु केवल इसी कारण से बम एवं पिस्तौल क्रांति के पर्यायवाची नहीं हो जाते। विद्रोह को क्रांति नहीं कहा जा सकता, यद्यपि यह हो सकता है कि विद्रोह का अन्तिम परिणाम क्रांति हो।

इस वाक्य में क्रांति शब्द का अर्थ ‘प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा’ है। लोग साधारणतया जीवन की परम्परागत दशाओं के साथ चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार मात्र से ही कांपने लगते हैं। यही एक अकर्मण्यता की भावना है, जिसके स्थान पर क्रांतिकारी भावना जाग्रत करने की आवश्यक्ता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अकर्मण्यता का वातावरणत्र निर्मित हो जाता है और रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज को कुमार्ग पर ले जाती हैं। ये परिस्थितियां मानव समाज की उन्नति में गतिरोध का कारण बन जाती हैं।

क्रांति की इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थाई तौर पर ओतप्रोत रहनी चाहिए, जिससे कि रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज की प्रगकति की दौड़ में बाधा डालने के लिए संगठित न हो सकें। यह आवश्यक है कि पुरानी व्यवस्था सदैव न रहे और वह नयी व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे, जिससे कि एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने शक्तियां से रोक सके। यह है हमारा वह अभिप्राय जिसको हृदय में रखकर हम इन्कलाब जिन्दाबाद का नारा ऊँचा करते है।

- भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त
22 सितम्बर 1929

25 सितंबर 2009

सैंया भए कोतवाल तो...तो क्या ??...अपने काम पर ध्यान दो !!

आज का इण्डियन एक्सप्रेस ( http://epaper.indianexpress.com/  ) जरूर पढ़ें। सार्वजनिक जीवन में निर्लज्ज झूठ और भ्रष्टाचार का अपूर्व उदाहरण देखने को मिलेगा। कुछ दिन पहले एक्सप्रेस ने खबर दी थी कि कांग्रेस सरकार के दो मंत्री पंचसितारा होटलों में करीब एक लाख रुपए रोज के किराए वाले कमरों में रह रहे हैं। मामला सार्वजनिक होने के बाद दोनों को भारी मन से होटल का कमरा छोड़ना पड़ा।

जब यह खबर आई तो अपनी सफाई में दोनों मंत्रियों ने इस बात पर बहुत जोर दिया कि होटल का बिल वो अपने निजी कमाई से भर रहे हैं। इनमें से एक मंत्री शशि थरूर ने तो इसी मामले की रौ में हवाईजहाज में भेड़-बकरी क्लास जैसी श्रेणी होने की ब्रेकिंग न्यूज सार्वजनिक कर दी। जबकि उससे पहले तक इस देश का आम आदमी यही समझता था कि हवाई जहाज में चलने वाले लोग बहुत अमीर इंसान (!) होते हैं।

इन दोनों मंत्रियों से किसी ने नहीं पूछा कि केन्द्रीय और राज्य मंत्रियों की निजी कमाई क्या होती है और यह कैसी की जाती है ? इस निजी कमाई में उनके पद की कोई भूमिका होती भी है या नहीं ? अभी तक सरकार या कानून ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि सुरक्षित तरीके से लिया गया सुविधा शुल्क या सुविधा किसी मंत्री या किसी सरकारी कर्मचारी की निजी कमाई मानी जाएगी या सरकार की तरफ से मिली सुविधाओं में से एक !!  ऐसे में मंत्रियों की निजी कमाई का मायाजाल बहुत रहस्यमय हो जाता है। खैर,यह कहानी तो लंबी है। फिर कभी।


ताजा खबर यह है कि इण्डियन एक्सप्रेस ने दावा किया है कि उसके पास वह कागजात हैं जिनसे प्रमाणित होता है कि एस एम कृष्णा के मंत्रालय के एक सक्षम ज्वाइंट सेक्रेटरी ने पूरी कोशिश की कि मंत्री जी के पंचसितारा रिहाईश का बिल सरकार भरे।

उस ज्वाइंट सेक्रेटरी ने इस संबंध में शहरी विकास मंत्रालय को कई पत्र लिखे। उन्होंने सरकार से  बिल भरवाना चाहा, तो निराशा हाथ लगी।  शहरी विकास मंत्रालय ने कह दिया कि भाई हम तो उन्हीं होटलों का बिल भर सकते हैं जो हमारी संबधित सूची में पहले से शामिल हैं। इसके बाद एस एम कृष्णा  के मंत्रालय के ज्वाइंट सेक्रेटरी ने अपने पत्र में मांग की कि मौर्या शेरेटन होटल जहाँ कृष्णा प्रवास कर रहे थे, को भी संबंधित सूची में शामिल कर लिया जाए। किन्हीं सरकारी कारणों से उनकी यह माँग पूरी नहीं हो सकी।

वैसे, अभी तक यह नहीं पता चला है कि मंत्री जी और उनके मंत्रालय के सक्षम अधिकारियों ने सरकार के अलावा किसी अन्य फंडिग एजेंसी  (!)  से भी कोई संपर्क किया था या नहीं ?

जब एक्सप्रेस  ने आइटीसी मौर्या के जी एम,कारपोरेट कम्यूनिकेशन्स रिचा शर्मा से यह जानना चाहा कि मंत्री जी ने होटल का बिल कब और कैसे दिया था तो............ उन्होंने बताने से इनकार कर दिया !!

आप सभी समझ सकते हैं इस टांग अड़ाउ रवैये से तो वो मीडिया वालों से रूठ ही गई होंगी।

मंत्री जी अभी अमरीका में हैं। इसलिए एक्सप्रेस को इस ब्रेकिंग न्यूज पर उनकी कीमती राय नहीं मिल सकी है। पता नहीं, मंत्री जी अमरीका निजी खर्चे पर गए हुए हैं या सरकारी !!

इस मामले में ज्यादा जानकारी के लिए http://epaper.indianexpress.com/ पढ़ें।

22 सितंबर 2009

ई रजा कासी हॅ !

लोगों को यह दुहराते बहुत सुना था। मगर प्रत्यक्ष समझा न था। आज अनुभव हो गया कि इसकी क्या घात है, क्या मार है। बनारस कैण्ट पर हमें लेने आए हमारे पुराने मित्र संजय मेजर का बटुआ किसी बदमुआश ने मार दिया। पहली बात बनारस के बारे में उन्होने हमें यही बताई कि बनारस में पैंतीस प्रतिशत लुच्चे हैं। मेरा ख्याल था कि हम रिक्शे-ऑटो से अपने मक़ाम तक पहुँचेंगे मगर उन्होने इसरार किया कि बैग लेके बाइक पर सवार हो जाया जाय। मैं घबराया किसी भी तरह उनके पीछे मोटरसाइकिल पर सवारी करने को तैयार न था। मगर उनके बेहद ज़ोर देने पर मुझे पिछली सीट पर बैग समेत क़ाबिज़ होना ही पड़ा।


हमारे अज़ीज़ ने अपनी गाड़ी को विपरीत दिशा से आने वाले ट्रैफ़िक की लेन में डाल दिया। मैंने प्रतिवाद किया कि ये क्या करते हो। उन्होने बताया कि रस्ता यही सही है। पूरा दृश्य तेज़ धूप से प्रकाशमान था। सड़क पर गाड़ी, मोटर, ठेला, रिक्शा, साइकिल, मोबाइक, स्कूटर से गँजा हुआ था। ऐसे बहुत मौके आए कि अब गिरे कि तब गिरे। हर वाहन एक दुर्घटना की सम्भावना की तरह से सामने से आता और अगल बगल से, और जाने कितनी बार तो छू कर निकल जाता; हमारा बाल भी बांका न होता। धन्य हैं मेरे मित्र संजय मेजर जिनके भीतर तमाम अन्य सौन्दर्यबोधों के अलावा बनारसी का ठेठ अबोध भी स्वयंभू रूप में अस्तित्वमान है। सारे वाहन हम पर चढ़े आते रहे मगर हम बने रहे अपनी जगह। जैसे बनारस इतनी अराजकता के बावजूद बना हुआ है।

बनारस और बनारसी किसी नियम-क़ानून की मर्यादा का पालन करते नहीं दिखते। अपनी सहूलियत के लिए वे जिस तरफ़ निकल पड़ें वही मार्ग होता है। बनारस का जीवन एक बेतरतीबी के सौन्दर्य(!) से आच्छादित है। कहीं पढ़ा था कि रैन्डमनेस इज़ वेरी डिफ़ीकल्ट टु अचीव, दि इन्स्टिन्क्ट ऑफ़ ऑर्गेनाइज़ेशन कीप्स स्पॉइलिंग इट। शायद काशी का महत्व इस बात में भी है कि वे इस दुर्गम पथ पर चौड़े होकर चलते हैं। बल्कि नहीं चलते हैं, पथ से उतर के चलते हैं, पथ के चारों ओर चलते हैं, पथ से उलट कर चलते हैं, और पथ को उलट कर चलते हैं।

सबसे ग़ौर करने लायक बात ये है कि जहाँ मुम्बई, दिल्ली, कानपुर आदि बाक़ी के शहर एक खास तौर के रोड-रेज से ग्रस्त होते जा रहे हैं, बनारस में हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की सम्भावित मार्ग पर निरन्तर डाका डालता रहता है, फिर भी कोई क्रोधित नहीं होता। सभी एक विचित्र वैराग्य से सब कुछ सहते रहते हैं और दूसरे के मार्ग पर डाका डालते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। सम्भवतः यही वह फ़्री ट्रेड की असली आत्मा है जिसे पश्चिम ने भुला दिया और जिसे बनारस ने न जाने कब से अपनी संस्कृति में जिलाए रखा है?

या फिर प्राचीन 'आनन्दवन' पर यह गौ, गंगा, और गौरीपति शंकर का प्रभाव है?

- अभय तिवारी

(बनारस यात्रा के दौरान लिखी गई डायरी से)

अभय nirmal-anand.blogspot.com के संचालक है।

21 सितंबर 2009

हेड या टेल ??

             कैरिकेचर को ज्यादा साफ देखने के लिए उस पर एक लेफ्ट क्लिक करें।


- अमर

19 सितंबर 2009

ज् ज् ज् जोर लगा के हइस्स्स्सा.....

कैरिकेचर को ज्यादा साफ देखने के लिए उस पर एक लेफ्ट क्लिक करें।


कामनवेल्थ खेलों के लिए सरकार की  तैयारियों को देखकर अमर का मन पसीज गया और उन्होंने उसे कागज पर उतारा जिससे पाठक भी उसे देख सकें। - रंगनाथ

17 सितंबर 2009

प्रो.मीनाक्षी मुखर्जी हमारे बीच नहीं रहीं


प्रतिष्ठित आलोचक प्रो. मीनाक्षी मुखर्जी का बुधवार को निधन हो गया। प्रो. मुखर्जी अपनी नई किताब An Indian for All Seasons : The many Lives of R.C.Dutt  के विमोचन के लिए हैदराबाद से दिल्ली जा रहीं थीं कि अचानक हवाईअड्डे पर ही उनकी तबीयत खराब हो गई और उनका आकस्मिक निधन हो गया। उन्होंने देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों में अध्यापन किया था।  72 वर्षीय मुखर्जी की ख्याति पोस्टकोलोनियल विमर्श में किए गए अकादमिक अवदानों को लेकर रही है। वो अपने अकादमिक उपलब्धियों और मधुर व्यवहार के लिए जानी जाती थीं। उनकी महत्वपूर्ण किताबें हैं।
The twice born fiction(1972)
Realism and Reality: Novel and Society in India(1985)
Re-reading Jane Austen(1995)
The Perishable Empire:Essays on Indian Writing in English (She had received Sahitya Academy award for this book in 2003)
प्रो.मुखर्जी के रूप में हमने एक महत्वपूर्ण अकैडमिशियन खो दिया है। बौद्धिक संसार में भारत की कंगाली को देखते हुए प्रो. मुखर्जी जैसे विद्धानों का अचानक हमारे बीच से चले जाना हृदयविदारक है। मैं ब्लाग दुनिया की तरफ से प्रो. मुखर्जी को श्रद्धां‍जलि देता हूँ।





15 सितंबर 2009

हम तो डूबेंगे सनम...तुमको भी ले डूबेंगे

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अमर आईआईटी रूढ़की के गणित विभाग में एसआरएफ हैं। उन्हें गणित की कक्षाओं में पढ़ना दुनिया की सबसे बड़ी सजा लगती थी। लेकिन  गणित पढ़ाने में उन्हें  बहुत मजा आता है। बकौल अमर गणित के चाट टीचरों ही ने उन्हें कैरिकेचर बनाना सिखा दिया। उन्होंने अपने ज्यादातर शुरूआती कैरिकेचर क्लास रूम में बनाए हैं। रिसर्च में आने के बाद उन्हें ढेरों चाट सेमिनारों में हाजिरी लगानी पड़ती है सो उनका शौक परवान चढ़ता रहा, हाथ साफ होता रहा। शौकिया कार्टून बनाने वाले मैथमैटिशयन का मैं हिन्दी दुनिया से परिचय कराना चाहता हूँ। अमर ने यह कार्टून कुछ दिन पहले बनाया था। उम्मीद है कि आप सब उनकी हौसला अफजाई करेंगे।

विष्णु खरे ध्यान दें या उनसे पुरस्कृत हुए/होनेवाले कवि उन तक यह प्रश्न पहुँचा दे

आज जब जीमेल खोला तो एक अजीब मेल आया हुआ था। शाह आलम एक सक्रिय सामाजिक कार्यकता हैं। उनका मेल पढ़ कर थोड़ा आश्चर्य हुआ।  मेरी जानकारी के अनुसार उनका काव्यालोचना या हिंदी साहित्य से कोई संबंध नहीं है। लेकिन जिस तरह मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसी तरह आलोचना एक सामाजिक कर्म है। उसका प्रत्यक्ष या परोक्ष समाजशास्त्र जरूर होता है। इसका प्रमाण शाह आलम की यह टिप्पणी है। यह टिप्पणी बचकाने बुजूर्गियत के तालाब में तैरते डण्डाधारी आलोचक के चलताऊ कूटनीतिक फतवे पर सहज प्रतिक्रिया मात्र है। अनिल कुमार सिंह को मैं दूर-दूर तक नहीं जानता। लेकिन शाह आलम को जानता हूँ। मेरी जाने वो दिल्ली आने से पहले अयोध्या में दस बरसों तक सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं। इस मामले में उनके पक्ष को रखने के नैतिक दायित्व का वहन कर रहा हूँ। विज्ञजन कृपया इस पर ध्यान दें। - रंगनाथ

"डा. अनिल सिंह की कविता और पुरस्कार के बहाने विष्णु खरे ने जो तर्क दिया है वह समझ से परे है वो लिखते हैं कि अनिल की कविता 1992 की भयावहता को कम नहीं कर पाई। अनिल कोई खास पहचान नहीं बना पाए। डा. अनिल के अन्दर राजनीतिक जागरूकता का अभाव है।

कविता प्रतिरोध का माध्यम है लेकिन एक कविता से बाबरी मस्जिद का गिराया जाना नहीं रोका जा सकता है। डा. अनिल सिंह इलाहाबाद विश्वद्यिालय में छात्र जीवन से सांप्रदायिकता से जूझ रहे हैं। श्रेष्ठ स्थान पर सेलेक्शन होने के बाद भी उन्होंने कार्यक्षेत्र के रूप में अयोध्या को चुना। विषम समय में भी वह मजबूती से डटे रहे लेकिन समझौता नहीं किया। 'सहमत' जैसी संस्था अनिल की कविता का पोस्टर बना जगह-जगह प्रदर्शित करती रही है। फासिस्टों ने उन पर बम से हमला किया था। दक्षिणपंथयों के गढ़ में उन्होंने जो काम किए हैं उनके बारे में विष्णु का क्या कहना है ?

विष्णु खरे हकीकत में खरे नहीं हैं। वो हर सरकार में मुँह मारते रहे हैं। किसी सरकार से परहेज नहीं रहा है। उन्होंने अर्जुन सिंह पर कविता लिखी है जिसे देश का कोई भी युवा कवि नहीं लिख पाया है। युवा कवियों को खरे से जरूर सीख लेनी चाहिए कि इसके पीछे का राज क्या है......?"

- शाह आलम

हिन्दी दिवस पर कामिल बुल्के का स्मरण और श्रद्धां‍जलि


 फादर कामिल बुल्के 1935 में बेल्जियम से भारत आए और भारत ही के हो कर रह गए। हिन्दी संसार उनका सदैव ऋृणी रहेगा। आज के जनसत्ता अखबार में उन पर प्रभाकर श्रोत्रिय का एक लेख हिंदी के तरूतात  छपा है। हिन्दी दिवस पर मैं इस लेख के कुछ अंश जनसत्ता से साभार प्रस्तुत कर रहा हूँ। लंबे लेख से मैंने सिर्फ वहीं अंश चुने हैं जो कामिल बुल्के के कहे गए कोट हैं। 


 मैं 1935 में भारत पहुँचा तो मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ और दुख भी कि बहुत से शिक्षित लोग अपने सांस्कृतिक परंपरा से अनभिज्ञ हैं। अंग्रेजी बोलना और विदेशी सभ्यता में ढल जाना गौरव की बात समझते हैं।

मेरी समझ में नहीं आता कि हिन्दी प्रांतो की जनता अंग्रेजी माध्यम से शासन किस प्रकार बर्दाश्त कर रही है।

हिन्दी शब्द संपदा और व्यंजकता की दृष्टि से यूरोपीय भाषाओं से कहीं समृद्ध है। जर्मन,फ्रेचँ आदि समर्थ भाषाओं की तुलना में हिन्दी की व्याकरणिक संरचना कहीं अधिक सुनिश्चित और वैज्ञानिक है।

यूरोपीय भाषाओं का शब्द भण्डार हिन्दी की तरह समृद्ध नहीं है। हिन्दी सहायक क्रियाओं की बहुलता के कारण जितने प्रकार की अर्थभेदों को प्रकट कर सकती है उतने प्रकार के अर्थ ग्रीक,लैटिन जैसी पुरानी और अंग्रेजी,जर्मन और फ्रेंच जैसी आधुनिक भाषाओं जैसे आधुनिक भाषाओं में प्रकट नहीं किए जा सकते हैं।

हिन्दी का विरोधी देश की एकता का विरोधी है। अंग्रेजी का वर्चस्व देश के स्वाभिमान के विरूद्ध है। अंग्रेज का प्रचलन राष्ट्र और जन विरोधी है।

किसी भी ज्ञान का बहिष्कार,किसी भी भाषा की जानकारी का विरोध अभारतीय है। अंग्रेजी भाषा न जानना और इस अज्ञान पर गौरव करना मूर्खता है। परंतु अपनी भाषा पर अधिकार न रखना,अपने देश की भाषाएं ठुकरा कर विदेशी भाषा में किसी विषय पर विचार विमर्श करना क्या यह भारत जैसे प्राचीन गौरवमय अतीत वाले देश के स्वाभिमान पर आघात नहीं करता ?

शिक्षा के माध्यम के रूप में विदेशी भाषा का उपयोग राष्ट्र के बौद्धिक विकास में अवरोध उत्पन्न करता है।

अंतिम इच्छा - अपने अंतिम समय से पहले उन्होंने इच्छा प्रकट की थी कि उनकी मृत्यु पर जो प्रार्थना की जाए वह हिन्दी में की जाए। उनकी इच्छा अनुसार ऐसा ही किया गया।

उनकी दो इच्छाएं अधूरी रह गई एक तो ओल्ड टेस्टामेंट का अनुवाद करने और दूसरी तुलसीदास पर एक ग्रंथ लिखने की।

कामिल बुल्के का संक्षिप्त परिचय उनके द्वारा संपादित शब्दकोश के फ्लैप पर कुछ यूँ है -

स्वर्गीय डा़ बुल्के,एस.जे. ने कलकत्ता विश्विद्यालय से संस्कृत में बी़ए किया था। एमए हिंदी में इलाहाबाद विश्विद्यालय से किया। इलहाबाद विश्वविद्यालय से ही 1950 में राम कथा का मूल और विकास विषय पर हिन्दी माध्यम में डीफिल किया। डा़ बुल्के 1950 से 1974 तक रांची के जेवियर कालेज में हिन्दी और संस्कृत विभागों के अध्यक्ष रहे। भारत सरकार ने शोध और भाषा में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पदम भूषण से सम्मानित किया।

12 सितंबर 2009

अब पप्पु फेल जैसा पास होगा !

देश की शिक्षा व्यवस्था की नियामक संस्थाओं में अतिमहत्वपूर्ण संस्था है केन्द्रिय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (एनसीईआरटी)। नौ सितंबर के जनसत्ता अखबार में इस संस्था से संबधित एक खबर थी। उसके कुछ हिस्से आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप भी देखें कि हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था के नियामक क्या कह रहे हैं ? आपको उनकी बात समझ में आए तो हमें भी समझाएं।


नई दिल्ली, 8 सितंबर (भाषा)।  सीबीएसई दसवीं बोर्ड में चालू सत्र के तहत होने वाली बोर्ड परीक्षा में ग्रेडिंग प्रणाली को अमल में लाया जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद दो से ज्यादा विषयों में ई 2 ग्रेड हासिल करने वाले छात्रों को फेल समझा जाएगा। हालांकि उनके प्रमाणपत्र या अंकपत्र में ऐसा लिखा नहीं होगा।

सीबीएसई के सचिव सह अध्यक्ष विनीत जोशी ने कहा कि ग्रेडिंग प्रणाली नौ पांइट वाले मापदंड पर आधरित होगी। जो ए1 ग्रेड(असाधारण) से शुरू होगी और ई 2 ग्रेड (असंतोषजनक) पर समाप्त होगी। उन्होंने कहा कि अगर किसी छात्र को दो विषयों में 32 फीसद से कम (ई 2 ग्रेड) अंक मिलते हैं तो उसे परिणाम को बेहतर बनाने के लिए दी जाने वाली परीक्षा(इंप्रूव्ड एक्जाम) की श्रेणी में रखा जाएगा। यह परीक्षा पहले ली जाने वाली पूरक परीक्षा की तरह ही होगी। लेकिन अगर किसी छात्र को दो से ज्यादा विषय में 32 फीसद से कम अंक अथवा ई 2 ग्रेड मिलता है तो उसे फिर से उसी कक्षा में रहना होगा। इस तरह से प्रमाणपत्र में फेल तो  नहीं लिखा जाएगा, लेकिन यह फेल जैसा ही होगा।

राज्य बोर्डों में ग्रेडिंग प्रणाली नहीं होने ,प्रतियोगिता परीक्षाओं में हिस्सा लेने या अन्य स्थितियों के कारण छात्रों को पेश आने वाली परेशानियों के बारे मे पूछे जाने पर जोशी ने कहा कि इन स्थितियों में ग्रेडिंग प्रणाली के कारण कोई परेशानी नहीं आएगी। क्योंकि अंक तो हमारे पास उपलब्ध रहेंगे ही। छात्रों के मांगे जाने पर हम उन्हें अंक उपलब्ध कराएंगे। उन्होंने कहा कि ग्रेडिंग प्रणाली काफी सोच विचार के बाद तैयार की गई है। इसमें छात्रवृति,प्रतियोगिता परीक्षा,राज्य बोर्डों की प्रणाली आदि का ध्यान रखा गया है।  


? - आधा फेल-आधा पास का मजेदार खेल और ग्रेड का ग्रेड। जरूरत पड़ने पर नम्बर भी है। लड़के चाहेंगे तो जान लेंगे अपना नम्बर। नहीं चाहेंगे तो नहीं जानेंगे ! अब कोई ये समझाए कि जब लड़कों को अपना नम्बर पता चल ही जाएगा तो ग्रेडिंग किस बात की  गर ग्रेडिंग लागु करने में जटिल व्यावहारिक दिक्कतें हैं तो फिर इन दिक्कतों को जान बूझ कर एनसीईआरटी की तरफ से दावत क्यों ? और इस दावत का फाइनेंसर कौन है ? सरकार ? या जनता ?

9 सितंबर 2009

बनारस


इस शहर में बसन्त
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है


जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्वमेघ पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढ़ियों पर बैठे बन्दरों की आँखों में
और एक अजीब-सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन
तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में बसन्त का उतरना !
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर


इसी तरह रोज-रोज एक अनन्त शव
ले जाते हैं कन्धे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ
इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है


यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की एक सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से


कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भूत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है
आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं है


जो है वह खड़ा है
बिना किसी स्तम्भ के
जो नहीं है उसे थामे हैं
राख और रोशनी के ऊँचे--ऊँचे स्तम्भ
आग के स्तम्भ
और पानी के स्तम्भ
धूँए के
खुशबू के
आदमी के उठे हुए हाथों के स्तम्भ


किसी अलक्षित सूर्य को
देता हुआ अर्घ्य
शताब्दियों से इसी तरह
ग्ंगा के जल में
अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टाँग से
बिलकुल बेखबर !

केदारनाथ सिंह

5 सितंबर 2009

मैं और तुम

बरसों पहले मैं यहाँ आया था जमीन पर रेंगते हुए कीड़े की तरह,
तब मेरे पंख नहीं थे,
तब मेरे कोई ख्वाब भी नहीं थे,
आसमान मेरे लिए एक कौतुहल था,
सागर की लहरें मुझमें एक खौफ पैदा करती थी,
मैं बंद कमरों में घुटता था,
लोहे की मेज के नीचे दुबका हुआ,
अँधेरा मेरी आँखों में जाल डालता था,
मैं तन्हा भटकता था, भीड़ भरी सड़कों पर, गलियों में,
दीवरों पर अपनी पीठ लगाये, आँखें मीचें, मुट्ठियाँ भीचें
अपनी परछाई में तिरोहित .........


कि तभी तुम आये ...अपनी हथेलियों पर रख कर मुझे पुचकारा
मेरी पीठ पर स्नेह और ज्ञान के बीज बोए
मैंने तब सूरज देखा, पहली बार, क्षितिज से उगता हुआ .....
मेरे पंख तब उग आये थे ..... तब मैं उड़ना जानता था ....
पर एक लगाव था अपनी जमीन से .... उन हथेलियों के मैदानों से ..
जहाँ मैंने उड़ना सीखा था ....
मैं अब उड़ना चाहता हूँ दूर तक .....आसमान के अंत तक ...
मैं उधेड़बुन में हूँ .....कि तुमने एक फूंक मार दी
मैं तैर रहा हूँ हवाओं के साथ ...हथेलियाँ अब भी वहीँ हैं
टिमटिमाते हुए तारों की मानिंद,
मैंने तुम्हारा चेहरा कभी नहीं देखा है .....पर मैंने देखा है वो हाथ,
जिसने मेरी पीठ पर बीज बोयें हैं
.......अंतर्दृष्टि के .......

- दीपांकर

2 सितंबर 2009

एक प्रेम कविता

शाम का झुटपुटा जब घिरता है तब गंगा की घाटों पर मेघों की चादर ओढे मैं प्रेम के छंद लिखता हूँ,
और ये प्रेम गीत बालू के टापुओं से टकराकर घाटों पर पसर जाते हैं,
इसी सदय छांव में तुम मुझसे मिलने आते हो .......
तुम्हारे प्रेम में एक रहस्य है, अपने सूनेपन को इस रहस्य में मिलाना चाहता हूँ,
अलसाई पीली धूप में लिपटकर एक अज्ञात करुणा मेरे हर शब्द को गुम्फित करती है,
तुम्हारे स्नेह में भींग कर मेरे गीत गेय बनते हैं,
तुम्हारा तरल स्वाभाव मेरे गीतों को आवेग देता है,
मेरी संचित ज्ञानराशि का टेक हो तुम, देह की हर कम्पन का उद्भास हो,
गंगा की धारा का बाहरी किनारा हो, जो तट के लगाव के कारण दूर नही जा पाती
मेरी वासना का उदात्तीकृत स्वरूप हो तुम, मेरे संगीत की अन्तस्सलिला, अवरूद्ध कंठ का उल्लास हो तुम,
भोर का आकाश और सांझ का तारा ,
अपने आकुल अंतस की जीवन धारा को चिर भटकाव के जिस अंतहीन काल पथ पर छोड देते हैं,
उसी अंतहीन मिलन की आस हो तुम मेरा सबकुछ मेरी निश्वास हो तुम.

- दीपांकर