“मैं लोगों के लिए गाऊं यह चुनाव मेरा नहीं था. बल्कि इस काम के लिए ज़िन्दगी ने मुझे चुना." अर्जेंटीना की महान लोकगायिका मर्सिडीज़ सोसा ने कुछ दिनों पहले यह बात एक इंटरव्यू में कही थी.
अमेरिका की आवाज़' कही जाने वाली मर्सिडीज़ सोसा ने अपने छह दशकों से भी लम्बे करियर में महज अपने महाद्वीप का ही नहीं बल्कि सारी दुनिया का प्यार और सम्मान अर्जित किया. देशज और फ्रेंच के मिलेजुले वंश से होने की वजह अपने प्रशंसकों द्वारा 'ला नेग्रा' अर्थात 'श्यामा' कहलाने वाली सोसा की धीर-गंभीर आवाज़ हर तरह के अन्याय और शोषण के खिलाफ गूंजती रही. उनके संगीत में बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लातिन अमेरिका के राजनैतिक और सामाजिक उथल-पुथल से भरे इतिहास का अनुनाद है.
हाइडी मर्सिडीज़ सोसा का जन्म 1935 में अर्जेंटीना के उत्तर-पश्चिमी प्रांत तुकुमान में हुआ था. उनके माता-पिता खेतिहर मज़दूर थे. तुकुमान की आबोहवा दूर बसे ब्वायनस आयरिस की शहरी संस्कृति के मुकाबले पड़ोसी देश बोलीविया की देशज (इंडीजीनस) संस्कृति से ज्यादा मेल खाती है. ऐसे माहौल में सोसा ने कच्ची उम्र से ही लोक संगीत और नृत्य में रूचि लेना शुरू कर दिया था. पंद्रह साल की उम्र में सोसा स्थानीय रेडियो स्टेशन द्वारा आयोजित एक गायन प्रतियोगिता की विजेता बनीं. पुरस्कारस्वरूप उन्हें दो महीनों तक रेडियो के लिए गाने का अनुबंध प्राप्त हुआ. प्रतिभाशाली सोसा के संगीत करियर की यहीं से शुरुआत हो गई.
1956 में लोकसंगीतकार ऑस्कर मातूस से विवाह के बाद उनकी कला और भी निखर उठी. उनका पहला अल्बम ला वोज दे ला ज़ाफरा 1959 में आया. साठ के दशक के मध्य तक सोसा न केवल अर्जेंटीना बल्कि पूरे दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप में लोकप्रिय हो चुकी थीं. योरप और उत्तर अमेरिका के दौरे के बाद उनकी ख्याति दुनिया भर में फैल गई.
सोसा का कहना था- "कलाकार कोई सियासी रहनुमा नहीं होता. उसकी एकमात्र शक्ति होती है जनता को थिएटर की ओर आकृष्ट करना." पचास और साठ के दशक में लातिन अमेरिकी संगीत में 'ला नुएवा कान्सिओन' यानी 'नव गीत आन्दोलन' की शुरुआत हुई. पारंपरिक लातिन अमेरिकी लोकधुनों और ताज़ातरीन रॉक संगीत का समन्वय और प्रगतिशील राजनैतिक चेतनासंपन्न गीत इस मूवमेंट की विशेषता थी. स्वयं को एक्टिविस्ट मानने से इनकार करने वाली सोसा अर्जेंटीना में नुएवा कान्सिओन का प्रतिनिधि स्वर बन गईं. पारंपरिक एवं लोकसंगीत के विशेषज्ञ डॉ. जोनाथन रिटर के अनुसार सोसा के गाये नुएवा कान्सिओन गीत राजनैतिक सन्देश पहुंचाने के लिए लातिन अमेरिकी कविता और साहित्य की समृद्ध विरासत से से अनुप्राणित थे. और इस तरह उसी दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रचलित रुक्ष विरोध-गीतों की बनिस्बत उनका प्रभाव और आकर्षण अधिक स्थायी था.
1971 में चिले की प्रसिद्द कवि और संस्कृतिकर्मी विओलेता पार्रा की स्मृति में तैयार एल्बम का एक गीत ग्रासिअस अ ला वीदा' (ज़िन्दगी का शुक्रिया) बहुत लोकप्रिय हुआ और आज तक सोसा के गाये सर्वश्रेष्ठ गीतों में गिना जाता है. श्रमिक संघर्षों की जयकार करने वाले उनके अल्बम 'हासता ला विक्टोरिया' ( फतह तलक) ने प्रगतिशील हलकों में उनके नाम की धूम मचा दी. गौरतलब है कि फिदेल कास्त्रो को लिखे गए अपने अंतिम पत्र में चे ग्वेवारा ने हासता ला विक्टोरिया कहकर विदा ली थी.
मगर सत्तर के दशक में लातिन अमेरिका में राजनैतिक हालात तेज़ी से बदल रहे थे. 1973 में चिले में जनरल पिनोशे ने सत्ता हथिया ली. इसके तुंरत बाद ही विख्यात कवि-गायक-संस्कृतिकर्मी विक्टर हारा को गिरफ्तार कर तरह तरह से प्रताड़ित किया गया और आखिरकार गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई. 1976 में जोर्गे विदेला के नेतृत्व में अर्जेंटीना में भी सैन्य सरकार सत्ता में आई. इसके साथ ही शुरू हुआ दमन का भयावह दौर जिसमें मार दिए गए या गायब कर दिए लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं की तादाद हजारों में बताई जाती है. सैनिक सरकार के अत्याचारों का सोसा ने अपने गीतों द्वारा पुरजोर विरोध किया. सरकार ने रेडियो और टेलिविज़न पर उनके गीत प्रसारित करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया.
1979 की एक सुहावनी शाम को ला प्लाता शहर में हो रहे एक कंसर्ट में सोसा मंच पर अपनी पुरखुलूस आवाज़ में गा रही थीं कि सेना ने वहां छापा मार दिया. मंच पर ही उनकी तलाशी लेकर उन्हें सरेआम बेइज्ज़त करने की कोशिश की गई. इतना ही नहीं, उनके अलावा 200 दर्शकों, जिनमें ज़्यादातर विश्वविद्यालयीन छात्र थे, को भी गिरफ्तार कर लिया गया. बहुत संभव था कि सरकार के अन्य विरोधियों की तरह उन्हें भी गायब कर दिया जाता. पर उनकी गिरफ्तारी को लेकर हुए भारी अंतर्राष्ट्रीय विरोध के आगे सरकार को झुकना पड़ा. अठारह घंटों बाद ही उन्हें रिहा कर दिया गया. पर इसके लिए उन्हें भारी जुर्माना अदा करना पड़ा और देश छोड़कर चले जाने को कहा गया.
निर्वासन के अगले कुछ साल उन्होंने मड्रिड और पेरिस में बिताये. योरप में गुज़ारे इन सालों में पॉप और रॉक जैसे अभिनव संगीत प्रकारों से उनका परिचय हुआ. इन नवेली चीज़ों को आत्मसात करने से पारंपरिक एंडियन और टैंगो रिदम की उनकी जड़ें मज़बूत ही हुईं.
अर्जेंटीना में सोसा की अनुपस्थिति में भी उनका संगीत जनता के लिए प्रेरणा बना हुआ था. 1982 में जब वे सैनिक तानाशाही के पतन से कुछ पहले स्वदेश लौटीं तो उनकी लोकप्रियता चरम पर थीं. बाद के वर्षों में भी सोसा निरंतर सक्रिय बनी रहीं. उनकी आवाज़ सदैव सामाजिक न्याय, महिला अधिकार और शान्ति की हिमायत करती रही. उनका कहना था - "संगीत मुश्किलें नहीं सुलझा सकता. इंसानों को अपनी मुश्किलें खुद सुलझानी होती हैं. पर संगीत मुश्किलों से जूझते लोगों को दिलासा दे सकता है और शायद मुश्किलें सुलझाने की प्रेरणा भी. जिन बातों में उनका भरोसा है, गायकों को वह गाते रहना होगा. उन्हें अपनेआप के प्रति ईमानदार बने रहना होगा. इन गीतों में मेरा भरोसा है इसलिए मैं इन्हें गाती रहूंगी."
लूचानो पावारोती, स्टिंग, जोआन बाएज़ और शकीरा जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाकारों के साथ उन्होंने मंच साझा किया. उनकी लोकप्रियता का यह आलम था कि 1987 में उनके एक कंसर्ट के दौरान न्यू यॉर्क का प्रतिष्ठित कार्नेगी हॉल दस मिनटों तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा. कहा जाता है कि ऐसे ही किसी कार्यक्रम के दौरान जोआन बाएज़ सोसा के करिश्मे से इतनी अभिभूत हुईं कि उनके क़दमों में झुक गईं.
सोसा के अब तक लगभग सत्तर अल्बम आ चुके हैं. जीवन के आखिरी दशक में भी उन्हें भारी सफलता हासिल हुई. 2000, 2003 और 2006 में उनके मुख्तलिफ अल्बमों को लातिन ग्रॅमी पुरस्कार हासिल हुए. उनका नवीनतम अल्बम कान्तोरा 1 इस वर्ष भी पुरस्कारों की होड़ में शामिल है. चे ग्वेवारा के जीवन पर बनी 2008 की बहुचर्चित फिल्म 'चे' में उनका एक गीत शामिल था. आज सोसा के न होने पर उन्हीं के गाये एक गीत के बोल कानों में गूंजते हैं.
हज़ारों बार मुझे मार डाला गया
हज़ारों बार कर दिया गया गायब
पर मैं हूँ, जो मर कर उठ खड़ी हुई
पीछे छूटी तानाशाही के मलबों से उभरती हुई, मैं हूँ.
और हम अब भी गा रहे हैं.
(मर्सिडीज़ सोसा का अर्जेंटीना की राजधानी ब्वायनस आयरिस में गत 4 अक्टूबर को निधन हो गया.)

