26 दिसम्बर 2009

हम अब भी गा रहे हैं

भारतभूषण तिवारी

“मैं लोगों के लिए गाऊं यह चुनाव मेरा नहीं था. बल्कि इस काम के लिए ज़िन्दगी ने मुझे चुना." अर्जेंटीना की महान लोकगायिका मर्सिडीज़ सोसा ने कुछ दिनों पहले यह बात एक इंटरव्यू में कही थी.

अमेरिका की आवाज़' कही जाने वाली मर्सिडीज़ सोसा ने अपने छह दशकों से भी लम्बे करियर में महज अपने महाद्वीप का ही नहीं बल्कि सारी दुनिया का प्यार और सम्मान अर्जित किया. देशज और फ्रेंच के मिलेजुले वंश से होने की वजह अपने प्रशंसकों द्वारा 'ला नेग्रा' अर्थात 'श्यामा' कहलाने वाली सोसा की धीर-गंभीर आवाज़ हर तरह के अन्याय और शोषण के खिलाफ गूंजती रही. उनके संगीत में बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लातिन अमेरिका के राजनैतिक और सामाजिक उथल-पुथल से भरे इतिहास का अनुनाद है.

हाइडी मर्सिडीज़ सोसा का जन्म 1935 में अर्जेंटीना के उत्तर-पश्चिमी प्रांत तुकुमान में हुआ था. उनके माता-पिता खेतिहर मज़दूर थे. तुकुमान की आबोहवा दूर बसे ब्वायनस आयरिस की शहरी संस्कृति के मुकाबले पड़ोसी देश बोलीविया की देशज (इंडीजीनस) संस्कृति से ज्यादा मेल खाती है. ऐसे माहौल में सोसा ने कच्ची उम्र से ही लोक संगीत और नृत्य में रूचि लेना शुरू कर दिया था. पंद्रह साल की उम्र में सोसा स्थानीय रेडियो स्टेशन द्वारा आयोजित एक गायन प्रतियोगिता की विजेता बनीं. पुरस्कारस्वरूप उन्हें दो महीनों तक रेडियो के लिए गाने का अनुबंध प्राप्त हुआ. प्रतिभाशाली सोसा के संगीत करियर की यहीं से शुरुआत हो गई.

1956 में लोकसंगीतकार ऑस्कर मातूस से विवाह के बाद उनकी कला और भी निखर उठी. उनका पहला अल्बम ला वोज दे ला ज़ाफरा 1959 में आया. साठ के दशक के मध्य तक सोसा न केवल अर्जेंटीना बल्कि पूरे दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप में लोकप्रिय हो चुकी थीं. योरप और उत्तर अमेरिका के दौरे के बाद उनकी ख्याति दुनिया भर में फैल गई.

सोसा का कहना था- "कलाकार कोई सियासी रहनुमा नहीं होता. उसकी एकमात्र शक्ति होती है जनता को थिएटर की ओर आकृष्ट करना." पचास और साठ के दशक में लातिन अमेरिकी संगीत में 'ला नुएवा कान्सिओन' यानी 'नव गीत आन्दोलन' की शुरुआत हुई. पारंपरिक लातिन अमेरिकी लोकधुनों और ताज़ातरीन रॉक संगीत का समन्वय और प्रगतिशील राजनैतिक चेतनासंपन्न गीत इस मूवमेंट की विशेषता थी. स्वयं को एक्टिविस्ट मानने से इनकार करने वाली सोसा अर्जेंटीना में नुएवा कान्सिओन का प्रतिनिधि स्वर बन गईं. पारंपरिक एवं लोकसंगीत के विशेषज्ञ डॉ. जोनाथन रिटर के अनुसार सोसा के गाये नुएवा कान्सिओन गीत राजनैतिक सन्देश पहुंचाने के लिए लातिन अमेरिकी कविता और साहित्य की समृद्ध विरासत से से अनुप्राणित थे. और इस तरह उसी दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रचलित रुक्ष विरोध-गीतों की बनिस्बत उनका प्रभाव और आकर्षण अधिक स्थायी था.

1971 में चिले की प्रसिद्द कवि और संस्कृतिकर्मी विओलेता पार्रा की स्मृति में तैयार एल्बम का एक गीत ग्रासिअस अ ला वीदा' (ज़िन्दगी का शुक्रिया) बहुत लोकप्रिय हुआ और आज तक सोसा के गाये सर्वश्रेष्ठ गीतों में गिना जाता है. श्रमिक संघर्षों की जयकार करने वाले उनके अल्बम 'हासता ला विक्टोरिया' ( फतह तलक) ने प्रगतिशील हलकों में उनके नाम की धूम मचा दी. गौरतलब है कि फिदेल कास्त्रो को लिखे गए अपने अंतिम पत्र में चे ग्वेवारा ने हासता ला विक्टोरिया कहकर विदा ली थी.

मगर सत्तर के दशक में लातिन अमेरिका में राजनैतिक हालात तेज़ी से बदल रहे थे. 1973 में चिले में जनरल पिनोशे ने सत्ता हथिया ली. इसके तुंरत बाद ही विख्यात कवि-गायक-संस्कृतिकर्मी विक्टर हारा को गिरफ्तार कर तरह तरह से प्रताड़ित किया गया और आखिरकार गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई. 1976 में जोर्गे विदेला के नेतृत्व में अर्जेंटीना में भी सैन्य सरकार सत्ता में आई. इसके साथ ही शुरू हुआ दमन का भयावह दौर जिसमें मार दिए गए या गायब कर दिए लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं की तादाद हजारों में बताई जाती है. सैनिक सरकार के अत्याचारों का सोसा ने अपने गीतों द्वारा पुरजोर विरोध किया. सरकार ने रेडियो और टेलिविज़न पर उनके गीत प्रसारित करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया.

1979 की एक सुहावनी शाम को ला प्लाता शहर में हो रहे एक कंसर्ट में सोसा मंच पर अपनी पुरखुलूस आवाज़ में गा रही थीं कि सेना ने वहां छापा मार दिया. मंच पर ही उनकी तलाशी लेकर उन्हें सरेआम बेइज्ज़त करने की कोशिश की गई. इतना ही नहीं, उनके अलावा 200 दर्शकों, जिनमें ज़्यादातर विश्वविद्यालयीन छात्र थे, को भी गिरफ्तार कर लिया गया. बहुत संभव था कि सरकार के अन्य विरोधियों की तरह उन्हें भी गायब कर दिया जाता. पर उनकी गिरफ्तारी को लेकर हुए भारी अंतर्राष्ट्रीय विरोध के आगे सरकार को झुकना पड़ा. अठारह घंटों बाद ही उन्हें रिहा कर दिया गया. पर इसके लिए उन्हें भारी जुर्माना अदा करना पड़ा और देश छोड़कर चले जाने को कहा गया.

निर्वासन के अगले कुछ साल उन्होंने मड्रिड और पेरिस में बिताये. योरप में गुज़ारे इन सालों में पॉप और रॉक जैसे अभिनव संगीत प्रकारों से उनका परिचय हुआ. इन नवेली चीज़ों को आत्मसात करने से पारंपरिक एंडियन और टैंगो रिदम की उनकी जड़ें मज़बूत ही हुईं.

अर्जेंटीना में सोसा की अनुपस्थिति में भी उनका संगीत जनता के लिए प्रेरणा बना हुआ था. 1982 में जब वे सैनिक तानाशाही के पतन से कुछ पहले स्वदेश लौटीं तो उनकी लोकप्रियता चरम पर थीं. बाद के वर्षों में भी सोसा निरंतर सक्रिय बनी रहीं. उनकी आवाज़ सदैव सामाजिक न्याय, महिला अधिकार और शान्ति की हिमायत करती रही. उनका कहना था - "संगीत मुश्किलें नहीं सुलझा सकता. इंसानों को अपनी मुश्किलें खुद सुलझानी होती हैं. पर संगीत मुश्किलों से जूझते लोगों को दिलासा दे सकता है और शायद मुश्किलें सुलझाने की प्रेरणा भी. जिन बातों में उनका भरोसा है, गायकों को वह गाते रहना होगा. उन्हें अपनेआप के प्रति ईमानदार बने रहना होगा. इन गीतों में मेरा भरोसा है इसलिए मैं इन्हें गाती रहूंगी."

लूचानो पावारोती, स्टिंग, जोआन बाएज़ और शकीरा जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाकारों के साथ उन्होंने मंच साझा किया. उनकी लोकप्रियता का यह आलम था कि 1987 में उनके एक कंसर्ट के दौरान न्यू यॉर्क का प्रतिष्ठित कार्नेगी हॉल दस मिनटों तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा. कहा जाता है कि ऐसे ही किसी कार्यक्रम के दौरान जोआन बाएज़ सोसा के करिश्मे से इतनी अभिभूत हुईं कि उनके क़दमों में झुक गईं.

सोसा के अब तक लगभग सत्तर अल्बम आ चुके हैं. जीवन के आखिरी दशक में भी उन्हें भारी सफलता हासिल हुई. 2000, 2003 और 2006 में उनके मुख्तलिफ अल्बमों को लातिन ग्रॅमी पुरस्कार हासिल हुए. उनका नवीनतम अल्बम कान्तोरा 1 इस वर्ष भी पुरस्कारों की होड़ में शामिल है. चे ग्वेवारा के जीवन पर बनी 2008 की बहुचर्चित फिल्म 'चे' में उनका एक गीत शामिल था. आज सोसा के न होने पर उन्हीं के गाये एक गीत के बोल कानों में गूंजते हैं.

हज़ारों बार मुझे मार डाला गया
हज़ारों बार कर दिया गया गायब
पर मैं हूँ, जो मर कर उठ खड़ी हुई
पीछे छूटी तानाशाही के मलबों से उभरती हुई, मैं हूँ.
और हम अब भी गा रहे हैं.

(मर्सिडीज़ सोसा का अर्जेंटीना की राजधानी ब्वायनस आयरिस में गत 4 अक्टूबर को निधन हो गया.)

24 दिसम्बर 2009

दो व्यस्क स्त्री-पुरूष किन-किन शर्तों पर शारीरिक संबंध बना सकते हैं ?

दो व्यस्क स्त्री - पुरूष किन-किन शर्तों पर शारीरिक संबंध बना सकते हैं ? निश्चय ही यह प्रश्न कानून की सीमारेखा से बाहर है। उनके बीच का जोड़ धन से बना है या यश से या ख्याति से या विवाह से या प्यार से इससे किसी तीसरे व्यक्ति या कानून का कोई वास्ता नहीं होना चाहिए। यदि किसी स्त्री या पुरूष ने धन के बदले अपना शरीर उपलब्ध कराया तो इसे कानूनी अपराध मानना अनुचित है। इसलिए इस कृत्य के डिक्रिमीलाइेशन की जरूरत है। एक व्यक्ति के स्तर पर धन के बदले शरीर उपलब्ध कराने को मैं कभी भी कानूनी अपराध की श्रेणी में नहीं रखना चाहुंगा। क्योंकि ऐसा करने पर बहुत सी ऐसी औरतें/पुरूष इस कानून की जद में आ जाएंगे जो रेडलाइट एरिया में नहीं रहते। कई विवाहित औरतें/पुरूष भी 'काफ्काई ट्रायल' के बाद इस कानून की तहत सजा पाने से बच न पाएंगे। यदि कोई स्त्री या पुरूष ऐसा करता है तो यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है। लेकिन  पुरानी कहावत है कि आप की स्वतंत्रता वहीं खत्म हो जाती है जहाँ दूसरे की नाक शुरू होती है। जाहिर है वेश्यावृत्ति जब तलक दो लोगों के बीच चलती है उसे वेश्यावृत्ति नाम भी नहीं दिया जाता। जब यह परिघटना एक संगठित व्यवसाय के रूप में सामने आती है तभी ही इसे वेश्यावृत्ति माना जाता है। किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत स्तर पर धनलाभ के लिए शरीर बेचना और संगठित रूप से वेश्यावृत्ति करना/करवाना दोंनो दो चीजें हैं। जो औरतें या पुरूष संस्थागत रूप से वेश्यावृत्ति को अपनाते हैं समाज में उन्हें ही वेश्या कहा/माना है।

वेश्यावृत्ति को इतिहास का सबसे पुराना पेशा बताना हास्यपस्द है। ऐसे लोगों के ऐतिहासकि स्रोत क्या हैं यह अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है सो इसपर ज्यादा नहीं कहुँगा। मैं ऐसा नहीं कह सकता कि यह विश्व का सबसे पुराना पेशा है। वेश्यावृत्ति का इतिहास सीधे-सीधे नगरीकरण के इतिहास से जुड़ा हुआ है। भारत में भी वेश्यालयों के जितने भी उदाहरण दिए जाते हैं वो ऐसे क्षेत्रों को हैं जहाँ पर धनिकों और वणिकों का संकेद्रण रहा है। भारत कृषि-प्रधान देश है। इस बात का सर्वेक्षण किया जा सकता है। कितने सौ गाँवों के बीच एक वेश्यालय स्थित है। कितने कस्बों में वेश्यालय स्थित है। और कितने वाणिज्यिक केन्द्र बने महानगरों में वेश्यालय स्थित है। ऐसे सर्वेक्षण के बाद वेश्यावृत्ति को सर्वव्यापी परिघटना मानने वालो को अपना पक्ष सुनिश्चित करने में सुविधा होगी। जाहिर है उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी।

वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देने या  देने की बहस का केन्द्रिय प्रश्न यह है कि क्या धनिकों को पैसे के बदले औरत खरीदने की खुली छूट दी जाए या नहीं ? अब इसे प्रस्तुत यूँ किया जा रहा है कि क्या औरतों को पैसे के बदले अपना शरीर बेचने की आजादी दी जाए कि नहीं ? यदि यह मामला औरत की आजादी का है तो फिर वेश्यालय बनाने की या उसे मान्यता देने की कोई जरूरत नहीं है। सरकार घोषणा करवा दे कि सम्पूर्ण भारत में कोई भी औरत/पुरूष कहीं भी रहकर धन की आवश्यक्ता होने पर अपने शरीर का विक्रय कर सकते हंै। ऐसा करने पर उन्हें किसी तरह के सामाजिक शोषण या बहिष्कार का शिकार नहीं होना पड़ेगा। सरकार की तरफ से उन्हें कानूनी संरक्षण दिया जाएगा। गर भारत सरकार और विश्व की अन्य कई सरकारें यह सोचती है कि ऐसा धन के बदले शरीर देने वाली औरतों को एक अलग इलाकों में रहना होगा। तो यह एक तरह का घेटोआइजेशन  है।  यदि आप इसे पेशा मानते हैं तो आपको अन्य पेशवरों की तरह उन्हें अपनी इच्छा से अपना आफिस खोलने का अधिकार देना होगा। उनका सामाजिक सम्मान सुनिश्चित करना होगा।

फिलवक्त जितने भी रेडलाइट एरिया हैं उनमें औरत का शरीर मुर्गी के माँस से भी सस्ता बिकता है। इन रेडलाइट एरिया की लाइफलाइन दो ही प्रमुख वर्ग हैं। एक वह प्रवासी कामगार वर्ग जो आंतरिक विस्थापन का शिकार है। दूसरा सेना या अन्य सुरक्षा बलों के अधिकारी वर्ग से नीचे के कर्मचारी। ऐसा नहीं है कि सेना के अधिकारी वर्ग के कर्मचारी इस सुख से सर्वथा वंचित रहते हैं जम्मु-कश्मीर और पूर्वोत्तर में उनके किए की गूँज पूरे देश में सुनाई दी। जम्मू-कश्मीर में जिस रैकेट का पर्दाफाश हुआ उसमें तो सेना और अन्य सुरक्षाबलों के आला दर्जे के अधिकारियों की गर्दन फँसती नजर आई। इन तथ्यों के मद्देनजर वेश्यावृत्ति  सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्न बन जाता है।

वेश्यावृत्ति के ग्राहकों के साथ ही वेश्याओं के वर्गीकरण की भी जरूरत है। तथाकथित रेडलाइट इलाको में फँसी ज्यादातर स्त्रियाँ या तो किसी अत्यंत पिछड़े या गरीब इलाके से आती हैं या फिर मुश्किल से गुजरबसर करते हुए परिवार से दलालों के सब्जबाग में फँसा कर लाई हुई होती हैं। गरीबी/बदहाली/सामाजिक संकट से वेश्यावृत्ति से सीधा संबंध है। अमरीका के अफगानीस्तान पर हमले के बाद अफगानीस्तान में जो कुछ चीजें सस्ती रह गई थीं उनमें औरतें प्रमुख थीं। (यहाँ जबरन बलत्कृत की जाने वाली स्त्रियों के अतिरिक्त तथाकथित स्वेच्छा से अपना शरीर बेचने वाली महिलाओं की ही बात की जा रही है। बलत्कृत स्त्रियों को शामिल कर लिया जाए तो स्थिति और भी भयावह होगी। )

स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति स्वीकार करने का तर्क आमतौर पर उन्ही वेश्याओं के लिए दिया जाता है जो एलीट होती हैं। क्योंकि इसी वर्ग में ऐसे ग्राहक उपलब्ध होते हैं जो एक बार सहवास के लिए इतना पैसा दे सकें जो किसी सरकारी बाबू की महीने या सालभर की तनख्वाह से ज्यादा हो और किसी स्त्री को मनुष्य के लिए उपलब्ध सर्वाधिक प्रगाढ़ और अंतरंग सुख का सौदा करने को प्रेरित कर सके। पुलिस के शोषण की बात और कानून द्वारा नियंत्रण न कर पाने की निश्चय ही हास्यपद है। इस तर्क से फिर किसी भी अपराध को कानूनी मान लेना चाहिए। क्योंकि ऐसा कोई अपराध नहीं है जिसका पुलिस और कानून उन्मूलन करने का दावा कर सकें। जब वेश्यावृत्ति गैर-कानूनी है तो पुलिस के ऊपर के जिम्मेदारी आती है कि ऐसा सब चलता था तो आप कहाँ थे ? जब यह कानूनी हो जाएगा तो पुलिस के पास कानून की घूँघट होगी जिसकी आड़ में सबकुछ छिपाया जा सकेगा। वेश्यावृत्ति एक वन-वे है जिसमें जाने का रास्ता तो है लेकिन वापस आने का नहीं। इसलिए मूल प्रश्न वेश्याओं के पुनर्स्थापना का है जिससे सरकार मुँह चुरा रही है। वेश्याएं पेशा छोड़ कर जाएं तो जाएं कहाँ ?

नोट- सारी बहस के साथ इस पड़ताल की भी जरूरत है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने के पीछे कहीं वैसा ही कोई खेल तो नहीं जैसा धारा 377 के पीछे था ? (देखें अभिषेक श्रीवास्तव का लेख, 377 के दुश्मन कौन हैं ?, समयांतर,अगस्त,2009) अभिषेक के लेख की कड़ी में ही देखें गीताश्री का लेख कि किस तरह केरल में पुरूष वेश्यावृत्ति फलफूल रही है।

18 दिसम्बर 2009

ग्राहकों को सजा हो

जब तक देह का भोग करने वालों पर शिकंजा नहीं कसा जाएगा,यह अमानवीय व्यापार जारी रहेगा। मौजूदा कानूनी ढांचा तो मजबूर औरतों पर ही अपना शिकंजा कसता है। जबकि असली दोषी तो इस व्यापार की मांग करने वाला है। अगर उन पर शिकंजा कसा जाए तो मांग कम होगी और इसमें जबरन धकेली जानी वाली या ग्लैमर के प्रभाव से इसमें लिप्त होने वाली महिलाओं की संख्या घटेगी। स्वीडन में जब तक ग्राहक को सजा देने का प्रावधान नहीं था तब तक यौन व्यापार में लोग ज्यादा सक्रिय थे। मांग ज्यादा थी लिहाजा मुनाफे के लालच में दलाल औरतों की गरीबी और जातीय मजबूरी का फायदा उठा कर उन्हें यौन व्यापार में धकलते रहते थे। कई बार नौकरी का झांसा देकर या आगे बढ़ने के बहाने भी वे औरतों को बरगला कर इस व्यापार में धकेलते रहते थे। आर्थिक रूप् से मजबूत लड़कियों को ग्लैमर की चकाचैंध में फंसा कर और इसके लिए देह व्यापार को आसान तरीका बता कर भी उलझाया जाता रहा है।

(नई दिल्ली में 12 जनवरी 2009 की प्रेस कांफ्रेस में दिए गए व्यक्तव्य का अंश।)

16 दिसम्बर 2009

यह व्यापार मंजूर नहीं

मृदुला सिन्हा
हाल ही में उच्चतम न्यायालय के पीठासीन न्यायधीशों दलबीर भंडारी और ए.के पटनायक की पीठ ने महान्यायवादी से कहा 'यदि देह व्यापार को कानूनी ढंग से रोका नही जा सकता तो इसे वैध क्यों नहीं कर दिया जाता'। अनुमान है कि न्यायधिशों ने गुस्से में यह बात कही है। उनका आशय कानून के जरिए देह व्यापार पर शीघ्र रोक लगाने से है। यदि कानून का पालन करने वाले इसे रोक नहीं पाते तो इसे वैध ही बना दें। समाचार पत्रों में यह खबर पढ़कर सभी पाठक चौंके होंगे। कुछ लोगों ने तो प्रतिक्रिया ही दे दी-'वेश्यावृत्ति को वैध बना देना चाहिए'। यह वृत्ति है। अर्थात जीविका का साधन। हम सब जानते हैं कि जीवन में सभी को मनचाही वृत्ति नहीं मिल पाती। किसी की चाहत अधिकारी बनने की होती है, वह कर्मचारी बनकर रह जाता है। कोई राजनेता बनना चाहता है और छोटा व्यापारी बनकर रह जाता है। जीवन के सारे कार्यकलाप वृत्ति भी हैं और शौक भी। ह भी कहा जाता है कि व्यक्ति को उसके कार्य (पेशे) से आनन्द भी मिलना चाहिए। तभी उसकी कार्य क्षमता बढती है। परंतु वेश्यावृत्ति में किसी मजबूरीवश फंसी युवतियां या किसी दलाल द्वारा फंसाई गई महिलाओं को भी अपनी वृत्ति से संतोष नहीं होता। सुख नहीं मिलता। इसलिए यह उनके ऊपर एक अत्याचार होता है। देह शोषण को देह व्यापार नहीं, देह दोहन ही कहना चाहिए।

इस दृष्टि से ही उनकी वृत्ति की वैधता और अवैधता पर विचार करना चाहिए। यह वृत्ति करने वाली और उसका लाभ लेने वाले, दोनों के लिए घातक है,उसे समाज स्वीकृत कैसे मान लें ? देह व्यापार में लगे लोगों की संख्या कम नहीं है। परंतु आज भी चोरी-छुपे ही पुरुष वहां जाते हैं। अर्थात वह गलत काम है। जो कार्य व्यक्ति और समाज के हित में नहीं, उसे वैध कैसे बनाया जाए ? आज हम आतंकवाद को नहीं रोक पा रहे। असहनशील हाथों में भी हथियार थमा दिए गए हैं,गोलियां चल जाती हैं, लोग मारे जा रहे हैं। तो क्या आतंककारियों और हत्या करने वालों के कृत्यों को भी वैध कर दिया जाए ? सोचा जाए तो वेश्यावृत्ति भी आत्महत्या के समान ही है। स्त्री का शरीर जिंदा है, पर उसका अस्तित्व वो उसी दिन मर जाता है जिस दिन उसे और कई पुरुषों के साथ सोना पड़ता है। वह जिन्दा लाश ही होती है। इस दृष्टि से विचार करने पर भी वेश्या का अपराध आत्महत्या की श्रेणी में ही आता है। और आत्महत्या तो अपराध है ही। समाज के लिए अहित करने वाला कर्म कभी वैध हो ही नहीं सकता। यह भी सही है कि कानून के जरिए इस वृत्ति को रोका नहीं जा सकता। व्यक्ति और समाज के अंदर जागृति लाना ही एक उपाय है। वर्तमान समय में जब चारों और भोगवादी प्रवृत्ति का बोलबाला है, पति-पत्नि के रिश्ते में भी ढीलापन आ गया ,समाज का भय समाप्त हो गया, इस वृत्ति को रोकना या नियंत्रिता करना भगीरथ प्रयत्न जैसा ही होगा। खुलेआम वेश्यातवृत्ति हो रही है, बड़े होटलों से लेकर अलग-अलग मोहल्लों में इस वृत्ति के पेशेवर भिन्न-रूपों में है। अब यह भी बात नहीं रही कि महिलाएं परिस्थितिवश इस क्षेत्र में धकेली जा रही हैं। फिर भी इस कृत्य को वैधानिक नहीं बनाया जा सकता। आनंद के लिए महिला-पुरुषों के घोर भटकाव के बावजूद यह कार्य अशोभनीय और निंदनीय हैं। अनुकरणीय तो हर्गिज नहीं।

आवश्यक्ता है जोर-शोर से इस वृत्ति के दुष्परिणामों को प्रचारित-प्रसारित करने की। खुले सेक्स संबंधों से होने वाली लाइलाज बीमारियों से लोगो को अवगत करने की। इस वृत्ति में रत महिला-पुरुषों के जीवन की विद्रुपताएं दिखाने की। पर हम तो उल्टी धारा में सलग्न हैं। 'सुरक्षित सेक्स' और 'अपने पर्स में कंडोम लेकर चलें' जैसा प्रचार हो रहा है। ऐसे प्रचार के पीछे का उद्देश्य अवांछित गर्भ रोकना है,परंतु इससे वेश्यावृत्ति को बढ़ावा मिलता है। समाज और सरकार गंभीरता से विचार ही नहीं करते। सामाजिक क्रियाकलाप के दूरगामी परिणाम का आकलन नहीं होता। इसलिए सब कुछ चलता है की मानसिकता में आ गया समाज। पर वेश्यावृत्ति इस मानसिकता से नहीं चलाई जानी चाहिए, क्योंकि इसके वर्तमान और दूरगामी दोनों परिणाम घातक हैं। (राजस्थान पत्रिका से साभार)

14 दिसम्बर 2009

आधी दुनिया का एक अंधेरा कोना

गीताश्री
सुप्रीम कोर्ट ने भले ही तल्ख होकर केंद्र सरकार को कहा कि वह अगर दुनिया के सबसे प्राचीनतम धंधा यानी वेश्यवृति को नहीं रोक सकती तो क्यों नहीं उसे कानूनी मान्यता दे देती है। वैध हो जाने के बाद कमसेकम उनकी हालत तो सुधर जाएगी। अभी तो सरकार ना ही इस पर रोक लगा पा रही है, ना निगरानी रख पा रही है और ना उनके लिए कोई पुनर्वास की योजना है। अदालत खीझ में है..इसलिए संवेदनशील नस पर हाथ रख दिया। सरकार चुप है। ना हां कहते बनेगा ना ना। अदालत ने एक आंदोलन को हवा दे दी...जो सेक्सवर्करो का संगठन कबसे चला रहा है। वे चाहते ही है कि इस धंधे को कानूनी मान्यता मिल जाए, पश्चिम के कुछ देशो की तरह उन्हें भी इसका लाइसेंस मिल जाए..फिर उनकी मुशिकलें थोड़ी आसान हो जाएगीं। अभी तो सरकार उनके विकास के लिए कोई कदम नहीं उठा पा रही है। कुछ भी करना उनके अस्तित्व को सरकारी रुप से स्वीकार करना है। सरकार यह जोखिम नहीं उठाना चाहती। जवाब देना आसान नहीं। हो सकता है केंद्र सरकार राज्य सरकार पर इसकी जिम्मेदारी डाले और अपना पल्ला झाड़ ले।

सच्चाई से कब तक आंखें मूंदेगे। कौन नहीं जानता कि यह धंधा किसकी मिलीभगत से चलता है। पुलिस और स्थानीय प्रशासन का क्या रोल है, किससे छुपा है। राजनेता कैसे इनके वोट से जीत कर आते हैं। अदालत के इस रवैये से सेक्सवर्करो के आंदोलन को थोड़ा बल मिला होगा। लेकिन उनकी राहे इतनी आसान नहीं। हमारे देश में छुपा कर किया गया कोई भी काम पाप नहीं..अनैतिक नहीं..खुले में किए तो घोर पाप..संस्कृति खतरे में..इसके ठेकेदार छाती पीटने लगेंगे.. कहेंगे,,,हाय हाय...ये आप कैसा भारत बनाना चाहते हैं..जब तक हम जिंदा हैं ये नहीं होने देंगे। सरकार इन्हीं ठेकेदारो से तो घबराती है।

अगर आपने इस विषय पर लिखा तब भी नैतिकतावादियों को यह बात रास नहीं आती। इनमें कुछ वे लोग भी शामिल हैं जो एसे कोठे आबाद करते हैं या जिनके दम पर ये गलियां रोशन होती हैं। जिनकी ना जानें कितनी औलादें(नाजायज नहीं) गलियों में फिरती हैं...। इन पर या एसे विषयो पर लिखना आपको उनके कठघरे में खड़ा कर देता है...या व नहीं तो उन जैसे जरुर थोड़े थोड़ मान लिए जाते हैं..खासकर एक स्त्री लेखिका..यह हमारी भाषाई मानसिकता की देन है। मगर जो डट कर लिख रही हैं वे अपने लिखने को लेकर कतई क्षमाप्रार्थी नहीं हैं जैसे सोनागाछी की सेक्सवर्कर..जिन्हें अपने धंधे पर कतई शरम नहीं है. वे शान से बताती हैं, अपने काम के बारे में..। वे श्रमिक का दर्जा पाना चाहती है।

खरीदार कभी समझ भी नहीं सकते एसी औरतो को। बेहतर हो खरीदारो को भी कोठे पर जाने के लिए परमिट लेना पड़े..जैसे गुजरात में शराब पीने के लिए परमिट लेना पड़ता है और दूकान के बाहर शराबी का नाम, बाप का नाम और पता लिखा होता है। खरीदार जब तक मौजूद हैं तब तक यह धंधा चलता रहेगा। मांग और पूर्ति का सीधा संबंध है यहां।

अभी सरकार लाइसेंस देने के बारे में बयान भी देगी तो तूफान उठ खड़ा होगा...तूफान वही उठाएंगे जो चोरी छिपे उन गलियों में फेरा लगाते हैं। अगर सेक्स बेचना अनैतिक है तो खरीदना उससे बड़ा अपराध..फिर सीना ठोक कर खरीदार क्यों नहीं खड़ा होता कि हां..हमने खरीदा या हम हैं खरीदार...पकड़े जाने पर चेहरे पर मफलर लपेट कर कैसे बच निकलते हैं...टीवी पर दिख जाते हैं। उनमें आंखें मिलाने का साहस नहीं...साहस है श्रमिक में। जो श्रम बेच रहा है बाजार में। काल गर्ल की बात छोड़ दें तो आप किसी भी सेक्स वर्कर से बात करें...उनमें अपने काम को लोकर कोई शरम नहीं..क्योंकि जिंदगी इस शरम से बहुत आगे की चीज है।

11 दिसम्बर 2009

विश्व का सबसे पुराना पेशा !!

जनसत्ता में एक छोटी सी खबर आई है। खबर महत्वपर्ण है। जेरे बहस है। उम्मीद है ब्लाग दुनिया इसपर कोई बहस चला सकेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केन्द्र से कहा कि दंडात्मक कार्रवाई से विश्व के सबसे पुराने पेशे पर पाबंदी लगाना अगर व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं हो तो क्या वह वेश्यावृत्ति को वैध बना सकता है। न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी और न्यायमूर्ति ए के पटनायक की पीठ ने सालीसीटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम से कहा-जब आप कहते हैं कि यह विश्व का सबसे पुराना पेशा है और जब आप कानून से उसपर पाबंदी लगाने में सक्षम नहीं हैं तो आप उसे वैध क्यों नहीं बना देते।

शीर्ष अदालत ने कहा कि महिलाओं की तस्करी को रोकने के लिए यौन व्यापार को वैध बनाना एक बेहतर विकल्प होगा। उसने कहा कि दुनिया में कहीं भी दंडात्मक उपायों से उसपर पाबंदी नहीं लगाई जा सकी। न्यायालय ने कहा कि यौन व्यापार किसी न किसी रूप में चल रहा है। दुनिया में कहीं भी वे कानून से उसपर अंकुश लगाने मे सक्षम नही हो सके हैं। कुछ मामलों में इसका संचालन छद्म रूप से हो रहा है।

9 दिसम्बर 2009

पढ़िए गीता

आज रघुवीर सहाय का जन्मदिन  है। उनको श्रद्धांजली देते हुए प्रस्तुत है उनकी बहुचर्चित कविता।

पढ़िए गीता
बनिए सीता
फिर इन सबमें लगा पलीता
किसी मूर्ख की  हो परिणीता
निज घरबार बसाइए।

होंय कँटीली
आँखे गीली
लकड़ी सीली,तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइए।

4 दिसम्बर 2009

अब आपका भाग्य बांचेगा बीएचयू, कुंडली तो लाइए

शैक्षणिक संस्थान ने आम लोगों के भविष्य बाचने की ओर ध्यान केंद्रित किया है। अब कोई भी तकाकथित ज्योतिषि आपको छल नहीं सकेगा क्योंकि भाग्य बाचने की दिशा में काशी हिंदू विश्वविद्यालय भी सीधे उतरने वाला है। इसके लिए परिसर स्थित संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय ज्योतिष परामर्श केंद्र बनाने की तैयारी में जुटा हुआ है। संकाय प्रमुख प्रो. आरसी पंडा कहते हैं कि जनवरी माह तक परामर्श केंद्र का गठन कर लिया जाएगा। संकाय में वैदिक, ज्योतिष आदि की शिक्षा दी जाती है लिहाजा इसका लाभ सीधे आम जनता को मिले इसी उद्देश्य से इस केंद्र का प्रस्ताव है। भाग्य बाचने के दायित्व का निर्वहन करेंगे संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय के विद्वान। लोग भाग्य के प्रति उत्सुक रहते हैं और वैदिक विद्या में भाग्य बाचने की व्यवस्था है। कुंडली का सटीक वाचन तो कोई योग्य ही कर सकता है क्योकि ज्योतिष तो पूरी तरह से विज्ञान ही है। इस विज्ञान की पूरी जानकारी नहीं होने की दशा में तथाकथित ज्योतिषि से आम लोग सिर्फ छले जाते हैं।

प्रो. पंडा कहते हैं कि अब लोग छले न जाएं और उन्हें हर तरह की संभावनाएं व आशंकाएं कुंडली के आधार पर बताने की ललक है। इसके लिए लोगों को अपनी कुंडली लानी पड़ेगी ताकि ग्रहों, तिथियों आदि की सटीक जानकारी हो सके। ज्योतिष में स्वास्थ्य, मौसम, पर्यावरण, जल आदि के आकलन का गूढ़तत्व समाहित हैं। विज्ञान व विकास की धारा के साथ ही भारत की इस प्राचीन विद्या के प्रति लोगों की उत्सुकता बढ़ रही है। प्रो. पंडा कहते हैं कि यह भारत में अपनी तरह का पहला केंद्र होगा। बताते हैं कि लोगों के रिस्पांस के आधार पर इसमें संसाधनों व सुविधाओं की व्यवस्था की जाएगी। यह भी जोड़ते हैं कि इससे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के साथ ही संकाय की प्रासंगिकता भी बढ़ेगी और इसकी महत्ता व गुणों का लाभ भी लोगों को मिल सकेगा।

 दैनिक जागरण वाराणसी संस्करण से साभार

2 दिसम्बर 2009

गाँधी और गांधीवाद

निशांत कौशिक
नहीं ये बिल्कुल भी सही जगह नहीं है, जब मैं गाँधी जी के जन्म से लेकर, नाथूराम गोडसे तक की मुलाक़ात का सचित्र वर्णन कराऊं। २ अक्टूबर ही नहीं १९४७ के बाद हर पल हर दिन गाँधी जी का दिया हुआ है, सो थोड़ा सा याद करना आवश्यक है. चूँकि १९४७ की आज़ादी में मुख्य हस्तक्षेप गाँधी जी का था, तो स्वाभाविक सी बात है कि आजादी का मुख्य कारण गाँधी जी ही बने, और जब हिस्से में आए देश की यथास्थिति का भी वर्णन करें तो गाँधी जी को भी याद करना वाजिब है।

वास्तव में गाँधी और गांधीवाद, गाँधी जी के जन्म से ही एक दूसरे से गुत्थमगुत्था होते रहे, और तमाम अनुभवों के बाद अंततः गाँधी जी द्वारा ये घोषणा कर दी गई, कि सात्विक, मर्यादित,अहिंसक और शुद्ध विचारधारा ही मेरे पूर्ण दृष्टिकोण का परिणाम है। गांधीवाद में गाँधी जी के समकालीन भारत में तमाम परिवेश, विधान, विचार मौजूद थे, और इन सब की गांधीवाद में मौजूदगी मुख्यतः नज़र आती है, गांधीवाद से सहमति का आधार भी यही रहा कि उन सात्विक परिवेशों,परिधानों और विचारों का भारत में तिलिस्म छाया रहा, और गाँधी जी के अव्वल चरित्र में ये सारे तिलिस्म ही मौजूद थे, अतः भारत वासियों ने गांधीवाद की जी भर कर प्रशंसा की।

चूँकि भगत सिंह ईश्वर,धर्म,जातिवाद,पूंजीवाद, सामंतवाद आदि के घुर विरोधी थे, इस वजह से गाँधी जी ने भगत को कभी उत्तेजना से भरा हुआ जवान खून कहकर टाल दिया।  भगत सिंह की विचारधारा आज़ादी के बाद निश्चित तौर पर उभरने वाली राष्ट्रीय संकीर्णता जो कि आज हर क्षेत्र में है ही, के ख़िलाफ़ थी। हमारे साथ बड़ी समस्या है कि हमने अपनी शैशव पीढी को आज़ादी संग्राम में हिस्सा लेने वाले हर व्यक्ति को "स्वतंत्रता संग्रामी" इन दो शब्दों के साथ बाँध दिया। ये बुनियाद यदि स्कूलों में बचपन से डाली जाए कि भगत सिंह के राष्ट्र स्वतंत्रता के विचार अलग थे तथा गाँधी के अलग। इन में से कौन सही था, कौन ग़लत या दोनों सही थे, दोनों ग़लत के बीच बच्चे ख़ुद अन्तर करेंगे।

भगत सिंह के साथ रहते हुए भी मैं बिल्कुल नहीं कह सकता की गांधीवाद से मैं पूर्ण रूप से असहमत हूँ, मैं बस असहमत इस बात पर हूँ कि सत्य-असत्य सिर्फ़ धार्मिक या सात्विकवादी विचारों से निश्चित किए जा रहे हैं। तो निश्चित ही हिंदू,मुसलमान और सभी धर्मों के अनुसार वे ईश्वर के बारे में तो एकमत होंगे मगर कर्मकांडों मे हर धर्म सत्य-असत्य की अलग व्याख्या करेगा। गाँधी जी की वैचारिक रुपरेखा में यही समस्या रही है कि सत्य-असत्य की व्याख्या के लिए वे उस युक्ति की सहायता लेते हैं जो कि अन्य युक्तिओं से कम से कम वैचारिक मतभेद रखती है। अपनी आसानी के लिए हम इसे धर्म भी कहते हैं।

जहाँ गांधीजी गीतावादी थे, चातुर्वर्ण व्यवस्था तथा हरिजन रूपांतरण के सहयोगी। यहाँ भगत सिंह सत्य-असत्य की व्याख्या परिस्थिति के अनुसार निश्चित करते थे, और चातुर्वर्ण व्यवस्था के सख्त ख़िलाफ़। इस मुश्किल दौर में भी यदि गाँधी जी की पुस्तक " सत्य के प्रयोग " पढ़ी जाए तो सभी कुछ क्रमवार समझ आवेगा, और भगत सिंह के समस्त लेखों को पढ़कर, वैचारिकता का प्रतिशत कहाँ घटता है कहाँ बढ़ता यह भी समझ में आ जाएगा। "सुदामा प्रसाद पाण्डेय" धूमिल के चंद शब्दों के बड़े बिम्ब के साथ लेख समाप्त करता हूँ।

"हर तरफ धुआं है
हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है
अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-
तटस्थता। यहां
कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिए, सबसे भद्दी
गाली है
हर तरफ कुआं है
हर तरफ खाईं है
यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है"

- यह लेख निशांत के ब्लाग ताहम पर पूर्वप्रकाशित हो चुका है।