महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938)
कुछ लोगों का खयाल है कि बोल-चाल की हिन्दी में कविता का जन्म हुए अभी बीस ही पच्चीस वर्ष हुए। पर खोज से इस भाषा की कविता के ऐसे कई नमूने मिले हैं जो बहुत पुराने हैं। यदि इस तरह की कविता का जन्म पच्चीस ही तीस वर्ष पहले हुआ माना जाय तो भी सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि आज से कोई पन्द्रह वर्ष पूर्व इसके दो ही चार नमूने निकले थे। बस, कुछ ही नमूने निकल कर बन्द हो गये थे, इस तरह की कविता का प्रचार नहीं हुआ था। परन्तु जब से सरस्वती ने बोल-चाल की भाषा में की गयी कविता को आश्रय दिया तब से इसका प्रचार बढ़ने लगा। पन्द्रह वर्ष पहले शायद ही कभी किसी अखबार या मासिक पुस्तक में ऐसी कविता निकलती रही हो। पर अब आप किसी भी अखबार या सामयिक पुस्तक को उठा लीजिए, प्रायः सर्वत्र ही आप को बोल-चाल की भाषा में कविता मिलेगी। ब्रज-भाषा में लिखी हुई कविता बहुत कम देखने को मिलेगी। इससे सिद्ध है कि समय-जमाना ऐसी ही कविता मांगता है। हां, जो अब भी ब्रज-भाषा में पद्य रचना करते हैं उन्हें वैसा करने को कोई रोक भी नहीं सकता। पर ब्रज-भाषा की कविता के महत्व के गीत अलापने का समय गया। अब वह फिर नहीं आने का। ब्रज- की बोली में कविता करने या उस बोली के न जानने वाले चाहे लंगूर बनाये जायें, चाहे गीदड़- इससे बोल-चाल की भाषा की कविता का प्रवाह बंद न होगा। बोलचाल की भाषा को खड़ी बोली कह कर उसके पुरस्कर्ताओं की निन्दा और उपहास करने से ब्रजभाषा को गौर नहीं बढ़ सकता।
एक बात और भी है। ब्रज भाषा के मीठे मीठे शब्दों के समुदाय और दो दो तीन तीन पृष्ठों तक व्यापक विशेषणावली से पूर्ण पद्य-रचना का नाम कविता हो भी नहीं सकता। ब्रज-भष की पुरानी कविता की लति पदावली में मनोहर भाव भी पाये जाते हैं। इसी से उसका अब भी आदर है। परन्तु इस भाषा या बोली की नई कविताओं या पद्यों में अच्छे भावों की बहुत कमी रहती है। कहीं-कहीं तो उनका अभाव ही दिखाई देता है। इस दशा में ऐसी कविता के प्रशंसकों का स्तुति-पाठ निष्फल हुए बिना नहीं रहा सकता। जिसमें कोई गुण नहीं अथवा जो समयानुकूल नहीं, उसकी चाहे जितनी प्रशंसा की जाय,कुछ लाभ न होगा। रोज देखते हैं, नई नई पुस्तकें और मासिक पुस्तकें निकलती हैं। उनकी अच्छी से अच्छी समालोचनायें निकलवाई जाती हैं और बार-बार निकलवाई जाती हैं, पर उद्देश्य-सिद्ध बहुत ही कम होती हैं। इसका कारण स्पष्ट ही है। बात यह है कि- गुणैहि सर्वत्र पदं निधीयते
कुछ लोग अकारण ही बोल-चाल की कविता की निन्दा किया करते हैं। नहीं मालूम उन्होंने कविता का क्या अर्थ समझ रखा है। क्या कोमल-कान्त-पदावली ही का नाम कविता है ? क्या जिस पद्य में कोई अच्छा भाव नहीं, सिर्फ लच्छेदार मीठे मीठे शब्दों की भरमार है, वही कविता है ? इन निन्दकों में कुछ कवि भी हैं। पर उनकी कविता इतनी नीरस,इतनी व्याकरण-विरुद्ध और इतनी भाव-शून्य होती है कि देख कर दुःख होता है और अहम्मन्यता पर दया आती है। कविता यदि सरस और भावमयी है तो उनका अवश्य ही आदर होगा- भाषा उसकी चाहे ब्रज की हो,चाहे उर्दू। यदि वे गुण उसमें नहीं तो औरों की हजार निन्दा करने पर भी उनकी पद्य-रचना को लोग बहुत ही कम पसन्द करेंगे। अतएव बोलचाल की हिन्दी में कविता करने वालों को इस तरह की निन्दावाद की कुछ भी परवाह न करके गुणवती कविता लिखने में चुपचाप लगे रहना चाहिए।
(अप्रैल,1914)
(अप्रैल,1914)
अच्छी पोस्ट लिखी है।आभार।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सही बात समय की पुकार भी यही है
प्रत्युत्तर देंहटाएंye khasi dilchasppost hai. lekin abhi bhi kai zid barkarar rahti hainkikavita kovaisi hihonachahiyejaisi tab thiadikal men
प्रत्युत्तर देंहटाएंअरे इसे यहां लगा के अच्छा किया भाई…
प्रत्युत्तर देंहटाएंमुझे तो लगता है कि जो कहना हो उसे कहने के लिये जैसी भाषा सही हो उपयोग की जानी चाहिये बस्…
मै सबद पर लगी खरे साहब की कविता पर आपकी प्रतिक्रिया देखना चाह रहा था।
चलिये नये मुल्लाओं की हिम्मत बढ़ी।
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छी पोस्ट.
प्रत्युत्तर देंहटाएंअशोक जी, आप तो जानते हैं कि दो समांतर रेखाएं सदैव साथ चलती हैं लेकिन कभी एक दूसरे से मिलती नहीं। यही हाल दो विश्वदृष्टियों के बारे में कही जा सकती है। बार-बार असहमतियां दर्ज कराना भी गैर-जरूरी लगता है। हां, कभी फुर्सत और जरूरत का संयोग हुआ तो विष्णु खरे एवं उनके मुरीद नवोदित नवाकुंरों की प्रकृति और प्रवृत्ति की सैद्धांतिकी का विस्तृत विश्लेषण कर लिया जाएगा।
प्रत्युत्तर देंहटाएंजी
प्रत्युत्तर देंहटाएं:-)
वैसे मुझे यह कविता अच्छी लगी थी हालांकि मैने इसे अलग तरह से देखा।
कविता तो मजेदार है। वीभत्स-रस को इतनी सफलता से उकेरने के लिए कवि बधाई का पात्र है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुन्दर पोस्ट
प्रत्युत्तर देंहटाएंआभार...........