3 मार्च 2010

धर्म और फलसफा

थामस मान
मुझे चाहे संक्षेप में या फिर ज्यादा विस्तारित स्वरूप में अपने फलसफे अथवा विचारों, या फिर कहें दृष्टिकोण या और बेहतर, जीवन और जगत के बारे में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना काफी मुश्किल जान पड़ता है। तस्वीरों और धुनों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया की ओर मेरे रवैये व अस्तित्वगत समस्याओं को अभिव्यक्त करने की आदत निरपेक्ष प्रदर्शन के उपयुक्त नहीं है। आज जब मुझसे बोलने को कहा जा रहा है, तो ऐसा लग रहा है कि मैं फाॅउस्ट हूं जिससे ग्रेशेन उसकी धार्मिक आस्था पर सवाल खड़े कर रहा हो।

भले ही आपकी नीयत मुझे सवालों के घेरे में खड़ा करने की न हो, लेकिन व्यवहार में आप दरअसल ऐसा ही कर रहे हैं। सही बात यह है कि मुझे यह बताने में ज्यादा आसानी होगी कि मैं धर्म के बारे में क्या महसूस करता हूं, बजाय इसके कि मेरा फलसफा क्या है। हालांकि मैं आध्यात्मिक मामलों में कोई भी सैद्धांतिक दावा नहीं करता हूं। लोग जिस आसानी से अपने होठों पर ईश्वर का नाम ले आते हैं, या फिर अपनी कलम से उसे लिख देते हैं, वह मुझे हमेशा काफी अचंभित करता है। मेरे मामले में धार्मिक चीजों के संदर्भ एक निश्चित किस्म की नरमी या कहें संकोच का भाव मुझे घेरे रहता है, न कि कोई आत्मविश्वास जैसी चीज। ऐसा लगता है कि इस विषय तक पहुंचने के लिए हमें कोई एक दिशा नहीं पकड़नी होगीः बल्कि जैसे किसी छोटे से काव्यात्मक मुहावरे से, एक नैतिक प्रतीक के माध्यम से, अगर मैं ठीक-ठीक कह पा रहा हूं तो- जहां यह विचार धर्मनिरपेक्ष हो जाता हो, जहां कुछ देर के लिए ही सही इसके ऊपर से पादरी का लबादा उतर जाए और जहां सिर्फ इंसानी आध्यात्मिकता का संतोषजनक प्रत्यय बचा रह जाए।

एक जानकार मित्र के लेखन के माध्यम से मुझे काफी बाद में लातिन शब्द रेलीजियो के उद्गम और इतिहास के बारे में पता चला। जिस क्रिया रेलेगेयर या रेलीगेयर से यह बना माना जाता है, उसका मूल अर्थ ध्यान रखना, ध्यान देना, खुद के बारे में सोचना है। नेगलेगेयर (उपेक्षा) के विपरीत इसका अर्थ एक ध्यान रखने वाला, सतर्क, सावधान, सरोकारी और सचेतन रवैया है- जैसा कि मैंने कहा, उपेक्षा और लापरवाही का उलटा। ऐसा लगता है कि रेलीजियो ने समूचे लातिन दौर काल में अपने भीतर इस सचेतनता के भाव को समाहित रखा है। पुराने लातिन साहित्य में धर्म या ईश्वरीय मसलों के सीधे संदर्भ के बगैर भी इसका प्रयोग हुआ है।

यह सब सुन कर मुझे खुशी हुई। तो मैंने खुद से कहा, कि अगर धार्मिक होना यही होता है, तो प्रत्येक कलाकार महज एक कलाकार होने के नाते ही खुद को धार्मिक पुरुष कहने का उपक्रम कर सकता है। क्योंकि आखिर एक कलाकार की प्रकृति के सबसे ज्यादा उलट लापरवाही और उपेक्षा के अलावा और क्या चीजें होंगी? उसके नैतिक स्तर का सबसे बड़ा लक्षण, उसके भीतर निहित सबसे बड़ा तत्व सावधानी, सतर्कता, सरोकार, सचेतनता आदि के अलावा और क्या हो सकता है- या कुल मिला कर कहें देखभाल! एक कलाकार सबसे सतर्क इंसान होता है बल्कि उससे भी ज्यादा इस मामले में श्रेष्ठ होता है; बौद्धिक तो यह व्यक्ति होता ही है, और जीवन व मस्तिष्क के बीच एक सेतु बनाने में अपनी मेधा का इस्तेमाल कर वह दिखाता है कि वह कुछ हट कर है- क्या हम उसे एक विशिष्ट किस्म का पेशेवर सनकी कह सकते हैं? हां, ऐसे व्यक्ति का सबसे प्रभावकारी तत्व सतर्कता ही होती हैः सार्वभौमिक सत्ता की इच्छा और गतिविधियों पर जबरदस्त और संवेदनशील निगाह; ताकि सच्चाई का बाना पहन सके; न्यायपूर्ण और आवश्यक चीजों की ओर मुड़ सके, दूसरे शब्दों में ईश्वर की सदिच्छा के अनुरूप, जिसकी सेवा एक विवेकवान और आध्यात्मिक व्यक्ति करता हो और ऐसा करते वक्त उस विद्वेष पर उसका ध्यान न जाता हो जो मूर्ख या डरे हुए लोगों में पैदा होता है, उन लोगों में जो अपने हितों के कारण काल के बुरे या अप्रासंगिक खंड से जुड़े होते हैं।

यानी एक कलाकार, एक कवि- न सिर्फ अपनी खुद की रचना बल्कि ईश्वर, सत्य और ईश्वरीय इच्छा के प्रति अपने सरोकार के कारण एक धार्मिक व्यक्ति होता है। तो ठीक ही है। आखिरकार, गोएथे का भी आशय यही था जब उन्होंने प्यार भरे उदात्त शब्द कहे थेः

Denkt er ewig sich ins Rechte,
Ist er ewig schön und gross.

दूसरे शब्दों में, मेरे लिए और मेरे जैसों के लिए धर्म मनुष्य के भीतर छिपी हुई एक चीज है। ऐसा नहीं है कि मेरी मानवीयता मानवता के दैवीकरण से उपजती है- शायद ही इसके लिए कम मौके आते हों! आखिर हमारे जैसी दिमागी रूप से दिवालिया प्रजाति में किसके पास इतना दिल होगा कि वह इस किस्म के आशावादी मुहावरे में फंसे, जब उसकी बातें रोजाना कटु और तीखे तथ्यों द्वारा झुठला दी जाती हों? हम रोज देखते हैं कि दस नीति निर्देशों के हिसाब से यह अपराधों में लिप्त रहता है; रोजाना हम उसके भविष्य को अंधकारमय बनाते जाते हैं; हम अच्छी तरह समझते हैं कि आखिर स्वर्ग के निर्माण के दिन से ही क्यों सारे देवताओं ने रचनाकार की इस संदिग्ध रचना में किए गए पक्षपात के कारण उसकी ओर से अपनी नाक-भौं सिकोड़ रखी है। और इसके बावजूद- पहले से कहीं ज्यादा आज मुझे लगता है कि हमें अपने मजबूत संदेह के बावजूद इंसानी नस्ल के प्रति सिर्फ निंदा और निराशा के विश्वासधात में नहीं जुड़ना चाहिए। इसके दोयम दर्जे के तमाम साक्ष्यों के बावजूद हमें इसके महान और सम्मानजनक तत्वों को नहीं भूलना चाहिए, जो कि कला, विज्ञान, सत्य की खोज, सौंदर्य के निर्माण, न्याय की अवधारणा में परिलक्षित होते हैं। हां, यह सही है कि जब हम ‘‘मनुष्य’’ और ‘‘मानवता’’ जैसे शब्द बुदबुदाते हैं और खुद की ओर से उस महान रहस्य के प्रति उपेक्षा बरतते हैं, तो हमारी आध्यात्मिक मृत्यु हो जाती है।

आध्यात्मिक मृत्यु। यह शब्द खतरनाक ढंग से धार्मिक प्रतीत होता हैः इसका गांभीर्य मारक है। और वास्तव में मनुष्य के बारे में सारे सवाल और उसके बारे में हमारी सारी सोच आज जीवन और मरण जैसी गंभीरता लिए हुए हमारे समक्ष उपस्थित है जो आज तक अज्ञात है, एक ऐसे कालखंड में जो हमारे जितना कटु नहीं। सभी के लिए, लेकिन विशेष तौर पर एक कलाकार के लिए यह मसला आध्यात्मिक जीवन और आध्यात्मिक मृत्यु का है; धार्मिक शब्दावली में कहें तो यह दरअसल मुक्ति का सवाल है। मैं मानता हूं कि जो लेखक रहस्यवादी चीजों का सामना न कर उनके साथ विश्वासघात करता है और इंसानी समस्याओं को आज के संदर्भ में राजनीतिक रूप में देखता है, वह एक भटका हुआ व्यक्ति है। उसका पतन अपरिहार्य है। और न सिर्फ उसके काम पर असर पड़ेगा, उसकी प्रतिभा में गिरावट आएगी, जब तक कि वह अपनी पैदा की हुई किसी भी रचना को जीवन दे पाने में कामयाब नहीं हो जाता। इतना ही नहीं, उसकी पहली की रचना भी, जो कभी सजीव और अच्छी थी, ंवैसी नहीं रह जाएगी, उसकी आंखों के सामने वह धूल में मिल जाएगी। यह मेरे विश्वास हैं; मेरा दिमाग ऐसे ही सोचता है।


क्या मैं इंसान को एक रहस्य बताने के क्रम में कुछ ज्यादा कह गया हूं? उसका उद्गम क्या है? वह प्रकृति से उपजा है, पाशविक प्रकृति से, और ऐसा ही व्यवहार अपनों से करता है। लेकिन उसके भीतर प्रकृति खुद को साकार करती है। ऐसा लगता है कि प्रकृति ने उसे इसलिए नहीं बनाया कि वह अपने होने पर स्वामित्व कायम कर सके- यह तो काफी गहरी बात है। उसके भीतर प्रकृति आध्यात्मिक पक्ष को मुक्त करती है,वह उसके भीतर खुद पर सवाल खड़े करती है, सराहना करती है और खुद का मूल्यांकन भी, ठीक ऐसे जीव में जो एक साथ प्राकृतिक भी है और उससे उच्चतर भी। चेतनासंपन्न होने का अर्थ है सचेतन होना, अच्छे और बुरे के बारे में जानना। और इंसानी स्तर से नीचे प्रकृति इन चीजों को नहीं जानती। वह ‘निर्दोष’ है। इंसान के भीतर वह अपराधबोध से ग्रस्त हो जाती है, यह उसका पतन है। यानी इंसानी नस्ल प्राकृतिक निर्दोषता से प्रकृति का पतन है; लेकिन वह पतन नहीं बल्कि उन्नयन है, क्योंकि निर्दोषता की स्थिति से चेतनता की स्थिति उच्चतर होती है। ईसाई जिसे ‘‘ओरिजिनल सिन’ यानी मौलिक बुराई कहते हैं, वह सिर्फ चर्च की ताकत तले लोगों को दबाए रखने की पुरोहिती चाल से काफी आगे की चीज है। यह एक आध्यात्मिक जीव के रूप में इंसान में मौजूद उसकी आंतरिक कमजोरियों व गलती करने की उसकी संवेदनशीलता के प्रति सशक्त जागरूकता है, और इसके ऊपर उसके जाने की आकांक्षा का नाम है। क्या यह प्रकृति के साथ धोखा है? कतई नहीं। यह उसकी खुद की गहन इच्छा के प्रति प्रतिक्रिया है। क्योंकि उसने अपने आध्यात्मिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही मनुष्य को गढ़ा है।

ये विचार एक साथ ईसाई भी हैं और मानवीय भी; ओर इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि हम आज अपनी पश्चिमी दुनिया की संस्कृति में ईसाई लक्षणों के विश्लेषण पर जोर देकर बेहतर करेंगे। मुझे उस अर्ध-शिक्षित भीड़ के प्रति घोर विद्वेष पैदा होता है जो खुद को ‘ईसाइयत की फतह’ से आगे नहीं देख पाती। लेकिन भविष्य की मानवता को लेकर मेरा विश्वास उतना ही सशक्त है- कि नई इंसानी और सार्वभौमिक भावना जो अपने जन्म की प्रक्रिया में है, खुद को ईसाई आस्था की आध्यात्मिकता में नहीं खपा देगी, आत्मा और शरीर, जीवन और रहस्य, सत्य और ‘‘जगत’’ के ईसाई द्वैत में नही नष्ट कर देगी।

मुझे भरोसा है कि हमारी सभी इच्छाओं में सिर्फ वे जो अच्छी और सार्थक होंगी जो इस नई मानवीय भावना को जन्म देने में योगदान देंगी, उन्हीं के साये और आश्रय में इस मौजूदा नेतृत्वविहीन युग की समाप्ति के बाद समूची मानवता बसर करेगी। मुझे भरोसा है कि विश्लेषण और संश्लेषण के बाद मेरी खुद की इच्छाओं का कोई अर्थ और मूल्य तभी होगा जब वे इस आसन्न जन्म के साथ एक बोधकारी संबंध स्थापित करेंगी। वास्तव में, मैं एक नए, तीसरे मानवतावाद के जन्म में भरोसा करता हूं जो अपने पूर्वजों से रंग-रूप और बुनियादी अंतर्वस्तु में भिन्न होगा। यह इंसानियत के साथ छल नहीं करेगा, उस पर गुलाबी चश्मे से निगाह नहीं डालेगा क्योंकि इसके पास ऐसे अनुभव होंगे जिसके बारे में दूसरे नहीं जानते। उसके पास इंसान के अंधेरे, शैतानी, और यथार्थवादी ‘‘प्राकृतिक’’ पक्ष का पुष्ट ज्ञान होगा; जो उसके पराजैविक और आध्यात्मिक पक्ष के प्रति सम्मान से एकाकार होगा। यह नई मानवता सार्वभौमिक होगी- और इसकी प्रवृत्तियां एक कलाकार जैसी होंगी। यानी वह इस बात को स्वीकार करेगी कि इंसान का वास्तविक सौंदर्य और मूल्य इस बात में निहित है कि वह दो साम्राज्यों का वासी है, एक प्रकृति और दूसरा चेतना। यह स्वीकार करेगी कि इस तथ्य में किसी भी किस्म का रूमानी संघर्ष या त्रासद द्वैतवाद अंतर्निहित नहीं; बल्कि नियति और मुक्त चयन का एक परिणामकारी मिश्रण है। इसी के आधार पर मानवता के प्रति प्रेम का जन्म होगा जहां निराशावाद और आशावाद मिल कर एक-दूसरे को खारिज कर रहे होंगे।

मैं अपनी युवावस्था में ब्रह्मांड के उस निराशावादी और रूमानी विचार के प्रति काफी आकर्षित था जो जीवन और चेतना, संवेदना और उपभोग को एक-दूसरे के विपरीत खड़ा करता था, और जिससे कुछ बेहतरीन बाध्यकारी प्रभाव पैदा होते हैं- बाध्यकारी, उसके बावजूद न तो उतने वैध और न ही वास्तविक। संक्षेप में कहें तो मैं वैग्नराइट था। लेकिन यह बहुत संभव है कि अपनी उम्र पकने के क्रम में मेरा प्रेम और ध्यान ज्यादा से ज्यादा एक कहीं ज्यादा प्रसन्नचित्त और विवेकपूर्ण माॅडल पर जा टिका हैः गोएथे की वह छवि, उनके भीतर शैतानी और शहरी का वह मिश्रण, जिसके चलते वह इंसानी सभ्यता के चहेते बन गए। मेरा यह चुनाव बहुत हलके में नहीं था- एक ऐसी महागाथा का नायक जो मेरे जीवन के काम को संचालित कर रहा है- ‘‘एक ऐसा व्यक्ति जिस पर ऊपर से नैसर्गिक और गहराइयों के वरदान बरसते थे।’’

पिता जैकब ने जोसेफ को यह वरदान दिया था। यह उनकी इच्छा नहीं थी कि उसे वरदान मिले, बल्कि वह ऐसा ही था उसका एक बयान था, कि वह खुश हो सके। और मेरे लिए मानवता की के आदर्श की यह सबसे संक्षिप्त और सारगर्भित व्याख्या है। मस्तिष्क और व्यक्तित्व में जहां कहीं भी मुझे इस आदर्श का प्रतिबिंबन मिलता है- अंधेरे और प्रकाश, भाव और विवेक, आदिम और सभ्य, ज्ञान और आनंद के एकीकरण के रूप में- हम संक्षेप में उसे मनुष्य कहते हैं। वहीं मेरा दिल लगता है, वहीं मुझे रहने को एक घर मिल जाता है। मैं साफ कर दूं कि मेरा आशय रूमानियत को हलका नहीं करना है, या बर्बरता को मैं परिष्कृत नहीं करना चाहता। यह तो प्रकृति है, संस्कृति है; यह एक कलाकार के रूप में मनुष्य की प्रतिमा है, और जहां कला ज्ञान के पथ पर मनुष्य की पथ प्रदर्शक है।

मानवता के प्रति सारा प्रेम भविष्य से बंधा हुआ है; और यही बात कला प्रेम पर भी लागू होती है। कला ही आशा है... मैं यह नहीं कह रहा कि मनुष्यता के भविष्य की सारी उम्मीद उसी के कंधों पर है; बल्कि सभी मानवीय आशाओं की वह अभिव्यक्ति है, आनंदित और संतुलित मानवता की एक तस्वीर। मैं यह मानता हूं, बल्कि मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि भविष्य ऐसा आ रहा है जहां हम ऐसी तमाम कला को काले जादू, विवेकहीन और उत्तेजना का उत्पाद कह कर खरिज कर देंगे जो बौद्धिक न हो। हम उसकी उसी हद तक आलोचना करेंगे जिस हद तक वह हमारे युग में जगह पा चुकी होगी, जिस युग में हम रह रहे हैं। जाहिर तौर पर कला सिर्फ मिठास और प्रकाश का नाम नहीं है। लेकिन वह पूरी तरह अंधकारमय, अंधी और पाताल की गहराइयों जितनी शैतानी प्रजाति भी नहीं है। वह सिर्फ ‘‘जीवन’’ नहीं। भविष्य के कलाकार के पास अपनी कला का एक स्पष्ट और ज्यादा सुखद संस्करण होगा जिसे वह ‘‘श्वेत’’ जादू कह सकेगा; एक ऐसा जादू जो जीवन और चेतना के बीच एक मध्यस्थ का काम करेगा, जिसके पर समय के होंगे, जैसा कि हर्मेस ने कल्पना की थी। क्योंकि मध्यस्थता चाहे कैसी भी हो, वह खुद चेतनामय होती है।

अनुवाद - अभिषेक श्रीवास्तव 

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