महाशय ब जब लड़के थे, तब फ्रेंच की एक लिखित परीक्षा के सिलसिले में उन्हें तर्तिया जाना पडा। वहाँ पहुँचते ही परीक्षा शुरू हो गयी। उनका एक सहपाठी यही परीक्षा लातिन में दे रहा था।
उस सहपाठी ने अपनी कुछ गलतियाँ रगड़ कर साफ कीं और प्रोफेसर के पास जाकर नम्बर बढ़ाने की माँग की। लेकिन उसे अंक और भी कम कर दिए गए, क्योंकि जहाँ-जहाँ गलतियाँ रगड़ी गयी थीं,घिसट्टा पड़ने से वहाँ-वहाँ कागज छिछला पड़ गया था।
उस सहपाठी ने अपनी कुछ गलतियाँ रगड़ कर साफ कीं और प्रोफेसर के पास जाकर नम्बर बढ़ाने की माँग की। लेकिन उसे अंक और भी कम कर दिए गए, क्योंकि जहाँ-जहाँ गलतियाँ रगड़ी गयी थीं,घिसट्टा पड़ने से वहाँ-वहाँ कागज छिछला पड़ गया था।
इस तरह की कारगुजारी के नुकसान से महाशय ब खूब परिचित थे । उन्होंने लाल स्याही ली,अपनी कापी पर कई सही जगहों पर भी गलतियों के निशान बनाए,और फिर प्रोफेसर के पास जाकर बोले
यहाँ क्या गलती है ? प्रोफेसर हैरान हो गए। लाल घेरों वाली जगहों सही थीं।
'प्रोफेसर यदि गलतियों को गिनने में ऐसी चूक करते हैं,तब निश्चित रूप से मेरे नम्बर बढ़ने चाहिए' - महाशय ब ने अपनी बात आगे रखी। इस तर्क के आगे प्रोफेसर झुक गए और महाशय ब के नम्बरों मे बढ़ोत्तरी कर दी गई।
बेर्टोल्ट ब्रेख्ट
अनुवाद - मोहन थपलियाल
ऐसा ही एक वाक़या भारत के एक क़स्बे के स्कूल में हुआ.जबकि सभी यह अच्छी तरह समझ गए थे कि बौद्धों के बाद भारत में ज्ञान-विज्ञान मे कोई तरक्की हुई न आगे किसी भाँति संभावना है.सदा की तरह यहाँ सबकुछ उधार या आयातित ही रहा आएगा.ऐसे फैसले के तामीली वक्त में रामचरन को यह खब्त सवार हो गई की हिंदी में ही हर तरह का शैक्षिक अनुशासन सीखेंगे भी और आगे लगभग व्यर्थ कर दी जानेवाली शिक्षा ले रहे बच्चों को सिखाएँगे भी.जबकि वे कहीं भी फेलोशिप की अवधि गुज़ारने रिसर्च करते रहकर पैसा और वक्त बरबाद करके भी विद्वान तथा तार्किक कहला सकते थे उन्होंने क़िस्मत को लात मारकर हिंदी का झोलाछाप चप्पलधारी मास्टर होना स्वीकार कर लिया.उन्हीं के स्कूल में यह दिलचस्प वाकया हुआ.
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक लड़की जो परीक्षा में शत प्रतिशत अंक लाने के लिए ही सोती-जागती थी,हिंदी में भी पूर्णांक लाने की अभिलाषा रखती थी.एक दिन वह रामचरन की ध्यान से जाँची हुई लगभग लाल स्याही से रंगी हुई उत्तरपुस्तिका लेकर उनके टेबल के पास पहुँची.उसने पूरी समस्या को बड़े मौलिक ढंग से रखा क्योंकि उसके जानने में आ गया था कि रामचरन सर समझा बुझाकर लौटा देते हैं.बोली-सर,आपने सौ में कुल चार अंक काटे है लेकिन दिया बानवे है मिलना तो छियानवे चाहिए न?रामचरन ने सोचा कह तो सही रही है ये आठवीं के बच्चे भी कितना सोचते हैं पर उन्होंने भी जवाब दिया गौर से देखो अगर टोटल में गलती हो तो बताओ मैं ठीक कर दूँगा.लड़की ने कहा-सर टोटल तो सही है.पर नंबर तो छियानबे ही होना चाहिए.वह इतना कहकर रोने लगी.बाक़ी बच्चों ने भी उसकी बात को सही ठहराया.पूरा प्रसंग इतना भावुक हो गया कि रामचरन को समझना मुश्किल हो गया चूक कहाँ हो गई.पर बिना संतुष्ट हुए नंबर बढ़ा देना उन्होंने स्वीकार नहीं किया.उसी वक्त परीक्षा विभाग से ज़रूरी बुलावा आ गया तो वे चले गए.प्रकरण कल तक के लिए टल गया.
पर बात रामचरन के दिमाग़ से निकल नहीं रही थी.इधर ऐसे वाक़ये भी हो रहे थे कि कुछ नंबर कम हो जाने से छोटे-छोटे बच्चे आत्महत्या कर रहे थे.यह सोचकर ही उनकी आँख भर आई कम नंबर के बगल में एक मासूम बच्चे की लाश पड़ी हुई है.उन्होंने पानी पिया,सिर धोया और लड़की की उत्तरपुस्तिका लेकर बैठ गए.जब मन एकाग्र हुआ तो उनके दिमाग़ में एक बात कौंधी और उन्हें हँसी आ गयी.ऐसा भी तो हो सकता है लड़की चार नंबर का प्रश्न हल करना भूल गई हो.उन्होने ध्यान से देखा तो यही हुआ था.अगले दिन कक्षा में उन्होंने लड़की को यह बात समझाई.पूरी कक्षा की सहमति ली.सब संतुष्ट हो गए.जैसे ही पूरे जोश के साथ कक्षा में सामूहिक यस सर गूँजा उनकी भावुक आँखें फिर भर आईं.उन्होंने सोचा कोई काम छोटा नहीं कालेज में प्रोफ़ेसर बनकर गलत विद्यार्थियों को प्रमोट करते रहने से अच्छी है ये साढ़े तीन हज़ार की मास्टरी.एक अध्यापक के गलत मूल्याँकन से पूरी सभ्यता बीमार हो जाती है उनके दिल में अपने प्रिय किंतु ज़माने भर में बदनाम दार्शनिक की बात गूँजी.उन्होंने मन में अपना संकल्प दोहराया और पढ़ाने में जुट गए.
शशि साहब की पोस्ट ने अधिक प्रभावित किया हालाँकि में ब्रेख्त के दीवानों में से एक हूँ.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत बढ़िया पोस्ट और शशि जी की टिप्पणी भी
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रणव सक्सैना
amitraghat.blogspot.com
पोस्ट सुंदर .......
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