25 मार्च 2010

एक ऐसी प्रजाति जिसने अपनी संततियों का सारा हिस्सा खा लिया !

देवेन्द्र
आदमी का इतिहास जब कभी सही ढ़ग से लिखा जायेगा तो चाहे उसमें चक्रवर्ती सम्राटों और उनकी लड़ाइयों का जिक्र न हो, गौरैया का जिक्र जरूर होगा! बगैर गौरैया, आदमी और उसकी कलाएं, कल्पनाएं, सुख-दुख के किस्से, उसके संगीत, उसकी प्रेम कहानियों के बारे में कुछ जान पाना संभव नही होगा। गौरैया की नन्ही आँखों में एक दिन जरूर लिखा और पढ़ा जायेगा सभ्यता का क्रूर इतिहास।

यह कोई पुरानी बात नही है। अभी कल तक गाँव के हमारे घरों में, हमारे बीच गौरैयों के झुण्ड रहा करते थे। बैलों के हरे चारे और सूखे पुवाल की गन्ध में चहचहांती, उड़ती-फ़ुदकती गौरैया सुबह-सबेरे सूरज की किरणों से पहले ही चली आती थीं। काम से फ़ुर्सत पाकर माँ जब कभी देहरी पर बैठतीं, गिलहरी और गौरैयों का झुण्ड उन्हे घेर लेता था। हमारे चारों तरफ़ बिखरे अन्न के दानों पर ही वो पलती थीं।

 माँ को विश्वास था कि हमारे अनाम पुरखे गौरैयों की शक्ल में हमें देखने-सुनने आते हैं। कैंसर से असहनीय दर्द से तड़पती-छटपटाती मेरी माँ का चेहरा गौरैया की तरह हो गया था। अन्न के दानों को अपनी नन्ही चोंच में दबाये वे अपने घोसलों में जाती थीं, जहाँ उनके बच्चे चीं...चीं..करते बेसब्री से उनकी प्रतीक्षा करते थे। एक आत्मीय उल्लास का मोहक संगीत हर समय हमारे चारो तरफ़ बजता रहता था। वे हमारे अभावों और संपन्नता के दिन थे। इन्ही चिड़ियों के पंख लेकर माँ के किस्सों और हमारे सपनों में परिया आती थीं। देखा जाए तो हमारा बचपन इन्ही के बीच पला और विकसित हुआ है।

विज्ञान ने प्रकृति के सारे रहस्यों को खोलकर आदमीं को सौप दिया है, दर्प और हठधर्मिता के आंकठ मे डूबी आज की सभ्यता मनुष्य को खतरनाक रास्तों की ओर ले जा रही है। वर्तमान हमेशा सफ़ल और शक्तिशाली लोगों का होता है। इतिहास सार्थक लोगों का। अगर स्वयं द्वारा किया गया मूल्यांकन ही अन्तिम सच होता तो सटोरियों और गिरहकटों को भी गलत साबित कर पाना ना-मुमकिन होगा।

प्रकृति के सारे संतुलन केन्द्रों को रात-दिन लगातार क्षति-ग्रस्त करते हुए चाहे हम खुद को कितना भी श्रेष्ठ कह लें, लेकिन यह तय है, कि हमारे विकास का वर्तमान ढ़ाचा क्षण-प्रतिक्षण मनुष्यता की बची-खुची संभावनाओं को लीलता जा रहा है। मशीनें मनुष्य को विस्थापित कर रहीं है। तकनीक और बाजार के संयुक्त दुश्चक्र में मनुष्य के भीतर से मनुष्यता का विस्थापन भयावह रूप से जारी है। हमने गौरैया के घोसले उजाड़ डाले है। नोच डाले गये उनके मुलायम पंख, जो हमें गर्मी की दुपहरी में अपने ठण्डे स्पर्श से सहलाते थे।

न्यूयार्क और वाशिंगटन की तर्ज पर जगह-जगह उगने वाले कंक्रीट के जंगलों में हमारी सभ्यता का भयावह कब्रगाह तैयार हो रहा है। मृत्यु लेख पर अनिवार्य रूप से दर्ज किया जा चुका है- “एक ऐसी प्रजाति, जिसने अपनी संततियों का सारा हिस्सा खाने के बाद अपनी भूख से तड़प कर सामूहिक आत्महत्या कर ली थी” जीवन के स्रोत सूखते जाएं और जीवन लहलहाता रहेगा- इस पागल कल्पना की गुंजाइस बहुत दूर तक नही रहेगी।

 प्रकृति के रहस्यों को जान कर उसे बाजार में बेंचना और मुनाफ़ा कमाना सभ्यता है? या वह बोध कि, प्रकृति के असीमित संसाधनों पर अंतत: हमारा अधिकार सीमित ही है? यह तय करना बेहद जरूरी है, कि तकनीकी दक्षता हासिल कर चुका कोई समाज मृत्यु की हद तक गैर जिम्मेदार रहकर सभ्यता और विकास का मानक बनेंगा? या वह प्रकृति पर अपनी निर्भरता को पहचानते हुए, अपनी सीमिति क्षमता और अदम्य जिजीविषा के बल पर उसे बनाये और बचाये रखने के लिए अन्तिम दम तक कृत संकल्प है।

शिक्षा और विज्ञान अगर आज बाजार की दासता स्वीकार कर चुके हैं, तो चाहे जैसे भी संभव हो, सभ्यता और विकास के वास्तविक मूलभूत अर्थों को थोड़े समय के लिए इससे अपने को बचाते हुए बाजार से लड़ना होगा। यह अनायास ही नही है, कि मानव रोधी तमाम बुराइयों और अपराधों का उत्सव तथाकथित शिक्षित, सक्षम, सभ्य और सम्पन्न लोगों के भीतर है। बौद्धिक समुदाय निर्लज्ज और खतरनाक हद तक इन्हे समर्थन दे रहा है।

यह अनायास ही नही है, कि सभ्यता और विकास के नाम पर कुछ लोग जंगलों पर आधिपत्य के लिए उतावले हैं, ताकि बाजार में उनकी कीमत लग सके। वहीं कुछ अशिक्षित, अर्ध-शिक्षित गुमराह और व्यवस्था विरोधी नक्सलाइट किस्म के लोग उन्ही जंगलों और जलाशयों को बचाने के लिए रोज-रोज अपने प्राण गवां रहे हैं।

वे लोग जो अपनी कुल आमदनी का चौथाई बजट दुनिया के बाजारों से हथियार खरीदने में खर्च करते है, वही उन्हे हिंसक बताते हुए अहिंसा का पाठ पढ़ा रहे हैं, बाजार की नजरों में वे खतरनाक किस्म के लोग है। जिन्होंने गौरैया की तरह संचय और जरूरत से ज्यादा संग्रह को वृत्ति को नही अपनाया है। वे जानते हैं कि जरूरत भर की सूखी लकड़ियों के लिए दूर-दूर तक फ़ैले जंगल का हरा भरा होना जरूरी है। शायद इसीलिए सभ्यता और बाजार की नजरों में वे जंगली और बर्बर हैं।

सभ्यताओं के संघर्ष के नाम पर होने वाले सेमिनारों के सारे बौद्धिक विमर्शों में उनकी दिलचस्पी इसलिए नही हैं, क्योंकि वे खुद सभ्यताओं के शिकार हैं। वे जानते हैं, कि आज देश और राजनीति की मुख्य धारा कुछ सटोरियों, विश्व बैंक के पालतू अर्थशास्त्रीयों और माफ़ियों से होकर बाजार के मल मूत्र में लिथड़ी पड़ी है।

 वे इसलिए भी असभ्य, विकास विरोधी और खतरनाक है, कि जनतांत्रिक सरकारों के क्रूर दमन की वैधानिक शक्ति को ठेंगा दिखाते हुए परमाणु युग के दौर में अपने परंपरागत हथियारों और विश्वासों के साथ जंगलों, नदियों, और चिड़ियों को बचाने के लिए कृत संकल्प है। बाजार और मुनाफ़े में उनकी कोई दिलचस्पी नही। वे जानते है, कि विश्वग्राम की मुड़ेर पर गौरैया और उनके घोसले उजाड़ डाले जाते हैं।

गौरैया सिर्फ़ किसी पक्षी का नाम नही है, वे ढेर सारी चीजों, जो हमारे बीच से एक-एक कर गायब होती जा रही हैं, उनकी शक्ल, सूरत उनकी आदतें गौरैयों से मिलती-जुलती होती हैं। गाँवों की सबसे बड़ी त्रासदी है, चरागाहों और पोखरों के निशान मिट जाना। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि अब वहाँ झुण्ड के झुण्ड बकरियां, गाय, भैंसे, नही दिखतीं। ये सब गाँव के सामुदायिक जीवन की रीढ़ थे। वहीं गौरैया फ़ुदकती थी। उनके सहवास और मैथुन की आदिम गंध से बंसत महकता था।

 धीरे-धीरे और एक-एक कर वहाँ से वे सारी चीजें, जो पेड़ों और चिड़ियों को आदमी से जोड़ती थी, विस्थापित होती जा रही हैं। विकास और सभ्यता  के इस क्रूर दस्तक से डरी-सहमी गौरैया अब न तो कभी हमारी स्मृतियों में चहचाती है, न सपनों में फ़ुदकती है। ढेर सारी मरी हुई गौरैयों और परियों के पंख हमारे विकास पथ पर नुचे-खुचे, छितराये पड़े हैं। सभ्यता के तहखाने में बन्द हमारी उदासी हमारी सांसों में भरती जा रही है। शायद अब कभी इन मुड़ेरों पर गौरैया नही आयेगी।

नोट-यह लेख कथाकार देवेन्द्र ने  विश्व गौरेया दिवस (20 मार्च) के  लिए लिखा था।

35 प्रतिक्रिया:

  1. देखिये देवेन्द्र जी आपने ये कविता तो सुनी होगी ,'' हर घड़ी बदल रही है रूप ज़िन्दगी, छाओं है कभी तो कभी तो धूप ज़िन्दगी ..........'' ठीक है गौरय्या नहीं के बराबर रह गयीं और शेर ख़त्म होने वाले हैं और डायनोसौर ख़त्म हो चुके हैं मगर ये परिवर्तन ही तो जीवन है ...बस हम और आप रहने चाहियें , इंसान बचे रहें और स्वस्थ रहें यही बहुत है . ये गौरय्या-फौरय्या तो केवल वाग-विलास है खासकर कुक्कुट-भक्षी समाज में !

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  2. इस कवितामयी पोस्ट के लिए आपका हार्दिक आभार ....लगता रहा जैसे मैंने कोई कविता पढ़ी ...और पलकें नम हो गईं .

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  3. बचपन में हमारे आंगन में ढेरों गौरैया फुदकती थीं। आज एक भी नहीं !

    हम नहीं चेते तो संभवतः यही हाल एक दिन आदमी का भी हो...

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  4. मुनीश जी, एक गंभीर और सोचने पर विवश कर देने वाले इस लेख पर कितनी फूहड़ प्रतिक्रिया दी है आपने. कही इस लेख को आप मनोरंजन के लिए तो नहीं पढ़ रहे थे. आप जो गाना देवेन्द्र जी को सुना रहे हैं, ऐसा लगता है उसे आप खुद समझ नहीं रहे कि वो गीत कह क्या रहा है. माफ़ी चाहूँगा, आपने ये लेख पढ़ा नहीं. प्रकृति से मिली चीजों के नुकसान ने मनुष्यों को कितनी क्षति पहुंचाई है, शायद इसका अंदाज़ा भी आपको नहीं है. आप लिख रहे हैं कि हम और आप रहने चाहिए. ये तो फासिस्ट सोच है. कभी सोच कर देखिये. हमारे आस-पास के गौरैयों का मरना सिर्फ उस पक्षी का मरना नहीं है. वो कौन सी चीज़ नहीं मर रही जो कल तक हमारे बीच हुआ करती थी. मुनीश जी, कोड्वेल ने अपनी एक किताब का नाम रखा था- 'Study in dying culture'. तो इसमें अर्थ कि जो दोहरी परत है, वो आज खुल गई है. एक तरफ देवेन्द्र जी का लिखा लेख है और दूसरी तरफ आपकी प्रतिक्रिया. आपकी प्रतिक्रिया पर गुस्सा भी आ रहा है और हंसी भी. मुनीश भाई, पढ़ कर चुप भी तो रहा जा सकता है. या अगर प्रतिक्रिया देने का ही शौक है तो कम से कम लेख तो पढ़ लेते भाई. ये बात मै बार-बार दोहरा रहा हूँ ताकि आपको कुछ स्वास्थ लाभ हो. आप जैसे लोगों कि बनाई और सजाई दुनिया सिर्फ आपको मुबारख. साहिर लुधियानवी कि चिंता वाजिब ही थी-'ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है'

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  5. देवेन्द्र जी !
    आप झिंझोड़ने में कामयाब रहे हैं। दुर्भाग्य से वे लोग इसे पढ़ेंगे नहीं जिनके लिये ये लेख है और हम नक़्क़ारख़ाने में तूती बन जायेंगे।
    संजय झा साहब !
    मुनीश जी उन्हीं लोगों पर व्यंग्य किया है जिन्हें देवेन्द्र जी ने आईना दिखाया है। विश्वास रखिये वे लेख को समझे हैं और वैसी दुनिया चाहते हैं जैसी देवेन्द्र जी, आप और हम चाहते हैं।

    यह पोस्ट जरूरी है

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  6. मार्मिक लेख.मुझे अपना घर याद आ गया जिसमें कई बार एक सीसा टाँगना मुश्किल होता था.गौरैया आ आकर चोंच मारती थीं.कई बार दोपहर में खेत से थककर लौटने के बाद एक घंटे की ज़रूरी नींद में उन्हीं की चीं चीं जगाती रहती थीं.गुस्से से दूर हाँकते हुए मन चिड़चिड़ा जाता था हे भगवान इन्हें तो मारकर भी चुप नहीं कराया जा सकता.सफ़ाई के दौरान हर बार चियार से गौरैया का अंडों-बच्चों से भरा घोंसला इस सावधानी से निकालने में कि गिरने न पाए रुआँसा हो जाता था.कितना पिछड़ा अभावग्रस्त समझ में आता था तब गाँव का अपना घर.लगता था इस खेती की कमाई से बननेवाले घर से कब छुटकारा मिले.एक घर हो ढंग का जिसकी अलमारी का खाली हिस्सा सज़ा हो ये नहीं कि गौरैया उसमें अपनी दुनियाँ बसा लें.पर अब उस घर का याद आना वो भी गौरैया के बहाने इतना भावुक कर जाएगा सोचा नहीं था.इससे पहले खयाल भी नहीं आया कि इस पक्के घर में चिड़ियों के लिए जगह न होना कितनी बड़ी कमी है.पर साथ में सोच भी रहा हूँ चिड़िया भी तभी बचेंगी जब खेती बचेगी.खेती से निकला हुआ लेखक ही गौरैया में माँ की शकल देख सकता है.आज पूरी दुनिया में खेती खतरे से जूझ रही है.ऐसे ऐसे भोजन की विधि तैयारी कर ली गई है जो खेतों से नहीं उपजेंगे.उन्हें मशीनें बना सकेंगी.याद रखिए व्यापारी घर गौरैया नहीं बचाना चाहेंगे.जिसे देखकर कोई गाय भैंस न रंभायी हो कभी वह जंगलों-पंछियों का हमदर्द न बन सकेगा.पशु,पक्षी,जंगल बचाना वही चाहेंगे जिनके जीवन का अंग रहे हों ये.सचमुच कितने मनहूस होंगे गाँव जब वहाँ सुबह-सुबह रेलवे स्टेशनों की तरह कौए बोलेंगे.
    देवेंद्र जी का यह लेख सिर्फ एक चिड़िया के बारे में नहीं है.इतनी मार्मिक चिंताएँ सिर्फ़ मनुष्यों के बारे में भी नहीं होतीं.दरअसल यह एक प्रार्थना होती है जो प्रकृति कभी कभी उस ज़बान में करती है जो संवेदना की वाहक होती है.देवेंद्र जी भरोसे के लेखक यूँ ही नहीं हैं.
    हाँ शुरू में मैं चौंका था कि डा. देवेंद्र कोई और हैं क्या.बाद में कथाकार देवेंद्र लिखा देखकर यक़ीन हो गया.वैसे मुझे लगता है डा.वगैरह लगाकर एक सुपरिचित नाम को अपरिचित जैसा बना देने की क्या ज़रूरत?

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  7. अपनी लिखी एक कविता "चिड़िया" जो पहले पोस्ट कर चुका हूँ आज पुनः अपने ब्लाग pritishbarahath.blogspot.com पर लगा रहा हूँ।
    इस पोस्ट ने दिमाग में अपना घोंसला जो बना लिया है

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  8. प्रीतीश जी

    मुनीश जी ने जो लिखा है उसे कई बार पढ़कर भी आपसे सहमत नहीं हो पाया। मुनीश जी जैसे प्रबुद्ध पाठक से ऐसी टिप्पणी की उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी। "परिवर्तन की शाश्वतता" के दर्शन के सहारे मुनीश ने जो समझाना चाहा है वह एक व्यंग्य तो है पर किस पर ??

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  9. शशि जी आप बहुत सुंदर ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्ति करते हैं। एक कथाकार-कवि सुलभ संवेदनशीलता के साथ लिखी आपकी प्रत्येक पंक्ति प्रभावित करती है। गौरैया के संदर्भ में भी आपकी टिप्पणी पठनीय है।

    जहां तक डा. लगाने की बात है तो इसके पीछे मेरा कोई व्यक्तिगत आग्रह नहीं है। लेखक की सम्मति से ऐसा किया गया है। लेखक के परिचित नाम को अपरिचित बना देने की हमारी कोई मंशा नहीं। प्रस्तुती के ढंग में मतांतर होना स्वाभाविक है। इससे कहीं से भी किसी की नीयत पर कोई सवाल नहीं उठता।

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  10. रंगनाथ जी,
    मुझे मालूम है आपके किसी तरह के व्यक्तिगत आग्रह होने का सवाल ही नहीं.आपकी नीयत दुरुस्त है.यह मेरे सोचने के ढंग में शामिल है कि कोई मुंशी प्रेमचंद कहे तो लगता है सायास बोल रहा है.मैं उस वक्त लेख में इतना घुल चुका था कि भूल ही गया आपको शुक्रिया भी लिखूँ.इसलिए भी कि यह पोस्ट पढ़ चुकने के बाद छूट ही गया कि दिन में क्या हुआ.मैं तो ऐसा ही ठहरा कि जिस सिर दर्द के लिए,नींद न आने के लिए लोग दवाई खाते हैं मैं लगभग वैसी ही स्थितियों के लिए पढ़ना हूँ.क्षुद्र दुनियावी चिंताओं से उबरने का यह अचूक इलाज़ मैं कभी खोना भी नहीं चाहता.देवेंद्र जी ने इस लेख में कैंसरग्रस्त मां के चेहरे की तुलना गौरैया के चेहरे से की है आज जिसकी विलुप्ति की आशंका है.कोई भी इतनी दारुण व्यंजक कल्पना किस मन:स्थिति में कर सकता है मैं यही सोचने में पिछले से उबर गया.कोई मतांतर की भी बात नहीं.यह सब खयाल में ही नहीं आया.आपने यह लेख छापकर बढ़िया किया.

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  11. रंगनाथ जी !
    मुनीशजी का पक्ष अधिकारिक रूप से तो वे ही रखेंगे मुझे कोई हक़ नहीं है किसी के बचाव का। मैनें तो आज तक मुनीश जी को पढ़ा है उसमें उन्हें प्रकृति प्रेमी पाया है जिसमें पशु-पक्षियों के प्रति भी उनका प्रेम उजागर होता है। जहाँ तक मैं उनके विचारों के बारे में जानता हूँ तो यह व्यंग्य उन पर हो सकता है जो प्रकृति को मानव की सेवा के लिये जीतने में विश्वास करते हैं और कुदरत को ठेंगा दिखाने का दुस्साहसिक सपना देखते हैं। दरअसल जब मैं अत्यंत निराश होकर कटाक्ष करता हूँ तब मेरी भाषा भी ऐसी ही हो जाती है।

    मैंने अनधिकारिक रूप से और बिना उनका पक्ष जाने मुनीश जी के प्रवक्ता का काम किया यह केवल पिछली वैचारिक साम्यता के आधार पर ही किया इसके लिये क्षमा चाहता हूँ और मुनीश जी से भी क्षमा चाहता हूँ ।
    वे अपना स्पष्टीकरण खुद करें मैं उन्हें मेल कर रहा हूँ।

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  12. प्रीतीश जी आपकी बातों मे सार है। यह भी सही है की मुनीश जी के स्पष्टीकरण के बगैर उनके कहे का वास्तविक अर्थ स्पष्ट नहीं हो सकता। उम्मीद तो हमें भी वही है जो आपको है। क्योंकि हम दोनों उन्हें पढ़ते रहे हैं। लेकिन उन लोगों के बारे में भी जरा सोचिए जो मुनीश जी को सिर्फ इस टिप्पणी के माध्यम से जानेंगे।

    उम्मीद है आपके मेल के बाद मुनीश जी अपनी बात को स्पष्ट कर देंगे।

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  13. देखिये एक और कविता याद दिला दी प्रीतीश और रंगनाथ ने मिल कर जो यों है --" चुप-चाप चिड़ी का बाप , चिड़िया मर गयी सब को पाप " सो कुक्कुट -भक्षियों द्वारा अत्यधिक मीथेन उत्सर्जन का परिणाम है ओजोन की छतरी में छेद और बिचारी चिड़िया की मौत , मगर उन्हें गरियाने के बजाय और चिड़िया की मौत का बदला लेने की बजाय हम-आप क्या कर रहे हैं -- मर्सिया पढ़ रहे हैं , मातम मना रहे हैं कभी चील का , कभी चिड़िया और कभी शेर, बघेरे का ! अब ये तो रोज़ की बात जैसी है . हर रोज़ कोई ना कोई जीव-रूप, कोई नस्ल सदा के लिए विदा हो रही है . मगर , इसे रोकने का जज़्बा हम में नहीं है चूंकि उसके लिए अपनी ज़रूरतों को लगाम देनी होगी सो फिर शोक भी काहे का -- ' हनी लेट्स डांस टुनाईट' ! प्रीतीश के लिए तो यही कहूंगा कि " कोई होता जिसको अपना कह लेते यारों......." ये गीत मुझे ब्लौग जगत में गुनगुनाने और भुन-भुनाने से रोक लिया उसने .

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  14. @"हम और आप रहने चाहिए. ये तो फासिस्ट सोच है"
    कोई इंसान धरती के सब इंसानों से ये कहे कि जो भी हो हम , आप बने रहें ऐसा उपाय करो तो इसमें फासिस्ज्म को सूंघने वाला या तो कोई बन-बिलाव ही हो सकता है या फिर गेंडा .

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  15. सबसे पहले मैं एक बात स्पष्ट कर दूं. प्रीतिश जी और रंगनाथ जी, मुनीश साहब जैसी टिपण्णी कर रहे हैं, वह तो एक बेहूदा बात भर ही कही जायेगी !! जब हम किसी निर्दोष जीवन को तिल-तिल मरते देखते हैं और उस पर कुछ सोचते-विचरते हैं तो मानव जीवन कि बात तो आती ही आती हैं. तो यहाँ इस बात पर चिल्लाने और गुर्राने कि तो कोई गरज मुझे नहीं दिख रही. मैं मुनीश का जिस बात पर विरोध कर रहा हूँ, उस पर अब भी बना हुआ हूँ. आप लोगों ने कहा कि मुनीश में प्रकृति प्रेम भरा हुआ है, मुझे तो ऐसा कही से नहीं लगता. उनकी पहली और दूसरी दोनों प्रतिक्रियाएं निहायत ही घटिया हैं. ये क्या बात हुई कि 'चिड़ियों कि मौत का बदला लेने के बजाय हम और आप मर्शिया पढ़ रहे हैं, मातम मना रहे हैं. ये तो निहायत ही सस्ता तर्क है. और मैं ही नहीं, कोई भी जागरूक पाठक इसे भी फाशिस्ट सोच ही कहेगा ! तब तो वे सारे पर्यावरणविद जिन्होंने अपना समूचा जीवन इन्ही चिंताओं में लिखते- पढ़ते बिताया, वे तो मुर्ख हुए ! या कोई बेवकूफ खड़ा हो जाये और कहे कि पर्यावरणविद सिर्फ अपना पेट भर रहे हैं, तो ये तो मुर्खता ही होगी. जज्बा सिर्फ ये तो नहीं कि लाठी उठा लिए और भांजने लगे.

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  16. @".....इसे भी फाशिस्ट सोच ही कहेगा !"
    चलो इस बार कुछ सही उच्चारण के साथ तो लिखा . ये 'फासिस्ट' नहीं 'फैशिस्ट' है . इतालवी शब्द है जनाब , जिसकी बात न समझ आये उसे यही कहने का फैशन पाया जाता है यहाँ . 'फैशन' .....'फैशिस्ट' इनमें भी ध्वनि- साम्य है !

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  17. ये लीजिए ! महानुभव अब शुद्धि-अशुद्धि पर आ गए ! आप बड़े वाले भाषाविद् हैं । मैं तो अपने ही देश की कई समृद्ध भाषाओं के अक्षरों को नहीं पहचान पाता जनाब, फिर भला इतावली कैसे जान पाता । आप जो कह गए उससे मुझे भी समझ में आ गया और पाठकों को भी ।

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  18. अरे संजीव भाई, अब इन्हें बख्श दीजिए । ये शुद्धि-अशुद्धि पर तो आयेंगे ही । अब जो कह गए उससे मुकर तो सकते नही, तो करें क्या । मुनीश जी, आपने लिखा है कि चिड़िया की मौत का बदला लेने की बजाए हम और आप क्या कर रहे हैं । तो मैं कहूंगा कि कुछ लोग कम से कम इन मुद्दों को उठा तो रहे है, आप तो इसे मजाक में तब्दील कर रहे हैं । माफी चाहूंगा, आप उम्रदराज हैं लेकिन जैसी टिप्पणियां आपने कीं उनसे तो छट्ठी कक्षा के DROP OUT लगते हैं । और सुनिए, जनाब, अब मेरी शुद्धि-अशुद्धि न देखने लगिएगा ।

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  19. बेनामीMarch 28, 2010

    ऐसा लगता है ब्लॉग-जगत टीवी चैनलों की अंधाधुंध नक़ल पर उतारू है . अभी महीना नहीं बीता है जब एअरसेल के विज्ञापन से प्रभावित हम बुद्धिजीवी ब्लोगिये बाघों को बचाने की कागजी मुहीम में जुटे थे और अब गौरैया की बारी है . आजकल फैशन बन गया है तरह -तरह के पखवाड़े और दिवस आयोजित कर सामाजिक कुरीतियों और पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता जतलाने के प्रदर्शन की . कुछ नहीं कम से कम क्षणिक पहचान तो बन ही जाती है . अगले महीने लेखक भी उस विषय को छोड़ कर किसी अन्य मसाले की तलाश में जुट जाता है जिससे की अपनी लेखनी को और तीखा बनाकर परोसा जा सके . यहाँ चल रहे बहस में कितने लोग गौरैया को बचाने के लिए इमानदार है उनका मन ही जनता होगा . और यहं तो ऐसा ही लग रहा है कि बस बहस के लिए बहस हो रही है . लोग अपनी प्रतिक्रियाओं में ही उलझे हुए दिख रहे हैं क्या कह रहे हैं क्यों कह रहे हैं ? पता नहीं ! अब लेखक ने लिखा तो सत्य है , इस पर इतना बबाल काटने की जरुरत नहीं है . अगर ज्यादा प्रकृति प्रेम उभर रहा हो तो जाकर एकाध पौधे लगाइए , गौरैयों को बचाने के लिए जमीनी स्तर पर कुछ कारगर कदम उठाइए ! यहाँ क्यों किसी को कोस रहे हैं ? दूसरों पर व्यंग करने वाले आप कौन होते हैं ? जितने वो जिम्मेदार हैं उतने ही आप भी ! आप और हम सभी उसी मानवता भक्षी समाज के अंग हैं . इस पर जरा सोचिये . इस तरह विलुप्तिकरण के खतरे पर सवाल उठाने से अच्छा कुछ अनुकरणीय उदाहरण पेश क्लारें ताकि और लोग प्रेरित हो सके . खैर , बिना बात की बहस यहाँ का शगल बन चुका है .

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  20. भाई लोग , आप लोगों का प्रकृति प्रेम देख कर हम भाव विभोर हो गया हूँ . मन इतना विचलित हो गया है कि मैं अब कुछ करना चाहता हूँ . अब कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि मैं किस उपक्रम से गौरैया को बचा सकता हूँ ? और यदि ब्लॉग लिखने से कुछ फर्क पड़ेगा मेरी प्यारी गौरैया को तो मैं कल से अकाद सौ पोस्ट लिख ही डालूँगा और अपने दोस्तों को भी कहूँगा लिखो और गौरैया को बचाओ !

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  21. बेनामीMarch 28, 2010

    बेनामी तुम बेनामी हो तो रहो लेकिन ये तो बताओ कि तुम्हें यहाँ कमेंट करने को किसने कहा था ?? जिस तरह तुमने स्वयं से बिना किसी निमंत्रण/आमत्रंण के इस मुद्दे पर लिखना जरूरी समझा उसी तरह दूसरों ने भी लिखा। फिर तुम्हारा ये सवाल पूछना अश्लील लगता है कि दूसरों पर व्यंग्य करने वाले आप लोग कौन होते हैं ?

    बेनामी तुमने खुद को बुद्धिजीवी भी घोषित किया है। इसलिए इतना तो जानते होगे कि आमतौर पर लेखक के सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम उसका लेखन ही होता है। लेखक ग्रीन हंट को रोक नहीं सकते तो क्या उसका विरोध करना भी छोड दें ?? तुम्हारे तर्क से तो अरूंधती राय को माओवादी को ज्वाइन कर लेना चाहिए या फिर सरकारी भोपूं बन जाना चाहिए !!

    बेनामी तुमने माना है कि लेखक ने लिखा सत्य है.....फिर जो बात सत्य है उसका माखौल बनाने वालों के पक्ष में लिख कर तुम स्वयं को क्या दिखाना चाहते हो ?

    तुमने बेनामी टिप्पणी की है फिर भी पूछना चाहुंगा कि तुमने इंटरनेट पर मौजूद कितनी बकवास पोस्टों पर इस तरह आपत्ति जताई है ?? तुम किस मकसद से यहाँ मुँह उठाए कमेंट करने चले आए ?? निरपेक्ष बन कर घाघ ढंग से कुछ एक दंभी मूर्ख का पिष्टपेषण करने के लिए तुमने इतना कष्ट किस लिए उठाया ??

    बेनामी तुम्हें लेखन की जरा भी समझ हो तो अपनी टिप्पणी पर पुर्नविचार करके ही अगला कमेंट करना। तुम्हें यह भी राय है कि तुम बेनामी बन कर लिखते वक्त अपनी भाषा शैली बदल लिया करो। तुम्हारे कमेंट से पता चलता है कि तुम पूरा दिन टीवी देखते बिताते हो ?

    @@ आदरणीय ब्लाग संचालक महोदय आप कहाँ चले गए ???

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  22. आज मन व्याकुल हो गया . आँखों से अश्रुधारा प्रस्फुटित हो पड़ी .रो रहा हूँ ! किसने पकड़ लिया गौरईया को ! नाम बताओ और पाता ...अभी निकलता हूँ बचाने को .
    इतना विचलित तो तब भी नहीं हुआ , जब कोशी पीड़ित भूख से मर रहे थे ...आज भी कुपोषण सेर बच्चे मर रहे है ..छोड़ो ..मारने दो..इन्सान तो बहुत ज्यादा है ..गौरिया को बचाओ..
    पर समझ में नहीं आ रहा , कैसे बचाऊ ? यार पे पोस्ट लिखने से कोई फायदा होता है ..कल मिश्र जी बोल रहे थे कि दो पोस्ट लिख्जी तो १० गौरैया बच जाएगी..कितनी बचानी है ?
    गौरैया कि आबादी का संतुलन का हिसाब किताब करके पोस्ट लिखना शुरू करते हैं .वैसे कल एक गौरैया अस्पताल खोलूँगा. २००० हज़ार का दोनतिओन भेज दें ..जरूरत है ... जय हिंद ! जय गौरईया !
    आह्वान : गौरैया को बचाने के लिए अधिक से अधिक पोस्ट लिखें

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  23. बेनामीMarch 28, 2010

    हे महामूर्ख ! दूसरे वाले बेनामी , तुम खुद क्यों बेनामी बन गये पता नहीं चला ? माओवादियों के रेड हंट के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है जिसमें बिहार के जमुई .के दर्जनों आदिवासियों पर कहर बन कर टूटा ? वो आदिवासी किस पूंजीपति शोषक समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे थे ?
    कोई जबाव सूझे तो बटन बेशक वो कुतर्क पर आधारित हो ! वैसे अब तुम लोगों के दिन लद गये हैं ! सम्माननीय कनु सान्याल की आत्महत्या किस कुंठा से हुई उसे समझने का प्रयत्न करो तो कहीं ज्यादा बेहतर होगा ..................... वैसे अरुंधती जैसों की जरुरत तुम जैसे माओवादियों को ही होगी भारत सरकार के पास ऐसी गंदे शौकों के लिए कोई जगह नहीं है ....................

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  24. बेनामीMarch 28, 2010

    बेनामी तुमने अपनी पहली टिप्पणी के मेरे प्रतिवाद पर कुछ नहीं लिखा। जाहिर है कि तुमने अपनी भूल को मौन ढंग से स्वीकार कर लिया है।

    रही माओवाद की बात तो यह एक विवादित विषय है। हमारी राय अलग-अलग हो सकती है। माओवाद का मैं समर्थन नहीं कर रहा लेकिन जिस तरह से सरकार ग्रीन हंट के नाम पर आदिवासियों को मार रही है वो माओवाद से जरा भी अलग नहीं है।

    तुम खुद को मुझसे बड़ा देशभक्त समझते हो। यह अच्छी बात है। लेकिन यह तो सोचो की काँग्रेस-भाजपा सरकारें जिस तरह से भारत की प्राकृतिक संपदा को कुछ एमएनसी को मुफ्त दिया जा रहा है उससे भारत को कंगाल होने में ज्यादा दिन नहीं लगंेगे। बेनामी, हर एक टन आयरन ओर पर कम्पनी को 5000 रु. घोषित मुनाफा होता है जबकि भारत सरकार इन धनपशुओं से एक टन आयरन ओर पर मात्र 27 रु टैक्स ले रही है। अब तुम बताओ कि भारत को कौन लूट रहा है ??

    ऐसे ढेरों आंकड़े हैं। जो सरकारी हैं। मैने नहीं गढ़े। ब्रिटिश ने सैकड़ों साल भारत के प्राकृतिक संसाधन का दोहन किया अब एमएनसी कर रही हैं। सोने की चिड़िया के पँख नोचे जा रहे हैं ? फिर तुम्हारा और हमारा भारत किस हाल में होगा इसकी कल्पना की जा सकती है !!

    बेनामी तुमने इस लेख को ध्यान से पढ़ा होगा तो देखा होगा कि लेखक ने गौरैया के विलुप्त होने पर कोरा मातम नहीं मनाया है। उसने विकास के उस माडल पर सवाल खड़ा किया है तो मूलतः मनुष्य के लिए खतरा बन चुका है ? और मुझे यह लेख इसीलिए पसंद आया कि लेखक ने एक पक्षी के विलुप्त होने को व्यापक मानवीय अर्थ में देखा है।

    देशभक्त हो तो जरा सघन पड़ताल करो कि यह सब भारत के हित मे है या अहित में ??

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  25. दूसरे बेनामी जी, मैं यही हूँ !

    आपके कमेंट के मद्देनजर मैं अपनी पोजिशन फिर से स्पष्ट किए देता हूँ। मुझे लगता है कि मुनीश जी ने अनावश्यक हल्केपन से पहला कमेंट किया। दूसरे कमेंट में भी उन्होंने जो कुछ कहा है वह आपत्तिजनक है। हम उनके तर्क से नहीं पढ़ते और लिखते।

    मेरा स्पष्ट मत है कि जो कुछ नहीं कर सकते ऐसे दो लोगों मे से जो चुप हैं उनसे बेहतर वो हैं जो कम से कम अन्याय की पहचान करके उसे उजागर तो कर रहे हैं।

    मुनीश जी ने जिस तरह से बन-बिलाव और गैंडा को बहस में आयातित किया है उसके बाद मैं उनके मामले में कुछ न कहना ही उचित समझता हूँ।

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  26. जयराम
    एक चर्चित ब्लागर होने के बावजूद तुम पूछ रहे हो कि ब्लाग लिखने से क्या फर्क पड़ता है ?

    तुम तो लेखक हो फिर भी क्या तुम्हें बताना पड़ेगा कि किसी मुद्दे पर सामान्य सचेतता का विकास करने के लिए लेखकों का विभिन्न मुद्दों पर लिखना क्यों जरूरी है ?

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  27. बेनामीMarch 28, 2010

    रंगनाथ जी, कुछ संघियों की फौज टूट पड़ी है। ये निकक्करधारी कुछ और तो करने से रहे तो अनामी और बेनामी बनकर ही हमला बोलेंगे । वैसे भी अब इनकी कोई सुनता नहीं । खुले रूप में तो ये हमला बोल नहीं सकते । मुनीश तो खैर क्या बोलेंगे ! बेवकूफी कर बैठे और पछताना तो उन्हें आता नहीं । बेनामी बेरोज़गारों, मैं भी बेरोज़गार ही हूं लेकिन तुम्हारे जैसा लंपट नहीं ।

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  28. तो बात यहाँ तक आ पहुँची !!!
    लंपट और स्वघोषित सुशील बेनामीयों रंगनाथ जी की टिप्पणी के बाद तो शांत हो जाओ। अगर रंगनाथ जी ने माडरेशन ऑन नहीं रखने का आप्सन मानक निर्णय लिया है तो कम से कम उनकी उदारता का तो सम्मान करो क्यूँ उन्हें सुदर्शन उठाने को मजबूर करते हो।

    तुम्हीं से प्यार करें तुम्हीं को खा जायें
    अदबी यूँ तो सियासी हैं मगर क़मीन नहीं (दुश्यंत)

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  29. बेनामीMarch 29, 2010

    अरे , जब प्रहार झेलने की ताकत नहीं है तो लिखते क्यों हो ? आ गये तुम भी चमचागिरी करने पर कुछ हासिल नहीं होगा ?

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  30. बेनामीMarch 29, 2010

    दूसरे बेनामी , अब देशभक्ति का प्रमाणपत्र तुम जैसे गद्दारों से लेने पड़ेंगे जो चीन का खाते और गाते हैं ............

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  31. बेनामीMarch 29, 2010

    बेनामी तुम मुझे चाइनिज समझ रहे हो !! खैर,तुम्हारा हाल तुम्हें मुबारक हो। तुम्हें देश की चिंता है तो देश के वास्तविक हालात का मुआयना करो। उस पर कुछ लिखो-पढ़ो। मेरी शुभकामनाएं।

    @रंगनाथ जी, धन्यवाद।

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  32. बहुत ही गज़ब का लेख. गौरैया के विलुप्त होने को इतना व्यापक स्तर पर विश्लेषण करना बहुत ही अच्छा लगा. गौरैया के माध्यम से आपने आज कल के 'विकसित होते समाज' को उधेड़ कार रख दिया है.
    हम और आप बचे रहे ये बिलकुल सही बात है मगर कैसे? क्या ये धरती हम और आप नहीं हैं? और धरती मात्र ज़मीन नहीं है. ये गौरैया भी धरती ही है. नदी,पर्वत, जंगल, पशु, पक्षी सभी धरती ही हैं और हाँ खनिज भी. स्वयं को बचाना है तो धरती ही बचाएं हम क्यूंकि अगर हमने ऐसा नहीं किया तो यूँ होगा की धरती तो बची ही रहेगी, स्वरुप बदल कर, किन्तु हम नहीं बचेंगे.
    लेख लिखने से क्या होता है और लेखक ही बताये की हम करें क्या. ये सवाल बहुत अच्छे हैं. हमें माओवादी, अमरीका की नीति, देश का आर्थिक खोखलापन, अरुंधती रॉय और भी बड़ी बड़ी बातें समझ में आती हैं बस समझ में नहीं अआता तो ये की गौरैया को कैसे बचाएं ! बड़े मासूम हैं हम सब साहब. निर्दोष और भोले. इस लेख से बाकी लोगों को क्या हुआ ये तो पता नहीं मगर हाँ मेरे जैसे पाठक को अवश्य ध्यान आया की 'यार बहुत दिन हुए गौरैया नहीं देखा' और जब मनन में सवाल आया तो जवाब भी सोचेंगे. लेखक का काम सिर्फ कवितायें और कहानियां लिखने का है वो समस्याओं को उजागर करने पर क्यूँ पड़े रहते हैं भाई? आखिर लेख लिखने से होता क्या है? विज्ञान और वाणिज्य पढ़िए और दुनिया को 'विकसित' करने में योगदान दीजिए, साहित्य पढ़ने से कुछ नहीं होता. हा हा हा. :)

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  33. पियूष,आप नीचे दिए लिंक पर एक बार जाएँ. एक महान लेखक ने बहुत ही कम शब्दों में 'एक लेखक क्या कर सकता है' प्रश्न का जवाब दिया है..

    http://www.banarahebanaras.com/search/label/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0

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