प्रतिभा कटियार
पहला प्रेम क्या इतनी आसानी से हाथ छोड़ता है. जिसका वजूद धड़कनों में शामिल हो, उससे किनारा करने की कोशिश में भी बेपनाह प्यार ही तो होता है. हर पल दूर जाते कदम और करीब ले जाते हैं. शब्द अपने अर्थ बदलने लगते हैं. दूर जाने में पास आने का अर्थ दिखने लगता है. होता भी यही है.
दूर होने की हर कोशिश प्यार के समंदर में एक और डुबकी सी मालूम होती है. पाब्लो नेरूदा का पहला प्रेम हो या चेखव का सब यही सच उजागर करते हैं कि जिससे लागे मन की लगन उसे क्या बुझायेगी चिता की अगन. मुस्कुराहटों में या आंसुओं में, इंतजार में या मिलन में, प्रेम में या आक्रोश में बात वही है बस प्यार.....
उन्हें हर उस वक्त वो व्यक्ति मिले जो उसे उसकी उत्कट आकांक्षाओं, समझ, विचार समेत स्वीकार करे. उसकी मन की गिरहों को न सिर्फ खोलता चले बल्कि उसका वैचारिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और व्यैक्तिक विकास भी करता चले. उसके प्रेम के इनकार को भी जो प्रेमी सिर आंखों पर सहेज ले. दखल न दे उसकी अंदर की दुनिया में.
उसे ठीक वक्त पर एक ऐसी दोस्त मिले जो उसे ताकीद करे कि बिना प्रेम के एक चुंबन भी किसी को मत देना. इससे बेहतर होगा मर जाना. भले ही यह ताकीद देने वाली वेरा की यह दोस्त एक वेश्या ही क्यों न हो. लेकिन प्रेम की प्रग्राढ़ता का कैसा अनमोल संदेश मिलता है वेरा को कदम कदम पर. कभी अपने भीतर से तो कभी बाहर से.
वेरा पाव्लोवेना को अपने पहले प्रेम को लेकर भले ही भ्रम हुआ लेकिन यह रिश्ता कमजोर नहीं था. तभी तो समझ और सच्चाई से सींचा गया रिश्ता मुझे तुमसे प्रेम नहीं है जैसी साफगोई को भी आसानी से स्वीकार कर लेता है. कहीं कोई हाय-हाय किच किच नहीं. वेरा के सपने में उसे पता चलता है कि जिस सद्भावना, दया, मदद, वैचारिक परिपक्वता को वह प्रेम समझ बैठी असल में वह तो प्रेम था ही नहीं.
प्रेम की जगह खाली थी और कोई ढेर सारे मौसम, सूरज की किरनें, चांदनी, खिलखिलाहटें, नर्माहटें, गर्माहटें लेकर आया और उस खाली जगह पर उसका अधिकार हो गया. लगा कि प्रेम पूरा हो गया. ऐसा ही तो होता है. ऐसा ही तो होता रहा है. लेकिन नहीं, ऐसा ही नहीं होता हमेशा. वेरा को समझ में आया. जिसने उसकी मदद की उसी से उसे प्रेम हो जाये यह कोई जरूरी नहीं है.
प्रेम को लेकर सबसे पहले हमें भ्रम ही तो होता है. किशोर वय में (या किसी भी उम्र में) जब हम दुखों में आकंठ डूबे हों, जब निराशाओं का समंदर लहरा रहा हो, जब अंधेरा स्थाई हो चुका हो, जब जीवन से विश्वास उठ चुका हो ऐसे में जो हाथ मदद को बढ़ता है, जो अंधेरे को चीरने में मदद करता है, जो जीवन को उम्मीदों की सौगात देता है, जो निर्जन मन की दुनिया को आशाओं के फूलों से पाट देता है, उसे ही प्रेम समझ बैठने का भ्रम भला किसके हिस्से नहीं आया होगा.
लेकिन प्रेम ऐसे नहीं आता. ढेर सारी परिभाषाओं, इच्छाओं, सद्भाावनाओं को रौंदता हुआ, सौंदर्य के उपमानों को भंग करता हुआ बेफिक्री, बेलौसी और ढिठाई के साथ आता है एक रोज. पकड़ता है हाथ और चल पड़ता है हमें साथ लेकर...सारी जद्दोजेहद, बचने की हजारों कोशिशें सब बेकार. वेरा की जिंदगी में भी ऐसे ही प्रेम दाखिल होता है. पहले भ्रम बनकर फिर सच बनकर. वेरा के करीब जाकर जिंदगी खुलती है पर्त दर पर्त.
कोई भी वेरा (स्त्री) किसी भी पुरुष को नहीं सौंपती अपना दुख. मुस्कुराहटें वो सबसे आसानी से सौंपती है. दुख को गहरे छुपाकर रखती है. तभी तो जीवन भर साथ होकर भी कोई पुरुष नहीं ही पहुंच पाता अपनी स्त्री के पास. उसके दुखों को ग्रहण करने की योग्यता ही प्रेम की योग्यता है।
1863 से, रूस से, निकोलाई के उपन्यास से निकलकर सरहदों की तमाम सीमाओं को पारकर, धर्म, जाति, संप्रदाय, नस्ल, रंग, भाषा, संस्कृति के तमाम बंधनों को तोड़कर हर स्त्री का आंचल बन गया है. लहरा रहा है यहां से वहां तक.
['वेरा ' निकोलोई चेर्नीवेश्की (1828-1889) के ऐतिहासिक महत्व के उपन्यास ‘व्हाट इज टु बी डन’ की कालजयी पात्र]
तभी तो जीवन भर साथ होकर भी कोई पुरुष नहीं ही पहुंच पाता अपनी स्त्री के पास. उसके दुखों को ग्रहण करने की योग्यता ही प्रेम की योग्यता है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबस प्रेम का सारा सार इन पंक्तियों मे आ गया…………अब कहने को कुछ बचा ही नही।
दिलचस्प है ......... एक स्त्री के भीतर की पड़ताल ......कुछ पहलू जाने पहचाने है
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रतिभा जी स्त्री होने के भाव में थोड़े अतिरेक में चली गयी हैं। प्रेम में उपजी कातरता, न समझे जाने की पीड़ा स्त्री-पुरुष दोनों में समान ही होती होगी। यह किसी का विशेषाधिकार नहीं है। पुरुषों लेखकों को स्त्री से कितना सुख मिला है यह तो विश्व साहित्य में दर्ज है। यही हाल स्त्री के लिए भी सही है। स्त्रिमय होने में हमें एकांगी नहीं हो जाना चाहिए। मैं सामान्य पाठक हूं। अतः इसे कोई विरोध न समझे। बस जो लगा वो कहा। इंटरनेट के लिए प्रति घण्टे पैसे देने होते हैं सो मैं आपसे का कोई संवाद भी स्थापित नहीं कर पाऊँगा। अतः इस पोस्ट पर इसे मेरा आखिरी कमेंट ही समझें। क्यांकि जब तक मैं वापस आऊँगा तब तक पोस्टों का कारवां आगे बढ़ चुका होगा
प्रत्युत्तर देंहटाएंapki samajh apke alfajon aur unki gahrayion me saaf dikhti hai...
प्रत्युत्तर देंहटाएंsukriya
आज दिनांक 26 जुलाई 2010 के दैनिक जनसत्ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्तंभ में आपकी यह पोस्ट पांवों पर कुल्हाड़ी शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्कैनबिम्ब देखने के लिए जनसत्ता पर क्लिक कर सकती हैं। कोई कठिनाई आने पर मुझसे संपर्क कर लें।
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपका लेख जनसत्ता के आज [26 जुलाई 2010] के संस्करण में प्रकाशित हुआ है. आप इसे जनसत्ता-रायपुर के ऑनलाइन संस्करण में प्रष्ट न. 4 पर पढ़ सकते हैं.
प्रत्युत्तर देंहटाएंhttp://www.jansattaraipur.com/