गंथ गयी है वह जमीन मेरी आत्मा में
सालती है मेरे उतप्त प्राण
रचती है मेरी मेधा के त्रसरेणु
जगाती है विस्मृत हो चुके कूपों में
एक त्वरा , एक त्विषा
कोंचती है अपने इतिहास का बल्लम
मेरे शरीर में, पीड़ा की शिराओं के अंत तक
तोड़ देती है अपने हठ की कटार
अस्थियों की गहराई में
धीमे से दबा देती है अपने बीज
मेरे उदर की की तहों में
सींचती है वह नदी मेरे स्वप्न
बुनती है मुझे धीमे से
मद्धम स्वरों में पिरो कर
वो वीथियाँ,
जोतती है मेरी बंजर चेतना
घुस कर मेरे स्वप्न तंतुओं में
छेड़ती है एक राग
बहुत महीन, बहुत गाढ़
धंस गयी है वह सुबह मेरी नींदों में
धोती है जो मुझे मंदिरों के द्वार तक
झांकती है मेरे अंधेरों में
कुरेद कर जगाती है मेरे सोये हुए प्रश्नों को
पवित्र करती है मुझे मेरे आखिरी बिंदु तक
एक स्पर्श रचता है मुझे
गढ़ता है अपने चाक पर, अपनी परिभाषा में,
पकाता है अलाव में धीमी आंच पर
गलाता है मुझे अपने अवसादों तक
टेरती हैं मीनारों से लटकी अज़ानें
मेरे दोष बोध को
सीढ़ियों पर बैठा जो खोजता है
अपने उद्धार के मंत्र, अपनी मुक्ति का तंत्र
कन्धों पर लाद कर लाया हूँ उत्कंठा के स्तूप
समा गयी है सारी दिशाएं मेरे संकल्प में
पच गयी है सारी धारणाएं उसी जमीन में
जहाँ से उगता हूँ मैं
- दीपांकर
ऐसा बस दीपांकर का ही लिखा होता है स्पर्श जो जगाता है "..विस्मृत हो चुके कूपों में एक त्वरा, एक त्विषा"
प्रत्युत्तर देंहटाएं[ रंग - आजानें कि अज़ानें ?]
अद्भुद! अद्भुद!
प्रत्युत्तर देंहटाएंऐसी रचनाएँ ही कालजयी कहलाने का अधिकार रखती हैं ... मोहित हूँ ... और क्या कहूँ
मनीष जी मैंने आपके द्वारा बताया सुधार कर दिया है। आपका धन्यवाद कि आपने इस बारीक अशुद्धि की तरफ ध्यान दिलाया।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसस्नेह
पदम जी आपके उदार शब्दों के लिए दीपांकर की तरफ से मैं आभार व्यक्त करता हूं।
प्रत्युत्तर देंहटाएंsunder ati sunder...
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक स्पर्श रचता है मुझे
प्रत्युत्तर देंहटाएंगढ़ता है अपने चाक पर, अपनी परिभाषा में,
पकाता है अलाव में धीमी आंच पर
गलाता है मुझे अपने अवसादों तक
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बेहद खूबसूरत !!!
एक स्पर्श रचता है मुझे
प्रत्युत्तर देंहटाएंकन्धों पर लाद कर लाया हूँ उत्कंठा के स्तूप
समा गयी है सारी दिशाएं मेरे संकल्प में
पच गयी है सारी धारणाएं उसी जमीन में
जहाँ से उगता हूँ मैं
...BAHUT ACHHI KAVITA