दीवान-ए-गालिब मुझे उतनी ही प्रिय है जितनी किसी को रामचरितमानस या गीता प्रिय होगी। फिर भी,आज दोपहर जब ब्लाग खोला तब पता चला कि गालिब का जन्मदिन है। 'जन्मदिन की बधाई' की जो अंतरध्वनि है वह गालिब के फलसफा-ए-जिंदगी का विपर्यय ही रचती है। गालिब ने कभी चाहा था कि -
रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो।
हम-सुखन कोई न हो और हम-जबाँ कोई न हो।।
बे-दरो दीवार-सा इक घर बनाया चाहिए।
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो।।
पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार।
और अगर मर जाइए तो नौहाख्वाँ कोई न हो।।
इस गजल को कहते वक्त गालिब की क्या कैफियत रही होगी इसका अंदाजा हर पाठक लगा सकता है। जीवन की त्रासदी यह कि महान कवि जीते जी जिन चीजों के लिए तरस के रह जाता है मरने के बाद वहीं चीजें उसे इफरात में मिलती हैं। इसी उधेड़बुन के बीच ख्याल आया कि गालिब जैसे शायर को आज भी कुछ खास तरह के लोग ही याद कर रहे हैं। गालिब के ही तर्ज पे कहें तो गालिब जो मर गया है तो हर शायर-दिल उदास है.....
लेता नहीं मेरे दिल-ए-आवारा की खबर।
अब तक वह जानता है कि मेरे ही पास है।।
हर इक मकान को है मकीं से शरअ असद।
मजनूँ जो मर गया है,तो जंगल उदास है।।
कुछ लोग मर कर भी नहीं मरते जैसे कि गालिब। उनके जन्म दिन की याद दिला कर आपने अच्छा किया।
प्रत्युत्तर देंहटाएंग़ालिब के जन्मदिन पर उम्दा प्रस्तुति.... स्मरण कराने के लिए आभार
प्रत्युत्तर देंहटाएंरहिए अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो।
प्रत्युत्तर देंहटाएंहम-सुखन कोई न हो और हम-जबाँ कोई न हो।।
बे-दरो दीवार-सा इक घर बनाया चाहिए।
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो।।
पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार।
और अगर मर जाइए तो नौहाख्वाँ कोई न हो।।
ग़ालिब के जन्मदिन पर बेहद उम्दा पोस्ट...
बेहतरीन पोस्ट। आभार इस प्रस्तुति के लिए।
प्रत्युत्तर देंहटाएंतुम न आओगे तो मरने की हैं सौ तदबीरें ,
प्रत्युत्तर देंहटाएंमौत कुछ तुम तो नहीं हो की बुला भी न सकूँ !
दुनिया में हैं और भी सुखनव्रर बहुत अच्छे
प्रत्युत्तर देंहटाएंकहते हैं गालिब का है अंदाजे बयां और ।
एक अच्छी पेशकश..शक्रिया आप का
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सामाजिक सरोकार से जुड़ के सार्थक ब्लोगिंग किसे कहते
नहीं निरपेक्ष हम जात से पात से भात से फिर क्यों निरपेक्ष हम धर्मं से..अरुण चन्द्र रॉय
सच कहा, मेरे लिये भी दीवाने-ग़ालिब किसी कुरान,गीता से कम नहीं और ग़ालिब तो साक्षात ख़ुदा...
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