29 जनवरी 2010

अच्छाई क्या है ?

1.

1.अच्छाई को परिभाषित करने से ज्यादा आसान है उसका बोध; अच्छे पात्रों को सिर्फ महान उपन्यासकार ही गढ़ सकते हैं। मेरे लिए सबसे कम असंतोषजनक विवरण यही कहना होगा कि कोई भी चीज या जीव जो अपने काम को कायदे से कर रहा हो, अपनी प्रकृति और वातावरण द्वारा प्रदत्त अधिकारों का पूरा प्रयोग कर रहा हो, वह अच्छा है- हालांकि हमें याद रखना चाहिए कि ‘प्रकृति’ और ‘वातावरण’ एक एकल और निरंतर परिवर्तित होती वास्तविकता के बौद्धिक अमूत्र्तकरण हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि वे लोग खुश और अच्छे हैं जिन्हें उनका काम मिल गया हैः ये काम कैसे होंगे, यह उस समाज पर निर्भर करेगा जिसमें ये काम किए जाते हैं।

अच्छाई दो किस्म की होती है, ‘प्राकृतिक’ और ‘नैतिक’। एक जीव प्राकृतिक रूप में अच्छा होता है जब वह अपने वातावरण के साथ संतुलन की स्थिति हासिल कर ले। सभी स्वस्थ पशु और पौधे इस अर्थ में प्राकृतिक रूप से अच्छे हैं। लेकिन, कार्य करने की अधिक स्वतंत्रता की ओर होने वाला कोई भी बदलाव नैतिक रूप से अच्छा बदलाव है। मुझे लगता है कि एक अनुकूल रूपांतरण पर नैतिक रूप से एक अच्छे काम की तरह बात की जा सकती है। नैतिक अच्छाई भी प्राकृतिक अच्छाई में तब्दील होती है। एक परिवर्तन होता है और एक नया संतुलन बन जाता है। मनुष्य के नीचे की प्रजातियों में यह तत्काल होता हैः प्रत्येक प्रजाति के लिए स्वतंत्रता की दिशा में होने वाला परिवर्तन खुद को दोहराता नहीं है। मनुष्य में यह जारी रह सकता है और नैतिक स्वतंत्रता के प्रत्येक चरण के बाद वैसा ही एक नया चरण आता है। मसलन, हम अक्सर अनपढ़ किसानों की ‘अच्छाई’ की सराहना करते हैं जब हम शहरवासियों की ‘बुराई’ से उसकी तुलना करते हैं। लेकिन, यह एक रूमानी किस्म का भ्रम है। किसान में हम जिस अच्छाई की सराहना कर रहे होते हैं, वह नैतिक नहीं, प्राकृतिक होती है। एक बार जब किसान के जीवन में मनुष्य की अधिकतम शक्तियों का उच्चतम उपयोग उसके काम करने की स्वतंत्रता की आखिरी सीमा तक हो चुका हो, तो यह बात सही नहीं रह जाती। शहरियों के पास ढेर सारे विकल्प होते हैं और अपनी ताकत का प्रयोग करने के ज्यादा अवसर होते हैं। वह अक्सर गलत चुन लेता है और इसीलिए नैतिक रूप से बुरा हो जाता है। हम जब इसके लिए उसकी निंदा करते हैं तो हम सही होते हैं, लेकिन यह कहना कि हम सभी एक किसान के जीवन में वापस लौट जाएं, नैतिक प्रगति की संभावना से इनकार करना होगा। इसी तरह युवावस्था की अर्चना एक अन्य किस्म का रूमानी निराशावाद है।

2.इसी तरह प्राकृतिक और नैतिक बुराई होती है। चुनने और काम की स्वतंत्रता की निश्चित सीमाएं, जैसे कि खाने और रहने के लिए जीवन को नष्ट करने की अनिवार्यता, जलवायु, दुर्घटनाएं, ये सभी प्राकृतिक बुराइयां हैं। दूसरी ओर एक बोर्डिंग हाऊस का रखवाला होने के नाते यह जानते हुए कि विटामिन स्वास्थ्य के लिए जरूरी है, लाभ कमाने या अपने आलस्य के कारण अतिथियों को अपर्याप्त भोजन देता रहूं, तो मैं नैतिक बुराई कर रहा होउंगा। जिस तरह नैतिक अच्छाई प्राकृतिक अच्छाई में तब्दील हो जाती है, ऐसे ही इसके उलट प्राकृतिक बुराई ज्ञान के विकास के साथ नैतिक बुराई में तब्दील हो जाती है।

3. इस धरती पर जीवन का इतिहास उन तरीकों का इतिहास है जिनके माध्यम से जीवन ने अपने वातावरण पर नियंत्रण पाया है और स्वतंत्रता हासिल की है। जीव किसी वातावरण में रहने के हिसाब से खुद को या तो ढाल लेते हैं, जैसे कि एक नागफनी की पत्तियां जो रेगिस्तान के हिसाब से बन जाती हैं- या फिर जीव खुद अपने वातावरण को बदलने के तरीके ईजाद कर लेते हैं। मनुष्य के नीचे के स्तर पर यह प्रगति संरचनागत जैविक बदलावों के माध्यम से हुई है जो रूपांतरण के अभाव या प्राकृतिक चयन की प्रायक्तिा पर निर्भर है। सिर्फ पुरुष ही अपनी सचेतन मेधा के सहारे अपने जैविक विकास के बाद भी अपना विकास क्रम जारी रखता है। भौतिक जगत के कानूनों को समझकर उसने उन पर बड़े पैमाने पर नियंत्रण कर लिया है और यहां तक कि वह जिस समाज और प्रकृति में रहता है, उनके भी कानून समझकर ऐसी स्थिति में पहुंचने की कोशिश करने लगता है जहां वह जो चाहता है, वह हो सकता है। ‘स्वतंत्रता’, जैसा कि एक प्रसिद्ध परिभाषा कहती है, ‘अपनी आवश्यकता को जानना है।’

4. एक पशु के रूप में मनुष्य की विलक्षणता उसके क्रमिक गति से अविशिष्ट और विवेकपूर्ण होने में है। अन्य सभी पशु ज्यादा तेजी से विकसित होते हैं और समाप्त हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो आनुवंशिकता का प्रभुत्व मनुष्य में सबसे कमजोर होता है। उसके पास वातावरण के चुनाव के व्यापक विकल्प हैं और उसके बदले में वातावरण या प्रकृति या फिर उसके सामाजिक जीवन में होने वाले बदलावों का उस पर सबसे ज्यादा असर होता है।

5. जैविक सर्वोच्चता के मामले में अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी कीड़ों के मुकाबले मनुष्य के पास एक विशिष्टीकृत और केंद्रीकृत स्नायु तंत्र होता है और बाकी अंग विशिष्टीकृत नहीं होते। जो प्रतिक्रियाएं वह प्राप्त करता है, वे एक ही अंग में संग्रहित हो जाती हैं। एक ही जगह पर एक से ज्यादा प्रतिक्रिया यदि मौजूद हो, तभी विवेक और चुनाव का सवाल पैदा होता है।

6. मनुष्य हमेशा से समुदायों में रहने वाला एक सामाजिक प्राणी रहा है। यह सामाजिक अनुबंध के किसी भी सिद्धांत को झुठलाता है। निर्वात में किसी व्यक्ति की कल्पना एक बौद्धिक अमूर्तिकरण ही है। व्यक्ति सामाजिक जीवन का उत्पाद है; उसके बगैर वह कुछ स्वाभाविक क्रियाओं के समुच्चय के अलावा और कुछ नहीं रह जाएगा। मनुष्य न तो स्वतंत्र और न ही भला जन्म लेता है।

7. समाज और संस्कृतियों में भारी अंतर होते हैं। कुल मिला कर इस मामले में मुझे मार्क्स ठीक जान पड़ते हैं जो कहते हैं कि भौतिक परिस्थितियां और आर्थिक उत्पादन के रूप ही समुदायों का स्वरूप तय करते हैंः मसलन, एशियन पेनिनसुला की भौगोलिक विशिष्टताओं के कारण ही छोटे लोकतांत्रिक शहरनुमा राष्ट्रों का जन्म हुआ, जबकि नदी के किनारे बसी सभ्यताएं जैसे मिस्र और मेसोपोटामिया केंद्रीकृत शासन वाले साम्राज्य बन कर रह गईं।

8. लेकिन हम सभी अपने प्रति एक सोचने-समझने और चाहने वाले जीव के रूप में सचेतन रहते हैं और इसी समग्र का ज्ञान भी हमारे पास होता है। यह अनुभव हमारी सोच को बनाता है। मैं यह नहीं समझ पाता कि अन्य समुच्चय जैसे परिवार, वर्ग, राष्ट्र आदि कैसे हमारे समुच्चय हो सकते हैं, सिवाय इसके कि इनका एक विवरणात्मक अर्थ है। हम राज्य को नहीं देखते, बल्कि उसे व्यक्तियों के समूह के रूप में देखते हैं। विभिन्न समुदायों का नृशास्त्रीय अध्ययन, जैसा कि डाॅक्टर बेनेडिक्ट ने आदिम अमेरिकी संस्कृतियों पर किया या फिर लिंड ने समकालीन मिडलटाउन पर किया, दिखाता है कि किसी सांस्कृतिक रूप में कितनी ताकत होती है कि वह उसके तहत जीने वाले व्यक्तियों की प्रकृति को बदल देता है। एक निश्चित सांस्कृतिक स्वरूप अपने अनुकूल आचार के चरित्र और माध्यमों का विकास करता है और उन्हें दबा देता है जिनका उसके लिए कोई मूल्य नहीं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी संस्कृति को हम महान व्यक्तित्व के सृजन से जोड़ दें, जो कि अपने घटकों के प्रति सचेत हो, ठीक वैसे ही जैसे मैं अपने हाथ या यकृत के प्रति सचेत हो सकता हूं। एक समाज विशिष्ट तरीके से एक निश्चित जगह और निश्चित काल में रहने वाले व्यक्तियों से मिल कर बना होता है, उसके अलावा यह कुछ नहीं।

9. सरकार और समाज के बीच लाॅक द्वारा किया गया अंतर काफी महत्वपूर्ण है। एक बार फिर मार्क्स मुझे सही लगते हैं जब वह कहते हैं कि संप्रभुता या सरकार किसी समाज द्वारा लिए गए ठेके का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह हमेशा समाज के उन कुछ लोगों से पैदा होते हैं जिनके हाथों में उत्पादन के औजार हैं। अधिकारों के सिद्धांत किसी सामाजिक रूप को सही ठहराने या गलत करार देने के लिए पैदा होते हैं और ये सामाजिक तनाव का एक संकेत हैं। बर्क और अन्य विचारक, जिन्होंने राज्य के एक आदर्शवादी सिद्धांत की परिकल्पना की, वे सामाजिक अनुबंध की पूर्व प्रस्थापना की आलोचना कर सही कर रहे थे और उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया कि समाज एक वृद्धि करता हुआ जैव तत्व है। लेकिन समाज और सरकार की पहचान करते वक्त उन्होंने सरकार द्वारा समाज के प्राकृतिक विकास में किए जाने वाले हस्तक्षेप को नजरअंदाज कर दिया, लिहाजा वे समाजों द्वारा सरकारों के प्रति विद्रोह करने के अधिकार को खारिज कर गए और राज्य के संरक्षण में यथास्थितिवाद के समर्थक हो गए।

10. प्रत्ययवादी राजनीतिक विचारक राज्य की तुलना अक्सर शरीर से करते हैं। यह तुलना गलत है। शरीर में कोशिकाओं के घटक तत्व सुनिश्चित हैं। स्नायु कोशिकाएं और ज्यादा स्नायु कोशिकाओं को जन्म दे सकती हैं; मांसपेशियों की कोशिकाएं अपने जैसी कोशिकाओं को इत्यादि। लेकिन माता से शिशु बनने के संक्रमण काल में आनुवंशिक कारकों का समूचा समुच्चय ही बदल जाता है। राजा का बेटा मानसिक रूप से विकलांग हो सकता है जबकि कोयला ढोने वाले का बेटा गणित का विद्वान बन सकता है। प्रतिभाओं और क्षमताओं का समूचा रुझान पीढ़ियों के साथ बदलता रहता है।

11. एक अन्य भ्रामक तुलना पशु साम्राज्य के साथ की जाती है। बाहर से देखने पर (उन्हें कैसा दिखता है, कोई नहंी जानता) ऐसा लगता है कि एक पशु अपनी प्रजाति को जारी रखने के प्रति त्याग करता है। इस तर्क का इस्तेमाल राज्य के खिलाफ व्यक्ति के अधिकारों के न होने को पुष्ट करने में किया जाता है। लेकिन मनुष्य और पशु के बीच एक अंतर यह है कि पूर्ण विकसित हो जाने के बाद एक पशु और विकसित नहीं होता, जबकि मनुष्य निरंतर विकसित होता रहता है। जहां तक हम समझ सकते हैं, पशुओं में इकलौती कसौटी शारीरिक रूप से दुरुस्त रहने की होती है, लेकिन मनुष्यों में अन्य कारक भी काम करते हैं। जिस चीज के पास जिजीविषा का मूल्य है, उसे तय नहीं किया जा सकता; मनुष्य उन्हीं व्यक्तियों के कारण अब तक बचा रह सका है जिनकी जिजीविषा किसी निश्चित समय के दौरान बहुत कम भी रही हो सकती है।

12. अपने वातावरण पर मनुष्य की नियंत्रण करने की क्षमता में वृद्धि के कारण कम से कम औद्योगिक देशों जैसे अमेरिका और इंगलैंड में, जहां जीवन स्तर काफी उच्च है, उसके लिए प्राकृतिक रूप से अच्छा जीवन बिता पाना मुश्किल होता जा रहा है और बुरा जीवन बिता पाना आसान होता जा रहा है। मान लें, कि कभी-कभार शरीर और मस्तिष्क दोनों के लिए ही टहल लेना फायदेमंद हो सकता है। यांत्रिक परिवहन के साधन आने से पहले मनुष्य पैदल चलता था क्योंकि वह और कुछ भी नहीं कर सकता था। वह प्राकृतिक रूप से अच्छे काम करता था। आज उसे चुनना होता है कि वह पैदल जाए या कार से जाए। जब कभी वह पैदल चल सकता हो, वह शायद कार से चल देता हो और इस तरह नैतिक रूप से वह गलत काम कर रहा होता है, और इसकी पूरी संभावना है कि वह ऐसा ही करेगा। इस समस्या का हल खोजना काफी निराशाजनक कार्य है जो फासीवादी नस्ली विचारधारा की कामयाबी के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है।
अनुवाद - अभिषेक श्रीवास्तव 

नोट- आडेन के लंबे निबंध का यह पहला अंश है। इस अंश का शीर्षक मैंने अपनी तरफ से लगाया है। इस निबंध के शेष दोनों अंश क्रमशः प्रस्तुत किए जाएंगे।

21 जनवरी 2010

मर नहीं गए मुक्त हो गए !

तबीयत कई दिनों से नासाज थी। थोड़ी राहत मिली कि हमारे पुराने मित्र अब्दुल्ला आ गए। हाल-चाल के बाद तय हुआ कि चलो कहीं चाय पीते हैं। अपने इलाके के चर्चित अड्डे एटीसी (अमरेकिन टी सेण्टर) तक हम गए। अमरीकन टी सेण्टर में बैठने के लिए पत्थर,पटिया वगैरह ही हैं। विश्वविद्यालय के छात्रों के अतिरिक्त कामगार वर्ग ही वहाँ का मुख्य ग्राहक है। चाय का आर्डर देकर हमने भी दो पत्थरों पर अपनी तशरीफ रख दी। दुनिया जहान की बातें होने लगीं। बात आईपीएल,राहुल गाँधी, ज्योति बसु, फैज से होती हुई घुम-फिर कर ठण्ड पर आ ठहरी। मैंने कहा मुझे गर्मी का मौसम ज्यादा पसंद है। अब्दुल्ला ने कहा, उसे ठण्ड बेइंतहा पसंद है। और कभी-कभी तो वो शीत-लहर में भी एक सूती शर्ट पहने रात को छत पर खड़ा हो ठण्ड का मजा लेता है। इसलिए वह चाहता है कि ऐसी ठण्ड कुछ दिन और रहे। मैंने प्रतिवाद करते हुए कहा, भाई जान हम जैसों का भी सोचो जिनकी ठण्ड से हड्डी तक गलने लगती है। गर हमारा न सोचना हो तो कम से कम उनका तो सोचो जिनके पास ठण्ड से बचने के लिए सिर पर छत और शरीर पर जरूरी गर्म कपड़े नहीं होते!

अब्दुल्ला के पास कोई जवाब नहीं था। उसने अपराधबोध के साथ भरे गले से कहा हाँ, गरीबों की सोचता हूँ तो लगता है गर्मी ही भली है। कहीं पड़ गए। कमजकम गर्मियों मे उनका सुकून से सोना तो हो जाता है। मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, आपको पता है अब तक इस ठण्ड ने सैकड़ों की जान ले ली है। अपने घरों से दूर कमाने आए,फुटपाथ पर सोने वाले कई कामगार लोग ठण्ड से मर गए। अब्दुल्ला ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि पास ही में दोनों घुटनों को पेट में घुसाए उकड़ूँ हो बैठै एक शख्स ने बीच में टोका। हम दोनों की निगाह एक साथ उस शख्स की तरफ घूम गई। हम समझ गए यह कोई रिक्शा चलाने वाला है जो कि अक्सर जगह का सुभीता होने से अपना रिक्शा किनारे खड़ा कर एटीसी पर चाय पीते रहते हैं। हम दोनों को बेसब्री से इंतजार था कि वह क्या बोलता है ? आखिर हमारी कौन सी बात उसे चुभी कि उसने हमें बीच में टोका? चाय का एक पूरा घँूट लेकर उसने अपने गले में उतारा। एक पुरसुकून इत्मिनान और आत्मविश्वास से भरी हुई ठण्ड से कांपती आवाज में उसने कहा, अरे, बाबू आप लोग तो साहब हो। पता न चलता होगा। हम से पूछो ! जानत हो महँगाई कितनी बढ़ गई है ! चीनी का दाम जानत हो ? प्याज का, मसाला का, दाल का, सब्जी.......

एक छोटी सी साँस ले कर वह आगे बोला....गरीब का पेट खाली और ऊपर से ठण्ड !! आप बाबूसाहेब लोग ऐसा क्यों सोचते हो कि फुटपथिए ठण्ड से मर गए। अरे साहब, इस महँगाई में,इस ठण्ड में उनका मरना ही भला। वो मर नहीं गए समझो मुक्त हो गए ! कम से कम उनके अपने शरीर का तो कष्ट कटा। जिनके लिए वो इस ठण्ड में घर-बार से इतनी दूर ठिठुर रहे थे आज नही ंतो कल महँगाई उन्हें यूँ भी लील जाएगी। कौन बचा लेगा ??

इतना कह कर वह एकदम से ही चुप हो गया। हम तीनों और आस-पास बैठा कोई शख्स कुछ नहीं बोला। हम सब के बीच एक लम्बा सन्नाटा खिंच गया। वहअपनी चाय खत्म कर चला गया। हम दोनों भी चाय खत्म कर चल दिए। अगले बीस मिनट तक हम साथ-साथ पैदल चलते रहे। मेरे घर का मोड़ आया तो हमने एक दूसरे को निगाहों-निगाहों में अलविदा कहा और चलते बने। दुनियाभर के फलसफों पर बात करने के शौकीन हम दोनों दोस्तों के पास उस बीस मिनट के दौरान एक-दूसरे से कहने के लिए शायद कुछ नहीं था। अब्दुल्ला के दिमाग में  न जाने क्या चल रहा था ? वो क्यूँ चुप था, पता नहीं ? लेकिन मेरे दिमाग में एक ही जुमला घुमड़-घुमड़ कर बज रहा था, मर नहीं गए मुक्त हो गए ! मर नहीं गए मुक्त हो गए !

12 जनवरी 2010

निबन्ध क्या है ?

रामचन्द्र शुक्ल (1884-1941)

यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है तो निबन्ध गद्य की कसौटी है भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबन्धों में ही सबसे अधिक सम्भव होता है। इसीलिए गद्यशैली के विवेचक उदाहरणों के लिए अधिकतर निबन्ध ही चुना करते हैं। निबन्ध या गद्यविधान कई प्रकार के हो सकते हैं- विचारात्मक,भावात्मक,वर्णनात्मक। प्रवीण लेखक प्रसंग के अनुसार इन विधानों का बड़ा सुन्दर मेल भी करते हैं। लक्ष्यभेद से कई प्रकार की शैलियों का व्यवहार देखा जाता है। जैसे,विचारात्मक निबन्धों में व्यास और समास की रीति,भावात्मक निबन्धों में धारा तरंग और विक्षेप की रीति। इसी विक्षेप के भीतर वह प्रलाप शैली आएगी। जिसका बंगला की देखा-देखी कुछ दिनों से हिन्दी में भी चलन बढ़ रहा है। शैलियों के अनुसार गुण-दोष भी भिन्न-भिन्न प्रकार के हो सकते हैं।

आधुनिक पाश्चात्य लक्षणों के अनुसार निबन्ध उसी को कहना चाहिए जिसमें व्यक्तित्व अर्थात व्यक्तिगत विशेषता हो। बात तो यह ठीक है, यदि ठीक तरह से समझी जाय। व्यक्गित विशेषता का यह मतलब नहीं कि उसके प्रदर्शन के लिए विचारों की श्रृखंला रखी ही न जाए या जान-बूझकर जगह- जगह से तोड़ दी जाय,भावों की वित्रितता दिखाने के लिए ऐसी अर्थ-योजना की जाय जो उनकी अनुभूति के प्रकृत या लोकसामान्य स्वरूप से कोई सम्बध ही न रखे अथवा भाषा से सरकस वालों की-सी कसरतें या हठयोगियांे के-से आसन कराए जाएँ जिनका लक्ष्य तमाशा दिखाने के सिवा और कुछ न हो।

संसार की हर एक बात और सब बातों से सम्बद्ध है। अपने-अपने मानसिक संघटन के अनुसार किसी का मन किसी सम्बन्ध-सूत्र पर दौड़ता है, किसी का किसी पर। ये सम्बन्ध-सूत्र एक-दूसरे से नथे हुए, पत्तों के भीतर की नसों के समान,चारों ओर एक जाल के रूप में फैले हैं। तत्व-चिंतक या दार्शनिक केवल अपने व्यापक सिद्धान्तों के प्रतिपादन के लिए उपयोगी कुछ सम्बन्ध-सूत्रों को पकड़कर किसी ओर सीधा चलता है और बीच के ब्योरों में कहीं नहीं फँसता। पर निबन्ध-लेखक अपने मन की प्रवृत्ति के अनुसार स्वछन्द गति से इधर-उधर फूटी हुई सूत्र-शाखाओं पर विचलता चलता है। यही उसकी अर्थ-सम्बन्धी व्यक्तिगत विशेषता है। अर्थ-सम्बन्ध-सूत्रों की टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ ही भिन्न-भिन्न लेखकों का दृष्टिपथ निर्दिष्ट करती हैं। एक ही बात को लेकर किसी का मन किसी सम्बन-सूत्र पर दौड़ता है, किसी काकिसी पर। इसी का नाम है एक ही बात को भिन्न-भिन्न दृष्टियों से देखना। व्यक्तिगत विशेषता का मूल आधार यही है।

तत्वचिंतक या वैज्ञानिक से निबन्ध-लेखक की भिन्नता इस बात में भी है कि निबन्ध-लेखक जिधर चलता है उधर अपनी समपूर्ण मानसिक सत्ता के साथ अर्थत् बुद्धि और भावात्मक ह्रदय दोनों लिए हुए। जो करुण स्थलों की ओर झुकता और गम्भीर वेदना का अनुभव करता चलता है। जो विनोदशील है उनकी दृष्टि उसकी बात को लेकर उसके ऐसे पक्षों की ओर दौड़ती है जिन्हें सामने पाकर कोई हँसे बिना नहीं रह सकता। इसी प्रकार कुछ बातों के सम्बन्ध में लोगों की बँधी हुई धरणओं क वपरीत चलने में लिस लेखक को आनन्द मिलेा वह उन बातों के ऐसे पक्षों पर वैचित्र्य के साथ विचरेगा जो उन धारणाअें को व्यर्थ या अपूर्ण सिद्ध करते दिखायी देंगे। उदाहरण के लिए आलसियों और लोभियों को लीजिए, जिन्हें दुनिया बुरा कहती चली आ रही है। कोई लेखक अपने निबन्ध में उनके अनेक गुणों को विनोदपूर्वक सामने रखता हुआ उनकी प्रशंसा का वैचित्र्यपूर्ण आनन्द ले और दे सकता है। इसी प्रकार वस्तु के नाना सूक्ष्म ब्योरों पर दृष्टि गड़ानेवाला लेखक किसी छोटी से छोटी,तुच्छ से तुच्छ,बात को गम्भीर विषय का-सा रूप देकर, पांडित्यपूर्ण भाषा की पूरी नकल करता हुआ सामने रख सकता है। पर सब अवस्थाओं में कोई बात अवश्य चाहिए।

इस अर्थगत विशेषता के आधार पर ही भाषा और अभिव्यंजना-प्रणाली की विशेषता-शैली की विशेषता-खड़ी हो सकती है। जहाँ नाना अर्थ-सम्बन्धों का वैचित्र्य नहीं, जहाँ गतिशील अर्थ की परम्परा नहीं, वहाँ एक ही स्थान पर खड़ी तरह-तरह की मुद्रा और उछल-मद दिखाती हुई भाषा केवल तमाशा करती हुई जान पड़ेगी।

9 जनवरी 2010

यह खेती भी खूब रही


फेसबुक का मैं सदस्य हूँ लेकिन उसपर मेरी सक्रियता बहुत कम है। फिर भी छठे-छमाहे देख लेता हूँ। फेसबुक पर एक खेल फार्मविले अति-लोकप्रिय है। यह खेल क्या है इसे जानने में मेरी कोई रूचि नहीं थी। न आज होती गर मेरे संग यह हादसा न हुआ होता। आज के आज इक्कीसवीं सदी की एक नवयुवती ने बताया कि आज-कल वो अपना टाइम पास फार्मविले खेल कर करती है। उसने कहा ,यह बहुत ही मजेदार खेल है। मैंने पूछा इसमें करना क्या होता है ? तो वह खेती-बाड़ी और पशुपालन में प्रयुक्त होने वाली शब्दावली का धड़ल्ले से प्रयोग करने लगी। कान्वेन्ट में पढ़ी लिखी, एक नामी-गिरामी मास-काम संस्थान की डिग्रीधारी नवयुवती को खेत-खलिहान, पशु-किसान की ऐसी जानकारी उपलब्ध कराने वाले फार्मविले महाराज को मैंने मन ही मन सादर प्रणाम किया। फार्मविले महाराज ने उस नवयुवती में आनलाइन किसानी के प्रति ऐसा आकर्षण भर दिया है कि वो इसके अलावा कोई बात ही नहीं करना चाहती ! और मुझे जैसे लोगों, जिन्हें इस किसानी का कखगघ नहीं पता, उनके अज्ञान और अभागेपन पर तरस खाती है !!

उसके सामने मैं  बुरी तरह झेप गया था। क्योंकि खेत तो मेरे पास भी हैं (जमीन पर न कि फेसबुक पर) लेकिन मुझे उसके जितनी खेती-बाड़ी की जानकारी नहीं है। खैर, फेसबुक के आने से पहले भी भारत एक कृषि प्रधान देश ही था।

6 जनवरी 2010

मौलिकता का मूल्य

महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938)
कुछ समय से , हिन्दी -साहित्य में, मौलिक रचना का महत्व खूब गाया जा रहा है। ऐसी रचनाओं की कमी ही नहीं,प्रायः अभाव ही सा बताया जा रहा है कि सामर्थ्य रखने वाल लेखकों को मौलिक ही पुस्तकों की रचना करनी चाहिए। इस पर प्रश्न हो सकता है कि मौलिक विशेषण का अर्थ क्या है ? कोशकार कहते हैं कि जिस वस्तु का मूल अर्थात् जड़ उसी में हो उसी को मौलिक कहते हैं। मतलब यह कि जिस पुस्तक में और कहीं से कुछ भी न लिया गया हो वही मौलिक है।

यह तो मौलिक शब्द का व्यत्पत्तिमूलक अर्थ् हुआ। इसी अर्थ को शायद ध्यान में रखकर हिन्दी-साहित्य से सम्बन्ध रखने वाली प्रतिष्ठित संस्थाएं मौलिक पुस्तकों के कर्ताओं को बड़े-बड़े पारितोषिक देने की घोषण करती हैं। परंतु जब मौलिक मानी गई पुस्तकें जांच करने वाले साहित्य शास्त्रियों के सामने जाती हैं तब और ही गुल खिलता है। तब तो वे लोग यदा-कदा औरों की लिखी हुई मूल पुस्तकों के भाष्यों और टीकाओं को भी मौलिक समझकर भाष्यकारों और टीका-लेखकों को भी उपहार का पात्र निश्चि कर देते हैं। इससे या तो यह सूचित होता है कोशकारों का किया हुआ, मौलिक शब्द का अर्थ परीक्षक पण्डितों को मान्य नहीं या पुस्तकं भेजने वाली और उपहार देने वाली संस्था के मौलिक-रचना सम्बन्धी नियमों के परिगलन की उन्हें परवाह नहीं। इससे यह भी सूचित होता है कि औरो के कथन को अपनी भाषा में अच्छी तरह समझा देने वाले या उसकी व्याख्या करने वाले लेखक भी मौलिक लेखक ही के सदृश महत्व रखते हैं।

संसार में ज्ञान की उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। मनुष्यों पर अपने पूर्ववर्ती पुरुषों के ज्ञानोपदेश का असर पड़े बिना नहीं रहता। यही हाल लेखकों का भी है। किसी विषय पर कुछ लिखने वाले लेखक के ह्रदय में उस विषय की दृष्टपूर्व पुस्तकों के भाव जरूर ही जागृत हो उठते हैं। जिसने कालिदास या भारवि या शेक्सपियर आदि महाकवियों के काव्यों का परिशीलन किया है वह यदि उन्हीं काव्यों में वर्णित विषयों पर कविता लिखने बैठेगा तो यह संभव नहीं कि उसी रचना में उनके भावो की कुछ न कुछ छाया न आ जाए। इस दशा में सर्वतोभाव से मौलिक रचन करना परम दुस्तर है। ऐसे लेखक दुनिया में बहुत ही थोड़े हुए हैं जिन्होंने अपने पूर्ववर्ती ग्रन्थकारों के संचित ज्ञान से, अपनी रचनाओं में, कुछ भी लाभ न उठाया हो। सर जगदीशचन्द्र  बसु ने कितने ही नए-नए और अद्भूत आविष्कार किए हैं और उनका विवेचन बड़े-बड़े ग्रन्थों में किया है। आप उनकी पुस्तकों को पढ़िए। आप देखेंगे कि उन्होंने अपने पूर्ववर्ती विज्ञान-वेत्ताओं के द्वारा संचित ज्ञान से कितना लाभ उठाया है। यह कोई नई बात नहीं। यह बात लेखक या विज्ञानवेत्ता की न्यूनता या क्षुद्रता की भी द्योतक नहीं। दूसरों के द्वारा प्राप्त ज्ञान के लाभ उठाने की परिपाटी तो परम्परा ही से चली आ रही है। और,पूर्वजों के इस ऋण से बचने का कोई उपाय भी तो नहीं। सभी लेखक-सभी ग्रन्थकार-अपने पूर्ववर्ती पण्डितों के ज्ञान से अपनी ज्ञान-वृद्धि करते चले आ रहे हैं। यह क्रम आज का नहीं बहुत पुराना है और सतत जारी रहेगा। यदि ऐसा न होता तो मनुष्य-समुदाय आज ज्ञानार्जन की जिस सोपान पंक्ति पर पहुंचा है उस पर कदापि न पहुंचता।

अतएव विवेचन जनों को देखना चाहिए कि जो पुस्तक उनके हाथ में है या जिसकी वे समालोचना करने जा रहे हैं उसमें ज्ञानवर्धन की कुछ सामग्री है या नहीं। अर्थात जिन लोगों के लिए वह लिखी गई है उनके लिए वह सामग्री उससे अच्छे रूप् में अन्यत्र सुलभ है या नहीं। यदि है और हाथ में ली हुई पुस्तक में कुछ भी, किसी तरह की विशेषता नहीं तो उसे महत्वहीन समझना चाहिए। यदि यह बात नहीं और उस पुस्तक से उसके विषय के किसी भी अंश की कमी दूर हो सकती है तो वह अवश्य ही अवलोकनीय है।

परंपरा नामक स्तम्भ में हिन्दी के दिवंगत लेखकों की प्रासंगिक गद्य-रचनाएं प्रस्तुत करने का प्रयास रहेगा।