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1.अच्छाई को परिभाषित करने से ज्यादा आसान है उसका बोध; अच्छे पात्रों को सिर्फ महान उपन्यासकार ही गढ़ सकते हैं। मेरे लिए सबसे कम असंतोषजनक विवरण यही कहना होगा कि कोई भी चीज या जीव जो अपने काम को कायदे से कर रहा हो, अपनी प्रकृति और वातावरण द्वारा प्रदत्त अधिकारों का पूरा प्रयोग कर रहा हो, वह अच्छा है- हालांकि हमें याद रखना चाहिए कि ‘प्रकृति’ और ‘वातावरण’ एक एकल और निरंतर परिवर्तित होती वास्तविकता के बौद्धिक अमूत्र्तकरण हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि वे लोग खुश और अच्छे हैं जिन्हें उनका काम मिल गया हैः ये काम कैसे होंगे, यह उस समाज पर निर्भर करेगा जिसमें ये काम किए जाते हैं।
अच्छाई दो किस्म की होती है, ‘प्राकृतिक’ और ‘नैतिक’। एक जीव प्राकृतिक रूप में अच्छा होता है जब वह अपने वातावरण के साथ संतुलन की स्थिति हासिल कर ले। सभी स्वस्थ पशु और पौधे इस अर्थ में प्राकृतिक रूप से अच्छे हैं। लेकिन, कार्य करने की अधिक स्वतंत्रता की ओर होने वाला कोई भी बदलाव नैतिक रूप से अच्छा बदलाव है। मुझे लगता है कि एक अनुकूल रूपांतरण पर नैतिक रूप से एक अच्छे काम की तरह बात की जा सकती है। नैतिक अच्छाई भी प्राकृतिक अच्छाई में तब्दील होती है। एक परिवर्तन होता है और एक नया संतुलन बन जाता है। मनुष्य के नीचे की प्रजातियों में यह तत्काल होता हैः प्रत्येक प्रजाति के लिए स्वतंत्रता की दिशा में होने वाला परिवर्तन खुद को दोहराता नहीं है। मनुष्य में यह जारी रह सकता है और नैतिक स्वतंत्रता के प्रत्येक चरण के बाद वैसा ही एक नया चरण आता है। मसलन, हम अक्सर अनपढ़ किसानों की ‘अच्छाई’ की सराहना करते हैं जब हम शहरवासियों की ‘बुराई’ से उसकी तुलना करते हैं। लेकिन, यह एक रूमानी किस्म का भ्रम है। किसान में हम जिस अच्छाई की सराहना कर रहे होते हैं, वह नैतिक नहीं, प्राकृतिक होती है। एक बार जब किसान के जीवन में मनुष्य की अधिकतम शक्तियों का उच्चतम उपयोग उसके काम करने की स्वतंत्रता की आखिरी सीमा तक हो चुका हो, तो यह बात सही नहीं रह जाती। शहरियों के पास ढेर सारे विकल्प होते हैं और अपनी ताकत का प्रयोग करने के ज्यादा अवसर होते हैं। वह अक्सर गलत चुन लेता है और इसीलिए नैतिक रूप से बुरा हो जाता है। हम जब इसके लिए उसकी निंदा करते हैं तो हम सही होते हैं, लेकिन यह कहना कि हम सभी एक किसान के जीवन में वापस लौट जाएं, नैतिक प्रगति की संभावना से इनकार करना होगा। इसी तरह युवावस्था की अर्चना एक अन्य किस्म का रूमानी निराशावाद है।
2.इसी तरह प्राकृतिक और नैतिक बुराई होती है। चुनने और काम की स्वतंत्रता की निश्चित सीमाएं, जैसे कि खाने और रहने के लिए जीवन को नष्ट करने की अनिवार्यता, जलवायु, दुर्घटनाएं, ये सभी प्राकृतिक बुराइयां हैं। दूसरी ओर एक बोर्डिंग हाऊस का रखवाला होने के नाते यह जानते हुए कि विटामिन स्वास्थ्य के लिए जरूरी है, लाभ कमाने या अपने आलस्य के कारण अतिथियों को अपर्याप्त भोजन देता रहूं, तो मैं नैतिक बुराई कर रहा होउंगा। जिस तरह नैतिक अच्छाई प्राकृतिक अच्छाई में तब्दील हो जाती है, ऐसे ही इसके उलट प्राकृतिक बुराई ज्ञान के विकास के साथ नैतिक बुराई में तब्दील हो जाती है।
3. इस धरती पर जीवन का इतिहास उन तरीकों का इतिहास है जिनके माध्यम से जीवन ने अपने वातावरण पर नियंत्रण पाया है और स्वतंत्रता हासिल की है। जीव किसी वातावरण में रहने के हिसाब से खुद को या तो ढाल लेते हैं, जैसे कि एक नागफनी की पत्तियां जो रेगिस्तान के हिसाब से बन जाती हैं- या फिर जीव खुद अपने वातावरण को बदलने के तरीके ईजाद कर लेते हैं। मनुष्य के नीचे के स्तर पर यह प्रगति संरचनागत जैविक बदलावों के माध्यम से हुई है जो रूपांतरण के अभाव या प्राकृतिक चयन की प्रायक्तिा पर निर्भर है। सिर्फ पुरुष ही अपनी सचेतन मेधा के सहारे अपने जैविक विकास के बाद भी अपना विकास क्रम जारी रखता है। भौतिक जगत के कानूनों को समझकर उसने उन पर बड़े पैमाने पर नियंत्रण कर लिया है और यहां तक कि वह जिस समाज और प्रकृति में रहता है, उनके भी कानून समझकर ऐसी स्थिति में पहुंचने की कोशिश करने लगता है जहां वह जो चाहता है, वह हो सकता है। ‘स्वतंत्रता’, जैसा कि एक प्रसिद्ध परिभाषा कहती है, ‘अपनी आवश्यकता को जानना है।’
4. एक पशु के रूप में मनुष्य की विलक्षणता उसके क्रमिक गति से अविशिष्ट और विवेकपूर्ण होने में है। अन्य सभी पशु ज्यादा तेजी से विकसित होते हैं और समाप्त हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो आनुवंशिकता का प्रभुत्व मनुष्य में सबसे कमजोर होता है। उसके पास वातावरण के चुनाव के व्यापक विकल्प हैं और उसके बदले में वातावरण या प्रकृति या फिर उसके सामाजिक जीवन में होने वाले बदलावों का उस पर सबसे ज्यादा असर होता है।
5. जैविक सर्वोच्चता के मामले में अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी कीड़ों के मुकाबले मनुष्य के पास एक विशिष्टीकृत और केंद्रीकृत स्नायु तंत्र होता है और बाकी अंग विशिष्टीकृत नहीं होते। जो प्रतिक्रियाएं वह प्राप्त करता है, वे एक ही अंग में संग्रहित हो जाती हैं। एक ही जगह पर एक से ज्यादा प्रतिक्रिया यदि मौजूद हो, तभी विवेक और चुनाव का सवाल पैदा होता है।
6. मनुष्य हमेशा से समुदायों में रहने वाला एक सामाजिक प्राणी रहा है। यह सामाजिक अनुबंध के किसी भी सिद्धांत को झुठलाता है। निर्वात में किसी व्यक्ति की कल्पना एक बौद्धिक अमूर्तिकरण ही है। व्यक्ति सामाजिक जीवन का उत्पाद है; उसके बगैर वह कुछ स्वाभाविक क्रियाओं के समुच्चय के अलावा और कुछ नहीं रह जाएगा। मनुष्य न तो स्वतंत्र और न ही भला जन्म लेता है।
7. समाज और संस्कृतियों में भारी अंतर होते हैं। कुल मिला कर इस मामले में मुझे मार्क्स ठीक जान पड़ते हैं जो कहते हैं कि भौतिक परिस्थितियां और आर्थिक उत्पादन के रूप ही समुदायों का स्वरूप तय करते हैंः मसलन, एशियन पेनिनसुला की भौगोलिक विशिष्टताओं के कारण ही छोटे लोकतांत्रिक शहरनुमा राष्ट्रों का जन्म हुआ, जबकि नदी के किनारे बसी सभ्यताएं जैसे मिस्र और मेसोपोटामिया केंद्रीकृत शासन वाले साम्राज्य बन कर रह गईं।
8. लेकिन हम सभी अपने प्रति एक सोचने-समझने और चाहने वाले जीव के रूप में सचेतन रहते हैं और इसी समग्र का ज्ञान भी हमारे पास होता है। यह अनुभव हमारी सोच को बनाता है। मैं यह नहीं समझ पाता कि अन्य समुच्चय जैसे परिवार, वर्ग, राष्ट्र आदि कैसे हमारे समुच्चय हो सकते हैं, सिवाय इसके कि इनका एक विवरणात्मक अर्थ है। हम राज्य को नहीं देखते, बल्कि उसे व्यक्तियों के समूह के रूप में देखते हैं। विभिन्न समुदायों का नृशास्त्रीय अध्ययन, जैसा कि डाॅक्टर बेनेडिक्ट ने आदिम अमेरिकी संस्कृतियों पर किया या फिर लिंड ने समकालीन मिडलटाउन पर किया, दिखाता है कि किसी सांस्कृतिक रूप में कितनी ताकत होती है कि वह उसके तहत जीने वाले व्यक्तियों की प्रकृति को बदल देता है। एक निश्चित सांस्कृतिक स्वरूप अपने अनुकूल आचार के चरित्र और माध्यमों का विकास करता है और उन्हें दबा देता है जिनका उसके लिए कोई मूल्य नहीं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी संस्कृति को हम महान व्यक्तित्व के सृजन से जोड़ दें, जो कि अपने घटकों के प्रति सचेत हो, ठीक वैसे ही जैसे मैं अपने हाथ या यकृत के प्रति सचेत हो सकता हूं। एक समाज विशिष्ट तरीके से एक निश्चित जगह और निश्चित काल में रहने वाले व्यक्तियों से मिल कर बना होता है, उसके अलावा यह कुछ नहीं।
9. सरकार और समाज के बीच लाॅक द्वारा किया गया अंतर काफी महत्वपूर्ण है। एक बार फिर मार्क्स मुझे सही लगते हैं जब वह कहते हैं कि संप्रभुता या सरकार किसी समाज द्वारा लिए गए ठेके का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह हमेशा समाज के उन कुछ लोगों से पैदा होते हैं जिनके हाथों में उत्पादन के औजार हैं। अधिकारों के सिद्धांत किसी सामाजिक रूप को सही ठहराने या गलत करार देने के लिए पैदा होते हैं और ये सामाजिक तनाव का एक संकेत हैं। बर्क और अन्य विचारक, जिन्होंने राज्य के एक आदर्शवादी सिद्धांत की परिकल्पना की, वे सामाजिक अनुबंध की पूर्व प्रस्थापना की आलोचना कर सही कर रहे थे और उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया कि समाज एक वृद्धि करता हुआ जैव तत्व है। लेकिन समाज और सरकार की पहचान करते वक्त उन्होंने सरकार द्वारा समाज के प्राकृतिक विकास में किए जाने वाले हस्तक्षेप को नजरअंदाज कर दिया, लिहाजा वे समाजों द्वारा सरकारों के प्रति विद्रोह करने के अधिकार को खारिज कर गए और राज्य के संरक्षण में यथास्थितिवाद के समर्थक हो गए।
10. प्रत्ययवादी राजनीतिक विचारक राज्य की तुलना अक्सर शरीर से करते हैं। यह तुलना गलत है। शरीर में कोशिकाओं के घटक तत्व सुनिश्चित हैं। स्नायु कोशिकाएं और ज्यादा स्नायु कोशिकाओं को जन्म दे सकती हैं; मांसपेशियों की कोशिकाएं अपने जैसी कोशिकाओं को इत्यादि। लेकिन माता से शिशु बनने के संक्रमण काल में आनुवंशिक कारकों का समूचा समुच्चय ही बदल जाता है। राजा का बेटा मानसिक रूप से विकलांग हो सकता है जबकि कोयला ढोने वाले का बेटा गणित का विद्वान बन सकता है। प्रतिभाओं और क्षमताओं का समूचा रुझान पीढ़ियों के साथ बदलता रहता है।
11. एक अन्य भ्रामक तुलना पशु साम्राज्य के साथ की जाती है। बाहर से देखने पर (उन्हें कैसा दिखता है, कोई नहंी जानता) ऐसा लगता है कि एक पशु अपनी प्रजाति को जारी रखने के प्रति त्याग करता है। इस तर्क का इस्तेमाल राज्य के खिलाफ व्यक्ति के अधिकारों के न होने को पुष्ट करने में किया जाता है। लेकिन मनुष्य और पशु के बीच एक अंतर यह है कि पूर्ण विकसित हो जाने के बाद एक पशु और विकसित नहीं होता, जबकि मनुष्य निरंतर विकसित होता रहता है। जहां तक हम समझ सकते हैं, पशुओं में इकलौती कसौटी शारीरिक रूप से दुरुस्त रहने की होती है, लेकिन मनुष्यों में अन्य कारक भी काम करते हैं। जिस चीज के पास जिजीविषा का मूल्य है, उसे तय नहीं किया जा सकता; मनुष्य उन्हीं व्यक्तियों के कारण अब तक बचा रह सका है जिनकी जिजीविषा किसी निश्चित समय के दौरान बहुत कम भी रही हो सकती है।
12. अपने वातावरण पर मनुष्य की नियंत्रण करने की क्षमता में वृद्धि के कारण कम से कम औद्योगिक देशों जैसे अमेरिका और इंगलैंड में, जहां जीवन स्तर काफी उच्च है, उसके लिए प्राकृतिक रूप से अच्छा जीवन बिता पाना मुश्किल होता जा रहा है और बुरा जीवन बिता पाना आसान होता जा रहा है। मान लें, कि कभी-कभार शरीर और मस्तिष्क दोनों के लिए ही टहल लेना फायदेमंद हो सकता है। यांत्रिक परिवहन के साधन आने से पहले मनुष्य पैदल चलता था क्योंकि वह और कुछ भी नहीं कर सकता था। वह प्राकृतिक रूप से अच्छे काम करता था। आज उसे चुनना होता है कि वह पैदल जाए या कार से जाए। जब कभी वह पैदल चल सकता हो, वह शायद कार से चल देता हो और इस तरह नैतिक रूप से वह गलत काम कर रहा होता है, और इसकी पूरी संभावना है कि वह ऐसा ही करेगा। इस समस्या का हल खोजना काफी निराशाजनक कार्य है जो फासीवादी नस्ली विचारधारा की कामयाबी के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है।
अनुवाद - अभिषेक श्रीवास्तव
नोट- आडेन के लंबे निबंध का यह पहला अंश है। इस अंश का शीर्षक मैंने अपनी तरफ से लगाया है। इस निबंध के शेष दोनों अंश क्रमशः प्रस्तुत किए जाएंगे।
