30 मार्च 2010

सीमा अरुंधती नहीं हैं, इसलिए शोर नहीं मचा

आवेश तिवारी
सीमा आजाद की गिरफ्तारी के 24 घंटे भी नहीं हुए थे, जब उनके एक बेहद करीबी दोस्त ने, जो एक नामचीन कवि भी हैं, उनसे कोई नाता होने से इनकार कर दिया था। सीमा की एक और मित्र, जिसे खुद की गिरफ्तारी का भी अंदेशा बना हुआ था, पुलिसवालों से मिलकर अपनी साफगोई बयान कर रही थी। सीमा की गिरफ्तारी के बाद जिन लोगों ने संसद भवन के बाहर धरना दिया था, उनमें से एक ने मुझसे फोन पर बच-बचा कर लिखने को कहा और बोला कि इस तरह से उसके पक्ष में लिखोगे तो पुलिस तुम्हे नहीं छोड़ेगी। उन्होंने ये भी कहा कि “यार मैं नहीं जानती थी, पूरे एक ट्रक नक्सली सामग्री बरामद हुई है। मुझसे एसटीएफ का एसपी कह रहा था, सीमा हार्डकोर नक्सली है और हमें ये सच मानना ही होगा। मैंने तो अरुंधती और सब लोगों को ये सच बता दिया है।” एक साहसिक पत्रकार की मनमाने ढंग से की गयी गिरफ्तारी पर उत्तरप्रदेश सरकार के सामने अपना अधोवस्त्र खोल कर बैठे अखबारों के पास कहने को कुछ भी नहीं था। मोहल्ला थोड़ा बहुत कराहने के बाद चुप हो गया था। साथियों, शुभचिंतकों के चेहरे बदलने लगे थे। उधर नैनी जेल की सीलन भरी कोठरी में बंद सीमा महिला कैदियों को अपना मनपसंद गीत सुना रही थी…

तीन गज की ओढ़नी, ओढनी के कोने चार,
चार दिशाओं का संसार,
ओढ़नी के कोने चार हर दो कोने बीच दीवार,
दीवार बना हैं घूंघट, घूंघट अंदर है घुटन,
घुटन भरी है जिंदगी,
ओढ़नी है जिंदगी, जिंदगी है ओढ़नी

अन्याय और शोषण के विरुद्ध शुरू किये गये अपने एकल युद्ध में अकेले खड़ी थी सीमा। आज ये पोस्ट लिखने से पहले जब मैंने सीमा के एक पत्रकार मित्र से बात की, तो उन्होंने पहले तो कुछ भी बात करने से मना कर दिया लेकिन बहुत जद्दोजहद करने पर उन्होंने कहा, “वो सिर्फ दोस्त थी। सबसे करीबी दोस्त नहीं। हमें लोकतंत्र में सत्ता की ताकत का अंदाजा है। सीमा को शायद नहीं था या फिर वो उसे अनदेखा कर रही थी।” वो कहते हैं, “सीमा का हम चाह कर भी सहयोग नहीं कर सकते, क्योंकि हमारे पास इतनी ताकत और इतना बड़ा समूह नहीं कि सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सके।” शायद सीमा ने इस नपुंसकता को पहचानने में देर कर दी और भीड़ के पीछे खड़ा होने का मुगालता पाले सलाखों में जकड़ दी गयी।

अरुंधती राय जैसी प्रगतिशीलता का वो अत्याधुनिक चेहरा नहीं थीं, जिसके पीछे पूरी भीड़ हो। वो मृणाल पांडेय या शोभा डे भी नहीं थी कि उनके खांसने की भी खबर प्रकाशित होती। वो सीमा थी। कभी गोरखपुर के इंसेफेलाइटिस प्रभावित इलाकों में अकेले घूमते हुए – इलाहाबाद के यमुना पार के इलाकों में मजदूरों को माफियाओं के जुल्मोसितम के खिलाफ आवाज उठाने को संगठित करती हुई सीमा का कसूर ये था कि उसके लिए खबरें सिर्फ अखबार के पन्नों पर छपी इबारत नहीं थी, जिसे पढ़ने के बाद आम आदमी अपने बच्चों का पखाना पोंछता है, उसके लिए खबरों का मतलब था कि जिनके लिए लिखो, उन्हें अपनी खबर से कुछ दो। उसका कसूर ये भी था कि वो इलाहाबाद के उन पत्रकारों की जमात का हिस्सा नहीं थी, जिनके लिए थाने की चाय अमृत का प्याला होती है और सिविल लाइन चौराहे पर देर रात तक चलने वाली गप्पबाजियां अखबारनवीस होने का प्रमाणपत्र।

सीमा की गिरफ्तारी के पहले और बाद में मीडिया मैनेजमेंट के लिए पुलिस ने क्या क्या किया और किस किस पत्रकार ने क्या क्या पाया, ये अपने आप में बड़ी रोमांचक कहानी है। इलाहाबाद के डीआईजी के घर में सीमा की गिरफ्तारी से महज कुछ घंटे पहले बैठकर चाय पीने और एसटीएफ के एसपी नवीन अरोरा को सीमा के खिलाफ हल्ला बोलने का आश्वासन देने वालों के चेहरे उतने ही काले हैं, जितनी कि उनकी कलम की रोशनाई। सीमा की गिरफ्तारी और उसके बाद मीडिया के एक वर्ग द्वारा पुलिस की भाषा में की गयी क्राइम रिपोर्टिंग ने ये साबित कर दिया कि उत्तर प्रदेश में पुलिस अपनी सफलताओं का तानाबाना दल्ले पत्रकारों और टायलेट पेपर सरीखे अखबारों के मालिकानों की मिलीभगत से तैयार कर रही है। होड़ इस बात की लगी है कि कौन सा समूह और कौन सा पत्रकार सरकार और सरकार के नुमाइंदों के सबसे नजदीक है। ये शत प्रतिशत सच है कि पुलिस द्वारा न सिर्फ माओवादियों के नाम पर की जा रही गिरफ्तारियां, बल्कि नक्सल प्रभावित इलाकों में आदिवासी जनों का उत्पीड़न भी मीडिया की सहमति से हो रहा है। ये बात दिल्ली, मुंबई में बैठे पत्रकार भले न मानें मगर ये सच है कि उत्तर प्रदेश में अखबार वाले बलात्कार से लेकर हत्याओं तक की खबरें दारू की बोतलों की कीमत पर गटक कर जा रहे हैं। ये तो गनीमत है कि पत्रकारों की हत्या नहीं हो रही है। अगर कल को पुलिस नक्सली बताकर किसी पत्रकार को गोली मार दे तो उसमें भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

अभी पिछले पखवारे जब कमलेश चौधरी की फर्जी मुठभेड़ में हत्या और उसके बाद सीमा की फर्जी तरीकों से की जाने वाली गिरफ्तारी से संबंधित खबर डेली न्यूज एक्टिविस्ट में छपी। अगले ही दिन प्रदेश के एक बेहद चर्चित और जनसत्ता में नियमित तौर पर लिखने वाले एक पत्रकार ने लखनऊ में एसटीएफ मुख्यालय से मुझे फोन करके कहा कि आवेश भाई आप नहीं जानते, मैंने आज माओवादियों का वो रजिस्टर देखा जिसमें सीमा के दस्तखत थे। वो और उसका पति तो बकायदा माओवादियों की साजिशों के सूत्रधार की भूमिका में थे। आप एक बार आकर यहां अधिकारियों से मिल लीजिए। आपकी सीमा को लेकर धारणा बदल जाएगी। मेरी धारणा बदली या नहीं बदली, उस दिन जो पत्रकार एसटीएफ मुख्यालय में मौजूद थे, उन लोगों ने बारी बारी से सीमा के खिलाफ खबरें निकालने का सिलसिला शुरू कर दिया और उन पत्रकार महोदय को जिन्होंने मुझे फोन पर सच्चाई का ज्ञान कराया था, नक्सल प्रभावित इलाकों में पंफलेट और पोस्टर छपवाने एवं उत्तर प्रदेश पुलिस के नक्सली उन्मूलन को लेकर की जा रही कवायद को लेकर एक बुकलेट छपवाने का ठेका मिल गया। वो ये काम पहले भी करते आये हैं और इस काम में वे इलाहाबाद के एक प्रिंटिंग प्रेस की मदद से लाखों की कमाई पहले भी करते आये हैं।

अभी कुछ नहीं कहा जा सकता कि सीमा कब तक जेल में रहेगी। इसका भी कोई अंदाजा नहीं कि कब कौन और कैसे माओवाद के नाम पर सलाखों के पीछे धकेल दिया जाएगा। लेकिन ये तय है कि हर एक बार जब कोई कलम से क्रांति की बात करने वाला सत्ता की खुराक बनेगा, जूठन खाने को चील कौवों की तरह मीडिया के ये शिखंडी भी मौके पर मौजूद रहेंगे।

लेखक  हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख हैं।

28 मार्च 2010

बनवास

सीता को देखे सारा गाँव
आग पे कैसे धरेगी पाँव

बच जाए तो देवी माँ है
जल जाये तो पापन
जिसका रूप जगत की ठण्डक
अग्नी उसका दरपन ?

सब जो चाहें सोचें समझें
लेकिन वो भगवान्
वो तो खोट कपट के बैरी
वो तो नहीं नादान !

अग्नी पार उतर के सीता
जीत गयी विश्वास
देखा दोनों हाथ बढ़ाए
राम खड़े थे पास
उस दिन से संगत में आया
सचमुच का बनवास।।
जहरा निगाह (पाकिस्तानी कवयित्री)

26 मार्च 2010

तू औरत है औरत...प्रतिक्रिया ना दे!!!

शादी से पहले यौन सम्बन्ध बनाना अपराध नहीं है फिर भी  इन मुद्दों को Complicated बना कर मजेदार तरीके से परोसना, डिस्कशन करते वक़्त चेहरे पर एक घटिया मुस्कराहट ले आना, चीप लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते हुए पर्सनल प्रहार बेहद आम है। जब भी इस तरह के किसी मुद्दे पर टीवी शो में किसी महिला को बुलाया जाता है तो कुछ मर्दों को घटियापन पर उतरते देर नहीं लगती... डिबेट प्रोग्राम्स में पूजा भट्ट पर बातों बातों में कीचड़ उछालना लगभग सभी ने देखा होगा. एक सज्जन ने एक शो में बहस के दौरान स्ट्रगलिंग एक्ट्रेस प्रीती को कहा था 'अगर आप को सड़क चलते कुछ भी पहनने का अधिकार है, तो मुझे भी आपके साथ कुछ भी करने का अधिकार है' !

यौन सम्बन्ध अपराध हो ना हो पर ऐसे टुच्चे शब्दों का इस्तेमाल उस  मानसिकता को दिखाता है जो पूरे समाज पर छाई हुई है.

अगर आपको अपनी So Called आबरू प्यारी है तो इनसे लड़ा भी नहीं जा सकता...लफ़्ज़ों से आपके कपड़े नोच लेंगे, नज़रों से आप को बेआबरू कर देंगे...मज़े की बात तो ये है की ये वही लोग हैं जो नारी जाति की भलाई और इज्ज़त की दुहाई देते हैं !  जबकि खुद मौका मिलते ही अपना नकाब उतार फेंकते हैं, उस परदे के पीछे का चेहरा सड़क चलते लड़कियों की कमर पर हाथ मार कर निकल जाने वालों से हुबहू मिलता है।

शादी के बाद पति की पत्नी पर जोर ज़बरदस्ती को ये कह कर ढंका जाता है की पत्नी अगर शारीरिक ज़रूरतों को पूरा नहीं करेगी तो पति बाहर का रास्ता देखेगा. वहीँ अगर यही बात पत्नी पर लागू की जाए तो वो औरत बदचलन कहलाएगी. अगर दो लोग अपनी मर्ज़ी से करीब आते हैं तो इस पर ख़राब करेक्टर का दोष भी लड़की पर. अभी हाल ही में एक किस्सा बहुत करीब से देखा एक कपल को ऑफिस में 'किस' करते देखा गया. (व्यक्तिगतरूप से मैं मानती हूँ की Personal रिश्तों को प्रोफेशनल जगहों से दूर रखना चाहिए या कम से कम प्रोफेशनली बिहेव करना ही चाहिए). इन हालात में वही हुआ जो होता आया है. लड़की को Terminate कर दिया गया जबकि वो लड़का अब भी ऑफिस में धड़ल्ले से काम करता है हँसता बोलता है।

किसी भी फिसिकली इन्वोल्व्मेंट में लड़की का ही सर झुकता है जबकि उसमें आदमी और औरत दोनों भागीदार होते हैं.

कहते हैं औरत की इज्ज़त लुट गयी...अरे काहे की इज्ज़त जो कुछ हुआ उसमें क्या लड़कों का कोई Role नहीं होता या तो दोनों की इज्ज़त लुटी या तो किसी की भी नहीं...इज्ज़त का टोकरा औरत ही क्यूँ उठाये ??

कभी अपना दुपट्टा सही से ओढ़ लो और कहीं अपना मुँह  चुपचाप बंद कर लो.....तुम औरत हो औरत, प्रतिक्रिया देना तुम्हारा काम नहीं !
फौज़िया रियाज़
iamfauziya.blogspot.com

25 मार्च 2010

एक ऐसी प्रजाति जिसने अपनी संततियों का सारा हिस्सा खा लिया !

देवेन्द्र
आदमी का इतिहास जब कभी सही ढ़ग से लिखा जायेगा तो चाहे उसमें चक्रवर्ती सम्राटों और उनकी लड़ाइयों का जिक्र न हो, गौरैया का जिक्र जरूर होगा! बगैर गौरैया, आदमी और उसकी कलाएं, कल्पनाएं, सुख-दुख के किस्से, उसके संगीत, उसकी प्रेम कहानियों के बारे में कुछ जान पाना संभव नही होगा। गौरैया की नन्ही आँखों में एक दिन जरूर लिखा और पढ़ा जायेगा सभ्यता का क्रूर इतिहास।

यह कोई पुरानी बात नही है। अभी कल तक गाँव के हमारे घरों में, हमारे बीच गौरैयों के झुण्ड रहा करते थे। बैलों के हरे चारे और सूखे पुवाल की गन्ध में चहचहांती, उड़ती-फ़ुदकती गौरैया सुबह-सबेरे सूरज की किरणों से पहले ही चली आती थीं। काम से फ़ुर्सत पाकर माँ जब कभी देहरी पर बैठतीं, गिलहरी और गौरैयों का झुण्ड उन्हे घेर लेता था। हमारे चारों तरफ़ बिखरे अन्न के दानों पर ही वो पलती थीं।

 माँ को विश्वास था कि हमारे अनाम पुरखे गौरैयों की शक्ल में हमें देखने-सुनने आते हैं। कैंसर से असहनीय दर्द से तड़पती-छटपटाती मेरी माँ का चेहरा गौरैया की तरह हो गया था। अन्न के दानों को अपनी नन्ही चोंच में दबाये वे अपने घोसलों में जाती थीं, जहाँ उनके बच्चे चीं...चीं..करते बेसब्री से उनकी प्रतीक्षा करते थे। एक आत्मीय उल्लास का मोहक संगीत हर समय हमारे चारो तरफ़ बजता रहता था। वे हमारे अभावों और संपन्नता के दिन थे। इन्ही चिड़ियों के पंख लेकर माँ के किस्सों और हमारे सपनों में परिया आती थीं। देखा जाए तो हमारा बचपन इन्ही के बीच पला और विकसित हुआ है।

विज्ञान ने प्रकृति के सारे रहस्यों को खोलकर आदमीं को सौप दिया है, दर्प और हठधर्मिता के आंकठ मे डूबी आज की सभ्यता मनुष्य को खतरनाक रास्तों की ओर ले जा रही है। वर्तमान हमेशा सफ़ल और शक्तिशाली लोगों का होता है। इतिहास सार्थक लोगों का। अगर स्वयं द्वारा किया गया मूल्यांकन ही अन्तिम सच होता तो सटोरियों और गिरहकटों को भी गलत साबित कर पाना ना-मुमकिन होगा।

प्रकृति के सारे संतुलन केन्द्रों को रात-दिन लगातार क्षति-ग्रस्त करते हुए चाहे हम खुद को कितना भी श्रेष्ठ कह लें, लेकिन यह तय है, कि हमारे विकास का वर्तमान ढ़ाचा क्षण-प्रतिक्षण मनुष्यता की बची-खुची संभावनाओं को लीलता जा रहा है। मशीनें मनुष्य को विस्थापित कर रहीं है। तकनीक और बाजार के संयुक्त दुश्चक्र में मनुष्य के भीतर से मनुष्यता का विस्थापन भयावह रूप से जारी है। हमने गौरैया के घोसले उजाड़ डाले है। नोच डाले गये उनके मुलायम पंख, जो हमें गर्मी की दुपहरी में अपने ठण्डे स्पर्श से सहलाते थे।

न्यूयार्क और वाशिंगटन की तर्ज पर जगह-जगह उगने वाले कंक्रीट के जंगलों में हमारी सभ्यता का भयावह कब्रगाह तैयार हो रहा है। मृत्यु लेख पर अनिवार्य रूप से दर्ज किया जा चुका है- “एक ऐसी प्रजाति, जिसने अपनी संततियों का सारा हिस्सा खाने के बाद अपनी भूख से तड़प कर सामूहिक आत्महत्या कर ली थी” जीवन के स्रोत सूखते जाएं और जीवन लहलहाता रहेगा- इस पागल कल्पना की गुंजाइस बहुत दूर तक नही रहेगी।

 प्रकृति के रहस्यों को जान कर उसे बाजार में बेंचना और मुनाफ़ा कमाना सभ्यता है? या वह बोध कि, प्रकृति के असीमित संसाधनों पर अंतत: हमारा अधिकार सीमित ही है? यह तय करना बेहद जरूरी है, कि तकनीकी दक्षता हासिल कर चुका कोई समाज मृत्यु की हद तक गैर जिम्मेदार रहकर सभ्यता और विकास का मानक बनेंगा? या वह प्रकृति पर अपनी निर्भरता को पहचानते हुए, अपनी सीमिति क्षमता और अदम्य जिजीविषा के बल पर उसे बनाये और बचाये रखने के लिए अन्तिम दम तक कृत संकल्प है।

शिक्षा और विज्ञान अगर आज बाजार की दासता स्वीकार कर चुके हैं, तो चाहे जैसे भी संभव हो, सभ्यता और विकास के वास्तविक मूलभूत अर्थों को थोड़े समय के लिए इससे अपने को बचाते हुए बाजार से लड़ना होगा। यह अनायास ही नही है, कि मानव रोधी तमाम बुराइयों और अपराधों का उत्सव तथाकथित शिक्षित, सक्षम, सभ्य और सम्पन्न लोगों के भीतर है। बौद्धिक समुदाय निर्लज्ज और खतरनाक हद तक इन्हे समर्थन दे रहा है।

यह अनायास ही नही है, कि सभ्यता और विकास के नाम पर कुछ लोग जंगलों पर आधिपत्य के लिए उतावले हैं, ताकि बाजार में उनकी कीमत लग सके। वहीं कुछ अशिक्षित, अर्ध-शिक्षित गुमराह और व्यवस्था विरोधी नक्सलाइट किस्म के लोग उन्ही जंगलों और जलाशयों को बचाने के लिए रोज-रोज अपने प्राण गवां रहे हैं।

वे लोग जो अपनी कुल आमदनी का चौथाई बजट दुनिया के बाजारों से हथियार खरीदने में खर्च करते है, वही उन्हे हिंसक बताते हुए अहिंसा का पाठ पढ़ा रहे हैं, बाजार की नजरों में वे खतरनाक किस्म के लोग है। जिन्होंने गौरैया की तरह संचय और जरूरत से ज्यादा संग्रह को वृत्ति को नही अपनाया है। वे जानते हैं कि जरूरत भर की सूखी लकड़ियों के लिए दूर-दूर तक फ़ैले जंगल का हरा भरा होना जरूरी है। शायद इसीलिए सभ्यता और बाजार की नजरों में वे जंगली और बर्बर हैं।

सभ्यताओं के संघर्ष के नाम पर होने वाले सेमिनारों के सारे बौद्धिक विमर्शों में उनकी दिलचस्पी इसलिए नही हैं, क्योंकि वे खुद सभ्यताओं के शिकार हैं। वे जानते हैं, कि आज देश और राजनीति की मुख्य धारा कुछ सटोरियों, विश्व बैंक के पालतू अर्थशास्त्रीयों और माफ़ियों से होकर बाजार के मल मूत्र में लिथड़ी पड़ी है।

 वे इसलिए भी असभ्य, विकास विरोधी और खतरनाक है, कि जनतांत्रिक सरकारों के क्रूर दमन की वैधानिक शक्ति को ठेंगा दिखाते हुए परमाणु युग के दौर में अपने परंपरागत हथियारों और विश्वासों के साथ जंगलों, नदियों, और चिड़ियों को बचाने के लिए कृत संकल्प है। बाजार और मुनाफ़े में उनकी कोई दिलचस्पी नही। वे जानते है, कि विश्वग्राम की मुड़ेर पर गौरैया और उनके घोसले उजाड़ डाले जाते हैं।

गौरैया सिर्फ़ किसी पक्षी का नाम नही है, वे ढेर सारी चीजों, जो हमारे बीच से एक-एक कर गायब होती जा रही हैं, उनकी शक्ल, सूरत उनकी आदतें गौरैयों से मिलती-जुलती होती हैं। गाँवों की सबसे बड़ी त्रासदी है, चरागाहों और पोखरों के निशान मिट जाना। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि अब वहाँ झुण्ड के झुण्ड बकरियां, गाय, भैंसे, नही दिखतीं। ये सब गाँव के सामुदायिक जीवन की रीढ़ थे। वहीं गौरैया फ़ुदकती थी। उनके सहवास और मैथुन की आदिम गंध से बंसत महकता था।

 धीरे-धीरे और एक-एक कर वहाँ से वे सारी चीजें, जो पेड़ों और चिड़ियों को आदमी से जोड़ती थी, विस्थापित होती जा रही हैं। विकास और सभ्यता  के इस क्रूर दस्तक से डरी-सहमी गौरैया अब न तो कभी हमारी स्मृतियों में चहचाती है, न सपनों में फ़ुदकती है। ढेर सारी मरी हुई गौरैयों और परियों के पंख हमारे विकास पथ पर नुचे-खुचे, छितराये पड़े हैं। सभ्यता के तहखाने में बन्द हमारी उदासी हमारी सांसों में भरती जा रही है। शायद अब कभी इन मुड़ेरों पर गौरैया नही आयेगी।

नोट-यह लेख कथाकार देवेन्द्र ने  विश्व गौरेया दिवस (20 मार्च) के  लिए लिखा था।

24 मार्च 2010

धर्म के ना रंग होते, अधर्म फिर होता नहीं…

जीत के आगे छुपा,
है लोभ का कोहरा घना…
हार कर देखा है मैंनें,
शर्म से जो मुंह बना..

परिणाम गर होते नहीं तो,
कितना सुन्दर दृश्य होता..
फिर विफल होता ना कोई,
और ना कोई दिव्य होता…

न कर्ण ही तब छला जाता,
और न लंका जला जाता…
दूर उस एक गांव में फिर,
नक्सली ना पला जाता..

धर्म के ना रंग होते,
अधर्म फिर होता नहीं…
बेफ़िक्र हो सोते सभी,
बच्चा कोई रोता नहीं…

राहुल कुमार ब्लॉग का पता

22 मार्च 2010

कोई पुरुष गुप्त रूप से लिखकर मुझे दे देता है

साहित्य/पत्रकारिता या विचार की दुनिया से जुड़े लोगों के लिए  सिमोन डी बोउआ का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। नारीवाद के इतिहास की संगमील किताब 'दि सेकेण्ड सेक्स' की लेखिका ने सामंती पितृसत्तात्मक समाज की कई ग्रंथियों को उघाड़ कर रख दिया था। दशकों पहले कही गई सिमोन की कई बातें आज भी प्रासंगिक हैं। हिन्दी जगत में कुछ ज्यादा ही प्रासंगिक हैं। अतः उनके लेखन के कुछ समीचीन हिस्सों को किस्तों में प्रस्तुत करने का प्रयास रहेगा। - रंगनाथ

सिमोन डी बोउआ 
लोगों को विश्वास नही होता कि यह परिपक्व लेखन मेरा हो सकता है।जरूर कोई पुरुष गुप्त रूप से लिख कर मुझे दे देता है अपने नाम से छापने के लिए। उन्हें शक है कि स्वयं सार्त्र मेरे लिए लिखते  हैं। जिस दिन मेरे लिए फ्राँस का श्रेष्ठ साहित्यिक पुरस्कार घोषित किया गया उसके दूसरे ही नि मेरे किसी हितैषी ने सच्चे मन से सलाह दी कि अब लोग तुम्हारा इंटरव्यू लेने आएंगे। जब जिसे भी इंटव्यू दो, हर बार यह बलपूर्वक कह देना कि पुरस्कृत ग्रंथ "ल मंदारिन" तुम्हारा खुद का लिखा हुआ है। तुम्हें मालूम है कि लोग कहते हैं कि तुम्हारे सर पर सार्त्र का हाथ है। लोग यह भी सोचते हैं कि मुझमें न अपनी लेखन-प्रतिभा थी न लेखन क्षमता। सार्त्र ने मेरे लिए कुल इतना ही किया कि उन्होंने मेरी दो पाण्डुलिपियाँ एक प्रकाशक को विचारार्थ दी थीं,जिनमें से एक अस्वीकृत भी हो गयी।

कैसा अजीब है कि आज भी लोगों को स्त्री के बारे में वही विचार है जो पचास साल पहले मेरे स्वर्गीय पिता का था। वे कहते थे औरत क्या है ? औरत वही है जो उसका पति उसे बना दे। पर मैं जानती हूँ मेरे पिता यह कह कर अपने को धोखे में रख रहे थे। उनके सामने कई ऐसे उदाहरण थे जहाँ स्त्रिों ने न केवल अपना पृथक चिन्तन किया था बल्कि उनके चिन्तन से उनके पति भी प्रभावित थे। लेकिन दृर्भाग्य से अभी भी हमारे समाज में ऐसे लोगों की बहुतायत है जिनका विचार है कि स्त्री के पास पुरुषों की तरह स्वतंत्र विवेक-विचार की क्षमता नहीं है। स्त्री का बुनियादी चिन्तन केवल प्रजनन और मातृत्व के ही दायरे में सीमित होता है।

20 मार्च 2010

बेटियों की सुरक्षा चाहें तो उन्हें उच्च-शिक्षा न दें

संतो-बाबाओं के बारे में रोज ही ऐसी खबरे आ रही हैं कि माँ-बाप अपनी बेटियों को किसी बाबा के दर्शन करने भेजने से घबराएंगे।

अब कुछ गलियाँ तो पुरानी बदनाम हैं। नई बदनाम गली का नाम है " केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के उच्च शिक्षा विभाग।" ऐसा नहीं है कि उच्च शिक्षा की पहले गली पूरी तरह  पाक-साफ थी। यौन-शोषण की बारंबारता के तुलनात्मक अध्ययन के बाद कहा जा सकता है कि पहले जो राई थी अब वो पहाड़ का रूप धर चुकी है।

मौजूदा हाल के बारे में मेरा एक लेक्चरर दोस्त कहता है कि

"आठवीं पास सड़क छाप बेरोजगार किसी लड़की के संग अभद्रता करे तो उसे शोहदा कहते हैं। पीएचडी धारी,लखटकिया नौकरी वाला बूढ़ा किसी लड़की का यौन शोषण करे तो उसे प्रोफेसर कहते हैं।"

हो सकता है कि ऐसा कहते वक्त मेरा दोस्त अतिरेक में बह गया हो। लेकिन मेरा भी अनुभव यही है कि उच्च शिक्षा में हर तरह के भ्रष्टाचार के मामले में पानी नाक के ऊपर बह रहा है। एम ए में पचपन प्रतिशत बनाने,आंतरिक मूल्यांकन,एमफिल,पीएचडी में प्रवेश,थीसिस पास करवाने, कालेज/विश्वविद्यालय में नियुक्ति इत्यादि वो जाल हैं जिसमें शातिर बहेलिया हर साल दो-चार लड़कियों को फांस लेता है।

पूरी दुनिया में औरतों के लिए माहौल असुरक्षात्मक है। तकलीफ इस बात की है कि स्वयं को सर्वाधिक परिष्कृत,सुसंस्कृत और प्रबुद्ध मानने वाला वर्ग घिनौने यौन शोषण में इस कदर लिप्त है। मजेदार बात है कि जो विषय-विभाग खुद को मानवीय संवेदना और समाज की सच्चाई का जितना बड़ा ठेकेदार समझता है उस विभाग में नैतिक पतन उतना ही ज्यादा है। विज्ञान से ज्यादा असुरक्षित समाज विज्ञान, समाज विज्ञान से भी ज्यादा असुरक्षित मानविकी, मानविकी में भी साहित्य विभाग लड़कियों के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित है !

मेरा लेक्चरर दोस्त जुमले गढ़ने में उस्ताद है,इस बारे में वह कहता है कि,

"पूरी दुनिया लड़कियों के लिए एक खतरनाक जगह है, केन्द्रिय विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभाग इन सभी खतरनाक जगहों में सबसे खतरनाक हैं।"

मेरा दोस्त खुद के केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाता है तो हो सकता है कि उसके कहन में उसके निजी आग्रह हों। लेकिन उसकी बात में कुछ तो है जिससे मन आतंकित हो जाता है।

बुद्धिजीवी वर्ग दावा करता है समाज के रहनुमाई का ! लेकिन मेरा खुद का अनुभव है कि बूढ़े प्रोफेसर,उनकी दिखाई राह पर चलते रीडर,लेक्चरर ऐसे कुकर्म मे लिप्त होने में अपनी शान समझते हैं। एक-दूसरे से अपने-अपने कुकर्म का रस ले-ले कर जिक्र करते हैं। जो प्रोफेसर रंगे हाथ पकड़ लिए गए वो भी सम्मानीय बने पद-प्रतिष्ठा भोग रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि यह षड्यंत्र सिर्फ कुछ बूढ़े प्रोफसरों के दम पर चल रहा है। इसमें नौजवानों की भी वैसी ही महत्वपूर्ण भूमिका है जैसी कि देश के 'विकास' के हर दूसरे मामले में होती है। बहुतेरे लड़कों को धारा 377 के कानूनी मान्यता मिलने से बहुत उम्मीद थी। लेकिन उनकी यह उम्मीद पानी का बुलबुला निकली। ऐसे लड़कों को प्रोफेसरों की जड़ जमाचुकी लत के आगे लाचार हो कर लड़कियों के फसाने में प्रोफसरों की मदद करके ही गुरु-दक्षिण देना पड़ रहा है। कौन सी लड़की फँस सकती है, कैसे फँस सकती है, कौन सी मजबूर है, किसको नौकरी की सख्त जरूरत है, किसका पिता नहीं है- माँ है और दो छोटी बहने अकेली हैं- ऐसी जानकारियों से लैस शोध छात्रों को ऐसे प्रोफसेरों के आगे-पीछे हरवक्त देखा जा सकता है।

पिछले कुछ सालों में यौन-शोषण का आरोप साबित हो जाने पर कुछ प्रोफेसरों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। आश्चर्य कि किसी भी मामले में इन प्रोफसरों के आँख-नाक-कान बने किसी भी दलाल तथाकथित छात्र को निष्कासित नहीं किया गया। आश्चर्य नहीं कि माँग और आपूर्ती के सिद्धांत के तहत ये दलाल किसी दूसरे प्रोफेसर को अपनी सेवाएँ दे रहे होंगे। या फिर किसी नैतिक प्रोफेसर को अनैतिक होने के सब्ज-बाग दिखा रहे होंगे।

इस मुद्दे पर बहुत कुछ है कहने को लेकिन फिलहाल इतना ही। इस पोस्ट को लिखते-लिखते भारतेंदु याद आते रहे,

अंधेर नगरी चौपट राजा
टका सेर भाजी टका सेर खाजा

19 मार्च 2010

आइए गाँव की कुछ ख़बर ले चलें

रामकुमार कृषक
आइए गाँव की कुछ ख़बर ले चलें
आँख भर अपना घर खंडहर ले चलें

धूल सिंदूर-सी थी कभी माँग में
आज विधवा-सरीखी डगर ले चलें

लाज लिपटी हुई भंगिमाएँ कहाँ
पुतलियों में बसा एक डर ले चलें

एक सुबहा सुबकती-सिमटती हुई
साँझ होती हुई दोपहर ले चलें

देह पर रोज़ आँकी गई सुर्खियाँ
चीथड़े खून से तर-ब-तर ले चलें

राम को तो सिया मिल ही मिल जाएगी
मिल सकें तो जटायु के पर ले चलें

खेत-सीवान हों या कि हों सरहदें
चाक होते हुए सब्ज़ सिर ले चलें

राजहंसों को पाएँ न पाएँ तो क्या
संग उजड़ा हुआ मानसर ले चलें

देश दिल्ली की अँगुली पकड़ चल चुका
गाँव से पूछ लें अब किधर ले चलें

17 मार्च 2010

अनपढ़ों के बीच पढ़े-लिखेः पढ़े-लिखों के बीच अनपढ़

सामाजिक कार्यकर्ता आत्माराम हमारे मित्र हैं। एक दिन अनपेक्षित ही उनका फोन आ गया। छूटते ही बोले, कहाँ हैं, मिलना है ?

मैंने कहा, विश्वविद्यालय पहुँचने वाला हूँ। आत्माराम बोले, मैं तो वहीं हूँ, जल्दी से आ जाइए।

कैम्पस कफे के पास मिलना तय हुआ। हम वहीं मिले। रस्मी हालचाल और मिजाजपुर्शी के बाद आत्माराम ने अपने खादी के झोले से हिन्दी का एक अखबार निकाला। संपादकीय पृष्ठ वाला हिस्सा मेरे सामने खोलकर रख दिया। एक लेख की तरफ दिखाकर बोले इसे पढ़िए और बताइए कि यह लेख किसके लिए लिखा गया है ?

मैंने अखबार हाथ में लिया। लेख देखा। हिन्दी के एक स्थापित कवि की मुस्कराती हुई तसवीर उस पर चस्पां थी। कवि को कवि के साथ ही फिल्मों का जानकार भी बताया गया था।

कवि ने उस तथाकथित लेख में दो-तीन अमरीकी-यूरोपीय फिल्मों की बे-सिर-पैर की चर्चा की थी। उनकी चर्चा का कोई ओर-छोर नहीं दिख रहा था। लेख में ऐसा कोई सूत्र नहीं मिल रहा था जिससे हिन्दी का आम पाठक स्वयं को उससे संबद्ध कर सके।

पूरे लेख को दो बार पढ़ने के बाद मैने ठण्डी आवाज में आत्माराम के प्रश्न का जवाब दिया। मैंने कहा, यह लेख पैसे के लिए,खुद के लिए और अपने कुछ चेलाटाइप पाठकों के लिए लिखा गया है।

आत्माराम की आँखो में चमक आ गई। होंठ चौड़े हो गए। लगभग खिलखिलाते हुए बोले, वही तो, मुझे भी ऐसा ही लगता था कि........ बस,कहते हुए डरता था।

उधर मैं मन ही मन सोच रहा था कि क्या दैनिक अखबार में भी कला के लिए कला के सिद्धांत से लेखन किया जा सकता है ?? ....सिर्फ लिखने के लिए लिखना !! वो भी दैनिक अखबार में ??

तभी मेरी चिंता में खलल डालते हुए आत्माराम ने गदगद भाव से अगला सवाल दाग दिया, अब बताइए कि आपके लिहाज से ऐसे लोगों को क्या समझा जाए ??

 मेरे मुँह से अनायास निकला,  अनपढ़ों के बीच पढ़े-लिखे और पढ़े-लिखों के बीच अनपढ़

14 मार्च 2010

लिखे को हस्तक्षेप मानना चाहिए

सुप्रसिद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत के अंश


गैब्रिअल गार्सिया मार्क्वेज कहते हैं कि कालेज के दिनों में उन्हें किसी दोस्त ने काफ्का की कहानियां पढ़ने को दी. मार्क्वेज उसमें 'मेटामोर्फोसिस” पढ़ने लगे. उसका एक वाक्य है- ''जैसे ही ग्रेगर समसा, बेचैन सपनों वाली रात के बाद सुबह सोकर उठा, उसने अपने को एक बहुत बड़े कीड़े में बदलते हुए देखा. '' मार्क्वेज कहते हैं कि उस वाक्य ने उन्हें जैसे पलंग से पटक दिया. उन्हें इससे पहले नहीं पता था कि लेखक को इस तरह भी कुछ लिखने की छूट होती है. मार्क्वेज के अनुसार अगर उन्हें ऐसा पता होता तो पहले ही लिखना शुरु कर देता. उन्होंने इसके बाद कहानियां लिखनी शुरु की.

. तो लिखना क्या इस तरह सहसा घटने जैसा कुछ है ? आपने लिखना कैसे शुरु किया था ?

लिखना शुरु करने के पहले लिखने का वैसा कोई कारण नहीं. सबसे पहले दूसरों का लिखा हुआ पढ़ा गया. शायद ये एक कारण हो सकता हो कि ऐसा लिखा गया. लेकिन तब भी, पहले तो अपने से बात करने का कोई और तरीका लिखने के अलावा नही है, बाद में लिख कर हम, लोगों से बात करते हैं. और लिखना लोगों से बात करना है. शायद इस तरह मुखर होने की मैंने कोशिश की है.

• लिखने की तरह की पहली रचना कौन सी थी ?

घर में लिखने का वातावरण था. संयुक्त परिवार था. माँ, जमालपुर जो कि अब बांग्लादेश में है; से नौ वर्ष की उम्र में अपने भाइयों के साथ कानपुर लौट कर आ गई थीं. उस नौ वर्ष की उम्र में उन्होंने बंगाल का संस्कार, जितना भी हो, एक पोटली में बांध कर ले आई थीं. और वही पोटली हर बार मेरे सामने खुल जाती थी. मैंने उन्हीं से रवींद्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र और बंकिम के नाम सुने.

पहली रचना तो लिखित में बची हुई कभी होती नहीं. जब लिखित में होने की प्रक्रिया होती है तो कोई दूसरी रचना, उस पहली रचना को खारिज कर देती है. खुद रचना को खारिज करना हमेशा दूसरों के द्वारा खारिज होने से अपनी रचना को बचाने का एक तरीका होता है. और दूसरी रचना, जो किसी तरह से खारिज होने से बच जाती है, रह जाती है.

तो पहली रचना तो कभी होती ही नहीं है. जितनी भी रचनाएं हैं, सब दूसरी रचनाएं हैं.

• ये `दूसरी’ पहली रचना कब थी ?

मैंने कविता के बड़प्पन को सीधे मुक्तिबोध में जाना. दो कदम बाद ही पहाड़ हो, नहीं मुक्तिबोध हों जैसे. सन 1958 में मुक्तिबोध राजनांदगांव में आए. रचना के संसार को टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं देखा, उसके विराट संपूर्ण को मुक्तिबोध में पाया. और मेरा कौतुहल, उत्सुकता बचकानी थी.

मुक्तिबोध जी ने मेरी कविताओं को देखा, फिर उन्होंने सबसे पहले कविता लिखने से मना किया, और लिखने-पढ़ने पर ज़ोर दिया, ताकि कुछ नौकरी कर परिवार की सहायता करूं.
पहली बार उनसे मिलने के बाद एक लंबा समय निकल गया. जब दुबारा नहीं मिला तो उन्होंने मेरे बड़े भाई, जो कि उनके विद्यार्थी थे, कहा कि मैं उनसे मिलूं. दुबारा मैं कविता लेकर उनके पास गया. उन कविताओं में से आठ कविताएं उन्होंने श्रीकांत वर्मा, जो `कृति’ के संपादक थे; को प्रकाशनार्थ भेजीं, और वे छपीं. इन आठों कविताओं को आप दूसरी कविता कह सकते हैं.

• घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है....

और
...घर का हिसाब किताब इतना गड़बड़ है / कि थोड़ी दूर पैदल जाकर घर की तरफ लौटता हूँ / जैसे पृथ्वी की तरफ....

और
....घर-बार छोड़कर संन्यास नहीं लूंगा / अपने संन्यास में / मैं और भी घरेलू रहूंगा / घर में घरेलू / और पड़ोस में भी....
और
...दूर से घर देखना चाहिए....


तो आपकी रचनाओं को पढ़ते हुए लगता है कि घर एक राग की तरह है. घर के साथ ये किस तरह का रिश्ता है. ?

अब इसको आप इस तरह कह लें कि मैं घरघुसना रहा. शायद मेरे लिए शुरुआत में घर में घुसे रहने की आदत बचपने के असुरक्षित होने के कारण ज्यादा रही होगी. क्योंकि जो लोग जंगलों में रात गुज़ारते हैं, वो अपने बचाव के लिए पेड़ की उंचाई पर आश्रय लेते हैं. और यह भी कि शिकारी भी मंच, पेड़ पर बनाता है. घर में संयुक्त परिवार के साथ मैं संसार को समझ रहा था. पिता की मृत्यु बचपने में ही हो गई थी.

मेरा मंच, मेरा घर रहा है और यह जान बचाने के लिए घर में घुस जाने जैसा रहा होगा. जीने के लिए घर से निकल जाना जैसा भी.

• लेकिन घर से बाहर जाना आपकी सबसे पहली इच्छा भी रही है- जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे / मैं उनसे मिलने / उनके पास चला जाऊँगा।…./ मैं फुरसत से नहीं/ उनसे एक जरूरी काम की तरह/ मिलता रहूँगा।.../ इसे मैं अकेली आखिरी इच्छा की तरह/ सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा...


यह भाव सदिच्छा मात्र की तरह क्यों है ?

देखिए, आपने जिस तरह मेरी रचनाओं में से, मेरे कहे हुए उत्तरों को सामने लाकर रख दिया है. दरअसल ये सब उन्हीं में से आई हैं और उसके जवाब की तरह ही हैं.

• लेकिन लगातार घर में ही रहना और उससे उलट घर से बाहर जाकर लोगों से मिलने की पहली इच्छा रखना...

मैं कुछ समझा नहीं.

सब कुछ कह दिया जैसा कभी होता नहीं. कहने को कुछ बचा नहीं, यह भी नहीं होता. कविता में केवल हमारा प्रश्न ही हमारा नहीं होता, दूसरों का प्रश्न भी हमारा होता है. रचना में दूसरों के प्रश्न ही होते हैं. और उत्तर एक मात्र नहीं होता. कहने के लिए पूरी जिंदगी बची होती है. और बिना कहे बात जारी है. पर कविता टुकड़ों-टुकड़ों में होती है. पूरी जिंदगी भर की टुकड़ों-टुकड़ों की कविताएं एक ही जिंदगी की केवल एक ही कविता होती है. ऐसा कोई नहीं जिसके पास सब उत्तर हैं– भगवान के पास तो कतई नहीं. भगवान के पास तो एक भी उत्तर नहीं. जो कविता में कहा गया है, उसे कविता में ही ढूंढना चाहिए. और जो नहीं कहा गया है उसे भी. कविता को स्वीकार करने, खारिज़ करने का अधिकार प्रत्येक पाठक के पास है.

• कोई भी लेखक जीवन में एक ही रचना लिखता है. लिखने की इस प्रक्रिया में जब मामला अभ्यस्ति तक आ जाये तो कोई रचनाकार reinvent कैसे होता है ?

लिखने में, लिखने का अभ्यास कभी नहीं होता. लिखना इस तरह की उस्तादी नहीं है कि मैंने इतना वजन उठा लिया. मुझे लिखते हुए पचास वर्ष हो गए होंगे, तब भी जब मैं कोई नयी रचना लिखता हूं तो हर बार मुझे लगता है कि मैं शुरुआती दौर पर ही हूं. कविता कभी भी सांचे से नहीं निकलती. प्रत्येक रचना अपनी रचना प्रक्रिया के साथ आती है. यह मान कर चलें कि प्रायः कही हुई बात समय के बदलने से बदल जाती है.

भूख पहले भी लगती थी और अभी भी. लेकिन पेट भरने के कारण, अलग-अलग समय पर बदल जाते हैं.

• आपकी जो लंबी कविताएं हैं, उनमें एक आवेग नज़र आता है. मसलन रायपुर-बिलासपुर संभाग. उसके बरक्स आपकी दूसरी छोटी कविताओं में उस तरह का आवेग नहीं है, तो यह कथ्य के कारण है या लिखे जाने की प्रक्रिया के कारण. दूसरा यह भी कि कुछ आलोचक आपकी छोटी कविताओं में mannerism की भी बात करते हैं ?

देखिए, अपनी तरह से लिखना mannerism नहीं होता. अगर हर बार मैं अपनी उपस्थिति में अपनी पहचान अपने नाक-नक्श से बनाता हूं. और ये जो मेरा नाक-नक्श है, इसे मैं कैसे mannerism कह दूं और बहरूपिया हो जाऊं. मुझे लगता है कि अगर मेरी रचनाओं में मेरा mannerism है, तो मैं इसे अच्छी बात मानता हूं. और मैं चाहता हूं कि दूसरों की रचनाओं में भी उनका अपना mannerism होना चाहिए.

• सलमान रश्दी, मकबूल फिदा हुसैन, तस्लीमा नसरीन... रचनात्मकता के इस तरह के प्रसंग को आप किस तरह से देखते हैं ?

असल में ये जो तीनों आपने उदाहरण दिए हैं, इनको एक साथ समेटना ठीक नहीं होगा. इनके यद्यपि अपने अलग-अलग कारण हैं. फिर भी एक कारण तो कट्टरता का है.
कोई भी रचना अपने स्वयं के सेंसरशिप से बाहर निकलती है. इसमें किसी और प्रकार की बाहरी सेंसरशिप करीब-करीब बेमानी है. अभी-अभी मैंने मकबूल फिदा हुसैन पर विष्णु खरे का लेख पढ़ा है जनसत्ता में. यह लेख मुझे अच्छा लगा.

. हरेक रचनाकार का लिखा जिस तरह का होता है, एक आलोचक उसके बहुत सारे पहलू को प्रकाश में लाता है. आपको क्या लगता है कि आलोचकों ने आपके किस पक्ष को अलक्षित ही रहने दिया, जिस पर गौर किया जाना था ?

आपने मेरी रचनाओं के संदर्भ में आलोचक और आलोचना की उनके द्वारा अलक्षित होने की बात की है. तो मैं एक छोटी सी टिप्पणी करूंगा कि सबसे अच्छा आलोचक मैं उनको मानता हूं, जिन्होंने मेरी रचनाओं को खराब कहा. और दूसरे क्रम में मैं उन आलोचकों को मानता हूं, जिन्होंने मेरी रचनाओं को अलक्षित किया है. और तीसरा मेरी दृष्टि में कोई क्रम नहीं है. मेरी उन पाठकों से मित्रता है, जिन्हें मैं जानता नहीं. और जो कम से कम एक-दो भी हो सकते हैं.

• आपको किन विदेशी कवियों ने प्रभावित किया है ?

मैं भुलक्कड़ हूं. नाम उन सबके नहीं ले सकूँगा, जिन सबसे मैं प्रभावित होता रहा होऊँगा. शुरुवात में सोवियत साहित्य ने प्रभावित किया. अंग्रेजी और स्पेनिश ने भी. वैसे मैं बहुत कम पढ़ा-लिखा हूँ. मैं किसी भी रचना से प्राकृतिक तरीके से प्रभावित होता हूँ जैसे किसी पौधे या पत्ती को देखकर.

• यह आधुनिक भारत की कैसी त्रासदी है कि एक आम आदमी के लिये जिंदा रहना लगातार मुश्किल हो रहा है. जीडीपी और सेंसेक्स के बेशर्म चमचमाते आंकड़ों के बीच इतिहास में सबसे अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं, देश भर में आदिवासियों का शिकार किया जा रहा है, भूख और कुपोषण से हजारों लोग मर रहे हैं. बाज़ार आदेशित कर रहा है और झूठ, छल-कपट, क्रूरता जीवन के मूल्य की तरह बनाये और बताये जा रहे हैं. ऐसे में साहित्य और साहित्यकार का समाज में हस्तक्षेप किस तरह संभव है ?

साहित्य को जिस तरह से हस्तक्षेप करना चाहिए, उस तरह से वह कर रहा है. जिस तरह से वो लिख रहा है, उसके लिखे को हस्तक्षेप ही मानना चाहिए. और इसके अलावा जो कुछ भी है, वो लिखने के बाद का है. मैंने शुरुआत में ही आपसे ये कहा कि लोगों से बात करने का सबसे अच्छा तरीका मुझे कविता लिखना लगता है. और मैं ये ही कर सकता हूँ.

• लेकिन 1967 में फूटे नक्सल आंदोलन, 1974 के छात्र आंदोलन और उसके बाद 1975 में लगे आपातकाल के दौरान बौद्धिक तबके की एक भूमिका दिखाई देती है, लेकिन उसके बाद से क्रमशः यह तबका सामाजिक जवाबदेही से हटता चला गया. क्या उनकी बहसें ड्राइंग रूम या इंडिया हैबिटेट सेंटर जैसी जगहों तक सीमित नहीं हो गई है ? क्या बौद्धिक समाज पिछले कुछ सालों में लगातार नकारा होता चला गया है ?

इस तरह की अपेक्षा करना कि लेखकों या बुद्धिजीवियों द्वारा हस्तक्षेप हो, जिसे सड़क पर उतर आना कहा जाता है, किसी लेखक की तरफ अगर कहीं नज़र उठती है कि वो सड़क पर उतर आये तो शायद अपने इस सड़क के उतरने के काम में असफल होगा.

जिसका लिखा जाना कोई हस्तक्षेप नहीं है, तो लेखक का सड़क पर उतर आना किस तरह का होगा ? लेकिन फिर भी अगर ऐसी स्थिति बनती है कि यही एक विकल्प है, जो रचना को छोड़कर है, तो सड़क पर भी उतर आएंगे. नकारा जैसी स्थिति तो है नहीं.

• लेकिन दुनिया के कई देशों में लेखक सक्रिय राजनीति में आए और उन्होंने सीधे-सीधे सड़क पर उतर कर राजनीतिक हस्तक्षेप किया.

जिन देशों में ऐसा किया गया, उन देशों में लिखना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता रहा है. पाठक के तौर पर भी, नागरिक के तौर पर भी. कथा, कहानी और कविता पर पूरे देश की नज़र रहती है.

• लेकिन भारत में भी ऐसे कई उदाहरण हैं. जिनमें रेणु जी भी शामिल हैं और अरुंधति रॉय भी.

ऐसा कुछ नहीं है. मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगता कि अरुंधति राय भी ऐसा कुछ कर रही हैं जिसे किसी लेखक का सड़क पर उतरने की तरह का हस्तक्षेप माना जाए. बुकर पुरस्कार मिलने के बाद उनका एक ताकतवर सामाजिक व्यक्तित्व बना, जिसकी वजह से उनका सड़क पर उतर आना एक हलचल की तरह हुआ.

रचनाकार की ताकत उसके पाठक की ताकत होती है. और यह पाठक समाज का एक बड़ा हिस्सा होता है. हमारे यहां ऐसा नहीं है. लेखक अपनी रचना से पहचाना जाता है और यह पहचान बाहरी तौर पर ताकत ही बनती है. और लेखक का ऐसा कुछ नहीं है.

. विकास की अवधारणा को लेकर पूरी दुनिया में बहस छिड़ी हुई है. बिजींग से बस्तर तक. एक तरफ कारपोरेट कल्चर है दूसरी ओर गिद्ध जैसी लोलुप राजनीतिक सत्ता है और तीसरी ओर न होने की तरह की नक्कारखाने की तूती जैसी अनसुनी आवाज़ है. इन सबों के बीच प्रतिरोध के लिये हिंसा की राजनीति भी है. गांधी के देश में हिंसा की इस राजनीति को लेकर आप क्या सोचते हैं ?

विकास की अवधारणा बाज़ार की अवधारणा के अनुरूप ही बनती है. वैश्विक स्तर पर जो भी बड़े-बड़े मसले उठाए जाते हैं, उसके बहुत से दूसरे कारण बताए जाते हैं. जैसे संसार के प्रदूषित होने का. संसार की जो कुछ भी गंदगी है, वह गंदगी गरीबों के द्वारा कभी नहीं होती. जो कुछ भी कचरा है, वो गरीबों का कभी नहीं होता. गरीब तो कचरा बिनने वाले होते हैं. सारा कचरा उन अमीर लोगों का है, जो बाजार से केवल डब्बाबंद सामान खरीदते हैं और उनके कल-कारखाने चलाते हैं. दुनिया में प्रदूषण अमीर देशों से है.

विकास के साथ-साथ बाज़ार चलता हुआ दिखाई देता है, विकास की दिशा वहीं खत्म होती है, जहां तक बाजार पहुँच चुका होता है. उसके आगे कोई विकास नहीं है. मुझे आश्चर्य है कि जंगल के सबसे भोले-भाले लोग, आदिवासी सबसे अधिक हिंसा के घेरे में हैं. ये किस तरह और कैसे हुआ, ये हम जैसे लोगों के लिए अचरज का विषय है.

आदिवासियों के पास जो तीर धनुष जैसा जो हथियार है, ये उनकी अपनी रक्षा के लिए और शिकार से पेट भरने का उनका अपना साधन है. इसको उतना ही और वैसा ही प्राकृतिक मानना चाहिए कि जैसे किसी हिरण के सींग होते हैं, जिससे वो अपना बचाव करता है. लेकिन अगर हिरण एक झुंड़ में खड़ा हुआ है और हिरण के सींग का नुकीलापन आकाश की तरफ मुखातिब है, ऐसे में उससे अपने बचाव के लिए हवाई हमले की बात करना कैसी सोच है?

जो हिंसा है, वह कभी भी ठीक नहीं है. चाहे नक्सलियों की हो या पुलिस की हो.

• एक ओर राजनीति की मूलधारा से एकदम दूर कुछ-कुछ घृणा की मुद्रा, वहीं दूसरी ओर साहित्य से कहीं अधिक साहित्य की राजनीति में डूते-उतराते साहित्यकार. साहित्य की राजनीति क्या साहित्य को समृद्ध करने का काम करती है ?

राजनीति का अर्थ तो कुछ उस तरह का हो गया है कि जो कुछ भी उसके अर्थ निकलते हैं, वो खराब ही होते हैं. राजनीति जिस तरह की और जैसी है, वो अच्छी कैसे होगी? तो साहित्य की उन्नति कैसे होगी?

• देश में जो राजनीतिक दृष्टियां हैं, वे रचना के लिये उपयुक्त हैं या रचना की अपनी स्वयं की कोई राजनीति या पक्षधरता होती है ?

जो राजनेताओं की राजनीति होती है, उससे रचना का कारण तो जरूर बनता है. और इस तरह से साहित्य की कोई राजनीति बनती है, उसके बजाय एक कारण बनता है. जो मनुष्य के पक्ष में होता है. अगर मनुष्य के पक्ष की किसी भी प्रकार की राजनीति साहित्य में दिखाई देती है तो ये राजनीति अच्छी है. लेकिन जो राजनीति के लोग हैं, उनका मनुष्य का पक्ष झुठलाने का ज्यादा होता है. लक्ष्य तो सत्ता होती है.

• पिछले कुछ सालों में हिंदी जगत मानने लग गया है कि अब लिखे के प्रतिसाद के लिए अंग्रेजी में जाना ही होगा.

नहीं ऐसा दृष्टिकोण तो नहीं है. लेकिन तब भी अगर कहीं भारत का लिखा हुआ अनुवादित होकर दूसरी भाषा में जाता है तो अच्छी बात है.

• लेकिन हिंदी में लिखना क्या संताप की तरह नहीं है ? खास तौर पर बड़े पाठक वर्ग को संबोधित करने का मामला हो और हिंदी का कृपण पाठक संसार हो....

ऐसा तो नहीं है. मुझे ऐसा नहीं लगता है.

अंग्रेजी में लिखना तो मुझे आता नहीं है. अगर मैं अंग्रेजी में लिख सकता तो भी मैं हिंदी में अपने लिखे हुए का शायद छुट-पुट अनुवाद कर लेता. वैसे मेरे लिखे हुए के अंग्रेजी में और दूसरी भाषाओं में अनुवाद हुए हैं. लेकिन ये सब अनायास कारणों से ही हुए हैं.

• आपके लिखे पर फिल्में भी बनी हैं. किसी किताब का परदे तक पहुँचना और फिर उसे एक खास तरह के पाठ के लिए अनिवार्य मजबूरी की तरह स्वीकार किया जाना, यह सब कुछ कैसा लगता है ?

इसको रचना के साथ न्याय और अन्याय की तरह जोड़कर देखना ठीक नहीं है. फिल्म रचना को देखने का एक बिल्कुल दूसरा तरीका है. और रचना उसमें आधार की तरह होती है. फिल्म दृश्य की एक ऐसी रचना है, जिसमें मेरी रचना झलक की ही तरह हो, तो एक कारण की तरह होती है. जो अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग होती है.
 (रविवारडाटकाम से साभार)

11 मार्च 2010

डायलेक्टिक

महाशय जब लड़के थे, तब फ्रेंच की एक लिखित परीक्षा के सिलसिले में उन्हें तर्तिया जाना पडा। वहाँ पहुँचते ही परीक्षा शुरू हो गयी। उनका एक सहपाठी यही परीक्षा लातिन में दे रहा था।

 उस सहपाठी ने अपनी कुछ गलतियाँ रगड़ कर साफ कीं और प्रोफेसर के पास जाकर नम्बर बढ़ाने की माँग की। लेकिन उसे अंक और भी कम कर दिए गए, क्योंकि जहाँ-जहाँ गलतियाँ रगड़ी गयी थीं,घिसट्टा पड़ने से वहाँ-वहाँ कागज छिछला पड़ गया था।

 इस तरह की कारगुजारी के नुकसान से महाशय खूब परिचित थे । उन्होंने लाल स्याही ली,अपनी कापी पर कई सही जगहों पर भी गलतियों के निशान बनाए,और फिर प्रोफेसर के पास जाकर बोले

यहाँ क्या गलती है ?  प्रोफेसर हैरान हो गए। लाल घेरों वाली जगहों सही थीं।

'प्रोफेसर यदि गलतियों को गिनने में ऐसी चूक करते हैं,तब निश्चित रूप से मेरे नम्बर बढ़ने चाहिए' - महाशय ने अपनी बात आगे रखी। इस तर्क के आगे प्रोफेसर झुक गए और महाशय के नम्बरों मे बढ़ोत्तरी कर दी गई।

बेर्टोल्ट ब्रेख्ट
अनुवाद - मोहन थपलियाल

10 मार्च 2010

वो किन्नर है!!!

वो गालियाँ देते हैं, आम लोगों को डराते धमकाते हैं, किसी को कुछ भी बोल देते हैं, ऐसे ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं की कान मैं पिघलता हुआ शीशा उडेल दिया हो, वो किन्नर हैं. चमकते हुए कपडे कड़ी धुप में बेहद डार्क मकेउप के साथ बस स्टैंड पर खड़ी रहती हैं, चेहरा धुप से सूर्ख हो रहा है या लाली से मालूम नहीं. लोग कहते हैं की किन्नर गुंडा गर्दी करते हैं, बदतमीजी पर उतर आते हैं, लोगों के डर का फ़ायदा उठाते हैं. पर वो इस हाल में क्यूँ हैं यह कोई सोचना नहीं चाहता  ?!

 हमारे समाज में जानवरों के भी रक्षक हैं, बड़ी बड़ी हस्तिया जानवरों पर हो रहे ज़ुल्म के लिए आवाज़ उठाती हैं और चंदे के नाम पर पैसा भी बटोरती हैं. पर किन्नरों का समुदाय आज भी अपने अधिकारों के लिए एक मुश्किल लडाई लड़ रहा है. जन्म के वक़्त ही माँ बाप छोड़ देते हैं और अगर ना भी छोड़ना चाहें तो समाज छुड़वा देता है. उन बच्चो को अपनाया नहीं जाता और फिर शुरू होता है. उनकी ज़िन्दगी का सफ़र जहाँ वो दूसरे किन्नरों के यहाँ ही पलते है बड़े होते है, ना पढाई ना लिखाई. ना मुस्तकबिल की बातें ना माजी की सुनहरी यादें...अब ऐसे में बड़ा होकर अगर वो लोगों से पैसा ना वसूले तो क्या करे क्यूंकि यही तरीका उन्होंने सीखा है...

हम प्रजातंत्र की बातें करते हैं, समान अधिकार के लिए debates करते हैं मगर ये समान अधिकार औरत मर्द के अधिकारों तक ही सीमित रहता है...समाज में तीसरा सेक्स भी है ये क्यूँ याद नहीं रहता? असल मैं हम बेहद मतलबी और दकियानूसी हैं, हमे क्या फर्क पड़ता है ? अपनी सोच के साथ चलते हुए दुनिया जहां पर राय देते हैं पर किन्नरों के पक्ष में एक लफ्ज़ बोलने से भी कतराते हैं. आज हमारे मुल्क में किन्नरों के पास वोट करने का अधिकार ना के बराबर है क्यूंकि वोटर आईडी के लिए जिन Documents की ज़रुरत होती है वो उनके पास होते ही नहीं हैं. पब्लिक प्लेस पर मेल और फिमेल के लिए सुलभ शौचालय  की बहस होती है पर किन्नरों के लिए अलग से सुलभ शौचालयों के बारे में बात ही नहीं उठती. समाज ने उनके साथ जो किया किन्नर आज वही समाज को लौटा रहे हैं.

एक जगह सुना था की जब किसी किन्नर की मौत होती है तो उसकी मईयत रात के अँधेरे मैं लेकर जाते हैं, साथ ही उसकी लाश को जूतों से पीटा जाता है और कहा जाता है की फिर इस दुनिया में मत आना...

9 मार्च 2010

महिला दिवस !!! अच्छा मजाक है


9 साल की बच्ची का निर्वस्त्र शव एक पुलिस कालोनी की छत पर मिला...महिला दिवस पर ये भेंट है समाज और कानून की तरफ से महिलाओ को.

9 साल की बेबस बच्ची का बलात्कार और फिर बेरहमी से मार डालना. कैसे होते हैं वो जानवर जो शकल से इंसान दिखते हैं? एक बच्ची जो कुछ दिन पहले तक स्कूल जाती थी, पार्क में झूले झूलती थी, अपनी गुड़िया के टूट जाने पर रोती थी. उसकी आँखें टॉम एंड जेर्री पसंद करती थीं या अलादीन. उसे ओरेंज आइसक्रीम पसंद थी या बर्फ का गोला. बड़े होकर वो डॉक्टर बनना चाहती थी या फिर सुपरगर्ल. कौन जाने वो क्या चाहती थी उसकी मासूम आँखों में कितने ख्वाब थे. शायद वो चिल्लाई होगी..."अंकल ये क्या कर रहे हो, अंकल मुझे छोड़ दो"

जिस जानवर ने ये किया उसका शायद पता भी ना चले और अगर पता चल भी जायेगा तो वो बच जायेगा. इसके बाद भी अगर आज से 20 साल बाद कोई सजा सुनाई जाएगी (अगर सुनाई गयी)तो वो होगी उम्र क़ैद या फांसी . क्या इतना काफी है ??? वो रोई भी बहुत होगी, उसकी फ्रोक झटके से उतार कर फ़ेंक दी गयी होगी. उसके गले से निकलने वाली चीखों को हाथ रख कर दबा दिया गया होगा. फिर जब वो अधमरी पड़ी होगी तो उसे अपने घिनोने हाथों से हमेशा के लिए चंदा मामा के पास भेज दिया गया होगा.

जिस घटिया, वहशी जानवर ने ये किया उस पर कोई आसमानी बिजली नहीं गिरेगी, कोई चमत्कार उसे तबाह नहीं करेगा.

वो नपुंसक भगवान, खुदा या GOD अगर है तो बस देखता रहेगा. उससे बेहद नफरत है मुझे.बेहतर है यही सोच लूं की कोई नहीं है...कोई नहीं है...कोई नहीं है 

fauziya.reyaz08@gmail.com

ये लड़कियाँ

मैं अपनी बात को सामान्यीकृत नहीं करूंगा। मैं विशेष संदर्भ में बात करूंगा। जिससे बात का दायरा साफ दिखे। मैं आगे जो कुछ लिखुंगा वह सब एक मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि के अनुभव हैं। मूलतः बड़े किसानों,व्यावसायियों,उद्यमियों और सरकारी अफसरों के समाजिक लोक वृत्त के अनुभव हैं।

हम छोटे थे तो हमारी कालोनी में एक बैंक मैनेजर सार्वजनिक चर्चा का विषय बनते रहते थे। क्योंकि उन्होंने एक बाद एक आठ लड़कियां पैदा कीं। एक बेटे की आस में। उनकी आस नौवें प्रयास में पूरी भी हो गयी। यह मामला बनारस शहर का है। देहात में ऐसा नहीं होता। कोई सात/आठ लड़कियों तक इंतजार नहीं करता। जहां भी वर पक्ष को शक हुआ कि वधु से लड़के की संभावना अभी दूर है वह तुरंत बेटे की दूसरी शादी की चर्चा छेड़ देते हैं। या फिर यदि बच्चा न हुआ हो तो पुरुष को दूसरी शादी लगभग अवश्यंभावी ही मानी जाती है। ऐसा नहीं है कि यह सारा मामला पुरुषों का रचा हुआ है। या फिर उन महिलाओं का जो सास,ननद,भाभी की भूमिका में होती है। मनुष्य की विश्वदृष्टि उसके भौतिक जीवन के निर्णय का आधार बनती है। मैंने बहुधा देखा है कि जिन स्त्रियों को सिर्फ बेटियां हों या जिनके बच्चा न हो वो पति के दूसरी पत्नि के पक्ष में होती हैं। ज्यादातर विकल्पहीनता की लाचारी के तहत लेकिन कई बार इसे अपनी नियती मानकर प्रसन्नतापूर्वक इसे स्वीकारती हैं।

सरकार ने बच्चे दो ही अच्छे का काफी प्रचार किया। इस प्रचार का असर भी हुआ था। फिर भी, यदि पहले दोनों बच्चे लड़कियां हो जाएं तो इस प्रचार का कचुम्मर निकलते क्षणभर देर न लगती थी। इस प्रचार के मध्यमवर्गीय परिवारों में एक लड़का-एक लड़की ही आदर्श था। इस समीकरण में लड़के दो हो जाएं तो पूछो मत, सभी गदगद। यदि लड़की दो हो जाए तो.........।

पितृसत्तात्मक समाज में सिर्फ बेटियां होना समाज में हीन बनाता है। ऐसे समाज में उपरोक्त पचड़े होते ही रहते हैं। आप एक ढूढांे दस उदारहण मिलते हैं। बहुत हद तक ऐसी स्थितियां आज भी बनी हुईं हैं। इसके खिलाफ बहुत कुछ लिखा गया होगा। लिखा जाएगा। हम चाहते हैं कि आज महिला दिवस पर एक बिल्कुल नई-नई उभरती तसवीर को सामने रखा जाय। श्याम पक्ष बड़ा हो तो क्या,श्वेत पक्ष ही हमारी उम्मीदों को जिंदा रखता है।

कहानी कुछ व्यक्तियों की है। ऐसे व्यक्तियों की जिन्हें मैं निजी कारणों से जानता हूं। मैं किसी वर्णन से बचते हुए दो टुक तथ्य रखुंगा। आप सब निर्णय करिएगा कि उन तथ्यों से क्या मायने निकलते हैं -

मेरी दीदी के एक ही बच्ची है। दीदी डिग्री कालेज में पढ़ाती है। दूसरे बच्चे को लेकर वह निश्चिंत है।

मेरे भाई के अभी एक ही लड़की है। भाई इंजीनियर है। भाभी कहती है बच्चे दो ही अच्छे। चाहे लड़की हो या लड़के। भाई की सोच भी यही कहती है।

ऐसे और भी किस्से हैं। कम से कम आधे दर्जन तो मेरे रिश्तेदारों में। हाण्डी की स्थिति समझने के लिए दो दाने काफी हैं। अब एक दूसरे कोने में झांकते हैं।

एक साथी लेकिन काफी अनुभवी पत्रकार से मैंने पूछा कि आप के कितने बच्चें हैं तो उन्होंने कहा कि एक बेटी है। एक ही रहेगी। उन्होंने एक ही रहेगी पर ऐसा जोर दिया कि मुझे क्षणभर के लिए लगा कि इसकी बिटिया से खुशनसीब बेटी दूसरी न होगी।

यही कहानी दूसरे कई पत्रकारों/लेखकों की है। कम से कम चार को तो मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं कि जिनके या तो एक बेटी है या दो बेटी या एक है दूसरा जो भी हो दो ही रहेंगे वाली बात है।

एक तीसरा कोना भी है। शायद छोटा है। लेकिन सबसे अधिक रोशनी इसे कोने में है। यहां मैं कुछ व्यक्तियों या घटनाओं की बात नहीं करने जा रहा। क्योंकि इस एक बात में युवा महिला पत्रकारों एवं दूसरे पेशेवर महिलाओं की नई सुखद एवं सकारात्मक सोच को समेट लिया गया है। अभी कुछ ही दिन पहले एक युवा महिला पत्रकार ने एक लेख में यह मिसरा लिखा।

तू निर्बंध सारी धरती पर घूम सके
अपने दिवाने को तू चूम सके

यह शैर बेटियों के लिए भारतयी मध्यवर्ग की बदलती सोच का बेहतरीन उदाहरण है। लेख में जाहिर किया गया है कि इस मिसरे को एक पिता ने अपनी बेटी के लिए लिखा था। यदि यह सच है तो इस शैर का वजन और भी बढ़ जाता है। इस वक्त मेरे दिमाग में उन तमाम युवा कवियों की बेटियों के लिए लिखी कविताएं घूम रही हैं। टाइम-स्पेस की बाध्यता से उनकी प्रस्तुती के लालच से खुद को रोक रहा हूं।

देहज हत्या,बालात्कार,प्रताड़ना की बहुतयात उदाहरणों के बीच ये उदाहरण बहुत कम प्रतीत होते है। लेकिन विशाल अंधकार में भी नन्हे से दीपक के अस्तित्व को कोई झुठला नहीं सकता। साल के 365 दिनों के भीतर महिला दिवस एक पड़ाव की तरह है। जहां ठहर कर हम सोचते हैं कि पिछले साल कहां से चले थे। आज कहां तक पहंुच पाए हैं। आगे कैसे और कहां जाना है। आमतौर पर यह काम लोग पहली जनवरी को करते हैं। लेकिन महिला अधिकारो के लिए सचेत जनों के लिए नया साल 8 मार्च से शुरू होता है। महिला दिवस पर सभी महिलाओं के लिए समानता,स्वंतत्रता एवं बंधुत्व की कामना करता हूं।

नोट- मैंने आज तक कभी भी किसी परिचित या अपरिचित से यह नहीं कहा कि मेरी फलां पोस्ट पर कमेंट करें। आज कह रहा हूँ, यदि आप इस पोस्ट को पढ़ रहे हैं तो इस विषय पर अपनी राय जरूर दें। आखिरकार एक जीवन में कम से कम चार स्त्रियों से तो हर पुरुष प्यार करता है,माँ,बहन,बेटी और वो।

8 मार्च 2010

तिहरी गुलामी के खिलाफ एकता जरूरी है

राज कपूर ने एक फिल्म बनायी थी,प्रेमरोग। कुछ लोग को यह नहीं समझ नहीं आता कि महिला उत्पीड़न मामले में क्लास या कास्ट का क्वेश्चन क्यों नहीं आना चाहिए। लेकिन राज कपूर को यह बात पता थी। पाठकों को जेंडर इक्वलिटी का सवाल उठाने वाली महिलाओं का इतिहास देखना चाहिए। वो कौन थीं ? किस क्लास से  थीं ? सर्वप्रथम आखिर किस क्लास की महिलाओं ने औरतों की पहचान लास्ट कालोनी के रूप में की ?

 वैश्विक स्तर पर जो बात सही है वही बात कमोबेश भारत के लिए भी सही है। दो मुद्दे तो बिल्कुल ताजे हैं। पत्रकार मृणाल वल्लरी ने ध्यान दिलाया कि भारतीय संसद में पहला महिला प्रसाधन गृह एक महिला स्पीकर ने बनवाया !

पत्रकार गीताश्री ने बहस छेड़ रखी है कि जाति और धार्मिक कट्टरवादिता से कई फुट ऊपर उठ चुके कबीर दास के नारी विरोधी (विरोधी हल्का शब्द है दमनकारी कहना ज्यादा सही होता) चेहरे को बार-बार छिपाने या रेशनलाइज करने की कोशिश की जाती है !

शम्बुक और एकलव्य आज मुख्यधारा में अपने संग हुए ऐतिहासिक अन्याय का जवाब मांगते हैं लेकिन सीता,शूपर्णखा,मंदोदरी,अहिल्या,उर्मिला का क्या ?

तुलसी जैसे रामराज्यवादी भी स्त्री के प्रति सर्वथा तटस्थ न रह सके। नारी की पूज्यनीय और प्रताड़नीय की दो अतिवादी छवियों के बीच कोई सामान्य नारी भी होती है इसे तुलसी ने  नहीं समझ सके थे। जबकि तुलसी जानते थे, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं।

सगुण और निर्गुण के दोपाटों पर बसे भक्त कवियों के विचार सिर्फ एक बिन्दु पर मिलता है, स्त्री दमन के मुद्दे पर। मुझे नहीं लगता कि जब बात स्त्री उत्पीड़न की होगी तो दलित-सवर्ण,अमीरी-गरीब,श्वेत-श्याम पुरूषों के बीच कोई फर्क रह जाएगा !!

निश्चय ही सवर्ण इस देश के सबसे शातिर प्राणी हैं लेकिन सवर्णों से भी शातिर हैं पुरुष। पहली बात केवल भारत के लिए सही है। दूसरी पूरी दुनिया के लिए। जिसे शक हो वो जांच ले।

5 मार्च 2010

बीहड़ में सिनेमा : १६ मार्च से चम्बल घाटी में होगा जमावड़ा

बीहड़ कभी भी अपनी जगह नहीं बदलते पर बदल गए हैं बीहड़ों के रास्ते और उनकी उम्मीदें !उम्मीदों पर ग्रहण है तो आशाओ पर पानी की गहरी धार.जिसमे से बिना सहारे के निकलना बीहड़ों के खातिर चुनौती भी है और जरुरी भी.कभी बीहड़ो की ओर रुख किया तो उपेक्षा ही नज़र आई .डकैतों के खात्मे के बाद विकास के नाम पर अरबों रुपयें मिले पर विकास आज भी उनसे कोशों दूर है .लोगों का रहन- सहन आदिम युग का है .अपराधी यही पनपते हैं और भौगोलिक परिस्थितियां उनका साथ देती है.

बीहड़ मैं दस्यु समस्या अभी भी मुह फैलाये खड़ी है.कभी पुलिस का आरोप तो कभी डकैतों की कारगुजारियो का दंश. शायद यही बीहड़ का दुर्भाग्य बन गया है. विकास की बातों पर गौर करें तो विकास में बीहड़ उपेक्षित है. क्योंकि विकास का पैकज बुंदेलखंड के हिस्से में जाता है और विकास के दावे बीहंचल करके ही किया जाता रहा है. यहाँ के स्थानीय नेता भी बीहड़ो का रुख नहीं करना चाहते,लिहाजा उनको बीहड़ो का दर्द नहीं समझ आता. बीहड़ के गावों के विकास की खातिर " खेत का पानी खेत में और गाँव का पानी तालाब में " साथ ही अनेक भूमि सुधार योजनाओ का लाभ महज उन्ही जगहों पर हुआ है जहाँ आला अधिकारियो का दौरा कराया जाना है ,बाकी क्षेत्रों के किसानो के हाथ खाली ही रहे हैं. बीहड़वासियों के बूढी आँखों में विकास के सपने तो पलते है पर हकीकत का रूप लेने से पहले ही कईयों आँखें बंद हो चुकी हैं उम्मीदों पर ग्रहण है तो भविष्य गर्त में नज़र आता है. विकास के ठेकेदार रसूख वाले बन बेठे हैं. जिनको विकास के नाम पर हर पांच साल बाद वोट लेना है. उन्हें इस बात से कुछ लेना देना नहीं है की विकास की जमीनी हकीकत क्या है ? कभी कोई बीहड़ो का रुख करता भी हैं तो बंजरो में कटीली झाड़ियो के बीच फिर से खुद को न उलझने का जज्बा लेकर जाता है.

कभी मौत का मंजर आये दिन अखबारों - खबरिया चैंनलो के लिए " चंबल घाटी और खून " जैसे शीर्षकों से पटी रहती थी. वस्तुतः वीहड़अंचल की भोगोलिक परिस्थितियां दस्यु समस्याओ के लिए ज्यादा जिम्मेदार रही हैं. डकैतों की भूमि तो पहले भी चम्बल रहा है. बात करीब १९२० के आसपास की हैं जब ब्रहमचारी डकैत ने डकेती छोडकर आज़ादी के समर में कूदा था, पर आज़ादी के इतिहास के समरगाथा से ब्रहमचारी डकैत गायब हैं.बीहड़ न सिर्फ विकास में बल्कि इतिहास में भी उपेक्षा झेलता आया है. आज बीहड़ की पहचान उसकी बदनामी से ही होती है. निर्भेय गुर्जर,फक्कड़ ,कुशमा ,रज्जन ,जगजीवन आदि ऐसे नाम रहे हैं जिन्होंने अपने दस्यु जीवन में बीहड़ों को अपने खौफ से उबरने दिया वहीँ दस्यु सुन्दरी सीमा परिहार के भाग्य का निर्णय मुम्बैया फ़िल्मी बाजार तय नहीं कर सका. सवाल यह उठता है की जब विनाश मीडिया की ख़बरों में नजर आता है तो विकास क्यों उपेक्षित है.

आज बीहड़ों का कसूर क्या है ? क्या यूं ही इस पर बदनुमा दाग बरकरार रहेगा ? या फिर सहयोग की खातिर हाथ बढाने में कोई झिझक है. हमारा मानना है कि बीहड़ों का शानदार इतिहास दुनिया के सामने आये ने कि इसका बदनुमा अतीत. बीहड़ो में कुछ दर्द है कुछ शिकायत हैं कुछ अपनापन है तो कुछ पाने कि हसरत भी इन बीहड़ो में छिपी है . बीहड़ो कि रवानी को दुनिया के सामने लाने कि हसरत ही फिल्म उत्सव आयोजन का मकसद बनी . उम्मीदों से परे यह फिल्म उत्सव उन बीहड़ गावो में आयोजित हो रहा है जो दस्युओ से प्रभावित रहे हैं. इसके साथ ही मार्च में औरैया, इटावा, मालवा, अम्बेडकर नगर, मऊ में फिल्म उत्सव का आयोजन किया जा रहा है. जिसमे खास तोर से जन सरोकारों पर केन्द्रित युवा फिल्मकारों कि फिल्मो का प्रदर्शन , जारी एवं मंच प्रदान कर प्रोत्साहन देना है. "अवाम का सिनेमा" के माध्यम से आम जन संवाद कर मन की जिज्ञासा शांत कर सके . इसी क्रम में पूरे देश में फिल्म के बहाने युवा प्रतिरोध को स्वर दे सकेंगे ,ऐसी उम्मीद दिखती है.

अभिवादन के साथ ,
शाह आलम
9873672153
तस्वीर महावीर गुर्जर की है। शाह आलम ने ही  दिया है।

3 मार्च 2010

धर्म और फलसफा

थामस मान
मुझे चाहे संक्षेप में या फिर ज्यादा विस्तारित स्वरूप में अपने फलसफे अथवा विचारों, या फिर कहें दृष्टिकोण या और बेहतर, जीवन और जगत के बारे में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना काफी मुश्किल जान पड़ता है। तस्वीरों और धुनों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया की ओर मेरे रवैये व अस्तित्वगत समस्याओं को अभिव्यक्त करने की आदत निरपेक्ष प्रदर्शन के उपयुक्त नहीं है। आज जब मुझसे बोलने को कहा जा रहा है, तो ऐसा लग रहा है कि मैं फाॅउस्ट हूं जिससे ग्रेशेन उसकी धार्मिक आस्था पर सवाल खड़े कर रहा हो।

भले ही आपकी नीयत मुझे सवालों के घेरे में खड़ा करने की न हो, लेकिन व्यवहार में आप दरअसल ऐसा ही कर रहे हैं। सही बात यह है कि मुझे यह बताने में ज्यादा आसानी होगी कि मैं धर्म के बारे में क्या महसूस करता हूं, बजाय इसके कि मेरा फलसफा क्या है। हालांकि मैं आध्यात्मिक मामलों में कोई भी सैद्धांतिक दावा नहीं करता हूं। लोग जिस आसानी से अपने होठों पर ईश्वर का नाम ले आते हैं, या फिर अपनी कलम से उसे लिख देते हैं, वह मुझे हमेशा काफी अचंभित करता है। मेरे मामले में धार्मिक चीजों के संदर्भ एक निश्चित किस्म की नरमी या कहें संकोच का भाव मुझे घेरे रहता है, न कि कोई आत्मविश्वास जैसी चीज। ऐसा लगता है कि इस विषय तक पहुंचने के लिए हमें कोई एक दिशा नहीं पकड़नी होगीः बल्कि जैसे किसी छोटे से काव्यात्मक मुहावरे से, एक नैतिक प्रतीक के माध्यम से, अगर मैं ठीक-ठीक कह पा रहा हूं तो- जहां यह विचार धर्मनिरपेक्ष हो जाता हो, जहां कुछ देर के लिए ही सही इसके ऊपर से पादरी का लबादा उतर जाए और जहां सिर्फ इंसानी आध्यात्मिकता का संतोषजनक प्रत्यय बचा रह जाए।

एक जानकार मित्र के लेखन के माध्यम से मुझे काफी बाद में लातिन शब्द रेलीजियो के उद्गम और इतिहास के बारे में पता चला। जिस क्रिया रेलेगेयर या रेलीगेयर से यह बना माना जाता है, उसका मूल अर्थ ध्यान रखना, ध्यान देना, खुद के बारे में सोचना है। नेगलेगेयर (उपेक्षा) के विपरीत इसका अर्थ एक ध्यान रखने वाला, सतर्क, सावधान, सरोकारी और सचेतन रवैया है- जैसा कि मैंने कहा, उपेक्षा और लापरवाही का उलटा। ऐसा लगता है कि रेलीजियो ने समूचे लातिन दौर काल में अपने भीतर इस सचेतनता के भाव को समाहित रखा है। पुराने लातिन साहित्य में धर्म या ईश्वरीय मसलों के सीधे संदर्भ के बगैर भी इसका प्रयोग हुआ है।

यह सब सुन कर मुझे खुशी हुई। तो मैंने खुद से कहा, कि अगर धार्मिक होना यही होता है, तो प्रत्येक कलाकार महज एक कलाकार होने के नाते ही खुद को धार्मिक पुरुष कहने का उपक्रम कर सकता है। क्योंकि आखिर एक कलाकार की प्रकृति के सबसे ज्यादा उलट लापरवाही और उपेक्षा के अलावा और क्या चीजें होंगी? उसके नैतिक स्तर का सबसे बड़ा लक्षण, उसके भीतर निहित सबसे बड़ा तत्व सावधानी, सतर्कता, सरोकार, सचेतनता आदि के अलावा और क्या हो सकता है- या कुल मिला कर कहें देखभाल! एक कलाकार सबसे सतर्क इंसान होता है बल्कि उससे भी ज्यादा इस मामले में श्रेष्ठ होता है; बौद्धिक तो यह व्यक्ति होता ही है, और जीवन व मस्तिष्क के बीच एक सेतु बनाने में अपनी मेधा का इस्तेमाल कर वह दिखाता है कि वह कुछ हट कर है- क्या हम उसे एक विशिष्ट किस्म का पेशेवर सनकी कह सकते हैं? हां, ऐसे व्यक्ति का सबसे प्रभावकारी तत्व सतर्कता ही होती हैः सार्वभौमिक सत्ता की इच्छा और गतिविधियों पर जबरदस्त और संवेदनशील निगाह; ताकि सच्चाई का बाना पहन सके; न्यायपूर्ण और आवश्यक चीजों की ओर मुड़ सके, दूसरे शब्दों में ईश्वर की सदिच्छा के अनुरूप, जिसकी सेवा एक विवेकवान और आध्यात्मिक व्यक्ति करता हो और ऐसा करते वक्त उस विद्वेष पर उसका ध्यान न जाता हो जो मूर्ख या डरे हुए लोगों में पैदा होता है, उन लोगों में जो अपने हितों के कारण काल के बुरे या अप्रासंगिक खंड से जुड़े होते हैं।

यानी एक कलाकार, एक कवि- न सिर्फ अपनी खुद की रचना बल्कि ईश्वर, सत्य और ईश्वरीय इच्छा के प्रति अपने सरोकार के कारण एक धार्मिक व्यक्ति होता है। तो ठीक ही है। आखिरकार, गोएथे का भी आशय यही था जब उन्होंने प्यार भरे उदात्त शब्द कहे थेः

Denkt er ewig sich ins Rechte,
Ist er ewig schön und gross.

दूसरे शब्दों में, मेरे लिए और मेरे जैसों के लिए धर्म मनुष्य के भीतर छिपी हुई एक चीज है। ऐसा नहीं है कि मेरी मानवीयता मानवता के दैवीकरण से उपजती है- शायद ही इसके लिए कम मौके आते हों! आखिर हमारे जैसी दिमागी रूप से दिवालिया प्रजाति में किसके पास इतना दिल होगा कि वह इस किस्म के आशावादी मुहावरे में फंसे, जब उसकी बातें रोजाना कटु और तीखे तथ्यों द्वारा झुठला दी जाती हों? हम रोज देखते हैं कि दस नीति निर्देशों के हिसाब से यह अपराधों में लिप्त रहता है; रोजाना हम उसके भविष्य को अंधकारमय बनाते जाते हैं; हम अच्छी तरह समझते हैं कि आखिर स्वर्ग के निर्माण के दिन से ही क्यों सारे देवताओं ने रचनाकार की इस संदिग्ध रचना में किए गए पक्षपात के कारण उसकी ओर से अपनी नाक-भौं सिकोड़ रखी है। और इसके बावजूद- पहले से कहीं ज्यादा आज मुझे लगता है कि हमें अपने मजबूत संदेह के बावजूद इंसानी नस्ल के प्रति सिर्फ निंदा और निराशा के विश्वासधात में नहीं जुड़ना चाहिए। इसके दोयम दर्जे के तमाम साक्ष्यों के बावजूद हमें इसके महान और सम्मानजनक तत्वों को नहीं भूलना चाहिए, जो कि कला, विज्ञान, सत्य की खोज, सौंदर्य के निर्माण, न्याय की अवधारणा में परिलक्षित होते हैं। हां, यह सही है कि जब हम ‘‘मनुष्य’’ और ‘‘मानवता’’ जैसे शब्द बुदबुदाते हैं और खुद की ओर से उस महान रहस्य के प्रति उपेक्षा बरतते हैं, तो हमारी आध्यात्मिक मृत्यु हो जाती है।

आध्यात्मिक मृत्यु। यह शब्द खतरनाक ढंग से धार्मिक प्रतीत होता हैः इसका गांभीर्य मारक है। और वास्तव में मनुष्य के बारे में सारे सवाल और उसके बारे में हमारी सारी सोच आज जीवन और मरण जैसी गंभीरता लिए हुए हमारे समक्ष उपस्थित है जो आज तक अज्ञात है, एक ऐसे कालखंड में जो हमारे जितना कटु नहीं। सभी के लिए, लेकिन विशेष तौर पर एक कलाकार के लिए यह मसला आध्यात्मिक जीवन और आध्यात्मिक मृत्यु का है; धार्मिक शब्दावली में कहें तो यह दरअसल मुक्ति का सवाल है। मैं मानता हूं कि जो लेखक रहस्यवादी चीजों का सामना न कर उनके साथ विश्वासघात करता है और इंसानी समस्याओं को आज के संदर्भ में राजनीतिक रूप में देखता है, वह एक भटका हुआ व्यक्ति है। उसका पतन अपरिहार्य है। और न सिर्फ उसके काम पर असर पड़ेगा, उसकी प्रतिभा में गिरावट आएगी, जब तक कि वह अपनी पैदा की हुई किसी भी रचना को जीवन दे पाने में कामयाब नहीं हो जाता। इतना ही नहीं, उसकी पहली की रचना भी, जो कभी सजीव और अच्छी थी, ंवैसी नहीं रह जाएगी, उसकी आंखों के सामने वह धूल में मिल जाएगी। यह मेरे विश्वास हैं; मेरा दिमाग ऐसे ही सोचता है।


क्या मैं इंसान को एक रहस्य बताने के क्रम में कुछ ज्यादा कह गया हूं? उसका उद्गम क्या है? वह प्रकृति से उपजा है, पाशविक प्रकृति से, और ऐसा ही व्यवहार अपनों से करता है। लेकिन उसके भीतर प्रकृति खुद को साकार करती है। ऐसा लगता है कि प्रकृति ने उसे इसलिए नहीं बनाया कि वह अपने होने पर स्वामित्व कायम कर सके- यह तो काफी गहरी बात है। उसके भीतर प्रकृति आध्यात्मिक पक्ष को मुक्त करती है,वह उसके भीतर खुद पर सवाल खड़े करती है, सराहना करती है और खुद का मूल्यांकन भी, ठीक ऐसे जीव में जो एक साथ प्राकृतिक भी है और उससे उच्चतर भी। चेतनासंपन्न होने का अर्थ है सचेतन होना, अच्छे और बुरे के बारे में जानना। और इंसानी स्तर से नीचे प्रकृति इन चीजों को नहीं जानती। वह ‘निर्दोष’ है। इंसान के भीतर वह अपराधबोध से ग्रस्त हो जाती है, यह उसका पतन है। यानी इंसानी नस्ल प्राकृतिक निर्दोषता से प्रकृति का पतन है; लेकिन वह पतन नहीं बल्कि उन्नयन है, क्योंकि निर्दोषता की स्थिति से चेतनता की स्थिति उच्चतर होती है। ईसाई जिसे ‘‘ओरिजिनल सिन’ यानी मौलिक बुराई कहते हैं, वह सिर्फ चर्च की ताकत तले लोगों को दबाए रखने की पुरोहिती चाल से काफी आगे की चीज है। यह एक आध्यात्मिक जीव के रूप में इंसान में मौजूद उसकी आंतरिक कमजोरियों व गलती करने की उसकी संवेदनशीलता के प्रति सशक्त जागरूकता है, और इसके ऊपर उसके जाने की आकांक्षा का नाम है। क्या यह प्रकृति के साथ धोखा है? कतई नहीं। यह उसकी खुद की गहन इच्छा के प्रति प्रतिक्रिया है। क्योंकि उसने अपने आध्यात्मिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही मनुष्य को गढ़ा है।

ये विचार एक साथ ईसाई भी हैं और मानवीय भी; ओर इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि हम आज अपनी पश्चिमी दुनिया की संस्कृति में ईसाई लक्षणों के विश्लेषण पर जोर देकर बेहतर करेंगे। मुझे उस अर्ध-शिक्षित भीड़ के प्रति घोर विद्वेष पैदा होता है जो खुद को ‘ईसाइयत की फतह’ से आगे नहीं देख पाती। लेकिन भविष्य की मानवता को लेकर मेरा विश्वास उतना ही सशक्त है- कि नई इंसानी और सार्वभौमिक भावना जो अपने जन्म की प्रक्रिया में है, खुद को ईसाई आस्था की आध्यात्मिकता में नहीं खपा देगी, आत्मा और शरीर, जीवन और रहस्य, सत्य और ‘‘जगत’’ के ईसाई द्वैत में नही नष्ट कर देगी।

मुझे भरोसा है कि हमारी सभी इच्छाओं में सिर्फ वे जो अच्छी और सार्थक होंगी जो इस नई मानवीय भावना को जन्म देने में योगदान देंगी, उन्हीं के साये और आश्रय में इस मौजूदा नेतृत्वविहीन युग की समाप्ति के बाद समूची मानवता बसर करेगी। मुझे भरोसा है कि विश्लेषण और संश्लेषण के बाद मेरी खुद की इच्छाओं का कोई अर्थ और मूल्य तभी होगा जब वे इस आसन्न जन्म के साथ एक बोधकारी संबंध स्थापित करेंगी। वास्तव में, मैं एक नए, तीसरे मानवतावाद के जन्म में भरोसा करता हूं जो अपने पूर्वजों से रंग-रूप और बुनियादी अंतर्वस्तु में भिन्न होगा। यह इंसानियत के साथ छल नहीं करेगा, उस पर गुलाबी चश्मे से निगाह नहीं डालेगा क्योंकि इसके पास ऐसे अनुभव होंगे जिसके बारे में दूसरे नहीं जानते। उसके पास इंसान के अंधेरे, शैतानी, और यथार्थवादी ‘‘प्राकृतिक’’ पक्ष का पुष्ट ज्ञान होगा; जो उसके पराजैविक और आध्यात्मिक पक्ष के प्रति सम्मान से एकाकार होगा। यह नई मानवता सार्वभौमिक होगी- और इसकी प्रवृत्तियां एक कलाकार जैसी होंगी। यानी वह इस बात को स्वीकार करेगी कि इंसान का वास्तविक सौंदर्य और मूल्य इस बात में निहित है कि वह दो साम्राज्यों का वासी है, एक प्रकृति और दूसरा चेतना। यह स्वीकार करेगी कि इस तथ्य में किसी भी किस्म का रूमानी संघर्ष या त्रासद द्वैतवाद अंतर्निहित नहीं; बल्कि नियति और मुक्त चयन का एक परिणामकारी मिश्रण है। इसी के आधार पर मानवता के प्रति प्रेम का जन्म होगा जहां निराशावाद और आशावाद मिल कर एक-दूसरे को खारिज कर रहे होंगे।

मैं अपनी युवावस्था में ब्रह्मांड के उस निराशावादी और रूमानी विचार के प्रति काफी आकर्षित था जो जीवन और चेतना, संवेदना और उपभोग को एक-दूसरे के विपरीत खड़ा करता था, और जिससे कुछ बेहतरीन बाध्यकारी प्रभाव पैदा होते हैं- बाध्यकारी, उसके बावजूद न तो उतने वैध और न ही वास्तविक। संक्षेप में कहें तो मैं वैग्नराइट था। लेकिन यह बहुत संभव है कि अपनी उम्र पकने के क्रम में मेरा प्रेम और ध्यान ज्यादा से ज्यादा एक कहीं ज्यादा प्रसन्नचित्त और विवेकपूर्ण माॅडल पर जा टिका हैः गोएथे की वह छवि, उनके भीतर शैतानी और शहरी का वह मिश्रण, जिसके चलते वह इंसानी सभ्यता के चहेते बन गए। मेरा यह चुनाव बहुत हलके में नहीं था- एक ऐसी महागाथा का नायक जो मेरे जीवन के काम को संचालित कर रहा है- ‘‘एक ऐसा व्यक्ति जिस पर ऊपर से नैसर्गिक और गहराइयों के वरदान बरसते थे।’’

पिता जैकब ने जोसेफ को यह वरदान दिया था। यह उनकी इच्छा नहीं थी कि उसे वरदान मिले, बल्कि वह ऐसा ही था उसका एक बयान था, कि वह खुश हो सके। और मेरे लिए मानवता की के आदर्श की यह सबसे संक्षिप्त और सारगर्भित व्याख्या है। मस्तिष्क और व्यक्तित्व में जहां कहीं भी मुझे इस आदर्श का प्रतिबिंबन मिलता है- अंधेरे और प्रकाश, भाव और विवेक, आदिम और सभ्य, ज्ञान और आनंद के एकीकरण के रूप में- हम संक्षेप में उसे मनुष्य कहते हैं। वहीं मेरा दिल लगता है, वहीं मुझे रहने को एक घर मिल जाता है। मैं साफ कर दूं कि मेरा आशय रूमानियत को हलका नहीं करना है, या बर्बरता को मैं परिष्कृत नहीं करना चाहता। यह तो प्रकृति है, संस्कृति है; यह एक कलाकार के रूप में मनुष्य की प्रतिमा है, और जहां कला ज्ञान के पथ पर मनुष्य की पथ प्रदर्शक है।

मानवता के प्रति सारा प्रेम भविष्य से बंधा हुआ है; और यही बात कला प्रेम पर भी लागू होती है। कला ही आशा है... मैं यह नहीं कह रहा कि मनुष्यता के भविष्य की सारी उम्मीद उसी के कंधों पर है; बल्कि सभी मानवीय आशाओं की वह अभिव्यक्ति है, आनंदित और संतुलित मानवता की एक तस्वीर। मैं यह मानता हूं, बल्कि मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि भविष्य ऐसा आ रहा है जहां हम ऐसी तमाम कला को काले जादू, विवेकहीन और उत्तेजना का उत्पाद कह कर खरिज कर देंगे जो बौद्धिक न हो। हम उसकी उसी हद तक आलोचना करेंगे जिस हद तक वह हमारे युग में जगह पा चुकी होगी, जिस युग में हम रह रहे हैं। जाहिर तौर पर कला सिर्फ मिठास और प्रकाश का नाम नहीं है। लेकिन वह पूरी तरह अंधकारमय, अंधी और पाताल की गहराइयों जितनी शैतानी प्रजाति भी नहीं है। वह सिर्फ ‘‘जीवन’’ नहीं। भविष्य के कलाकार के पास अपनी कला का एक स्पष्ट और ज्यादा सुखद संस्करण होगा जिसे वह ‘‘श्वेत’’ जादू कह सकेगा; एक ऐसा जादू जो जीवन और चेतना के बीच एक मध्यस्थ का काम करेगा, जिसके पर समय के होंगे, जैसा कि हर्मेस ने कल्पना की थी। क्योंकि मध्यस्थता चाहे कैसी भी हो, वह खुद चेतनामय होती है।

अनुवाद - अभिषेक श्रीवास्तव