मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बाँहे फैलाए !!
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं
व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने
सब सच्चे लगते हैं
अजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती है
मैं कुछ गहरे मे उतरना चाहता हूँ
जाने क्या मिल जाए !!
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है
हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है
प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य-पीड़ा है
पलभर मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ
प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ
इस तरह खुद ही को दिए-दिए फिरता हूँ
अजीब है जिंदगी !!
बेवकूफ बनने की खतिर ही
सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ
और यह देख-देख बड़ा मजा आता है
कि मैं ठगा जाता हूँ
हृदय में मेरे ही
प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा है
हँस-हँसकर अश्रुपूर्ण,मत्त हुआ जाता है
कि जगत्..... स्वायत्त हुआ जाता है।
कहानियाँ लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
जहाँ जरा खड़े होकर
बातें कुछ करता हूँ
......उपन्यास मिल जाते।
दुख की कथाएँ, तरह तरह की शिकायतें
अहंकार विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,
जमाने के जानदार सूरे व आयतें
सुनने को मिलती हैं !
कविताएँ मुसकरा लाग- डाँट करती हैं
प्यार बात करती हैं।
मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियां
श्रद्धाएँ चढ़ी हैं !!
घबराए प्रतीक और मुसकाते रूप- चित्र
लेकर मैं घर पर जब लौटता.....
उपमाएँ द्वार पर आते ही कहती हैं कि
सौ बरस और तुम्हें
जीना ही चाहिए।
घर पर भी,पग-पग पर चौराहे मिलते हैं
बाँहे फैलाए रोज मिलती है सौ राहें
शाखाएँ-प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं
नव-नवीन रूप-दृश्यवाले सौ-सौ विषय
रोज-रोज मिलते हैं....
और,मैं सोच रहा कि
जीवन में आज के
लेखक की कठिनाई यह नहीं कि
कमी है विषयों की
वरन् यह कि आधिक्य उनका ही
उसको सताता है
और वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है !!
- मुक्तिबोध
31 मई 2010
मुझे कदम-कदम पर चौराहे मिलते हैं
चिप्पी :-
मुक्तिबोध
29 मई 2010
खूनी लाल सलाम !
यह याद रखने की बात है कि कोलकाता से मुम्बई जाने वाली ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस में हम और आप भी हो सकते थे। जिसे माओवादियों ने दुर्घटनाग्रस्त करवा दिया। परिणामस्वरूप इस ट्रेन में सफर कर रहे करीब 100 मासूमों की जान जा चुकी है। करीब 200 मासूम नागरिक जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। लाल रंग से आब्सेस्ड वाम-चरमपंथियों ने इस देश के तीन सौ मासूम परिवारों को लाल खून से रंग दिया है।
जो लोग इस हादसे के शिकार नहीं हुए हैं उनके सामने प्रश्न है कि मासूमों का खून बहाकर लाल जमीन तैयार करने वालों ने यह खूनी लाल सलाम किसको दिया है ?
पुनश्च
एक अनुभवी जिम्मेदार पत्रकार ने कमेंट बाक्स में स्पष्ट किया है कि इस ट्रेन दुर्घटना के सही कारण सामने नहीं आए हैं। मैंने Times Of India में आई खबर के एंगल पर भरोसा करके यह त्वरित पोस्ट लिखी थी। उस वक्त यह ध्यान नहीं रहा कि TOI का यह product 'Paid News' भी हो सकता है !
पुनश्च
एक अनुभवी जिम्मेदार पत्रकार ने कमेंट बाक्स में स्पष्ट किया है कि इस ट्रेन दुर्घटना के सही कारण सामने नहीं आए हैं। मैंने Times Of India में आई खबर के एंगल पर भरोसा करके यह त्वरित पोस्ट लिखी थी। उस वक्त यह ध्यान नहीं रहा कि TOI का यह product 'Paid News' भी हो सकता है !
चिप्पी :-
विचार-विमर्श
28 मई 2010
लाल मिट्टी-लाल सलाम
अजय प्रकाश की रपट
छत्तीसगढ़ में ‘सलवा जुडूम’ अभियान, आदिवासियों की व्यथा और नक्सली जीवन के सच से बावास्ता होने, हम जब रायपुर में अपने मिलने की जगह पर पहुंचे तो पहली बार लाल मिट्टी पैरों में लगी थी और उसी मिट्टी का जन्मा एक लाल ‘लाल सलाम’ बोला था। उसी ने कहा रायपुर में लाल सलाम बोलने वाला हर आदमी नक्सली है या सरकार की नजर में नक्सलियों का एजेंट है। इसलिए जो उनके बारे में लिखेगा, उनसे मिलेगा, साक्षात्कार लेगा वह ‘जन सुरक्षा अधिनियम’ के तहत छत्तीसगढ़ सरकार के जेलखाने में होगा।
मगर हम डिगे नहीं। कलम की नोक को संगीनों से टकराने चल पड़े। एक ठिगने कद का गोंड नौजवान जो थोड़ी-बहुत हिंदी जानता था उससे हमें पता चला कि रायपुर से हमारी मंजिल काफी दूर है। ग्यारह घंटे के रास्ते में ड्राइवर ने वह ढेर सारी जानकारियां हमें दे दीं जो किसी क्षेत्र की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति को जानने-समझने की बुनियादी शर्त होती है। हमारा ड्राइवर एक बुजुर्ग सरदार था जो क्षेत्र का चलता-फिरता इन्साइक्लोपीडिया था। उसने बताया कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का कहते हैं - राज्य के 32 प्रतिशत थाने नक्सल प्रभावित हैं। फिर खुश होते हुए कहा -‘अपन लोगों को नक्सली कभी नहीं छेड़ते। वे तो बांस,तेंदूपत्ता के ठेकेदारों से वसूली करते हैं। मगर उनका एक काम गड़बड़ है,सड़क नहीं बनाने देते। बारूदी सुरंग से उड़ा देते हैं। पुलिस वालों से तो उनकी दुश्मनी जन्मजात है। अपन,जहां आप लोगों को छोड़ेगा वहां तो एक पुलिस वाला भी नहीं दिखता। सिर्फ सीआईएसएफ। वैसे सीआईएसएफ भी क्या कर लेती है। इसी साल फरवरी महीने में सीईएसएफ के बैलाडिला कैंप पर हमला कर नक्सलियों ने हथियार लूट लिये और कई टन विस्फोटक साथ ले गये।’ हमारी गाड़ी दंतेवाड़ा की तरफ बढ़ी तो बीच में गीदम पुलिस चौकी के पास हम चाय-पानी के लिए रुके. वहां ड्राइवर ने बताया कि दो महीने पहले इस थाने को नक्सलियों ने लूट लिया था।
अब रात के आठ बज रहे थे। बुजुर्ग सरदार हमें किरंदुल छोड़कर जा चुका था। किरंदुल जिसे बैलाडिला के नाम से भी लोग जानते हैं वहां हम एक रात और दिन रहे। रात में उतरने के साथ ही पहली निगाह छत्तीसगढ़ के समृधि का पर्याय कहे जाने वाले 'नेशनल मिनरल्स डेवेलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएमडीसी)'पर पड़ी जिसके बारे में कुछ बातें हमें सरदार ने भी बताईं थीं। जैसे यह कंपनी जापान सरकार के मदद से बनी है और भारत में इससे बड़ा कोई खदान नहीं है। यह पूरा क्षेत्र आदिवासी है लेकिन एनएमडीसी में आदिवासियों को काम पर नहीं रखा जाता । कंपनी के बाहर माल ढोने के लिए ठेकेदार इनका इस्तेमाल बस कूली के रूप में करते हैं। कंपनी के कामगार बाहर से आते हैं।
गहराती रात की तेज हवाएं,मौसम में अचानक बढ़ी ठंड,सड़कों पर घूम रहे कुत्ते और गश्त लगा रही सीआईएसएफ की गाड़ियां, ये सब मिलकर दहशतनुमा माहौल रच रहे थे। रात कटी, दिन गुजरा और फिर रात को हम चल पड़े। हम अपनी मंजिल के नजदीक पहुंच रहे थे। मगर अब अगल-बगल गाड़ियां,बिजली के पोल, इमारतें नहीं थीं। पहाड़,नदियां,जंगलों का असीम फैला मैदान ही अपना था और हम उनके लिए बेगाने। सहसा जंगलों के पास पहुंची हमारी टीम को देखकर गांव में अफरातफरी मच गयी। लोग घरों को छोड़ जंगलों में भागने लगे तो हमारे ‘कुरियर’ने गोंडी में चिल्लाकर बताया कि यह पुलिस- एसपीओ के लोग नहीं हैं, सलवा जुडूम की सच्चाई जानने-समझने आये हैं।
इतना सुनने के बाद परछाइयां हम लोगों की तरफ बढ़ती दिखायी दीं। उन्होंने आगे बढ़कर हाथ मिलाया,लाल सलाम बोला और राहत की सांस ली। टॉर्च की मद्धिम पड़ रही रोशनी में भी उनके चेहरे पर उभरा सुकून किसी बीते भय की तरफ इशारा कर रहा था। बहरहाल,हम लंबी दूरी तय करने चल पड़े। जहां हम पहुंचे वह पुरनगिल था और नजदीक ही कहीं नदी के बहने की आवाज आ रही थी। कुशल-क्षेम होने के बाद ग्रामीण लकमा ने बताया कि स्कूल-अस्पताल तो इस इलाके में एक भी नहीं हैं। दसियों गांवों के बीच सड़क की तरफ कहीं-कहीं स्कूल हैं,लेकिन जब से सलवा जुडूम अभियान शुरू हुआ है तब से कोई मास्टर नहीं आया है। जुडूम वालों ने सुकलु नाम के एक शिक्षक की भी हत्या कर दी, जिसके बाद मास्टर आने से डरते हैं। हां, गंगकोट की तरफ एक आश्रम जरूर है जहां पांचवी कक्षा तक बच्चे पढ़ते हैं। दवा भी कभी-कभार सड़क की तरफ मिल जाती थी, लेकिन सालभर से वह भी बंद है। गंगलूर प्रखंड के पालनार गांव का नौजवान लक्खु 2001 से गांव में 4-14 वर्ष तक के बच्चों को पांचवीं कक्षा की शिक्षा दिया करता था,परंतु सलवा जुडूम गुंडों ने उसे इस कदर पीटा कि वह दुबारा बच्चों को पढ़ाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। दूसरा पढ़ने का विकल्प तोरका गांव का आश्रम था जिसे सलवा जुडूम ने तहस-नहस कर दिया।
रात के लगभग दस बजे हमें पता चला कि पत्रकारों की एक और टीम आयी है और थोड़ी दूरी पर ठहरी हुई है। हमारी टीम को इस बात की खुशी हुई कि चलो इस बियावान में अपनी बात समझने वाले कुछ लोग और आ गये हैं। थोड़ी देर की बातचीत के बाद हमें दाल-चावल खाने को मिला और जमीन पर झिल्लियों का बिस्तर बिछा दिया गया। गद्दों पर नींद लेने के आदी हम ‘शहरी मानुष’ सोने का प्रयास ही कर रहे थे कि कुत्ते तेज आवाज में भौंकने लगे। सामने से चार-पांच टॉर्च लाइटें आगे बढ़ती दिखीं। जब वे लोग झोपड़ियों के नजदीक पहुंचे तो कुत्ते दुम हिलाने लगे। उन्होंने हम सबको लाल सलाम किया। पांचों के कंधों पर बंदूकें लटकी हुई थीं। आते ही उन्होंने हमें एक चिट्ठी थमायी जो राज्य सचिव गणेश की थी। उस पत्र में कामरेड गणेश ने हमारा दण्डकारण्य के विशाल वन क्षेत्र में आने का स्वागत किया था और आगे लिखा था कि हम लोगों से उनकी मुलाकात अगले दिन संभव होगी। चिट्ठी लेकर आये चारों नौजवानों की बातचीत से पता चला कि वे दलम के सदस्य हैं। दलम यानी पार्टी का पूर्णकालिक हथियारबंद दस्ता, जिसे गुरिल्ला आर्मी के रूप में भी जाना जाता है। दलम ने बताया कि वे हमें अगली सुबह पांच बजे एक दूसरी जगह पर ले जायेंगे। हम लोगों को इन्हीं की सुरक्षा में चलना पड़ेगा।
हमें पहाड़ों और जंगलों में चलने की आदत नहीं थी। इससे भी बढ़कर ये कि पैदल चलना सबसे अधिक भारी पड़ रहा था। हम पुरनगिल पांच घंटे पैदल चलकर पहुंचे थे। जब हमें यह पता चला कि पांच घंटे और चलकर मुख्य स्थान पर पहुंचना है तो हम पत्रकारों के पैरों की थकावट और बढ़ गयी। जहां हम पहुंचे वह क्षेत्र नक्सली आंदोलन के मुख्य आधार वाले इलाकों में से एक था। बावजूद उसके गुरिल्ले बेहद सतर्क थे और हथियारबंद जनमिलीशिया को पहरे पर लगा दिया गया था। बताया गया कि हर डेढ़ घंटे में ड्यूटी बदलती रहती है। सोमलु,जिसके घर पर हम रात को ठहरे उसने बताया कि यह सुरक्षा हम पुलिस से निपटने के लिए करते हैं। दूसरा यह कि आप लोग हमारे मेहमान हैं और उन चंद पत्रकारों में से हैं जिन्होंने तमाम खतरों को मोल लेते हुए यहां तक की दूरी तय की। इसलिए भी हमें सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना पड़ रहा है। भौगोलिक तौर पर समझने के लिए बताया गया कि बस्तर का यह दक्षिणी क्षेत्र है। बस्तर को उनकी पार्टी ने आधार इलाके खड़ा करने की दृष्टि से दो और इलाकों उत्तरी और पश्चिमी बस्तर में विभाजित किया है। खासकर 2001में संपन्न तत्कालीन पीडब्ल्यूजी की नौंवी कांग्रेस में दण्डकारण्य को आधार इलाके में तब्दील करने का कार्यभार अपनाये जाने के बाद से आंदोलन की रफ्तार और बढ़ गयी।
सुबह उठने में हम लोगों ने थोड़ी हिला-हवाली की। गुरिल्ले पांच बजे से पहले उठकर नित्य कर्म से निवृत हो हमें उठाने लगे। हम लोग भी साढ़े पांच बजे तक अपना-अपना किट लेकर चल पड़े। पुरनगिल गांव के ठीक पीछे कोटरी नदी मिली जो हमारे लिए अद्भुत थी। सुबह के शांत माहौल में उसकी ध्वनि किसी हरकारे जैसी थी। दलम सदस्य शुकु ने बताया कि यह नदी छह महीने गेरूए रंग की रहती है और छह महीने इसका पानी स्वच्छ रहता है, मगर ऐसा पिछले सात-आठ सालों से ही हो रहा है। ऐसा किस कंपनी की वजह से हो रहा है वह यह तो नहीं जानते, लेकिन इतना अवश्य जानते हैं कि यह नदी बैलाडिला के पहाड़ों की तरफ से आती है।
हमने पहली चलायी में तीन छोटी नदियां पार कीं और चार घंटे में एकाध हाल्ट लेकर पीरिया गांव पहुंचे। दलम ने बताया -'यह गांव पांच किलोमीटर में फैला हुआ है । पहले यह नक्सलियों का सुरक्षित इलाका नहीं था। सलवा जुडूम अभियान के बाद यहाँ आधार बना है।' साथ चलने वालों से पता चला कि रास्ते में पड़ने वाले सभी टोले और घर पीरिया गांव के तहत आते हैं। इस गांव के सरपंच को माओवादी पार्टी की जन अदालत ने गोली मारने का फैसला दिया था। गांव के ही मंगु ने अपनी टूटी-फूटी हिंदी में बताया कि वह सरपंच एसपीओ हो गया था और पुलिस की मुखबिरी करता था। उसने यह भी बताया कि सरपंच को पार्टी ने गलतियां सुधारने के तीन मौके दिये,मगर वह अपने आदतों से बाज नहीं आया और थोड़े से पैसे के लालच में तेरह घरों को जलवा दिया। उस घटना के बाद गांव के लोगों ने तय किया कि उसे गोली मार दी जाये। एसपीओ माने स्पेशल पुलिस अफसर। एसपीओ की खास बात यह है कि इनकी भर्ती आदिवासियों के ही बीच से होती है। इस समुदाय का मानना है कि यदि एसपीओ नहीं होते तो सीआरपीएफ और नगा बटालियन जंगलों के अंदर नहीं घुस पाते। सरकार ने सलवा जुडूम को सफल बनाने के लिए 3500लोगों को एसपीओ बनाया जिसके बदले उन्हें 1500 रुपये महीने दिये जाते हैं।
इसी गांव के दसवीं पास बुद्धराम के अनुसार पैसे का लालच आदिवासियों को एक दूसरे के खिलाफ भड़का रहा है। यह अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’जैसा है। जब सरकार को अपने तमाम प्रयासों से साफ हो गया कि वह नक्सली आधार को नेस्तनाबूद नहीं कर पायेगी तो छत्तीसगढ़ सरकार ने इजरायली सरकार की तर्ज पर ‘सलवा जुडूम’ का गठन किया। छत्तीगढ़ के बस्तर इलाके में सलवा जुडूम अभियान का नेतृत्व कर रहे कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा ने इस तरह के जन जागरण अभियान पहले भी चलाये हैं। वर्ष 1991 और 1997 में जन जागरण के नाम पर चलाये गये इन अभियानों को कोई खास सफलता नहीं मिल पायी थी। सफलता तो इस बार भी हाथ नहीं लगी है,मगर इस बार के जन जागरण अभियान में जो बर्बरता आदिवासियों पर ढायी गयी वह ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है। ‘आपरेशन रक्षक’ और ‘आपरेशन ग्रीन हंट’के नाम से दमन अभियान चलाये गये। इसके साथ ही गांवों में ‘ग्राम सुरक्षा समिति’का निर्माण कर सरकार की ओर हथियार देने की भी घोषणा की गयी। दरअसल,एसपीओ का प्रयोग कश्मीर की तर्ज पर किया गया और दंतेवाड़ा में इसकी ट्रेनिंग भी दी गयी।
ये तमाम बातें करते हुए वे लोग हम लोगों को एक खुले मैदान में ले गये जहां एक साफ-सुथरी झोपड़ी में तीन-चार चारपाइयां बिछी हुई थीं। इस समय घड़ी ने दिन के ग्यारह बजा दिया था। वहां आधे दर्जन महिला दलम ने हमारा स्वागत किया। हमें विशेष व्यवस्था के तहत दूध की चाय पिलायी गयी। विशेष व्यवस्था इसलिए कि वे लोग लाल चाय ही पीते हैं। चाय पीने या खाना खाने के दौरान गिलासों और थालियों की समस्या को वे पत्तों के दोने से दूर करते थे। गांव वालों को छोड़ सबके लिए एक चीज समान थी,वह था गर्म पानी। चूंकि दलम सदस्य हमेशा क्षे़त्रों का भ्रमण करते,जन समस्याओं को निपटाते,पार्टी मीटिंगें करते हुए आगे बढ़ते रहते इसलिए उनके किट का अहम हिस्सा,गर्म पानी था। सभी दलम कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के पास फौजी किट मौजूद रहती है। किट में कुछ दवाएं, घड़ी, टॉर्च, एक खाली पाउच, दो बाई दो मीटर की एक पॉलीथीन और इन सबसे बढ़कर एक हथियार हमेशा साथ रहता है।
साये के माफिक संगीनें इन गुरिल्लों के साथ लगी रहती हैं,फिर चाहे गुरिल्ला सो रहा हो या नित्य कर्म से निवृत ही क्यों न हो रहा हो। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सहज-स्वाभाविक जिंदगी बसर करने वाले इन आदिवासियों के बीच बीस से तीस हजार के आसपास गुरिल्ले हैं जिनकी सुबह और रात संगीनों के साये के बीच होती है। वैसे तो भारतीयकम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी),दण्डकारण्य इकाई आदिवासी मजदूर किसान संगठन,आदिवासी महिला संगठन,दण्डकारण्य आदिवासी बाल संगठन,संघम आदि संगठनों के माध्यम से आम जनता के बीच व्यापक पैठ रखती है,लेकिन पार्टी को मजबूत बनाने और दीर्घकालिक लोकयुद्ध को जारी रखने में मिलीशिया, जनमिलीशिया और दलम का महत्वपूर्ण योगदान है। जहां डीकेएमएस,केएएमएस,बलल (बाल संगठन) जनता के बीच काम करने वाले जनसंगठन हैं,वहीं दलम जैसी शाखाएं पार्टी संगठन हैं। यह जानकारी हमें बुन्नू ने दी जो तीन साल पहले दलम से जुड़ा है। इसी बीच लक्की नाम की एक महिला कामरेड आकर बताती है कि दोपहर का भोजन तैयार हो चुका है। खाने पर जाते हुए महिला कामरेड बद्री से बातचीत के दौरान पता चला कि पीपुल्स वार का नाम बदल चुका है और भाकपा (माओवादी) हो गया है। पार्टी का नाम परिवर्तन 2004 के सितंबर माह में हुआ था जब पीपुल्स वार की एकता माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसीआई) से हुई थी।
इस एकता को सरकार ने नक्सलियों की सफलता के रूप में स्वीकारा था। हमारी बातचीत और आगे बढ़ पाती कि उसी वक्त सामने से गुरिल्ला का एक दल आता दिखायी दिया। उस दल में से दो लोगों के पास लाइट मशीनगन और एसएलआर थी। बंदूकों की चर्चा इसलिए कि हमने बंदूकों को ही देखकर नेता का अंदाजा लगाया। दल के बाकी लोग‘लाल सलाम’बोलकर हमसे अलग हो गये। सिर्फ वही दो लोग हम लोगों की तरफ बढ़े। उनमें एक पुरुष था जो ठिगने कद का दुबला-पतला गोरा गोंड आदिवासी था। वह भाकपा (माओवादी) का स्टेट सेक्रेटरी गणेश था, जिस पर सरकार ने पांच लाख का इनाम रखा है। दूसरी दलम सदस्य एक महिला थी जिसका परिचय डिवीजनल संयोजक के रूप में हुआ। उसके बाद गणेश से जो सवाल-जवाब का दौर शुरू हुआ वह रात के नौ बजे खत्म हो पाया। पार्टी की गतिविधियों की सामान्य चर्चा के बाद स्टेट सेक्रेटरी ने अपनी पूरी बातचीत ‘सलवा जुडूम’ अभियान जिसे वे सरकारी गुंडों का जुल्म नाम देते हैं,पर केंद्रित की। सलवा जुडूम शब्द का गोंडी भाषा में संधि विच्छेद कर सचिव ने बताया कि इसका अर्थ ‘ठंडा शिकार’ होता है।
सेक्रेटरी की नजर में यह नक्सलियों के खिलाफ चलाया गया पहला सरकारी अभियान नहीं है। गणेश बताते हैं कि माओवादी संगठनों के पचीस साल के राजनीतिक सफर में (एकता से पहले भी)अलग-अलग सरकारों ने केंद्र सरकार की मदद से दर्जनों बार दमन अभियान चलाये हैं। नीजि सेनाओं का गठन,जनता के एक तबके को राज्य प्रायोजित हिंसा से जुड़ने के लिए बाध्य करना,माओवादियों के खिलाफ खड़ा कर देना और एक बड़ा झूठ गढ़ना कि आदिवासी खुद ही माओवादियों के खिलाफ खड़े हो गये हैं जैसे कई अभियान हमें उखाड़ फेंकने के लिए सरकार ने सिलसिलेवार सत्ता ने प्रायोजित किये। दण्डकारण्य में ‘जन जागरण’ अथवा ‘सलवा जुडूम’ के नाम से, झारखण्ड में ‘संदेश’ कहकर, महाराष्ट्र में ‘गांवबंदी’ का नाम देकर, उड़ीसा में ‘शांति सेना’ के नाम पर नक्सली दमन की योजना अमल में लायी गयी। इतना ही नहीं, आंध्र प्रदेश में ‘कोबरा’ तथा ‘टाइगर्स’ के नाम से निजी हथियारबंद गिरोहों का भी गठन किया गया है।
सेक्रेटरी के मुताबिक सरकार ने दण्डकारण्य में जो जुल्मी अभियान छेड़ा है उसके पीछे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबाव तथा स्थानीय सामंती ताकतों की पैरोकारी रही है। मई 2005में हुई मुख्यमंत्री रमन सिंह की कनाडा और अमेरिका यात्रा के मद्देनजर भी समझा जा सकता है क्योंकि ‘सलवा जुडूम’ने अपना पहला निशाना पांच जून और दूसरा 18जून को साधा। इसके बाद जो तांडव भैरमगढ़, बीजापुर, उसर वमेत कई और विकासखंडों में हुआ वह अभूतपूर्व था। ‘सलवा जुडूम’के शुरू होने के बाद से बस्तर में हिंसा और प्रतिहिंसा का सिलसिला जारी है। इसने सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों को उनके रैन-बसेरों से उजाड़कर सड़क पर पटक दिया है। जिन गांवों की तरफ नगा बटालियन और सीआरपीएफ के जवान जाते,उन रास्तों में पड़ने वाले सारे गांव जनविहीन हो जाते,लेकिन जिन गांवों पर चोरी से हमला बोल दिया जाता है वे लोग बलि का बकरा बन जाते हैं। 28अगस्त को नगा बटालियन ने अरियल (चेरली)गांव में हमला बोल दस लोगों को खड़ा कर गोली मार दी जिसमें दस साल का एक बच्चा भी शामिल था।
हमारे सफर का अगला पड़ाव गांव मूकाबेल्ली था। इस गांव में दो महिलाओं का बलात्कार किया गया और एक गर्भवती के पेट को चीर डाला। गंगलुर क्षेत्र के सीपीआई (माओवादी)एरिया कमांडर संतोष ने बताया कि सरकारी गुंडों ने महिलाओं पर अत्याचार और बच्चों की हत्या को अपने अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाया है। इसी क्षेत्र के कर्रेमाका गांव में आदिवासी महिला संगठन की सक्रिय कार्यकर्ता सरिता के साथ 15अगस्त 2005 को नगा पुलिस और सलवा जुडूम के गुंडों ने सामूहिक बलात्कार किया। इसके बाद खून से लथपथ सरिता को भैरमगढ़ थाने ले गये और यातनायें देते रहे। ऐसी घटनाओं की पूरी फेहरिस्त है जो दिल दहला देने वाली है। एक अनुमान के मुताबिक पिछले एक वर्ष में कम से कम डेढ़ सौ महिलाओं के साथ सलवा जुडूम अभियान से जुड़े लोगों ने बलात्कार किया। औरतों पर ढाये गये जुल्मों की सबसे अधिक शिकार आदिवासी महिला संगठन की कार्यकर्ता हुईं।
मगर दिलचस्प तथ्य यह है कि नक्सलियों को जड़मूल से समाप्त करने के लिए आयी फौजें उनके मात्र दो दलम कार्यकर्ताओं को मार पायीं। डिवीजनल संयोजक निर्मला बेहिचक स्वीकार करती हैं कि माओवादी पार्टी को इस जुल्मी अभियान से कुछ खास नुकसान नहीं हुआ है। बड़ा नुकसान जनता का हुआ है जो जंगलों की ओर भागकर खूंखार जानवरों के बीच रहने के लिए मजबूर है। निर्मला कहती है कि सलवा जुडूम अभियान से हमारी ताकत दुगुनी से ज्यादा बढ़ी है,जबकि इस तथाकथित जनजागरण अभियान से आतंकित हो 600 गांवों के 50 हजार आदिवासी अपने आशियानों को छोड़कर भागने के लिए मजबूर हुए। अभी भी लगभग एक हजार आदिवासी राज्य की विभिन्न जेलों में बंद हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि एक भी पुलिसिया जवान के खिलाफ किसी भी थाने में मुकदमा दर्ज नहीं किया गया है। जो आदिवासी कुछ महीनों तक हमारे प्रति उदासीन रहते थे अब उनमें से हजारों की तादाद में हमारे तमाम जनसंगठनों में सक्रिय भूमिकाएं निभा रहे हैं। जहां अभी हम प्लाटून बना रहे थे,वहीं सलवा जुडूम के बाद हमने अब मिलिट्री कंपनियां खड़ी कर ली हैं। स्थानीय युवक सुराजा ने बताया कि जब से पार्टी (नक्सली) आयी है तब से कोई न तो भूखा मरता है और न ही किसी लड़की की इच्छा के बगैर शादी होती है। यह दो बातें आदिवासी जनता के लिए विशेष महत्व की हैं। कबीलाई सभ्यता से धीरे-धीरे ऊपर उठ रहे आदिवासियों में पटेल,सरपंच जमींदारों जैसी स्थिति में हैं। लेकिन जिन इलाकों में माओवादी हैं वहां उन्होंने जमीनों का वितरण पारिवारिक जरूरत और परिवार में मौजूद सदस्यों के आधार पर कर दिया है।
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण चीज है,कैंपों की जिंदगी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कैंपों में पैंतालीस हजार शरणार्थी रह रहे हैं। हालाँकि भैरमगढ़ इलाके के माओवादी एरिया कमांडर हरेराम मानते हैं कि अब सिर्फ शिविरों में चार हजार लोग बचे हैं। उसमें बड़ी संख्या उनकी है जो पुलिस के मुखबिर हैं या जनविरोधी लोग। हिंसा के शुरूरुआती महीनों में पुलिस बल जबर्दस्ती लोगों को शिविरों में ले गये और लोगों को बंदियों के माफिक रखा। कारण कि वहां से मीडिया को बताना था कि यह जनता माओवादियों के जुल्मों से तंग आकर शिविरों में रह रही है। इसका फायदा सरकारों को मिला भी। मीडिया ने मौका मुआयना किये बगैर ही सरकारी जानकारी को छापा। अब तक हजारों लोग कैंप से भागकर वापस गांवों में आ गये हैं। इतना ही नहीं,कुल एसपीओ में से 50अपने गांवों में वापस आ गये हैं। भैरमगढ़ ब्लॉक के एक राहत शिविर से भागकर आयी सुबकी ने बताया कि उसकी वहां जबरन ‘शादी कर दी गयी और कई दिनों तक उसके तथाकथित पति ने बलात्कार किया।
सावनार,पालनार गांवों के सैकड़ों लोग जो कि अपनी आपबीती सुनाने के लिए आये थे,उनके अनुभवों से स्पष्ट हो गया कि राहत शिविरों की जिंदगी बदतर है। वहीं जो सरपंच,पटेल या पार्टियों के नेता शिविरों का नेतृत्व कर रहे हैं, मालामाल हुए हैं।गुदमा,जांगला,भाटवाड़ा, बैरंगढ़, बादेली, पिंडकोंडा, मिप्तुल, करडेली, वंगा आदि गांवों में राहत शिविर बनाये गये हैं। बैरंगढ़ कैंप से भागकर आये लच्छु ने बताया कि एसपीओ ने गांव में घोषणा की है कि जो आदिवासी अपना गांव छोड़ शिविरों में नहीं आयेगा उनके घर जला दिये जायेंगे।
माओवादी कार्यकर्ता बुद्धराम के मुताबिक जनता को राहत शिविरों में रख सरकार ने हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। बाकायदा धमकी दी गयी कि यदि माओवादी फौजों पर हमला करेंगे तो फौजें शिविरों में रह रहे लोगों को भून डालेंगी।
अजय की ली गई तस्वीरों सहित इस रपट को पढ़ने के लिए उनके ब्लाग जनज्वार तक इस लिंक से जाएं।
चिप्पी :-
अजय प्रकाश,
विचार-विमर्श
26 मई 2010
चोखेरबालियों के लिए
आज चोखेर बाली ब्लाग पर लगी पोस्ट पढ़कर पहले सोचा कि एक लेख लिखुं जिसका शीर्षक हो बूब्स शूक द वर्ल्ड ! कि तभी कुछ दिनों पहले पढ़ी किश्वर नाहिद की एक कविता याद आ गई। काफी पहले एंड आफ आइडियालजी के लेखक डेनियल बेल का थीसिस इलेवन जर्नल में छपा इंटरव्यु पढ़ा था। जिसमें उन्होंने कहा था कि सभी धार्मिक संस्थाओं को महिलाओं से ही असल चुनौती मिलेगी। क्योंकि सभी धर्म मूलतः सामंती पितृसत्ता का पोषण करते हैं। इस तरह वो अंततोगत्वा नारी-विरोधी ही ठहरते हैं। धर्म की खोल ओढ़कर सामंती पितृसत्ता ने जिस तरह से खुद को बार-बार रिवाइव किया है वो सभी आधुनिकों के लिए गहरी चिंता का विषय रहा है। कई बार इस तथ्य से मन में गहरा अवसाद भर जाता था। ऐसे ही समय में मैंने डेनियल बेल का वह कथन पढ़ा था। जिससे मुझे रोशनी मिली थी। एक उम्मीद मिली थी। वैसे ही रोशनी और उम्मीद आज मुझे चोखेरबाली ब्लाग पर शाया खबर पढ़कर मिली है। इस विषय पर किश्वर नाहिद से बेहतर ढंग से कुछ कहने में अक्षम हूं इसलिए उनकी वह कविता आपके सामने है।
ये हम गुनाहगार औरतें हैं
जो अहले जुब्बा की तमकनत से
न रौब खाएं न जान बेचें
न सर झुकाएं, न हाथ जोडें
ये हम गुनाहगार औरतें हैं,
के : जिनके जिस्मों की फसल बेचें जो लोग
वे सरफराज ठहरे न्याबतें इम्तियाज ठहरें
वो दावर-ए-अहल-ए-साज ठहरें
ये हम गुनाहगार औरतें हैं
के सच के पचरम उठा के निकले
तो झूठ से शाहराहें अटी मिले हैं
जो बोल सकती थीं वो जबाने कटी मिली हैं
हर एक दहलीज पर सजाओं की दास्तानें रखी मिले हैं
ये हम गुनाहगार औरतें हैं
के : अब तअक्कुब में रात भी आए
तो ये आंखे नहीं बुझेंगी
के : अब जो दीवार गिर चुकी है
इसे उठाने की जिद न करना
ये हम गुनाहगार औरतें हैं
जो अहले जुब्बा की तमकनत से
न रौब खाएं न जान बेचें
न सर झुकाएं, न हाथ जोडें
- किश्वर नाहिद
चिप्पी :-
किश्वर नाहिद,
ये लड़कियाँ
24 मई 2010
दो लाख किसानों की आत्महत्या का जिम्मेदार कौन?
1997 के बाद से अब तक लगभग 2 लाख किसान भारत में आत्महत्या कर चुके हैं. 12 साल की अवधि में पाँच बड़े राज्यों के हिस्से में 1,22,823 आत्महत्याएँ आई हैं. --- एनसीआरबीराष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2008 में 16,196 किसानों ने मौत को गले लगा लिया. अर्थशास्त्री प्रोफेसर नागराज द्वारा भारत में किसान आत्महत्याओं पर बनाई गई अपनी रिपोर्ट में कहा है भारत में किसानों की हालात दयनीय है और किसान कर्ज में डूबा हुआ हुआ. उन्होंने अपने अध्यन में कहा है कि आत्महत्या करने वाले अधिकतर किसान कर्ज में डूबा हुआ था.
इसलिए, संख्या एक धोखा हो सकता है.लगभग 2 लाख भारत में 1997 के बाद से आत्महत्या कर ली किसान. पांच बड़े राज्यों - महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ - में 1997 से 2008 के बीच 12 साल की अवधि में लगभग 1,22,823 आत्महत्या की है .जबकि बाकी राज्यों को मिला कर ये आंकड़ा दो लाख के करीब पहुचता है.
औसतन हर तीस मिनट में एक किसान आत्महत्या करता है(यह आंकड़ा और ऊपर जा सकता है). विशेषज्ञों का मानना कि है एक असफल मानसून, चरम सूखे और बुनियादी वस्तुओं की कीमतों में रिकॉर्ड वृद्धि से गरीबों के लिए जीवन एक असहनीय बोझ बन गया है. और मौत उनको इस सबसे दूर ले जाती है. शायद यही कारण है कि किसानों की आत्महत्या रूकने का नाम नहीं ले रही है।
भारत आज भी कृषि प्रधान देश है। यदि जल्द ही हालात न बदले तो भारत विश्व का पहला ऐसा कृषि प्रधान देश होगा जिसमें किसान नहीं होंगे। क्योंकि मनमोहन सिंह की मोहिनी नीतियों के सदके उन्हें जीवन से बेहतर मौत लगने लगी है !
चिप्पी :-
किसान,
शैलेन्द्र नेगी
23 मई 2010
शराबी पायलट और दुर्घटनाएं
दुबई से मेंगलुरु आ रहा एयर इंडिया का एक प्लेन मेंगलुरु के बाजपे एयरपोर्ट पर लैंडिंग के वक्त रनवे से फिसलकर खाई में गिर गया इस हादसे में 158 लोगों की मौत हो गई और 8 घायल हो गए. विमान में 160 यात्री और 6 क्रू मेंबर्स सवार थे। ये खबर है.
...हादसे के पीछे क्या कारण जिम्मेदार थे उसका अभी पता नहीं. लेकिन इस हादसे ने 158 लोगों की जान ले ली ये सच्ची खबर है. कुछ लोग अस्पतालों में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहे हैं.
सिविल एविएशन मिनिस्टर प्रफुल्ल पटेल नैतिक जिम्मेदारी ले चुके हैं. जांच जारी है. कई सवालों के जवाब अभी बाकी हैं. जिसे मरना था मर गया जो बच गए उनको ज़िन्दगी का नायाब तोहफा मिला है. बहरहाल मीडिया और सरकार इस पर माथा पच्ची कर रहे हैं कि आखिर हादसे कि जड़ क्या थी. सूत्रों के मुताबिक पहाड़ी इलाके में बने मेंगलुरु एअरपोर्ट का रनवे देश में मौजूद बाकी रनवे के मुकाबले छोटा है और मंत्रालय को इस बाबत सूचना पहले ही दे दी गई थी लेकिन मंत्रालय ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया. हादसे की एक वजह ये भी हो सकती है.
लेकिन शक की सुई विमानन कंपनियों और पायलटों पर भी जाती है. कहीं ऐसा तो नहीं कि पायलटों से उनकी केपेसिटी से ज्यादा काम लिया जा रहा हो. कहीं पायलटों को वेतन के अलावा अन्य चीजों का लालच तो नहीं दिया जा रहा ? जिसके लालच में आकर वो अपनी केपेसिटी से ज्यादा काम करते हैं. और इस लालच का अंत मेंगलुरु जैसी विमान दुर्घटनाओं के रूप में होता है.
आपको याद होगा पिछले कुछ समय से विमानों में खराबी और उसके बाद उनकी आपात लेंडिंग की घटनाएं आम हो गई थी. लेकिन इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया. कि अचानक ऐसा क्या हो गया कि एक के बाद एक विमान ख़राब हो रहे हैं और आपात लेंडिंग की जा रही है.
पायलटों की बात करें तो देश में कुल 4084 पायलट ऐसे हैं जो व्यावसायिक फ्लाइटों को संचालित करते हैं उनमें से 532 ऐसे पायलट हैं जो विदेशी हैं. जबकि भारतीय पायलटों की संख्या 3552 है. विदेशी पायलटों कि संख्या फ्लाइटों में इस तरह से है - गो एअर - 4, ब्लू डार्ट - 7, एलायंस एयर - 23, किंगफिशर एयरलाइंस - 139, जेट एयरवेज - 137; एयर एयर इंडिया एक्सप्रेस सहित (भारत) - 136 ; जेटलाइट -, 3 इंडिगो - 41, डेक्कन कार्गो - 7, पैरामाउंट एयरवेज - 22, स्पाइस जेट - 42 और जेग्सन - 1.
डायरेक्टरेट ऑफ सिविल एविएशंस (डीजीसीए) ने पिछले साल 2009 में विभिन्न एयरलाइंस के 42 पायलटों को नशे में धुत ड्यूटी करते पाया. यह जानकारी हमें सूचना के अधिकार के तहत खुद डीजीसीए ने दी है. उसने पायलटों व एयरलाइंस के नामों का खुलासा नहीं किया. फिर भी यह स्पष्ट किया है कि उनके खिलाफ नियमों के तहत आवश्यक कार्रवाई की गई है. नियम के अनुसार बारह घंटे पहले क्रू मेम्बरों के लिए शराब पीना प्रतिबंधित है. लेकिन ऐसा नहीं होता.
उड्डयन विशेषज्ञ इसे यात्रियों की सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक मान रहे हैं. उनका कहना है कि शराब खून में मिलने से पायलट सुस्त हो जाता है और किसी आकस्मिक स्थिति में उसकी प्रतिक्रिया करने की क्षमता घट जाती है. ऊंचाई पर शराब सर्वाधिक असर करती है.
साल 2009 में ही सिविल एविएशन मिनिस्टर प्रफुल्ल पटेल ने मीडिया के सामने ही स्वीकार किया था कि 29 पायलट शराब के लिए किए जाने वाले ब्रेथ एनलाइजर टेस्ट में फेल हुए हैं. इनमें सबसे ज्यादा 9 पायलट किंगफिशर एयरलाइंस के थे, जिसके मालिक 'लिकर किंग' विजय माल्या हैं।
बूज टेस्ट में पकड़े गए पायलटों में इंडिगो और स्पाइस जेट के 6-6 जबकि जेटलाइट, पैरामाउंट और जेट एयरवेज के 3-3 पायलट शामिल थे. तब प्रफुल्ल पटेल ने बताया था कि पायलटों पर अचानक किए जाने वाले इस टेस्ट में फेल होने पर उन्हें 6 हफ्तों तक उड़ान भरने के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाता है.
कई ऐसे वाकये भी सामने आए हैं कि जब किसी पायलट ने उड़ान से पहले के 12 घंटों के दौरान शराब पी और एयरपोर्ट पर जांच होता देख वह वहां से भाग खड़ा हुआ।
नियम
एयरक्राफ्ट नियम-24 के तहत फ्लाइट से पहले के 12 घंटों में क्रू सदस्यों के लिए शराब पीना प्रतिबंधित है।
अगर क्रू के किसी भी सदस्य के खून में अल्कोहल कि मात्रा मिली तो क्या कार्रवाई होनी चाहिए ?
पायलट के खून में अल्कोहल पाया जाता है या वह परीक्षण से गुजरने से इनकार कर देता है तो उसे न्यूनतम चार सप्ताह तक उड़ान नहीं भरने दी जाती है। एयरलाइंस उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है। दुर्घटना या उसकी स्थिति पैदा होने पर सबसे पहले पायलट और को-पायलट के खून में अल्कोहल चेक किया जाता है।
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शैलेन्द्र नेगी
21 मई 2010
काँग्रेसी मछलियाँ
सब्जियों के चढ़ते हुए दाम से त्रस्त एक मजदूर ने तय किया कि आज वो मजदूरी पर नहीं जाएगा। एक दिन की मजदूरी में एक दिन भी पेट नहीं पलता। मँहगाई बढ़ने से उसी अनुपात में मजदूरी तो बढ़ती नहीं,यही सोचते-सोचते उसने तय किया कि आज वह मछली मार कर लाएगा। उसे पकवाएगा। खाएगा। इस तरह बहुत दिनों बाद वह कुछ स्वादिष्ट खाने का सपना देखने लगा। इस सपने के खुमार में वह ठीक से सो भी न सका। अगली सुबह वह तड़के उठा और बिना पत्नि-बच्चों को बताए घर से काफी दूर तालाब की ओर निकाल गया। धूप चढ़ने तक उसे काम भर की मछलियाँ मिल गई। वह घर वापस आया और पत्नि ने उसे सही सलामत देखकर राहत की साँस लेते हुए प्रश्नवाचक चिह्न जैसा मुँह बना लिया।
बीवी का मिजाज देखते हुए उसने खुशामद करने के अंदाज में कहा, देखो आज मैं मछली लाया हूँ। लो पका दो। बहुत दिन हो गया कुछ ढंग का खाए !
पत्नि उसकी इस सीधी सी बात पर तुनक गई। लगभग झगड़ते हुए उसने कहा कि घर में पकाने भर गैस नहीं है,तेल नहीं है, मसाले नहीं है.......लाट साहब मछली खाँएगे।
मजदूर ने एक बार अपने बच्चों और बीवी का मुँह देखा। फिर उस बाल्टी की तरफ देखा जिसमें मछलियाँ थीं। दो मिनट के मौन के बाद वह बिना कुछ कहे-सुने उलटे पाँव घर से बाहर निकल गया।
वह जेब से गरीब था लेकिन दिल से दयालु था। उसने सोचा कि जब हम सब को भूखे ही रहना है तो मछलियों की जान क्यों ली जाए ! तालाब पर आकर उसने सभी मछलियों को वापस पानी में छोड़ दिया।
अभी उसने मछलियों को तालाब में छोड़ा ही था कि कुछ सुनकर वो ठिठक गया। उसे लगा कि पानी के अंदर से अजीब आवाजे आ रही हैं। कि जैसे वो मछलियाँ नारा लगा रही हों -
काँग्रेस पार्टी जिंदाबाद,मनमोहन सिंह अमर रहें,सोनिया गाँधी अमर रहें ......
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विचार-विमर्श,
हल्का-फुल्का
20 मई 2010
हिंसा-प्रतिहिंसा की अंतहीन श्रृखंला,तू टूट जा
पिछले कुछ दिनों में माओवादी हमले की कई खबरें आई हैं। माओवादियों ने करीब 35 नागरिकों को एसपीओ के साथ बस में सफर करने के जुर्म में मार दिया। उसके बाद भी उनके हमले होते रहे हैं। कल खबर थी कि गृहमंत्री चिदंबरम ने उन्हें बातचीत के लिए एक बार फिर आमंत्रित किया है। आज खबर आई कि माओवादियों ने 5 सीआरपीएफ जवानों की हत्या कर दी। ऐसा लगता है कि माओवादियों की भी बात-चीत से हल निकालने में कोई खास रुचि नहीं है।
हिंसा-प्रतिहिंसा के इस खेल में कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं दिखता। भारत सरकार की मुख्य समस्या है कि एक राष्ट्र अपनी संप्रभुता में किसी गैर-सरकारी संगठन को साझीदार नहीं बना सकता। इसलिए माओवादियों को भारत सरकार के सामने थोड़ा झुकना ही होगा। भारत सरकार पर कारपोरेट का कैसा कब्जा है यह तो नीरा राडिया,ए राजा,बरखा दत्त,वीर संघवी,रतन टाटा इत्यादि के संयुक्त कारनामे से जगजाहिर हो गया है। इसलिए आम जनता में इस सरकार और इसकी नीतियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रह गई है। सरकारी संरक्षण में राष्ट्रीय संपदा का खून पीकर कारपोरेट जोंक मोटे होते जा रहे हैं। जनता दुबली होकर मरणासन्न होती जा रही है। परिणामस्वरूप सरकार जनता में अपनी विश्वसनीयता खोती गई है।
ऐसा भी नहीं है कि माओवादियों के पास कोई व्यापक जनसमर्थन हो। देश के सभी आदिवासी उनके साथ नहीं हैं। उनका व्यापक एजेंडा क्या है यह किसी को नहीं पता है। मुखर रूप से उन्होंने कभी भी अपनी नीतियों को जाहिर नहीं किया है। उनका लोकतंत्र में कितना और कैसा विश्वास है यह भी जाहिर नहीं है। किसी माओवादी पार्टी (गर वो है तो) का लोकतंत्र में सैद्धांतिक तौर पर कितना यकीन होगा इसका अंदाजा हम सभी को है। माओवादियों को समझना चाहिए कि उनको उनके प्रभाव क्षेत्र से बाहर की जनता से जो सहानुभूति मिली है उसकी वजह उनका नेतृत्व नहीं है। वह सहानुभूति उनके पीछे विभिन्न कारणों से लामबंद हुए आदिवासियों के लिए है। अतः माओवादियों को ऐसा कोई भ्रम हो कि देश की बहुसंख्या हरबात में उनका साथ देगी तो उन्हें अपने दिमाग से यह भ्रम निकाल देना होगा।
थाईलैण्ड में जो चल रहा है उससे ज्यादातर पाठक परिचित होंगे। हाल ही में श्रीलंका में जो हुआ उससे भी लोग अनजान नहीं। आखिर कब तक हजारों-हजार लोग इस तरह के संघर्षों में मारे जाते रहेंगे ? धीरे-धीरे मध्य भारत में ऐसी ही स्थिति बन चुकी है। सामूहिक हत्या के लिए कोई भी तर्क कमजोर होता है। भारत सरकार के साथ माओवादियों को भी यह बात समझनी होगी। भारत सरकार इस बातचीत को लेकर ईमानदार है यह तभी पता चलेगा जब माओवादी सामने आकर बात करेंगे। उन्हें बातचीत के लिए आगे आना ही चाहिए। जिससे निर्दोषों की हत्या का सिलसिला रुक सके। हिंसा-प्रतिहिंसा की यह अंतहीन श्रृखंला टूट सके।
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विचार-विमर्श
17 मई 2010
दार्शनिक-राजा कहाँ ?
दार्शनिक-राजा की परिकल्पना सर्वप्रथम प्लेटो ने प्रस्तुत की। तब से यह परिकल्पना एक ख्याल ही बनी हुई है। यह ख्याल कभी हकीकत नहीं बन सका। दुनिया ने कभी भी सर्वश्रेष्ठ विचारकों की राय उनके रहते अपवाद स्वरूप् ही मानी होगी। इतिहास में पहली बार यह मौका अल्बर्ट आइंसटाइन को मिल सकता था जब उन्हें नए राष्ट्र इजराइल का अध्यक्ष बनाया जा रहा था। आइंसटीन ने इस पद को अस्वीकार कर दिया। उन्हें संभवतः इस बात का अंदाजा था कि उन्हें उनकी योग्यता के लिए यह पद नहीं मिल रहा है। वह समझ सकते थे कि तात्कालीन विश्व में सबसे सम्मानित और लोकप्रिय यहूदी होना ही इस प्रस्ताव के पीछे की मूल प्रेरणा थी। अतः उन्होंने यह प्रस्ताव एक बहुत ही खूबसूरत बहाने के साथ ठुकरा दिया। इसके बाद से ऐसा कोई अवसर नहीं आया कि किसी अग्रणी विचारक को किसी राष्ट्र ने अपना नेतृत्व सौंपा हो।
भारत में बहुत से विचारकों के बारे में मान्यता है कि वो राजपरिवारों में जन्मे थे। कईयों ने राजगद्दी छोड़ कर ज्ञान-साधना का मार्ग चुन लिया। बुद्ध,महावीर,भर्तृहरि,विश्वामित्र इत्यादि इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं। परंपरागत भारतीय राजाओं में एक मात्र महाराजा जनक को सफल दार्शनिक राजा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उन्हें विदेह कहा गया। क्योंकि वह संसार में रहकार भी इससे निर्लिप्त रह कर शासन कर सके।
भारतीय महाकाव्यों मे ऐसे दूसरे दार्शनिक राजा के रूप में युधिष्ठर को देखा जा सकता है। यम से जीवन और ज्ञान प्राप्त होने के कारण उन्हें धर्मराज की उपाधि मिली थी। लेकिन इसका कुपरिणाम ये रहा कि वंशानुगत राज्य को भी उनका संचालन नहीं मिला। स्वयं पाण्डवों में अर्जुन,भीम और कर्ण का चरित्र उनसे ज्यादा प्रभावशाली दिखता है। उनके महाज्ञानी होने का महाभारत के युद्ध पर कोई निर्णायक प्रभाव नहीं दिखता। इसके उलट युद्ध में विजय के लिए उन्हें अपने ही गुरू से झूठ बोलना पड़ा। जिससे गुरू की हत्या संभव हो सके।
जनक और युधिष्ठर का उदाहरण भारतीय साहित्य में मिलता है इसलिए इनकी चर्चा की। वरना ऐतिहासिक भारत में ऐसा कोई उदाहरण मुश्किल ही है।
जनक और युधिष्ठर का उदाहरण भारतीय साहित्य में मिलता है इसलिए इनकी चर्चा की। वरना ऐतिहासिक भारत में ऐसा कोई उदाहरण मुश्किल ही है।
लम्बे दौर में देखा जाए तो दार्शनिक दुनिया के सबसे गहरे प्रभावित करते हैं। अरस्तु का प्रभाव सिकंदर के प्रभाव से दीर्घजीवी रहा है। लेकिन अपने जीवन काल में अधिकतर दार्शनिकों की कोई प्रभावी भूमिका नहीं बन पाती। उनकी सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यही रह जाती है कि उनकी बात राजा/प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति के कानों तक गाहे-बगाहे पहुंच जाती हो ! उन पर अमल होना, न होना दूर की बात है।
समाज अपने समय के सबसे बुद्धिमान लोगों की बात को नहीं सुनता। ये एक ऐतिहासिक सत्य हैं। सत्ताधारियों का इन विचारकों से परहेज करना समझ में आने लायक बात है। लेकिन अफसोस की जनता भी अक्सर इन लोगों को नहीं सुनती। वो या तो सस्ते कारणों से अतिलोकप्रिय लोगों की सुनती है या फिर सत्ता संरचना में प्रभावशाली लोगों की। शशि थरूर,ललित मोदी,शाहरुख खान जैसों के चूँ-चूँ को सुनने के लिए लाखों लोग तैयार रहते हैं। लेकिन इतिहास,दर्शन,साहित्य इत्यादि विषयों के मान्य विद्वानों को सुनने वाले दो-चार हजार भी नहीं मिलते। किसी भी समाज के अधोपतन का यह एक बड़ा कारण है।
यह सब बातें उन विचार तन्तुओं का हिस्सा है जो मेरे दिमाग में अमर्त्य सेन की नई पुस्तक पढ़ने के बाद उठे। जब उनकी नई पुस्तक The Idea of Justice समीक्षा के लिए आई तो सबकुछ छोड़कर जिज्ञासावश उसे ही पढ़ना शुरू कर दिया। नए-पुराने दुनिया भर के सैकड़ों दार्शनिकों के विचारों से लदी-फँदी यह किताब समतामूलक समाज के लिए न्याय-बोध और संवादधर्मिता की अनिवार्यता को स्थापित करने का प्रयास करती है। लेकिन मूल सवाल यह है कि यह पुस्तक स्वयं किससे संवाद करती है ! सत्ता से या जनता से ?? या कुछ मुट्ठी भर बुद्धिजीवियों से !!
यह सब बातें उन विचार तन्तुओं का हिस्सा है जो मेरे दिमाग में अमर्त्य सेन की नई पुस्तक पढ़ने के बाद उठे। जब उनकी नई पुस्तक The Idea of Justice समीक्षा के लिए आई तो सबकुछ छोड़कर जिज्ञासावश उसे ही पढ़ना शुरू कर दिया। नए-पुराने दुनिया भर के सैकड़ों दार्शनिकों के विचारों से लदी-फँदी यह किताब समतामूलक समाज के लिए न्याय-बोध और संवादधर्मिता की अनिवार्यता को स्थापित करने का प्रयास करती है। लेकिन मूल सवाल यह है कि यह पुस्तक स्वयं किससे संवाद करती है ! सत्ता से या जनता से ?? या कुछ मुट्ठी भर बुद्धिजीवियों से !!
अमर्त्य सेन खुशनसीब हैं कि नोबेल पुरस्कार पाकर पाप्युलर हो गए। अतः उनकी पुस्तक का एक छोटा सा बाजार है। शेष दार्शनिकों के नसीब में ऐसी खुशनसीबी कहाँ !! और फिर ऐसे में दार्शनिक-राजा की परिकल्पना के सच होने की उम्मीद भी कहाँ ?
चिप्पी :-
विचार-विमर्श
14 मई 2010
पहले मैं अपनी कलम को तलवार समझता था
पहले मैं अपनी कलम को तलवार समझता था। अब मैं जान गया हूँ कि हम लेखक शक्तिहीन हैं। किन्तु कोई हर्ज नहीं। मैं अभी भी पुस्तकें लिखता रहुँगा। संस्कृति किसी चीज या व्यक्ति की रक्षा नहीं करती। न यह कोई औचित्य प्रमाणित कर सकती है। लेकिन यह मनुष्य से उत्पन्न एक चीज है। मनुष्य इसमें अपने व्यक्तित्व को स्थापित करता है,इसमें अपने को देखता है। यही एक शीशा है जिसमें वह अपनी छवि देख सकता है।
मैं ईमानादारी से कह सकता हूं कि मैंने सिर्फ अपने समय के लिए ही लिखा है परन्तु अपनी कुप्रसिद्धि पर मुझे झुंझलाहट होती है....चूँकि मैंने एक अज्ञात व्यक्ति की तरह मरने का अवसर खो दिया है, मैं कभी-कभी यह सोच कर खुश होता हूँ कि मैं अपने जीवन में गलतफहमी का शिकार हूँ....
मुझे अपनी विक्षिप्तता के बारे में एक चीज सबसे अच्छी लगती है कि इसने शुरू से ही विशिष्ट वर्ग के आकर्षणों से बचाए रखा है.....लोगों को खुश करना मुझे अच्छा लगता था और मैं स्वयं को संस्कृति में पूरी तरह निमग्न करना चाहता था....
Jean Paul Sartre की आत्मकथा The Words के अंश
चयन और अनुवाद- राजेन्द्र कुमार मिश्र
चिप्पी :-
सार्त्र
13 मई 2010
मैंने उस से ये कहा
प्रस्तुत है हबीब जालिब की एक और नज्म। उन्हीं की आवाज में।
चिप्पी :-
स्वतंत्र-प्रजातंत्र,
हबीब जालिब
12 मई 2010
शमशेर की याद में: यह विवशता
एक जिद्दी धुन ने याद दिलाया कि आज शमशेर की पुण्यतिथि है। आजकल हालात है ये हैं कि हर तरफ से केवल बुरी खबर आ रही है। मिरचपुर,हरियाणा,कोडरमा,देवबंद,इलाहाबाद,दिल्ली हर तरफ से ऐसी खबरें आ रही हैं कि भारत बर्बरता के युग में लौट रहा है। इतिहास स्वयं को दोहराता-तिहराता रहता है। तो ऐसे ही किसी समय में शमशेर ने यह कविता लिखी होगी। शमशेर को उन्हीं की कविता के साथ श्रद्धांजलि।
यह विवशता
कभी बनती चाँद
कभी काला ताड़
कभी ख़ूनी सड़क
कभी बनती भीत, बांध
कभी बिजली की कड़क, जो
क्षण प्रतिक्षण चूमती-सी पहाड़।
यह विवशता
बना देती सरल जीवन को
ख़ून की आंधी
यह विवशता
मौन में भी है अथाह
भावनाओं के सलीब
स्वयं कांधा बन उठे-से हैं
कठिनतम।
हड्डियों के जोड़
खुल रहे हैं।
टूटते हैं बिजलियों के स्वप्न के आंसू;
आंख सी सूनी पड़ी है भूमि।
क्रांत अंतर में अपार
मौन।
चिप्पी :-
शमशेर बहादुर,
श्रद्धांजलि
11 मई 2010
आग का दरिया
- हृदय और मस्तिष्क के दुःख कलेश और परीक्षाएं । मैं मुक्ति नही चाहता । करुणा बहुत बड़ी चीज़ है, शाक्यमुनि! किंतु सम्भव है, मुझे स्वयं तुम पर करुणा होती है। प्रश्न ये है पावन राजकुमार की कौन किस पर करुणा करेगा ?
- ताल सूख पत्थर भयो हंस कहीं न जाए पिछली प्रीत के कारने कंकर चुन-चुन खाए।
- "न स्त्री स्वतंत्रम्" मनु महाराज ने लिखा है। स्त्री स्वतंत्र नही है बिल्कुल सही है। रामायण के छ्टे काण्ड में तो यहाँ तक लिखा है की संकट काल में, विवाह के अवसर पर और आराधना के समय स्त्री बाहर आ जाए तो कोई आपत्ति की बात नही। और ये भी लखा है की स्त्री के वेद पढ़ने से बड़ा अनिष्ट फैल सकता है।
- कलाकार न बनिए, आजकल कलाकार की तो फौज की फौज हर जगह घूम रही है। कोई बुनियादी काम करिए, इतना कुछ करने को पड़ा है।
- "तो शादी आपकी इकनॉमिक मसलों का हल है" शादी हिंदुस्तान की हर लड़की की निजी और खानदानी प्रॉब्लम का हल माना जाता है।
- जीवन इतना गुंजलक, इतना व्यस्त, इतना उबड़ खाबड़ और इतना तर्कहीन था की इंसान सारे परिचितों और सारे जानने वालो के साथ निबाह न कर सकता था। इतना समय ही नही था।
- यह लड़कियां मरी क्यूँ जाती हैं - असल में - उसने इत्मीनान से टांग पर टांग रख कर सोचना शुरू किया - इनको हजारों बरस से इस काम्प्लेक्स में फंसा दिया गया है- एक, सुना है वो सटी थीं फिर सीता! फिर गोपियों का फ्रौड़ चला - इनको दुनिया में कोई काम नही! बस, किसी भले मानुस को पकड़ कर, दे पूजा, दे उसकी पूजा! अरी नेक्बख्तों, अल्लाह-रसूल से दिल लगाओ, अगर प्रेम ही करना है। हज़रत राबिया से सबक लो ! इसके अलावा और भी बहुत सी पहुँची हुई बीबियाँ गुजरी हैं लेकिन यह सारी सेंट वेंट औरतें भी सोचती होंगी कि अगर ईशो मसीह भी मिल जाएँ तो लेकर उनके मोजे रफू कर दें।
- जिसकी सारी उम्र ज़मींदारी के खिलाफ नारे लगते गुजरी थी, ज़मींदारी खत्म हो जाने के कारण हालत इतनी गिर गयी थी कि दो वक़्त की रोटी मुश्किल से चलती थी.
- 'इतने demoralized क्यूँ हो गए हो ? संघर्ष का साहस खो बैठे. यही तो वक़्त है आज़माइश का. डटे रहो. मजदूरी करो, हल चलाओ, आखिर इन्कलाब का सामना करना इसी को तो कहते हैं. मगर तुम क्या ऐश के सपने देख रहे हो? अगर ऐसा है तो पाकिस्तान चले जाओ. पर मैं तुमसे उम्र भर ना बोलूंगी'.
- जब खुशहाली आएगी तो सारे मुल्क के लिए आएगी. वो ये थोड़े ही देखती है की ये हिन्दू का द्वार है या मुसलमान का. हम सब एक साथ डूबेंगे, एक साथ उभरेंगे.
- सारी दुनिया की तरफ से इस्लाम का ठेका इस वक़्त पाकिस्तान सरकार ने ले रखा है. इस्लाम कभी एक बढती हुई नदी की तरह अनगिनत सहायक नदी - नालों को अपने धारे में समेत कर शानके साथ एक बड़े भारी जल - प्रपात के रूप में बहा था, पर अब वही सिमट - सिमटा कर एक मटियाले नाले में बदला जा रहा है.
- मज़ा यह है की इस्लाम का नारा लगाने वालों को धर्म दर्शन से कोई मतलब नहीं. उनको सिर्फ इतना मालूम है की मुसलमानों ने आठ सौ साल इसाई स्पेन पर हुकूमत की, एक हज़ार साल हिन्दू भारत पर और चार सौ साल पुर्वी यूरोप पर. इसके अलावा इस्लाम की जो महान मानव प्रेम की परम्पराएं हैं, उनका नाम नहीं लिया जाता.
- फिर उसने एशिया में काम्यूनिज्म के खतरे पर प्रकाश डाला और कमाल को बताया की मुस्लिम देश धार्मिक और आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा जेहाद में अमरीका की बड़ी सहायता कर सकते हैं.
- मैंने तरह तरह के जीनिअस किस्म के लोगों के साथ समय बिताया. उनमें से हर एक अपनी जगह पर खुश होता, कभी रंजीदा. तुम खुश क्यूँ हो ? मैं हर किसी से पूछती- इतनी गहरी और बारीक समझ रखते हुए भी ऐसे मगन हो ! हद है. मैं बुरा मान कर कहती. मगर आखिर मैंने देखा की बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने दुःख को दुनिया के दुःख में समो दिया था. किस कदर आसान बात थी! पहाड़ के नीचे पहुँचा तो मालूम हुआ हम खुद और हमारा निजी दुःख कितना तुच्छ है.
- आठ साल बाद तुम्हारी तरह मैं भी अपने वतन वापस लौटी और मैंने यहाँ के हालात देखे. ऐसी बातें देखी जिनसे मेरे सर फक्र से ऊँचा हुआ, ऐसी चीज़ें देखी जिनसे मेरा सर शर्म से झुक गया. मेरे सामने प्रोब्लेम्स का बहुत ऊँचा पहाड़ था. तब जानते हो क्या हुआ- चींटी ने क्या किया? उसने कानो में हाथ लटका कर पहाड़ पर चढ़ना शुरू कर दिया.
- क्या करू पार्टनर मेरा अंत बड़ा दुखद हुआ है.
- मैं ही लाश हूँ और मैं ही कब्र खोदने वाला और मैं ही रोने वाला.
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फौजिया रियाज,
ये लड़कियाँ
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