31 जुलाई 2010

यह तीसरा आदमी कौन है?

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।

- धूमिल

30 जुलाई 2010

ये ब्लाग में जन्मे 'पोप' हैं

अभी हाल में ब्लॉग की दुनिया के बारे में नया कुछ जानने को मिला। कुछ ब्लॉग और ब्लॉगों से जन्मी वेबसाईट् जगह-जगह सेमीनार करा रहीं हैं। ब्लॉग्स की दुनिया के बारे में सेमीनार। उनमें देश के बड़े-बड़े बुद्धिजीवी अपनी जुबां की खराश मिटा रहे हैं। ये तमाम बुद्धिजीवी तब किसी नये सुझाव के साथ कभी नजर नहीं आये जब तक देश के लाखों करोड़ों लोगों के पास इस तरह का कोई विकल्प नहीं था।

लेकिन इन लोगों को आप तब भी देख और पढ़ सकते थे कभी ये न्यूज पेपर में छपते थे तो कभी ये किसी प्रकाशन से अपनी कृतियों के प्रकाशन के समय दिखायी देते थे। बाद में न्यूज चैनल्स आये तो इन बुद्धिजीवियों की दुकान वहां जम गयी। खूब चले अपनी विवादास्पद बातों के दम पर।  औरतों और लड़कियों को 'सामान' बोलने-समझने वाले लोगों की इस जमात की किताबें आपको देश भर के बड़े प्रकाशनों से हजार की तादाद में छपी हुई मिल जायेंगी।

इस बीच में आम आदमी के लिये कही मंच नहीं था। वो मीडिया के रहमोकरम पर था। पहले अखबार के संवाददाताओं की चिरौरी और बाद में टीवी के ग्लैमरस रिपोर्टरस की जमात के आगे अपने भीख मांगते से अपनी बात कहने की कोशिश करता था।

सालों तक देश में यही हालत रही। तभी तथाकथित विद्धानों के मुताबिक नैतिक तौर पर भ्रष्ट्र पश्चिमी देशों से आयी एक नयी क्रांति ब्लाग...यानि आप को जो महसूस हो रहा है। दुनिया के बदलाव को आप जो समझ रहे है। दुनिया से आप को क्या उम्मीद है। बिना किसी लाग-लपेट के आप अपनी बात जब चाहे दुनिया तक पहुंचा सकते है। बिना किसी को परेशान किये। जिनको आप के विचारों में दिलचस्पी है वो उसको पढ़ लेंगे और जिनको नहीं है वो उस पर देखें बिना अपना वक्त गुजार लेंगे।

काफी दिन तक इस लोकतंत्रात्मक संचार पद्धति ने उन लोगों को चकित कर दिया जो तथाकथित बुद्धजीवियों के चेलों के तौर पर मीडिया में अपनी जगह बना रहे थे। लेकिन जितना उनके गुरू सफल रहे उतनी बाईट्स नहीं खा पा रहे थे। अब उन लोगों ने अचानक अपने-अपने ब्लॉग्स बनाये औऱ उतर पड़े मैदान में। जिसकों देखों अपने गुरू की अखाड़े की मिट्टी बदन पर लगाये नयी नयी कहानी सुना रहा है। 

यानि जितना विवादास्पद बयान दें उतनी ही टीआरपी। इसमें भी मीडिया के लोगों की भरमार। भाई लोग टीवी औऱ अखबार में अपनी जुबां और कलम के दम पर कुछ कर पाये हो यह तो उसकी कमाई और नहीं कर पाये तो इसलिये रगड़ाई। आप को हैरानी हो सकती है अगर आप ये देंखें कि कितने पत्रकारों के ज्ञान की उल्टी रोज इस आम आदमी के मीडियम पर हो रही है। भाई लोगों को ओर कुछ नहीं सूझा तो उन लोगों ने शुरू कर दिया ब्लाग्स के लोगों की पंचायती करना।

मैं और तो कुछ नहीं कहना चाहता लेकिन मैं इन खुदाई खिदमतगारों से कहना चाहता हूं कि भाई जिन लोगों को ब्लॉग्स तो अपने आप चलने वाली दुनिया है। उसमें आपके शराबी कबाबी गुरूओं की पंचायत की जरूरत नहीं है। आप खां म खां नेता बनने पहुंच गये। आप को जितना भी ज्ञान बघारना हो अपने ब्लॉग्स पर बघारे जिसे जरूरत होंगी आप से ले लेगा। आप को पोप बनने की जरूरत नहीं है। ना ही आम जनता को किस्मत से हासिल इस अधिकार को गंदा करने की। मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता लेकिन ब्लाग्स के नाम पर चल रही इस दुकानदारी से सब लोग परिचित होंगे।

28 जुलाई 2010

आज तुम्हारा जन्मदिवस

आज नामवर सिंह जन्मदिन है। उन्हीं की लिखी इस कविता के साथ उन्हें बना रहे बनारस की तरफ से जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ।

आज तुम्हारा जन्मदिवस, यूँ ही यह संध्या
भी चली गई, किंतु अभागा मैं न जा सका
समुख तुम्हारे और नदी तट भटका-भटका
कभी देखता हाथ कभी लेखनी अबन्ध्या।
पार हाट, शायद मेल; रंग-रंग गुब्बारे।
उठते लघु-लघु हाथ,सीटियाँ; शिशु सजे-धजे
मचल रहे... सोचूँ कि अचानक दूर छ: बजे।
पथ, इमली में भरा व्योम,आ बैठे तारे
'सेवा उपवन',पुस्पमित्र गंधवह आ लगा
मस्तक कंकड़ भरा किसी ने ज्यों हिला दिया।
हर सुंदर को देख सोचता क्यों मिला हिया
यदि उससे वंचित रह जाता तू.........?
क्षमा मत करो वत्स, आ गया दिन ही ऐसा
आँख खोलती कलियाँ भी कहती हैं पैसा।

25 जुलाई 2010

नई दिल्ली को हर तरह के विचार को बातचीत में शामिल करना चाहिएः उमर अब्दुल्ला

 सन् 2008 में उमर अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो घाटी को उनसे कई उम्मीदें थी। उमर युवा हैं। विदेश में पले-बड़े हैं और इनकी एजूकेशन भी विलायती है। उमर जब से मुख्यमंत्री बने हैं बेशक सीमापार से प्रायोजित आतंकवाद कम हुआ है लेकिन राज्य के अंदर अलगाववादी ताकतें काफी मजबूत और एकजुट हुई हैं। आमतौर पर देखा गया है कि किसी भी मौत पर अलगाववादी बखेड़ा खड़ा कर देते हैं भले ही यह मौत सेना या पुलिस की गोली से न हुई हो। और यह भारी हिंसा का रूप ले लेती है। उमर अब्दुल्ला देश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री हैं। वह घाटी मे अमन और शांति का रास्ता खोज रहे हैं। अमर अब्दुल्ला से बातचीत के कुछ अंश।

उमर जी श्रीनगर और  उसके आसपास के इलाकों में हिसां का जो प्रदर्शन किया गया उसके लिए क्या राज्य सरकार को आर्मी की मदद लेना जरूरी था जबकि  पिछले दो दशकों में कुछ भी नहीं हुआ?

हमें यह सूचना मिली थी कि कुछ पार्टियां इस हिंसक प्रर्दशन के पीछे हैं और हिंसा को कश्मीर के शहरी इलाकों में फैलाना  चाहती हैं। अमरनाथ यात्रा का दौर भी शुरू होने वाला है सुरक्षा के लिहाज से इस ओर ध्यान देना बहुत जरूरी था। इससे पहले अमरनाथ यात्रियों के साथ हिंसक घटनाओं की कुछ खबरे हमें पहले भी मिल चुकी हैं। इस तरह की घटनाएं पूरे कश्मीर के लिए शर्म की बात हैं। 

हालांकि यह समझ पाना बड़ा मुश्किल है कि इस साल जरूरत से ज्याद एक्शन लेने कि आवश्यकता क्यों पड़ गई। इस सबके बावजूद, जम्मू और कश्मीर में ऐसे हिसंक प्रदर्शन कुछ सालों से देखने को मिल ही जाते हैं?

यह सच है ..... परंतु हमने पिछले सालों से जो सीख ली उससे यही सीखा कि अमरनाथ यात्रा के समय हमारी पुलिस पर ज्यादा दबाव होता है। लेकिन हम सब कुछ संभालते आए हैं। लेकिन काउंटर टेररिज्म के लिए काम कर रही आर्मी को हटाने के बाद हमने यह जाना कि आतंकी गतिविधियों को सक्रीय होने का मौका मिल जाता है । और वह हमारे लिए एक समस्या बन सकते हैं। इस साल में नहीं चाहता कि कोई भी समस्या खड़ी हो इसलिए सरकार ने आर्मी को उसकी जगह वापस बुला लिया गया है। यह सब एक सोची समझी प्रक्रिया के तहत ही किया गया था।

कुछ आलोचको का कहना है कि सेना को वापस बुलाने का निर्णय जल्दबाजी में और हड़बड़ी में लिया गया था यह भी कहा गया है कि गृह मंत्री पी.चिदंबरम आपके इस निर्णय से इतेफाक नहीं रखते थे?
   
ऐसा नहीं है.... श्रीनगर को लेकर हमने यह निर्णय लिया। क्योंकि हमारी पुलिस अंतिम समय तक इस संघर्ष को शांत करने की कोशिश करती रही। लेकिन हिंसा के जारी रहते हुए हमने सेना को बुलाने का निर्णय सोच समझ के लिया। अगर हम कुछ नहीं करते तो हो सकता था कि यह सारा मामला हमारे हाथों से निकल जाता उस समय सारे देश की मीडिया हमें हिंसा का दोषी मानती। हां ये बात सच है कि श्री चिदंबरम यहां आर्मी का हस्तकक्षेप नहीं चाहते थे। वह नहीं चाहते थे कि इस मुद्दे पर आर्मी का प्रयोग किया जाए। लेकिन हम उन्हें स्थिति की गंभीरता के बारे में समझाने मे सफल हुए और उन्होंने हमारी बात को पूरी तवज्जो दी।                                  

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने ऑल पार्टी डायलॉग मे शामिल होने की आपकी और प्रधानमंत्री दोनों की अपील को नकार दिया तो अब आप क्या करेंगे?

जो मोहतरमा महबूबा मुफ्ती साहिबा ने सोचा है वह वास्तव में अच्छा नहीं ......मैंने महबूबा मुफ्ती जी से बात की और प्रधानमंत्री जी ने भी उनसे अपील की कि इस डॉयलॉग का हिस्सा बनें। मैं तो बस यही सोचता हूं कि उन्हें अपने निर्णय पर दोबारा विचार करना चाहिए था। जहां तक मेरा मानना है इस हिंसा से बहुत से कश्मीरी परेशान हैं मुख्यतौर पर नौजवान। मैं चाहता हूं कि सभी अपने मत रखें ताकि अमन का नया रास्ता निकाला जा सके। जिसका सिर्फ एक ही तरीका है और वह है बातचीत। मुख्य धारा की बहुत सी पार्टियों का यहां ज्यादा प्रभाव नहीं है इसी वजह से भी दूसरी पार्टियां परेशान हैं यहां तक की अलगाववादियों  का भी यहां ज्यादा प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता। मैं इस हिंसा को खत्म करना चाहता हूं और मैं हर प्रकार के विचार पर सोचने के लिए तैयार हूं।

आप क्या सोचते हैं महबूबा मुफ्ती ने जिस ओर संकेत किए है क्या उसमें नई दिल्ली कोई बड़ा रोल अदा करेगी ?
  
मेरा मानना है कि जिस समय मुशर्रफ साहब पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे उस समय पीडीपी ने भारत और पाकिस्तान की वार्ता के बीच अहम भूमिका अदा की थी। पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता के चलते जम्मू और कश्मीर को लेकर कोई सही फैसला नहीं आ पाया। लेकिन नई दिल्ली इस बात को लेकर आज भी कोशिश करने में लगी हुई है। मुझे लगता है नई दिल्ली को चाहिए की वह हर तरह के विचार फिर चाहे वह विभाजन का ही क्यों न हो उसे बातचीत में शामिल करें।  मैं जानता हूं कि अपने आप को अलग करना कभी भी मददगार साबित नहीं होगा लेकिन कश्मीर में अमन के लिए सभी को एक छत के नीचे आना ही होगा।
अनुवादः  सुनील चौहान और शैलेंद्र नेगी
साभारः द् हिंदू

24 जुलाई 2010

वे सिर्फ बालीवुड सितारे हैं, वास्तविक जीवन के नायक नहीं

रेमो फर्नाण्डिस
भारत सरकार बॉलीवुड के सितारों के प्रति जो असीम आकर्षण रखती है,मैं उसे समझ नहीं पाता हूं। वर्षों से उनको  अत्यधिक महत्व दिये जाने की मैं आलोचना करता रहा हूं और सार्वजनिक रूप से यह बताता रहा हूं कि यह देश  हमारे बच्चों के लिए अन्य सभी तरह के नायकों और रोल माडलों के मामले में दिवालिया है।

संगीत म्यूजिक अवार्ड के मौके पर लंदन के रॉयल अल्बर्ट हाल में (एक भाषण जिसका हाल में उपस्थित दर्शकों  ने जोरदार स्वागत किया था, लेकिन जिसे सहारा टीवी के प्रसारण से हटा दिया गया था क्योंकि सहारा ही उस कार्यक्रम की आयोजक थी) मैंने इस बात का जिक्र किया था कि किस तरह हैदराबाद के राष्ट्रीय खेलों के मौके पर भी भारत के राष्ट्रपति के साथ मंच पर आसीन मुख्य अतिथिगण खिलाड़ी नहीं थेः वहां न तो पी टी उषा थी, न सचिन तेंदुलकर, न ही लिएंडर पेस, न ही महेश भूपति।

हाँ, आपने ठीक अनुमान लगाया, वहाँ विराजमान थे बालीवुड के सितारे। और उस संगीत म्यूजिक अवार्ड में क्या नजारा था? बॉलीवुड के सितारों की उपस्थिति और कार्यक्रमों को वहां इतना महत्व दिया गया कि संगीतकार और गायक गायिकाओं को हाशिए पर धकेल दिया गया। आप रेडियो खोलिए  या टी.वी., कोई भी भारतीय चैनल ऐसा नहीं है जिसकी ’नेशनल ज्योग्राफिक‘ या ’एनिमल प्लेनेट‘ से जरा भी तुलना की जा सकती हो। सभी के सभी चैनल बालीवुड के सितारों पर केन्द्रित हैं।

हम अपनी तथाकथित धरोहर और संस्कृति पर इतना गर्व महसूस करते हैं कि हम इसकी खूबियों के बारे में धृणास्पद होने की हद तक हल्ला मचाते हैं। लेकिन मुझे एक भी भारतीय टी.वी चैनल या रेडियो स्टेशन ऐसा दिखाइए जो हमारे शास्त्रीय या लोकसंगीत, हमारी पारम्परिक वास्तुकला या हमारे रीति-रिवाज और संस्कृति के प्रति पूरी तरह समर्पित हो। विदेशी  चैनल इन सभी विषयों पर शानदार वृत्त चित्र बनाते हैं। हमारे ’टाक शो‘, ’गेम शो‘ और यहां तक कि हमारी जिन्दगियॉ भी बॉलीवुड सितारों द्वारा नियंत्रित हैं। भला क्यों न हों,हमारी सरकारों में भी तो उन्हीं सत्ता लोभी, भ्रष्ट, महत्वाकांक्षी, स्तूलकाय  ,निकम्मे, भूतपूर्व बालीवुड सितारों की धुसपैठ है।

मैं खुद बॉलीवुड का एक दूरस्थ हिस्सा हूँ, अपनी शोहरत और दौलत का एक हिस्सा मैंने अपने गाये हुए बहुत ही थोड़ी संख्या में, लेकिन अत्यंत सफल फिल्मी गीतों से कमाया है लेकिन मैं आखिरी आदमी होऊँगा जो यह उम्मीद करे कि वे गीत मुझे वास्तविक जीवन के नायक के दर्जे का हकदार बनाते हैं। या इसके चलते हमारी सरकार जरूरी और जायज उदेश्यों  पर खर्च करने की जगह मुझ जैसे लोगों पर करोड़ों रूपये खर्च करे। नेकनीयती का तकाजा है,क्या शो बिज में मुझे पर्याप्त पहचान, शोहरत और पैसा नहीं मिला है? क्या असली जरूरतमंद लोगों को सरकारी धन और प्रोत्साहन की मुझसे अधिक जरूरत नहीं है?

विश्वास  करें, मैं बॉलीवुड के सितारों के खिलाफ नहीं हूँ। लेकिन मेरे लिए वे सिर्फ बालीवुड सितारे हैं, उससे अधिक कुछ भी नहीं । वे वास्तविक जीवन के नायक नहीं है। वे सिर्फ नायकों की असली दिखने वाली भूमिकाओं का अभिनय करते है। हे भगवान,क्या हमारे पास अश्लील  नृत्य करने वाले शराब पीकर गाड़ी चलाने और लोगों की जान लेने वाले, अण्डर वर्ल्ड के अपराधियों से रिश्ते  रखने वाले, काला धन जमा करने वाले और हर तरह गंदे कामों में लिप्त, हद से ज्यादा पैसा पाने वाले इन प्रतिभाहीन लोगों की जगह अपने बच्चों को देने के लिए असली जीवन के कोई आदर्श  नहीं हैं?

पर्दे पर सुन्दर दिखने वाले लड़कों और तुच्छ लड़कियों की जगह हमारे बुद्धिजीवी, हमारे लेखक, हमारे वैज्ञानिक, हमारे नगर योजनाकार और निर्माणकर्ता, वास्तविक जीवन के सफल लोग कहाँ हैं? यदि हमारे पास अपने बच्चों को  देने के लिए सिर्फ ये ही आदर्श हैं तो हमें आश्चर्य  नहीं होना चाहिए यदि हमारे बच्चे भी बड़े होकर मानसिक और नैतिक रूप से इन्हीं लोगों की तरह बनें।

और हमें इस बात पर भी ताज्जुब नहीं करना चाहिए,यदि हमारा राष्ट्र खुद भी बालीवुड की तरह विकसित हो कार्डबोर्डों और थर्माकोलों से बना हुआ,टेक लगाकर खड़ा किया गया,पूरी तरह से नकली ,कृत्रिम,सतही और असली लगने वाली कचकड़ानुमा (सेलुलायड) मूल्य-मान्यताओं पर आधारित, जहाँ हमारी आध्यात्मिकता, दर्शन  और संस्कृति हमारे गौरवमयी अतीत की दूरस्थ,विस्मृत, उपेक्षित ओर धुँधली सी स्मृति भर रह जाय।

जब यह भयानक नैतिक और मूल्यगत दिवालियापन एक दिन अपनी पूरी शक्ति के साथ हम पर हमला बोलेगा, जब इतनी देर हो चुकी होगी कि इस दिशा में कुछ भी करना सम्भव न रहे तब भी हम पलायन का एक मार्ग तो खोज ही लेंगे-हम फिल्म देखने चले जाएंगे।

फिल्म महोत्सव के लिए खुदा का शुक्र है। हाँ, आप यह जरूर पूछ सकते हैं कि यदि मैं भारतीय अन्तरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव,गोवा, के बारे में इतने तीखे विचार रखता हूँ? क्योंकि वहाँ कार्यक्रम प्रस्तुत करना स्वीकार करके मैंने यह तय किया है कि भारतीय अन्तरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के कोश का एक बहुत ही छोटा सा हिस्सा उन दो उदेश्यों  की तरफ मोड़ा जाए जिन्हें मैं सर्वोच्च प्राथमिकता का समझता हूं। इस प्रस्तुति से होने वाली अपनी पूरी आय को गोवा के परोपकारी स्वास्थ्य और शिक्षा संस्थाओं को मैं दान करने वाला हूँ। इसका मतलब है कि जैसा मैं कहूँ वैसा ही आचरण करूँ।
समाप्त
पहला भाग ...... दूसरा भाग

23 जुलाई 2010

पहला प्रेम क्या इतनी आसानी से हाथ छोड़ता है.

प्रतिभा कटियार

पहला प्रेम क्या इतनी आसानी से हाथ छोड़ता है. जिसका वजूद धड़कनों में शामिल हो, उससे किनारा करने की कोशिश में भी बेपनाह प्यार ही तो होता है. हर पल दूर जाते कदम और करीब ले जाते हैं. शब्द अपने अर्थ बदलने लगते हैं. दूर जाने में पास आने का अर्थ दिखने लगता है. होता भी यही है. 


दूर होने की हर कोशिश प्यार के समंदर में एक और डुबकी सी मालूम होती है. पाब्लो नेरूदा का पहला प्रेम हो या चेखव का सब यही सच उजागर करते हैं कि जिससे लागे मन की लगन उसे क्या बुझायेगी चिता की अगन. मुस्कुराहटों में या आंसुओं में, इंतजार में या मिलन में, प्रेम में या आक्रोश में बात वही है बस प्यार.....
उन्हें हर उस वक्त वो व्यक्ति मिले जो उसे उसकी उत्कट आकांक्षाओं, समझ, विचार समेत स्वीकार करे. उसकी मन की गिरहों को न सिर्फ खोलता चले बल्कि उसका वैचारिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और व्यैक्तिक विकास भी करता चले. उसके प्रेम के इनकार को भी जो प्रेमी सिर आंखों पर सहेज ले. दखल न दे उसकी अंदर की दुनिया में.


उसे ठीक वक्त पर एक ऐसी दोस्त मिले जो उसे ताकीद करे कि बिना प्रेम के एक चुंबन भी किसी को मत देना. इससे बेहतर होगा मर जाना. भले ही यह ताकीद देने वाली वेरा की यह दोस्त एक वेश्या ही क्यों न हो. लेकिन प्रेम की प्रग्राढ़ता का कैसा अनमोल संदेश मिलता है वेरा को कदम कदम पर. कभी अपने भीतर से तो कभी बाहर से.


वेरा पाव्लोवेना को अपने पहले प्रेम को लेकर भले ही भ्रम हुआ लेकिन यह रिश्ता कमजोर नहीं था. तभी तो समझ और सच्चाई से सींचा गया रिश्ता मुझे तुमसे प्रेम नहीं है जैसी साफगोई को भी आसानी से स्वीकार कर लेता है. कहीं कोई हाय-हाय किच किच नहीं. वेरा के सपने में उसे पता चलता है कि जिस सद्भावना, दया, मदद, वैचारिक परिपक्वता को वह प्रेम समझ बैठी असल में वह तो प्रेम था ही नहीं.


प्रेम की जगह खाली थी और कोई ढेर सारे मौसम, सूरज की किरनें, चांदनी, खिलखिलाहटें, नर्माहटें, गर्माहटें लेकर आया और उस खाली जगह पर उसका अधिकार हो गया. लगा कि प्रेम पूरा हो गया. ऐसा ही तो होता है. ऐसा ही तो होता रहा है. लेकिन नहीं, ऐसा ही नहीं होता हमेशा. वेरा को समझ में आया. जिसने उसकी मदद की उसी से उसे प्रेम हो जाये यह कोई जरूरी नहीं है.


प्रेम को लेकर सबसे पहले हमें भ्रम ही तो होता है. किशोर वय में (या किसी भी उम्र में) जब हम दुखों में आकंठ डूबे हों, जब निराशाओं का समंदर लहरा रहा हो, जब अंधेरा स्थाई हो चुका हो, जब जीवन से विश्वास उठ चुका हो ऐसे में जो हाथ मदद को बढ़ता है, जो अंधेरे को चीरने में मदद करता है, जो जीवन को उम्मीदों की सौगात देता है, जो निर्जन मन की दुनिया को आशाओं के फूलों से पाट देता है, उसे ही प्रेम समझ बैठने का भ्रम भला किसके हिस्से नहीं आया होगा. 


लेकिन प्रेम ऐसे नहीं आता. ढेर सारी परिभाषाओं, इच्छाओं, सद्भाावनाओं को रौंदता हुआ, सौंदर्य के उपमानों को भंग करता हुआ बेफिक्री, बेलौसी और ढिठाई के साथ आता है एक रोज. पकड़ता है हाथ और चल पड़ता है हमें साथ लेकर...सारी जद्दोजेहद, बचने की हजारों कोशिशें सब बेकार. वेरा की जिंदगी में भी ऐसे ही प्रेम दाखिल होता है. पहले भ्रम बनकर फिर सच बनकर. वेरा के करीब जाकर जिंदगी खुलती है पर्त दर पर्त. 


कोई भी वेरा (स्त्री) किसी भी पुरुष को नहीं सौंपती अपना दुख. मुस्कुराहटें वो सबसे आसानी से सौंपती है. दुख को गहरे छुपाकर रखती है. तभी तो जीवन भर साथ होकर भी कोई पुरुष नहीं ही पहुंच पाता अपनी स्त्री के पास. उसके दुखों को ग्रहण करने की योग्यता ही प्रेम की योग्यता है। 


1863 से, रूस से, निकोलाई के उपन्यास से निकलकर सरहदों की तमाम सीमाओं को पारकर, धर्म, जाति, संप्रदाय, नस्ल, रंग, भाषा, संस्कृति के तमाम बंधनों को तोड़कर हर स्त्री का आंचल बन गया है. लहरा रहा है यहां से वहां तक.

['वेरा ' निकोलोई चेर्नीवेश्की (1828-1889) के ऐतिहासिक महत्व के उपन्यास व्हाट इज टु बी डन’ की कालजयी पात्र]

22 जुलाई 2010

‘वेरा’ निकोलाई की कैद से निकल भागी है।

प्रतिभा कटियार

वेरा अब समय, काल, इतिहास की कैद से मुक्त हो चुकी है। वेरा निकोलाई की कैद से निकल भागी है। निकोलाई चेर्नीवेश्की जिसने उसे अपने उपन्यास की नायिका बनाया। हालांकि वेरा निकोलाई के भी साधे सधी नहीं। वो उपन्यासकार को अपने ही इशारों पर नचाती रही, खुद जिंदगी के हाथों के मजबूर होने के बावजूद। बहरहाल, वेरा उस काल खंड को पार कर, देशकाल को पार कर पूरी दुनिया में विचरण कर रही है।


दिल्ली, मुंबई की सड़कों पर वेरा भागती-फिरती है. कहीं टैक्सी पकड़ती कहीं, सिटी बस तो कहीं मेट्रो टे्रन. 8 फरवरी 1863 को एक बंद लिफाफे से शुरू हुई वेरा की दास्तां यूं तो निकोलाई के उपन्यास में सिमट गयी लेकिन उसके सपनों का विस्तार किन्हीं भी पन्नों में सिमटने वाला नहीं था. वेरा ने अपनी पहचान का सपना देखा. खुद को महसूस किया. अपने भीतर के आंदोलन को समझा. व्यैक्तिक स्वतंत्रता, समानता के अर्थ उसके लिए बड़े थे. तब भी जब उसने अपने लिए मुट्ठी भर अस्तित्व भी नहीं गढ़ा था. गरीबी, कुंठा, निराशा से भरे बचपन में भी उसकी आंखों में मुक्त व्यक्तित्व का सपना लगातार पलता रहा. उसने वक्त आने पर गलत का पुरजोर विरोध किया.


वेरा से मिलकर यह महसूस होता है एक चेतन व्यक्तित्व का होना क्या होता है. हिम्मत क्या होती है और सपनों का अर्थ क्या होता है. प्रेम क्या होता है, संघर्ष क्या होता है. नैतिकता, परंपरा, वर्जना जैसे शब्द वेरा के विराट व्यक्तित्व के आगे बेहद बौने नजर आते हैं. वेरा हर बंधन से आजाद स्त्री मुक्ति का सपना है. वेरा प्रेम का विस्तार है. प्रेम की नई, खुली हुई परिभाषाओं का निर्माण करती वह स्त्री युगों-युगों तक के लिए स्त्रियों को संदेश देती है कि खुद को समझो. देश-काल और अपना मन सबका कितना महत्व है,यह भी समझो।


विवाह का अर्थ उसके लिए व्यक्तित्व का विकास है न कि बंधन. प्रेम को समझने के प्रयास में वेरा यह निःसंकोच मानती है कि किसी की मदद, सहयोग, पारस्परिक समझ, सहानुभूति, मित्रता का मिलाजुला रूप, जिसे हम प्रेम समझ लेते हैं असल में वह पे्रम नहीं होता. प्रेम तो इन सारे तत्वों से बहुत दूर कहीं होता है. तारों की छांव में...दूर तक फैले सरसों के खेतों में...अमराइयों में... बच्चों की खिलखिलाहट में. किसी की एक बूंद आवाज में, किसी के तिरस्कार में, किसी की जिद में, किसी से हार में हो सकता है प्रेम।


वेरा वेदना के तंतुओं से गुंथी है लेकिन फिर भी सुख में,जीवन में, उसकी अटूट आस्था है. दुःख को लेकर वह विचलित नहीं होती बल्कि उसे पार कर उससे शक्ति लेती है. वह सच्ची है अपनी भावनाओं को लेकर. इतनी सच्ची कि कई बार उसकी बेबाक बयानी यह भ्रम भी देती है कि कहीं वह घमंडी तो नहीं. लेकिन नहीं, वेरा झूठ को चिपकाये रहकर उसके साथ जीते जाने और परंपराओं का पालन करते जाने से बेहतर मानती है झूठ से मुक्ति पाना. वह सच से साक्षात्कार करने को कभी भी तैयार रहती है.


निकोलाई की वेरा से मिलते समय महसूस होता है कि वेरा सिर्फ वो नहीं जो किरदार में है जो वेरा अप्रस्तुत रह गई है वह ज्यादा महत्वपूर्ण है. उसकी जीवन को जीने की उत्कट इच्छा उसे आम से खास बनाती है. वह न तो सौंदर्य की देवी है न ऐसी कि एक बार में किसी का मन मोह ले. लेकिन जैसे-जैसे हम उसके करीब जाते हैं, उसका मन खुलता है, उसका दिमाग खुलता है, हमें वेरा से प्यार होने लगता है. एक समय के बाद वेरा का नशा छाने लगता है. कहीं भी वेरा अपने स्त्री होने के कारण, सौंदर्य के कारण, कमनीयता के कारण, स्त्रियोचित आकर्षण के कारण नहीं खींचती. उसका सोचने का ढंग ही उसे खास बनाता है. निकोलाई की वेरा उस दौर में विवाह के बाद भी अपनी स्वतंत्रता की पक्षधर है और आर्थिक आत्मनिर्भरता की भी. इसके लिए वह कैसा भी और कितना भी संघर्ष करने को तैयार रहती है.


वेरा शब्द ही प्रेम का पर्याय है। यूं वेरा को उसके समग्र में वैसे का वैसा समझ पाना भी कोई बहुत आसान काम नहीं है. निकोलाई की इस वेरा से दुनिया भर के न जाने कितने नवयुवकों ने प्रेम किया होगा. न जाने कितनी लड़कियों ने वेरा के सपनों में अपना दिल भी धड़कते हुए महसूस किया होगा. भाषा, संस्कृति और भौगोलिक सीमाओं से परे वेरा हर दिल की धड़कन बन गई. हर उस दिल की जो वेरा के करीब से होकर गुजरा और जो नहीं गुजरा वो वेरा जैसी किसी की तमन्ना को दिल में दबाये अपनी अनजानी तलाश को अंजाम देने को बेताब फिरता रहा सदियों तक।


वेरा में अपने सारे सपने, सारी भावनाएं तिरोहित करते हुए एक ऐसे समय ऐसी दुनिया का स्वप्न देखा किया जहां सिर्फ और सिर्फ प्रेम का साम्राज्य हो. जहां दुख, प्रेम पर विश्वास की अग्नि में तपकर पिघल जाये. जहां देह का अर्थ बहुत पीछे छूट जाये और बेहद आसान हो जाए आत्माओं को देख पाना, जैसे कोई देखता है अपनी खिड़की से सामने जाने वाली सड़क को.


वेरा की आंखों से न जाने कितने सपने देखती हैं. शोषण से मुक्त समाज का सपना, धरती पर छाई हरियाली का सपना. स्त्री को उसके सर्वस्व के साथ महसूस करने का सपना. उनके ढेर सारे सपने इस देश, समाज और प्रेम के वास्ते देखे गये, वेरा की खूबसूरत आंखों से. वेरा को प्रेम करना अपने अस्तित्व को प्रेम करना है, अपने अस्तित्व से सारी अकराहटों-टकराहटों को उठाकर फेंक देना है. आत्मा के संगीत को प्रवाह देना है, उसे महसूस करना है.


[‘वेरा’, निकोलोई चेर्नीवेश्की(1828-1889) के ऐतिहासिक महत्व के उपन्यास व्हाट इज टु बी डन’ की कालजयी पात्र]

21 जुलाई 2010

हम उन टुकड़ों के लिए शुक्रगुजार हैं

रेमो फर्नांडीस  
थोड़ी देर के लिए इस बात पर विचार करें... फिल्म उद्योग को बढावा देने और उसकी मदद करने के लिए 120 करोड़ रुपये?  क्या फिल्म उद्योग को हमारे वित्तीय सहारे की जरूरत है और वह भी इतने भारी पैमाने की ? फिल्म उद्योग को देश  के सबसे अमीर और सबसे भ्रष्ट उद्योगों में से एक माना जाता है। इसे काले धन के लिए अपराधियों के साथ रिश्तों के लिए और अभिनय सिखाने वाले महारथियों द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुरूप पतित जीवन शैली  के लिए जाना जाता है।

यह वह उद्योग है जिसे सरकार बढ़ावा देना जरूरी समझती है? गोवा के लघु उद्योगों को, हस्तशिल्पों  को खेल और तियात्र  कलाकारों को इतने ही बड़े पैमाने पर या इसके एक छोटे अंश द्वारा ही मदद की जाती है तो कैसा रहता? इन सभी लोगों को तो परेशानी  उठानी पड़ती है और भ्रष्ट अधिकारियों को घूस देने के लिए लंबी लाइनों में धक्के खाने पड़ते हैं। ताकि उन्हें सरकारी अनुदान मिल पाए, जिनका विज्ञापन तो जोर शोर से किया जाता है लेकिन मिलता कुछ ही लोगों को है। और  सरकार अश्लील  दौलतमंद फिल्म उद्योग पर 120 करोड़ फूंक देती है।


हां, लेकिन तब कहेंगे, कि यह खर्च गोवा पर किया गया है, यहां पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए। पर्यटक? क्या गोवा में पर्यटकों की कोई कमी है?  कमी पर्यटकों की नहीं, पर्यटकों के लिए सुविधाओं की है। वरना गोवा में पहले से ही पर्यटको की भरमार है। असली पर्यटक इलाकों में, जो कि समुद्र तट पर एक छोर से दूसरे छोर तक स्थित हैं हालात शर्मनाक है। एक लेन वाली सड़कें काफी जर्जर हालत में है जिनसे पर्यटक बसें या दो कारें भी एक दूसरे के बगल से नहीं जा सकती। खासकर हमारे मशहूर समुद्र तटों पर तथा पुरानी विलक्षण वस्तुओं के बाजारों, रेस्तराओं, शराबखानों और सभी लोकप्रिय ठिकानों के आस-पास सीजन के दौरान हर दिन ट्रेफिक जाम रहता है।


 जिस प्रकृतिक सौन्दर्य के चलते पर्यटक गोवा आते हैं, उसका विनाश  करने वाले कानूनी, गैर कानूनी बदसूरत निर्माण और विज्ञापनों के होर्डिंग, समुद्र तटों पर चारों ओर बिखरा कूड़ा-कचरा, प्लास्टिक और कांच के टुकड़े। पणजी सहित गोवा के सभी म्युनिसिपल मार्केट भारत के अन्य गंदे शहरों की ही तरह बदबू करते रहते हैं। सरकार  के पास असली समस्या पर्यटक इलाकों, असली पर्यटकों की असली समस्याओं को हल करने के लिए कोई समय है, न ही  दिलचस्पी। लेकिन उनके पास एक मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर, एक जहाजघाट, पणजी बस स्टैंड से दोना पाउला तक खूबसूरत  सड़क बनाने के लिए 1230 करोड़ रुपये हैं, जिनका पर्यटक शायद ही इस्तेमाल करें।


हां लेकिन बीचों की सफाई करना, बिजली और पानी की निरंतर आपूर्ति को बनाए रखना, सड़कों की मरम्मत करना, इन सभी कामों को पर्यटकों को आकर्षित  करने  वाली गतिविधि के तौर पर नहीं गिना जाता,क्योंकि ये बहुत ही आसान काम हैं और इन पर बहुत ही कम खर्च आता है। एक फिल्म आयोजन को ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है,भले ही यह सप्ताह भर के लिए लोगों को आकर्षित करता हो जिनमें ज्यादातर सरकार के खासुल खास मेहमान होते हैं। क्योंकि इसमें करोड़ों खर्च होते हैं। मुझे इस बात पर ताज्जुब होता हैकि लोग ये क्यों नहीं समझते कि जो चीजें ज्यादा जरुरी हैं उन पर कम पैसा खर्च करने के बजाए गैर जरुरी चीजों पर अधिक पैसा खर्च करना कहां की समझदारी है।


एक और बातः एक तर्क कि इन आयोजनों से गोवा में प्रगति और अवरचनागत विकास होते हैं, जो इसके बिना नहीं आते या जिनके आने मे सालों लग जाते है,गोवावासियों के लिए यह सबसे बड़ा अपमान है। जो उन्हें एक बार नहीं दो-दो बार सहना पड़ा है।  दो अलग-अलग सरकारों द्वारा। पहली बार यह कांग्रेसी सरकार थी जब राष्ट्रअध्यक्षों के सम्मेलन के मौके पर हवाई अड्डे से फोर्ट आगुआडा के बीच सड़क को सुधारा और चौड़ा किया गया और गोवा में एस.टी.डी. और आई.एस.डी सुविधा चालू की गई। और इस बार यहॉ भाजपा की सरकार है और मौका है भारतीय अन्तरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का।


गोवा की प्यारी जनता, इसका मतलब यही है कि आप और हम, यानी असली करदाता, जिनके पैसे से ये सुविधाएं निर्मित की जाती हैं,इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं कि हमारे लिए इनका निर्माण किया जाए। आप और हम दशकों तक खामोशी  से पोस्ट ऑफिस के टेलीफोन बूथों पर रुखे ऑपरेटरों के द्वारा अपमानित हो सकते हैं। आप और हम अपनी मेहनत की कमाई से खरीदी गई कारों को गढडों से भरी सड़कों पर दौड़ा कर बर्बाद कर सकते हैं, भले ही हम रोड टैक्स अदा करते हों।


 क्योंकि मेरे प्यारे लोगो हमारा कोई मोल नहीं है। हम तो सिर्फ कर चुकाते हैं धन मुहैया कराते हैं। भला उसे हम पर क्यों खर्च किया जाए? हां जब मुट्ठी  भर देशी  और विदेशी  राष्ट्राध्यक्ष पधारें, जब मुटठी भर बॉलीवुड की मशहूर और हॉलीवुड की बेनामी हीरोइनें अवतरित हों, तभी उस पैसे को खर्च करने का मतलब है। वो भी उन लोगों पर। हम लोगों पर नहीं।   


लेकिन,हम सबको तो इस बात के लिए शुक्रगुजार होना चाहिए कि उनकी लदी-फदी खाने की मेजों से गिर का कुछ टुकड़े हमारी ओर भी जाएंगे,जब वो भकोस कर उठेंगे और प्रीति भोज से चले जाएंगे। हां, निश्चय ही सह बात दीगर है कि ये सारे निर्माण कार्य आनन- फानन में किए गए हैं, इसलिए उनमें से अधिकांश तो एक बरसात भी नहीं झेल पाते। ऐसी शुभ घड़ी में इस तरह की निराशा  और हताशा पैदा करने वाली बातों को तो जुबान पर न लाना ही बेहतर है।
जारी...  (तीन भागों में)
भाग एक

20 जुलाई 2010

नाकारा सरकार और फिल्म महोत्सव

 रेमो फर्नाडिंस
9 दिसंबर 2004 को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव गोवा के समापन समारोह में कार्यक्रम देने के लिए मेरे साथ करार किया गया है। मैं एक पेशेवर कलाकार हूं और  इस तरह के तमाम आयोजनों में अनुबंधित किए जाने पर मैं कार्यक्रम प्रस्तुत करता हूं मेरे लिए सभी कार्यक्रम एक जैसे होते हैं। अपनी और मैं बस अच्छी प्रस्तुति देने की कोशिश  करता हूं बस।

अक्सर मुझसे भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव गोवा के बारे में राय पूछी जाती  है। मैं कार्यक्रम देने के लिए अनुबंधित हूं इसका मतलब यह नहीं कि मैं फिल्म महोत्सव के बारे में अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त न करुं। और मेरा ख्याल है कि गोवा सरकार भी जो नागरिकों के विचारों और उन्हें प्रकट करने के उनके अधिकार का सम्मान करती है इस बात से सहमत होगी।
तो ये हैं मेरे विचार।

थोड़ी देर के लिए ऐसे दंपति की कल्पना कीजिए जिनके दर्जन भर बच्चे हों। उनमें से ज्यादातर बीमार और अनपढ़ हों। दंपति का मानना है कि उनके पास बच्चों के उचित इलाज के लिए, उन्हें पढ़ाने लिखाने के लिए पैसा नहीं है। और  फिर भी उसी दम पर बाप कहे- लेकिन मेरे पास सिनेमा देखने के लिए पैसा है, चलो सब लोग फिल्म देखने चलते हैं।

आपने मेरी बात का मतलब समझ लिया न। यह प्राथमिकता का मामला है। स्वास्थ्य और शिक्षा सबसे पहले आते हैं और फिल्में सबसे बाद में। और इनके बीच ढेर सारी अन्य चीजें आती हैं-सार्वजनिक परिवहन, ट्रैफिक व्यवस्था, अपराध नियंत्रण, सूची लंबी है। लेकिन यह बात तय है कि फिल्मों का स्थान इनमें सबसे नीचे है।

हमारे गोवा मेडिकल कॉलेज में आइए और खुद अपनी आंखों से वहां का गंदगी, शौचालयों की दुर्दशा, खून के धब्बे वाली चादरें या रोगियों के कपड़े, तकियों या तकियों के गिलाफों की कमी तथा अधिकांश कर्मचारियों के रुखेपन तथा लापरवाही का नजारा देखिए। किसी भी सरकारी स्कूल या कॉलेज में जाइए और उनकी फटीचर हालत, पाठय पुस्तकों, बेंचों या छत की खपरैल जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव, अध्यापकों और  पाठयक्रमों के घटिया ये घटिया स्तर से दो चार होइए। अगर आपके पास इस देश  के निजी अस्पताल या निजी स्कूल में जाने के लिए पैसा नही है (जो कि व्यापक मौन बहुसंख्यक आबादी के पास नहीं है) तो आपके बच्चों के भविष्य का भगवान ही मालिक है।

सरकार कहती है कि स्वास्थ्य और शिक्षा की दयनीय दशा  का कारण धन का अभाव है। लेकिन उनके पास फिल्म महोत्सव आयोजित करने के लिए 120 करोड़ रुपये हैं। (इतना तो केवल सरकार खर्च करेगी गैर सरकारी खर्चे का अनुमान आप खुद  ही लगा लें।)

फिल्म उत्सव फ्रांस में हो या अन्य विकसित देशों  में, वहां की सरकार अपनी जनता की काफी अच्छी तरह से देखरेख करती है। वहां की सड़कें, वहां की बिजली आपूर्ति, जल आपूर्ति, स्वास्थ्य सुविधाएं, उनके  सरकारी ऑफिस और सार्वजनिक सेवाएं सभी चाक चौबंद और परिपूर्ण होते हैं- शहर के कोने-कोने में,  केवल उस मुख्य मार्ग पर ही नहीं जहां फिल्म महोत्सव का आयोजन किया किया गया हो। वहां के नागरिक हर क्षेत्र में पूरी तरह संतुष्ट हैं और इसीलिए वहां का सरकार अपने नागरिकों को "फिल्म दिखाती" है तो न्याय संगत है।

एक ऐसी सरकार के लिए ऐसा  करना न्याय संगत नहीं है जो यह दावा करती है कि उसके पास स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च करने के लिए पैसा नहीं है।
जारी...  (तीन भागों में)

 (रेमो फर्नाडिंस गोवा के एक लोकप्रिय गायक हैं। वहीं के एक स्थानीय अखबार में प्रकाशित  उनका लेख )

19 जुलाई 2010

हमन है इश्क मस्ताना

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?

खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?

न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?

कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?

- कबीर

17 जुलाई 2010

सभी को ढेर सारे प्यार के साथ।

मैं बहुत देर से यह पोस्ट लिखने की कोशिश कर रहा हूं। लिखता रहा,मिटाता रहा। लेकिन तय नहीं कर पाया कि क्या लिखुं ! तो अंततोगत्वा तय किया कि इस बार जो लिख रहा हूं वही आखिरी होगा। चाहे वो कितना ही गलत क्यों न हो !!

ऐसा कब हुआ है कि हम अपने लिखे से ठीक वही मैसेज हर किसी को दे पाए हों जो देना चाहते थे.....हम अक्सर  यह कहते हुए पाए जाते हैं कि मेरे कहने का यह मतलब नहीं था..... ऐसा मेरे संग भी कई बार हो चुका है..इतनी बार कि मैं इससे तंग हो चुका हूँ।

मैं यह भी साफ कर दूं कि मैं एग्री या डिसएग्री होने से नहीं परेशान हूं। यह तो सबसे सामान्य बात है। मैं परेशान हुआ हूं,उन बातों से जो मैंने नहीं लिखी थीं...लेकिन मेरे लिखे में वो मौजूद थीं....कई बार मुझे ही दूसरों के दिखाने पर दिखीं....कई बार मुझे नहीं दिखी लेकिन दूसरों को दिखती रहीं....।

यह भाषा की सीमा है, हमारे एक्सप्रेशन की सीमा है या आदमी के समझ की सीमा है ? जो भी हो....व्याख्यायें आवश्यकारूप से समस्या का हल नहीं देती। सो,मैं इसकी व्याख्या नहीं करना चाहता।

मैं कभी भी लिखने को लेकर आतुर नहीं था। लेकिन लोगों ने मुझे मजबूर कर दिया। यह कह-कह कर या जता-जता कर कि "लिख ही नहीं सकता इसलिए नहीं लिखता" !!

मैं कभी नहीं तैयार था ऐसे लिखने के लिए, न ही अब हूँ......। लेकिन उन 'मूर्खों' और 'मूर्खों के समूह' के दबाव में मैं लिखने लगा। पहले अखबार और मैगजीन में। फिर ब्लाग पर। जिससे मैं स्वयं ही असंतुष्ट रहा।

मैं पढ़ना चाहता था। मैं पढ़ना चाहता हूं। और मुझे उसी में सुख है। लिखना दुख है। दारुण दुख है। हमेशा ही है। इसलिए वह तभी स्वीकारना चाहिए जब "भूख और प्यास" की तरह असह्य हो जाए।

लोग मुझे जाने,मेरा नाम हो,अर्ध-शिक्षित मुझे विद्वान समझे इसके लिए मैं नहीं लिखना चाहता। मैं नहीं चाहता कि मैं लिखता भी रह जाऊँ और उम्र के अंत में इस तरह ऐसे लिखते जाने के लिए पछताऊँ !

मैं इस तरह लिखने से थक गया हूँ। इस प्रक्रिया में जरूर कोई खोट है। मैं एक ब्रेक चाहता हूं इस लिखने से। और इस ब्लाग से।

 हां,इस ब्लाग से। पिछले एक साल में मैंने अपना सारा खाली समय इस मुए को खिला दिया। मैंने बहुत कम पढ़ा है पिछले एक साल में। दुनिया में घूमा नहीं। बहुत से अजनबियों से नहीं मिल सका। जो मुझे अक्सर मिल जाते थे। और जिनसे मैं वो सीखता रहा जो किताबों मे नहीं मिलता।

इस ब्लाग के फालोवर बढ़ते गए। रीडरशिप भी बढ़ती गई। बिना किसी विशिष्ट प्रयास के। सभी जानते हैं कि मैंने कभी किसी को तंग नहीं किया कि मेरा ब्लाग पढ़िए-पढ़िए। फिर भी ठीक-ठाक संख्या में लोग इसे पढ़ते रहे। और मैं ब्लाग के  पढ़े जाने के भ्रम में फंस गया।

सो मैंने आज यह सोच लिया है कि अब मैं इस ब्लागिंग से एक ब्रेक लूंगा। कितना लम्बा पता नहीं ??

हो सकता है कि कुछ मित्र मुझसे ऐसा करने से रोकने की कोशिश करें। जिसकी कोई जरूरत नहीं। जिस दिन मुझे ब्लागिंग न करना खलने लगेगा मैं बिन बुलाए वापस आ जाऊँगा। खेदपूर्वक कह रहा हूं कि मैं इस पोस्ट पर पूछे किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगा।

सभी को ढेर सारे प्यार के साथ।

बाँधो न नाव इस ठाँव,बन्धु !

बाँधो न नाव इस ठाँव,बन्धु !

पूछेगा सारा गाँव, बन्धु!
यह घाट वही जिस पर हँसकर
वह कभी नहाती थी धँसकर
आँखे रह जाती थीं फँसकर
कँपते थे दोनों पाँव बन्धु !

वह हँसी बहुत कुछ कहती थी
फिर भी अपने में रहते थी
सबकी सुनती थी,सहती थी
देती थी सबके दावँ, बन्धु !

- निराला

16 जुलाई 2010

एक अशुद्ध बेवकूफ

हरिशंकर परसाई

बिना जाने बेवकूफ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है।

मगर यह जानते हुए कि मैं बेवकूफ बनाया जा रहा हूं और जो मुझे कहा जा रहा है, वह सब झूठ है- बेवकूफ बनते जाने का एक अपना मजा है। यह तपस्या है। मैं इस तपस्या का मजा लेने का आदी हो गया हूं। पर यह महंगा मजा है- मानसिक रूप से भी और इस तरह से भी। इसलिए जिनकी हैसियत नहीं है उन्हें यह मजा नहीं लेना चाहिए। इसमें मजा ही मजा नहीं है- करुणा है, मनुष्य की मजबूरियों पर सहानुभूति है, आदमी की पीड़ा की दारुण व्यथा है। यह सस्ता मजा नहीं है। जो हैसियत नहीं रखते उनके लिए दो रास्ते हैं- चिढ़ जायें या शुद्ध बेवकूफ बन जायें। शुद्ध बेवकूफ एक दैवी वरदान है, मनुष्य जाति को। दुनिया का आधा सुख खत्म हो जाए, अगर शुद्ध बेवकूफ न हों। मैं शुद्ध नहीं, ‘अशुद्ध’ बेवकूफ हूं। और शुद्ध बेवकूफ बनने को हमेशा उत्सुक रहता हूं।

अभी जो साहब आये थे, निहायत अच्छे आदमी हैं। अच्छी सरकारी नौकरी में हैं। साहित्यिक भी हैं। कविता भी लिखते हैं। वे एक परिचित के साथ मेरे पास कवि के रूप में आये। बातें काव्य की ही घंटा भर होती रहीं- तुलसीदास, सूरदास, गालिब, अनीस वगैरह। पर मैं ‘अशुद्ध’ बेवकूफ हूं, इसलिए काव्य-चर्चा का मजा लेते हुए भी जान रहा था कि भेंट के बाद काव्य के सिवाय कोई और बात निकलेगी। वे मेरी तारीफ भी करते रहे और मैं बरदाश्त करता रहा। पर मैं जानता था कि वे साहित्य के कारण मेरे पास नहीं आये।

मैंने उनसे कविता सुनाने को कहा। आमतौर पर कवि कविता सुनाने को उत्सुक रहता है, पर वे कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे। कविता उन्होंने सुनायी, पर बड़े बेमन से। वे साहित्य के कारण आये ही नहीं थे- वरना कविता की फरमाइश पर तो मुर्दा भी बोलने लगता है।

मैंने कहा- कुछ सुनाइए।

वे बोले- मैं आपसे कुछ लेने आया हूं।

मैंने समझा ये शायद ज्ञान लेने आये हैं।

मैंने सोचा- यह आदमी ईश्वर से भी बड़ा है। ईश्वर को भी प्रोत्साहित किया जाए तो वह अपनी तुकबंदी सुनाने के लिए सारे विश्व को इकट्ठा कर लेगा।

पर ये सज्जन कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे और कह रहे थे- हम तो आपसे कुछ लेने आये हैं।

मैं समझता रहा कि ये समाज और साहित्य के बारे में कुछ ज्ञान लेने आये हैं।

कविताएं उन्होंने बड़े बेमन से सुना दीं। मैंने तारीफ की, पर वे प्रसन्न नहीं हुए। यह अचरज की सी बात थी। घटिया से घटिया साहित्यिक सर्जक भी प्रशंसा से पागल हो जाता है। पर वे जरा भी प्रशंसा से विचलित नहीं हुए।

उठने लगे तो बोले- डिपार्टमेंट में मेरा प्रमोशन होना है। किसी कारण अटक गया है। जरा आप सेक्रेटरी से कह दीजिए, तो मेरा काम हो जाएगा।

मैंने कहा- सेक्रेटरी क्यों? मैं मन्त्री से कह दूंगा। पर आप कविता अच्छी लिखते हैं।

एक घण्टे जानकर भी मैं साहित्य के नाम पर बेवकूफ बना- मैं ‘अशुद्ध’ बेवकूफ हूं।
एक प्रोफेसर साहब क्लास वन के। वे इधर आये। विभाग के डीन मेरे घनिष्ठ मित्र हैं, यह वे नहीं जानते थे। यों वे मुझसे पच्चीसों बार मिल चुके थे। पर जब वे डीन के साथ मिले तो उन्होंने मुझे पहचाना ही नहीं। डीन ने मेरा परिचय उनसे करवाया। मैंने भी ऐसा बर्ताव किया, जैसे यह मेरा उनसे पहला परिचय है।

डीन मेरे यार हैं। कहने लगे- यार चलो केण्टीन में, अच्छी चाय पी जाय। अच्छा नमकीन भी मिल जाए तो मजा आ जाय।

अब क्लास वन के प्रोफेसर साहब थोड़ा चौंके।

हम लोगों ने चाय और नाश्ता किया। अब वे समझ गये कि मैं ‘अशुद्ध’ बेवकूफ हूं।
कहने लगे- सालों से मेरी लालसा थी कि आपके दर्शन करूं। आज यह लालसा पूर्ण हुई।(हालांकि वे कई बार मिल चुके थे। पर डीन सामने थे।)

अंग्रेजी में एक बड़ा अच्छा मुहावरा है- ‘टेक इट विद ए पिंच ऑफ साल्ट’- याने थोड़े नमक के साथ लीजिए। मैंने अपनी तारीफ थोड़े नमक के साथ ले ली।

शाम को प्रोफेसर साहब मेरे घर आये। कहने लगे- डीन साहब तो आपके बड़े घनिष्ठ हैं। उनसे कहिए न कि मुझे पेपर दे दें, कुछ कांपियां भी- और ‘माडरेशन’ के लिए बुला लें तो और अच्छा है।

मैंने कहा- मैं ये सब काम डीन से आपके करवा दूंगा। पर आपने मुझे पहचानने में थोड़ी देर कर दी थी।

बेचारे क्या जवाब देते? अशुद्ध बेवकूफ मैं- मजा लेता रहा कि वे क्लास वन के अफसर नहीं, चपरासी की तरह मेरे पास से विदा हुए। बड़ा आदमी भी कितना बेचारा होता है।

एक दिन मई की भरी दोपहर में एक साहब आ गये। भयंकर गर्मी और धूप। मैंने सोचा कि कोई भयंकर बात हो गई है, तभी ये इस वक्त आये हैं। वे पसीना पोंछकर वियतनाम की बात करने लगे। वियतनाम में अमरीकी बर्बरता की बात कर रहे थे। मैं जानता था कि मैं निक्सन नहीं हूं। पर वे जानते थे कि मैं बेवकूफ हूं। मैं भी जानता था कि इनकी चिंता वियतनाम नहीं है।

घण्टे-भर राजनीतिक बातें हुईं।

वे उठे तो कहने लगे- मुझे जरा दस रुपये दे दीजिए।

मैंने दे दिए और वियतनाम की समस्या आखिर कुल दस रुपये में निपट गई।

एक दिन एक नीति वाले भी आ गये। बड़े तैश में थे।

कहने लगे- हद हो गयी! चेकोस्लोवाकिया में रूस का इतना हस्तक्षेप! आपको फौरन वक्तव्य देना चाहिए।

मैंने कहा- मैं न रूस का प्रवक्ता हूं न चेकोस्लोवाकिया का। मेरे बोलने से क्या होगा।
वे कहने लगे- मगर आप भारतीय हैं, लेखक हैं, बुद्धिजीवी हैं। आपको कुछ कहना ही चाहिए।

मैंने कहा- बुद्धिजीवी वक्तव्य दे रहे हैं। यही काफी है। कल वे ठीक उल्टा वक्तव्य भी दे सकते हैं, क्योंकि वे बुद्धिजीवी हैं।

वे बोले- याने बुद्धिजीवी बेईमान भी होता है?

मैंने कहा- आदमी ही तो ईमानदार और बेईमान होता है। बुद्धिजीवी भी आदमी ही है। वह सुअर या गधे की तरह ईमानदार नहीं हो सकता। पर यह बतलाईये कि इस समय क्या आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं? आपकी पार्टी तो काफी नारे लगा रही है। एक छोटा सा नारा आप भी लगा दें और परेशानी से बरी हो जाएं।

वे बोले- बात यह है कि मैं एक खास काम से आपके पास आया था। लड़के ने रूस की लुमुम्बा यूनिवर्सिटी के लिए दरख्वास्त दी है। आप दिल्ली में किसी को लिख दें तो उसका सिलेक्शन हो जाएगा।

मैंने कहा- कुल इतनी-सी बात है। आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं। रूस से नाराज हैं। पर लड़के को स्कालरशिप पर रूस भेजना भी चाहते हैं।

वे गुमसुम हो गए। मुझ अशुद्ध बेवकूफ की दया जाग गयी।

मैंने कहा- आप जाइए। निश्चिंत रहिए- लड़के के लिए जो मैं कर सकता हूं करूंगा।
वे चले गए। बाद में मैं मजा लेता रहा। जानते हुए बेवकूफ बनने-वाले ‘अशुद्ध’ बेवकूफ के अलग मजे हैं।

मुझे याद आया गुरु कबीर ने कहा था- ‘माया महा ठगनि हम जानी’

15 जुलाई 2010

खुसरो बाज़ी प्रेम की...

खुसरो बाज़ी प्रेम की मैं खेलूँ पी के संग।

जीत गई तो पीया मोरे , हारी, पी के संग॥

14 जुलाई 2010

तब लग ही जीयौ भलौ दीयौ पड़ै न धीम

प्रस्तुत है पंकज बिष्ट के लिखे एक कापुरुष का महाप्रयाण का आखिरी भाग

क्या हुआ अगर मैं एक लेखक (परफार्मिंग) की तरह नहीं जी पाया ? क्या हुआ अगर मेरा नाम हर गोष्ठी,परिचर्चा,हर पुरस्कार के संदर्भ में नहीं लिया गया ?

लेखक कोई जनरल तो होता नहीं कि उसके सीने पर तमगे लटकाकर एक स्वार्थी वर्ग उसे उसकी महानता की याद दिलाता रहे और पुरस्कार भी ऐसे,जो टालस्टाय के होते नुट हाम्सन को मिलें,चेखव,काफ्का और गोर्की को न मिलें और चर्चिल के हाथ लग जाएं,नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल,शमशेर बहादुर सिंह के होते आला,हाला और लाला के हरिवंश राय बच्चन को मिल जाए ? इन पुरस्कारों के लिए अफसोस ?

यहां भगवान बुद्ध की एक सलाह याद आ रही है। अजातशत्रु द्वारा देवदत्त के सत्कार-लाभ पर उन्होंने ईर्ष्याग्रस्त भिक्षुओं को समझायाः

फलं वे कदलिं हंति फलं नलं।
सक्कारो कापुरसिं हंति गब्भो अस्सतरिं यथा।

(यानी फल केले के पेड़ का नाश करता है,फल बांस का और नल-नरकट का नाश करता है। खच्चरी का गर्भ खच्चरी का नाश करता है। इसी प्रकार सत्कार कापुरुष का नाश करता है।)

मैंने 'हंस' द्वारा आयोजित न लिखने के कारण वाली गोष्ठी में अपनी पांच साल की बेटी का उदाहरण दिया था,जो अकेले में तन्मय होकर नाचती रहती है। उसकी चिंता यह नहीं होती कि कोई नाच को देख रहा है या नहीं ? बस, नाचना और उससे आनन्दित होना ही उसका उद्देश्य रहता है।

राजेन्द्र यादव ने इसे बालसुलभ सरलता कहा था,पर मेरे विचार में यही सरलता एक हद तक किसी भी ईमानदार लेखक के लिए आवश्यक्ता होती है। अक्सर ज्यादा पाठक और प्रतिबद्धता का ध्यान रखने वाला लेखक ही दंद-फंद में पड़ता है। जितना मुझसे स्वतःस्फूर्त और स्वाभावकि तौर से लिख गया,मैंने लिखा।

तीन साल में तीन कहानी ही सही,पर जो कुछ लिखा मैंने लिखा,उसके प्रति मैं ईमानदार रहा। कुल मिलाकर लेखन से मुझे अभिव्यक्ति और रचना करने का जो सुख मिला वह सर्वोपरि था। उससे मैं संतुष्ट हूं और इससे पहले कि कट-पिटकर इतने क्षत-विक्षत हो जाते कि विगत गले में लटके भरी असहनीय पत्थर में बदल जाता,बेहतर हुआ मैं दिवंगत हो गया और कौन-सा हिन्दी साहित्य मुझसे ही शुरू होकर मेरे साथ ही खत्म होने वाला था।

आप ही कहिए,क्या यह अच्छा नहीं हुआ कि हिन्दी साहित्य का थका और ऊबा पाठक समुदाय कम से कम एक और कलम घसीटू के बोरी-भर कूड़े से समय रहते निजात पा गया। मुझे नई पीढ़ियों पर पूरा भरोसा है। निश्चित है कि मुझसे बचे कागज और स्याही का बेहतर उपयोग होगा।

पुनश्चः साथियों,मैं मरा बहुत भारी दिल से हूं,फिर भी संतोष के लिए मेरे पास योगेन्द्र दत्त शर्मा की दी हुई दो पंक्तियां हैं और जनहित में मैं उन्हें भी दोहराता हूं:

तब लग ही जीयौ भलौ दीयौ पड़ै न धीम
बिन दीयौ जीबौ जगत हमै न रुचै रहीम

पिछली कड़ियों के लिंक -
पहला भाग....दूसरा भाग....तीसरा भाग....चौथा भाग....पाँचवा भाग

13 जुलाई 2010

मैंने औरतों को प्रकाश में भी देखने की कोशिश की

प्रस्तुत है पंकज बिष्ट के लिखे एक कापुरुष का महाप्रयाण का पाँचवा भाग

जब मुझे 'ओमप्रकाश पुरस्कार' मिला तब मुझे बड़ा मजा आया। पहली बार लगा कि हां मैं वाकई लेखक हो गया हूं। कई जगह फोटो छपे,साक्षत्कार भी हुए और कुछ लोग ही सही,चलते-फिरते भी मुझे पहचानने लगे। प्रेमपाल शर्मा और सुरभि पाण्डे ही नहीं,फ्राँसिसी महिला निकोल बलबीर ने मुझे मिलने बुलाया और इतालवी लड़की लिचा,वह काफी हाउस तक देखने आई जिनका वर्णन लेकिन दरवाजा में हुआ है। रूसी हिन्दी विशेषज्ञ,जिनका मैं नाम भूल रहा हूँ,मुझे ढ़ूँढ़ते फिरे।

ये वे क्षण थे,जिनका मैंने खूब रस लिया,आनन्द उठाया। मुझे तब और भी प्रसन्नता हुई जब दिनमान ने यह लिखा-वह खोजी पत्रकारिता का जमाना था कि इस बार (संभवतः 1984) के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए रघुवीर सहाय और पंकज बिष्ट के नाम अंतिम थे। साथियों,मैं नहीं जानता कि यह कितना सच था,पर जहाँ तक मेरा सवाल है,मुझे तो इसे सच मानने में ही सुख मिलता रहा है। एक तरह से तब मुझे यकीन हो गया था कि चलो,इस बार का नहीं तो अगली बार का पुरस्कार तो अपना है ही। धीरे-धीरे समय बीतने के साथ यह दर्दनाक सत्य मेरी समझ में आ गया कि मेरी और मेर समकालीनों की नियति ही यह है कि वे इसी तरह के चर्चा-सुखों से आनन्दित होते रहें।

पर ठहरिए,इस आत्म-तर्पण का,इस तरह कुंठा और हताशा से भरे शोक-गीत में,अंत नहीं होना चाहिए। इस दिवंगत आत्मा का एक गुण,जो मैं व्यक्तित अनुभव से जानता हूं,वह यह था कि इस आदमी ने अपने तुनकमिजाज और भड़कीले स्वभाव के बावजूद हर वस्तु के सकारात्मक पक्ष को भी देखना चाहा था। नीलाबंर ने ('लेकिन दरवाजा' में) एक जगह कहा हैः "मेरी बात समझ रहे हो देब्बू। एक व्यक्ति के स्वप्न का कोई अर्थ नहीं होता। उसने गर्दन हिलाते हुए कहा,हम अपने को सबसे काट नहीं सकते। ऐसे स्वप्न जो बहुत निजी होते हैं,पागलपन की ओर ले जाते हैं-जैसे आप किसी बियावान पिरामिड में छोड़ दिए गए हों,हर सुविधा से सम्पन्न,पर पिरामिड में। तूतनखामेन की कब्र में।"  परिवार और समाज से कटकर मैं आखिर किसके लिए लिखता ?

 एक पल को मैं कल्पना तो कर सकता हूं कि मैंने एक शब्द भी न लिख होता,पर क्या मैं यह सोच भी सकता हूं कि मैं अपने बच्चों के बगैर भी रह सकता था ! इसलिए अगर उनके लिए ही मैंने अपनी अमूल्य जिंदगी का इतना लम्बा समय कतर-ब्यौंत में गंवाया तो भी अफसोस कैसा ? इसलिए अब तक यह लेखक नहीं,एक थके और हताश आदमी का प्रलाप था। क्या एक लेखक का मूल्यांकन करते समय यह याद किया जाएगा कि उसने कितने ऐंन्द्रिय सुख भोगे,कितनी औरतों के साथ वह सोया। वह विला या बंगले में रहा या नहीं,और कितने पुरस्कारों से उसे सम्मानित किया गया?

शायद सेनेका ने कहा है कि 'अंधेरे में सब औरतें एक-सी होती हैं।' पहली बार जब मैंने यह बात पढ़ी थी तो मुझे बहुत बुरा लगा था। पर बात का मर्म मेरी समझ में अब आ गया। अगर आप औरत को सिर्फ एक शारीरिक इकाई,एक भोग्य वस्तु मानते हैं तो वास्तव में सब एक बराबर हैं। ईमानदारी की बात है,मैंने औरतों को प्रकाश में भी देखने की कोशिश की,इसलिए अफसोस कैसा ? क्या जानवर (स्टड वुल) न हो पाने का ?
जारी.....
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12 जुलाई 2010

आवेश की दो कविताएँ

1.
प्यार
केवल भ्रम
याद
केवल श्रम
जिसके पूर्व
जिसके पश्चात
कोई बदलाव नहीं
और यह सम्बंध
पिछली जिंदगी का
पूर्ववत घिसता हुआ
क्रम -
जो मुझे मंजूर नहीं

2.
कोई क्या देगा गम उनको
जो खुद गैरों का गम लेंगे

जहाँ सब भागते होंगे
वहीँ कुछ लोग थम लेंगे

जहाँ सब हाँथ सेकेंगे
वहीँ कुछ जल रहे होंगे

कोई क्या उनको कम देगा
जो अपने आप कम लेंगे

- आवेश तिवारी

प्यार हमेशा "चिपचिपा" होता है !

तुम कहती हो
कि मैं इमानदार नहीं
क्योंकि मेरी हर बात में "मैं" है
मैं भी जानना चाहता हूँ ...
पोकर का ये खेल कब तक चलेगा,
आखिर किसका ब्लफ जीतेगा !
तंग आ चुका हूँ
अपने ही सपाट चेहरे
और तुम्हारी "सायक्लोनी" आँखों से !
शायद मैं समझता हूँ,
क्यों हर बार सायक्लोंन "फिमेल" होती है !
रेटिना से निकला भंवरिला चक्करदार समुद्र
घुस चुका है मेरे माथे में
टूट गया है सेरेब्रुम कार्टेक्स
बह गए हैं उस बाढ़ में,
उम्मीदें, रिश्ते और रेतघड़ी !
सिर्फ एक भारी पत्थर बैठा है तलहटी में,
ये ग्रेनाईट से ज्यादा "सौलिड" और डायमंड से भी "प्योर" है
बेशक ये कुंठा, भय, धोखे और आंसू का "ओर" है !
तुम्हारी गर्दन पर बना लाल निशान
मुझे याद दिलाता है कि
प्यार हमेशा "चिपचिपा" होता है !

- रोहित "वत्स"

11 जुलाई 2010

एक लेखक के लिए जिंदगी है क्या- रचना,रमणी और रम के सिवा ?

प्रस्तुत है पंकज बिष्ट के लिखे ‘एक कापुरुष का महाप्रयाण’ का चौथा भाग -
अफसोस तो कई हैं पर सबसे बड़ा अफसोस मेरे पुरुष को है कि महिलाओं की असीम कृपा के बावजूद मैं,उसका न के बराबर लाभ उठा पाया। कभी अपनी हीन-ग्रंथि के कारण,कभी अपनी नैतिकतावादी छवि के चक्कर में,कभी सामाजिक डर के कारण और कभी शुद्ध बेवकूफी में मैंने जो अवसर गंवाए उनके लिए उम्र की तीसरी अवस्था के साथ ही मेरा हाथ मलना बढ़ता गया था। अंततः एक लेखक के लिए जिंदगी है क्या- रचना,रमणी और रम के सिवा ?

मैं चाहता रहा था कि मेरे पास पहाड़ पर एक मकान हो जो चारों ओर से कम से कम दो एकड़ चीड़,बांज और बुरांस के जंगल से घिरा हो। दिल्ली के कोलाहल से दूर,अपने इसी बंगले के बरामदे में पहाड़ी गुदगुदी घूप में,आरामकुर्सी पर लदा मैं वे कई किताबें पढ़ना चाहता था,जो मैंने इस जन्म में खरीदी थीं,पर बंगले की प्रतीक्षा में आज भी पड़ी हैं और अब अगले जन्म में भी नहीं पढ़ी जाएंगी !

किताबों का बोझ तो मेरे बच्चे ढोते रहेंगे,पर मकान न बदल पाने के साहस के अभाव के कारण पत्नी की नजर में नाकारा सिद्ध होने के दर्द को झेलने के अलावा,मैं ऐसे मकान में रहने को भी अभिशप्त रहा,जहां मशीनों की खटपट और पड़ोसी रेडियो-टीवी के हल्ले से आहत मैं अंततः पूरी तरह से रेडियो-टीवी का विरोधी हो गया। (आप ठीक समझे पत्नी-विरोधी होना खतरे से खाली नहीं था) बंगला गया भाड़ में,दिल्ली विकास प्राधिकरण का फ्लैट नाम का डिब्बा भी तारे तोड़ना जितना असंभव कार्य बना रहा।

ऐसा नहीं था कि मैंने टवी के कार्यक्रमों में शामिल होना ही न चाहा हो। लोकप्रियता और अपनी छवि को सुरहरे पर्दे पर जगमगाता कौन मूर्ख नहीं देखना चाहता ? पर मुझे यह स्वीकार नहीं था कि जिस पर्दे के सबसे बड़े कवि सुरेन्द्र शर्मा और अशोक चक्रधर जैसे लोग ही हो सकते हैं,उसी के माध्यम से मैं भी पहचाना जाऊँ(फिर वही दंभ-पर हाँ यह दंभ मुझमें था।)

वैसे भी जहां तक किसी लेखक की नार्सिसी-ग्रंथि के तुष्टिकरण का सवाल है,समझ में आता है। पर टेलीविजन लेखक होने का प्रमाण ही नहीं पर्याय भी होने लगे,यह पतन मुझे स्वीकार नहीं था। लेखक का काम लिखना है, न कि अभिनय के माध्यम से अपना लेखक होना सिद्ध करना। और लिखने का उद्देश्य पढ़ा जाना है न कि खेल में बदल दिए जाना ! माफ कीजिएगा,अपने सारे आवरण के बावजूद मानसिक रूप से मैं एक असहिष्णु रूढ़िवादी पुराणपंथी ही रहा हूँ। जो नई चीजों को जल्दी स्वीकार नहीं कर पाता।
 जारी.....
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10 जुलाई 2010

देशहित में यही है कि मणि जी की 'बात' सच निकले।

टाइम्स आफ इण्डिया इन दिनों इतना फुटबाल खेल रहा है कि पूछिए मत। इस कदर फुटबाल खेलने का नतीजा ये निकला कि आज उसके मुख्य पृष्ठ पर पाल जी(जर्मन आक्टोपस) और मणि जी(भारतीय मूल(!) के मलेशियाई तोते) की फोटो छप गई। क्योंकि ये दोनों प्राणी टाइम्स वालों की ही तरह फुटबाल प्रेमी हैं। सिर्फ प्रेमी होते तो शायद टाइम्स से कम ही होते ! लेकिन ये दोनों टाइम्स के खेल विशेषज्ञों से बड़े खेल विशेषज्ञ निकले। जिसकी वजह से टाइम्स को इनको ससम्मान-सचित्र जगह देनी पड़ी।

हाल ये है कि जहाँ सारे खेल विशेषज्ञ चूक गए वहाँ पाल जी और मणि जी बाजी मार ले गए ! जाहिर है कि फुटबाल विश्व कप के बाद भी यह मामला जारी रहेगा। इंसान की सोचने की क्षमता से आक्टोपस और तोते कैसे बीस पड़ गए इस पर शोध होंगे। होने ही चाहिए। होंगे ही। खैर ये तो भविष्य की बात है। भविष्य देखने के लिए तो पाल जी और मणि जी हैं ही। हम मनुष्य ताजा हालात की समीक्षा करें। यही मनुष्योचित है !

फाइनल से पहले तक पाल जी और मणि जी हर मैच के परिणाम पर सहमत थे। फाइनल मैच में दोनों का एकमत होना संभव नहीं था। डेमोक्रेसी है भाई, अपोजीशन का होना जरूरी है ! सो,फाइनल को लेकर पाल जी और मणि जी दोनों ने अलग-अलग टीमों पर हाथ धरा है।

मैं राष्ट्रवादी हूँ अतः हर मामले में देशहित की पहले सोचता हूँ। इसलिए मैंने सोचा (!) भारत के लिए बेहतर यह होगा कि पाल जी की बात गलत निकले। मणि जी का सही होना हर लिहाज से देशहित में है। हमारा देश ‘तोतों’ का देश है। गली-गली में ऐसे ‘तोते’मिल जाएंगे जो टाइम्स या किसी भी अन्य मीडिया हाउस के विषय-विशेषज्ञों से ज्यादा सटीक भविष्यवाणी कर सकते हैं !

गर मणि जी की बात सही हो गई तो भारत के पास अपने देश के ‘तोतों’ की ब्रांडिंग करने का सुनहरा मौका होगा। जरा सोचिए,वो दिन कैसा होगा....हर देश का सिरमौर ‘भारतीय तोता’ !!

अमेरिका का राष्ट्रपति कौन बनेगा,ये बताएगा ‘भारतीय तोता’। इरान पर हमला कब होगा ये बताएगा ‘भारतीय तोता’। अमेरिका दुनिया में 'डेमो-क्रेसी' फैलाना कब बंद करेगा ये बताएगा ‘भारतीय तोता’। अंतरराष्ट्रीय मामलों का सबसे बड़ा विशेषज्ञ, कोई और नहीं... ’भारतीय तोता’ !!

ऐसा नहीं है कि ‘भारतीय तोता’ विदेशी मामलों का ही जानकार होगा। भारत के बिल्कुल घरेलू मुद्दे,मँहगाई,बेरोजगारी,भूखमरी जैसे मुद्दे भी उसके विचारार्थ रहेंगे। लेकिन ये मुद्दे तो भारत में हमेशा से रहे हैं ! सो,मेरा ख्याल है भारतीय जनता की तरह ‘तोता समुदाय’ भी इन्हें ज्यादा गंभीरता से नहीं लेगा। जब-जब जरूरत पड़ेगी किसी ‘तोते’ को वोट देकर छुट्टी पा लेगा। लगता है,मैं विषय से भटक गया। बात फुटबाल की हो रही थी। न कि डेमोक्रेसी की। जो कहने के लिए मैंने यह पोस्ट लिखी सीधे उस पर आता हूँ।

मैं सभी आस्तिक लोगों से गुजारिश करूँगा कि विशुद्ध भारतीय मूल के मलेशियाई तोते मणी जी की लिए प्रार्थना करें। कि उनकी ही भविष्यवाणी सच निकले। जिससे ‘भारतीय ‘और ‘भारतीय मूल’ के ‘तोतों’ के दिन बहुरें।

एक बदमाश दो एनकाउन्टर

एक बदमाश का दो बार एनकाउन्टर और दोनों बार मौत. गाजियाबाद और मेरठ दोनों जिला पुलिस के दस्तावेज कह रहे हैं असली को हमने मारा .....

उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा फर्जी पुलिस मुठभेड़ होती हैं.ये बात राष्ट्रीय मावाधिकार आयोग की रिपोर्ट कहती है कि 1993 से 2009 के बीच उत्तर प्रदेश पुलिस ने 16फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम  दिया. तफ्तीश में एक ऐसा मामला सामने आया जो देश के कानून और पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है.   ये एक ऐसे एनकाउन्टर की कहानी है जिसमें एक व्यक्ति का दो बार एनकाउन्टर  होता होता है. दोनों बार वो मारा जाता है. दोनों बार मृत व्यक्ति की शिनाख्त उसका बाप करता है.दोनों बार सवाल खड़े होते हैं.दोनों मामलों की जांच दो अलग अलग   एसडीएम स्तर के अधिकारी करते हैं . दोनों की  रिपोर्ट में एक ही आदमी मारा जाता है. दोनों एसडीएम अपनी जांच रिपोर्ट में एक दूसरे के एनकाउन्टर पर सवाल खड़े करते हैं.    मामला मुजफ्फरनगर  जिले के चरथावल थाना क्षेत्र का है . ये  बात उत्तर प्रदेश पुलिस से आर टी आई के माध्यम से प्राप्त  दस्तावेज कह  रहे हैं. 

 क्या है मामला
 दरअसल नौशाद एक बदमाश था. जितनी दहशत नौशाद के जिंदा रहते उसके नाम की थी  उससे भी दहशत भरा है उसका  पुलिस फाइलों  में दबा  मौत का सफरनामा.ये कोई कहानी नहीं है. बल्कि उत्तर प्रदेश पुलिस का ऐसा कारनामा है जिसकी पहेली आजतक खुद उत्तर प्रदेश पुलिस भी नहीं बुझा पाई है. दरअसल नौशाद का एनकाउन्टर 28 जून 1997 को मेरठ जिले के सरधना थाने ने किया. इंस्पेक्टर गिरीश चंद्र के नेतृत्व में बहादुर पुलिस टीम  ने इनामी बदमाश  नौशाद की मार गिराया. बाकायदा कपडे और फोटो देख कर गाँव और पुलिस के मौजूद लोगों ने  मृतक की पहचान क़स्बा पीरजादगान, जिला मुजफ्फर नगर निवासी  नौशाद के रूप में की. और इस तरह नौशाद का एनकाउन्टर  हुआ. गौरतलब है कि नौशाद उत्तर प्रदेश शासन के साथ साथ दिल्ली पुलिस से भी घोषित इनामी बदमाश था लेकिन पुलिस टीम  सरधना पुलिस ने इनाम कि राशि लेना उचित नहीं समझा.

पुलिस की  कहानी पर सवालिया निशान
आमतौर पर किसी भी इनामी बदमाश को मारने पर पुलिस अपने स्तर पर इनाम कि घोषणा तो करती ही है साथ ही आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन भी दिया जाता है.लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. खैर मामला शांत हुआ और नौशाद कि फाइल हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दी गई. लेकिन नौशाद का जिन्न इस एनकाउन्टर के ठीक पांच महीने बाद फिर  बाहर  आ गया क्योंकि  21 नवंबर 1997 को मृत  नौशाद फिर से मारा गया.  सरधना पुलिस के द्वारा पांच महीने पहले  मारे गए इनामी बदमाश नौशाद को गाजियाबाद पुलिस के विजयनगर थाने ने एक बार फिर मार गिराया.इस बार ये कारनामा कर दिखाया इंस्पेक्टर शरद प्रताप सिंह की बहादुर टीम ने.

इसके साथ ही सवाल  खड़ा हुआ कि आखिर असली नौशाद कौन था.मामले में तब नया मोड़ आ गया जब दिल्ली पुलिस के तत्कालीन डीसीपी अजय कश्यप ने ये कह कर गाजियाबाद के तत्कालीन  एसएसपी को पत्र लिखा कि विजय नगर पुलिस द्वारा मारा गया व्यक्ति बदमाश नहीं बल्कि जमा मस्जिद के एक  होटल में काम करने वाला मौहम्मद अरशद पुत्र  अमीर हसन जिला मुजफ्फरनगर, गांव ककरौली  का रहने वाला  था. दरअसल अरशद  होटल मालिक से  21  नवंबर 1997  की शाम ये कह कर गया था कि एक घंटे में वापस आ रहा है. लेकिन अरशद का एक घंटा आजतक वापस नहीं आया. बाकायदा घटना कि मजिस्ट्रेटी जांच की गई.लेकिन सच्चाई कही दबी रह गई. तत्कालीन अपर जिला मजिस्ट्रेट विनोद कुमार पंवार ने अपनी रिपोर्ट में सरधना  पुलिस के द्वारा किए गए एनकाउन्टर  पर सवाल तो उठाए लेकिन अपनी रिपोर्ट में  ये साफ नहीं किया कि दोनों मुठभेड़ों में किस पुलिस टीम ने बेगुनाह का कत्ल किया . मजिस्ट्रेट विनोद कुमार ने विजय नगर पुलिस द्वारा किए गए एनकाउन्टर कि जो कहानी जांच रिपोर्ट में  पेश कि वो  किसी हिन्दुस्तानी फिल्म कि कहानी से कम नहीं है...जांच रिपोर्ट के कुछ अंश 

बहादुर पुलिस की कमजोर कहानी 
थाना अध्यक्ष श्री शरद प्रताप सिंह, कां 1646 श्री अशोक कुमार, कां 1644 ज्ञानेन्द्र कुमार व का. 1588 अवध नारायण  दिनांक 21-11-1997 को सरकारी जीप संख्या यूपी-14ई/-1616 ड्राईवर ओंकार के साथ गश्त करते हुये बाईपास रोड पर जा रहे थे  एक आदमी ने उनकी जीप रूकवाई और बताया कि मौहल्ला बौद्ध विहार में कुछ बदमाश हैं जिन पर हथियार भी हैं। इस सूचना पर उन्होंने श्विवास करके आपस में एक-दूसरे की जामा-तलाशी ले- देकर विश्वास किया कि उनमें से किसी के पास कोई नाजायज असलाह आदि नहीं है और पैदल-पैदल विजयपाल के आपिस की तरफ बढ़े तो विजयपाल के आपिस के दक्षिण पर कच्ची सड़क पर पहुंचे तो चारों तरफ अंधेरा  था और 2-3 छाया-सी विजयपाल के आपिस के सामने प्रतीत हो रही थी।

इस पर थाना अध्यक्ष व कां ज्ञानेन्द्र कुमार सीधे कच्ची सड़क से व का.अशोक कुमार व अवध नारायण दोनों करीब दस कदम पूरब को हटकर छाया की तरफ बढे़ तो थोड़ा आगे बढ़े थे कि उधर से आवाज आई कि कौन है? इस पर थाना अध्यक्ष ने कहा कि ह पुलिस वाले हैं। इतना सुने ही बदमाशों ने उन पर गोली चलानी शुरू कर दी तथा उन्होंने फुर्ती से जमीन पर लेटकर अपनी जान बचाई और पोजीशन ली तथा थाना अघ्यक्ष ने ललकार कर कहा कि तुम लोग चारों तरफ से घिर गये हो अपने-आप को पुलिस के हवाले कर दों जिस पर उनमें से एक व्यक्ति ने चिल्लाकर गाली देकर कहा कि भाग जाओं आज तुम्हारी समझ में आ जायेगा कि नौशाद किसे कहते है। भाग जाओ आज तुम्हारी समझ में आ जायेगा। वह सभी लोग ट्रालिंग करते हुये बदमाशीं की फायरिंग का जवाब देते हुये आत्मरक्षार्थ एवं बदमाशों पर पुलिस का दवाब बनाने की नीयत से फायरिंग करते हुये आगे बढ़ते गये। इसी दौरान फायरिंग के बीच में एक हल्की-सी चीख के साथ एक बदमाश गिरता दिखाई दिया और इसी के साथ शेष दोनों बदमाश उन पर फायरिंग करते हुये पीछे की तरफ हटने लगे। थाना अध्या ने का.ज्ञानेन्द्र कुमार को बदमाश को वहीं करीब 20 कदम की दूरी जहां से वह फायरिंग कर रहे थे.(ये अंश एसडीएम की जांच रिपोर्ट से लिए गए हैं)

आखिर कब मिलेगा इंसाफ?
इस पूरी कहानी में एक बात तो सच है कि किसी भी एक मुठभेड़ में एक बेगुनाह पुलिस की गोली का शिकार हुआ. लेकिन वो कौन था? ये सवाल आज भी ज्यों का त्यों बना हुआ है.नौशाद और अरशद एक ऐसी पहेली बन चुके हैं जिनकी बंद फाइलें चीख -चीख कर उत्तर प्रदेश पुलिस और कानून ऐसे न्याय की गुहार लगा रही है.एक बात तो सब मान लेंगे कि नौशाद तो बदमाश था लेकिन सीधा साधा अरशद भी  21-11-1997 से आजतक कभी वापस नहीं लौटा.आज भी अरशद का बूडा बाप अपने बेटे के बेगुनाह होने की भीख मांग रहा है. मां की बूड़ी आँखें अब थक चुकी हैं पत्नी आज भी अपने शौहर की राह तक  रही है और एक बेटा अपने अब्बू  का इंतजार कर रहा है. इंसाफ  की कोई आस नहीं है. क्योंकि उनके पास इतना पैसा नहीं कि वो इंसाफ का दरवाजा खटखटा सकें.

9 जुलाई 2010

इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई

इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दवा करे कोई।

बात पर वाँ जबान कटती है
वो कहें और सुना करे कोई।

बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या कुछ
कुछ न समझे,खुदा करे कोई।

न सुनो,गर बुरा कहे कोई
न कहो,गर बुरा करे कोई

रोक लो,गर गलत चले कोई
बख्श दो,गर खता करे कोई

कौन है,जो नहीं है हाजतमंद
किसकी हाजत रवा  करे कोई

जब तवक्को ही उठ गई गालिब
क्यों किसी का गिला करे कोई।

इब्न-ए-मरियम = मरियम का बेटा (ईसा मसीह).  तवक्को = आस         

8 जुलाई 2010

वो जो 'आलोक तोमर' हैं

 आवेश तिवारी
क्या मै संपादक जी से बात कर सकता हूँ ?जी जरुर वो एक बैठक में हैं ,१० मिनट बाद कीजिये
१० मिनट बाद ......कैसे हैं आवेश जी हम आपकी रिपोर्ट छाप रहे हैं और हाँ सुनिए लगातार लिखते रहिये ,जी सर.....

मेरे लिए बड़ी अजीब सी बात थी ये लगातार लिखते रहिये ,कभी किसी ने नहीं कहा ,कहता भी कैसे हर संपादक आलोक तोमर नहीं होता.

कुछ वैसे ही जैसे हर खबर सिर्फ खबर नहीं होती ,कभी कभी ख़बरों को अखबारनवीस जीता भी है उन्हें खाता भी है उन्हें पीता भी है,ख़बरों को जीने वाले ही आलोक तोमर कहलाते हैं. आलोक तोमर से मै आज तक नहीं मिला ,सिर्फ कभी कभार फोन पर बातें ही हो पाती हैं,लेकिन एक चीज की हमेशा हम दोनों के बीच सहमति रही ,हमने उन्हें अपना गुरु माना और उन्होंने चुपचाप मुझे अपना शिष्य बना लिया.

 मै जानता हूँ मैं जितना उन्हें पढता हूँ वो उससे ज्यादा मुझे पढते हैं ,शायद यही वजह है कि जब कभी मै कुछ लिखने बैठता हूँ तो एक बात हमेशा जेहन में रहती है कि अगर उन्हें रिपोर्ट में दम नहीं लगा तो वो उसे अगले ही पल उठा कर कूड़े के ढेर में फेंक देंगे ,या फिर अगर उन्हें अच्छी लगी तो उसे खुद ही सजा संवारकर प्रस्तुत कर देंगे, ये एक चीज हमेशा हमें सही ,तथ्यपरक और सरोकार से जुडी रिपोर्ट्स लिखने को प्रेरित करती रही

न जाने कब आलोक ,मुझ जैसे युवाओं के सेनापति बन गए ,हम नहीं जानते ,लेकिन इतना जरुर जान गए थे कि हमारा सेनापति अपनी सेना को कभी हारने नहीं देगा क्यूंकि उसने हारना सीखा ही नहीं है. वो एक और सिर्फ एक हैं जिनकी उपस्थिति ने हमेशा ये एहसास कराया कि जिस दिन रोटी के लाले पड़ेंगे सिर्फ एक फोन करूँगा, विश्वास है .आलोक जी मुझे भूखे तो नहीं मरने देंगे.

पिछले महीने दिल्ली की सड़कों पर मैं अपने मित्र रंगनाथ के साथ घंटों आलोक सर के बारे में बात करता रहा ,बातचीत के दौरान एक युवा पत्रकार मित्र का जिक्र छिड़ गया ,जो सीनियर इंडिया में आलोक जी के साथ थे और मेरे भी मित्र थे ,जानकारी मिली कि उसने ने शादी कर ली ,वो भी अंतरजातीय प्रेम विवाह ,लड़की वाले इस विवाह के सख्त खिलाफ थे ,स्थिति यूँ थी कि लड़के की जान पर बन आई थी.लेकिन आलोक जी ने अकेले खड़ा होकर और सबसे लोहा लेकर शादी कराई ,अगर वो न होते तो ये शादी संभव ही नहीं हो पाती.

एक बार आलोक जी ने कहा था जब आपके बीच से ही कोई एक साथी काठ की तलवार से ही सही लड़ने का फैसला कर लेता है तो आप सिर्फ तमाशाई क्यों बन जाते हैं?ये सिर्फ कुछ शब्द नहीं थे एक पत्रकार के तौर पर आलोक तोमर आज भी तमाशाइयों की भीड़ में शामिल नहीं होना चाहते ,उन्हें मालूम है कि अगर कोई पत्रकार साथी काठ की ही तलवार उठा रहा हो तो उसके साथ हर मुनासिब हथियार लेकर उठ खड़ा हो जाना है ,हालाँकि उन्हें इसकी कीमत लगातार चुकानी पड़ रही है.

आलोक जी की सबसे बड़ी खासियत ख़बरों के प्रति उनकी ईमानदारी है डेनिश कार्टूनिस्ट का कार्टून छापने के मामले में जो कुछ उनके साथ हुआ ,शायद वो जानते थे कि ऐसा होगा दिल्ली पुलिस के तत्कालीन मुखिया के के पाल ने आलोक जी को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी ,आलोक जी हिम्मत नहीं हारे ,लड़ते रहे ,ये बात जगजाहिर थी कि आलोक तोमर ने पाल के बेटे के बारे में जो लिखा था ये सब उसी का नतीजा था ये, अपने आपमें चौंका देने वाली खबर थी कि जो मुक़दमे वो लड़ता है हार जाता है ,ये वो समय था जब दिल्ली तमाम पत्रकार के के पाल के साथ रोज बरोज दारू मुर्गे की दावत खाते थे और कोई उनके खिलाफ एक शब्द भी लिखने से कतराता था ,लेकिन आलोक जी ने साहस के साथ लिखा.

 ये बात शायद कम लोग जानते हैं कि सीनियर इंडिया में जो कार्टून छपा वो इसी टाइम्स ऑफ इंडिया से उठाया गया था ।प्रथम दृष्टि में देखकर ही पता लगता था कि आलोक तोमर ने ये जानबूझ कर नहीं छापा है लेकिन उन पर कार्यवाही हुई. अजीब सी बात थी कि आलोक जी का उस वक़्त विरोध कर रहे लोगों में तमाम वो लोग थे जो हुसैन द्वारा देवी देवताओं का चित्र छापे जाने पर हो रहे विरोध को लेकर झंडा बुलंद किये हुए थे ,मगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्र से जुड़े इस मामले में सबने होंठ सी लिए ,आलोक तोमर उन विकट परिस्थितियों से लड़े और बहादुरी के साथ बाहर आये.

ख़बरों में जोखिम लेने का जज्बा हमने उनसे ही सीखा है ,अगर खबर है तो है ,चाहे वो बरखा दत्त हों वीर संघवी हों या उनके अभिन्न मित्र ओमपुरी हों या फिर कोई और. अगर खबर का वो हिस्सा हैं तो आप आलोक जी से पास ओवर की उम्मीद बिलकुल न करें.और अब आज गुरुवार को फेसबुक पर ये सन्देश उभरता है -

 “ मित्रो, आपके स्नेह और चिंता से अभिभूत हूँ.मेक्स अस्पताल वालों ने आज चार घंटे लम्बी और सत्तर हज़ार रुपये महंगी जांच के बाद कहा है की है तो केन्सर ही, मगर वक़्त पर पकड़ लिया गया है. कल इलाज़ की प्रक्रिया तय होगी. मैं आपका पीछा इतनी ज़ल्दी छोड़ने वाला नहीं हूँ. जिन मित्रों ने फोन किये और सन्देश भेजे, वे मेरी आत्मा पर अंकित हैं.”

आलोक अब कैंसर से लड़ेंगे ,लड़ते शेर ही हैं ,बाकी आत्मसमर्पण कर देते हैं ,एक ऐसे वक्त में जब हम हर तरफ हार रहे हैं ,आलोक जी का ये जज्बा लड़ना और लड़ कर जितना सिखाता है ,हम जानते हैं वो कैंसर से भी जीतेंगे,अभी भी बहुत कुछ सीखना शेष है ,उनसे बहुत कुछ पाना शेष है.

लेखक हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख हैं। 

7 जुलाई 2010

कैमीभूड़ मर रहा है ! हाथी नहीं मरा है महाराज !!

देवेन्द्र
इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि ’कैमीभूड़’ कहाँ है? देश के मानचित्र पर काली बिन्दियों से दर्शाए गए असंख्य गांवों की शक्ल इससे किसी भी तरह अलग नहीं है। हर पगडंडी जहां जाकर खत्म हो जाती है वहीं आपको कैमीभूड़ मिल जाएगा। कैमीभूड़, यानी कर्ज और यातना के अंधेरे मं छटपटाता गांव, जहां किसान एक-एक कर आत्महत्याएं कर रहे हैं। लोकतंत्र के नाच घर में थोड़ी देर के लिए बत्ती गुल होती है। शोक संवेदनाएं पढ़ी जाती हैं।

 पालतू अर्थशास्त्रियों की भीड़ सेंसेक्स के तापमान को देखकर आश्वस्त है कि विकास की देर बेहतर है जबकि यहाँ रात-दिन आजादी के सपनों का संहार हो रहा है। लखीमपुर खीरी जनपद मुख्यालय से 37 किलोमीटर दूर कैमीभूड़ का सीमान्त,जहां से एक साथ सिर्फ दो ही रास्ते अलग-अलग दिशाओं की ओर जाते हैं। एक नक्सलबाड़ी की ओर और दूसरा राजधानी के सुरक्षित और संरक्षित राजमार्ग पर, जहाँ संसद है, न्यायपालिकाएं हैं,अमीन का दफ्तर है। 15 अगस्त 1947 की आधी रात को कैमीभूड़ के लैम्पपोस्ट पर उम्मीद की जो लालटेन लटका दी गई थी, उसमें कालिख और धुंआ भर चुका है।

लाश होने से पहले थरथराती कांपती देह की जान में जितनी सांस होती है उतनी ही सांस कैमीभूड़ के हिस्से मयस्सर है। यहां एक विभत्स तबाही का खौफनाक मंजर है। शकों, हूणों या मंगोलों ने नहीं, विशुद्ध आर्य नस्ल के भारतीय प्रशासनिक ढ़ाँचे ने कैमीभूड़ को उजाड़ा है और बर्बाद किया है। आर्थिक उदारीकरण और मनमोहनी विकास की परिकल्पना में कैमीभूड़ एक ऐसे वोट बैंक की तरह है जो नए अर्थतंत्र में असुविधा पैदा करते हुए बेवजह सताता रहता है जबकि वे कैमीभूड़ के जनतंत्र का मतलब जानते हैं। एक ऐसा जनतंत्र,जहाँ आपको अपने विरोध में काम करने वाली तमाम सरकारों में से किसी एक को चुनना होता है।

सरकार कहती है कि तीन एकड़ तक खेत वाले किसान को लगान नहीं देनी है, लेकिन यहाँ दो बीघे खेत वाले से भी लगान ली जाती है। दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र का संविधान कैमीभूड़ की गलियों में मृतप्राय कराह रहा है। अमीन और तहसीलदार ने उसक पीछे एक खूंटा ठोंक दिया है। अब यहाँ अमीन की मर्जी ही संसद है और संविधान भी। लेखपाल जब चाहे यहाँ किसी की वल्दियत बदल सकता है। न्यायपालिकाएं न तो इसे अपनी अवमानना मानती हैं न संसद अवज्ञा। यहाँ अमीन का मतलब सरकार होता है। अमीन की बेजा हरकतों में हस्तक्षेप, सरकारी काम में बाधा माना जाता है। अमीन को पीटना दरअसल सरकार को पीटना है। अमीन है तो सरकार है। न्यायपालिका है, प्रशासन है, संसद है, प्रजातंत्र है।

हफ्ता भर पहले। कैमीभूड़ में अमीन ने न तो ग्राम प्रधान को सूचना दी, न तो डुगडुगी बजवाई, न खेतों में झंडा ही गाड़ा, जबकि न्यायिक प्रक्रिया में ऐसा करना जरूरी है, उसने तहसील दफ्तर में बैठ कर ही एक किसान की सारी जमीन बैंक की उस मामूली रकम के एवज में नीलाम कर दी जिस जमीन में खड़ी फसल ही बैंक कर्ज का भुगतान करने के लिए काफी होती।

एक बुरी सूचना यह थी कि उसी किसान का पैसा अजवापुर चीनी मिल पर पहले से बाकी पड़ा था। अमीन या तहसील ने यह भी मुनासिब नहीं समझा कि जमीन नीलाम होने की सूचना किसान को दे दी जाए। उस सुबह वह खेत पर अपनी फसल काटने गया था। उसे वहीं सूचना मिली कि अब वह खेत और वह फसल उसकी नहीं रह गई है, तो उसने बगल में खड़े पेड़ से लटक कर आत्महत्या कर ली। थोड़ी देर बाद जब यह खबर उसके भाई को लगी तो उसने भी दूसरे पेड़ से लटककर आत्महत्या कर ली। यह कोई आत्मघाती कदम नहीं है,बल्कि उस समूची न्यायिक प्रक्रिया पर थूकना है जहाँ उसी अमीन के बड़े-छोटे भाइयों का दुष्चक्र फैला हुआ है। देखा जाए तो भारत के दूर-दूर तक फैले भूगोल में कैमीभूड़ कितनी जगह घेरता है?

गाँव स्तर की इस मामूली खबर का प्रचार करना,हो सकता है कुछ लोगों को अरूचिकर लगे। उन कुछ लोगों में शेयर बाजार के दलाल,मल्टीनेशनल के पालतू अर्थशास्त्री,राज्य सरकार,जिले का कलक्टर या वे भद्र नागरिक भी हो सकते हैं,जिनके रामरथ का टूटा हुआ पहिया गुजरात से होता हुआ सेतु समुद्र पर तमाशबीनों की भीड़ के लिए डुगडुगी बजा रहा है। लेकिन मेरे लिए कैमीभूड़ महज एक सूचना नहीं, एक सवाल है जिसका उत्तर तय करेगा कि 15 अगस्त 1947 को कैमीभूड़ के बारे में चुपचाप क्या कुछ तय किया गया था। आजादी, लोकतंत्र, संविधान और संसद सबका चरित्र इस बेहद मामूली से दिखने वाले प्रश्न के उत्तर पर टिका है।

औपनिवेशिक गुलामी के दौर में भी किसानों की दुर्दशा कम न थी। गाँवों के सामन्ती ढाँचे और साहूकारों की सूदखोरी व्यवस्था में फँसे किसानों का दयनीय चित्रण करते हुए प्रेमचन्द ने उपन्यासों और कहानियों की लम्बी श्रृंखला रची है। लेकिन वहाँ स्थितियां इतनी जटिल और भयावह नहीं है कि किसान आत्महत्या करे। तब किसान लड़ता था। माना जाता था कि वह आजादी के लिए लड़ रहा है। आज यह मानने में हमें कोई गुरेज नहीं कि आजादी के बाद विकसित नए तंत्र की वजह से ही किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

 कैमीभूड़ धीरे-धीरे मर रहा है। कस्बों में फैले भूमि विकास बैंक को गाँव के लोग भूमि विनाश बैंक कहते हैं। इन बैंकों में दलालों की भीड़ है,जिनके पास किसानों के अंगूठा निशान गिरवी रखे हैं। वे जब चाहे किसी की जमीन पर किसी दूसरे को कर्ज दिला सकते हैं। लेखपाल जब चाहे किसी की वल्दियत बदल सकता है। प्रशासनिकतंत्र का यह एक ऐसा समृद्ध और अय्यास वर्ग है जिसकी अंतड़ियों की लम्बाई समूचे देश के इतिहास और भूगोल से बहुत ज्यादा लम्बी है। एक कैमीभूड़ को डकार जाना उसके लेखे बेहद मामूली तजुर्बा है।

इतिहास की किताबों में हमने पढ़ा था कि भारत को आजादी शांतिपूर्ण ढ़ंग से कांग्रेस के नेतृत्व में अहिंसा के रास्ते मिली थी। एक बूँद खून नहीं बहा था आजादी की लड़ाई में। और हमने पाया कि नेहरू युग के प्रथम दशक में ही बगैर एक बूँद खून बहाए एकदम शांतिपूर्ण ढ़ंग से उसी अहिंसा के रास्ते प्रजातांत्रिक भारत की एक-एक संस्थाएं निर्जीव और निष्प्राण कर डाली गईं।

श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास रागदरबारी इन्हीं मरी संस्थाओं और भ्रष्ट राजनीति का महाकाव्यात्मक वृत्तांत है। कैमीभू़ड़ ने पाया कि आजाद भारत में उसके हिस्से एक मरा हुआ संविधान, रक्त पीती न्यायपालिका, दलाल पथ पर टिकी संसद और भ्रष्ट अधिकारियों का कभी न खत्म होने वाला अटूट सिलसिला है। कैमीभूड़ के लिए वोट की शक्ति दरअसल, ऊसर में उगे उस नागफनी की तरह है, जिससे वह अपनी फसलों को रूंघता हे ताकि कोई रौंद न सके। और एक दिन उसका भविष्य नागफनी की उन्हीं कंटीली झाड़ियों में उलझकर रह जाता है। प्रजातंत्र के जिन निर्जीव स्तनों पर वह दूध की उम्मीद में पिछले 60 वर्षां से चिपका हुआ है, वहाँ सिर्फ मवाद और बीमारी के सिवा कुछ भी शेष नहीं है।

यथार्थ की परतें इस सबसे भी बहुत गहरी हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है। लेकिन मैंने बचपन से उस राजा की कहानी पढ़ रखी है, जिसने कह रखा था कि हर उस नागरिक को सूली चढ़ा दिया जाएगा, जो कहेगा कि हाथी मर चुका है। डरे हुए मंत्रियों की तरह मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि महाराज, आपका हाथी न हिलता-डुलता है। न चलता है। कुछ भी नहीं बोलता है, आपका हाथी। आपका हाथी साँस भी नहीं लेता है महाराज। चारों ओर दुर्गन्ध और बदबू फैला रहा है आपका हाथी। पता नहीं कब से कैमीभूड़ में सरकारी संस्थाओं को सफेद हाथी कहने का चलन शुरू हो गया है।

6 जुलाई 2010

मैं एक लेखक की तरह नहीं जी पाया

प्रस्तुत है पंकज बिष्ट के लिखे 'एक कापुरुष का महाप्रयाण' का  तीसरा भाग -

कौन कहेगा कि पंकज बिष्ट अहंकार और पाखण्डी आदमी था। उसे लिखना आता भी था इसमें शक है। यहां तक कि वह सज्जन जो कहते फिरते थे कि उसका पहला उपन्यास उसके एक मृत दोस्त (कैलास साह) का लिखा था और उसने इसे अपने नाम चोरी से छपवा लिया था,उस समय चुप रहेंगे। न ही वे लोग कुछ कहेंगे जो मानते रहे कि ‘लेकिन दरवाजा’ शतप्रतिशत ‘अंधेरे बंद कमरे’ की था या उससे बुरी तरह प्रभावित तो था ही। उसके पाखण्ड को सिद्धांतवादिता कहा जाएगा। अहंकार को स्वाभिमान बनाने में क्या लगता है।

 उद्दण्डता को (उन लोगों के द्वारा भी,जिन्हें मैंने जाने-अनजाने अपमानित किया था) साफगोई और साहसकिता कहा जाएगा। ‘लेकिन दरवाजा’ को हिंदी उपन्यास में एक नई शुरुआत और ‘उस चिड़िया के नाम’ को एक गंभीर कृति करार दिया जाएगा,पर शोक-सभा के समाप्त होते-होते लोग फुसफुसाने लगेंगे,अरे ये जनवादी और प्रगतिशील,इसे जबरदस्ती महान बनाने में लगे हैं-सफदर हाशमी की तरह।

इसमें है क्या ? पहला उपन्यास नकल था,दूसरा पहाड़ी लोक-कथाओं का कोलाज है। दोनों उपन्यासों में सिवा पतनशील प्रवृत्तियों के चित्रण के और क्या है ? कहानियों को लें,ये जादुई यथार्थवाद का चक्कर है या जीतय यथार्थवाद का( याद कीजिए चंचल चैहान को), जो लिखा था वे कहानियां थी या पहेलियां ? बात करता था आम जनता की,काम हैं जनता को साहित्य से काटने के।

वामपंथी मित्र क्षमा करेंगे-यह बात सही है कि लिखना मेरे लिए कमोबेश एक स्वांतः सुखाय प्रक्रिया रहा। एक सीमा तक मैं स्वाभिमानी व्यक्ति रहा और वह भी ऐसे दौर में,जबकि स्वाभिमान पाखण्ड का दूसरा नाम हो गया है। मैंने न कभी किसी आलोचक को ढोक दी,न किसी मठाधीश के दरबार में हाजिरी। अपनी विचारधारा में मैं जीवनपर्यंत वाम की ओर रहा पर कभी भी मैंने कोई पार्टीलाइन नहीं मानी। सच है कि मैं मिडियाकर धंधेबाजों से धृणा करता रहा ओर इस घृणा को कभी छिपाया भी नहीं। जब चाहा,जिस किसी की आलोचना की और खिल्ली उड़ाई।

मैंने हिंदी के शायद ही किसी संपादक को बख्शा हो,इस सबके बावजूद लोगों ने मेरी बात सुनी। मुझे छापा,रचनाओं की तरीफ भी की ही।(वैसे मेरा अब मानना है कि अपनी ईमानदारी,छवि और अक्खड़पन से आप लोगों को ज्यादा असानी से बहला-टहला सकते हैं।) इसके पीछे इन लोगों भलमनसाहत और एक सीमा तक ईमानदारी(या मजबूरी) ही थी। इस पर भी जिस तरह का स्वाभिमान और सच्चाई एक लेखक के लिए जरूरी हैं,मुझमें शायद ही कभी हो सकी। जब भी मुझे लगा,अब और आगे नहीं जा सकता,चुप बैठ गया-स्वाभिमान को ताक पर रखकर। आपातकाल से लेकर मुक्त-व्यापार तक न जाने कितने मोके आए,जब मुझे लगा कि मेरा दम बस घुटने ही वाला है पर नौकरी के अनुशासन ने मेरी सांस को ठिकाने पर लगाए रखा। (कहां हो कबीर! कहां हो सार्त्र! म्रेी आत्मा को मुक्त करो।)

अक्सर सोचता रहा कि आखिर कारण क्या था कि मैं इतना कम लिख पाया ? कहीं मैं परफैक्शन बीमारी का शिकार तो नहीं रहा ? शायद इसका कारण मेरी शुद्ध जाहिली और आत्ममुग्धता थी,जो धीरे-धीरे बढ़ती गई। यह सच है कि जब तक मेरा पहला उपन्यास नहीं छपा था,मेरे अंदर जबर्दस्त अविश्वास औ असुरक्षा रही। आखिर उपन्यास लिखते कैसे होंगे ? क्या मैं कभी इतना सारा एक साथ लिख पाऊंगा ? पर लेकिन दरवाजा की सफलता (अब चाहे जैसा भी लिखा गया) ने मुझे एक सीमा तक निश्चिंत-सा कर दिया कि जैसा लेखन मेरे समकालीन कर रहे हैं(विशेषकर उपन्यास) वैसा तो मैं उल्टे हाथ से कर सकता हूं।

 इसी का परिणाम था कि मैं इधर के हिन्दी उपन्यास नहीं पढ़ता था। (फिर भी हाल ही में मैंने रात का रिपोर्टर पढ़ा था। दुर्भाग्य से मेरे विश्वास को बल ही मिला)। आत्ममुग्धता को उस चिड़िया का नाम ने और पुख्ता किया। मुझे विश्वास हो चला था कि जिस भी विषय को मैं चाहूं,उपन्यास में बदल सकता हूं। मैंन कई विषय सोचे,खाके बनाए पर लिख नहीं पाया,क्योंकि न तो मैं अपने अतिविश्वास की जकड़ से निकल पाया, नही आलस्य को जीत पाया। गप्प मारना औ योजना बनाना मेर प्रिय शौक रहे और काफी हाउस कमजोरी।

सच तो यह है कि यद्यपि संघर्षरत जनता से मैं हमदर्दी जताता रहा पर कभी मजबूती से उनके पक्ष में लिख पाया होऊं,ऐसा नहीं हो सका। जैसा कि मैं कह चुका हूं,लिखते समय मैं एक अलग ही आदमी होता था। इसका मुझे अफसोस भी रहेगा और यह मेरे चरित्र का मानदण्ड भी कि मैं अपने मध्यवर्गीय संस्कारों और मानसिकता से निकल नहीं पाया। अपनी सुविधाओं के लिए या कहिए परिवार और समाज जैसे दबावों के चलते,चाहते हुए भी अपने कंधो से नौकरी का जुआ नहीं फेंक सका।

 ऐसे लोगों के साथ काम करना पड़ा,जिनका सामान्य जिंदगी में एक क्षण को मुंह देखना भी मुझे गंवारा नहीं था। खूंटे से बंधे बछड़े की तरह पहले मैं खूब बिदकता रहा अंततः एक समझदार बैल में बदल,दफ्तर और घर की दूरी तय करता गया। इस पर भी मैं जानता हूं कि मेरी कायरता,सुविधा की दमित कामना,मेरा दायित्व-बोध कहलाएगी,पर अपनी कायरता,जिसे मेरे दोस्त मोहम्मद असलम ने पिटे-पिटाए रास्ते पर चलने की आदत कहा है,के चलते मैं अफसोस के साथ कह सकता हूं कि मैं एक लेखक की तरह नहीं जी पाया,ऐसे लेखक की तरह,जिसके लिए रचना सर्वोपरी होती है और इसके लिए वह कुछ भी बलिदान कर सकता है। यह जीवन आखिर दुबारा तो मिलने वाला नहीं है।,हमें अपनी इच्छानुसार रहने का अधिकर तो होना ही चाहिए !
                                                                                                                                                   जारी.....

5 जुलाई 2010

मेरी एक ही माँ है और मैं उसका एक ही बेटा।

मेरी एक ही माँ है और मैं उसका एक ही बेटा। मैं इस बात से बहुत दिनों से परेशान हूं। इससे मेरी मां भी परेशान है। उसे लगता है कि मैं कम परेशान हूं वो ज्यादा है क्योंकि उसको उस कहावत में यकीन है कि

माई क जीउवा गाई,पूतवा क जीउवा कसाई !

आज फिर मुझे इस कटु सत्य की कसक उठी। साथ ही एक पुरानी घटना याद आ गई। सोचा आपसे साझा कर लूं।

हमारा संयुक्त परिवार था। बहुत लम्बे समय तक मैं उस संयुक्त परिवार का सबसे छोटा ‘पुरुष’ सदस्य था। इसलिए मुझे अन्य सभी पुरुषों के ‘अनुचर’ की तरह ही रहना होता था। उनकी मर्जी मेरी मर्जी होनी ही चाहिए थी। उनके कायदे-कानून मेरे लिए पत्थर पर लकीर होने चाहिए थे। सभी बच्चे कभी न कभी बड़ों के इस दबंगई से उकता जाते हैं। खीझ जाते हैं। और अपने-अपने तरीके से इस पर प्रतिक्रिया करते हैं। यह घटना ऐसी ही बाल-प्रतिक्रिया से जुड़ी है।

जरूर वह कोई बहुत भारी दिन रहा होगा कि मैंने सोचा, मैं घर से भाग जाऊँ। करीब आधी रात का वक्त था। मैं मेरे कमरे में अकेला था। एक अकेले कमरे में अकेला होना कितना त्रासद हो सकता है जो इसे समझते हैं उनसे कहुंगा कि उस दिन उस कमरे में सारी यंत्रणाएं घटित होती रहीं। मैंने तय कर लिया कि इस घर में मेरे लिए कुछ नहीं है ! किसी को मेरी जरूरत नहीं है। इसलिए मुझे घर से चले ही जाना चाहिए। मैंने जीन्स पहनी,टी शर्ट डाली,अपना प्यारा लोटो का स्पोर्ट शू पहना,फीते बांधे और 'महापरिनिर्वाण' के लिए तैयार हो गया। कमरे का लैच लगाया। छत की सीढ़ियों की तरफ जाने वाले चैनल को खोला,छत पर चढ़ गया। सीढ़ियों पर मैं सोचता जा रहा था कि मैं जाऊँगा कहाँ ? उस वक्त मैं स्वयं को किसी दार्शनिक जैसा विचार-मग्न महसूस कर रहा था। (आज लगता है कि मेरे दिमाग में हिन्दी फिल्मों के कई दृश्यों की नकल चल रही थी !)

सबसे पहले मैंने ये सोचा कि दूर जाने के लिए तो ट्रेन से जाना होगा। ट्रेन से जाने के लिए पैसे चाहिए होंगे ! मैं ‘फेंके’(घर वालों के दिए) हुए पैसे को हाथ नहीं लगाना चाहता था !! मैंने तय किया कि,मैं अपना पर्स लेकर नहीं जाऊँगा। क्योंकि उसमें वो पैसे हैं जो ‘मेरे’ नहीं हैं। पैसे नहीं होंगे तो टिकट नहीं होगा। टिकट नहीं होगा तो टीटी पकड़ लेगा ! टीटी पकड़ लेगा तो....जेल ले जाएगा......। खैर, मैं जेल में रह लूंगा। (उस वक्त तक मैंने असल जेल नहीं देखी थी !)

जेल में रह लेने की निर्णय से आए आत्मविश्वास को अगले पल ही टूट जाना था। अगले ही पल मेरे दिमाग में ख्याल आना था कि जब सबको पता चलेगा कि फलां का लड़का जेल में बंद था तो....क्या होगा.....। लेकिन मेरे दिमाग ने मामला संभाल लिया। उसने मुझे राय दी कि तुम बताना ही मत कि तुम कौन हो !! (उस वक्त मुझे ये तर्क फौलादी लगा था!)

इस मामले के निपटते-निपटते मैं छत की आधी सीढ़ियां चढ़ चुका था। अब मुझे दूसरी चिंता सताने लगी। मैं जीवन में कभी भूखा नहीं रहा था इसलिए मेरे पेट को चिंता हुई कि मैं खाऊँगा क्या ? तुरंत ख्याल आया कि किसी से मांग के खा लूंगा !

(न जाने क्यों मुझे उस वक्त ऐसा लगा था कि मैं मागुंगा और लोग दे देंगे,शायद फिल्में ज्यादा देखने के कारण!)

इस दूसरे मामले के निपटने तक मैं खुली छत पर था। मैं छत से पोर्च,पोर्च से घर के मेन गेट की दीवार को फांद कर बहादुरों की तरह घर से निकलने वाला था। यह मेरे लिए कोई बड़ा काम नहीं था। मैं अपनी वीरता दिखाने के लिए दिन-दहाड़े ऐसा पहले भी कई बार कर चुका था। (यह बताना जरूरी है कि उस वक्त तक हमारा घर एक मंजिला था)

 मेरा एक पैर छत की रेलिंग दूसरी तरफ और एक पैर इस तरफ था तभी मेरे कानों में नाइट ड्यूटी वाले चौकीदार की सीटी की आवाज सुनाई दी। एक पल को मैं थम गया। मैंने अंदाजा लगाया कि चौकीदार ज्यादा दूर नहीं है। मैं दुविधा में पड़ गया कि चैकीदार से मुझे डरना चाहिए कि नहीं !!

पहले तो मुझे लगा कि मुझे चौकीदार से भला क्यों डरना चाहिए ? वो तो मुझे ही भैया जी-भैया जी करता है.....। लेकिन यह तर्क पिलपिला निकला। अगले ही पल मुझे ख्याल आया कि यह दिन नहीं रात है....मैं छत से डांक कर नीचे उतर रहा हूं....अगर उसने चोर-चोर चिल्ला दिया तो.....लोग क्या कहेंगे ?? मैंने तय किया कि चौकीदार को कालोनी के पीछे की साइड की तरफ जाने देता हूं। फिर उतरूंगा। मैं छत पर वापस आ गया। चारपाई निकाली। ठीक बीच छत पर बिछायी। और बेड़े-बेड़े सो गया। यानि मेरा धड़ चारपाई पे था और पैर जमीन पर। नतीजा, मेरी खुली आँखों के सामने तारों भरा खुला आसमान था। वह तारों वाली रात थी। आश्चर्य कि आसमान में उतने तारे मुझे फिर कभी नहीं दिखे। लेटे-लेटे मेरे दिमाग में हजारों ख्याल आने लगे। फिल्मी ख्याल। थोड़ी देर बाद मैंने खुद को आसमान से बातें करता हुआ पाया। मुझे लगा कि मेरे अंदर से कोई उर्जा पुंज निकल कर आसमान के किसी उर्जा-पुंज से एकमएक हो रहा है !

(उस वक्त मुझे वह सच ही लगा था,बहुत साल बाद मुझे याद आया कि मैंने इस घटना के कुछ दिन पहले ही ऐसे ही किसी चमत्कार के बारे में किसी पैंतरेबाज अध्यात्मिक किताब में कुछ पढ़ा था!)

वो ख्याल इतने हसीन थे कि मैं उनमें ही खो गया। मेरी ख्याल को तोड़ा चौकीदार की सीटी और लाठी ठोंकने की आवाज ने। धत्त...तरेकी....चौकीदार ने वह चक्कर पूरा कर लिया और दूसरे पे आ गया ! यानि मुझे भागने के लिए फिर से उसके कालोनी के पीछे साइड में जाने का इंतजार करना होगा ! खैर,करना तो होगा ही। इस बार मैं रिस्क नहीं लेना चाहता था। सो,मैं चारपाई छोड़कर छत पर टहलने लगा। छत पर टहलते-टहलते फिर मेरे दिमाग में लाखों ख्याल आने लगे (ख्याल आने की बिमारी जिसे लग जाए फिर छोड़ती नहीं है)। ख्याल बहुत से आए थे लेकिन आज मुझे याद नहीं कि कौन-कौन से आए थे सिवाए उस एक खास ख्याल के जिससे इस कहानी में सबसे बड़ा मोड़ आया।

टहलते-टहलते मैं सोचने लगा कि मेरे जाने के बाद लोगों का रिएक्शन क्या होगा ? मुझे इस सोच में मजा आने लगा। कि मुझे ख्याल आया, माँ का....यार, मैं चला जाऊँगा तो मम्मी का क्या होगा....?? उस वक्त मुझे लगा था कि मेरी मम्मी तो बस मेरी ही भरोसे है, पूरी दुनिया में मैं ही उसका एक सहारा हूं !

(पता नहीं,यह भ्रम मेरी मां ने मेरे दिमाग में डाला था या मैंने खुद इसे पाल लिया था या यह भी हो सकता है कि इसमें हम दोनों की मिली-जुली भागीदारी रही हो ! )

मेरे दिमाग में बार-बार यही ख्याल आने लगा कि,यार माँ क्या होगा ? ,यार माँ क्या होगा ? ,यार माँ क्या होगा ? ,यार माँ क्या होगा ?....................

माँ तो मर जाएगी.............।

इस एक ख्याल से मेरा सर भारी हो गया। मैं वापस चारपाई पर सो गया। थोड़ा-थोड़ा भावुक भी होने लगा था.....यार,माँ तो रोते-रोते मर जाएगी !

अब एक तरफ माँ थी और दूसरी तरफ घर जिसे मुझे छोड़ना था ! माँ का पलड़ा भारी पड़ता जा रहा था। मैं पिघल रहा था। न जाने के तर्क मेरे दिमाग में आने शुरू हो गए। मैंने सोचा कि यार,घर से तो कुछ साल बाद भी भागा जा सकता है। जब मैं थोड़ा और बड़ा हो जाऊँगा तो माँ को समझा लूँगा......। गर तब भी माँ नहीं मानी तो मैं उसके मरने के बाद भाग जाऊँगा...... वैसे भी माँ कितने बरस जिएगी ?!

(आप समझ सकते हैं कि तब मुझे यह बोध भी नहीं था कि मनुष्य कितने बरस जी सकता है, अंदाजन उस वक्त मेरी माँ की उम्र चालीस से ज़्यादा नहीं रही होगी)

अब,मुझे इस बात पर अफसोस होने लगा कि क्यों मैं अपनी माँ का एक ही बेटा हूँ ?? यही सोचते-सोचते मेरे घर से भागने का प्लान कैंसिल हो गया। धीरे-धीरे मुझे नींद दबोचने लगी थी। भारी मन से वापस अपने कमरे में आया और मन ही मन यह दुहराते हुए कि एक दिन घर से भाग जाऊँगा, मैं सो गया। समय बीतने के साथ धीरे-धीरे मुझे भूल गया कि मुझे घर से भागना भी था, माँ का यह समझाना भी था कि यह करना जरूरी क्यों है !

आज,मैं पाँच साल से दिल्ली में हूँ। घर भी छूट गया,माँ भी छूट गयी, माँ को समझाना भी रह गया ।

क्या करूं, पीटूं दिल को या करूं हाय-हाय, मेरी एक ही माँ  है और मैं उसका एक ही बेटा ।