30 नवंबर 2010

चलो, अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परीशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं,ऐसा हुआ होगा

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने वहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा

चलो, अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें
कम-अज-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा

- दुष्यंत कुमार

29 नवंबर 2010

कवि और सुनहरी मछली का किस्सा

कहते है कि किसी अभागे कवि ने कास्पियन सागर में एक सुनहरी मछली पकड़ ली।

कवि, कवि,मुझे सागर में छोड़ दो, सुनहरी मछली ने मिन्नत की।

तो इसके बदले में तुम मुझे क्या दोगी ?

"तुम्हारे दिल की सभी मुरादें पूरी हो जाएंगी।"

कवि ने खुश होकर सुनहरी मछली को छोड़ दिया। अब कवि की किस्मत का सितारा बुलन्द होने लगा। एक के बाद एक उसके कविता-संग्रह निकलने लगे। शहर में उसका घर बन गया और शहर के बाहर बढ़िया बंगला भी। पदक और श्रम-वीरता के लिए तमगा भी उसकी छाती पर चमकने लगे। कवि ने ख्याति प्राप्त कर ली और सभी की जबान पर उसका नाम सुनाई देने लगा। ऊँचे से ऊँचे ओहदे उसे मिले और सारी दुनिया उसके सामने भुने हुए,प्याज और नींबू से कजेदार बने हुए सीख कबाब के समान थी। हाथ बढ़ाओ,लो और मजे से खाओ।

जब वह अकादमीशियन तथा संसद-सदस्य बन गया था और पुरस्कृत हो चुका था, तो एक दिन उसकी पत्नी ने ऐसे ही कहा-

“आह, इन सब चीजों के साथ-साथ तुमने सुनहरी मछली से कुछ प्रतिभा भी क्यों नहीं मांग ली ?”

- रसूल हमजातोव, मेरा दागिस्तान
  अनुवाद - मदनलाल मधु

27 नवंबर 2010

वाह रे पुलिस!

अपने अजीबोगरीब कारनामों के लिए देशभर में नाम कमाने वाली हरियाणा पुलिस ने शुक्रवार को ऐसा कारनामा कर दिखाया जिसकी कल्पना कोई भी आधुनिक सुरक्षा बल शायद ही कर पाए। लेकिन  हरियाणा पुलिसने ये कर दिखाया दरअसल हरियाणा पुलिस किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की बजाय आम राहगीर को एस्कार्ट करने लगे और असली मेहमान सड़क पर खड़ा होकर आम राहगीर की तरह अपने गंतव्य स्थल का रास्ता पूछते रहे।

आप चौंकेंगे अवश्य लेकिन हकीकत यही है। शुक्रवार को रोहतक में आयोजित एक समारोह में भाग लेने जा रहे मॉरीशस के राष्ट्रपति अनिरूद्ध जगन्नाथ व उनकी पत्नी के साथ यही हुआ और वे बहादुरगढ़ के गजराज होटल के सामने बिना किसी पायलट, एस्कार्ट या सुरक्षा के आम राहगीर की तरह रोहतक का रास्ता पूछते रहे। घटना दोपहर 12 बजे की है।

जगन्नाथ अपनी पत्नी के साथ पूर्व निर्धारित योजना के मुताबिक दिल्ली से रोहतक के रास्ते में थे। राष्ट्राध्यक्ष की यात्रा को देखते हुए बहादुरगढ़ पुलिस ने टीकरी बार्डर पर उनकी आगवानी के लिए प्रोटोकाल के तहत बाकायदा पायलट, एस्कार्ट, एम्बुलेंस, क्रेन व स्ट्राइकिंग वाहन तैनात कर दिए। हरियाणा पुलिस को राष्ट्रपति के साथ चल रही दिल्ली पुलिस की एस्कार्ट से सूचना भी मिली कि महामहीम ने नांगलोई पार कर ली है।

 एकबारगी तो राज्य पुलिस के आगवानी दस्ते ने राष्ट्रपति की टैक्सी नंबर की मर्सिडिज कार (नंबर डीएल 1 जेड़ 2166) को रिसीव करते हुए उसके आगे चलना शुरू भी कर दिया लेकिन एकाएक यह दस्ता गलतफहमी का शिकार होकर राष्ट्रपति के काफिले से हट गया। फिर क्या था करीब दो किलोमीटर चलने के बाद राष्ट्रपति की कार व उनके साथ चल रही स्पेयर इनोवा बहादुरगढ़ के गजराज होटल के सामने खड़ी हो गई ताकि आगे का रास्ता पता कर सके।

इसी दौरान हरियाणा पुलिस को दिल्ली पुलिस की एस्कार्ट से मिली सूचना के बाद अपनी गलती का एहसास हुआ और अफरातफरी में राष्ट्रपति के काफिले को ढूंढने का सिलसिला शुरू हुआ। राष्ट्रपति गजराज होटल के सामने कार समेत सड़क पर खड़े रहे और उनके लिए बार्डर पर तैनात एस्कार्ट जिप्सी राजमार्ग पर उन्हें रास्ते में ही छोड़कर ढूंढ़ते हुए आगे बढ़ गई। इसी दौरान रोहतक का रास्ता पता करने के बाद राष्ट्रपति की दो कारों का छोटा काफिला भी निकल पड़ा।

सूत्रों के मुताबिक, जब जगन्नाथ की कार आसौदा गांव के समीप पंहुच गई तब कहीं 20 मिनट बाद जाकर पुलिस के आगवानी दल को इसका पता लगा और किसी तरह उनके काफिले को रोहतक जिले की सीमा पर स्थानीय पुलिस को सौंपा गया। राष्ट्रपति जैसी हस्ती के साथ हुई इस सुरक्षा संबंधी चूक को लेकर झज्जर पुलिस में हड़कंप मचा हुआ है। मामले पर लीपापोती करने के लिए विभाग के छोटे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। एक विदेशी राष्ट्रपति के साथ हुई इस अभूतपूर्व रक्षा चूक ने आधुनिक संचार व त्वरित कार्रवाई के जरिए सेवा, सुरक्षा व सहयोग के राज्य पुलिस के दावों की पोल भी इस घटना ने खोल कर रख दी है।
(साभार: भास्कर)

26 नवंबर 2010

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह

मैनें तुझसे चाँद सितारे कब माँगे
रौशन दिल बेदार नज़र दे या अल्लाह

सूरज सी इक चीज़ तो हम सब देख चुके
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह

या धरती के ज़ख़्मों पर मरहम रख दे
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह

- कतील शिफाई

22 नवंबर 2010

धी और बहूटी पण्डित की

टूटी बाँह जवाहर की
रनजित-लट छूटी पण्डित की।
लोगों ने निधि विधि ने लूटी
किस्मत फूटी पण्डित की।

विद्या का गया सहारा
गीत का गला भी मारा
कोई भी न ला सका रन
लछमन की बूटी पण्डित की।

कब से ये दल-बादल घेरे
यह बिजली आँख तरेरे
झण्डे ले लेकर निकलीं
धी और बहूटी पण्डित की।

& fujkyk

21 नवंबर 2010

प्रधानमंत्री ईमानदार हैं !!

शैलेन्द्र नेगी

रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था। रोम साम्राज्य के खत्म होने के सैकड़ों साल बाद भी ये कहावत जिंदा है। यानि इतिहास उन सबका हिसाब रखता है जो इतिहास को भूल जाते है या पीठ दिखाते है। देश के बेबस ईमानदार प्रधानमंत्री इस समय नीरो को मात देने में लगे है। देश भर में लूट चल रही है। देश बिक रहा है। देश को राज्यों में बांटा गया था शासन चलाने के लिये लेकिन इस प्रधानमंत्री ने देश को बांट दिया लूट के लिेये। ये कैसे ईमानदार प्रधानमंत्री है भाई। इनको मालूम है इनके मंत्रिमंडल में शामिल लुटेरे देश का सौदा कर रहे है। लेकन बेचारे प्रधानमंत्री को अपनी कुर्सी बचानी है युवराज के लिये। युवराज कह रहा है कि प्रधानमंत्री को शर्मिंदा होने की कोई जरूरत नहीं है।

ये बात बिलकुल दुरूस्त है। देश को शर्मिंदा होना चाहिए ऐसे प्रधानमंत्री होने पर। क्या खडाऊं प्रधानमंत्री युवराज और राजमाता के आदेश पर देश चला रहे है। सोनिया गांधी का बयान आया कि देश को और जिम्मेदार सरकार चाहिए। कौन देगा सरकार। आपको बहुमत मिला और आपने ऐसे लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल कर दिया जो महमूद गजनवी और नादिरशाह जैसे लुटेरों को भी मात देने में जुटे है। ऐसे मंत्रियों पर लगे आरोपों में हजार दो हजार करोड़ के घपले का नहीं लाखों करोड़ के मामले शामिल है। लेकिन सोनिया को नहीं लगता कि कोई जवाबदेही का कानून बनाया जाए।

देश के तथाकथित नेशनल मीडिया की औकात कितनी है ये लगातार हम आपको बताते रहे है। देश में चल रही लूट पर पर्दा डालकर हमेशा एक सवाल को गायब करना ही इस नेशनल मीडिया की कोशिश रही है। सवाल है जवाबदेही का। संविधान में इस बात की गुंजाईश छोड दी गई कि अंग्रेजों से बेहतरीन अंग्रेजी बोलने वाले काले नौकरशाहों और राजनेताओं को दान में मिले देश को लूटने के बाद किसी तरह की जवाबदेही न हो। खानदान राज कर रहे है। राजवाड़े जिनके होते लगातार देश अपमानित होता रहा शर्मिंदा होता रहा उनकी औलादें शान के साथ देश की लूट में शामिल हो गई। हाल ही में जोधपुर के एक पूर्व महाराजा के बेटे की शादी का ऐसा वर्णन देश के तथाकथित मीडिया ने किया कि भाट और चारण भी शर्मा जाएं। 1857  की आजादी की लडाई में जिन घरानों का इतिहास अंग्रेजों के जूते चाटने और देश भक्तों को मारने में रहा वो आज जनतंत्र के नाम पर जीत कर संसद में बैठते है कानून बनाते है लेकिन किसी अखबार या चैनल को नहीं लगता कि उस दौरान की कहानी भी चला दी जाए।

देश की आजादी की ताकत को लुटेरों की हिफाजत में लगाने वाले तथाकथित राष्ट्रीय पत्रकारों के चेहरे बेनकाब हुए है। बरखा दत्त, वीर सांघवी जैसे नामचीन पत्रकारों की बातचीत की रिकार्ड़िंग ये बताती है कि सत्ता में कितने बौने लोग आ गए जो इनको दलाल की तरह से इस्तेमाल कर रहे है। बरखा दत्त जैसी पत्रकार उन लोगों को बेहद पंसद है जो लूट को वैधानिक बनाने के रास्ते तलाशते है।

मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के वक्त देश के तथाकथित मीडिया ने ऐसा माहौल बनाया था कि जैसे सत्यवादी हरिश्चन्द्र का अवतार आ गया हो। ईमानदारी ने साक्षात इंसानी अवतार लिया हो और नाम रखा मनमोहन सिंह। ऐसा ही माहौल तैयार किया गया था वीर सांघवी और बरखा दत्त जैसे पत्रकारों ने। आज प्रधानमंत्री की ईमानदारी छवि के सारे पर्दे हट चुके है। लेकिन इस छवि के सहारे मलाई काटने वाले आज भी ये नारा लगा रहे है कि प्रधानमंत्री की ईमानदारी पर दाग नहीं है। ये ऐसे ही है जैसे कोई आदमी लुटेरों को वकील उपलब्ध करा रहा हो और जब उसकी कलई खुले तो कहे कि भाई हमारा तो कोई दोष नहीं है हम तो महज मदद कर रहे थे।

हम पूछना चाहते है कि देश में प्रधानमंत्री का काम क्या है। क्या है उसकी जिम्मेदारी। और यदि जिम्मेदारी नहीं निबाह पाया तो उसकी सजा क्या हो ?

सबसे दुखद यह है कि ऐसे कठिन समय में  भी  देश का तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया नूरा कुश्ती में व्यस्त है।

16 नवंबर 2010

यूँ ही कभी तेरी अयादत लगे है रात

कभी कभी जिंदगी की हकीकत लगे है रात
यूँ ही कभी तेरी अयादत लगे है रात
कभी कभी तो खुदा की इनायत लगे है रात

कभी कभी सबा की आस लगे है रात
यूँ ही कभी सुबहू का एहसास लगे है रात
कभी कभी तो गम की लम्बी रात लगे है रात

कभी कभी वासोख्त्गी की कसल लगे है रात
यूँ ही कभी आवारगी का शगल लगे है रात
कभी कभी तो सादगी की गजल लगे है रात

कभी कभी खाबों की परवाज लगे है रात
यूँ ही कभी तेरी पलकों का अंदाज लगे है रात
कभी कभी तो अपनी ही आवाज लगे है रात

- दीपांकर

13 नवंबर 2010

गालिब और तस्वीर

मियाँ दाद खाँ सय्याह के नाम खत

साहब इस बुढ़ापे में तस्वीर के पर्दे में क्या खिंचा-खिंचा फिरूँ। गोशानशीन(एकांतवासी) आदमी अक्स की तस्वीर उतारने वाले को कहाँ ढूंढ़े। देखा एक जगह मेरी तस्वीर बादशाह के दरबार में खींची हुई है,अगर वह हाथ आ जाएगी तो वह वर्क भेज दूंगा....।

तस्वीर का हाल यह है कि एक मुसव्वर साहब मेरे दोस्त मेरे चेहरे की तस्वीर उतारकर ले गए, इनको तीन महीने हुए। आज तक बदन का नक्शा खींचने को नहीं आए। मैंने गवारा किया आइने पर नक्शा उतरवाना भी। एक दोस्त इस काम को करते हैं,ईद के दिन वह आए थे। मैंने उनसे कहा कि भाई ! मेरी शबीह(तस्वीर) खींच दो। वादा किया था कि अब तो नहीं परसों असबाब खींचने का लेकर आऊँगा। यह पांचवाँ महीना है। आज तक नहीं आए....।

11 नवंबर 2010

एकाक्षरी से कंपित हिन्दी जगत

नामवर सिंह हिन्दी के गपोड़ों के प्रिय विषय हैं। आलम ये है कि नामवर कुछ भी कह दें तो वह 'बहस' का विषय हो जाता है। नामवर चुप रह जाएं तो वह भी 'विमर्श'  का हेतु बन जाता है। चुनांचे नामवर हिन्दी के फुरसतियों के लिए अनिवार्य बन चुके हैं। आजकल फिर नामवर सिंह चर्चा के केन्द्र में हैं। इस बार  मामला जरा ठोस है। बात पाखी पत्रिका के नामवर सिंह विशेषांक से निकली है। जिसके दूर तक जाने का अंदेशा है।

नामवर सिंह के  सुझाव पर पाखी के विशेषांक संपादक प्रेम भारद्वाज और दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. गोपेश्वर सिंह ने उनसे एकाक्षरी खेली। इसी एकाक्षरी से हिन्दी जगत कंपित है। हिन्दी साहित्य-आलोचना में रुचि रखने वालों के लिए नामवर सिंह के उस एकाक्षरी का चयनित अंश साभार प्रस्तुत किया जा रहा है।

प्रेम भारद्वाज के प्रश्न

:- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से मूल शिक्षा क्या ग्रहण की।

चढ़िए हाथी ज्ञान को सहज दुलीचा डाल

:- मंच पर जाने से पहले की तैयारी कैसी होती है।

अध्यापन-कक्ष में जाने जैसी, जो अक्सर बेकार साबित होती है।

 :- अकेलापन कितना परेशान करता है।

वैसे तो अकेले होने के क्षण कम ही होते हैं, लेकिन जब होते हैं तो आलम कुछ ऐसा होता है-

तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता !

लेकिन उस 'तुम' के बारे में सवाल न ही करें तो अच्छा !

:- प्रेम आपकी दृष्टि में।

 'प्रेमा पुमर्थो महान्'

:- हिन्दुत्व क्या है आपकी नजर में।

 'त्व' अवांछित है।

:- बड़े आलोचक की पहचान।

राजशेखर की 'काव्य मीमांसा' के अनुसार जो 'तत्वाभिनिवेशी'  है और आनंदवर्धन की तरह 'सहृदय-हृदय चक्रवर्ती'
  
गोपेश्वर सिंह के प्रश्न

:- ऐसा काम जिसे करने का अफसोस हो।

अफसोस तो यही है कि अफसोस भी नहीं।

:- ऐसा काम जिसे न करने का अफसोस हो।

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।

:- वह अकेली पुस्तक जिसे आप निर्वासन में साथ रखे

रामचरित मानस।

:- आपका प्रिय भोजन

सत्तू

:- दुबारा जीवन मिले तो आप कैसा जीवन जीना चाहेंगे

पुनर्जन्म में विश्वास ही नहीं है।

:-आपकी प्रिय अकेली आलोचना पुस्तक

दूसरी परंपरा की खोज

 :-अकेला आलोचक

विजय देव नारायण साही

:- अकेला कवि

रघुवीर सहाय

:-अकेला कहानीकार

निर्मल वर्मा

:- अकेला उपन्यासकार

फणीश्वरनाथ रेणु

:- अकेला निबंधकार

हरिशंकर परसाई

:- किसी एक महापुरुष को चुनना हो तो किसे चुनेंगे।

महात्मा गाँधी

:- गाँधी और मार्क्स में किसी एक को चुनना हो तो

मार्क्स को, विचारक के रूप में।

9 नवंबर 2010

हम अपने ख़याल को सनम समझे थे

हम अपने ख़याल को सनम समझे थे

अपने को ख़याल से भी कम समझे थे

होना था- समझना न था कुछ भी, शमशेर,

होना भी कहाँ था वह जो हम समझे थे !

- शमशेर बहादुर सिंह

6 नवंबर 2010

विलुप्त प्रजाति का शोक गीत

देवेन्द्र
देखा जाए तो शहर में स्कूल होते हैं, अस्पताल होते हैं, संसद, न्यायपालिकाएं, थाने का कांस्टेबुल वगैरह-वगैरह और इन्हीं सबसे बनी एक सरकार होती है। अपेक्षाकृत शहर में पढ़े लिखे लोग होते हैं जो देश-दुनिया के बारे में तो सबकुछ जानते-बूझते ही हैं उन्हें दूसरे ग्रहों को बारे में भी खूब पता है। यह एक अजीब विडम्बना और विरोधाभास है कि शहर के लोग जो इतना सारा कुछ जानते हैं उन्हें सड़क पर चलने का मामूली शऊर नहीं होता। जगह-जगह चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस वाले हाथों में डंडा लेकर उन्हें चलना सिखाते हैं तब भी अक्सर एक चौराहे से दूसरे चौराहे तक जाने में वे पढ़े लिखे लोग भूल कर जाते हैं। विडम्बना की इस मामूली पर्त के नीचे आधुनिक सभ्यता का क्रूर रहस्य छिपा हुआ है। जिस देखना वास्तव में अपने गिरेबान में झाँकना है।

जंगलों के लगातार सिकुड़ते जाने और धीरे-धीरे जंगल राज के फैलते जाने के बीच एक बाघ ठीक उसी तरह शहर में दाखिल होता है जैसे किसी निस्पन्द कविता में बिंब। पौराणिक आख्यानों से होता हुआ आधुनिकतम संविधान के काले हर्फों में सुरक्षित संरक्षित चकम और चटकार बिम्ब।

जैसे संसद और न्याय पालिकाएं सबके लिए एक जैसी नहीं होती उसी तरह बाघ का गांवों में होना भी सबके लिए एक सा नहीं होता। भ्रष्टाचार के चारों पाये पर टिका वन विभाग और उसके छोटे-बड़े अधिकारी बाघ को लाखों रूपये के ’बे-आडिट’ बजट के रूप में देखते हैं। महीनों से किसी सनसनीखेज खबर की तलाश में ऊबते-ऊँघते पत्रकारों के लिए बाघ रोमांचकारी अनुभवों, गप्पों को बांटने और सुनने-सुनाने का धंधा होता है।

बाघ चलता फिरता टी0आर0पी0 है। वन्य जीव संरक्षण के नाम पर फल-फूल रहे सैकड़ो एन0जी0ओ0 जो रोज-रोज लाखों का पेट्रोल पी रहे हैं उनके बारे में कोई टिप्पणी करना भी बेहद संजीदा मामला है। लेकिन जिनका जीवन इस मामूली बात पर निर्भर करता है कि या तो वे बचेंगे या बाघ और बाघ के तमाशबीनों का ध्ंाधा? वे अपेक्षाकृत कम पढ़े लिखे, इसीलिए मनुष्य के रूप में बचे रह गए, गरीब, फटेहाल और चीथड़े लोग होते हैं। उनके लिए बाघ एक चलती-फिरती मृत्यु का दबे पांव खूंखार झपट्टा होता है।

जहां पचासों गांवों का जीवन बाघ की अफवाह मात्र से ठहर जाता है, वहां बाघ को देखना ढेर सारे बाघों के बीच घिरा होना होता है। उनकी बकरियां, बैल, गायें, उनके बच्चे, जो झोला पटरी लेकर स्कूल में पढ़ने गए हैं, उनकी औरतें जो शौच के लिए खेतों में गयी हैं, इनमें से कब कौन कहां मांस के नुचे-खुचे अधखाये लोथड़ों में पाया जायेगा इसी अंधेरे में एक-एक पल घुटना होता है। बैल, बकरियां, कुत्ते, हाथी आदि-आदि ढेर सारे जानवर, सरकारी बही-खातों में चाहे उन्हें विलुप्त प्रजाति का घोषित किया गया हो या नहीं, सब के सब उनके जीवन और दिनचर्या के हिस्से होते हैं।

वे साथ-साथ उदास और प्रसन्न होते हैं। वे उनसे उन्हीं की भाषा में बोलते-बतियाते हैं। उनका सोने-जागने का साथ होता है। जीने-मरने का साथ होता है। किसी एन0जी0ओ0 की पाठशाला में वन्य जीव संरक्षण का ककहरा उन्हें नहीं पढ़ना है। तमाम आदिम और नैसर्गिक क्रियाओं की तरह वे जानवरों और उनकी बोलियों को मां के पेट से सीख कर आते हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा वे आदमखोरों की अनिवार्य परिणति में अपनी भूमिका भी पहचानते हैं। वे पराए और परजीवी लोगों की नीयत और अपनी नियति में ताल-मेल बैठा कर ही अपने को बचाए हुए हैं। वे प्रकृति के इस मूल रहस्य से वाकिफ हैं कि अपनी संततियों और फिर अपनी रक्षा इस प्रकृति संसार का सर्वाधिक बड़ा दायित्व है।

वे यह भी जानते हैं कि कुछ धन्धेबाज लोग सक्षम और समर्थ होकर कैसे और कितनी-कितनी तरह से अपनी ही प्रजाति को खा-खाकर सभ्यता का विकास कर रहे हैं। कैसे उन लोगों की शिक्षा, उनके सरोकार इस प्रकृति संसार से पृथक हो चुके हैं। वे आदमी को खाते और बाघ को बचाने से ज्यादा बेंचने में दिलचस्पी रखते हैं। बावजूद उनकी ढपोरसंखी हिदायतों के, जब गांव वाले किसी बाघ को घेरते और मारकर जला देते हैं तो वे सीधे सिर्फ अपनी मृत्यु को पराजित कर रहे होते हैं। वन्य जीव संरक्षण के नाम पर डांय-डांय चिल्लाने से क्या होगा?

सरकार और बाघ में एक अद्भुत समानता है कि आदमखोर होने की दशा में दोनों उन्हीं लोगों को सबसे पहले अपना शिकार बनाते हैं जो निर्धन हैं। आज से पचास साल पहले जिनके पूर्वज जंगलों में अय्याशी करते हुए शिकार खेला करते थे आज उन्हीं के वंशज वन्य जीव संरक्षण के लिए एन0जी0ओ0 का धंधा कर रहे हैं। बता रहे हैं कि ’पृथ्वी पर सबको जीने का हक है’- इस अर्धसत्य के नेपथ्य में क्रूर दुर्भावनाएं हैं। जब आपका होना, दूसरे के होने की शर्त बन जाएगा तब देर-सबेर कोई एक ही बचेगा। चाहे वह जंगल का राजा बाघ हो या वे जो अपने को बाघ का बेटा समझते हैं। लोग अपने भोथरे हथियारों, अपनी सामूहिक शक्ति और अपने जिन्दा बचे रहने के सामान्य तर्क पर मृत्यु के किसी भी रूप को चाहे वह कितना भी बहुरूपिया और मोहक हो, उसे पहचान कर मिटा ही डालेंगे।

आज वे सारे लोग जो बाघों और सियारों के मरने पर त्राहि-त्राहि कर रहे हैं क्या इस मामूली बात का जवाब देंगे कि जंगलों को उजाड़ा किसने? जंगल के लकड़ियों की तस्करी से किसकी जेबें आजादी के साठ सालों में चौड़ी, खूब चौड़ी होती गयी हैं। उनकी नजर में तो गांव वाले जन्मजात क्रूर और वहशी होते हैं। उन्होंने उस बाघ को, जिसने उनकी औरतों को चबा डाला था, उसे घेर कर मारा और जला दिया। जला देना अपने-आप में इस बात का प्रमाण है कि गांव वालों को बाघ की कीमती हड्डियों और लाखों में बिकने वाले चमड़े में राई-रत्ती दिलचस्पी नहीं। बाघ को मारना उनकी जरूरत थी। जिन्हें विलुप्त प्रजाति को बचाये रखने की चिन्ता है वे अपनी चिन्ताओं के लिए कोई कीमत अदा करें। अपनी सुख-सुविधाओं में कटौती करें। यह क्या कि अपनी चिन्ताओं का विलाप और विज्ञापन करते हुए एन0जी0ओ0 से पैसा वसूलें और खुद बारहसिघों की खोपड़ी और शेर के खालों का धंधा करते रहें।

गांव वालों को इन फर्जी चिन्ताओं का खूब सारा व्यौरा मालूम है। जब सैकड़ो भेड़ों और बकरियों को उनके घर का छोटा सा बच्चा हांक ले जाता है और वे अपने रास्ते चलती चली जाती हैं तो पढ़े-लिखे लोगों को हाकने के लिए क्यों चौ राहे-चौ राहे ट्रैफिक पुलिस खड़ी रहती है। वे पढ़े लिखे हैं। वे सभ्य हैं। पेट में जरूरत से ज्यादा गोदामों का अनाज भर गया है। उनकी चिन्ताओं से गांव और गांव के लोग गायब हो चुके हैं। ऐसे में राजा को तो मरना ही होगा। चाहे वह जंगल का राजा हो या कंक्रीट और कोलतार से सुसज्जित किसी राजधानी का।

4 नवंबर 2010

दीवाली की तीन पीढ़ियाँ

दीवाली(1) - दादाजी के समय की

दादा ,दादी
एगो टींगन (बाबूजी)
दो जोड़ी बैल
लगहर-पतहर
भरल बथान
चकमक चमके
खेत खलिहान
बेचन,जीलदार(दोनों हलवाह)
पखेव के रस्सी
बांटे आज
मिलल बक्सीस
एक दो तीन
रूपया पॉँच
बाप रे बाप
कन्ट्रोल की दुकान
कोरी मारकीन
धोती साडी
मटिया तेल
चीनी के मेल
रेलम रेल
"लोहा सिंह नाटक"
रेडियो पे आज
दीया बाती
करुआ तेल
लड्डू बताशा
तोशक-रजाई
बिछी चारपाई
बर-बर्तुहारी
दिन नजदिकाई
तीना-तरकारी
अचका-बचका
तकली-चरखा
हाथ मे काम
खादी,सुत्ती
दिखते आम
नेहरु बहादुर
लाल गुलाब
जय जवान
जय किसान
कामरेड 'रेणु'
फिर भी परेशान

दीवाली(2) - बाबूजी के समय की

बाबूजी
अम्माँ
पाँच भाई बहनों का गुच्छा-
दुरा-दरवाज़ा
जर्सी गाय
टी0वी0
एन्टीना
घर-घर लटकाए
बैल भैंस कबके बिदाये
ट्रैक्टर ड्राईवर
फर-फर साईलेंसर
राजदूत मोटरसाईकिल
जयन्ती-जनता सुपरफास्ट
जाती भर कर दिल्ली आज
बेचन जिल्दार हो गए बेकार
खेदु,गजाधर गए जलंधर
दीया-बाती
आई मोमबती
झड़-झड़,झड़-झड़
झडे फुलझड़ी
"माँ-बेटा
बुलंद झंडा
घुमा फिराके
चपके पंजा
बाकि बचे
वो खाए डंडा
बुढ़वा दे-
जवान को कन्धा!"
अगड़ा-पिछडा
हिन्दू-मुसलमान
.......
.......
कैसे-कैसे बंटवारे आज
दूरदर्शन 'रामायण'
जय श्रीराम
नाल- नलकटुआ
दिखते आम
बड़-बेकारी
मिले न काम
वाम-वाम
भोथरी शान
देशी दूल्हा
विदेशी जामा
कामरेड 'सुदामा'
फाड़े पजामा

दीवाली(३) - मेरे समय में

मैं
बीबी
एक बच्ची
बिकल ट्रेक्टर
बिकल जमीन
सुदी किस्ती,जालम-जाल
दीवाली-दीवाला,हाल बेहाल
लगहर-पतहर,भेल नदारद
नाद-नदौरी
भूसा-भूसौरी
आपन करम के कोसे कबसे
मरद के बात
पुछिह न आज
सउँसे गाँव
जनानी मुसम्मात
खेदु गजाधर बसे ज़लन्धर
गाँव में अब नाचे कलन्दर
मुखिया-सरपंच
पईसा-परपंच
शिक्षामित्र
आँगनबारी
गड़बड़-झाला
एक से एक
रंगीन घोटाला
कामरेड लोग के हालबेहाल
नपुंसक सरकार,घेरे दलाल
छोटे शहर में
बड़े शोरुम
पिज्जा बर्गर
मैक्डी के धूम
लो-वेस्ट जींस
पार्लर-शैलून
दिल्ली के ट्रेन में
है नोरूम
सुना हूँ
दिल्ली में है रोज़गार
खा पी के शाएद बचे हज़ार
अपने गवारूँ भी
वही पे आज
दिन ही नहीं कालसेंटर में रात
ये सब सुनके हूँ
मैं भी तैयार
भेजूँगा घर
जलेगा चुल्हा
भरेगा पेट

- सुधांशु फिरदौस

2 नवंबर 2010

सेना के खलनायक और राष्ट्रवादी

एडमिरल माधवेन्द्र सिंह
शर्म के साथ कहना पड़ रहा है  कि भारतीय सेना अब नायक नहीं खलनायक पैदा कर रही है। जिन सेना प्रमुखों को सेना और देश के सामने आदर्श  पेश करने चाहिए वो भी लूट में हिस्सेदार हैं । जिन्हें भारत ने अपना नायक बनाया था वो  ही खलनायक बन बैठे।  पहले  शहीद जवानों के फ्लैट अपने नाम किए।  और अब मासूमियत से उन्हें लौटाकर देश को अपने आदर्शवादी और इमानदार होने का अहसास करवा रहे हैं। देश की यकीन नहीं आ रहा कि ऐसी जिम्मेदारी वाले लोग भी लूटेरे हो सकते हैं।

आखिर  इन तीनों खलनायकों के चेहरे   बेनकाब हुए।  महाराष्ट्र में हुए आदर्श घोटाले में  जल सेना, थलसेना और वायु सेना तीनों सेनाओं के शीर्ष अधिकारियों ने लूट में सामूहिक हिस्सेदारी ली। दुःख और अफ़सोस की बात है कि पैसे के लिए बिकने और  ईमान बेचने वालों में अब सेना के लोग भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे है।  बदले में इनका कहना है कि इन्हें कुछ मालूम  नहीं । कितने बेवकूफ अधिकारी रहे होंगे अगर इनको इतना भी नहीं मालूम होगा कि 8 करोड़ का फ्लैट 80 लाख में मिल रहा है तो क्या कारण है। दरअसल इतनी मासूमियत से ये लोग ईमानदारी का गला घोंटते है कि इनके लिये गला भर आएं।

अरुंधती  को छिनाल और ना जाने क्या- क्या कहने वाले तथाकथित राष्ट्रवादियों की जुबान बंद  है। उन्हें नहीं दिख रहा कि जो सेना अध्यक्ष घोटालेबाज हो सकते हैं वो चंद पैसे उया निजी हितों के लिए  दुश्मन मुल्कों से मिलकर  महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी भी लीक कर सकते हैं। लेकिन अरुंधती के छोटे से बयान पर उसको गोली तक मार देना आह्वाहन  करने वाले तथाकथित देश प्रेमियों को ये सब ठीक लग रहा है। अब उन्हें ये बातें लोकतांत्रिक दिखने लगी हैं। हैरानी कि बात यह है कि किसी ने दिखावे के लिए तक विरोध दर्ज नहीं किया। आखिर राष्ट्रवादियों का ये  कैसा देश प्रेम है जहां मां सरेआम नीलाम हो रही है और बेटा प्रतिज्ञा की  दुहाई देकर कह रहा है मैं बेबस हूं क्योंकि मैं भीष्म प्रतिज्ञा कर चुका हूं। और मां को बिकने दो।

पूर्व थल सेना प्रमुख जरनल दीपक कपूर
इन लोगों की सेलरी का हिसाब निकाल लिया जाएं और इनके रहन-सहन का स्तर किसी स्वतंत्र तरीके से चैक करा लिया जाएं तो आसानी से पता चल जाएंगा कि किस तरह से देश की लूट में इन महानुभवों ने अपना योगदान दिया होगा। करगिल युद्ध में  1971 के बाद पहली बार इतने जवान और अधिकारियों की शहादत हुई। आजतक भी उस वक्त सत्ता में बैठे लोगों या फिर बाद में सत्ता में आएं लोगों ने इस बात का जवाब नहीं दिया कि कैसे आतंकवादी इतनी तादाद में भारतीय सीमा के अंदर घुस आएँ। कैसे बंकर बने कैसे रणनीतिक कब्जा किया गया। 

पूर्व थल सेना प्रमुख जरनल एन सी विज
 लेकिन सेना के अधिकारियों को तो जवाब देना था कि कैसे हुआ ये सब। अब आदर्श घोटाले ने जरूर देश को ये यकीन दिलाया कि किस तरह से ये मासूम अफसर अपना दायित्व निबाह रहे होंगे। कारगिल के शहीदों के नाम पर किस तरह से लूट की। इन अफसरों के सैकड़ों फोटो सेनाओं के ऑफिसों में लगे होंगे जिनमें ये कारगिल के शहीदों के प्रति अपना सम्मान जता रहे होंगे।

1 नवंबर 2010

ऐसे होती है घोटालों की जांच

"मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती...." कितना गर्व होता था इस गाने को सुनकर अपने देश पर।  लेकिन अब ये सच्चाई नहीं है अब तो इस देश की धरती पर भी बेईमान और घोटालेबाज पैदा हो रहे हैं। बेहद बेशर्म और निर्लज्ज। एकदम आदर्श घोटालेबाज ताजा प्रकरण में महाराष्ट्र के मौजूदा मुख्यमंत्री दो पूर्व मुख्यमंत्री जो अब केन्द्रीय मंत्री हैं रीयल स्टेट घोटाले की जांच में है। दो पूर्व थलसेनाध्यक्ष एक पूर्व नौसेनाध्यक्ष और पूर्व वायुसेनाध्यक्ष ये सब आदर्श सोसायटी स्कैम की जांच के दायरे में हैं। इतने पर बस नहीं है महाराष्ट्र सरकार के कई मौजूदा मंत्रियों सहित कई पूर्व मंत्री इस जांच के दायरे में हो सकते है

इसके अलावा राजस्व विभाग के नौकरशाह और नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट्स देने वाली सरकारी एजेंसियों के नौकरशाह अभी पर्दे के पीछे है लेकिन जल्दी ही उनके नाम का भी हल्ला मच सकता है। हैरानी की बात नहीं है। देश में लूट की आदर्श स्थिति चल रही है। संविधान में लुटेरों को रोकने का कोई खास प्रावधान नहीं है। लूट की छूट में कोई व्यावधान नहीं है। 

इस देश में घोटाले की जांच भी एक बेहद पसंदीदा खेल है और खेल है तो खेला जाना चाहिएं। इसीलिये खेल शुरू हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जांच के आदेश दे दिये है। देश के रक्षामंत्री ए के एंटनी और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी जांच करेंगे। वित्त मंत्री कांग्रेस की इस सरकार के ट्रबल शूटर है। हर मामले की जांच में वही होते है। 

कांग्रेस के लगुवे-भगुवे बहुत खुश हुएं। सबसे पहले देश की सबसे शक्तिशाली महिला सोनिया गांधी की बैठाई गई जांच पर बात की जा सकती है। इस घोटाले की जांच सीबीआई भी कर सकती है। इस घोटाले की जांच रक्षा मंत्रालय भी कर रहा है। कई सारे सवाल है। यदि कांग्रेस अध्यक्ष को जांच करानी थी तो सीबीआई को खुली छूट दी जा सकती थी। कानूनन तो पुलिस भी जांच कर सकती थी। लेकिन मुख्यमंत्री की जांच करेंगे केन्द्र के दो मंत्री। प्रणव मुखर्जी साहब को अभी कागज पढ़ने है। कागज तो साफ है मुख्यमंत्री के तीन -चार रिश्तेदारों के नाम फ्लैट है। इसके अलावा जांच के लिये पार्टी को कुछ करना नहीं है। 

क्योंकि वो तो जांच एजेंसियों का काम है। कांग्रेस पार्टी ये साबित करने में लगी रहती है कि उनके प्रधानमंत्री खड़ाऊं प्रधानमंत्री नहीं है और राज-काज के फैसले खुद लेते है। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष ने इस मामले में देश के प्रधानमंत्री के देश में वापस लौटने का इंतजार भी नहीं किया। बेबस से ईमानदार प्रधानमंत्री को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यदि अखबारों में छपी खबरों पर यकीन किया जाएं तो प्रधानमंत्री ने एक सवाल के जवाब में ऐसा जवाब उन्होंने एक पत्रकार को जवाब दिया था। खैर प्रधानमंत्री की असली राजनीतिक ताकत की हकीकत राजनेता भी जानते है और आम जनता भी। 

चारा घोटाला, ताज कॉरी़डोर, गोमतीनगर विपुल खंड प्लॉट स्कैम, मधु कोड़ा की अकल्पनीय लूट, चौटाला का टीचर भर्ती घोटाला, या फिर ऐसी एक लंबी लाईन है जिसका कोई अंत नहीं है। आप की संसद और विधानसभा आजतक एक भी ऐसा कानून नहीं बना पाय़ी कि ऐसे मुख्यमंत्रियों को फौरन दंड मिल सके। इनके लिये कानून के एक होने की बात की जाती है। लेकिन क्या आप ऐसी छूट की उम्मीद किसी जेंबकतरें या फिर रहजन के लिये कर सकते है। नहीं इन लोगों को पब्लिक सड़कों पर पीट-पीट कर मार देती है।

भटका हुआ-सा फिरता है दिल किस ख़याल में

चुपके से कोई कहता है, शाइर नहीं हूँ मैं ।
क्यों अस्ल में हूँ वो जो बज़ाहिर नहीं हूँ मैं ।

भटका हुआ-सा फिरता है दिल किस ख़याल में
क्या जादए-वफ़ा का मुसाफ़िर नहीं हूँ मैं ?

क्या वसवसा है, पा के भी तुमको यक़ीं नहीं
मैं हूँ जहाँ वहीं भी तो आख़िर नहीं हूँ मैं ।

सौ बार उम्र पाऊँ तो सौ बार जान दूँ
सदक़े हूँ अपनी मौत पे काफ़िर नहीं हूँ मैं ।

- शमशेर बहादुर सिंह