31 दिसंबर 2010

इस साल का सर्वश्रेष्ठ भारतीय

2010 का सर्वश्रेष्ठ भारतीय -  डा. बिनायक सेन

हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे साथी,उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी,गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी,जिन्दगी के टुकड़े

हथौड़ा अब भी चलता है,उदास निहाई पर
हल अब भी बहते हैं चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता,प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी

कत्ल हुए जज्बों की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हम लड़ेगे साथी
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का मूत पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले खुद नहीं सूँघते
कि सूजी आँखो वाली
गाँव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्ध से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने ही भाइयों का गला घोंटने को मजबूर हैं
कि दफ्तर के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर....
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरूरत बाकी है....
जब बन्दुक न हुई,तब तलवार होगी

जब तलवार न हुई,लड़ने की लगन होगी
कहने का ढंग न हुआ,लड़ने की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी....

हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद जिन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे साथी.....

- पाश

29 दिसंबर 2010

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग

मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग

अनगिनत सदियों के तारीक बहिमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाये हुये
जा-ब-जा बिकते हुये कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुये ख़ून में नहलाये हुये
जिस्म निकले हुये अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुये नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग

- फैज अहमद 'फैज'

27 दिसंबर 2010

गालिब जो मर गया है तो हर शायर-दिल उदास है

दीवान-ए-गालिब मुझे उतनी ही प्रिय है जितनी किसी को रामचरितमानस या गीता प्रिय होगी। फिर भी,आज दोपहर जब ब्लाग खोला तब पता चला कि गालिब का जन्मदिन है। 'जन्मदिन की बधाई' की जो अंतरध्वनि है वह गालिब के फलसफा-ए-जिंदगी का विपर्यय ही रचती है। गालिब ने कभी चाहा था कि -

रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो।
हम-सुखन कोई न हो और हम-जबाँ कोई न हो।।

बे-दरो दीवार-सा इक घर बनाया चाहिए।
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो।।

पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार।
और अगर मर जाइए तो नौहाख्वाँ कोई न हो।।

इस गजल को कहते वक्त गालिब की क्या कैफियत रही होगी इसका अंदाजा हर पाठक लगा सकता है। जीवन की त्रासदी यह कि महान कवि जीते जी जिन चीजों के लिए तरस के रह जाता है मरने के बाद वहीं चीजें उसे इफरात में मिलती हैं। इसी उधेड़बुन के बीच ख्याल आया कि गालिब जैसे शायर को आज भी कुछ खास तरह के लोग ही याद कर रहे हैं। गालिब के ही तर्ज पे कहें तो गालिब जो मर गया है तो हर शायर-दिल उदास है.....

लेता नहीं मेरे दिल-ए-आवारा की खबर।
अब तक वह जानता है कि मेरे ही पास है।।

हर इक मकान को है मकीं से शरअ असद।
मजनूँ जो मर गया है,तो जंगल उदास है।।

25 दिसंबर 2010

ये युद्ध है और हम इसमें शामिल हैं

आवेश तिवारी

घोटालों ,भ्रष्ठाचार , आतंक और राजनैतिक वितंडावाद से जूझ रहे इस देश में अदालतों का चेहरा भी बदल गया है ,ये अदालतें अब आम आदमी की अदालत नहीं रही गयी हैं ,न्याय की देवी की आँखों में बन्दे काले पट्टे ने समूची न्यायिक प्रणाली को काला कर दिया है ,जज राजा है ,वकील दरबारी और हम आप वो फरियादी हैं जिन्हें फैसलों के लिए आसमान की और देखने की आदत पड़ चुकी है
बिनायक सेन को उम्र कैद की सजा हिंदुस्तान की न्याय प्रक्रिया का वो काला पन्ना है जो ये बताता है कि अब भी देश में न्याय का चरित्र अंग्रेजियत भरा है जो अन्याय ,असमानता और राज्य उत्प्रेरित जनविरोधी और मानवताविरोधी परिस्थितियों के साए में लोकतंत्र को जिन्दा रखने की दलीलें दे रहा है .

सिर्फ बिनायक सेन ही क्यूँ देश के उन लाखों आदिवासियों को भी इस न्याय प्रक्रिया से सिर्फ निराशा हाँथ लगी हैं जिन्होंने अपने जंगल अपनी जमीन के लिए इन अदालतों में अपनी दुहाई लगाई. खुलेआम देश को गरियाने वाले और सशस्त्र क्रान्ति का समर्थन करने वाले खुलेआम देश- विदेश घूम घूम कर हिंदुस्तान के खिलाफ विषवमन करते हैं ,और संवेदनशील एवं न्याय आधारित व्यवस्था का समर्थन करने वालों को सलाखों में ठूंस दिया जाता है

बिनायक सेन की सजा के आधार बनने वाले जो सबूत छत्तीसगढ़ पुलिस ने प्रस्तुत किये ,वो अपने आप में कम हास्यास्पद नहीं है ,पुलिस द्वारा मदन लाल बनर्जी का लिखा एक पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमे बिनायक सेन को कामरेड बिनायक सेन कह कर संबोधित किया गया है ,एक और पत्र है जिसका शीर्षक है कि "कैसे अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरोध में फ्रंट बनाये ",इनके अलवा कुछ लेख कुछ पत्र जिन पर बकायदे जेल प्रशासन की मुहर है सबूत के तौर पर प्रस्तुत की गयी.

 भगत सिंह और सुभाष चद्र बोस जिंदाबाद के नारे लिखे कुछ पर्चे भी इनमे शामिल हैं अदालत ने अपने फैसले में सजा का आधार जिन चीजों को माना है वो छत्तीसगढ़ ,झारखण्ड ,ओड़िसा और उत्तर प्रदेश के किसी भी पत्रकार समाजसेवी के झोले की चीजें हो सकती हैं.  बिनायक चिकित्सक हैं नहीं तो पुलिस एक कट्टा ,कारतूस या फिर एके -४७ दिखाकर और कुछ एक हत्याओं में वांछित दिखाकर उन्हें फांसी पर चढवा देती.

देश में माओवाद के नाम पर जिनती भी गिरफ्तारियां या हत्याएं हो रही हैं चाहे वो सीमा आजाद की गिरफ्तारी हो या हेमचंद की हत्या सबमे छल ,कपट और सत्ता की साजिशें मौजूद थी साजिशों के बदौलत सत्ता हासिल करने और फिर साजिश करके उस सत्ता को कायम रखने का ये शगल अब नंगा हो चुका है माओवादियों के द्वारा की जाने वाली हत्याएं जितनी निंदनीय हैं उनसे ज्यादा निंदनीय फर्जी मुठभेड़ें और बेकसूरों की गिरफ्तारियां हैं क्यूंकि इनमे साजिशें और घात भी शामिल हैं

बिनायक सेन एक चिकित्सक हैं वो भी बच्चों के चिकित्सक ,देश में पूरी तरह से जीर्ण शीर्ण हो चुकी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को पुनर्स्थापित करने को लेकर उनके जो उन्होंने कभी नक्सली हिंसा का सर्थन नहीं किया पर हाँ ,वो राज्य समर्थित हिंसा के भी हमेशा खिलाफ रहे ,चाहे वो सलवा जुडूम हो या फिर छतीसगढ़ के जंगलों में चलाया जा रहा अघोषित युद्ध बिनायक खुद कहते हैं "माओवादियों और राज्य ने खुद को अलग अलग कोनों पर खड़ा कर दिया है ,बीच में वो लाखों जनता हैं जिसकी जिंदगी दोजख बन चुकी है ,ऐसे में एक चिक्तिसक होने के नाते मुझे गुस्सा आता है जब इन दो चक्कियों के बीच फंसा कोई बच्चा कुपोषित होता है या किसी माँ का बेटा उसके गर्भ में ही दम तोड़ देता है ,क्या ऐसे में जरुरी नहीं है कि हिंसा चाहे इधर की हो या उधर की रोक दी जाए,और एक सुन्दर और सबकी दुनिया ,सबका गाँव सबका समाज बनाया जाए"

कम से कम एक मुद्दा ऐसा है जिस पर देश के सभी राजनैतिक दल एकमत हैं वो है नक्सली उन्मूलन के नाम पर वन ,वनवासियों और आम आदमी के विरुद्ध छेड़ा गया युद्ध ,भाजपा और कांग्रेस जो अब किसी राजनैतिक दल से ज्यादा कार्पोरेट फर्म नजर आते हैं निस्संदेह इसकी आड़ में बड़े औद्योगिक घरानों के लिए लाबिंग कर रही हैं ,वहीँ वामपंथी दलों के लिए उनके हाशिये पर चले जाने का एक दशक पुराना खतरा अब नहीं तब तब उनके अंतिम संस्कार का रूप लेता नजर आ रहा है.

मगर ये पार्टियाँ भूल जा रही है कि देश में बड़े पैमाने पर एक गृह युद्ध की शुरुआत हो चुकी है भले ही वो वैचारिक स्तर पर क्यूँ न लड़ा जा रहा हो ,विश्वविद्यालों की कक्षाओं से लेकर ,कपडा लत्ता बेचकर चलाये जाने वाले अख़बारों ,पत्रिकाओं और इंटरनेट पर ही नहीं निपढ निरीह आदिवासी गरीब ,शोषित जनता के जागते सोते देखे जाने वाले सपनों में भी ये युद्ध लड़ा जा रहा है ,हम बार बार गिरते हैं और फिर उठ खड़े होते हैं.

हाँ ,ये सच है ,  विनायक सेन जैसों के साथ लोकतंत्र की अदालतों का इस किस्म का गैर लोकतान्त्रिक फैसला रगों में दौड़ते खून की रफ़्तार को बढ़ा देता हैं ,ये युद्ध आजादी के पहले भी जारी था और आज भी है.

24 दिसंबर 2010

करम गति टारै नाहिं टरी

करम गति टारै नाहिं टरी ॥

मुनि वसिष्ठ से पण्डित ज्ञानी, सिधि के लगन धरि ।
सीता हरन मरन दसरथ को, बनमें बिपति परी ॥

कहॅं वह फन्द कहाँ वह पारधि, कहॅं वह मिरग चरी ।
कोटि गाय नित पुन्य करत नृग, गिरगिट-जोन परि ॥

पाण्डव जिनके आप सारथी, तिन पर बिपति परी ।
कहत कबीर सुनो भै साधो, होने होके रही ॥

23 दिसंबर 2010

माया 'मेमसाब'



बेलगाम ख्वाहिशें दर्द के ऐसे रास्ते पर ले जाती है जहाँ से लौटना नामुमकिन होता है. ख्वाब, मोहब्बत, वासना, एक ही माला के मोती हैं.जब तक माला गुंथी हुई है खूबसूरत है पर जैसे ही एक मोती भी गिरा, धीरे-धीरे सारे मोती बिखर जायेंगे. जो मोती साथ में सलीके से बंधे चमकते हैं वो ज़मीन पर बिखर कर पांव में चुभेंगे. केतन मेहता की माया मेमसाब 90 के दशक की सबसे बोल्ड फिल्मों में से एक है. दीपा साही यानी माया खुद से कहती है "आगे मत बढ़ो वरना जल जाओगी, पर रुक गयी तो क्या बचोगी" सपनो के राजकुमार का इंतज़ार करने वाली, रूमानी किस्सों में डूबी रहने वाली , गीत गुनगुनाने वाली माया जब फारुख शेख यानी डॉ. चारू दास से मिलती है तो उसे नज़र आता है वो लम्हा जब दोनों एक दूसरे से बातों बातों में खेलते हैं. लफ़्ज़ों की जादूगरी माया को उस डॉक्टर की तरफ आकर्षित करती है. बड़े से महेल में अपने बूढ़े पिता के साथ अकेले रहने वाली माया को फारूख में अपनी रूमानी कहानियों के सच होने का रास्ता दिखने लगता है. फारुख शादीशुदा है पर माया का जादू उन पर चढ़ जाता है. चारू ने अपनी बीवी को कुछ कुछ वैसा ही धोका दिया जैसा आगे चल कर माया चारू को देती है चूँकि माया बेलगाम है उसकी बेवफाई का स्तर इतना ऊँचा हो जाता है की खुद माया का दम घुटने लगता है.

चारू की पत्नी के मरने बाद माया उसकी ग्रहस्ती में आती है. जो माया अपनी पुरानी हवेली में घूमती-नाचती फिरती थी बंद कमरे के मकान में बस जाती है. अब तक सब ठीक था पर परेशानी तब खड़ी हुई जब शादी के बाद भी माया अपने "आईडिया ऑफ़ रोमांस" से बाहर नहीं आई. उसने डायरी पर ख्वाबों का महेल बनाना नहीं छोड़ा उसने प्रेमी के साथ भाग चलने के ख्वाब देखने नहीं छोड़े, उसकी रोमांस की चाहत शादी पर खत्म नहीं हुई वो प्रेमी द्वारा सबसे ज्यादा चाहे जाने, बाहों के घेरे में दिन भर बैठे रहने और आँखों की तारीफ़ में कसीदे पढवाने को अब भी बेचैन थी. यही थी माया की भूल. कवितायेँ पत्नी के लिए नहीं प्रेमिका के लिए लिखी जाती हैं ये माया की समझ नहीं आया. अपनी ज़िन्दगी में वो अब भी तलाशती रही वो राजकुमार जो उसे निहारे, उसके लिए बेचैन रहे, आहें भरे. माया को ये मिला जतिन (शारुख खान) में, फिर रूद्र (राज बब्बर) में और फिर जतिन में, प्लेटोनिक फिर जिस्मानी और फिर ओबसेशन. भावनाएं कितनी तेज़ी से तीव्र होती हैं इसकी गति का पता नहीं चलता. मालूम होता है तब जब आप रुकना चाहते हुए भी रुक ना सको. फिर चाहे जितनी भी चैन खींचो ट्रेन रूकती नहीं. माया जानती है "शुरुआत का कोई अंत नहीं"

लेकिन माया का अंत उसके ख्वाबों ने नहीं बल्कि हकीक़त ने किया. अपनी खाली ज़िन्दगी को कभी प्रेम संबंधों से तो कभी महंगे फर्नीचर से भरते हुए माया को अंदाजा नहीं हुआ, ख्वाबों के पैसे नहीं लगते पर ख्वाबों को हकीक़त का रूप देने में खजाने कम पड़ जाते हैं. आँखों पर ख्वाहिशों की पट्टी बांधे वो अपने घर को आलिशान बनाने और अपनी ज़िन्दगी को परियों की कहानी सा बनाने में लगी रही. पर जब उधार हद से पार हुआ और रिश्ता ओबसेशन में तब्दील दोनों ने ही उसके मुह पर तमाचा जड़ा.

अपने घर को नीलामी से बचाने के लिए माया के सामने शारीरिक सम्बन्ध बनाने का प्रस्ताव रखा गया. माया अपने जिस्म को छुपाये अपने पुराने प्रेमी प्रूद्र के पास गयी लेकिन वहां भी माया के जिस्म की ही पूछ थी उसकी तकलीफों के लिए जगह नहीं थी. रूद्र को अब माया में कोई दिलचस्पी नहीं थी जो उसकी मदद करता. माया दूसरे प्रेमी जतिन की बाहों में जा समायी और सब कुछ बचाने की गुहार लगायी. पर जतिन माया के किसी और से हमबिस्तर होने की बात पर आग बबूला तो हो सकता था पर उसे बेघर होते देखते हुए बेहिस था. मदद के दरवाज़े वहां भी बंद थे.

अपनी परियों की कहानी का ये अंजाम माया के बर्दाशत से बाहर था पर माया खूबसूरत इत्तेफाकों में यकीन करती थी तभी उसने एक बाबा का दिया "जिंदा तिलिस्मात" पी लिया. वो घोल ज़हर था या जादुई पानी माया नहीं जानती थी. माया जीते जी ख्वाबों के सच होने की कोशिश करती रही और मरते वक़्त भी किसी अलिफ़ लैला की कहानी के सच होने का इंतज़ार करती रही. ना उसके साथ सच ही रहा ना किस्सा ही. ज़िन्दगी कहाँ खत्म होती है और मौत कहाँ से शुरू होती है ये रास्ता दुनिया के किसी भी नक़्शे पर नहीं है, शायद माया को उस रास्ते पर चलते हुए ख्वाबों की पगडण्डी मिल गयी हो.वो दुनिया की तरह मौत को भी धोका देती हुई उसी पगडण्डी पर आगे चली आ रही हो
.


*इस लेख के प्रकाशन के लिए  अनुवादक की सहमति आवश्यक है.

15 दिसंबर 2010

एक नीला आइना बेठोस

एक नीला आइना
बेठोस-सी यह चाँदनी
और अंदर चल रहा हूँ मैं
उसी के महातल के मौन में।
मौन में इतिहास का
कन किरन जीवित,एक,बस।

एक पल के ओट में है कुल जहान।

आत्मा है
अखिल की हठ-सी।

चाँदनी में घुल गए हैं
बहुत-से तारे बहुत कुछ
घुल गया हूँ मैं
बहुत कुछ अब।

रह गया-सा एक सीधा बिम्ब
चल रहा है जो
शांत इंगित-सा
न जाने किधर।

- शमशेर बहादुर सिंह

13 दिसंबर 2010

पहला ब्रेक

कम उम्र में बड़े निर्णय कुछ लोग ही ले पाते हैं। ऐसे ही एक शख्स का आज मैं आपसे परिचय करवाना चाहता हूँ। जिसने चौदह साल की कम उम्र में तय कर लिया कि वह फिल्म गीतकार बनेगा। सोलह साल की उम्र में वह माया नगरी मुम्बई जा पहुँचा। सपनों की राह लम्बी और कँटीली होती है। विक्की के लिए भी यह रास्ता आसान नहीं था।

चार साल के अथक संघर्ष के बाद विक्की को उसका पहला ब्रेक मिला। किसी भी संघर्षरत कलाकार के लिए पहले ब्रेक से बड़ी कोई चीज नहीं होती। यदि पहला ब्रेक इस कदर उम्दा हो तो खुशी का दोगुनी हो जाती है। विक्की को पहला ही ब्रेक हिन्दी सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और मलयाली सुपरस्टार मोहनलाल अभिनीत फिल्म कान्धार में मिला है। गाने के बोल हैं भोर छुपी है कहीं.....। गाने का प्रोमो-विडियो आपके लिए प्रस्तुत है। इस पोस्ट के  साथ ही विक्की को उसके सफल और सुखी भविष्य के लिए बना रहे बनारस की तरफ से हार्दिक शुभकामनाएँ।

11 दिसंबर 2010

छोटी सी चाबी से बड़ा सन्दूक खोला जा सकता है

छोटी सी चाबी से बड़ा सन्दूक खोला जा सकता है - मेरे पिता जी कभी कभी ऐसा कहा करते थे। अम्माँ तरह-तरह के किस्से कहानियां सुनाया करती थीं- “सागर बड़ा है न ? हाँ,बड़ा है। कैसे बना सागर ? छोटी सी चिड़िया ने अपनी और भी छोटी चोंच जमीन पर मारी-चश्मा फूट पड़ा। चश्मे से बहुत बड़ा सागर बह निकला।”

अम्माँ मुझसे यह भी कहा करती थीं कि जब काफी देर तक दौड़ लो तो दम लेना चाहिए,बेशक तब तक,जब तक कि हवा में ऊपर फेंकी गयी टोपी नीचे गिरती है। बैठ जाओ,साँस ले लो।

आम किसान भी यह जानते हैं कि अगर एक खेत में,वह चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो,जुताई पूरी कर दी गयी है और दूसरे खेत में जुताई शुरू करनी है तो जरूरी है कि इसके पहले मेड़ पर बैठकर अच्छी तरह से सुस्ता लिया जाए।

- रसूल हमजातोव, मेरा दागिस्तान
   अनुवाद - मदनलाल मधु

9 दिसंबर 2010

सूचना: रघुवीर सहाय की स्मृति में कविता पाठ

मित्रो आज शाम पांच बजे,  दिनांक 9 दिसम्बर,2010, स्थान:राजेन्द्र भवन (निकट आई टी ओ) नई दिल्ली,  में रघुवीर सहाय की स्मृति में एक कविता पाठ का आयोजन है. समय हो तो ज़रूर आइए. दूर बैठे साहित्य प्रेमियों के लिए बना रहे बनारस लेकर आएगा कविता पाठ की झलकियाँ. 

8 दिसंबर 2010

बड़ा अफ़सर

इस विषय पर विचार का कोई प्रश्न नहीं
निर्णय का प्रश्न नहीं
वक्तव्य – अभी नहीं
फिर से समीक्षा का प्रश्न नहीं
प्रश्न से भागता गया
उत्तर देते हुए इस तरह बड़ा अफ़सर।

-रघुवीर  सहाय 

3 दिसंबर 2010

कुछ इश्क किया कुछ काम किया

वो लोग बड़े खुशकिस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मशरूफ रहे
कुछ इश्क किया कुछ काम किया

काम इश्क के आड़ आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया

- फैज अहमद फैज

2 दिसंबर 2010

'शाहजादे' की शाही शादी

बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के बेटे निखिल की 2 दिसंबर यानि शुक्रवार को नागपुर में शादी है। निखिल पेशे से बिजनेसमैन हैं और उनकी होने वाली पत्नी ऋतुजा संस्कृत में एम.ए कर रही है।

ये शादी अपनी भव्यता और इंतज़ामों को लेकर खासी चर्चाओं में है। नागपुर शहर में इस शादी के लिए बेहद खास इंतजाम किए गए है। इस शादी में करीब डेढ़ लाख से ज्यादा मेहमानों के आने की उम्मीद है।

3 दिसंबर को निखिल की शादी का ग्रांड रिसेप्शन शुक्रवार को नागपुर के जामता स्टेडियम और रेशम बाग में होगा। इसमें सियासत से जुड़े करीब डेढ़ लाख लोग शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है।

इसके अगले दिन यानि 4 दिसंबर को डेढ़ लाख लोगों के लिए स्वागत समारोह आयोजित किया जाएगा।

चर्चायें हैं कि इस शादी में नितिन गडकरी अपने लाडले को खासा मंहगा गिफ्ट देने जा रहे हैं, जी हां नागपुर के रविनगर के पास हिल रोड स्थित 46 नंबर का बंगला जिसकी कीमत करीब नौ करोड़ है और करीब चार करोड़ की इसमें साज-सज्जा है। इसके साथ ही बेटे निखिल को बीएमडब्ल्यू कार भी गिफ्ट करने वाले हैं पिता नितिन गडकरी।

शादी के बांटे गए कार्डो की कीमत एक करोड़ रूपए बताई जा रही है। अकेले नागपुर शहर में 1.36 लाख कार्ड बांटे गए हैं। इसके अलावा विदर्भ और महाराष्ट्र में 80 हजार तथा शेष भारत में 76 हजार कार्डो का वितरण किया गया है।

स्वागत समारोह में करीब छह लाख लोगों के भोजन की व्यवस्था की गई है।गडकरी ने भाजपा के अलावा तमाम दलों के नेताओं को शादी में आने का न्यौता दिया है। शादी में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के आने की भी चर्चायें हैं।