जब सारे तारे चले जायेंगे
न जाते जाते;रात भी चली जायेगी
तो चाँद क्या करेगा
जब दुःख की चादर इतनी फ़ैल जायेगी
कि उससे बाहर निकलने की कोई सूरत नहीं बचेगी
जब पूरे आकाश का भार,अकेले उठाना मुश्किल हो जायेगा
जब किसी के आने का इंतजार लम्बा और लम्बा होता जायेगा
और आँखे, दिए के कोर की तरह स्याह से स्याहतर होती चली जायेंगी
तो चाँद क्या करेगा
- सुधांशु
सूरज से बतियाते-बतियाते उसके पीछे छिप जाएगा। अच्छी कविता।
प्रत्युत्तर देंहटाएंतब आशा की एक नई किरण आयेगी जीवन फिर से चलने लगेगा।
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (6/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com
Oh ye chand bhi bas....
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज आपकी चर्चा हमने भी की है जी हमारे ठिकाने पर तशरीफ़ ला सकते हैं
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेरा नया ठिकाना
चाँद क्या करेगा ? हमी को कुछ करना होगा।
प्रत्युत्तर देंहटाएंकहना होगा भटके हुए तारों से कि आ लौट चलें...चाँद आज अपनी बेबसी पर बहुत उदास है।
बहुत सुन्दर ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंचाँद अपनी चाँदनी से आकाश को ढक लेगा ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंtab chand aapki kavita ko padhega aur uska jawab likhne ko kisi achchhe kavi ko aamantrit karega,ho sakta hai nimantran aap par bhi aaye.bahut khoob..
प्रत्युत्तर देंहटाएंmere blog kaushal par bhi aapka hardik swagat hai...
चाँद कुछ भी करेगा , पर दीवाने सुधान्सू और हम जैसे लोग उसे नही छोडेंगे.
प्रत्युत्तर देंहटाएंजब नाज़ी कम्युनिस्टों के पीछे आए,
प्रत्युत्तर देंहटाएंमैं खामोश रहा
क्योकि, मैं कम्युनिस्ट नहीं था
जब उन्होंने सोशल डेमोक्रेट्स को जेल में बंद किया
मैं खामोश रहा
क्योकि, मैं सोशल डेमोक्रेट नहीं था
जब वो यूनियन के मजदूरों के पीछे आए
मैं बिलकुल नहीं बोला
क्योकि, मैं मजदूर यूनियन का सदस्य नहीं था
जब वो यहूदियों के लिए आए
मैं खामोश रहा
क्योकि, मैं यहूदी नहीं था
लेकिन,जब वो मेरे पीछे आए
तब, बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था
क्योंकि मै अकेला था।
जर्मन कवि पस्टोर मार्टीन निमोलर के -"फर्स्ट दे कम" से