28 जनवरी 2011

कूट-बीज

मैंने देखा है वह बीज
धीमे से उगते हुए
महत्वाकांक्षा का
अन्दर की सड़ी और बदबूदार ग्रंथियों में

घोंट कर अपना अभिमान
जलाकर आत्मा अपनी
जगाकर व्यथा पापों की
हीनता की दुरूह वीथियों में
अंतहीन यातनाओं की पीठ पर
गड़ा कर एड़ियाँ अपनी
उठाता है अपने स्वप्नमेघ

गहरी नींद के भयावह सपनों से
उठती हुई तृषा के भंवर में
ढूँढता है अपना संबल
एक जाग्रत तत्व
दांतों में दबाकर भय अपना
कूदता है किसी गहन अज्ञात में

फोड़ कर अपना आवरण
तोड़ कर परम्पराएँ अपनी
लांघ कर परकोटे ग्लानियों के
देता है अपने आने की सूचना
गहन निर्वात की नलिकाओं के ध्वांत में
नोंच कर रिक्ष अपनी आत्मा से
बिछा देता है लक्ष्य पथ पर

जंग लगे अभिमानों की
गली हुई मैल से
उगता है वो उदभिज
बनाकर स्फुल्लिंग स्वेदकणों को
जगाता है स्फुरण
अपनी मरी हुई जिगीषा में
हार की खीज में
खदबदाते कृमियों की
जिजीविषा चुराकर
भोंकता है सींग अपने अंतर्द्वंद्वों की छाती में
खींचता है अपने शब्द की लकीर

एक चिर अनंत प्रतीक्षा
बाँध कर अपने पौरुष की व्यग्रता
बैठ कर घुटनों के बल
एकटक देखती है
अपने स्वप्नों की नीहारिका
अज्ञातवास की पीड़ा भरती है
नये स्वप्न, नये स्पर्श, नयी सर्जना
ढूँढती है नये बीज
अपने इतिहास की अँधेरी
नम मिट्टी की परतों में

- दीपांकर

5 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन का बेहद सकारात्मक नज़रिया .बहुत खूब .

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  2. आपके ब्लाग पर पाठक बहुत जहीन हैं

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  3. इस कविता को पढ़ कर अपनी हालत तो उस किशोर के समान हो गई है जो मुकेश के गीत सुन-सुन कर मस्त हो रहा था कि यकबयक भीम सेन जोशी के राग-तरंग से पाला पड़ जाय और अपना सर जोर-जोर से हिलाने लगे कि लोग बाग उसे निरा बुद्धु न समझ लें।
    ..कल फिर मिलेंगे इस कविता से।

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