10 फरवरी 2011

बीज-व्यथा

घुप अँधेरी गुफाओं में
बहुत गहरी शिराओं में
गुमकती है एक गहन टीस
दर्द उठता है काले पत्थरों में
खड़ा हो उठता है चिहुंक कर
प्रस्तर लाट एक लम्ब
सर उठाये एंठता हुआ
माथे पे उसके बैठी है
एक गाढ़ी बूँद
बूँद में बीज
टंगा हुआ ठूंठ पर
शुष्क सा उतप्त सा
तकता है नीचे की आर्द्र जमीन
तो कभी उन्मन सा
ऊपर का आकाश

उठते हैं मादक हवाओं के रेशे
लिपटे हुए सोंधी भाप में
चूमते हैं उसका शल्क
पिघल जाता है
वह अनवद्य आवरण
एक गाढ़ा लास्य टपकता है
शून्य में छोड़ कर यह शरीर
घुस जाना चाहता है गीली मिट्टी में
घुल जाना चाहता है कणों में

अपनी मुक्ति के लिए
नए अंकुर के प्राणों के लिए
अपने इतिहास के नए जन्म के लिए
अपनी गाथाओं के शाश्वत गीतों के लिए

कि अचानक हवा का एक बनडोवा
उड़ा कर पटक देता है
उसके स्वप्न
बिखेर देता है उसका शरीर
रूप-रस-गंध तिरते हैं आकाश में
भटकती है उसकी आत्मा
नंगे पाँव
गहरी सुनसान रातों में
समंदर की लरजती पीठ पर
आधा चाँद झांकता है
बादलों की नकाब के पीछे से
क्षितिज के उस पार तक
लौट कर फिर आती है वह
देख कर चाँद को रोती है
रोकर सूख जाती है ग्रंथियां
सूख कर जल जाती है वासना
फिर राख के नीचे सुगबुगाती है
वह बीज-बिंदु-आत्मा
कोसती है अपने स्वप्नों को
अपनी जड़ों को
मिथकों की प्रेरणाओं को

अपने साहस की ग्लानि
से रुंधी हुई वह
भीष्म प्रतिज्ञाओं की कुंठा
से पिसी हुई वह
ढूँढती है विकल्प अपनी मुक्ति का
चिर भटकाव में
अनंत तक बहती नदी के सहारे चलती है
घिस देती है अपनी देह
रगड़ कर तल के अवसादों से
फिर रचती है
एक स्वप्न
एक साकार
एक चेतन
फिर बुनती है
एक नया प्रारब्ध, निरंध्र
मुक्ति के अंत तक
रूप-रस-गंध से बनी हुई धुंध में
गुम हो जाती है वह अनाम, निस्शब्द
पर टांक देती है अपने अर्थ
हवाओं के माथे पर
चिर अनंत तक

- दीपांकर

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