28 फ़रवरी 2011

गुलज़ार : हिन्दी सिनेमा का अपना स्पेशल इफेक्ट


गुलज़ार की शायरी की, उनके लिखे गीतों की, नज्मों की बात तो हमने बहुत की है पर उनके सिनेमा की बात हमने कम ही की है.

गुलज़ार की सभी फ़िल्में तो नहीं देखी मैंने पर हाँ अधिकतर देख चुका हूँ, मेरे अपने से शुरू हुआ उनका सफर हू तू तू पर आ कर एक 'pause' लिए हुए है और मैं अब भी इंतज़ार मे हूँ कि कब सिनेमा का ये सफर 'resume' होगा

गुलज़ार की फिल्म देखते हुए लगता है के हम जिस कमरे मे बैठे हैं उसमे से एक दरीचा खुल गया है और उसी दरीचे से आती हुई रौशनी मे फिल्म का सारा घटनाक्रम बिलकुल हमारे सामने घटित हो रहा है , कहने का मतलब यह है कि गुलज़ार के सिनेमा को स्पेशल चश्मा लगा के देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती, साफ़ दिल करके देखने पर सब अपने आप 3D नज़र आता है.

गुलज़ार की कविताओं का असर उनके बनाये हुए सिनेमा पर भी दिखता है और यह असर इजाज़त मे चरम पर है. अलग हो चुके पति पत्नी एक रात एक एक रेलवे स्टेशन पर मिलते हैं जबकि उनकी गाडी सुबह आने को है, रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम मे वो इंतज़ार करते हैं अपनी अपनी गाड़ी के आने का और उसी क्रम मे पत्नी पति से वैसा ही व्यवहार करने लगती है जैसा तलाक़ के पहले करती थी ,रात भर मे पति मानसिक रूप से तैयार हो जाता है कि पत्नी सुबह होते ही उसी के साथ चल देगी लेकिन सुबह उस औरत का दूसरा पति आ जाता है

अपने अंत पर पहुँचने से पहले यह कितनी सीधी कहानी लगती है,  उस अंत पर पहुँचने से पहले गुलज़ार साब रिश्तों के ताने बाने को समझाते हैं (जैसे कि अपनी नज़्म  "यार जुलाहे"  मे समझाते हैं) और देखने वाले को बता देते हैं कि देखो यह रही वो गाँठ और इसे छुपाने की ज़रूरत नहीं बल्कि ऐसा करो कि गाँठ पड़े ही न और इसी समझाने के दौरान उनकी कवितायेँ अपने आकार ले लेती हैं , खैर ये तो वो कविता है जिसे उनके सिनेमा मे हम महसूस करते हैं, सीधे सीधे तौर पे भी कई सारी कवितायेँ कहती है इजाज़त की दूसरी नायिका.

दुनिया की विसंगतियों को भी अपने अंदाज से दिखाया उन्होंने फिल्म “अचानक” और मौसम  मे, अचानक मे फांसी पाया हुआ नायक बीमारी से मर रहा है लेकिन उसे उस बीमारी से बचाकर फांसी दी जाती है उसे जिंदगी ही इसीलिए दी जाती है ताकि उसे मारा जा सके इससे बड़ी विसंगति क्या होगी हमारे समाज की.

मौसम मे बूढा हो चुका नायक अपनी पूर्व प्रेमिका की बेटी को वेश्यावृति से छुटकारा दिलाना चाहता है लेकिन उसे एहसास होता है कि वो उससे प्यार करने लगी. गुलज़ार की फिल्मो मे असामान्य दिखने वाली घटनाएं बहुत ही सामान्य तरीके से घटित हो जाती हैं.

“इत्तेफाक” का गुलज़ार से बढ़िया इस्तेमाल शायद ही किसी ने किया हो , किताब का नायक एक नन्हा बच्चा है जो अपनी दीदी और जीजा के साथ रहता है जहां उसे बात बात पे डांट मार पड़ती है ,उसका दिल स्कूल मे भी नहीं लगता और उसके दोस्त के परिवार से भी उसके जीजा को दिक्कत होती है परिणाम स्वरुप वह घर छोड़ के भागता है अपनी माँ के घर और तब उसे नज़र आती है ये दुनिया, इस दुनिया के कष्ट और इस दुनिया की भयावहता और तब उस नन्ही सी उम्र मे उसे समझ आ जाती है ये दुनिया और जिंदगी की किताब.

ऐसा नहीं की गुलज़ार ने सिर्फ रिश्तों को ही समझा और समझाया बल्कि उन्हें व्यक्ति के मन की और समाज के मन की दोनों की पहचान थी, समाज का मन व्यक्ति के मन को किस तरह प्रभावित करता है इसका उदहारण है हू तू तू  और माचिस  जिसमें जहां नायक नयिका साज द्वारा उत्पन्न की गयी परिस्थितियों से उद्वेलित हो कर एक अलग ही कदम उठा लेते हैं और दूसरी तरफ राजनीति( जिसका कोई मन नहीं होता) के गहरे दांव पेंचो भी को समझाया है गुलज़ार साब ने  हू तू तू और  आंधी मे.

माचिस तो उनके लिए उनकी जन्भूमि पंजाब का कर्ज उतारने जैसा है (हालाँकि जन्भूमि का क़र्ज़ कभी उतर नहीं सकता) जहां के आतंकवाद को नायक के मन मे बैठ कर गुलज़ार खुद देखते हैं

गुलज़ार ने अपनी फिल्मों मे फ्लैश बैक का जैसा इस्तेमाल किया है वैसा शायद ही कहीं और किसी की निर्देशक की फिल्म मे दिखता हुआ गुलज़ार की फ़िल्में स्वस्थ होती हैं दूध की तरह और फ्लैश बैक उनमे ऐसा है जैसे केसर डाल दिया गया हो, फ़िल्म का स्वाद ही दोगुना कर देते हैं गुलज़ार इसका इस्तेमाल कर के.

गुलज़ार ने एक निर्देशक के अलावा पटकथा लेखक और संवाद लेखक के तौर पर भी काम किया है हृषिकेश मुखर्जी जैसे निर्देशक की फिल्मों को अलग ही रंग देते थे इनके संवाद. साथिया फिल्म मे भी गुलज़ार के ही संवाद थे जिसमे इनके सेन्स ऑफ ह्यूमर की झलक साफ़ दिखती है.

किसी फिल्म से गुलज़ार जुड़े हों तो उनका प्रभाव साफ़ झलकता है, एक गुलजाराना महक आती रहती है और ये एक ऐसा स्पेशल इफेक्ट है जो सिर्फ उन्ही के होने से मिल सकता है.

- स्वप्निल तिवारी 

15 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया लिखा है। जिन फिल्मों का आपने जिक्र किया उनमें से ज्यादातर देख चुका हूं....इत्तफाक और इजाजत देखने की इच्छा मन में जग गई है। देखें कब पूरी होती है।

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  2. बढ़िया रचना





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  3. गुलजार का प्रभाव स्पष्ट दिखता है।

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  4. GULZAAR ...JIS BHI VIDHAA KO CHHOO LE WO SONA HO JATA HAI

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  5. बात को कहने का जो सलीका गुलज़ार साहब के पास है ....वही उनका सिग्नेचर है...मेरे अपने ओर इत्तेफाक में उन्होंने विनोद खन्ना को हीरो की इमेज दी ......गर गौर से देखे तो खुशबू में जीतेन्दर का गेट अप गुलज़ार साहब का ही था ...उनकी फिल्मे रिश्तो को टटोलती ओर सहेजती है ...बिना किसी विलेन के ....बिना किसी समय सीमा से बंधे वे आज भी प्रासंगिक है ....किनारा के सोंग ...".तूने साडी में उरस ली है चाभिया घर की ".रोमांस की हदों को छूता गाना है ...कहानी कमर्शियल एस्पेक्ट बनाये रखे हुए भी अपनी आत्मा नहीं खोती है ....
    "नमकीन" का ड्राइवर कैसे एक घर के रिश्तो से बंध जाता है .कैसे घर की तीन लडकिया हालातो से अपने अपने स्तर पर जूझती है ...उनकी फिल्मो में वक़्त भी एक किरदार है अक्सर विलेन सा........
    अंगूर में उन्होंने कोमेडी की नयी ऊंचाई दी ओर साबित किया के एक अच्छा निर्देशक सिनेमा की दूसरी विधायो ...दूसरी गेलरियो में भी .मुकम्मल है .....
    हु तू तू .....में अलबत्ता वे अपने स्टाइल में नहीं दिखे ......
    बच्चो के लिए फिल्म बनाने वाले गुलज़ार साहब शायद अकेले निर्देशक है ..उन्होंने उस दौर में "किताब "बनायीं .....जब उनका एक मक़ाम था वे किसी भी सब्जेक्ट पर फिल्म बना सकते थे पर उन्होंने अपनी मर्जी से इसे चुना........दरअसल हम नये सिनेमा ओर बोल्डनेस पर रीझ तो जाते है पर ये भूल जाते है के किसी भी सिनेमाई निर्देशक की एक अलिखित जिम्मेवारी होती है समाज के प्रति .....समाज को एक विजन देने की ......उसे वो सोच देने की ...जो उसकी बेहतरी के लिए हो.....सिर्फ गाली को सिनेमा में इंट्रो ड्यूस करना साहसी सिनेमा नहीं है ....साहसी सिनेमा है बाज़ार की परवाह किये बगैर एक अच्छी कहानी देना ....

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  6. अचानक का नायक बिमारी से नही मर रहा होता है पत्नी की हत्या के बाद उसकी इच्छा -मंगलसूत्र को नदी में (शायद गंगा में) प्रवाहित करने के लिए पुलिस से बच कर भागता है और पुलिस की गोली का शिकार हो जाता है जो उसके सिर पर लगती है. गुलज़ार जी की मीरा एक असफल मगर बहुत प्यारी फिल्म थी.
    परिचय,खुशबु,किनारा कई है अभी नाम याद नही.मगर मैं गुलज़ार जी का मात्र नाम पढ़ कर फिल्म देखने चली जाती थी.
    ऐसिच हूँ मैं तो. हा हा हाEdit8:01 pm

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  7. ...बढ़िया पोस्ट। डा0 अनुराग का कमेंट भी बढ़िया।

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  8. @Indu ji...
    Bahut bachpan me dekhi thi film...baad me kaheen mili nahi..lagta hai fir dhundhna padega...shukriya udhar dhyan dilane ke liye...lekin meri kahani b koi buri ni thi..hehehe.. :-P

    @dr. Anurag
    aapki tippadi to humesha aisi post pe sanjeevni ka kaam karti hai...aabhar kuch aur baaton ki taraf dhyan dilane ke liye...

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  9. @ किनारा के सोंग ...".तूने साडी में उरस ली है चाभिया घर की

    Thanks अनुराग जी, इतनी सुन्दर पंक्तियों की जानकारी देने के लिये, जल्द ही ये फिल्म देखूंगा :)

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  10. gulzar ek swapndarshi filmmaker haiN. samajik tane-wane ko unhoNne apni filmoN me bakhubi dikhaya he. ijazat our machis do alag alag tarah ki film haiN lekin donoN hi insani kasmakas ko dikhati he, ek andaruni to dusri bahri saMbandhoN ka byan he.

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  11. शानदार... आपका लेख भी ...

    और गुलजार साहब भी...

    अच्छा नजरिया दिया है आपने..
    अब ये सारी फिल्मे दुबारा देखने का मन हो आया है

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  12. इनके बारे में कितनी बातें हमने बैठ कर की हैं.. गुलज़ार नाम है एक एहसास का.. बयान करने चलो तो एहसास बासी लगने लगते हैं..

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  13. गुलज़ार...बस नाम ही मुकम्मल है. कोई और क्या कहे...

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  14. गुलजार की इन फिल्मो में मैंने किताब नहीं देखी है | मेरे अपने से लेकर हु तू तू तक काफी फिल्मे देखी है | उनसकी पकड़ जीतनी मानवीय रिस्तो पर है उतनी ही सामाजिक और राजनितिक स्थिति पर भी | किनारा फिल्म का वो गाना " तूने साडी में उरस ली है चाभिया घर की " में गाने से पहले धर्मेन्द्र यही कहते है की वो किसी भी बात को गाने में कह सकते है | गुलजार की फिल्मो को संवाद ऐसे होते है जो सुन कर ये नहीं लगता की किसी फिल्म की डायलाग बजी सुन रहे है वो इतनी वास्तविक और सहज होती है की कभी कभी लगता है की ये संवाद किरदार नहीं हम बोल रहे है हम होते तो यही करते या बोलते | गुलजार पर लेख पढ़ कर अच्छा लगा हमें भी उनकी अगली फिल्म का इतजार है और यहाँ पर गुलजार के इतने प्रसंसको को देख कर अच्छा लगा |

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  15. पोस्ट की अंतिम लाइन शानदार है पूरे पोस्ट की बात को खूबसूरती से क्न्क्लुद करती है
    बहुत बढ़िया लिखा है

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