10 मार्च 2011

हिन्दी साहित्य में वीरबालकवाद - 5

मनोहरश्याम जोशी

किसी छोटे या बड़े नेता,किसी छोटे या बड़े सेठ की कृपा से किसी गद्दी पर आसीन साहित्यिक सामन्त वीरबालक का जलवा देखना हो तो उसके साथ कभी दौरे पर निकलिए। जहां जाइएगा स्टेशन या हवाईअड्डे पर स्थानिक वीरबालकों की सलामी गारद अटेंशन में पाइएगा। उसका स्थानिक मन-सबदार उसे हार पहनाएगा और वेरी इम्पोर्टेन्ट वयोवृद्ध वीरबालक वी. आई.वी. वी. की चरण रज अपने माथे लगाएगा। फिर अपने यहां के सबसे बड़े नेता,सेठ या अधिकारी की कार में वी.आई.वी.वी. को अपने यहां के सबसे बढ़िया होटल या सरकारी विश्राम गृह में ले जाइएगा जहां कार-दाता एक और सलामी-गारद,एक और हार के साथ प्रस्तुत होगा। सलामी की रस्म पूरी हो जाने के बाद कारदात अपना स्काचदाता रूप दिखाते हुए एक बोतल सेवा में प्रस्तुत करेगा। जो सभा होगी उसमें वी.आई.वी.वी अपनी वीरता और शत्रुओं की कायरता का बखान करके स्थानीय वीरबालकों की दाद पाएगा और स्थानीक साहित्यकारों के वीरबालकवादी तेवरों पर स्वयं दाद देगा। साहित्य चर्चा अन्तर्गत इतना ही होगा कि स्थानिक वीरबालक वी.आई.वी.वी. को अपनी कोई पुस्तक थमाते जाएंगे कि सर पढ़कर दो शब्द लिखने की कृपा करें। सर प्रोत्साहन के दो शब्द वहीं बगैर पढ़े कह डालेंगे और दिनभर में मिली कई किलो रद्दी स्थानीक मनसबदार के लिए छोड़ आएंगे।

वी.आई.वी.वी. तरूण वीरबालकों को यह नेक सीख दे जाता है कि अच्छा साहित्यकार होने के लिए अच्छा वीरबालक होना जरूरी है,कुछ अच्छा पढ़ना या लिखना नहीं। जहां तक हो सके लिखो ही मत। लिखो तो अच्छा मत लिखो क्योंकि रूपवादी समझ लिए जाओगे। और देखो तुम्हें लिखने के जिद ही हो तो ऐसी छोटी-मोटी कविताएं लिखे जिनकी तारीफ में मित्र आलोचक जितना भी कहें वो कम हो लेकिन जिनके बारे में इतना कहना ही काफी हो कि याद न रखी जा सकने के मामले में ये सर्वथा यादगार है। ऐसी कविताएं लिखने में समय कम लगता है और संग्रह जल्दी तैयार हो जाता है। संग्रह पढ़ने में भी ज्यादा समय नहीं लगता। उपन्यास लिखोगे तो सभी वीरबालक लोकार्पण गोष्ठी में बिना पढ़े ही पहुंच जाएंगे। लेकिन दि बेस्ट तो यह है कि कुछ भी मत लिखो। बस विवादस्पद वक्तव्य, साक्षात्कार देते रहो। इस बात को समझो कि वीरबालकों के साहित्य-दरबार में राजा इन्द्र का रोल ऐसे रिवोल्युशनरी ऋषि को ही नसीब हो पाता है जो आसार-संसार में आकंठ लिप्त होते हुए भी साहित्य संसार में सन्यास ले चुका हो। अब लगे हाथों कुछ बातें वीरबालकवाद के ऋषि पक्ष के संदर्भ में भी कर ली जाए। सािहत्यिक हाजमा ठीक रखने के लिए सत्यम,शिवम,सुंदरम की डोज नियमित रूप से पीने और पिलाने वाले हमारे वीरबालकों का ऐसा विश्वास है कि ऋषिगण सुरा-सुंदरी और राजदरबार में मिलने वाले मान-सम्मान तीनों से सख्त बरतते आए हैं। सांसारिक भोग-विलास से यह परहेज ही उन्हें समाज की आंखों में राजा से ऊँचा स्थान दिलाता आया था। अब सुरा का ऐसा है कि उसका अविष्कार हुआ ही इस लिए की कतिपय कविमन किस्म के प्राणियों ने पाया कि नशे के अभाव में सही सुर लग नहीं पाता है। और सुंदरी का ऐसा है कि मानव जाति ने लंगोट का इजाद किया ही तब जब आमराय यह बनी कि जो मर्द बच्चा सो लंगोट कच्चा।

प्राचीन ऋषियों के बारे में मेरी जानकारी नहीं के बराबर है इसलिए मैं पंडित वागीश शुक्ल से पूछकर ही आपको बता सकूंगा कि वे सुरा और सुन्दरी से कितना परहेज बरतते थे। सम्भव है तब भी न बता पाऊँ क्योंकि प्राचीन भारत के बारे में किसी तरह की गड़बड़ बात बोलना निरापद नहीं है। दो नवीन ऋषियों उर्फ वीरबालकों में से ज्यादातर सुरा-सुन्दरी त्याग नहीं पा रहे हैं बेचारे। तो इस सन्दर्भ में सारा वीरबालकत्व यह सिद्ध करने में है कि मैं पीता भी हूं तो अपने पैसे की जबकि दूसरे मुफ्त की पीते हैं ? जी हाँ,और अगर कौनो जन बहुत पीछे पड़ जाए तो हमहु पी लेते हैं। इस सन्दर्भ में वयोवृद्ध वीरबालकों के बारे में तरुण वीरबालक दिलचस्प जानकारियां देते रहे हैं मुझे। जैसे यह कि उनमें से एक सुरा-प्रेमियों को दर्शन देने बहुधा आ जाते हैं लेकिन मधुशाला को उनसे एक कानी कौड़ी भी लेने का आज तक कष्ट नहीं उठाना पड़ा है। कलम का कोई भी मजदूर शराब पीने में अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई बरबाद नहीं कर सकता,अपना जिगर भले कर दे।

जहां तक सुन्दरियों का सम्बन्ध है कदाचित इतना ही कह देना पर्याप्त हो कि साहित्यकार होने के नाते वीरबालक में आरम्भ से ही उत्कट सौन्दर्यबोध रहता है और आयु के साथ-साथ उक्त सौन्दर्यबोध तीव्रतर होता चला जाता है। स्वाभाविक है कि जो सुन्दरियां युवा वीरबालक को माताएं-बहनें लगती रहीं थीं वे वृद्धावस्था में बेटियां प्रतीत होने लगती हैं। पूर्णाहुत से ठीक पहले या ठीक बाद के क्षण में। नितान्त प्रीतिकर रूप से पारिवारिक यह सौन्दर्यप्रियता वीरबालकों के ऋषिपद की सुरक्षा करती रहती हैं। अब ऐसा है कि वीरबालक ऋषि के साथ-साथ क्रान्तिकारी भी होते हैं और क्रान्तिकारी आप जानिए आधुनिक भी होता है और आधुनिकता के मारे आप जानिए कि जैनेन्द्र जी जैसे गांधीवादी लेखक तक को पत्नी के साथ-साथ प्रेमिका भी आवश्यक प्रतीत होने लगी थी। तो वीरबालक को क्रान्तिकारी रूप में एक ठो प्रेमिका भी अपेक्षित रहती है। बल्कि दो ठो क्योंकि अज्ञेय नदी के द्वीप में अपने साथ रेखा और गौरा दूनों को ले गए थे और सौन्दर्याबोध के क्षेत्र में अज्ञेय ही क्रान्तिकारियों के आदर्श हैं। वीरबालकवादी साहित्यकार अपने आसपास से जुड़ा रहता है इसलिए जोड़ीदार प्रेमिका को भी आस-पास से ही प्राप्त करना चाहता है। इसके चलते साहित्य-साधिका को ही प्रेमिका बनाने की परिपाटी चली आ रही है। आज वीरबालकवादी डींगें वीरबालकवादी ढोंग के अनुपात में ही इतनी बढ़ चली हैं कि अब हर साहित्य-साधिका किसी न किसी वीरबालक को प्रेमिका ठहरायी जा रही है। प्रतिपक्ष के वीरबालक हर सफल साहित्य-साधिका के विषय में यहां तक कहते सुने जाते हैं कि वह स्वयं नहीं लिखती,भले घर की औरतों को बिगाड़ने वाला अमुक लम्पट वीरबालक उसके लिए लिख दिया करता है। यह शंका करना अपनी मूर्खता का परिचय देना होगा कि अगर वह लम्पट-लंगोट-लुच्चा इतना अच्छा लिख सकता है तो अपने नाम से ही क्यों नहीं लिख लेता ?

वीरबालक अपनी प्रेमिका का इस अर्थ में भी संरक्षक होता है कि वह उस पर दूसरों की बुरी नजर नहीं पड़ने देता। एक साहित्य-सभा के बाद चाय-पान के दौरान मैं अपना परिपक्व सौन्दर्याबोध एक नवोदिता पर आजमाने लगा तो एक वयोवृद्ध वीरबालक विशेष मुझे बाँह पकड़कर एकान्त में ले गए और उन्होंने फुसफुसाकर मुझसे कहा कि अइसा है ये बहुत ही सम्भ्रांत घर की महिला हैं और इनसे हमारा पारिवारिक सा सम्बन्ध रहा है। आप इनसे कुछ इस टाइप....आप समझ रहे हैं ना ? अब इतना नासमझ तो बन्धुवर मैं भी नहीं हूँ। इधर कुछ अन्य वीरबालक जो कोई ओर क्रान्तिकारी चीज लिखने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं,अपनी प्रेम-लीलाओं का सार्वजनिक स्वीकार करके अपनी वीरता का प्रमाण दे रहे हैं। सिद्ध कर रहे हैं कि भले ही वे अपने आराध्य पश्चिमी लेखकों जैसा कुछ रच न सके हों प्रेमिकाएं अपनाने-छोड़ने के मामले में उनसे कभी पीछे नहीं रहे हैं।
जारी...

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