11 मार्च 2011

हिन्दी साहित्य में वीरबालकवाद - 6

ऋषि-ग्रन्थि के अन्तर्गत वीरबालक बिरादरी में राजाश्रय और सेठाश्रय दोनों बड़ी घटिया किस्म की चीजें मानी जाती है। इसीलिए वीरबालक अपने लिए एक ठो स्टैंडर्ड बायोग्राफी गढ़ चुका होता है। मामूली हैसियकत वाले परिवार में जन्म,संघर्षरत माता अथवा पिता अथवा दोनों से प्रेरणा प्राप्त,निर्दय समाज से निर्भीक टक्कर,प्रलोभन ठुकरा क्रान्ति पथ पर अग्रसर,सीकरी को ठेंगा दिखाने के दंड-स्वरूप मान-सम्मान से वंचित,तिकड़मबाजों द्वारा उपेक्षित किन्तु आश्वस्त कि हिस्ट्री बोलेगी ही वाज सिम्पली ग्रेट बट हिस्ट्री की डिफिकल्टी यह है कि वह ससुरी मरणोपरान्त शुरू होगी। तो वीरबालक दारू से महकती एक आह भरकर कहता है अपने से और अपनों से कि 'अइसे तो हम निराला,मुक्तिबोध की तरह अनचीन्हे मर जावेंगे' इसलिए नौकरी-वौकरी करनी पड़ जाती है और अपना स्थान बानने के लिए भी संघर्षरत रहना पड़ता है।

बता ही चुका हूँ कि वीरबालक-बिरादरी में यह माना जाता है कि दूसरों को नौकरी भ्रष्ट विचारधारा और उत्कृष्ट चमचागीरी के कारण मिली है। इसमें इतना और जोड़ना आवश्यक है कि इस बिरादरी में अगर किसी की कुर्सी जाती है तो वह यही कहता है कि मुझे अपनी क्रान्तिकारी विचारधारा के कारण प्रतिक्रियावादी प्रतिष्ठान ने पद से हटाया। खैर इतना निर्विवाद है कि वीरबालक नौकरी सरकार की कर रहे हों या सेठ की वे सच्चे सेवक क्रान्ति के ही होते हैं। जैसा कि सरकारी नौकरी वाले एक नवोदित वीरबालक ने भरी सभा में मुझे 'सिनिसिज्म' के लिए लताड़ते हुए घोषणा की थी,जैसे तुलसी ने राम की चपरास गले में डाल ली थी वैसे हमने क्रान्ति की चपरास गले में डाल ली है। गोया वीरबालक राज हो या सेठ के दिए कपड़े भले ही पहन ले नीचे क्रान्ति की कोई जनेऊनुमा चपरास बराबर डाले रहते हैं कि नौकरी जाते ही कपड़े उतार के उसे दिखा दें।

राजाश्रय या सेठाश्रय की अनिवार्यता से तिलमिलाते वीरबालक फिर एक क्रान्तिकारी स्थापना यह करते हैं कि हमें साहित्य में सेठों और नेताओं की घुसपैठ स्वीकार नहीं करनी चाहिए। अस्तु,न सरकारों और सेठों के दिए पुरस्कार ग्रहण किए जाएं और न ऐसे किसी साहित्यिक आयोजन में सम्मिलित हुआ जाए जिसमें किसी मन्त्री या सेठ को बुलाया जा रहा हो। लेकिन इसमें भी कुछ व्यावहारिक दिक्कतें आ जाती हैं। जैसे यह कि नेता न आए तो टी.वी. कवरेज नहीं होता,और तमाम जिस चीज का टी . वी. में कवरेज न हुआ हो वह न हुई मान ली जाती है। पुरस्कारों का ऐसा है कि सरकारों या सेठों द्वारा ही दिए जाते हैं। उन्हें ग्रहण न किया जाए तो बेटी की शादी से लेकर फ्लैट की खरीद तक कई काम अटके रह जाते हैं और कायदे का बायोडाटा भी नहीं बन पाता। 'अस्तु,लेने ही पड़ जाते हैं बन्धू।' और फिर आप यह भी तो समझिए ना कि अगर कौनो बड़का मन्त्री या कैपिटलिस्टुआ हमको सम्मानित करे के बदे आता है तब हमारा अस्टेटस उससे हाई ही न कहा जाएगा ?

इसके बाद ले-देकर यह बचता है कि साधारण साहित्यिक आयोजन में नेता या सेठ न बुलाए जाएं। महमूर्ख किस्म के लोग ही यह शंका कर सकते हैं कि जब वीरबालकों कोनेताअें के दरबार में स्वयं हाजिरी लगाते कोई आपत्ति नहीं होती तब साहित्य के दरबार में उनकीउपस्थित से इतना कष्ट क्यों होता है। हमारे वीरबालक सिद्धान्तवादी है। इसलिए उनके तमाम विरोध सैद्धान्तिक स्तर पर ही होते आए हैं,व्यावहारिक स्तर पर नहीं। सुनता हूँ कि एक वीरबालक अपने घनिष्ठ मित्र और संरक्षक छोटा सेठ से कहा,"भाई मेरे बुरा मत मानियो सिद्धान्त का मामला है आज मैं भरी सभा में तेरा जौत्य-कर्म करूँगा।" इस पर छोटा सेठ ने कहा, "कर लियो भई लेकिन मीटिंग के बाद मन्त्री जी से मेरा सौदा जरूर करवा दीयो।" इस तरह के तमाम दिलचस्प किस्से मुझे नवोदित वीरबालकों के मुँह से सुनने को मिलते रहते हैं क्योंकि अब मैं वीरबालक बिरादरी में स्वयं ज्यादा चलायमान नहीं रह गया हूँ।

तरूण वीरबालकों के कई किस्से सुनकर अपने कानों पर विश्वास नहीं होता और यही प्रमाणित होता है कि हमारे नेताओं की तरह साहित्यिक मठाधीशों ने भी ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें सब एक-दूसरे को और जाहिर है कि अपने को भी चोर मान रहे हैं। तरूण वीरबालक अधेड़ और वयोवृद्ध वीरबालकों की अनैतिकता,चाटुकारिता,भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के किस्से सुनाते जाते हैं और बेसब्री से मुझ वयोवृद्ध वीरबालक की किसी टिप्पणी की प्रतिक्षा करते हैं कि जाके सम्बद्ध व्यक्ति को सुना आए। मैं अपनी जबान को भरसक लगाम देता हूँ लेकिन मैं जानता हूँ कि चुप रहने से भी वीरबालक बिरादरी में कोई बात बनती नहीं है क्योंकि आपके मुँह से निकला कोई-न-कोई उद्गार सुविधानुसार गढ़ लिया जा सकता है। मुझे आश्चर्य होता है कि तरुण वीरबालक आकर कभी कोई साहित्यिक चर्चा नहीं करते। उनकी सारी बातचीत साहित्यिकार चर्चा को समर्पित रहती है। वह यही बताना चाहते हैं कि किसको जमाने-उखाड़ने के सिलसिले में वयोवृद्ध वीरबालकों में क्या सौदेबाजी हुई है।

उनके अनुसार कभी-कभी ये सौदे साहित्य के दायरे तक सीमित होते हैं जैसे यह कि वीरबालक 'ए' ने वीरबालक 'बी'' के लेखन की पहली बार निन्दा की जगह प्रशंसा इसलिए की है कि वीरबालक बी ने वीरबालक 'ए' के विवादास्पद व्यक्तव्य के समर्थन में कुछ लिख दिया है। लेकिन अकसर ये सौदे अहोरूपम अहो ध्वनि के दायरे से बाहर होते हैं। प्रशंसा की कीमत कैश या कांइड में वसूल की जाती है। तरुण वीरबालक आते हैं और आश्चर्य करते हैं कि सर क्या आपको इतना भी नहीं पता कि अलाँ ने फलाँ को अपने खर्चे से विदेश यात्रा करायी है। अलाँ को तो फलाँ ने अपनी मिस्ट्रेस बना लिया है। अलाँ ने फलाँ के लिए उसकी कृति के विदेश अनुवाद किए जाने का या उसे विदेश में कोई फेलोशिप मिल जाने का जुगाड़ करवा दिया है। यह विदेश वाली बात तरुण वीरबालकों की चर्चा में अक्सर आ जाती है।
जारी...

2 टिप्‍पणियां:

  1. आनन्द बह रहा है, हम लूटने में लगे हैं।

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  2. ऋषी ग्रंथी दिखते नहीं लगता है जोशी जी के साथ चले गये। अब तो अक्सर अर्थ ग्रंथी ही वीर बालकों का ढाढस बढ़ाते दिख जाते हैं..सब चलता है।
    ...मेरी तरह सभी वीर बालकों को खूब आनंद आ रहा होगा पढ़कर।

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