31 मार्च 2011

मुझे जिन्दा रखो कि मैं आत्मा हूँ तुम्हारी

मुझे जिन्दा रखो कि मैं आत्मा हूँ तुम्हारी
मुझे मत मरने दो कि मैं जिन्दा रखूंगी
तुम्हारे गीत, तुम्हारे शब्द, तुम्हारी सार्थकता

जब तुम बाज़ार में बिक जाओगे
कौड़ियों के मोल
नंगा हो जायेगा तुम्हारा शरीर
बह जायेगा तुम्हारा गेहूवां रंग
रेत बन कर तमाशे में सरेआम
तब भी जगा कर रखूंगी तुम्हारा गर्व
बचा कर रखूंगी थोड़ी सी लाज

जब अँधेरी रात में बुझ जायेंगे सारे दीये
भय का घुन खुरच खुरच कर खा जायेगा
तुम्हारा साहस, तुम्हारा धैर्य
तब भी बचा कर रखूंगी
तुम्हारे आँखों के कोवो में कुछ स्वप्न-बूँद

जब आँखों में तुम्हारे छा जाएगी
घमंड की चरबी
ईर्ष्या की झांयीं मार देगी टोना
तब दिखाउंगी तुम्हारे इतिहास का दर्पण
आँखों में झांक कर बताउंगी मैं
कि कैसे रेंगते थे तुम भी कभी पनीले काली नालियों में
कि कैसे किसी अँधेरी सुबह
चुपचाप दबे पाँव तुमने
दफना दिये थे अपने गंदले कपड़े
कि कैसे बंद कमरों में भीख मंगाते थे तुम दांत निपोरकर
तब मैं बचा कर रखूंगी थोड़ी सी प्यास
तुम्हारे आँखों के नमकीन पानी की खातिर

नाम की भूख में जब तिल तिल कर जलेगा तुम्हारा विवेक
सोने-चांदी जब हिला देंगे तुम्हारा ईमान
देह की आग जला देगी तुम्हारा संचित ज्ञान,
जब गल जाएगी तुम्हारी लौह प्रतिज्ञाएँ
मैं रोक दूंगी तुम्हें
पकड़ लूंगी तुम्हारी कलाई
पैरों में गिर कर लिपट जाउंगी
आँचल फैला कर मांग लूंगी सच की भीख, उसे कहने का साहस

जब अहम् तुम्हारा ठुकरा देगा
किसी अज्ञात प्रेम की छोटी सी याचना
और फिर उसकी ठंढी ग्लानि में
रो पड़ेगा तुम्हारा दर्प
तब भी जिन्दा रहूंगी मैं बन कर एक मीठी सी खलिश
मैं जिन्दा रखूंगी वह ताजी पुलक

समाज जब नोच लेगा सारे कीर्ति-रोम
जब शीशे के अन्दर बर्फ के फाहों में हजारों साल बाद गल जाएगी तुम्हारी देह
मिट्टी में दफ़न हो जायेंगे तुम्हारे लाव-लश्कर
समय के साथ जब झड़ जायेंगे
तुम्हारी कविताओं के अर्थ
तब भी

मैं भटकती रहूंगी अनीह, निस्पृह, अनिरुद्ध
बचा कर रखूंगी उनकी मर्यादा
ढोउंगी उनके सघन अंतर्द्वंद्व
जगाये रखूंगी उनका संशय
संजो कर रखूंगी उनके शाश्वत प्रश्न

मुझे जिन्दा रखो कि मैं आत्मा हूँ तुम्हारी
मैं नहीं मरने दूंगी तुम्हारा पौरुष
कि मैं जिन्दा रखूंगी उसकी विराट कल्पना.

- दीपांकर

8 टिप्‍पणियां:

  1. जब अहम् तुम्हारा ठुकरा देगा
    किसी अज्ञात प्रेम की छोटी सी याचना
    और फिर उसकी ठंढी ग्लानि में
    रो पड़ेगा तुम्हारा दर्प
    तब भी जिन्दा रहूंगी मैं बन कर एक मीठी सी खलिश
    मैं जिन्दा रखूंगी वह ताजी पुलक...

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  2. प्रिय दीपांकर जी
    आपकी रचना को मैंने पुरे दिल से पढ़ा बहुत ही लाजवाब रचना है और इसमें प्रयुक्त शब्द की तो कोई जोड़ ही नही है| वाकई में मजा आ गया|
    ------------------------------------------------
    यहाँ भी आयें|
    आपकी टिपण्णी से मुझे साहश और उत्साह मिलता है|
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  3. आत्मा को जिन्दा रखने का सुख शेष अन्य सुखों से अधिक आत्मीय है। बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति।

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  4. मैं जिन्दा रखूंगी उसकी विराट कल्पना.

    jai baba banaras..

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  5. बहुत ही खूबसूरत..कविता मुझे वही अच्छी लगती है जो लगे मानो मेरे मुंह से लफ्ज़ छीन लिए हों, और यह एक ऐसी ही कविता है..

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  6. 'समाज जब नोच लेगा सारे कीर्ति-रोम
    जब शीशे के अन्दर बर्फ के फाहों में हजारों साल बाद गल जाएगी तुम्हारी देह
    मिट्टी में दफ़न हो जायेंगे तुम्हारे लाव-लश्कर
    समय के साथ जब झड़ जायेंगे
    तुम्हारी कविताओं के अर्थ
    तब भी'
    बेहतरीन कविता , दिल और दिमाग दोनों को स्पर्श किया

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  7. दीपांकर ji maine aapko pda aur samja ki aatma aur insan ka kya rista hai...bahut acchi kavita ...
    sabdo main tej hai ...

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