4 अप्रैल 2011

मेहनत का सार


एक बार भोले शंकर ने दुनिया पर बड़ा भारी कोप किया पार्वती को साक्छी बनाकर संकल्प किया कि जब तक यह दुष्ट दुनिया सुधरेगी नहीं, तब तक शंख नहीं बजाएँगे शंकर भगवान शंख बजाएँ तो बरसात हो

अकाल-दर-अकाल पड़े पानी की बूँद तक नहीं बरसी न किसी राजा के क्लेश व सन्ताप की सीमा रही न किसी रंक दुनिया में त्राहिमाम-त्राहिमाम मच गया लोगों ने मुँह में तिनका दबाकर खूब ही प्रायश्चित किया, पर महादेव अपने प्रण से तनिक भी नहीं डिगे

संजोग की बात ऐसी बनी की एक दफ़ा शंकर-पार्वती गगन में उड़ते जा रहे थे उन्होंने एक अजीब ही दृश्य देखा कि एक किसान भरी दोपहरी जलती धूप में खेत कि जुताई कर रहा है पसीने में सराबोर, मगर आपनी धुन में मगन जमीन पत्थर की तरह सख्त हो गयी थी

फिर भी वह जी जोड़ मेहनत कर रहा था, जैसे कल-परसों ही बारिश हुई हो उसकी आँखों और उसके पसीने की बूंदों से ऐसी ही आशा चू रही थी भोले शंकर को बड़ा आश्चर्य हुआ कि पानी बरसे तो बरस बीते, तब यह मूर्ख क्या पागलपन कर रहा है

शंकर पार्वती विमान से नीचे उतरे उससे पूछा," अरे बावले! क्यूं बेकार कष्ट उठा रहा है? सूखी धरती में केवल पसीने बहाने से ही खेती नहीं होती बरसात का तो अब सपना भी दूभर है"

किसान ने एक बार आँख उठा कर उनकी और देखा,और फिर हल चलाते-चलाते ही जवाब दिया," हाँ बिलकुल ठीक कह रहे हैं आपमगर हल चलने का हुनर भूल न जाऊँ, इसलिए मैं हर साल इसी तरह पूरी लगन के साथ जुताई करता हूँ जुताई करना भूल गया तो केवल वर्षा से ही गरज सरेगी ! मेरी मेहनत का अपना आनंद भी तो है फ़कत लोभ की खातिर हीं मैं खेती नहीं करता "

किसान के ये बोल कलेजे को पार करते हुए शंकर भगवान के मन में ठेठ गहरे बिंध गए सोचने लगे," मुझे भी शंख बजाये बरस बीत गए कहीं शंख बजाना भूल तो नहीं गया! बस,उससे आगे सोचने कि जरुरत ही उन्हें नहीं थी खेत में खड़े-खड़े ही झोली से शंख निकला और जोर से फूंका चारो और घटायें उमड़ पडी- मतवाले हाथिओं के सामान  आकाश में गडगडाहट पर गडगडाहट गूँजने लगी और बेशुमार पानी बरसा- बेशुमार जिसके स्वागत में किसान के पसीने की बूँदें पहले ही खेत में मौजूद थीं

-विजयदान देथा

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर कथा. मुझे पता नहीं था की यह विजयदान देथा जी की है.
    मैं इसे अपने ब्लौग पर लगाना चाहूँगा.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. बड़ी सुन्दर कथा, हमें अपना कार्य करना कभी नहीं छोड़ना चाहिये।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. प्रियवर
    बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने सचमुच
    लगन से की हुई मेहनत बेकार नही होती |
    और कोशिस करने वालों की कभी हर नही होती ||
    सधन्यवाद |
    WWW.akashsingh307.blogspot.com

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. हमें भी लिखते रहना चाहिए। कभी न कभी माँ सरस्वती कृपा करेंगी ही। वीणा के तार जब बजेंगे तो सुनने लायक ह्रदय तो शेष रहे।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. मुझे भी नहीं पता था कि ये कहानी विजयदान देता जी की है.. बहुत सुन्दर

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  6. @कुश जी! यह लोककथा है, विजयदान जी की कथाओं में अधिकांश लोककथायें ही हैं।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं