31 जुलाई को प्रेमचंद का जन्मदिन होता है. पिछले कई-कई सालों से इसी दिन प्रेमचंद द्वारा स्थापित पत्रिका हंस का वार्षिक दिवस मनाया जाता है. इस दिन होने वाले कार्यक्रम में भारी संख्या में साहित्य-प्रेमी जुटते हैं. कल भी ३१ जुलाई थी,प्रेमचंद का जन्मदिन था,हंस का वार्षिक कार्यक्रम था और लोग भी जुटे थे.
इस बार हंस का कार्यक्रम थोड़ा खास था. १९८६ से राजेंद्र यादव के संपादन में हंस फिर से निकलना शुरू हुआ है. २०११ में इसने अपने नए जीवन के २५ साल पूरे किये. इसलिए यह कार्यक्रम पिछले सालों में हुए हंस के सालाना जलसों से अलग था. कार्यक्रम को लेकर लोगों की उम्मीदें भी अलग थीं. सभी के मन में कौतुहल था कि, हंस अपनी रजत जयंती कैसे मनाता है ? सभी को जिज्ञासा थी कि इस अवसर पर मुख्य एवं एकमात्र वक्ता के रूप में नामवर सिंह क्या बोलेंगे ?
(पाठकों को ध्यान रहे, दो साल पहले हंस के वार्षिक कार्यक्रम में नामवर जी ने हंस के गिरते स्तर और कुपात्रों को प्रश्रय देने के लिए राजेंद्र यादव की कड़ी आलोचना की थी.)
कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही ऐवाने-ग़ालिब सभागार भरा हुआ था. लोगों की उम्मीदें शबाब पर थीं. कार्यक्रम के संचालक के रूप में अजय नावरिया नामक सज्जन मंच पर आए. कार्यक्रम शुरू हुआ.
(नावरिया का एक ही बौद्धिक करतब अब तक हमारी आँख से गुजरा है. इन्होंने ने हंस के युवा विशेषांक का संपादन(बड़ा ही भद्दा) किया था. सुना है कि कहानी-वहानी भी लिखते-विखते हैं. खैर...इन सज्जन को दो बरस पहले नामवर जी ने लबे-मंच भरे सभागर में काफी लताड़ा था. नामवर जी ने जिन कुपात्रों पर कुपित थे उनमें नावरिया सर्वप्रमुख थे)
नावरिया के मंच पर आने के साथ ही हंस के कार्यक्रम की गत बिगड़नी शुरू हो गई. अपने भौंडे मंच-संचालन से नावरिया ने श्रोताओं को इतना अधिक पका दिया कि लोग उनके खिलाफ हूटिंग करने लगे. और अंत में जब नामवर जी बोलने की घोषणा करने के नाम पर नावरिया सस्ती-चापलूस बयानबाजी करने लगे तो लोगों ने सामूहिक रूप से हूटिंग कर दी की. चलो किनारे हटो, नामवर को बोलने दो !
(नावरिया का एक ही बौद्धिक करतब अब तक हमारी आँख से गुजरा है. इन्होंने ने हंस के युवा विशेषांक का संपादन(बड़ा ही भद्दा) किया था. सुना है कि कहानी-वहानी भी लिखते-विखते हैं. खैर...इन सज्जन को दो बरस पहले नामवर जी ने लबे-मंच भरे सभागर में काफी लताड़ा था. नामवर जी ने जिन कुपात्रों पर कुपित थे उनमें नावरिया सर्वप्रमुख थे)
नावरिया के मंच पर आने के साथ ही हंस के कार्यक्रम की गत बिगड़नी शुरू हो गई. अपने भौंडे मंच-संचालन से नावरिया ने श्रोताओं को इतना अधिक पका दिया कि लोग उनके खिलाफ हूटिंग करने लगे. और अंत में जब नामवर जी बोलने की घोषणा करने के नाम पर नावरिया सस्ती-चापलूस बयानबाजी करने लगे तो लोगों ने सामूहिक रूप से हूटिंग कर दी की. चलो किनारे हटो, नामवर को बोलने दो !
(जाहिर है, कुपात्रों को प्रमोट न करने की जो सलाह नामवर जी ने दो साल पहले राजेंद्र जी को दी थी,उसे राजेंद्र जी ने अनसुना कर दिया था. जिसका नतीजा कल हंस को भुगतना पड़ा ! )
नावरिया बतौर संचालक कार्यक्रम के अंत तक मंच पर मौजूद रहे. यह जानने के बाद पाठकों को अंदाजा लग गया होगा कि हंस के रजत जयंती जलसे का लब्बोलुआब क्या था. इस निराशाजनक कार्यक्रम में कुछेक चीजें सुखद भी रहीं. जिनसे श्रोताओं को थोड़ा सुकून मिला होगा कि चलो, यहाँ तक आना पूरी तरह बर्बाद नही गया...
हंस ने इस अवसर पर हंस से जुड़े सभी लोगों को सम्मानित किया. इन सम्मानित लोगों में हंस कि परिकल्पना में सहयोगी रहे बहुत पुराने साथी,ढाई दशकों से हंस के प्रकाशन को संभव बनाने वाले कर्मचारी और हंस के सम्पादकीय टीम से जुड़े रहे लोगों को सम्मानित किया गया. (सम्मान-सत्र में भी नावरिया ने हंस को जिल्लत ही बख्शी !, हो सकता है उन्होंने जो किया-धरा उसकी चिन्दियाँ आपको अन्य-ब्लॉग/वेबसाइट पर उड़ती मिल जाएँ )
जैसा कि रिवाज है नामवर जी कार्यक्रम के अंत में बोलने आए. और जैसी उम्मीद थी कि वो आज तो राजेंद्र जी की तारीफ करेंगे,उन्होंने की भी. नामवर जी ने अपनी चिरपरिचित अदा के अनुरूप अपनी बात शुरुआत इस संबोधन के साथ की "मेरे दुश्मन राजेंद्र और सभा में उपस्थित ......." (मेरे दुश्मन..सुनते ही हाल नामवर जी को अतिप्रिय करतल ध्वनि से गूँज उठा). इसके बाद नामवर जी ने खुद ही मंच पर वह सवाल सामने रखा जो और कई लोगों के मन में था, आखिर नामवर जी ही रजत जयंती पर एकमात्र वक्ता क्यूँ ?
ज्यादातर लोग इसे कार्यक्रम को हिट बनने कि फ़िराक से जोड़ रहे थे लेकिन नामवर जी इसके पीछे सर्वथा नवीन वजह खोज निकाली. (नामवर जी की खोजी द्रष्टि ! ). नामवर जी ने श्रोताओं को बताया कि यह अजब संयोग है कि राजेंद्र जी के जन्मदिन पर नामवर जी और राजेंद्र जी का आमना-सामना अक्सर हो ही जाता रहा है. चाहे वो कलकत्ता हो या केरल जन्मदिन पर दोनों (और शायद 'मय के प्याले' भी) 'टकरा' ही जाते हैं.
जन्मदिन कि 'टकराहटों' के बाद नामवर जी ने कलकत्ते में मन्नू-राजेंद्र परिवार के साथ बितायी नववर्ष संध्या को प्रफ्फुलित ढंग से याद किया. बकौल नामवर जी उनके जेएनयू आने और मन्नू जी-राजेंद्र जी के दिल्ली आने के बाद तो उनकी हर नववर्ष संध्या मन्नू-राजेंद्र निवास पर ही बीती है. (हालाँकि, नामवर जी के कथन से यह स्पष्ट नही हुआ कि क्या आजकल भी उनकी नए साल कि शाम वहीँ बितती है या कहीं और ...)
नामवर जी द्वारा जन्मदिन की तमाम शाम और नए साल की कई संध्याओं के जिक्र का मर्म तब खुला जब नामवर जी ने मन्नू-राजेंद्र परिवार से अपने ऐसे शाम-ओ-शाम के सम्बंध के आधार पर स्वयं को हंस के एक वृहत परिवार का अंग माना. और नामवर जी को लगा कि शायद यही वो वजह रही होगी कि राजेंद्र ने उन्हें हंस के रजत जयंती पर एक मात्र वक्ता चुना.
(नामवर जी को यह ध्यान नहीं रहा कि मन्नू जी भले ही तमाम शाम में नामवर,राजेंद्र एवं अन्य की साझीदार रही हों लेकिन हंस और राजेंद्र यादव ने मन्नू जी को हंस के परिवार का अंग नहीं माना. एक सज्जन (टीएम लालानी) जिन्हें कल हंस ने सम्मानित किया,उन्होंने अपने 'दो शब्दों' में कहा भी कि मन्नू जी भी इस अवसर पर सम्मान की हक़दार हैं.फिर भी... )
मित्रों, अवांतर प्रसंग होने के बावजूद कहना चाहूँगा कि कल जब लालानी जी ने कहा कि हंस कि परिकल्पना में मन्नू जी की भी भूमिका बनती है..मैं खुद ही अवाक रह गया. मैं ही क्या हाल में उपस्थित किसी भी व्यक्ति के दिमाग में शायद यह बात नही आई कि अरे मन्नू जी भी तो है ! राजेंद्र जी की कहानी में मन्नू जी का जिक्र आने पर मुझे उस बहेलिये की कहानी याद आती है जो रात को जंगल में फंस कर एक पेड़ के नीचे बैठा भूख से तड़प रहा था. पेड़ पर रहने वाले चिडे-चिड़िया से उसकी भूख देखी नही गई. उन्होंने ना जाने किसके बनाये नैतिक-धर्म का पालन करते हुए उस बहेलिये को अपना मेहमान (याद रखें,अतिथि देवो भव:) समझ उसकी भूख मिटने के लिए चिडे-चिडीया(यहाँ मन्नू लेखिका और मन्नू पत्नी ) ने अपने बच्चे (उनका बंटी) सहित आग में कूद कर जान दे दी. संभव है अपने मन के किसी गहरे कोने में मन्नू जी भी मानती रही होंगी कि पति परमेश्वरो भव: ! आखिरकार जिस देश के चिडे-चिड़िया इतने मर्यदाबद्ध हों वह कि स्त्री कि क्या बात करना !
मित्रों, अवांतर प्रसंग होने के बावजूद कहना चाहूँगा कि कल जब लालानी जी ने कहा कि हंस कि परिकल्पना में मन्नू जी की भी भूमिका बनती है..मैं खुद ही अवाक रह गया. मैं ही क्या हाल में उपस्थित किसी भी व्यक्ति के दिमाग में शायद यह बात नही आई कि अरे मन्नू जी भी तो है ! राजेंद्र जी की कहानी में मन्नू जी का जिक्र आने पर मुझे उस बहेलिये की कहानी याद आती है जो रात को जंगल में फंस कर एक पेड़ के नीचे बैठा भूख से तड़प रहा था. पेड़ पर रहने वाले चिडे-चिड़िया से उसकी भूख देखी नही गई. उन्होंने ना जाने किसके बनाये नैतिक-धर्म का पालन करते हुए उस बहेलिये को अपना मेहमान (याद रखें,अतिथि देवो भव:) समझ उसकी भूख मिटने के लिए चिडे-चिडीया(यहाँ मन्नू लेखिका और मन्नू पत्नी ) ने अपने बच्चे (उनका बंटी) सहित आग में कूद कर जान दे दी. संभव है अपने मन के किसी गहरे कोने में मन्नू जी भी मानती रही होंगी कि पति परमेश्वरो भव: ! आखिरकार जिस देश के चिडे-चिड़िया इतने मर्यदाबद्ध हों वह कि स्त्री कि क्या बात करना !
नामवर जी राजेंद्र यादव को दुश्मन का संबोधन देने और अपने मुख्या वक्ता होने के अलबेले औचित्यकरण के बाद इस बात पर कटाक्ष किया कि १९८६ में पुनर्जन्म पाने वाले हंस का रजत जयंती समारोह राजेंद्र यादव के रजत जयंती समारोह में बदल गया है. इन्हीं शब्दों के साथ नामवर जी राजेंद्र यादव की प्रगाढ़ तारीफ़ शुरू की. सबसे पहले उन्होंने राजेंद्र जी को इस बात का वाजिब श्रेय दिया कि प्रेमचंद की जिस विरासत को उनके बेटे श्रीपत राय-अमृत राय ना बचाए रख सके उसे राजेंद्र यादव ने बचाया.
नामवर जी सबका ध्यान इस बात कि तरफ दिलाया कि तमाम संस्थानों के होने के बावजूद,तमाम ऐसे लोगों के होने के बावजूद जो खुद को बहुत 'काबिल' समझते थे(नामवर जी इस सन्दर्भ में कमलेश्वर पर तिर्यक मार की ) हंस को फिर से जिलाया राजेंद्र ने...जिसके पास ना कोई नौकरी थी,न ही आय का कोई दूसरा ठोस स्रोत था. नामवर जी ने उचित ही राजेन्द्र यादव के इस योगदान को ऐतिहासिक बताया.. इस अवसर पर उन्होंने राजेंद्र यादव के सम्पादकीय साहस और खुलेपन पर भी दिल-खोल कर दाद दी. अब ये नामवर जी कि अदा ही है की राजेंद्र जी को दाद देने के प्रसंगवश वो अशोक वाजपेयी,रविन्द्र कालिया और अखिलेश को साहित्यिक रगाद दे गए. (यानी,राजेंद्र जी को मिली दाद वाजपेयी,कालिया और अखिलेश के लिए खाज-खुजली का वायस बनेगी...)
नामवर जी ने अपने वक्तव्य के शुरू में इस बात की आलोचना की थी कि हंस का जलसा राजेंद्र यादव का जलसा बन गया है. संभवतः वो अपनी ही बात भूल गए और अपने भाषण में हंस से ज्यादा राजेंद्र यादव पर बोले. नामवर जी भूल ही गए होंगे, क्यूंकि नामवर जी को कई बार मंच पर सुना है लेकिन पहली बार देखा कि वो संस्कृत का एक अति-प्रसिद्ध श्लोक (काक चेष्टा वको ध्यानं..) बोलने में दो बार अटक गए...
(बीती २८ जुलाई को नामवर जी ८५ के हुए. ८५ तक तो वो संस्कृत,हिन्दी,उर्दू,अंग्रेजी इत्यादी से सटीक उद्दरण देने के मामले में अव्वल ही बने हुए हैं. सन्दर्भ दूसरा था लेकिन नामवर जी ने खुद ही कल कहा कि "काल के कोड़े से कोई नही बच सका है...)
(बीती २८ जुलाई को नामवर जी ८५ के हुए. ८५ तक तो वो संस्कृत,हिन्दी,उर्दू,अंग्रेजी इत्यादी से सटीक उद्दरण देने के मामले में अव्वल ही बने हुए हैं. सन्दर्भ दूसरा था लेकिन नामवर जी ने खुद ही कल कहा कि "काल के कोड़े से कोई नही बच सका है...)
इस श्लोक का जिक्र आ ही गया है तो पाठकों को बता दें कि नामवर जी लोगों को याद दिलाया कि हंस एक पक्षी होता है,मनुष्य नहीं और इस श्लोक में विद्यार्थियों को जिन तीन पशु-गुणों को अपनाने कि बात कही गई है वो तीनों गुण हंस पत्रिका (या राजेंद्र यादव ) में मौजूद हैं. हालाँकि, जब नामवर जी ने हंस के कौए,बगुले और कुत्ते के अनुकरणीय गुणों से युक्त होने की अपनी संस्कृतनिष्ठ स्थापना दी तो कुछ श्रोता थोड़े भौचक्के दिखे, कुछ को उनकी यह स्थापना किंचित विनोदपूर्ण लगी.
नामवर जी ने हंस के सालाना जलसे में एक जिम्मेदारी ऐसी भी निभाई पाठकों के बीच जिसका जिक्र जरुरी है. कल शाम नामवर जी एकमात्र व्यक्ति थे जिसने किसी भी बहाने से प्रेमचंद का नाम लिया हो. दो साल पहले भी हंस के जलसे में नामवर जी वक्ता बन कर आए थे तब भी प्रेमचंद को बस उन्होंने ही याद किया था.नामवर जी ने इस बार भी निराश नही किया,कथासम्राट के जन्मदिन पर,प्रेमचंद के हंस के सालाना जलसे पर प्रेमचंद नाम तो लिया ! निसंदेह इसके लिए नामवर जी कोटि-कोटि बधाई के पात्र हैं. दो साल पहले भी श्रोताओं ने इस बात को नोटिस किया था,इस बार भी किया होगा कि नामवर जी न होते तो हंस के जलसे में प्रेमचंद का कोई नाम लेवा भी नहीं होता !
(राजेंद्र यादव और हंस यह कभी नही भूलते कि वो प्रेमचंद का हंस चला रहे हैं या यूँ कह ले कि इसकी याद दिलाते रहते हैं. न ही यह बात कोई अन्य रचनाकार-आलोचक भूलता है कि राजेंद्र जी प्रेमचंद की विरासत संभाले हुए है. आश्चर्य कि हंस द्वारा ये भूलना-भूलाना हंस के सालाना जलसे पर ही होता है !)
नामवर जी का वक्तव्य बहुत ही छोटा रहा. आमतौर पर नामवर जी के दिए वव्याख्यानों कि तुलना में उसकी लम्बाई काफी कम थी, किंचित निराश करने वाली थी. उनके एकमात्र वक्ता होने के कारण भी लोगों को उम्मीद थी कि आज वो जम कर बोलेंगे. लेकिन वो नहीं बोले. नामवर जी के व्याख्यान का विषय था "साहित्यिक पत्रकारिता और हंस". साहित्यिक पत्रकारिता भी विषय है इस बात का नामवर जी ने नोटिस ही नही लिया. साहित्यिक पत्रकारिता और उसके व्यापक सन्दर्भ में हंस की भूमिका पर बोलने से उन्होंने परहेज किया. कम से कम मुझे यही लगा कि वो हंस पर नहीं, हंस के हवाले से राजेंद्र यादव पर बोलने आए हैं.
अपने भाषण के आखिरी हिस्से में नामवर जी ने नए लेखकों को राय दी कि "राजेंद्र यादव के पास जाएँ(जोर दे के कहा)....लेकिन हंस में छपने के लिए नहीं राजेंद्र से कहानी लिखना सीखने के लिए...
(कुछ सुधी जनों ने माना कि नामवर जी ने यह बात सभी लेखकों के लिए नहीं कही, वह हंस में छपते रहने वाले कुछ लेखकों से मुखातिब थे, आशय यह कि छपने के लिए तो जाते हो, कभी राजेंद्र से लिखना भी सीख लो ! )
नामवर जी के व्याख्यान के प्रथम तीन शब्दों "मेरे दुश्मन राजेंद्र" का व्यापक अर्थ सबसे आखिर में खुला. नामवर जी ने अपने छोटे से भाषण में राजेंद्र जी की जिन-जिन बातों के लिए तारीफ की ( सिर्फ तारीफ ही की ) राजेन्द्र यादव का कोई पुश्तैनी दुश्मन भी उन बातों के लिए राजेन्द्र जी की "तारीफ़" करेगा,जरुर करेगा, सो नामवर जी भी कर गए...(खैर,जन्मदिन-नववर्ष वाले संध्या-मिलन में उपजी लाग-डान्ट को दोनों वफ़ादारी से निभाते रहे हैं ).
नामवर जी अपने पूरे व्याख्यान में भले 'मेरे दुश्मन राजेंद्र' से मुखातिब रहे हों, लेकिन अपने वक्तव्य का अंत उन्होंने कुछ यूँ किया कि राजेंद्र जी का सबसे बड़ा मुरीद भी कह उठे, काश राजेंद्र जी कि इज्ज़त-अफजाई में ये शे'र पहले मैंने पढ़ा होता. शे'र कुछ यूँ था-
जो हो सकता है उससे वो किसी से हो नहीं सकता
मगर देखो तो फिर कुछ आदमी से हो नही सकता.
नामवर जी के व्याख्यान के बाद राजेंद्र जी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया. जैसी कि उम्मीद की जाती है,उन्होंने हंस को संभव बनाने वाले सभी लोगों (इसमें पाठक खुद को शामिल समझें) का आभार जताया.
कहना ना होगा, कार्यक्रम उम्मीद से फीका भले रहा हो, उपस्थित श्रोता कल शाम थोड़े निराश जरुर हुए हों, लेकिन आने वाले वक्त में वहाँ उपस्थित हर श्रोता इसे एक उपलब्धि के तौर पर ही याद करेगा, कि ३१ जुलाई २०११ को हंस के रजत जयंती के जलसे की शाम एवाने-ग़ालिब में हम भी थे...

शाम ए रंगीनियत अब ना पूछ आई और आ के यूँ निकल गई
प्रत्युत्तर देंहटाएंसमझदारी थी कि फिर बहल गई, होशियारी थी कि फिर संभल गई
जब तुझे देख लिया, सुबह महक महक उठी
जब तेरा ज़िक्र सुन लिया, रात मचल मचल गई
दिल से तो हर मुआमलात करके चले थे साफ वो
आने तक सबके सामने, बात बदल बदल गई
बढ़िया रिपोर्ट, प्रेमचंद के जन्मदिन पर हंस और राजेंद्र यादव के इस अलोकतांत्रिक जलसे में नाम मात्र का सवाल-जवाब का दौर होने और एक ही सवाल के बाद इस दौर का भी खात्मा कर देने का ज़िक्र रह गया.
भारत
प्रत्युत्तर देंहटाएंछूट और भी चीजें गई ही हैं..लेकिन पोस्ट लंबी होती जा रही थी...और मेरा मकसद कार्यक्रम की हुबहू रपट तैयार करना नही था..वैसी रपट दूसरे माध्यमों में आनी ही है...सो कुछ खास बातों तक खुद को समेट लिया...
मित्रों,सवाल ये नहीं की कल एवाने गालिब में क्या हुआ? सवाल ये है कि क्या हंस अपनी तरह की अन्तिम पत्रिका होगी?क्या और कोई पत्रिका दलितों को,स्त्री विमर्श को,नए लेखकों को इतना स्थान देगा? नामवर सिहं और राजेन्द्र यादव दोनो हिन्दी साहित्य के शिखर पुरुष हैं,पर इन दोनो लोगों के बीच तमाम आपसी विरोधों के बाद भी एक समानता ये है कि दोनो लोगो ने ही अपने लेखन से ज्यादा दूसरों के लेखन को महत्व दिया,उसको लोगों के सामने रखा,वर्ना हिन्दी मे अपना ढोल पीट्ने वाले लेखक तो बहुत हैं।
प्रत्युत्तर देंहटाएंहाँ, बात तो इसी पर होनी चाहिए, मगर अपुन भी नामवर सिंह की तरह भटक-भटक गया.
प्रत्युत्तर देंहटाएंविवेक जी, उम्मीद पर दुनिया कायम है और हम भी...
प्रत्युत्तर देंहटाएंभारत, :-) :-)
प्रत्युत्तर देंहटाएंरोचक लगी रिपोर्ट...घर बैठे ही बहुत कुछ जानने -समझने को मिल गया...
प्रत्युत्तर देंहटाएंरोचक जानकारी।..आभार।
प्रत्युत्तर देंहटाएंदृश्य-दर-दर और समानांतर कमेंटरी... पढ़कर आयोजन में किसी मित्र ( हां, रंगनाथ जी भी ) के साथ फुसफुसाते-बतियाते हुए शामिल रहने जैसी अनुभूति हुई। सुख भी कम नहीं मिला। नयी शैली मे रिपोर्ट लिखना संभव करने के लिए बधाई... । वस्तुतथ्य से यहां अवगत होने के बाद मुझे तो यही लगा कि नामवर जी ने सधे अंदाज में अपना काम अवश्य पूरा किया। किसी के आयोजन में जाकर उसकी सीधे-सीधे धज्जियां उड़ा देना न उचित होता न शोभनीय। ऐसा करना तो अराजक क़दम ही माना जाता। विनोद-स्वर में ही सही, आखिर अपने संबोधन-शब्द में उन्होंने राजेन्द्र जी से अपने संबंध-समीकरणों का भूगोल-इतिहास और ताज़ा तापमान भी संकेतित कर ही दिया। सोचा जाये कि ऐसे माहौल-अवसर पर वह और क्या कर सकते थे... आग उगलने के बरक्स राजेन्द्र के कथाकार-स्वरुप को नये लेखकों के लिए अनुकरणीय बताकर अंतत: उन्होंने उनके संपादक को खारिज ही तो किया। जाहिरन यह 'हंस'के विचलनों पर आक्षेप ही ठहरा। बहरहाल, बेहतरीन पोस्ट के लिए आभार रंगनाथ जी...
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रिय श्यामल जी, आपके उदार शब्दों के लिए हार्दिक आभार...
प्रत्युत्तर देंहटाएंrochak jaankari.naamvar ji jo kahna chahte the vo unhone kah hi diya beshak vinod ke swar me kaha lekin har vinod me ek gambhirta nihit hoti hai.. padhkar achha laga. shyamalji ke kathan bhi samaroh aur naamvar ji ke pryojan ki sahi vyakhya karte hain. abhar.
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