6 अगस्त 2011

अनुज लुगुन की कविता : अनायास


अब तक ये सर्वविदित हो चुका है कि वर्ष २०११ के भारतभूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार युवा कवि अनुज लुगुन को मिला है. इस वर्ष के चयनकर्ता थे  कवि-कथाकार उदय प्रकाश. अनुज  लुगुन के साथ ही उदय प्रकाश को भी उनके इस चयन के लिए ढेरों बधाईयां मिल रही हैं. हम अपने पाठकों को बता दें कि  भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार पिछले कई वर्षों से अत्यधिक विवादित रहा है. इस वर्ष के पुरस्कार को युवा कवि अनुज के सम्मान से ज्यादा स्वयं भारतभूषण पुरस्कार की धूमिल होती छवि को साफ़ करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.  अनुज मूलतः झारखण्ड निवासी हैं. फ़िलहाल वो हिन्दी विभाग,काशी हिंदू विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं.  बना रहे बनारस की तरफ से अनुज को सृजनात्मक भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनायें. 

अनायास ही लिख देता हूँ
तुम्हारा नाम
शिलापट पर अंकित शब्दों-सा
हृदय मे टंकित
संगीत के मधुर सुरों-सा
अनायास ही गुनगुना देता हूँ
तुम्हारा नाम ।

अनायास ही मेघों-सी
उमड़ आती हैं स्मृतियाँ
टपकने लगती हैं बूँदें
ठहरा हुआ मैं
अनायास ही नदी बन जाता हूँ
और तटों पर झुकी
कँटीली डालियों को भी चूम लेता हॅूँ
रास्ते के चट्टानों से मुस्कुरा लेता हूँ ।

शब्दों के हेर-फेर से
कुछ भी लिखा जा सकता है
कोई भी कुछ भी बना सकता है
मगर तुम्हारे दो शब्दों से
निकलते हैं मिट्टी के अर्थ
अंकुरित हो उठते हैं सूखे बीज
और अनायास ही स्मरण हो आता है
लोकगीत के प्रेमियों का किस्सा ।

किसी राजा के दरबार का कारीगर
जिसका हुनर ताज तो बना सकता है
लेकिन फफोले पड़े उसके हाथ
अॅँधेरे में ही पत्नी की लटों को तराशते हैं
अनायास ही स्मरण हो आता हैं
उस कारीगर का चेहरा
जिस पर लिखी होती हैं सैकड़ों कविताएँ
जिसके शब्द, भाव और अर्थ
आँखों में छुपे होते हैं
जिसके लिए उसकी पत्नी आँचल पसार देती है

क़ीमती हैं उसके लिए
उसके आँसू
उसके हाथों बनाए ताज से
मोतियों की तरह
अनायास ही उन्हे
वह चुन लेती है।

अनायास ही स्मरण हो उठते हैं
सैकड़ों हुनरमन्द हाथ
जिनकी हथेलियों पर कुछ नहीं लिखा होता है
प्रियतमा के नाम के सिवाय ।

अनायास ही उमड़ आते हो तुम
तुम्हारा नाम
जिससे निकलते हैं मिट्टी के अर्थ
जिससे सुलगती है चूल्हे की आग
तवे पर इठलाती है रोटी
जिससे अनायास ही बदल जाते हैं मौसम ।

अनायास ही लिख देता हूँ
तुम्हारा नाम
अनायास ही गुनगुना देता हूँ
संगीत के सुरों-सा
सब कुछ अनायास
जैसे अपनी धुरी पर नाचती है पृथ्वी
और उससे होते
रात और दिन
दिन और रात
अनायास
सब कुछ....

11 टिप्‍पणियां:

  1. kya khub kaha hai aapne.... kuchh na kahate hue bhi sabhi ke dil ki baat kahane ko hee aap ka avtar hua hai....jai ho

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  2. बहुत ही सुन्दर कविता, सम्मान हेतु बधाई।

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  3. कविता बहुत अच्छी है। युवा कवि के बारे में जानकर और भी खुशी हुई।

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  4. bahut sundar kavita hai... Prem kavitaein to asankhya likhi gayi hain.. yeh kavita phir bhi ek naya bayaan kar paane mein safal hai... badhai...

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  5. एक नया और ताजगी भरा अहसास कविता पढते हुए. बधाई युवा रचनाकार को.

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