11 अगस्त 2011

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है


मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है
इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है
पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है
रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है
हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है
दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है
दुष्यंत कुमार

12 टिप्‍पणियां:

  1. behtareen ghazal lagti hai ye mujhe....aakhiri sher to itna pasand hai ki bas... :)

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  2. नेपथ्य में ही चलता है वास्तविक सीन ...
    बहुत बढ़िया !

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  3. वाह गज़ब की प्रस्तुति दिल को छू गयी।

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  4. इस गज़ल को पढकर जवाँ हुए और जानते बूझते मकते को अपनी ज़िंदगी का फलसफा बना लिया! अब तो नेपथ्य भी बहाने लगा है और भीड़ भी बढ़ गयी है वहाँ!!

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  5. अपने समय की तहलका मचाती हुयी कविता थी यह।

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  6. Superb lines and really i enjoyed this write up. Thanks a lot for sharing these awesome lines.

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  7. BEHAD UMDA RACHNA HAI YEH.....
    KHAS KAR PEHLA MAKTA

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