14 अगस्त 2011

विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता पर बातचीत

सुरेन्द्र सिंह ने फेसबुक पर विनोद जी की कविता लगायी तो उसके अर्थ को लेकर एक चर्चा शुरू हो गई. उस चर्चा के साहित्यिक महत्व को देखते हुए हम उसे बना रहे बनारस पर ले आए ताकि यह मानीखेज बातचीत फेसबुक के गोदाम में खो न जाए !

उसी कविता पर आगे चली बातचीत में फेसबुक ही पर कुछ साथियों ने प्रतिक्रिया दी. हम उसे यहाँ साभार साझा कर रहे हैं. देवेन्द्र पांडे जी की  टिप्पणी हमने मेल से मिली है. उसे भी साथ ही प्रस्तुत किया जा रहा है. इस चर्चा में नए जुडने वाले साथियों को बता दें कि उस कविता को आप पिछली पोस्ट पर जाकर या यहाँ जाकर पढ़ सकते हैं. 

हम साथियों के सामने यह भी स्पष्ट करना चाहेंगे कि अंकगणित के किसी सवाल की तरह किसी कविता का कोई एक सही हल/अर्थ नहीं होता. माना जाता है कि, हर पाठक किसी रचना का अपने तईं सर्वथा नवीन अर्थ ग्रहण करता  है. इसलिए नीचे दी जा रही टीपों को 'सही-गलत' के आधार पर न पढ़ें. इस कविता के जितने भी पाठ प्रस्तुत किये जायेंगे वो इस कविता की 'जेनुइन' अर्थ-छायाएँ हैं.



आतंरिक लय', जो इस कविता में भरपूर है , अक्सर बड़ी कविता की निशानी हुआ करती है. पर बार-बार पढ़ने पर भी पाठक पर एक चमत्कारिक प्रभाव यह कविता छोडती है जिसका कोई संबंध इस कविता की अंतर्वस्तु से दिखाई नहीं पड़ता.'शब्द-वैचित्र्य' कहीं न कहीं इसकी अंतर्वस्तु विहीनता को ही अधिक उजागर करता है. कितनी ही बार यह होता है की हमें कोई ख़ास अभिव्यक्ति बेहद मोहाविष्ट कर जाती है, पर यह भी ध्यान रखने की बात है कि मोह सबसे पहली बलि विवेक की लेता है.हम हैरान होते हैं, पर अर्थ जैसे हर बार हमारी गिरफ्त में आने से पहले ही फिसल जाता है. पता नहीं यह निष्कर्ष कितनों को स्वीकार्य होगा. पर अर्थ के बारे में जब कविता ज़्यादा मदद नहीं कर पाती तो पाठक को भी अपनी तरह से कविता की व्याख्या करने के अलावा मुक्ति का कोई अन्य मार्ग दिखाई नहीं पड़ता. 


अशोक वाजपेयी ने कभी विनोद कुमार शुक्ल की कविता पर विचार प्रकट करते हुए लिखा था कि ''कविता का काम चीजों के बीच नए संबंध खोजना है, वहीं चीजों को उनकी स्वतंत्र सत्ता में देखना भी है.''


विनोद कुमार शुक्ल जी की कविता में शिल्प का अलगपन तो है ही , अंतरवस्तु का कई परतों में होना भी उनकी कविताओं की विशेषताओं है ...प्रकृति के अबूझ रहस्यों के बीच आदमी की सहज संवेदना का बखूबी निर्वहन करते हैं वे ...और प्रकृति की स्वाभाविक घटनाएँ उनके वहाँ अचानक घटित होती हैं !

.....यह कविता हाशिये के आदमी की पीड़ा को अपने अनोखे और अमूर्त शिल्प में रचती है ...!


प्रथमतः  तो एक व्यक्ति का स्वयं का स्वयं से द्वैत नज़र आता है और  उस द्वैत की अनुभूति को अनुभूत करने वाला एक साक्षी तत्व दीखता है ,  पुनश्च... द्वैत/द्वन्द  अगर असमान शक्तियों का हो तो विकास तीव्र होता है...तो ये कहा जा सकता है   कि एक व्यक्ति का उर्जावान/ऊश्मावान /सद स्वरुप   व्यक्तित्व जिसकी उर्जा /ऊष्मा क्षणिक है का प्रक्षेपण उस मूल व्यक्ति के समक्ष उसकी समस्त सांसारिक वास्तविकताओं के रहते हुए हो रहा है .क्योंकि  सुबह छह बजे का वक़्त सुबह छह बजे की ही  तरह है  ."---पेड़ के नीचे ....".तो यहाँ तक बात आयी कि वह व्यक्ति किन्ही विशेष परिस्थतियो (पेड़) में स्वयं को पाता है ."---- कुहरे में आदमी के ...".  व्यक्ति अपने वैचारिक झंझावात और जंजालो ( कुहरा ) में उस उर्जावान व्यक्तित्व में स्वयं को देख रहा है . "---पेड़ का धब्बा बिलकुल....". जिन परिस्थतियों में वह स्वयं को फेका हुआ पा रहा है वह उसका मनोमय संसार न होकर वह एक जागतिक /वास्तविक घटना है ."----दाहिने रद्दी नस्ल .....".  व्यक्ति के मन /मस्तिष्क का दाया हिस्सा अर्थात उसका वास्तविक स्व, उतना ही निम्न कोटि का है  ,जितना की उसे स्वयं के बारे में आश्वस्ति है ."---------घोडा भूखा था ...." व्यक्ति का वास्तविक स्व ( trueself ) अनेक विचारो के उत्परिवर्तन  (mutation )  से गुजर रहा है . एक विचार अगले अनेक विचारो को जन्म देता है .और ये प्रक्रिया अनंत है . कुहरा अर्थात वैचारिक झंझावात और जंजाल, उस वैचारिक mutation  को और हवा दे रहे है ."----और कई मकान ...."  व्यक्ति को पूर्णतः यह भान है कि वह स्व  (truself ) वही है जिसके होने के आरोपण किसी अन्य चीज़ पर नहीं किया जा सकता ."----अकेला एक घोडा ...." व्यक्ति को यह दो वास्तविकताए एक साथ पता है ,प्रथम कि उसका एक  trueself  और  द्वितीय इस वास्तविक स्व के अतिरिक्त भी मेरी एक विशुद्ध सत्ता है ."--------------लेकिन हांफते हुए .............." व्यक्ति जब भी अपना अन्तःनिरीक्षण  (introspection )करता है तो वह पाता है कि उसकी चेतना उसी वैचारिक झंझावात और जंजाल से परिचालित हो रही है ."---यदि एक ही जगह ...." व्यक्ति उसी समान परिस्थति (पेड़ ) में अपने उर्जावान या सद स्वरुप  को देख रहा है ,और उसको अपनी वास्तविकता भी अनुभूत कर रहा है और यह पाता है कि जो उसका व्यावहारिक सत्य है ,जिन मुलभुत प्रवृतियों से स्वयं को संचालित पाता है ,वाला व्यक्तित्व उस सद स्वरुप को आत्मसात करने के लिए विह्वल तो है लेकिन उस विह्वलता में तथाकथित वास्तविक विडम्बनाये आबद्ध है .


"वह आदमी................................................... मैं पिछड़ गया"                                                                    

विचार (कल्पना) में और जमीनी सच्चाई में यही फर्क होता है। विचार गरम कोट की तरह की तरह कटीले ठंड में ( विपरीत मौसम) में भी आगे निकल जाते हैं औऱ जमीनी सच्चाई रबड़ के चप्पल की तरह पिछड़ जाती है।


"जाड़े में उतरे हुए...................................... सुबह छः बजे की तरह"

सुबह छः बजे का वक्त धुला-धुला, ताजा-ताजा, होता है संभवतः यहां कवि अपनी बात रखने के लिए जमीन तैयार कर रहा है। जहाँ कल्पना की उड़ान जाड़े के कपड़े की तरह उतरी हुई है।.


"पेड़ के नीचे आदमी था........................रद्दी नस्ल के घोड़े की तरह था"

आदमी के धब्बे की तरह आदमी और पेड़ के धब्बे की तरह पेड़ में काफी अंतर होता है। पेड़ के धब्बे की तरह पेड़, पेड़ ही रहता है मगर आदमी के धब्बे की तरह आदमी, आदमी नहीं रह जाता। रद्दी नस्ल के घोड़े से संभवतः कवि उन कामगारों की बात करना चाहता है जो पेड़ के नीचे खड़े आदमी की निगाह में रद्दी नस्ल के घोड़े की तरह होते हैं। पेंड़ के नीचे खड़ा आदमी ही आदमी माना जाता है। दौड़ता-भागता आदमी रद्दी नस्ल का घोड़ा होता है। 

"घोडा भूखा था तो................................अकेला एक घोडा था i.

घोड़ा हमेशा अकेला ही होता है। वैसे ही जैसे कई मकान कई पेड़ कई सड़कें सिर्फ आदमियों के लिए होती हैं।


"मैं घोडा नहीं था................................घोड़े की तरह नाल ठुकी थी.

मजदूर कभी खुद को घोड़ा नहीं समझता। भले ही उसके जूते में घोड़े की तरह नाल ठुकी हो। वह इसी भ्रम में जीता है कि मेरे पैर में नहीं, जूते में नाल ठुकी है।

रबर की चप्पलों की तुलना में गरम कोट का एक आभिजात्य है , जैसे श्रम की तुलना में विचार का. आखिर गरम कोट गरम कोट है और चप्पल चप्पल ! कुहरे की तुलना में सुबह ६ बजे का वक़्त ! घोड़ा और घोड़े जैसी नाल ठुंके आदमी की तुलना में मालिक आदमी ! चप्पल और कोट के बीच जो दूरी है , वह निरपेक्ष शाश्वत दूरी नहीं है , बल्कि तुलनात्मक है. इस तुलनात्मक या सापेक्षिक दूरी के चलते ही चीजें प्रायः अपने जैसी ही होती हैं, यहाँ तक कि उन के धब्बे भी. क्योंकि अगर वे कुछ और हो जायेंगी तो यह सापेक्षिक दूरी संकट में पड़ जायेगी. लेकिन इसी के चलते ,उन में यह संभावना बराबर होती है की वे कुछ और हो जाएँ. कोहरा केवल सच को ही नहीं संभावनाओं को भी ढँक लेता है. वह सापेक्षिक दूरियों को निरपेक्ष दूरियों में बदल देता है. कई बार भाषा भी एक कोहरा बनाती है. यह कविता भाषा के औजारों से ही भाषा के कुहरेपन की चीरफाड़ करती है. यही इस कविता के आकर्षण की खास वजह लगती है.


नोट : विनोद कुमार शुक्ल से और परिचय के लिए उनका एक साक्षात्कार यहाँ जाकर पढ़ सकतें हैं. टिप्पणीकारों के  बारे में  ज्यादा जानने के लिए उनके नाम  पर लेफ्ट  क्लिक करें.

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