एक अग्रज साथी ने सुविख्यात कवि विनोद कुमार शुक्ल की यह कविता फेसबुक पर लगायी. हस्बे-दस्तूर दो-दर्जन से ज्यादा लोगों ने कविता को 'Like' किया. कई लोगों ने कमेन्ट करके इस कविता के बारे में प्रशंसा के बोल कहे. इस आरती में दो नौजवानों ने अनापेक्षित खलल डाल दिया. दोनों का प्रश्न एक था कि "इस कविता में ऐसी क्या खास बात है, जिसे इतनी प्रशंसा मिल रही है". अभी तक किसी कोने से उनके प्रश्न का जवाब नहीं आया है !
मुझे आश्चर्य था कि इस अति-चर्चित कविता के महत्व को लेकर ऐसी 'चुप' ! अति-प्रशंसित होने बावजूद जब विनोद कुमार शुक्ल की कविता पर सवाल उठाया गया तो उसके बचाव में कोई सामने नही आया ! ऐसे चु़प भरे माहौल को देखते हुए यह तय हुआ कि इस कविता को बना रहे बनारस के पाठकों के बीच रखा जाए. उनसे इस कविता पर राय ली जाए. उसके बाद कोशिश की जायेगी कि इस बहु-प्रशंसित कविता का भाष्य किया जाए. इस ब्लॉग को विभिन्न अन्य पाठकों के साथ-साथ हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े लोग भी अच्छी संख्या में पढते रहें हैं. सभी सुधी जनों से उम्मीद की जाती है कि वो अपने निजी सीमाओं,आग्रहों से ऊपर उठकर इस कविता पर अपनी स्पष्ट राय रखेंगे. वह अन्य पाठकों को बताएँगे कि उन्हें यह कविता क्यूँ पसंद/नापसंद है.
वह आदमी नया गरम कोट पहिन कर चला गया विचार
की तरह
रबड़ की चप्पल पहिन कर मैं पिछड़ गया
जाड़े में उतरे हुए कपडे का सुबह छः बजे का वक़्त
सुबह छः बजे का वक़्त , सुबह छः बजे की तरह
पेड़ के नीचे आदमी था
कुहरे में आदमी के धब्बे के अन्दर वह आदमी था
पेड़ का धब्बा बिलकुल पेड़ की तरह था
दाहिने रद्दी नस्ल के घोड़े का धब्बा ,
रद्दी नस्ल के घोड़े की तरह था
घोडा भूखा था तो
उसके लिए कुहरा हवा में घास की तरह उगा था
और कई मकान,कई पेड़ ,कई सड़के इत्यादि कोई घोडा नहीं था
अकेला एक घोडा था i मैं घोडा नहीं था
लेकिन हांफते हुए ,मेरी साँस हुबहू कुहरे की नस्ल की थी
यदि एक ही ज़गह पेड़ के नीचे खड़ा हुआ वह मालिक आदमी था
तो उसके लिए
मैं दौड़ता हुआ जूते पहिने हुआ था ,जिसमे घोड़े की तरह नाल
ठुकी थी.
विनोद कुमार शुक्ल को जानने के लिए उनका यह साक्षात्कार जरूर पढ़ें. इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

जिन साथियों को इस कविता पर किंचित लंबी टिप्पणी करनी हो बेहतर होगा कि वो अपनी टिप्पणी rangnathsingh@gmail.con पर सीधे मेल कर दें. हम उसे पोस्ट के रूप में लगाना चाहेंगे जिससे अधिक से अधिक पाठक उस पर तवज्जो दे सकें.
प्रत्युत्तर देंहटाएंकविता में अर्थ तलाशने निकला था और कविता लिखना सीख गया। गहरी लिखी कविता में अर्थ गहराता ही है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंरबर की चप्पलों की तुलना में गरम कोट का एक आभिजात्य है , जैसे श्रम की तुलना में विचार का. आखिर गरम कोट गरम कोट है और चप्पल चप्पल!कुहरे की तुलना में सुबह ६ बजे का वक़्त !घोड़ा और घोड़े जैसी नाल ठुंके आदमी की तुलना में मालिक आदमी! चप्पल और कोट के बीच जो दूरी है , वह निरपेक्ष शाश्वत दूरी नहीं है , बल्कि तुलनात्मक है. इस तुलनात्मक या सापेक्षिक दूरी के चलते ही चीजें प्रायः अपने जैसी ही होती हैं , यहाँ तक की उन के धब्बे भी. क्योंकि अगर वे कुछ और हो जायेंगी तो यह सापेक्षिक दूरी संकट में पड़ जायेगी. लेकिन इसी के चलते ,उन में यह संभावना बराबर होती है की वे कुछ और हो जाएँ. कुहरा केवल सच को ही नहीं संभावनाओं को भी ढँक लेता है. वह सापेक्षिक दूरियों को निरपेक्ष दूरियों में बदल देता है. कई बार भाषा भी एक कुहरा बनाती है. यह कविता भाषा के औजारों से ही भाषा के कुहरेपन की चीरफाड़ करती है. यही इस कविता के आकर्षण की खास वजह लगती है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंऔर लोग कोट बदलते रहते हैं विचार की तरह। बेहतरीन कविता है।
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