चुका भी हूँ मैं नहीं
कहाँ किया मैनें प्रेम
अभी.
जब करूँगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफन उठेंगे
सात सागर.
किंतु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैनें साज
अभी.
सरल से भी गूढ़, गूढ़तर
तत्व निकलेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
हृदय ।
निकटतम सबकी
अपर शौर्यों की
तुम
तब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख
तुम बनोगी तब
प्राप्य जय !
- शमशेर बहादुर सिंह
- शमशेर बहादुर सिंह
उम्दा अभिव्यक्ति।
प्रत्युत्तर देंहटाएंपढ़वाने का आभार।
प्रत्युत्तर देंहटाएंभावपूर्ण कविता.
प्रत्युत्तर देंहटाएंतुम बनोगी तब प्राप्य जय / वाह बहुत सुन्दर भाव
प्रत्युत्तर देंहटाएंशमशेर हिंदी कविता के विचारवान कवी है ,उन्हें गम्भीरता से पड़ने की जरुरत है
प्रत्युत्तर देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंदमदार प्रेम की अभिव्यक्ति
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