2 सितम्बर 2011

चुका भी हूँ मैं नहीं


चुका भी हूँ मैं नहीं
कहाँ किया मैनें प्रेम
अभी.
जब करूँगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफन उठेंगे
सात सागर.
किंतु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैनें साज
अभी.
सरल से भी गूढ़, गूढ़तर
तत्व निकलेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
हृदय ।
निकटतम सबकी
अपर शौर्यों की
तुम
तब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख
तुम बनोगी तब
प्राप्य जय !

शमशेर बहादुर  सिंह 

7 प्रतिक्रिया:

  1. देवेन्द्रSeptember 09, 2011

    तुम बनोगी तब प्राप्य जय / वाह बहुत सुन्दर भाव

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  2. प्रेम तन्मयSeptember 10, 2011

    शमशेर हिंदी कविता के विचारवान कवी है ,उन्हें गम्भीरता से पड़ने की जरुरत है

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  4. दमदार प्रेम की अभिव्यक्ति

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