27 सितम्बर 2011

ग़ज़ल की पहली किताब

स्वप्निल तिवारी

अभी दो तीन रोज पहले अखबार में पढ़ने को मिला की जगजीत सिंह को ब्रेन हैमरेज हो गया है और वो अस्पताल में हैं यह खबर पढ़ते ही लगा की अपने भीतर कहीं कुछ उदास होना शुरू हो गया है और इस उदासी की वजह थी अतीत में जगजीत सिंह से रहा बेहद लगाव

आज मैं मेहदी हसन और नुसरत फ़तेह अली खान को अधिक सुनता हूँ लेकिन इनको सुनना जगजीत सिंह को सुने बिना संभव नहीं था और मेरे लिए तो बिलकुल ही नहीं था। वजह ये की उर्दू की कोई खास समझ नहीं थी और छोटी उम्र में शास्त्रीय गायन से लगाव की तो बात ही छोडिये नींद अलबत्ता आने लगती थी।

मुझे याद मैंने खुद से गाने प्ले करना और उन्हें सुनना बारहवीं में शुरू किया था और उन दिनों ‘राज़’ ‘हाँ मैंने भी प्यार किया है’ के गाने बहुत अधिक पसंद थे (अब लगता है की मेरी भी हद्द थी क्या क्या पसंद था मुझे) बारहवीं पास करते करते लगा कि भाई बढ़िया म्यूजिक या तो पुराना वाला है या तो ए आर रहमान का है। 

बारहवीं के बाद मैं बनारस गया मेडिकल की तैयारी करने (और सही बताऊँ तो जगजीत सिंह को सुनने के चक्कर में ही मैं डॉक्टर नहीं बना और अब लगता है कि अच्छा हुआ नहीं बना।) एक बार छुट्टियों में घर से बनारस लौटते हुए घर पे पड़ा हुआ एक कैसेट उठा लाया जिसका नाम था “फीलिंग्स ऑफ लव”। इसमें सारी ग़ज़लें जगजीत सिंह की गयी गाई फ़िल्मी ग़ज़लें थीं जिसे किसी और गायक ने गाया था। उस नकली आवाज़ में भी जगजीत सिंह की वो ग़ज़लें सुन कर मैं दीवाना हो गया। हालाँकि कभी कभी रंगोली में कुछ ग़ज़लें देखी सुनी हुई थी पर उस समय उनका प्रभाव एक दम अलग था। मेरे अंदर के लगभग सभी हार्मोन्स पर उस कैसेट के गीतों का नियंत्रण हो गया था। जल्दी ही मुझे पता चल गया कि यह आवाज़ नकली है और ये गीत जगजीत सिंह की आवाज़ में और अच्छे हैं। खैर अब जगजीत सिंह की आवाज़ की दीवानगी में मैं उनके नगमें ढूँढने निकला और खुद से पहली कैसेट खरीदी जो थी ‘सहर’।

सहर को सुनना शुरू किया और ‘तेरे आने की जब खबर महके” नें मुझे अपना दीवाना कर लिया बाकि ग़ज़लें उस वक्त मेरे लिए बहुत कठिन थीं। सहज सरल शब्द होने के बावजूद उनके मानी तक पहुँच पाना मेरे बस के बाहर की चीज़ थी। एक दोस्त बलजीत की मदद से कुछ शेर समझ मैंने, फिर अपनी माँ की मदद से कुछ और शेर समझे। जैसे जैसे मैं इस एल्बम के गीतों समझता गया वैसे वैसे जगजीत सिंह के लिए मेरा लगाव बढ़ता गया। धीरे धीरे ‘चिट्ठी न कोई सन्देश’ और ‘होश वालों को खबर क्या’ जैसे गीतों गज़लों के जरिये वो मेरे पसंदीदा सिंगर बन गए।

उस समय लगता था कि जगजीत सिंह का अकेला फैन मैं ही हूँ और इनकी गायकी की खासियत को मेरे अलावा किसी नें महसूस ही नहीं किया है कुल मिलाकर सिर्फ जगजीत सिंह को सुनने की वजह से मैं अपने आप को ‘खास’ मानता था। खैर जल्दी ही ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया क्यूंकि उसी समय मेडिकल की ही तैयारी करने वाले एक लड़के “नागेन्द्र दूबे” (बन्दा अब डॉक्टर बन गया है) से मुलाकात हुई उसी के घर जाने पर एक दिन देखा कि जगजीत सिंह के कैसेटों से उसका कलेक्शन भरा पड़ा है। मुझे पहली बार इन्फीरियर फील हुआ खैर लजाते लजाते मैंने ‘मरासिम’ उठाई और उससे पूछ लिया कि यह कैसेट कैसी है। और उसने कहा “साले..जगजीत सिंह कभी बुरा गाते हैं”। खैर ..मैंने मरासिम उससे उधार मांगी और सुनने लगा। 

कुछ आसान शेरों ‘एक पुराना मौसम लौटा” “शाम से आँख में नमी सी है” नें तो एक दम धाक जमा ली मेरे ऊपर। सारे दिन मैं यही गुनगुनाता रहता था। गुलज़ार साब को उनके लिखे गीतों के ज़रिये तो मैं पहले से ही जानता था (विविध भारती का शुक्रिया जिस पर गीत सुनाते हुए गीतकारों के नामों का भी उल्लेख होता था आज एफ एम् के जमाने में ये शराफत गायब हो चुकी है) लेकिन इस एल्बम के ज़रिये मैं उन्हें बहुत अधिक पसंद करने लगा यहीं से शुरआत हुई जगजीत और गुलज़ार के कॉम्बिनेशन को ढूँढने की। 

मेरे साथ साथ मेरे रूम मेट मनीष को भी भयंकर लत लग गयी। एक कैसेट सुनते और दूसरा खरीदते यही सिलसिला चल निकला। आर्चीस में घूमते हुए एक दिन मिर्ज़ा ग़ालिब एल्बम दिखाई दिया। दिमाग में घुसेगा या नहीं ये सोचे बिना ही बस जगजीत-गुलज़ार का नाम देखकर ही उसे खरीद लिया गया। रूम पे ला कर जब उसे सुनने लगे तो वो एल्बम भी ‘बल्लीमारान के पेचीदा दलीलों की सी गालियाँ’ जैसा साबित हुआ। और सबसे अधिक दिक्कत हुई “कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक’। अरे भाई लाख सर पटक लो ज़ुल्फ़ कभी सर में तब्दील नहीं होगी। खैर पूरे एल्बम में एक आधे शेर समझ आये पर उसका म्यूजिक इतना रूहानी था कि बस सुनते जाने को जी करता था।

धीरे-धीरे महसूस हुआ कि जो सुन रहा हूँ वो समझ भी तो आना चाहिए। तो बस उसी के एल्बम को समझने के लिए “दीवान ए ग़ालिब” खरीद लाया। सबसे पहले ग़ालिब की उन गज़लों को समझने की कोशिश की जो जगजीत सिंह ने गयी थी और बाद में दूसरी गज़लों को।

उस किताब को पढ़ने के बाद जगजीत सिंह की गायी दूसरी गज़लों को समझने में मुझे शायद ही कभी कोई दिक्कत हुई। और जब ग़ालिब को पढ़ने लगा तो टूटे फूटे शेर कहने का भी दिल हुआ। तब से लेकर आज तक मैं भी थोड़े बहुत शेर कह रहा हूँ। इस तरह से देखा जाए तो मेरी ग़ज़ल की पहली किताब जगजीत सिंह ही हैं। और मैं दिल से यही दुआ करता हूँ इस किताब में और भी पन्ने जुड़ते रहें। भगवान उन्हें लंबी उम्र दें।

6 टिप्‍पणियां:

  1. दिल से दुआ हम भी कर रहे है स्वप्निल ... तुम्हारे दोस्त ने ठीक कहा था जगजीत जी कभी खराब नहीं गाते यकीन ना हो तो उनके गाये भजन, राम धुन, श्याम धुन,गायत्री मंत्र ओम , गुरुवाणी कुछ भी सुन लो आत्मा से सीधा कनेक्शन होता है उनकी आवाज़ का ..

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  2. कुछ ऐसी ही पोस्ट मैं भी लिखने की सोच रही थी...पर हिम्मत नहीं हो रही...सच कहूँ तो इस पोस्ट को भी रुक-रुक कर पढ़ा....
    एक एक ग़ज़ल से जुड़ी ऐसी यादें हैं कि उमड़ी चली आती हैं...

    मेरा एक कजिन आज भी जब बात करता है..तो पहला उल्लेख जगजीत सिंह का ही करता है...क्यूंकि कभी मैं भी कुछ ऐसा ही समझती थी....
    "उस समय लगता था कि जगजीत सिंह का अकेला फैन मैं ही हूँ और इनकी गायकी की खासियत को मेरे अलावा किसी नें महसूस ही नहीं किया है "

    ईश्वर उन्हें जल्दी से स्वस्थ कर..उन्हें एक लम्बी उम्र दे.

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  3. जगजीत सिंह की गज़लों ने सदा ही बड़ी शान्ति दी है।

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  4. बनारस और उन ग़ज़ल सुनने के शुरूआती दिनों की यादें फिर से ताज़ा हो गयीं तुम्हारा ये लेख पड़ कर ... सच कहा हम जैसों के लिए तो ग़ज़ल की पहली किताब जगजीत सिंह ही हैं.... ईश्वर उन्हें लम्बी उम्र दें .. और इस किताब में और भी पन्ने जुड़ते रहें...

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  5. सही बात है।
    मैं तो खैर ग़ज़ल का मतलब ही जगजीत सिंह समझता आया हूँ।
    वह शीघ्र स्वस्थ हों।

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  6. स्वप्निल आप अकेले नहीं है ....इतने पागल और जुनूनी हम भी रहे है . भगवान् उन्हें जल्द ठीक करे .

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