3 अक्टूबर 2011

जजमेंट एट न्यूरेमबर्ग

संदीप मुदगल

कहते हैं कि आधुनिक राष्ट्र-राज्य के शासन की जटिलता और कथित लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने की जद्दोजेहद में कुछ जातियों-जनजातियों के मूलभूत अधिकारों का हनन होता ही है, लेकिन सच तो यह है कि यह चक्र लोकतांत्रिक व्यवस्था के अस्तित्व में आने से भी पहले से चला आ रहा है।

भारतीय उपमहाद्वीप से इतर इस मामले में पश्चिम जगत में भी हालात कुछ अलग नहीं रहे। यों आधुनिक समय में दो महायुद्धों को जन्म देने और इनसान पर परमाणु शक्ति का अब तक एकमात्र इस्तेमाल का श्रेय भी पश्चिम जगत को ही जाता है। इस पर द्वितीय महायुद्ध के बाद नाजियों द्वारा यहूदी ‘नरसंहार’ (होलोकाॅस्ट) को जिस खौफनाक हद तक संचार माध्यमों के जरिए जिस व्यापक स्तर पर प्रसारित किया गया, उससे भी सब भली-भांति परिचित हैं।

बहरहाल, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद युद्ध अपराधों के आरोप में नाजियों पर चलाए गए मुकदमों के समय समूची जर्मन नस्ल और सभ्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाने के प्रयास किए गए थे, जिन्हें जाहिर है नाजी युद्ध अपराधियों के वकीलों और जर्मन जनता के बड़े समूह ने सिरे से नकारा था। दलील दी गई थी कि समूची जर्मन जनता नाजी नहीं!

यह भूमिका इसलिए क्योंकि 1961 में निर्मित फिल्म ‘जजमेंट एट न्यूरेमबर्ग’ की विषय वस्तु यही है। फिल्म में राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में समूची सभ्यता की खामियों एक व्यापक बहस सामने आती है। फिल्म की पृष्ठभूमि एक सत्य मुकदमे पर आधारित है जिसमें चार युद्ध अपराधियों पर मुकदमा चलाया गया था। सुनवाई के दौरान जन-साधारण से जुड़े तमाम मुद्दों और निरंकुश नाजी सरकार द्वारा जर्मन समाज पर जबरन थोपी गई पाबंदियों का ब्योरा अक्सर अपने देश के आपातकाल से जुड़े अनेक तथ्यों की याद दिलाता है!

फिल्म में अनेक प्रश्न उठते हैं। मसलन, किसी समाज या समुदाय द्वारा किसी अन्य समाज या समुदाय पर नस्ली प्रभुसत्ता, राजनीतिक प्रतिशोध, धार्मिक कारणों के नाम पर अत्याचार किन दबावों के अधीन किए जाते हैं ? क्या यह अत्याचार किसी एक व्यक्ति के निजी प्रतिशोध का नतीजा होते हैं या एक समूचे समुदाय के प्रति घृणा के कारण ? क्या निरंकुश सरकारों के साथ व्यावासायिक और राजनीतिक संबंध कायम रखने वाली दूसरे देशों की सरकारों (जो कालांतर में उसके खिलाफ हो जाती हैं) भी उतनी ही दोषी नहीं होतीं ?

इनके साथ ही सबसे बड़ा प्रश्न उठता है कि क्यों विश्व के राजनीतिक परिदृश्य में एक निश्चित समय या हालात के उबरने के बाद दक्षिणपंथी ताकतें सिर उठाने लगती हैं ? क्या यह तथाकथित लोकतंत्र की बारंबार असफलता नहीं है ?

‘जजमेंट एक न्यूरेमबर्ग’ का निर्माण 1960 के दशक में स्टैनले क्रेमर ने किया था जो सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर फिल्में बनाने के लिए जाने जाते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी के न्यूरेमबर्ग में चले नाजी युद्ध अपराधियों पर चले मुकदमों के विषय ने लेखकों-फिल्मकारों की रचनात्मकता को बहुत उद्वेलित किया था। इसलिए यहां जरूरी है कि कुछ शब्दों में फिल्म की कथावस्तु का भी जायजा लिया जाए।
फिल्म की शुरुआत एक अमेरिकी जज के जर्मनी पहुंचने पर होती है। मुकदमे की सुनवाई जर्मनी में स्थापित एक विशेष अमेरिकी अदालत में होती है।

कहना न होगा कि यह वही समय था (1948 का) जब शीत युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी। अदालत में चार युद्ध अपराधियों की पैरवी एक जर्मन मूल के वकील और प्रतिपक्ष की ओर से अमेरिकी सेना का वकील करता है। अदालत में आरोप-प्रत्यारोप के साथ ही फिल्म आगे बढ़ती है और नाजीवाद के उदय, युद्ध अपराधों और समूचे सभ्यता विमर्श पर एक-एक कर अनेक जोरदार दलीलें सामने आती हैं। इन सबके बीच चारों नाजी युद्ध अपराधियों में से एक है अर्नेस्ट यानिंग जो अपने समय का प्रख्यात जर्मन कानूनविद् रह चुका है और जो कालांतर में अनिच्छा से नाजियों के साथ हो लिया था। फिल्म के उत्तरार्द्ध में एक महिला गवाह से बचाव पक्ष के वकील द्वारा अशिष्ट प्रश्न पूछने पर यानिंग का उठ खड़े होकर अपने ही वकील को डपटना एक महत्वपूर्ण दृश्य है, (यानिंग बचाव पक्ष के वकील का आदर्श भी है)। दरअसल, यही फिल्म का वह मोड़ है जहां जर्मन जनता की नाजीवाद के प्रति हिकारत का एक अनोखा रूप सामने आता है!

इसके बाद अब तक चुप रहा यानिंग अपनी मर्जी से, अपने ही विरुद्ध बयान देता है। एक जिम्मेदार कानूनविद् नाजीकाल और उससे पूर्व जर्मनी के प्रख्यात न्यायाधीश होने के नाते वह उक्त महिला गवाह के मुकदमे से संबंधित कई तथ्यों पर से पर्दा उठाता है। यानिंग की आवाज यहां समूची जर्मन जनता की आवाज बन कर जोरदार तरीके से अदालत में गूंजती है। यानिंग के अनुसार उक्त महिला गवाह को जब एक पूर्व मुकदमें में अदालत में घसीटा गया था (जिससे संबंधित सवाल यानिंग का वकील अशिष्ट तरीके से पूछता है) वह मुकदमा एक वृद्ध यहूदी को जबरन सजा दिलाने के लिए बैठाया गया था जिस दौरान जज की कुर्सी पर स्वयं यानिंग मौजूद था। यानिंग कहता है, वह मुकदमा 1933 में एक वृद्ध यहूदी द्वारा जर्मन मूल की किशोरी (उक्त महिला गवाह) के साथ अवैध संबंध बनाने के बिना पर नाजी प्रशासन द्वारा दायर किया गया था, लेकिन उस मुकदमे का असल मकसद उस वृद्ध यहूदी को सजा देना ही था, यानी सजा देने की तैयारी पूर्ववत की जा चुकी थी। यानिंग के अनुसार उस मुकदमे को नाजी सरकार ने एक ऐसे मानक के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की थी जिससे सीख लेकर तमाम गैर जर्मन मूल के लोग, विशेषकर यहूदी, बंजारे, कम्युनिस्ट और अन्य अल्पसंख्यक किसी जर्मन महिला के साथ भविष्य में संबंध स्थापित करने का दुस्साहस न करें। यानिंग की ग्लानि उसे अपनी गलतियों को भरी अदालत में मानने को मजबूर कर देती है। वह कहता है, ‘मैं जानता था कि नाजी गलत हैं, उनके साथ चलने वाले गलत हैं, लेकिन फिर भी मैं उनके साथ चल दिया और अपने जीवन को मैंने मैले में मिला दिया।’

यानिंग से संबंधित यह घटनाक्रम, जो फिल्म के लगभग अंत में आते हैं, पूरे मुकदमे और बहस का एक हिस्सा भर हैं जिसके बाद पहले से चली आ रही बहस को कुछ क्षणों के लिए विराम मिलता है और फिर केवल कुछेक जोरदार उपसंहार रूपी दलीलों की ही जरूरत रह जाती है।

दरअसल, ‘जजमेंट...’ एक राजनीतिक और सामाजिक फिल्म है जिसमें समूची सभ्यता की खामियों को छुपाने की बजाय उन पर एक व्यापक बेलाग बहस दिखती है। कथित सभ्य समाज कितना ‘सभ्य’ है, इस पर खुली बहस में तर्क-वितर्कों से दोनों पक्ष ही उतरोत्तर कठघरे में खड़े दिखाई देते हैं और कुल मिलाकर इतना भर समझ आता है कि आज तक इनसान अपने मूल में रूप् में केवल साफ-सुथरे कपड़े पहनने वाला एक ‘जानवर’ भर है।

‘जजमेंट...’ के सबसे प्रमुख पात्र के तौर पर अमेरिकी जज हेवुड को दिखाया गया है। जज हेवुड पर ही, अन्य दो साथी जजों के साथ मुकदमे पर फैसला ने का दारोमदार है। द्वितीय विश्वयुद्ध के लगभग फौरन बाद शीत युद्ध की शुरुआत हो गई थी, इसलिए जर्मनी में मौजूद अमेरिकी राजनीतिज्ञ अप्रत्यक्ष रूप से जज हेवुड पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। पश्चिमी जगत में राजनीति के न्यायपालिका पर असर का यहां एक प्रमाण मिलता है। लेकिन जज हेवुड अपने निर्णय पर अटल रहते हैं और सांत्वना के पात्र यानिंग के साथ-साथ अन्य तीन पूर्व जर्मन जजों (जिनमें से एक यानिंग की गवाही के दौरान उस पर गद्दार होने आरोप लगाता है) को उम्र कैद की सजा सुनाते हैं। पश्चिमी राजनीतिक जगत की विसंगतियों और खामियों का इस फिल्म में भरपूर चित्रण है।

बहरहाल, यह आलेख फिल्म के कलात्मक पहलुओं पर नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक रुझानों पर केंद्रित है, इसलिए फिल्म के कलापक्ष पर बहस यहां बेमानी होगी, क्योंकि किसी धीर-गंभीर विषय पर कोई फिल्म यों भी अधिकतर अपनी उद्देश्यपरकता के लिए ही याद रहती हैं।

‘जजमेंट...’ के राजनीतिक रुझान इस मायने में भी व्यापक है क्योंकि यह मूल रूप् से दक्षिणपंथी या तानाशाही समाज का पर्दाफाश करती है। एक दक्षिणपंथी या तानाशाही समाज में सरकार की ओर से एकरसता की जबरन स्थापना अंततः कहां जाकर विस्फोटक रूप् लेती है, आधुनिक विश्व में नाजी जर्मनी इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। यह सत्य कई अन्य देशों में भी हम देख चुके हैं। हिटलर के 1933 में सत्ता में आने के बाद से महज 12 वर्ष के अंदर ही नाजी जर्मनी का खौफनाक अंत पूरी दुनिया के लिए सीख रहा है, बशर्ते कोई उससे कुछ सीखना चाहे तो! हो सकता है कि कोई अन्य तानाशाही शासक अपनी भौगोलिक सीमाएं फैलाने के लिए हिटलर जितना महत्वाकांक्षी न रहा हो, लेकिन दक्षिणपंथ और तानाशाही के मिले-जुले समाज की एकरसता और जनता पर उस समाज के राजनीतिकवर्ग की सोच जबरन थोपने पर उस समाज का टूट कर बिखर जाना ही उसकी प्राकृतिक परिणति है। मौजूदा समय में अपने तरीके के एक दक्षिणपंथी समाज की स्थापना करने निकले तालिबान का उदाहरण आज हमारे सामने है।

यहां पश्चिमी फिल्म जगत के संबंध में एक बाद बता देनी बेशक जरूरी है। ‘जजमेंट...’ जिस समय बनी थी वह दौर अमेरिका में मैकार्थीवाद के उत्तरार्द्ध का दौर था। फिल्म निर्देशक स्टैन्ले क्रेमर को स्वयं मैकार्थीवाद के समय उनके राजनीतिक रुझानों के कारण कुछ परोक्ष दबाव झेलने पड़े थे। उन्होंने अमेरिकी ‘साफगोई’ को बड़े ही व्यंग्यात्मक लहजे में प्रतिपक्ष के वकील कर्नल लाॅसन के मुंह से एक क्लब के दृश्य में नशे ही हालत में कहलाया है।

सत्यजित राय ने भी कभी अपने एक साक्षात्कार में कहा था हम अपने देश में ‘जजमेंट...’ जैसी बेबाक फिल्में नहीं बना सकते। स्पष्ट है कि उनका इशारा फिल्म माध्यम पर पड़ने वाले अवांछित राजनीतिक दबावों की ओर था।

‘जजमेंट...’ का लक्ष्य न केवल नाजीवाद के घिनौने रूप् को दर्शकों के सामने रखना है, बल्कि निष्पक्ष तौर पर कथित सभ्य समाज और विश्वयुद्ध के समय मित्र राष्ट्रों की दोगली राजनीतिक नीतियों पर से पर्दा हटाना भी है जिनके कारण पहले ही नाजी और फासीवाद को प्रश्रय मिला था। फिल्म के अंतिम दृश्य में जेल में बैठे यानिंग से जज हेवुड का मिलने आना और यानिंग का उसे अपनी डायरी सौंपना मार्मिक प्रसंग है। यानिंग यहां कहता है  िक वह नहीं जानता था कि इतना सबकुछ होने वाला था। उसके कथन पर यकीन न करने की कोई वजह नहीं होती, लेकिन जवाब में हेवुड कहता है - जब आपने अपना पहला फैसला सुनाया था तभी उस विध्वंस की शुरुआत हो चुकी थी। यह कथन अपने आप में तार्किक भी होता है और ठीक भी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. फिल्म की सुन्दर समीक्षा ने देखने की रुचि बढ़ा दी है।

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  2. इतने बढ़िया ढंग के आपने समीक्षा प्रस्तुत की है कि अब तो लग रहा है कि जल्द से जल्द फिल्म देख डालूं

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