संदीप मुदगल
शतरंज के खिलाड़ी की समूची रचना प्रक्रिया को अगर देखें तो पता चलता है कि सत्यजित राय का फिल्मकार किसी भी पूर्वग्रह से ग्रसित नहीं है। वह हिन्दी मुख्यधारा के कलाकारों को पसंद करते थे, लेकिन उन्हें ही जिनमें प्रतिभा के कुछ अंश नजर आएं। दोनों नवाबों की भूमिका में संजीव कुमार और सईद जाफरी की जोड़ी की प्रतिभा पर किसी को शक नहीं, परंतु यही एकमात्र बिंदू है जो पूरी फिल्म में कुछ कमजोर नजर आता है। कहानी की मार्फत जिस तरह के नवाबों की परिकल्पना किसी भी पाठक ने की होगी, उसके ख्याल में दोनों नवाब एक खास तरह की ठेठ लखनवी बोलचाल वाले रहे होंगे, जिस स्तर पर दोनों अभिनेता उन्नीस ही नजर आते हैं।
यहां यह सोचना भी गलत नहीं होगा कि कहानी को यदि मंच पर खेला जाता तो वहां यह दोनों अभिनेता या भूमिकाओं में कोई अन्य दो अभिनेता कैसे दिखते। संजीव कुमार और सईद जाफरी मंचीय अभिनेता रहे थे, लेकिन फिल्म में सीन-दर-सीन उनकी अदाकारी का ग्राफ नीचे की ओर आता है। दोनों के सबसे बेहतरीन दृश्य स्वयं फिल्म के शुरुआती दृश्य हैं। यहां एक सवाल उठता है कि क्या जाने-माने चेहरों की मौजूदगी विषय की गंभीरता का क्षरण करती है ?
सत्यजित रे ने अपनी फिल्मों में जब-तब देश के राजनीतिक धरातल को कुरेदने की कोशिश की है। हालांकि वह कभी मृणाल सेन जैसे ‘उग्र’ राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर नहीं रहे थे, लेकिन राजनीतिक पृष्ठभूमि पर उनकी फिल्म निर्माण की इच्छा बहुत गहरी रही थी। यही कारण था कि उन्होंने महाभारत के चौपड़ दृश्य पर एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की फिल्म बनाने की रूपरेखा बनाई थी। सन् 1965 के करीब नई दिल्ली के सप्रू हाउस में देबू चक्रवर्ती ने प्रस्तावित महाभारत कालीन फिल्म के काॅस्ट्यूम पर जब उनसे सवाल पूछा तो जवाब से पूर्व वह कुछ पल को चुप रह गए थे और फिर मात्र इतना भर ही कह पाए थे कि अभी इस दिशा में काम करना है। बाद में उन्होंने वह परियोजना ही रद्द कर दी थी। यह अकारण नहीं था। सत्यजित रे जैसा फिल्मकार यदि ऐतिहासिक-पौराणिक विषय पर कोई फिल्म बनाता तो उनसे उम्मीद की जाती कि वह कालखंड के हिसाब से सही रहें, परंतु सब जानते हैं कि महाभारत व रामायण काल के सटीक समय का हिसाब आज तक नहीं लगाया जा सका है। इसके बावजूद, सत्यजित रे का फिल्मकार खामोश नहीं बैठा।
सत्तरादी में निर्मित कलकत्तात्रयी नाम से मशहूर उनकी फिल्में ‘प्रतिद्वंद्वी’, ‘सीमाबद्ध’ और ‘जन अरण्य’ उथल-पुथल भरे समय को देख रहे एक सच्चे कलाकार की रचनाएं हैं। इसके अलावा, स्वयं ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और बाद में ‘गणशत्रु’ भी कुछ ऐसी ही छवियां हैं जिनमें एक गहन राजनीतिक सोच-समझ वाला कलाकार बोलता है। हालांकि, इन दोनों फिल्मों को अलग-अलग कारणों से कई समीक्षकों ने नकारा भी था। वह कारण कुछ ऐसे नहीं हैं जिन पर कुछ खास बहस-मुबाहिसे की जरूरत हो। शतरंज के खिलाड़ी को नकारने वाले कुछेक महानुभावों ने लखनवी तहजीब में भद्रलोक के एक पुरुष को ‘बाहरी’ माना, जो नितांत हल्की वजह है। वहीं गणशत्रु की पटकथा और स्क्रीनप्ले और उसके एक कमरे में ‘बंद-बंद’ से परिवेश को लेकर सवाल दागे गए थे। यहां यह जानना जरूरी है कि गणशत्रु के समय सत्यजित रे शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद कमजोर थे, इसके बावजूद उन्होंने एक बेहद तनावपूर्ण विषय को उठाया, उसका भारतीयकरण किया और दर्शकों के समक्ष रखा था। गणशत्रु यदि आज के समाज की विसंगतियों को सामने रखती है तो अपने तरीके से शतरंज के खिलाड़ी भी यही काम करती है।
सत्तरादी में निर्मित कलकत्तात्रयी नाम से मशहूर उनकी फिल्में ‘प्रतिद्वंद्वी’, ‘सीमाबद्ध’ और ‘जन अरण्य’ उथल-पुथल भरे समय को देख रहे एक सच्चे कलाकार की रचनाएं हैं। इसके अलावा, स्वयं ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और बाद में ‘गणशत्रु’ भी कुछ ऐसी ही छवियां हैं जिनमें एक गहन राजनीतिक सोच-समझ वाला कलाकार बोलता है। हालांकि, इन दोनों फिल्मों को अलग-अलग कारणों से कई समीक्षकों ने नकारा भी था। वह कारण कुछ ऐसे नहीं हैं जिन पर कुछ खास बहस-मुबाहिसे की जरूरत हो। शतरंज के खिलाड़ी को नकारने वाले कुछेक महानुभावों ने लखनवी तहजीब में भद्रलोक के एक पुरुष को ‘बाहरी’ माना, जो नितांत हल्की वजह है। वहीं गणशत्रु की पटकथा और स्क्रीनप्ले और उसके एक कमरे में ‘बंद-बंद’ से परिवेश को लेकर सवाल दागे गए थे। यहां यह जानना जरूरी है कि गणशत्रु के समय सत्यजित रे शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद कमजोर थे, इसके बावजूद उन्होंने एक बेहद तनावपूर्ण विषय को उठाया, उसका भारतीयकरण किया और दर्शकों के समक्ष रखा था। गणशत्रु यदि आज के समाज की विसंगतियों को सामने रखती है तो अपने तरीके से शतरंज के खिलाड़ी भी यही काम करती है।
एक अजीब सी साम्यता जो गणशत्रु और शतरंज के खिलाड़ी को बांधती है वह यह कि दोनों ही तस्वीरें कुलीन वर्ग की कायरता और अवसरवादिता को अपने-अपने तरीके से उकेरती हैं। हालांकि, मात्र इतनी सी बात से ही दोनों चित्रों के सही राजनीतिक रूप का एक समीक्षात्मक निचोड़ सामने आ जाता है लेकिन फिर भी ‘शतरंज...’ पर कुछ सोचना जरूरी होता है क्योंकि इस कथा में हमारे देश के आधुनिक इतिहास के बहुत बड़े मंजर को सामने रखा गया है।
शतरंज के खिलाड़ी का दायरा अपने आप में बहुत व्यापक है। औपनिवेशिक दबाव के तहत टूटते भारत के एक हिस्से का चित्रण रे ने अपनी पारंपरिक शैली से काफी हटकर किया है। रे का सिनेमा मूलतः व्यक्तिगत संबंधों की परतों का लगभग औपन्यासिक दृष्टि से विवेचन करता है। अपु त्रयी से लेकर चारुलता (जिसे उन्होंने अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति कहा) में ऐसा ही विस्तार दिखता है। शतरंज के खिलाड़ी (मुंशी प्रेमचंद की कहानी) बेशक मूलतः एक छोटी सी रचना है और उसे मुंशी जी ने लगभग व्यंग्यात्मक प्रभाव दिया है, लेकिन सत्यजित रे ने उस पर एक वृहद स्तर का और बहुत संजीदा चित्र बनाया लेकिन व्यंग्य की दृष्टि से वह भी पीछे नहीं रहे। फिल्मी भव्यता की दृष्टि से शतरंज के खिलाड़ी शायद राय की लगभग सबसे बड़ी फिल्म रही। दूसरा कारण यह भी कि फिल्म हिन्दी में है और बंबई फिल्म उद्योग के कुछ बड़े अभिनेता इसमें थे। केवल इन्हीं कुछ कारणों से फिल्म का बड़ा होना लाजिमी है। विषय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का भी इसमें दखल रहा है।
सबसे बड़ा फर्क जो मुंशी प्रेमचंद की कहानी और सत्यजित रे की फिल्म के बीच दिखता है वह यह कि रे ने कहानी का विस्तार किया है। कहानी केवल दो निठल्ले नवाबों की है, लेकिन फिल्म में यही नवाब अगर बिसात बिछाए रहते हैं तो दूसरी ओर राजनीति की बिसात भी बिछी है। नवाब वाजिदअली शाह और जनरल आॅटरम के बीच बिछी सियासी बिसात दरअसल वह असली ‘खेल’ है जिसे रे दिखाना चाहते हैं। हालांकि उनके इस प्रयास में दोनों निठल्ले नवाब कहीं पीछे नहीं रह जाते। वह सियासी माहौल पर अपने दोस्तों-यारों से गर्मागर्म बहस तो कर लेते हैं, लेकिन अपनी अय्याशी के सामान में खलल पड़ता देख, दुम दबाकर निकल लेते हैं। कुछ इसी कुलीनवर्गीय नपुंसकता को उकेरा गया है यहां और यह नपुंसकता सिर्फ उनके रोजमर्रा के बर्ताव में ही नहीं है बल्कि उनकी शिराओं में भी दौड़ रही है जिसका प्रमाण है उनकी बेग़मों की शारीरिक तड़प !
यहां एक और अजीबोगरीब साम्यता है। अवध की शान समझे जाने वाले नवाब वाजिदअली शाह की हालत खुद भी इन दोनों नवाबों से कम नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि वह अपनी कमी को अपने वजीरों के बीच कबूल कर लेता है, लेकिन दोनों नवाबों को इसका इल्म सबसे आखिर में होता है, जब वो एक दूसरे पर हमला कर चुकते हैं। दोनों के बीच बिछी आखिरी बिसात से पहले और बाद के कुछ संवाद अगर हंसाते हैं तो उनके चरित्रों की हकीकत भी दिखा देते हैं।
शतरंज के खिलाड़ी की समूची रचना प्रक्रिया को अगर देखें तो पता चलता है कि सत्यजित राय का फिल्मकार किसी भी पूर्वग्रह से ग्रसित नहीं है। वह हिन्दी मुख्यधारा के कलाकारों को पसंद करते थे, लेकिन उन्हें ही जिनमें प्रतिभा के कुछ अंश नजर आएं। दोनों नवाबों की भूमिका में संजीव कुमार और सईद जाफरी की जोड़ी की प्रतिभा पर किसी को शक नहीं, परंतु यही एकमात्र बिंदू है जो पूरी फिल्म में कुछ कमजोर नजर आता है। कहानी की मार्फत जिस तरह के नवाबों की परिकल्पना किसी भी पाठक ने की होगी, उसके ख्याल में दोनों नवाब एक खास तरह की ठेठ लखनवी बोलचाल वाले रहे होंगे, जिस स्तर पर दोनों अभिनेता उन्नीस ही नजर आते हैं।यहां यह सोचना भी गलत नहीं होगा कि कहानी को यदि मंच पर खेला जाता तो वहां यह दोनों अभिनेता या भूमिकाओं में कोई अन्य दो अभिनेता कैसे दिखते। संजीव कुमार और सईद जाफरी मंचीय अभिनेता रहे थे, लेकिन फिल्म में सीन-दर-सीन उनकी अदाकारी का ग्राफ नीचे की ओर आता है। दोनों के सबसे बेहतरीन दृश्य स्वयं फिल्म के शुरुआती दृश्य हैं। यहां एक सवाल उठता है कि क्या जाने-माने चेहरों की मौजूदगी विषय की गंभीरता का क्षरण करती है ?
बहरहाल, इसके विपरीत नवाब वाजिदअली शाह की भूमिका में अमजद खान की यह संभवतः सर्वश्रेष्ठ अदाकारी रही है। इस भूमिका में अमजद खान के अतिरिक्त आज तक किसी अन्य अभिनेता के बारे में सोचना भी मुश्किल लगता है। संवाद अदायगी, भरे दरबार में सबकुछ भूल कर ठुमरी-दादरा का अंदाजे-बयां, शाही भाव-भंगिमाएं, अपनी कमजोरियों का बुलंद ऐलान और अंततः अंग्रेजी रौब से डर कर खामोशी अख्तियार कर जाना, यह सब अमजद खान की असाधारण प्रतिभा को दर्शाता है जिसका दुर्भाग्यवश यदा-कदा ही इस्तेमाल हुआ था। अमजद खान नख-शिख से जानेआलम का प्रचलित रूप दिखे थे। दरअसल, हिन्दी मुख्यधारा अभिनेता का कुछ इस कदर अपने किरदार में घुलमिल जाने का यह बहुत दुर्लभ उदाहरण है। सत्तावनी क्रांति के आसपास मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के साथ जानेआलम वाजिदअली शाह उन चुनिंदा शाही किरदारों में से एक थे जो सांत्वना की दृष्टि से देखे गए थे। दोनों ने अपने शासनकाल के दौरान ही अपनी राज न कर पाने की अपनी कमजोरियां कबूल ली थीं।
एक अन्य तथ्य जिसके बारे में भारतीय दर्शक कुछ असमंजस से में रह जाता है, वह है जनरल आॅटरम का किरदार। रिचर्ड एटनबरो बेहतरीन अभिनेता-निर्देशक रहे हैं। वह इंग्लैंड की क्लासिकल शेक्सपियराना शैली के अभिनेता हैं। उनका यहां होना अगर विदेशी दर्शक के लिए कुछ आराम का बायस है तो वहीं भारतीय दर्शक इस सुखद अनुभव से दूर रहता है। कारण है उनके प्रति अनभिज्ञता, जो फिल्म बनने के लगभग 35 वर्ष बाद तक कायम है। फिल्म में उनके दृश्यों को प्राकृतिक तरीके से पिरोया गया है। एक ओर एक औसत दर्जे तक का ईमानदार नौकरशाह (चाहे कहीं का हो) की मजबूरियां उनकी बोलचाल और हावभाव में नजर आती हैं तो दूसरी ओर गोरी चमड़ी का दंभ भी उस किरदार में कूट-कूट कर भरा है। भारतीय संगीत और कला के प्रति उसकी तिरछी नजर का दायरा यहां के बाशिंदों के लिए निजी पसंद-नापसंद तक फैला है। कई समीक्षकों ने इसे एटनबरो का सर्वश्रेष्ठ अभिनय माना है, जिस पर एक अलग विमर्श जरूरी है।
यह सत्यजित रे की सिनेमाई माध्यम पर परिपक्वता ही थी कि उन्होंने अपेक्षाकृत सीमित संसाधनों में बनी इस फिल्म को भव्यता का जामा पहनाया था। शतरंज के खिलाड़ी के पूरे परिवेश में रंगों का अद्भुत इस्तेमाल दिखता है। दोनों नवाबों की हवेलियों में टंगे रंगीन पर्दे हों या वाजिदअली शाह के दरबार की शान, मात्र पृष्ठभूमि के रंग के इस्तेमाल से रे ने फिल्म को ग्रैंड स्केल की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि रंगों के चतुर इस्तेमाल से किसी भी चलचित्र में आसाधारण प्रभाव देखने को मिलते हैं। चारुलता चूंकि श्वेत-श्याम चित्र है इसलिए भव्यता के मामले में उसकी कुछ सीमाएं नजर आती हैं। यह कहना भी यहां कुछ गलत नहीं होगा कि विश्व सिनेमा के शुरुआती कुछेक उदाहरणों को छोड़कर ‘एपिक्स’ की श्रेणी में अधिकांशतः रंगीन फिल्मों का ही बोलबाला रहा है। शतरंज के खिलाड़ी सत्तरादि के अंतिम दौर में बनी थी, और राय ने लखनवी महलों और हवेलियों का यहां खुलकर इस्तेमाल किया। इन्हीं महलों और हवेलियों के लंबे सेहन और मेहराबदार रास्तों को दिखाने भर से फिल्म में ‘एपिकल’ प्रभाव उभर आया था। फिल्म के अंतिम दृश्य में लखनऊ में प्रवेश करती ‘गोरी पलटन’ का दृश्य भी शायद राय की फिल्मों में दिखाया गया सबसे विस्तृत दृश्य है। नितांत निजी और पारिवारिक संबंधों को तरजीह देने वाले राय के सिनेमा में भव्यता दर्शाते ऐसे दृश्य केवल ‘जलसाघर’, ‘नायक’ या ‘घरे बायरे’ के ही याद पड़ते हैं।
शतरंज के खिलाड़ी सत्यजित रे की बहुत महत्वाकांक्षी फिल्म रही थी। इसे बनाते समय उन्होंने ‘बाॅक्स आॅफिस’ को कितना केंद्र में रखा था, इस तथ्य पर आंकड़ों के जरिए ही बात हो सकती है, लेकिन फिल्म पारंपरिक भारतीय मुख्यधारा सिनेमा से दूर दिखती है। देश में बाॅक्स आॅफिस पर उनको सफलता ‘गोपी गायेन बागा बायेन’ में अधिक मिली थी। विदेशों में उनकी फिल्मों को जरूर बाॅक्स आॅफिस पर दर्शक मिले थे और ऐसा अधिकांशतः फिल्म समारोहों के चलते संभव हुआ था। शतरंज के खिलाड़ी को दृश्य और संवेदना के पैमाने पर संतोषप्रद बताया जा चुका है। एक खास बात यह भी है कि फिल्म इतिहास के साथ खिलवाड़ नहीं करती (जैसा कि अक्सर ऐतिहासिक विषयवस्तु पर बनी फिल्मों के साथ होता है)। फिल्म भारत के बदलते परिदृश्य को दर्शाती है, वह समय जब जागीरों और रियासतों से हटकर भारतवर्ष में ‘देश’ की भावना प्रबल हो रही थी। राजनीतिक दृष्टि से इसी सापेक्ष नजरिए से फिल्म को देखना होगा। वहीं दूसरी ओर कलात्मक दृष्टि से फिल्म पूरी तरह से अपने समय का औपन्यासिक विवेचन है, जिसमें यदि विस्तार है तो गहराई भी है और यह गहराई उसके किरदारों के ठीक पीछे खड़ी है, एक छाया समान।
सत्यजित रे का सिनेमाई कलापक्ष
रे के सिनेमा पर अक्सर ‘धीमी गति’ का होने के आरोप लगते रहे थे। उन्होंने खुद कहा था कि वह इस दिशा में कुछ नहीं कर सकते क्योंकि कहानी अपनी रफ्तार और दिशा खुद तय करती है। इस तथ्य के कई रूप हैं। कोई जासूसी कथा भी धीमी हो सकती है और सामाजिक कथा बेहद तेज रफ्तार। रे सिनेमा के सभी माध्यमों (वित्तीय सहित) को एक ही कड़ी के अंश मानते थे। उनकी यह सोच सिनेमा के लगभग सभी ग्रेट मास्टर्स से मेल खाती दिखती है। सत्यजित रे के जीवनकाल में उन्होंने और कई अन्य लोगों ने कहा कि उनको देश से बाहर अधिक सराहा गया है तो यह तथ्य भी गलत नहीं रहा। जाहिर है रे की सिनेमाई समझ हाॅलीवुड के उन पर प्रभाव, पारिवारिक परिवेश, शांति निकेतन में उनकी कला शिक्षा और अन्य देसी-विदेशी फिल्मकारों और छायाकारों के सानिध्य में परिपक्व हुई थी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने सिनेमा की अपनी एक भाषा विकसित की थी। वह भाषा ‘मौन पुकारों’ की थी। उन पुकारों की जो हमारे समाज में गूंजती है, लेकिन इनसानी शोर के कारण अक्सर पुकारने वाले व्यक्ति के साथ खड़े व्यक्ति को भी सुनाई नहीं देती। हैरानी नहीं होनी चाहिए यदि रे की फिल्मों में उग्र किरदार यदा-कदा ही देखने को मिलते हों। बहुत गौर करने पर भी इक्का-दुक्का ही ऐसे चरित्र याद पड़ते हैं। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि सत्यजित रे के समूचे सिने संसार में शारीरिक हिंसा को अधिक स्थान नहीं मिला। उन्होंने मात्र एक फिल्म ‘अभिजान’ में लड़ाई का दृश्य फिल्माया है। ‘शतरंज के खिलाड़ी’ रक्तरंजित सत्तावनी क्रांति के मुहाने पर खेली जा रही कहानी है, लेकिन उसमें भी अंत में जनरल आॅटरम के आगमन से पूर्व अवध के सभी सिपाहियों से हथियार ले लिए जाते हैं। यह अजीब विडंबनात्मक स्थिति है, जहां दर्शक कुछ ‘एक्शन’ की अपेक्षा रखता है, लेकिन जानेआलम चुपचाप अवध अंग्रेजी हुकूमत को सौंप देते हैं। इसके विकल्प के स्वरूप अगर दर्शक को कुछ मिलता भी है तो दोनों अय्याश नवाबों की एक दूसरे पर गोलीबारी।
अन्य फिल्मों ‘सोनार केला’ और ‘जय बाबा फेलुनाथ’ (दोनों रे की कहानियों पर आधारित) में कुछ हिंसा के दृश्य हैं। इनमें भी ‘जय बाबा फेलुनाथ’ में फेलु दा (रे का जासूस किरदार प्रवोष सी. मित्तर) के एक दोस्त के तौर पर एक बलिष्ठ पहलवान को राय ने बेहद डरपोक दिखाया है जो मामले को बिगड़ता देख लगभग शहर छोड़ कर भागने को तैयार है। खुद रे शारीरिक हिंसा के बारे में क्या सोचते थे, इसका तो इल्म नहीं, लेकिन उनके बनाए कार्टून चित्रों में, जो उनकी जीवनियों में छपे हैं, उन्होंने ‘मार्शल आट्र्स’ को उकेरा है जिनमें शायद उन्होंने किशोरावस्था में हाथ आजमाया होगा। इसलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए कि जब स्वयं कई विदेशी समीक्षकों ने उन्हें सबसे ‘मानवीय’ फिल्मकार बताया था। अकादमी पुरस्कार के समर्पण में भी उनके ‘मानवीय’ स्वरूप का जिक्र है। कला में हिंसा का जिक्र कितना जरूरी है, इस पर सब के अपने विचार हो सकते हैं, लेकिन अगर कला जीवन से निकलती है तो हिंसा उसका अविभाज्य अंग है, इस पर शायद सब एकमत होंगे।
दृश्य फिल्मांकन में सत्यजित रे की सीमाएं सीधे तौर पर उनकी फिल्मों के वित्तीय बजट से जुड़ती दिखती हैं। कहने का मतलब यह है वह कई बार दो या अधिक कैमरों का प्रयोग करते हैं, लेकिन विहंगम दृश्य उनकी फिल्मों में बहुत कम देखने को मिलते हैं। इसका कारण जैसा कि ऊपर बताया गया, वह मानवीय भंगिमाओं को उकेरना अपनी पहली जरूरत समझते हैं। चेहरों के उठते-गिरते भावबोध को जितनी कुशलता से रे ने अपनी फिल्मों में पकड़ा है, वैसी परिपक्वता बहुत कम फिल्मकारों में दिखती है। इस मामले में वह एक बहुत कुशल मनोवैज्ञानिक जैसे रहे हैं, और केवल चरित्र का चेहरा ही नहीं, उनके किरदारों की समूची शारीरिक भाषा बहुत कसी हुई रहती है। वह अपने चरित्रों के साथ धैर्य बरतते हैं, उन्हें धकेलते नहीं, उनसे कम समय में बहुत अधिक कर गुजरने की अपेक्षा नहीं रखते, उनके किरदार अपना समय लेते हैं, अपनी बात तसल्ली से पूरी करते हैं, पूरा दृश्य अपनी प्राकृतिक गति के साथ पूरा होता है। किसी तनाव भरे दृश्य में भी उनके किरदार जरूरत से ज्यादा उग्र नहीं होते। रे का कैमरा वैसे भी उनके चरित्रों के आसपास ही रहता है, उनके समानांतर, ज्यादा ऊपर या नीचे नहीं। बहुत कम अवसरों पर वह किसी दीर्घकालिक लांग शाॅट के जरिए अपनी बात रखते हैं (कंचनजंघा कुछ हद तक इसका अपवाद है)।
दरअसल, रे का निर्देशक एक कुशल गद्य लेखक सरीखा है, वह अपने चरित्रों के बाहरी ढांचे के जरिए उनके मन की बात को दर्शकों के सामने रखना चाहता है। कई बार वह इसके लिए बिंब भी तलाशते हैं (ग्रामीण परिवेश पर बनी कुछ फिल्मों में उनका इस्तेमाल कुछ अधिक है) जो किसी भी रूप में हो सकते हैं। इसके बाद रे का कैमरा तुरंत पात्र के पास लौटता है, ठीक उसके चेहरे के समक्ष और समूची इबारत वहां लिखी होती है जिसे पढ़ना किसी भी दर्शक के लिए कठिन नहीं रह जाता।
दरअसल, रे का निर्देशक एक कुशल गद्य लेखक सरीखा है, वह अपने चरित्रों के बाहरी ढांचे के जरिए उनके मन की बात को दर्शकों के सामने रखना चाहता है। कई बार वह इसके लिए बिंब भी तलाशते हैं (ग्रामीण परिवेश पर बनी कुछ फिल्मों में उनका इस्तेमाल कुछ अधिक है) जो किसी भी रूप में हो सकते हैं। इसके बाद रे का कैमरा तुरंत पात्र के पास लौटता है, ठीक उसके चेहरे के समक्ष और समूची इबारत वहां लिखी होती है जिसे पढ़ना किसी भी दर्शक के लिए कठिन नहीं रह जाता।



बहुत विश्लेषणात्मक एवं ज्ञानवर्द्धक आलेख !!
प्रत्युत्तर देंहटाएंशतरंज के खिलाड़ी ने शतरंज के खेल को पहुत नुकसान पहुँचाया। इसे फिल्म की सफलता ही कही जायेगी।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसही मायने में ब्रिटिश शासन उस वक़्त खिलाडी ही थे और भारत की सरज़मी चेसबोर्ड ,बहुत ही उम्दा फिल्मांकन और वक़्त को पकड़ने की कोशिश ,शुक्रिया संदीप |
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