बलात्कार की घटना, छेड़खानी का प्रयास, दहेज़ की मांग, दहेज़ के कारण हत्या, पति द्वारा पिटाई और ना जाने कितनी ऐसी ख़बरें. जिनसे देश भर के अखबार रोज भरे रहते हैं. लेकिन ये घटनाएं केवल छोटे शहरों और कस्बों तक सीमित नहीं हैं. बल्कि देश की राजधानी दिल्ली और अन्य बड़े शहर जहां सुरक्षा एजेंसियों की पैनी नजर रहती है वो भी ऐसी घटनाओं से रोज शर्मसार होते हैं. क्या आप दिल्ली में रहती हैं? क्या आप महिला हैं? अगर हां तो सावधान! क्योंकि देश की राजधानी अब बलात्कार की राजधानी बन चुकी है. दिल्ली अब शरीफों और दिल वालों की दिल्ली नहीं. क्योंकि शहर पर दरिंदों की नजर है. ये बात हम नहीं कह रहे बल्कि सरकारी आंकड़े कह रहे हैं. ये तस्वीर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों से साफ हुई है.
महिलाओं को लेकर कई बार चिंताएं व्यक्त की जाती हैं और नई-नई नीतियां बनाई जाती हैं. पुलिस महिला सुरक्षा के नए-नए दावे करती है. पर ये बातें जमीनी हकीकत से दूर हैं. सच्चाई यह है कि महिलाएं आज भी सुरक्षित नहीं है. कम से कम साल 2010 के क्राइम रेकॉर्ड्स को देख कर तो यही लगता है. साल 2010 के दौरान महिलाओं के खिलाफ अपराध 4.8 फीसदी बढ़ा. कुल 2,13,585 मामले दर्ज किए गए जबकि साल 2009 में 2,03,804 मामले दर्ज किए गए थे.
साल 2010 के क्राइम रिकॉर्ड पर नजर डालें तो देश के 35 बड़े शहरों में राजधानी दिल्ली महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित है. साल 2010 के आंकड़ों के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी में 414 बलात्कार के केस दर्ज किए गए. जो कि देश के बड़े 35 शहरों में नम्बर एक पर है. ये वही राष्ट्रीय राजधानी है जिसकी मुख्यमंत्री एक महिला हैं और जिसकी पुलिस सदैव आपके साथ रहती है. दूसरे नम्बर पर देश की कॉमर्शियल कैपिटल मुंबई है वहां 194 बलात्कार के केस दर्ज किए गए.
एनसीआरबी के मुताबिक देश के 35 बड़े शहरों में महिलाओं के खिलाफ हुए कुल अपराधों में 23 प्रतिशत अकेले दिल्ली में हुए हैं. जबकि मुंबई के हिस्से 10.8 प्रतिशत बलात्कार के केस हैं.
किडनेपिंग के मामले में भी दिल्ली पीछे नहीं है साल 2010 में राष्ट्रीय राजधानी में 1422 केस दर्ज किए गए. जो देश के बड़े 35 शहरों का कुल 37.7 प्रतिशत हिस्सा है. दहेज़ हत्या के मामले में भी राजधानी दिल्ली पीछे नहीं है. राजधानी में पिछले साल 112 महिलाओं की दहेज़ के कारण हत्या की गई है. जबकि घरेलू हिंसा और पति द्वारा किए गए अपराधों के 1273 मामले दर्ज किए गए.
राष्ट्रीय राजधानी की तुलना में देश की कॉमर्शियल कैपिटल मुंबई भी पीछे नहीं रही. वहां के आंकड़े भी शर्मसार करने वाले हैं. पिछले साल मुंबई में 146 महिलाओं को किडनेप किया गया, 21 की दहेज़ हत्या हुई जबकि 312 मामले घरेलू हिंसा जिसमें पति और घर वालों द्वारा हिंसा के थे दर्ज किए गए.
बलात्कार के मामले में 91 केसों के साथ पुणे तीसरे नम्बर पर है. जबकि मध्यप्रदेश के जबलपुर में 81 और इंदौर में 69 मामले सामने आए. साइबर सिटी बंगलूरू में रेप के 65 मामले दर्ज किए गए. राज्यों के मामले में मध्यप्रदेश में 3,135 बलात्कार के केस दर्ज किए गए. जो कि देश में नम्बर एक है. दूसरे नम्बर पर ममता दीदी का राज्य पश्चिम बंगाल रहा. पश्चिमबंगाल में 2,311 मामले दर्ज किए गए. जबकि असम 1,721,महाराष्ट्र 1,599, उत्तर प्रदेश 1,563, चंडीगड़ 1,012 छत्तीसगढ़1,025, बिहार 795 और आंध्र प्रदेश में 1,362 मामले दर्ज किए गए.
कुल अपराधों के मामले में देश में साल 2010 में अपराध के मामलों में साल 2009 के मुकाबले पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई है. दहेज हत्या में मामलों में 0.1 प्रतिशत बढोतरी हुई जबकि देश में प्रतिदिन130 महिलाएं आत्महत्या कर रही हैं.
एनसीआरबी के ये आंकड़े महिलाओं की सुरक्षा पर सवालिया निशान खड़ा करते हैं. साथ ही उन दावों की भी पोल खोलते हैं जिनमें महिला सुरक्षा की बात कही जाती है. ये आंकड़े देश की सुरक्षा एजेंसियों पर बड़ा सवालिया निशान हैं.
ये वो आंकड़े हैं जो पुलिस फाइलों में दर्ज हैं. इन आंकड़ों में अभी और भी बढोतरी हो सकती है क्योंकि ऐसे कई मामले होते हैं जिन्हें समाज के डर से महिलाएं या उनसे जुड़े परिवार छुपा जाते हैं और जो पुलिस की क्राइम फाइल में दर्ज नहीं हो पाते. ऐसे में महिलाओं की सुरक्षा को और पुख्ता करने और महिलाओं के प्रति समाज को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्यकता है.
इसके लिए ठोस और कारगर सरकारी नीति के साथ-साथ थोड़ा सा सामाजिक बदलाव की आवश्यकता है. और साथ ही बदलते वक्त के साथ अपनी सोच में भी बदलाव की आवश्यकता है. जरुरत है हम अपनी बंधे-बंधाए सामाजिक बंधनों को तोड़ें और अपनी बहू-बेटियों और मांओं के लिए एक सुरक्षित माहौल तैयार करें. जिससे वो भयमुक्त माहौल में सांस ले सकें.
जरुरत है हम अपनी बंधे-बंधाए सामाजिक बंधनों को तोड़ें और अपनी बहू-बेटियों और मांओं के लिए एक सुरक्षित माहौल तैयार करें
प्रत्युत्तर देंहटाएंआगे उम्मीद तो रखनी ही चाहिए !!
Achcha likha hai Shailendra!
प्रत्युत्तर देंहटाएंस्तरीय विश्लेषण समस्या का।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत हौलनाक माजरा है यह तो ...बेहद अफसोसनाक भी !
प्रत्युत्तर देंहटाएंभयावह आंकड़े।
प्रत्युत्तर देंहटाएंतथाकथित सभ्य समाज के मुह पर एक और करारा तमाचा.
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