9 नवंबर 2011

लेकिन...


संदीप मुदगल

कवि, लेखक और निर्देशक गुलजार मूलतः फिल्मकार नहीं हैं। इस तथ्य से बेशक कुछ लोग एकमत न हों, लेकिन यह सच है कि गुलजार के अंदर से बुनियादी तौर पर एक कवि झांकता है जो गद्य में भी कुछ दखल रखता है। बतौर फिल्मकार वह हिन्दी सिनेजगत से जुड़े जरूर लेकिन उनका मूल तत्व फिर भी लेखन ही रहा। इस तथ्य को कुछ इस तरीके से भी समझा जा सकता है कि सिनेजगत में उन्होंने अपनी पारी की शुरुआत जिन फिल्मकारों के साथ की थी वह भी बौद्धिक बिरादरी से संबंध रखते थे। बिमल राय की ‘बंदिनी’ में उन्होंने सबसे पहले गीत लिखे थे। बंदिनी भारतीय मुख्यधारा सिनेमा की उन गिनी-चुनी छवियों में से है जो अपने समूचे कलेवर में पारंपरिक साहित्यिक मानदंडों (!) से बहुत दूर नहीं है।

फिल्म में शामिल गीत भी लोकशैली का गहन भावनात्मक आभास लिए हुए दिखते हैं। इन गीतों की शालीनता और सौम्यता अपनी कहानी आप कहती है। वह गीत असल में एक फिल्म के गीत न होकर कथा में दिए गए कुछ ठहराव हैं जो दर्शक को कहानी के पूर्ववर्ती घटनाक्रमों पर उस दौरान कुछ सोचने पर बाध्य करते हैं। इसे कुछ यूं भी कह सकते हैं कि बंदिनी में गीत पहले से चली आ रही संवेदनात्मक प्रक्रिया को और रफ्तार देते हैं जिसके बाद दर्शक खुद को आगे के संभावित घटनाक्रम के लिए भावनात्मक तौर पर और मजबूत करता है या पाता है। अतः गुलजार का सिनेजगत में पहला कदम रचनात्मक दृष्टि से बहुत समृद्ध रहा था, परंतु यह शुरुआत एक कवि के बतौर थी।

गुलजार ने बतौर निर्देशक कई स्मरणीय फिल्में बनाई हैं। हिन्दी मुख्यधारा सिनेमा में 1970 के बाद जो एक दिमागी दिवालियापन देखने को मिला है, उसके बीच यदा-कदा कुछेक ऐसे फिल्मकार आते रहे हैं जिनकी एक-दो सफल आॅफबीट छवियां देखने के बाद एक भेड़चाल सी चली है। ऐसा ही कुछ गुलजार के साथ भी हुआ था। ‘मेरे अपने’, ‘परिचय’, ‘खुशबू’, ‘मौसम’ जैसी फिल्मों की सफलता के बाद उन्हें लगभग ‘असाधारण’ फिल्मकार मान लिया गया था। दरअसल, इसके पीछे हिन्दी मुख्यधारा सिनेजगत में बेहिसाब फैली हुई मूलभूत कमियां झांकती दिखती हैं जिसमें पटकथा लेखकों या वृहद तौर पर लेखक जगत के प्रति वितृष्णा का भाव रहा है। हिन्दी साहित्य के जितने दिग्गज लेखक बंबइया सिनेमा पहुंचे, उनमें से अधिकांश को निराश होकर वापस लौटना पड़ा था, यह सच भी किसी से छुपा नहीं है। ऐसे में साहित्यजगत का हिन्दी मुख्यधारा सिनेमा से संबंध कटा रहा था। यह तथ्य हाॅलीवुड या यूरोपीय सिनेमा के बिल्कुल विपरीत है जहां की अधिकतर नामी फिल्में उतनी ही मशहूर साहित्यिक कृतियों पर रही हैं। यहां उनके नाम गिनाना वाजिब नहीं होगा क्योंकि कोई भी सिनेप्रेमी इस तथ्य से वाकिफ होगा।

बहरहाल, गुलजार ने अपने फिल्म निर्माण काल में एक प्रयास जारी रखा था, वह था एक सौम्य और भावनात्मक कथावस्तु पर अपनी फिल्म केंद्रित करना। वैसे उनकी पहली फिल्म ‘मेरे अपने’ आगामी कई गैंगवाॅर फिल्मों का आधार भी बनती दिखी, लेकिन उसके बाद उनका फिल्मकार अपने मूल तत्व को पहचानता हुआ चलता दिखाई दिया और यह उनकी खुशकिस्मती थी कि उन्हें अपने तरह के सिनेमाई सृजन के लिए आर्थिक जुगाड़ भी जुटता गया। जहां तक याद पड़ता है उनकी तमाम फिल्मों में इक्का-दुक्का को छोड़कर अन्य कोई घोषित या अघोषित तौर पर किसी साहित्यिक कृति पर आधारित नहीं है। इसके बावजूद, उनकी कुछ फिल्मों का कलेवर साहित्यिक पृष्ठभूमि लिए दिखता है तो अन्य कुछ हल्का-फुल्का मनोरंजन परोसती हैं।

‘लेकिन’ एक ऐसी फिल्म रही है जो मनोरंजन और गंभीरता का नपा-तुला सम्मिश्रण है। वैसे इसमें गंभीरता का तत्व अधिक हावी है और वह भी अलौकिकता की छटा लिए हुए है। रबीन्द्रनाथ टैगोर की एक कहानी पर यह आधारित है। लता मंगेशकर ने इसे बनाया था तो जाहिर है संगीत की इसमें प्रधानता होनी चाहिए। फिल्म में हृदयनाथ मंगेशकर का संगीत ही उसे हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ संगीत प्रधान फिल्मों में शुमार कर देता है। 

फिल्म में यदि कथा तत्व अपनी तरह का अनोखा है तो संगीत भी। शास्त्रीय एवं लोक संगीत का इतना व्यापक इस्तेमाल बहुत कम फिल्मों में याद पड़ता है। इस दृष्टि से यह फिल्म हिन्दी सिनेजगत की सबसे बड़ी संगीत प्रधान फिल्मों में से एक गिनी जा सकती है। फिल्म की कथावस्तु में संगीत को स्थान बहुत खूबसूरती के साथ दिया गया है। एक ओर अगर लगता है कि इसके रहस्यवादी कथानक में संगीत महज एक सहायक तत्व होगा तो वहीं दूसरी ओर संगीत के बिना इसकी कल्पना करनी मुश्किल हो जाती है। संगीत फिल्म का प्रधान तत्व ही नहीं बल्कि एक पात्र सरीखा दिखता है। इसका स्थान फिल्म में कुछ इतना गहरा है कि वह लगभग पात्रों की पृष्ठभूमि की गहराई के बराबर दिखता है।

फिल्म एक भटकती आत्मा की कहानी है जो एक युवक को जब-तब मिलती है और कुछ कहे बिना उससे कुछ मदद चाहती है। प्रेत आत्माओं के इस कथानक को भी मानने या न मानने वालों के अलग-अलग विचार सुने गए हैं, परंतु मुख्य पात्रों विशेषतः नायिका (भटकती प्रेतात्मा) के चरित्र की पृष्ठभूमि को सविस्तार दर्शाया गया है। फिल्म का यही एक चरित्र है जिसका बचपन से युवावस्था में मृत्यु तक का समूचा चित्रण दिखता है, जो अपने आप में पटकथा का अनोखा अंश है। 

दरअसल, फिल्म केवल इतनी ही नहीं है, उसमें अलौकिकता (मैटाफिजिक्स) पर हल्की-फुल्की दृष्टि भी डाली गई है। जन्म-पुनर्जन्म को लेकर कुछ प्रश्न हैं और उनके कुछेक जवाब भी हैं, लेकिन फिर भी बहुत कुछ अनकहा रह जाता है, जो अनिवार्य है। जन्म-पुनर्जन्म से जुड़े प्रश्नों के उत्तर संभवतः अस्पष्टता के पैराए में ही हो सकते हैं। जाहिर है, इस पूरी बहस से अधिकांश लोग एकमत नहीं होंगे, इसीलिए ‘लेकिन...’ विशेष पसंद के दर्शकों के लिए है।

फिल्म एक समय की नवाबी शान-शौकत के अवशेषों को समेटने के सरकारी प्रयास से शुरू होती है। कथानक में तब नए मोड़ आते हैं जब भी नायिका नायक से मिलती है। एक जीवित व्यक्ति के किसी मृत आत्मा से मिलने के बाद उस पर जो असर हो सकता है, वह नायक के साथ होता है। नायक समीर की भूमिका में विनोद खन्ना का अभिनय बुरा तो नहीं पर औसत से अधिक नहीं कहा जा सकता। इसका कारण है विनोद खन्ना की छवि, जो एक ‘ही मैन’ की रही है। वह डरने का अभिनय करने के दृश्यों में भी ‘डरे हुए’ से नहीं लगते। दूसरी ओर नायिका यानी प्रेतात्मा की भूमिका में डिंपल कापड़िया भी औसत से कुछ ही ऊपर दिखती हैं। हिन्दी फिल्मों में आमतौर पर अभिनय का सामान्यतः निचले स्तर के होने का कारण अभिनेताओं का ‘प्रशिक्षणहीन’ होना रहा है। मंच पर प्रशिक्षित कुछ कलाकार भी हिन्दी सिनेजगत में ‘दोहराऊ प्रणाली’ के शिकार हो बैठे हैं। इसमें अगर पूरी तरह से उनका कसूर नहीं है तो काफी हद तक है भी, जिन कारणों पर बात करना यहां बेमानी होगा।

बहरहाल, ‘लेकिन...’ मूलतः एक उलझन को सुलझाने का प्रयास है, जिसमें उसके पात्र और दर्शक अंततः उलझ कर ही रह जाते हैं, परंतु फिल्म, इस तरह के कथानक के प्रेमियों के बीच अपना गहरा असर छोड़ती है, कुछ दृश्यों में उन्हें काफी हद तक खौफजदा कर देने तक! इसका मुख्य कारण फिल्म का निर्देशन है, जो असाधारण तो नहीं, परंतु कथावस्तु के हिसाब से काफी परिपक्व नजर आता है। गुलजार का निर्देशन मूलतः सीधा और सरल रहता है, यहां भी कुछ ऐसा ही मामला है, लेकिन उनकी अन्य फिल्मों के मुकाबले यहां निर्देशकीय परिपक्वता के प्रयोग अधिक नजर आते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महल के पुराने और नए स्वरूप का फिल्मांकन, जिसमें उसके कारागार से जुड़े दृश्यों का खासतौर पर जिक्र करना जरूरी है। नए व जर्जर कारागार और पुराने समय की उस जेल कोठरी की साम्यता को बनाए रखने की कोशिश के पीछे की मेहनत खुद-ब-खुद नजर आती है। जेल कोठरी के दृश्य रहस्यवादिता से भरे हैं। वहां पहुंचकर दर्शक अपने आप कुछ निष्कर्ष निकालने को प्रेरित होता है। बशर्ते, वह एक सीमा से अधिक नहीं सोच पाता।

यहां एक और बात कहनी जरूरी है। स्वर्गीय मणि कौल ने ‘दुविधा’ का निर्माण किया था जो यथार्थवादी और आॅफबीट दृष्टि से बनाई गई थी। उसी कथा पर बरसों बाद अमोल पालेकर ने ‘पहेली’ बनाई जो मुख्यधारा को केंद्र में रखकर बनी थी। अनजाने में ही सही, ‘लेकिन...’ में यह दोनों तत्व एकसाथ दिखते हैं। एक ओर इसके प्रमुख पात्र नामी-गिरामी कलाकार हैं तो वहीं संगीत की दृष्टि से यह नितांत आॅफबीट है। हालांकि, यह इतनी बड़ी वजह नहीं कि इस पर अलग से बहस हो, फिर भी सिनेमाई पक्ष के तौर पर इस दिशा में कुछ प्रश्न उठते ही हैं।

भटकती प्रेतात्माओं पर यूं तो पूरब और पश्चिम में कई फिल्में बन चुकी हैं, जिनमें से अधिकांश में एक रहस्यवादी और अलग-थलग से पड़े परिवेश (रेगिस्तान या कोई अनजान-अनाम स्थान) का इस्तेमाल होता रहा है। अब सवाल यह है कि आत्माएं ऐसे दूर-दराज के इलाकों में ही क्यों भटकती हैं, भीड़ भरे शहरों में क्यों नहीं ? ‘द सिक्स्थ सैंस’ में मनोज ‘नाइट’ श्यामालान ने बड़े शहर में आत्माओं से ही एक किशोरवय बालक के साक्षात्कार दिखाए थे, परंतु उन्होंने उन आत्माओं को भटकाया नहीं था, वह उनके जरिए एक पक्ष सामने रखना चाहते थे। वह खुद आत्माओं के अस्तित्व से इनकार नहीं करते (उनके अपने शब्दों में)। तो क्या यह समझा जाए कि शहरी और गांव-देहात की प्रेतात्माओं में कुछ फर्क होता है या भटकना पूरब की प्रेतात्माओं की नियति है और वहीं पश्चिम की प्रेतात्माएं एक ‘सभ्य जगत’ और अपनी हालत पर दार्शनिक नजरिए से विमर्श करने की क्षमता रखती हैं। यह प्रश्न जरूर कुछ गहरी सिनेमाई पड़ताल मांगता है!

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामीनवंबर 09, 2011

    bahut achchha likha hai. Gulzar ke filmon par bahut kam baat huyi hai. atah is lekh ke liye sadhuvaad.

    Nitin
    lucknow

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. गुलज़ार को लेकर एक विचारणीय टिप्पणी है...

    भले ही गुलज़ार मूलत: फिल्मकार नहीं माने जाएँ किंतु उनका कवि ही तो उन्हे फिल्म जगत के प्रचलित गम्भीर फिल्मकारों से अधिक गम्भीर फिल्मकार बना देता है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं