17 नवम्बर 2011

गद्दी



जहां वादियां लोकगीतों को सुनकर झूमती हैं, जहां सूरज हर सुबह उन गीतों को सुनने के लिए सफेद मखमली बर्फ की चादर से आँख  मिचौली खेलता है, वह हिमाचल प्रदेश है। रावी की हरी भरी घाटियों में रची-बसी इंसानी सभ्यता और संस्कृति गद्दी जनजाति के रुप में जीवन के गीत-गाती जीवन की राह पर सदियों से अपने सफर को तय कर रही है। रावी नदी को गद्दी जनजाति की जीवन रेखा कहे तो इसमें कुछ गलत नहीं है। पानी की बहती धाराएं दूर तक फैले हुए वन प्रदेशों के बीच जन्मी गद्दियों की विरासत सदियों से इनकी उपस्थिति की गवाह रही है। रावी को हम पुरूषणीके नाम से भी जानते हैं और यह शब्द पुषण से जन्मा है जिसका संबंध गड़रिऐ चारागाह और भेड़ से होता है यानि कि कुल मिलाकर यह गद्दी समुदाय से जुड़ा हुआ है।

हिमालय प्रदेश के इन पर्वतीय क्षेत्रों को अपना रैन बसेरा बनाए ये गद्दी जनजाति के लोग किस समय से यहां रहते आ रहे हैं इसको जान पाना बड़ा ही मुश्किल है। अगर हम इतिहास के पन्नों में झाके तो गद्दी संस्कृत भाषा से जुड़ा हुआ शब्द है। जिसका मतलब भेड़ है। वहीं दूसरी तरफ कुछ इतिहासकारों का मानना है कि गद्दी हिंदी भाषा के गदेर शब्द से लिया गया है जो चरवाहे समुदाय के लिए प्रयोग होता था। हिमालय के पीर पंजाल और धौला धार क्षेत्रों के बीच चंबा घाटी के अलावा कांगड़ा, धर्मशाला, पालमपुर और मंडी जिलों में भी गद्दी जनजाति पीढ़ियों से रहती आई है।

गद्दी समुदाय एक बहुत पुराना जनजातिय समाज है। भाषा के आधार पर कह सकते हैं कि गद्दी जब इस पर्वतीय क्षेत्र में बसने आए तब भारत में आम तौर पर संस्कृत भाषा बोली जाती थी। गद्दियों की रोजमर्रा की बोली में आज भी संस्कृत के कई शब्द आमतौर पर प्रयुक्त होते हैं। इनकी बोल-चाल में कई ऐसे शब्द भी हैं जो हिंदी भाषा में भी प्रयोग नहीं होते। बल्कि वो शब्द केवल संस्कृत की किताबों में ही मिलते हैं। वैदिक इतिहासकारों का मानना है कि गद्दी जनजाति के लोग 8वीं शताब्दी के आस पास मेरूवर्मन के काल में यहां आए थे और तब से यहां के मूल निवासी हैं। उस समय अपने मंदिरों के लिए ब्राहम्ण पुजारी की जरूरत थी और उन्हीं पुजारियों के तौर पर जो लोग यहां आकर बसे वो आगे चलकर गद्दी कहलाए। आज भी इस समुदाय में ऐसे लोग हैं जो स्वयं को ब्राहम्ण कहते हैं।

गद्दी समुदाय के साथ-साथ पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले अन्य समुदायों के बारे में एक कहावत यह भी प्रचलित है कि उजड़या लाहौर ते बसया परमौर। अपने अंदर कई रहस्य छुपाये ये बस्तियां आम सामाजिक बस्तियों से काफी अलग दिखती हैं। ये बस्तियां अपनी सभ्यता में इतनी रची-बसी है कि शहरी प्रभाव इनको छू भी नहीं पाया है। ऊँचे पहाड़ों पर जहां-तहां बिखरी उनकी बस्तियां गदेरन कहलाती हैं। गदेरन यानि जहां गद्दी लोग रहते हैं। पहाड़ियों पर बिखरी ये गदेरन बस्तियां मोटे तौर पर गद्दियों का एक गांव कहलाती हैं। हर गांव एक-दूसरे से अलग-थलग भी होता है और घरों के लिहाज से छोटा भी। वैसे तो आम पहाड़ी गांव अमूमन सामान्य गांवों की तुलना में छोटे ही होते हैं मगर गद्दी लोगों के गांव पहाड़ी गांव से भी छोटे होते हैं।

आमतौर पर गद्दी लोग अपना गांव किसी मंदिर के आस-पास ही बसाते हैं, साथ ही इस बात का भी ख्याल रखते हैं कि वहां से पानी का श्रोत काफी नजदीक हो और भेड़-बकरियों को चराने कहीं दूर न जाना पड़े। गद्दी गांव की सड़के और गलियां सामान्यतः संकरी होती हैं। ऊँची जातियों के घर आस-पास और पिछडी-जातियों के घर दूर-दूर होते हैं। दूर तक फैली विशाल पर्वत श्रेणियां भी इस समुदाय को बाधकर नहीं रख सकी। जीवन के उतार-चढाव को झेलकर ये जीवन जीने की कला में निपुण हुए। गद्दी जनजाति के लोग स्वभाव से लगनशील विनम्र और परिश्रमी होते हैं।
गद्दी समाज मूलतः पितृ प्रधान समाज है। पिता परिवार का मुखिया होता है और वह परिवार के भरण-पोषण के साथ-साथ तमाम सामाजिक और आर्थिक मामलों का प्रधान होता है।

इस समाज में पति-पत्नि का संबंध प्यार, विश्वास और भरोसे पर पूरे जीवन के लिए आर्दश होता है। अन्य जातियों और जनजातियों की तरह गद्दी समुदाय के अपने नियम कानून होते हैं। इनके समाज में पति को राम और पत्नि को सीता मानने की परंपरा रही है। पारिवारिक मसलों पर घर का मुखिया महिलाओं से विचार-विमर्श करता है और उनके फैसले में महिलाओं की रजामंदी शामिल होती है। संपत्ति उत्तराधिकार का भी नियम इनमें पैतृक ही होता है। पिता की संपत्ति पर पुत्रों का अधिकार होता है, परन्तु इस मामले में बड़े लड़के को कुछ विशेषाधिकार भी है। गद्दी भाषा में इसे जैथोड़ कहते हैं। संपत्ति बटवारे में सभी बेटों को संपत्तियां मिलती हैं। लेकिन बड़े बेटे को संपत्ति का कुछ ज्यादा हिस्सा हासिल होता है। गद्दी लोग रिश्तों के अटूट बंधन में बधें होते हैं और अपनी रिश्तेदारियों का निर्वाहन भी बखूबी जानते हैं। गद्दी समाज में दो तरह के लोग पाए जाते हैं, एक जो सही मायने में गद्दी जनजाति से संबंध रखते हैं और दूसरे जो गद्दी नहीं महज जनजाति मात्र हैं।

इतिहास को चुनौति देते हुए वर्तमान में मुस्कुराती इस जनजाति ने खुद को सहेजने के लिए बहुत संघर्ष किया है। इनके संघर्षों ने इन्हें जीने का नया आयाम दिया और आज पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल है। पशुओं से गद्दी समुदाय का संबंध चोली-दामन का रहा है। जीवनयापन के लिए गद्दी जनजाति भेड़ और बकरियों का पालन करती हैं। उनका व्यापार और व्यवसाय भेड़-बकरियों के उन से जुड़ा हुआ है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो भरमौर में इनकी आबादी से लगभग दोगुने से भी ज्यादा आबादी तो इनके पशुओं की है। इन पशुओं में 85 फीसदी से भी अधिक तादात तो भेड़-बकरियों की है। जिन्हें गद्दी लोगों के व्यवसाय का आधार भी माना जाता है। औसतन गद्दी परिवार में 300-400 भेड़-बकरियां पाई जाती हैं और आर्थिक रूप से ठीक-ठाक परिवारों में इनकी संख्या 1500 से भी अधिक होती है।

मौसम की मार झेलने वाले गद्दी जनजाति के लोग अपने पशुओं की जीवन-रक्षा के लिए उन्हें लेकर सुरक्षित स्थानों पर निकल पड़ते हैं। सदियों से इन्हीं इलाकों में रहने के कारण यह बखूबी जानते हैं कि किस मौसम में पशुओं को कहां जाना बेहतर रहेगा और अपनी इसी जानकारी की बदौलत गद्दी लोग मौसमी खानाबदोशी पर निकल पड़ते हैं। भेड़-बकरियों के साथ ही अपने कुनबे को लिए वह सफर करते रहते हैं। तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए और अपने चेहरे पर मुस्कान लिए हुए अपने पशुओं और कुनबे का बखुबी ख्याल रखते हैं। सफर के दौरान वह अपनी भेड़-बकरियों पर बकरियों पर बारीकी से नजर रखते हैं। पशुओं के जत्थों की निगरानी अमूमन 2-3 लोग करते हैं। इसके अलावा भेड़-बकरियों पर नजर रखने के लिए कुत्ते भी साथ होते हैं।

पशुपालन के साथ ही खेती गद्दी समुदाय का दूसरा लोकप्रीय व्यवसाय है। इनकी खेती मौसमी होती है और उन्हीं दिनों में होती है जब गद्दी समाज के लोग स्थायी रूप से कहीं रहते हैं। मौसम के मिजाज को देखते हुए खेती करने वाला यह समुदाय ऐसे समय को चुनता है जब उन्हें खानाबदोश न होना पड़े। गद्दियों की कार्यशैली दो भागों में बटी होती है। पहले तो वह ठंड के मौसम में अपने पशुओं के लिए चारागाह की तलाश करते हैं और दूसरा खेती कर अनाज उपजाने का काम करते हैं। कुल मिलाकर देखें तो खानाबदोशी के साथ-साथ खेतीहर जिंदगी को जीनेवाली यह जनजातियां मानव समाज के लिए प्रेरणा का श्रोत हैं। मौसमी फल और सब्जियों को उपजाने के साथ ही यह भेड़ों के उन बेचकर अपना जीवन-यापन करते हैं। यह खुद पहनने के लिए भी भेड़ के उन से बने कपड़े का प्रयोग करते हैं और पीने के लिए बकरियों का दूध इन्हें खासा पसंद है। खानाबदोशी के वक्त बकरियों का दूध इनके लिए बड़ा मायने रखता है।

गद्दी समुदाय के लोग खान-पान में नियम के बड़े  पक्के होते हैं और इनके खाने के अंदाज में बादशाहत झलकती है। यह रोजाना सुबह दोपहर और शाम तीन वक्त खाना खाते हैं। यहां तक कि इनकी खानाबदोश जिंदगी भी इनके खाने में आड़े नहीं आती। 
गद्दी लोग सुबह जो नाश्ता करते हैं उसे विशेष तौर पर नुहारी कहते हैं। जिसमें रात के बचे खाने के साथ छांछ या अगर छांछ न हो तो भी गुड़ की चाय इनके नाश्ते की लज्जत को कम नहीं होने देती। उसी तरह इनके शाम के खाने को सांझ की रोटी कहते हैं। इनके खाने में मक्के की राटी, दाल और मौसमी सब्जी को शामिल कर एक संपूर्ण खाने की शक्ल दी जाती है। विशेष अवसरों पर गेहूं की रोटियां भी पकाई जाती हैं। मूंग और मसूर की दाल इन्हें खास पसंद है। इनके खाने को पकाने और खाने के लिए जिन बर्तनों का प्रयोग किया जाता है। वह इनके अपनी विरासत से जुड़ा है परन्तु बदलते वक्त से इनके बर्तन अछूते न रहे। आज बहुतायत में धातुओं के बर्तनों का भी प्रयोग होता है।

यह घुमंतू और ठहरी हुई जनजाति धुम्रपान का भी शौक रखती है। चाहे इत्मनान का समय हो या काम का गद्दी पुरूष हुक्का गुड़गुड़ाते अपनी दुनिया में मगन रहते हैं। घर में बैठे हैं तब भी हुक्के के कश लगाते रहते हैं और चारागाहों में बकरियों और भेड़ों के बीच ये हुक्के इनका बखुबी साथ देते हैं। गद्दी शिल्पकारी और दस्तकारी में भी माहिर माने जाते हैं इनकी कला घरों के बाहर नक्काशी के तौर पर साफ झलकती है और कला ही इनके जीवन का आधार है।

अपनी कला के तौर पर अपनी सभ्यता और संस्कृति से रूबरू कराने वाले गद्दी लोगों की कला में भी सादगी भरी हुई है। कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है इनके मंदिरों की शिल्पकला में। भरमौर के रहने वाले इन गद्दी लोगों के हाथों की बारीकियों और दिमाग की उपज देखने से ऐसा लगता है जैसे ये कला के सिरमौर हैं। मंदिरों की निर्माण शैली बेहद ही कलात्मक है। इनका शिल्प और कलात्मक अभिव्यक्ति इतिहास के पन्नों में तो दर्ज है ही इसके साथ-साथ देश के अन्य स्थापत्य कलाओं पर इनकी विशेष छाप देखी जा सकती है।

गद्दी जनजाति के पूजनीय मनिमहेश मंदिर का वास्तुशिल्प कई शिल्पकलाओं का अद्भुत् संगम हैं। इसके प्रवेश द्वार पर गुप्तकालीन स्थापत्य कला का प्रभाव दिखाई देता है। वही मंदिर निर्माण में मत्स्य स्वरूप की उत्कल शैली का खासा असर दिखता है। मंदिर के शिखर की छतरियों पर पर्वतीय कला का प्रभाव दिखाई देता है।

गद्दी समाज आज भी अपनी पारंपरिक पोशाकों का प्रयोग बखुबी करते हैं। चोला, टोपा, डोरा जैसी पोशाक गद्दी समाज के लिए सदियों से वैसे ही हैं और आज भी इनमें खास परिवर्तन नहीं हुआ है। लबादे जैसे चोले का प्रयोग गद्दी लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में करते हैं लेकिन खास मौके के लिए ये चोले थोड़े हट कर होते हैं। इन चोलों में रंगीन धागों से कढ़ाई की जाती है और कांच के छोटे टुकड़ों को इससे जोड़कर इन्हें नया रूप दिया जाता है। घर पर उन से बने ये चोले इतने बड़े होते हैं जैसे गद्दी लोगों के दिल। खास अंदाज का लंबा टोपा आम गद्दी लोगों का पारंपरिक गौरव रहा है उसमें कनटोप जैसे दो लोलक भी होते हैं। जिन्हें नीचे खीचकर कानों को ढ़क लिया जाता है।

गद्दी समाज में डोरे का चलन पुरूष और महिलाओं के बीच समान रूप से है। कमर के चारों ओर लपेटे जाने वाला यह डोरा गद्दी लोगों का धार्मिक प्रतीक जनेउ से काफी भिन्न है। उन का बना यह डोरा आम तौर पर काले रंग का होता है। पुरूषों के द्वारा पहने जाने वाले डोरे लगभग 50 मीटर लंबे होते हैं। गद्दी महिलाएं घर में सूती कपड़े से बनी लंबी कुर्ती और पजामा पहनती हैं और जब कभी घर से बाहर निकलती हैं तो लुआंचरी पहनकर निकलती हैं।

गहने हर इंसानी जिंदगी में अपनी एक खास पहचान रखते हैं। गद्दी महिलाओं को गहनों से विशेष लगाव होता है। इन गहनों की फेहरिस्त काफी लंबी है। ये गहने चांदी और नगों से बने होते हैं मगर सोने के गहने भी इनकों खासा पसंद है। गद्दी महिलाओं के सिर की शोभा बढ़ाते हैं चौंक  और चिड़ी। इसके साथ ही खुबसूरत क्लिप इनके बालों को खुबसूरत से संवारती है। गद्दी महिलाएं कानों में फेल झुमका टिटकानी बुंदे कांटे डुंगानी कनफूल पहनाती हैं इसके साथ ही बालु, बुलके इनके नाक को खुबसूरत बनाते हैं। इनके हाथों को सजाती चुड़ियां और उंगलियों में अंगुठियां इन्हें आदर्श नारी की खूबसूरती से सजाती हैं। इसके साथ ही चंद्रहार विशेष है जिनके बारे में कालिदास से लेकर वाणभट्ट तक ने लिखा है। आंखों में सुरमयी काजल सुन्दर रुप की आखिरी शर्त होती है। जिसे गद्दी औरतें बखूबी निभाती हैं।

अनिश्चिताओं और अभावों से जूझने वाले गद्दी जनजाति इन गहनों को अपने जीवन में शामिल कर इसे कलात्मक आयाम देते हैं। गद्दी लोग त्योहारों और मेलों को उल्लास के साथ मनाते हैं। ये गद्दी लोग विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रहना जानते हैं। अपने त्योहारों में झूमते-नाचते गाते यह लोग हर पल को खुशियों से सराबोर कर देते हैं। इनके लोकगीत इनकी रोजमर्रा से जुड़ी जिंदगी के साथ-साथ इनकी परंपरा को, इनकी संस्कृति को दर्शाने का बेहतरीन तरीका है।

गद्दी जनजाति के परंपराओं की झलक इनके भवन निर्माण में बखूबी झलकती है। आमतौर पर इनके घर कई मंजिलों तक गगन को चूमते हैं लेकिन अगर साधारण घरों पर भी निगाह डालें तो उनके घर भूतल के साथ तीन मंजिलों तक बने होते हैं। भू-तल पर एक बड़ा सा कमरा बना होता है, जो ओबारा के नाम जाना जाता है। इस कमरे के आगे विशाल बरामदा होता है, जिसे पशुओं का आरामगाह कहा जा सकता है। पशुओं के बांधने के साथ-साथ बाकी बची जगहों का प्रयोग बाहरी आंगन के रुप में किया जाता है। जिसकी जरूरत सभी गद्दी परिवारों की होती है और इसी खाली जगह यानि आंगन से होकर घर के लिए प्रवेश द्वार बने होते हैं। बाहरी आंगन का प्रयोग रोजमर्रा के कामों के लिए किया जाता है। इसी आंगन से सटे घर की दूसरी मंजिल पर जाने के लिए आंगन से सटी सीढ़ी होती है जिसे सनाटी कहते हैं। बरामदे से सटे सीढ़ी का निर्माण आजकल के हिसाब से कुछ अटपटा है, लेकिन भारतीय वास्तुशास्त्र की मान्यताओं पर बिल्कुल खरा है।

गद्दी घरों की दूसरी मंजिल भोर कहलाती है। जो एक बड़े कमरे की तरह होती है। इस कमरे का प्रयोग गद्दी लोग अपने रहने के लिए करते हैं। गद्दी लोगों के दिन और रात का गुजारा ऐसे ही कमरों में होता है। इसी कमरे से सटी इनकी रसोई होती है और रसोई के पास ही एक ऐसी जगह होती है। सर्दियों के दिनों में गुनगुनी धूप को सेंकने के साथ ही तमाम घरेलू कामों में आने वाले इस बरामदे को डांगरा कहते हैं। अब दूसरी मंजिल के बाद बात शुरू होती है तीसरे मंजिल की। तीसरे मंजिल को मंडेह कहते है। मंडेह का निर्माण भोर और डांगरा के ऊपर  होता है। मगर कभी कभार मंडेह का निर्माण भोर के ऊपर ही होता है और ऐसी स्थिति में मंडेह का भी एक डांगरा यानि बरामदा होता है। भोर की तरह ही मंडेह एक बड़ा कमरा होता है। जिसमें परिवार के लोग रहते हैं अगर परिवार छोटा है, तो आमतौर पर मंडेह को रहने के लिए और भोर का अनाज रखने के लिए किया जाता है। इसी तरह मंडेह से सटे बरामदे को भी घेर कर गद्दी लोग प्रयोग में लाते हैं। ये बरामदे दोनों ओर से खुले होते हैं।

गद्दी गांव में नए जमाने ने भी दखल दिया और इसका नतीजा यह हुआ कि उनके घरों में खिड़कियां बनने लगी। कांच जड़ी ये खिड़कियां पुराने जमाने और नये जमाने के संगम की अद्भुत मिसाल हैं। गद्दी अपने घरों को बनाने के लिए उन्ही सामानों का प्रयोग करते हैं। जो उन्हें आसानी से मिल सके। वह अपने घरों को बनाने के लिए लकड़ी और मिट्टी के साथ ही पत्थर के टुकड़ों का भी प्रयोग करते हैं।

जिंदगी और मौत का अपना अनोखा दस्तूर है और इस दस्तूर में गद्दी समाज के भी अपने नियम और कायदे हैं। हर मौके के लिए अपने रिवाज इन्हें अपनी परंपराओं से मिले हैं। गद्दी समाज के यह रिवाज इतिहास के पन्नों दर्ज है,और यह रिवाज ठीक आज भी वैसे ही चले आ रहे हैं। गद्दी समाज कुंआरी पूजा की विशेष परम्पराए देखने को मिलती है। एक वर्ष से सोलह वर्ष तक की बच्चियों को बाला पूजा में शामिल किया जाता है। अगर धार्मिक आस्था के तौर पर देखा जाए तो गद्दी हिंदू समाज की ही तरह मिलते-जुलते हैं। बदलते समय के साथ हिंदू समाज में भी अनेक परिवर्तन आए हैं लेकिन गद्दी समाज की आधारशिला उसकी अपनी पुरानी परंपरा और रिवाज हैं जिसे वो आज भी सुरक्षित बचाए हुए हैं।

गद्दी समाज हिंदू धर्म के समान ही देवाताओं, भूत-प्रेतों आत्माओें के साथ-साथ नाग देवताओं को अपनी प्रचलित मान्यता में शामिल किए उनकी पूजा अर्चना करते हैं। रोजमर्रा के जीवन में अपनी पूजा-पाठ खुद करने वाले गद्दी समुदाय के लोग विशेष मौकों पर धर्म-कर्म के कार्यों को संपन्न करवाने के लिए कुशल लोगों की सेवाएं लेते हैं। इन कुशल लोगों को पुरोहित कहते हैं। गद्दी समाज में शिलान्यास से लेकर जन्म-मृत्यु-शादी-विवाह तक के तमाम धार्मिक कार्य पुरोहित की सहायता से पूरे किए जाते हैं।

गद्दी समाज में हमें रिवाजों का प्रचलन अनोखे तरीके से दिखाई देता है। मसलन शादी की बात की जाए तो यह भी हिंदू धर्म की तरह सामान्य ही है लेकिन इनकी शादी में एक परम्परा है जो इन्हें सबसे अलग बनाती है। जी हां शादी से पहले यानी जब गद्दी दूल्हे की बरात जानी होती है उससे पहले उसे शिव का रुप धारण करना होता है। ठीक वैसे ही जैसे भगवान शिव ने पार्वती से विवाह के पहले किया था। गद्दी दूल्हे को भी भगवान शिव की तरह पूरे शरीर पर भभूत मला जाता है। इसके बाद कमर में पहनने वाले डोरे से जनेउ बनाकर उसे शरीर पर धारण कराया जाता है और उसी डोरे से सिर पर पगड़ी बनाई जाती है। हाथ में धनुष धारण किए शिव का रुप धारण लिए दूल्हा पूरे गांव में घूमता है। इस अनोखी प्रथा के बाद ही दूल्हा तैयार होकर बारातियों के साथ दूल्हन के घर जाता है, जहां विभिन्न रीति रिवाजों से दूल्हे की शादी दूल्हन के साथ होती है। शादी के बाद दूल्हा-दूल्हन को लेकर अपने घर आता है। यह शादी सिर्फ गद्दी दूल्हे और दूल्हन की ही नहीं है, बल्कि यह शिव और पार्वती के मिलन का अनेाखा स्वरूप है।

हर समाज की तरह गद्दी समाज की भी अपनी एक विशेष पहचान है। उनकी यह विशेष पहचान उनके गीत संगीत और नृत्यों के साथ जुड़ी हुई है। परंपरागत रूप से गद्दी समाज में नाचने-गाने का रिवाज बहुत पुराने समय से चला आ रहा है। मौका अगर खुशी का है, तो वह तब तक अधूरा है जब तक उनके पैर न थिरकें। नृत्य में पुरूष और महिलाओं की भागीदारी समान होती है। सामुदायिक नृत्य का इन पर खासा प्रभाव है, महिलाएं और पुरूष अलग-अलग समूहों में नाचते हैं और खुशियों का हर लम्हा झूमते-नाचते हुए गुजारते हैं।

एक ही धुन एक ही थाप और उस पर झूमता पूरा गद्दी समाज। ढोल-ढोलक, नरसिंहा, बासुरी और नगाड़ा जब एक साथ बजते हैं तो कोई भी ऐसा नहीं होता जो अपने आप को नाचने से रोक सके। गद्दी समुदाय का जुड़ाव विशेष रुप से शिव के साथ है इसलिए इनके अनुसार प्रभु शिव का नटराज नृत्य भी इनके पारंपरिक नृत्यों में शामिल हैं। अगर शैली की बात की जाए तो गद्दी नृत्य वाणभट्ट के हर्षचरित के मंडलाकार नृत्य से काफी मिलता-जुलता है, जिनमें पुरूषों और महिलाओं के नृत्य समूह गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं और साथ ही गीत भी गाते हैं।

भरमौर का यह पूरा क्षेत्र प्राचीन काल से ही शिव-भूमि के तौर पर जाना जाता है। इस क्षेत्र के प्रमुख देवता शिव हैं और गद्दी समाज के आराध्य देव के रूप में प्रभु शिव की ही पूजा होती है। आठवीं शताब्दी में वर्मन साम्राज्य के महाराज मेरूवर्मन ने चंबा को धार्मिक नगरी के तौर पर विशेष पहचान दिलाई और इस धर्मनगरी का केंद्र बना भरमौर। चौरासी मंदिरों को एक ही परिसर में स्थापित कर महाराजा मेरूवर्मन ने धार्मिक इतिहास में भरमौर को अद्वितीय स्थान दिलाया। चैरासी मंदिर के इस विशाल परिसर में सभी मंदिर प्रभु शिव को समर्पित हैं। प्रत्येक मंदिर में स्थापित शिवलिंग से यह संपूर्ण क्षेत्र अति पवित्र और देवताओं के निवास योग्य माना गया है। यही कारण है कि यहां प्रभु नरसिम्हा के साथ-साथ मां शक्ति का भी वास है।

गद्दी जनजाति की परंपरा और जीवन शैली का प्रभु शिव के साथ ऐसा जुड़ाव है कि यहां के बच्चे-बच्चे की जुबान पर शिव की पौराणिक कहानियां रची-बसी हैं। हिमालय से जुड़ा यह पूरा क्षेत्र प्रभु शिव के मनीमहेश रुप को समर्पित है। भगवान मनीमहेश के इस मंदिर को आठवीं शताब्दी में महाराजा मेरूवर्मन ने बनवाया था। पत्थर से बने प्रभु मनीमहेश शिवलिंग अपने दिव्य स्वरूप में मंदिर गर्भ गृह में स्थापित हैं। प्रभु शिव का यह दिव्य स्वरूप अत्यन्त आकर्षक और मनमोहक है। मंदिर का मुख्य द्वार अत्यन्त छोटा है, जहां झुक कर ही भक्त मंदिर के भीतर या बाहर आ जा सकते हैं। प्रभु मनीमहेश शिवलिंग से 18 मीटर दूर नंदी की अष्टधातु से निर्मित मूर्ति अपने शांत और सौम्य रूप में विराजमान हैं। 152 सेमी ऊँची यह विशालकाय मूर्ति 38 सेमी ऊँचे पायदान पर स्थित है। भरमौर से करीब 35 किमी दूर सागर तल से 5486 मीटर की उंचाई पर स्थित मनीमहेश चोटी प्रकृति की रमणीयता को संजोए आध्यात्म और शांति का पावन स्थल है। इसे चंबा कैलाश कहा जाता है।

मनीमहेश अर्थात् मन का महेश। मन की सारी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले प्रभु मनीमहेश के नाम से यहां एक विशाल झील विद्यमान है। इस मनीमहेश झील का पावन संबंध प्रभु मनीमहेश मंदिर से है।

भाद्र मास के कृष्ण पक्ष अर्थात् कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भगवान मनीमहेश मंदिर में मेले का आयोजन होता है। इस मेले को मनीमहेश जात्रा के नाम से भी जाना है। इस दिन गद्दी जनजाति के लोग मनीमहेश झील के पावन जल से स्नान करके प्रभु मनीमहेश के दर्शनों के लिए मनीमहेश मंदिर जाते हैं। इस मनीमहेश जात्रा के संदर्भ में पौराणिक कथा है, कि जब भगवान कृष्ण का जन्म हुआ तो प्रभु शिव कैलाश से उनके दर्शन के लिए गए थे, इसलिए इस जात्रा को कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मनाते हैं।

गद्दी जनजाति के देवी देवताओं में लक्ष्णा देवी का विशेष स्थान है। लकड़ी से निर्मित मां लक्ष्णा के इस मंदिर को भी महाराजा मेरूवर्मन ने आठवीं शताब्दी में बनवाया था। प्राचीनता और आधुनिकता का अनोखा समागम लिए मां लक्ष्णा का यह मंदिर हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में महिषासुर मर्दनी का प्रतिरूप माना जाता है। धातु की यह मां लक्ष्णा की मूर्ती संभंग मुद्रा में दाहिने हाथ में त्रिशुल धारण किये हुए हैं। आयताकार मंच पर लक्ष्णा देवी की धातु की मूर्ति भक्तों के बीच सदैव अपना तेज बिखेरती रहती है। 

इस मंदिर को देखने से ऐसा कहा जा सकता है कि इस पर उत्तर गुप्त कालीन सभ्यता के अजंता की विशेष छाप है। लकड़ी से निर्मित इस मंदिर की दीवारों पर बेहद सुन्दर नक्काशी की गई है। जो उस समय की कला को प्रदर्शित करती है। मंदिर के भीतरी भाग को गर्भ गृह कहा जाता है। यहां मां लक्ष्णा अपने जागृत रूप में विराजमान है। गर्भ के आगे खुली जगह को मुखमंडप कहते हैं। मंदिर की छत का निर्माण पत्थरों की स्लेटों से हुआ है, परन्तु इस मंदिर की विशिष्टता इसकी काष्ठकला में छुपी हुई है। नरसिंह भगवान विष्णु के प्रतिरूप। भगवान नरसिंह गद्दी समुदाय के प्रमुख देवताओं में से एक हैं। इन्हें नरसिम्हा भी कहा जाता है। वर्मन साम्राज्य के राजा अजयवर्मन के काल में भगवान नरसिंह की मूर्ति की स्थापना हुई थी। 91 सेमी लंबी धातु की इस मूर्ति में मानव और सिंह के रुपों का कलात्मक संयोजन है।

भगवान नरसिंह के बाद अब हमारा अगला पड़ाव प्रभु गणेश का मंदिर है। अष्टधातु से बनी गजनान गणेश की मूर्ति वर्मन साम्राज्य के कुशल मूर्तिकार गूगा द्वारा बनवाई गई है। भगवान गणेश की यह मूर्ति 91 सेमी लंबी है। मूर्त स्वरूप में भगवान गणेश अपनी आंखों को खोले भक्तों को दर्शन दे रहे हैं। इन मंदिरों और देवालयों के साथ ही इस पर्वतीय क्षेत्र में एक और पवित्र मंदिर है, जिसे छितरेरी मंदिर कहा जाता है। मां शक्ति की मनमोहक 37 सेमी लंबी मूर्ति 15 सेमी लंबे धातु के पद्म पीठ पर स्थापित है। शक्ति की यह मूर्ति त्रिभंगा मुद्रा धारण किये दिव्य तेज के समान प्रकाशित हो रही है। प्रत्येक वर्ष दूर्गा अष्टमी के तीसरे दिन मां शक्ति का विशाल मेला लगता है। इस मेले में भक्त मनीमहेश झील के पावन जल से स्नान करके शक्ति पूजा करने जाते हैं। मां शाक्ति का यह मंदिर छितरेरी गांव में स्थापित होने के कारण छितरेरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। रावी नदी के बाई ओर चंबा नदी से 48 किमी दूर इस विशाल गांव में ब्राम्हणों की जनसंख्या ज्यादा है। मां शक्ति का यह मंदिर महाराजा मेरूवर्मन ने आठवीं शताब्दी में बनवाया था।

चेहरे पर मासूमियत सी मुस्कान लिए गद्दी समाज के लोग आधुनिक सुख-सुविधाओं से मीलों दूर अपनी जिंदगी में अलमस्त रहने वाले हैं। जाड़ों के ठंड भरे मौसम में धूप का मखमली एहसास पाने के लिए खानाबदोश जिंदगी बिताते हैं तो वहीं दूसरी तरफ बाजुओं को फौलाद बनाकर धरती से अनाज भी पैदा करते हैं। गद्दी समाज में भी महिलाएं बराबरी का दर्जा हासिल किए पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए जिंदगी के सफर को तय कर रही हैं। यह गद्दी जनजाति के लोग हैं, जो खुद जिंदगी को जीते-गाते और हंसते हुए जिंदगी का फलसफा पेश करते हैं। यही गद्दी जनजाति है।

6 प्रतिक्रिया:

  1. गद्धी के बारे में लिखा आपका लेख बहुत कुछ समेटे हुए है, बेहतरीन लेख।

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  2. vah nyi jaankari ke liyen dhnyvaad hmare raajsthaan ke svaai maadhopur me bhi gaddi bhut hai or mzbut sthiti me hai ...akhtar khan akela kota rajsthan

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  3. संस्कृति का संस्कृत से इतना गहरा नाता इतिहास में प्रधानता से उजागर होना चाहिये।

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  4. गद्दी जनजाति के बारे में इतना कुछ पहली बार पढ़ा। ऐसे आलेख किसी भी समुदाय को ठीक से समझने में सहायक होते हैं। लगभग हरेक बिंदुओं पर आपने विस्तृत प्रकाश डाला है। पहाड़ों में बसने वाले समुदायों के रीति-रिवाजों में कुछ न कुछ साम्य देखने को मिलता है। ऐसा वहां की जलवायु के कारण होता होगा। रोजी-रोजगार उनके जीवन शैली में विभिन्नता प्रदर्शित करते हों लेकिन कई बातें मिलती जुलती हैं। एक बात यह खटक रही है कि आपने इन्हें हिंदू नहीं लिखा, हिंदुओं की तरह लिखा है। मैं जानता नहीं लेकिन आपका आलेख पढ़ने के बाद तो ये मुझे हिंदू ही लग रहे हैं।

    बाबा का एक और आकर्षक नाम मनीमहेश पढ़कर आनंदित हूँ। सचमुच मनीमहेश हैं बाबा। आज की इस पोस्ट को पढ़कर जानकारी के साथ-साथ आनंद का भी अनुभव हो रहा है।
    ..आभार।

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  5. गद्दी जनजाति की परंपरा और जीवन शैली का विस्तार में परिचय कराने का आभार!

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