23 नवंबर 2011

रस्सी में अटका अस्तित्व


संदीप मुदगल
दुनिया में जीने का अधिकार आखिर किसे है ? मानवीय आधार पर इस प्रश्न का उत्तर है, सबके पास। दूसरी ओर, चाल्र्स डार्विन के ‘सर्वाइवल आॅफ द फिटेस्ट’ सिद्धांत के बारे में आम धारणा है कि उसमें शक्ति संपन्न को ही जीने का अधिकार होने की सिफारिश की गई है। डार्विन जैसे मानवतावादी के इस सिद्धांत के बारे में यह गलत धारणा दरअसल बरसों-बरस की सोची-समझी राजनीतिक साजिश का नतीजा रही है। ‘सर्वाइवल...’ सिद्धांत से डार्विन का आशय था, बदलते समय के साथ-साथ जो प्राणी स्वयं को सकारात्मक तौर पर बदल सके, वही जिंदा रहने के लिए सबसे ‘आदर्श पात्र’ (फिटेस्ट) साबित होता है।

जीवविज्ञानी डार्विन ने यह सिद्धांत आदिकालीन प्राणिजगत के लिए दिया था, जो लाखों वर्ष पूर्व नई अस्तित्व में आई पृथ्वी पर हो रहे तीव्र भौगोलिक परिवर्तनों से बचने का प्रयास करते किसी तरह से ‘सर्वाइव’ कर रहे थे। परंतु सच यह है कि इनसान पर भी यह सिद्धांत लागू होता है, जिससे मतांतर केवल विशिष्ट मठीय पूर्वाग्रहों के दबाव में थकी हुई और पिटी-पिटाई सोच ही कर सकती है।

बहरहाल, इसमें कोई दोराय नहीं कि जीने का हक सबका है। तो फिर कत्ल जैसी घटनाएं क्यों होती हैं ? वहीं अगर कोई हत्या सिर्फ यह फलसफा आजमाने के लिए की जाए कि कोई व्यक्ति शारीरिक, बौद्धिक या आर्थिक तौर पर दूसरे से कमतर है तो उसे क्या कहा जाएगा! मात्र यही विषयवस्तु है अल्फ्रेड हिचकाॅक की फिल्म ‘रोप’ की! 

हिचकाॅक के फिल्मकार के बारे में कई धारणाएं हैं, अधिकांश लोग उन्हें सस्पेंस का बादशाह मानते हैं। यदि एक बार को हम हिचकाॅक के समूचे सिने संसार का समग्र मूल्यांकन करें तो पता चलता है उन्होंने सस्पेंस के प्रचलित माने जाने वाले फाॅर्मूले से अपनी खासी दूरी बनाए रखी थी। वह मनोविज्ञान को अधिक तरजीह देते थे। मनोविज्ञान का एक छुपा हुआ अंश सस्पेंस का बेहद होता है, परंतु मनोविज्ञान मूलतः वैज्ञानिक विषय है।

दूसरी बात, हिचकाॅक रोमांस को बहुत खूबी से उकेरते थे। उनके प्रिय विषय - खुद को निर्दोष साबित करने के लिए कानून और खलनायकों से बचकर भागते नायक को नायिका विपरीत परिस्थितियों में ही मिलती है। ‘द 39 स्टैप्स’, ‘सैबोट्यूर’, ‘नाॅर्थ बाय नाॅर्थवैस्ट’, ‘नोटोरियस’, ‘रैबैका’, ‘स्पैलबाउंड’ जैसी कई फिल्मों में उनका नायक विपरीत परिस्थितियों में भी रोमांस के पल तलाश लेता है। यह भी अपने आप में एक मनोवैज्ञानिक घटना ही कही जा सकती है, नायक के बचाव का एक मार्ग, जो केवल उसके लिए ही नहीं, नायिका के साथ-साथ दर्शकों के मनोविज्ञान को बचाए रखने का सामान होता है। इसके विपरीत, ‘रोप’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें कानून के साथ गंभीर खिलवाड़ तो है, परंतु वहां भी दोनों नायक (या खलनायक) और एक श्रेष्ठ नायक के बीच खींचतान नैतिकता और श्रेष्ठताबोध को लेकर दिखती है। फिल्म में रोमांस के छिटपुट अंश हैं, जो मुख्य कथा से अलग बीते कल की बात दिखते हैं। पूरी फिल्म उपरोक्त फलसफे पर आधारित है - जीने का अधिकार। 


फिल्म से जुड़े कुछ अन्य तथ्य भी हैं, पहला, यह हिचकाॅक का बनाया हुआ प्रथम रंगीन चलचित्र था। दूसरा, पूरी फिल्म एक ही घर, या कहें कि एक ही कमरे में फिल्माई गई है और तीसरा व सबसे बड़ा तथ्य कि फिल्म एक ही कैमरा एंगल से बनी है। फिल्म का तीसरा तथ्य यकीनन सबसे चौंकाऊ है। फिल्म इतिहास में आज तक जितने भी प्रयोग हुए हैं, हिचकाॅक का यह प्रयोग उन सबके बीच कहीं दब सा गया है। ‘रोप’ पर जितनी बात होनी चाहिए थी, नहीं हुई। हालांकि तकनीकी दृष्टि से यह फिल्म उससे पहले और बाद की कई फिल्मों से श्रेष्ठ है।

रोप के दोनों मुख्य पात्र समलिंगी परंतु विरोधाभासी हैं। हत्या करने वाला एक युवक उच्छृंखल (साजिश रचने वाला) और दूसरा अंतर्मुखी है। साजिश रचने वाले का कथन है कि वह हत्या एक प्रयोग के तौर पर की गई है, मरने वाला एक कमजोर व्यक्ति था इसलिए उसे जीने का कोई हक नहीं था। इस फलसफे पर शुरू में उसका अंतर्मुखी साथी हामी भरता है परंतु जब उसका साथी लाश को उसी कमरे में छुपाने की बात कहता है, जहां कुछ देर बाद एक दावत शुरू होने वाली है तो वह परेशान हो जाता है। अंतर्मुखी व्यक्ति के तौर पर फार्ले ग्रेंजर का अभिनय ध्यान देने लायक है। वह कम उम्र, अनुभवहीन, जल्द दूसरे व्यक्ति के असर में आ जाने वाला चरित्र है। पार्टी शुरू होने के साथ-साथ उसका तनाव भी बढ़ता जाता है। प्रत्येक नए व्यक्ति के आगमन पर उसके चेहरे पर एक अतिरिक्त सलवट दिखती है, जिसे कोई पकड़ नहीं पाता। परंतु उसके दोस्त को इंतजार है एक खास व्यक्ति का, जो दोनों का गुरु रहा है। दर्शनशास्त्र का अध्यापक, और अब दर्शन पर पुस्तकें प्रकाशित करता है, ‘बेहतरीन समीक्षाएं लेकिन शून्य बिक्री’, दोनों की महिला दोस्त (मृतक की मंगेतर) आमफेहम लेकिन अनजाने में सटीक और व्यंग्यात्मक तंज कसती है।

मृतक के पिता और अन्य दोस्तों के बाद दर्शन गुरु भी पधारता है, तनाव हद से ज्यादा बढ़ जाता है अंतर्मुखी हत्यारे के लिए। कुछ अंतराल के बाद उसके चेहरे के भाव धीरे-धीरे उसका गुरु पढ़ता जाता है। उधर सबको इंतजार है एक ही व्यक्ति का जो अब मर चुका है। पार्टी के बीच-बीच हंसी-मजाक, छींटाकशी और न आने वाले के लिए बेचैनी भरे संवाद सुनाई पड़ते हैं। इस बीच दर्शन गुरु अपने चेले के चेहरे के भावों को पढ़ता रहता है और खुद एक अदद निष्कर्ष पर जा पहुंचता है, लेकिन वह नतीजा क्या है, इसका खुलासा नहीं करता, शायद वह खुद पसोपेश में है कि उसका शिष्य तनावग्रस्त क्यों है, या वह सबकुछ जान गया है, या वह अपने चेले के तनावग्रस्त चेहरे में उसी के अतीत का कोई अंश तलाश रहा है, या इन सब से इतर, अपने चिर-परिचित ‘सनकी’ स्वरूप में किसी नए दार्शनिक अध्याय को ही लिखने का मन बना रहा है। लेकिन उसके चेहरे के भाव शको-शुबह के बढ़ते जाने को दिखाते हैं।

हिचकाॅक ने चेहरे के भावों से अभिनय बहुत ही कम अवसरों पर इससे बेहतर कराया है। इसका कारण, हिचकाॅक एक ‘एक्टर्स डायरेक्टर’ न होकर साधारण ‘स्टोरी टैलर’ थे, जिसका लक्ष्य कहानी को सीधे-सादे तरीके से कहना होता था। अभिनय की गुणवत्ता का फैसला वह दर्शकों पर छोड़ देते थे। कहना न होगा कि हिचकाॅक की फिल्में मूलतः अभिनय के लिए न होकर उनके ‘प्लाॅट्स’ और मनोवैज्ञानिक उठा-पटक के लिए याद की जाती हैं। बहुत कम अवसरों पर हिचकाॅक अभिनेताओं से इससे बेहतर अभिनय ले सके हैं और ऐसा फिल्म के एक कमरे में बंद परिवेश के कारण हुआ है।

कथानक के बारे में इतना भर बता देना भी शायद कुछ ज्यादा हो जाता है। वैसे ‘रोप’ ‘हू डन इट’ नहीं है, हिचकाॅक की अधिकांश फिल्में ‘हू डन इट’ नहीं होती। इसलिए दर्शक अधिकांशतः उनकी फिल्में देखते हुए संभावित अंत को आधे रास्ते में ही भांप लेते हैं। ‘रोप’ इस मामले में बहुत भिन्न नहीं है, लेकिन फिल्म के अंत में रहस्य के पत्ते किस तरीके से खुलेंगे, पर पर्दा पड़ा रहता है। मनोविज्ञान को पीछे छोड़ शुद्ध ढंके-छुपे सस्पेंस को उकेरने का हिचकाॅक का यह अप्रतिम प्रयास है।

तो आखिर ‘रोप’ क्या और क्यों है ? इतना ही जान लेना काफी है कि आम जनजीवन में अपने से कमतर चरित्र पर रौब डालना गाहे-बगाहे हरेक व्यक्ति का प्रिय शगल बन जाता है! यह आदत जाने-अनजाने हर व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बन जाती है। रोप में हत्या एक रस्सी से की जाती है, एक आम इस्तेमाल की चीज। साजिश रचने वाला हत्यारा उसी रस्सी में लपेट कर कुछ पुस्तकें मृतक के पिता को भेंट करता है, एक अजीबोगरीब और हृदयहीन घटना! यह निश्चय ही एक बहुत भद्दा मजाक है, जायका बिगाड़ देने की हद तक भद्दा! रस्सी में बंधी पुस्तकों के सहारे हिचकाॅक समूची कथित सभ्यता पर सवाल दागते हैं, एक बहुआयामी सवाल! रस्सी में बंधी किताबें मानवीय विरोधाभास को दर्शाती हैं। एक आम इस्तेमाल की वस्तु और ज्ञान का पुलिंदा, मासूमियत और ज्ञान, कितनी मासूमियत और कितना ज्ञान!! यह ज्ञान किसके लिए है, मासूमियत किसकी है, ज्ञान किसके काम आएगा और मासूमियत कब तक कायम रहेगी!! सवाल दर सवाल उठते हैं। हिचकाॅक के सिने संसार में ऐसा दहला देने वाला बिंब बहुत कम देखने को मिलता है।

रोप का एक और रोचक तथ्य उसका फिल्मांकन है। जैसा कि बताया गया कि फिल्म पूरी तरह एक ही कैमरा एंगल से फिल्माई गई है। इस दृष्टि से फिल्म एक लंबा दृश्य हो जाती है, जिसमें कोई दूसरा दृश्य नहीं है। इसके बावजूद, फिल्म में कुछ दृश्य सर्वथा नए सिरे से शुरू होते हैं। प्रसिद्ध फ्रांसीसी निर्देशक फ्रांकोइ त्रुफो को दिए गए लंबे इंटरव्यू (पुस्तक रूप में प्रकाशित) में हिचकाॅक ने फिल्म के कई तकनीकी पहलुओं पर ध्यान दिलाया है। वह सबसे पहले यह कहते हैं कि फिल्म उनके लिए परंपरा से हटकर थी, वह इसे बनाने की ओर कैसे मुड़े, इसका स्वयं उन्हें इल्म नहीं, लेकिन वह ‘रोप’ को किसी कीमत पर एक असफल प्रयोग मानने को राजी नहीं। वह कहते हैं कथा 7ः30 से 9ः15 तक चलती है और दावतखाने (डायनिंग रूम) से झांकती खिड़कियों से बाहरी रोशनी आती है। धीरे-धीरे कर अंधेरा छाता है (कहानी के मूड के अनुसार) और बाहर छाते जा रहे अंधेरे को कहानी में पिरोना बहुत जरूरी था। दूसरी बात, फिल्म एक लंबा सिंगल शाॅट है।

हिचकाॅक बताते हैं कि हरेक रील के अंत में जब कैमरा रीलोड करने की बारी आती तो वह किसी पात्र को कैमरे के आगे से निकालते और जिससे कैमरे के आगे अंधेरा छा जाता और इस दौरान रील बदली जाती। दूसरे शब्दों में कहें तो कैमरे को किसी की कमीज पर गहराई से फोकस किया जाता और अगली रील को उसी किरदार की उसी मुद्रा से शुरू किया जाता था। तो कह सकते हैं ‘रोप’ यकीनन एक असफल प्रयोग नहीं है। यह मंझी हुई निर्देशकीय दृष्टि का प्रमाण है, जिसके अनेकानेक नवीन पहलू हैं।

रोप मंच पर खेला गया एक नाटक है, जिसे फिल्म में तब्दील करते समय हिचकाॅक ने नाटक की शर्तों को सख्ती से पूरा किया है। ‘डायल एम फाॅर मर्डर’ में वह नाटक की शर्तों को तोड़ देते हैं, लेकिन यहां कथानक में ही ऐसी गुंजाइश नहीं है कि वह अपनी ओर से कुछ बदलाव कर सकते। ‘रोप’ के कथानक की गांठें सख्ती से एक दूसरे के साथ जुड़ी हैं, जिन्हें हिलाना मुमकिन नहीं। 

कथानक एक फलसफे के सहारे जुड़ा है। सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्योंकर एक सकारात्मक कथानक नहीं बुना जा सकता ? किसी समस्या के हल की तलाश में क्यों पहले कई सारी दुर्घटनाएं अवश्यंभावी हो जाती हैं ? उन दुर्घटनाओं को रोकने के अतिरिक्त प्रयास क्यों नहीं होते ? ‘रोप’ के कथानक में नकारात्मकता का अतिरेक क्यों है ? हत्या के लिए इस्तेमाल की जाने वाली रस्सी जान बचाने का काम भी कर सकती है, गिरते को संभालने या डूबते को बचाने के लिए, फिर वह रस्सी फंदा ही क्यों बनती है ? ऐसे ही कुछ मुद्दों पर दर्शन गुरु अंततः हत्यारे चेलों के साथ बहस करता है, परंतु क्या वह उन्हें कुछ समझा पाता है ? अंतिम दृश्य में उसके गोली चलाने से निर्देशक की क्या मुराद है ? क्या हिंसा रूपी अंतिम विकल्प किसी भी मुबाहिसे के दौरान बहुत जल्द आ धमकता है, या हमारा सारा दार्शनिक चिंतन अभी तक इतना परिपक्व भी नहीं हो सका कि वह समाज में जीवन-मृत्यु के अधिकार पर बहस को एक सही अंजाम देने की कूव्वत रखता हो ? दर्शन से जुड़े इन बिंदुओं को हमें पूरे सभ्यता विमर्श और राजनीतिक बहस के केंद्र में रखकर देखना जरूरी हो जाता है। ‘रोप’ के कथानक के यह दार्शनिक पहलू देर तक दर्शक को बेचैन रखते हैं।

6 टिप्‍पणियां:

  1. डार्विन की उक्ति के तात्विक विवेचन के बाद हिचहाक की कृति का यह विवेचन -मजा आ गया !(लिखना थोडा समझना अधिक )

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  2. अपने अपने विश्वों में जीने का अधिकार सबको है, दूलके के विश्व छेड़ने का अधिकार किसी को नहीं है।

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  3. दिलचस्प....पूरी फिल्म को एक नए नजरिये से देखने की इच्छा है

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  4. समीक्षा, फिल्म देखने की उत्सुकता जगा रही है. लोगों में फिल्म संस्कृति को बढ़ावा देने की ओर एक अच्छा प्रयास.

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