4 दिसम्बर 2011

लिक्खा हुआ कुछ और मिला है किताब में

ईमान गड़बड़ी में है दिल के हिसाब में
लिक्खा हुआ कुछ और मिला है किताब में

दिल जिनमें ढूंढ़्ता था कभी अपनी दास्ताँ
वो सुख़ियाँ कहाँ हैं मुहब्बत के बाब में!

ऎ दिलेनवाज़ पहलू ही जब दिल के और हों,
क्या ख़िलवतों में लुत्फ़ धरा क्या हिजाब में!

उस आस्ताँ तक हमको बहारों में ले के जाओ
जिस पर कोई शहीद हुआ हो शबाब में!



शमशेर बहादुर सिंह

3 प्रतिक्रिया:

  1. उस आस्ताँ तक हमको बहारों में ले के जाओ
    जिस पर कोई शहीद हुआ हो शबाब में!

    ____________________

    बेहतरीन..........

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  2. उस आस्ताँ तक हमको बहारों में ले के जाओ
    जिस पर कोई शहीद हुआ हो शबाब में!
    well said..

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं