28 जनवरी 2011

कूट-बीज

मैंने देखा है वह बीज
धीमे से उगते हुए
महत्वाकांक्षा का
अन्दर की सड़ी और बदबूदार ग्रंथियों में

घोंट कर अपना अभिमान
जलाकर आत्मा अपनी
जगाकर व्यथा पापों की
हीनता की दुरूह वीथियों में
अंतहीन यातनाओं की पीठ पर
गड़ा कर एड़ियाँ अपनी
उठाता है अपने स्वप्नमेघ

गहरी नींद के भयावह सपनों से
उठती हुई तृषा के भंवर में
ढूँढता है अपना संबल
एक जाग्रत तत्व
दांतों में दबाकर भय अपना
कूदता है किसी गहन अज्ञात में

फोड़ कर अपना आवरण
तोड़ कर परम्पराएँ अपनी
लांघ कर परकोटे ग्लानियों के
देता है अपने आने की सूचना
गहन निर्वात की नलिकाओं के ध्वांत में
नोंच कर रिक्ष अपनी आत्मा से
बिछा देता है लक्ष्य पथ पर

जंग लगे अभिमानों की
गली हुई मैल से
उगता है वो उदभिज
बनाकर स्फुल्लिंग स्वेदकणों को
जगाता है स्फुरण
अपनी मरी हुई जिगीषा में
हार की खीज में
खदबदाते कृमियों की
जिजीविषा चुराकर
भोंकता है सींग अपने अंतर्द्वंद्वों की छाती में
खींचता है अपने शब्द की लकीर

एक चिर अनंत प्रतीक्षा
बाँध कर अपने पौरुष की व्यग्रता
बैठ कर घुटनों के बल
एकटक देखती है
अपने स्वप्नों की नीहारिका
अज्ञातवास की पीड़ा भरती है
नये स्वप्न, नये स्पर्श, नयी सर्जना
ढूँढती है नये बीज
अपने इतिहास की अँधेरी
नम मिट्टी की परतों में

- दीपांकर

27 जनवरी 2011

बनिए का चाकर

कोल्हू का बैल और बनिए का चाकर हर वक्त फिरते हुए ही शोभा देते हैं.

किसी एक सुहानी वर्षा की बात है कि बादलों की मधुर-मधुर गरज के साथ झमाझम पानी बरस रहा था. चौक वाली बरसाली में सेठ जी के पास हीं उनका नौकर मौजूद था. पानी बिना रुके बह रहा है और यह ठूंठ कि तरह खड़ा है, कैसे बर्दाश्त होता !

चौक में पत्थर की पंसेरी पडी थी,सेठ जी इसी चिंता में खोये थे कि नौकर को क्या काम बताया जाये. यह तो मालिक कि तरह ही आराम कर रहा है !

पंसेरी पर नज़र पड़ते ही तत्काल उपाय सूझा चाकर कि तरफ मुँह करके हुक्म सुनाया,  "खड़ा-खड़ा देख क्या रहा है,यह पंसेरी अन्दर ले आ बेचारी पानी में भीग रही रही है"

- विजयदान देथा

नोट - विजयदान देथा की कहानियां हमें सुधांशु के सौजन्य से प्राप्त हो रही हैं।  

26 जनवरी 2011

पश्चिम से हम क्या सीख सकते हैं ? - 5

एन आर नारायण मूर्ति

हम भारतीय बौद्धिक ईमानदारी भी नहीं दिखाते हैं। मिसाल के लिए,हमारे राजनीतिक नेता पत्रकारों को मोबाइल फोन से फोन करके कहते हैं कि वो टेक्नोलाजी में विश्वास नहीं करते हैं ! अगर हम चाहते हैं कि हमारे युवा प्रगति करें,तो ऐसे पाखण्ड को रोकना होगा।

हम अपने नागरिक अधिकारों से अच्छी तरह परिचित हैं। मगर फिर भी अधिकारों के साथ जुड़े कर्तव्यों को स्वीकार करने में अक्सर नाकाम रहते हैं। हमें अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइसेनहावर के शब्दों को याद रखना चाहिए कि "जो लोग अपने उसूलों से ऊपर अपने विशेषाधिकारों को आंकते हैं,जल्दी ही दोनों को खो देते हैं।"

हमें याद रखना होगा कि हमारी अधिकांश बुनियादी सामाजिक समस्याएं आम भलाई के प्रति प्रतिबद्धता की कमी के कारण बढ़ती हैं। हेनरी बीचर ने कहा था,"संस्कृति वह है जो सबकी बेहतरी के लिए काम करने में हमारी मदद करती है।" मेरा मानना है कि अपने अच्छे मूल्यों को बरकरार रखते हुए और अपनी संस्कृति में इन पश्चिमी मूल्यों को शामिल करके हम सार्थक प्रगति कर सकते हैं।

हमारे व्यवहार की अधिकांश कमियां लालच,आत्मविश्वास में कमी,राष्ट्र में विश्वास की कमी और समाज के प्रति सम्मान की कमी की वजह से आती हैं। महात्मा गांधी के शब्दों को याद रखना सर्वाधिक उचित होगा कि "इस दुनिया में सबकी जरूरतों के लायक पर्याप्त है,मगर सबके लालच के लिए नहीं।" हम सब मिलकर एक ऐसा समाज बनाएं जहां हम दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करें जैसा दूसरों से हम अपने लिए चाहते हैं। हम जिम्मेदार नागरिक बनें और अपने देश को जीने के लिए एक बेहतर स्थान बनाएं। "उत्तरदायित्व महानता का मूल्य है",विंस्टन चर्चिल ने कहा था।

हमें अपने पारिवारिक मूल्य अपने घर की सीमाओं से आगे बढ़ाने होंगे। आइए हम ज्यादा से ज्यादा लोगों के ज्यादा से ज्यादा से ज्यादा कल्याण के लिए काम करें: समस्त जनाम् सुखिनो भवन्तु। हम महज अच्छे लोगों की तरह नहीं,अच्छे नागरिकों की तरह भी बर्ताव करें,ताकि अगली पीढ़ी के लिए अच्छी मिसाल पेश कर सकें।
समाप्त
पिछली किस्तों के लिंक - पहली किस्त, दूसरी किस्त, तीसरी किस्त,चौथी किस्त.

25 जनवरी 2011

पश्चिम से हम क्या सीख सकते हैं ? - 4

एन आर नारायण मूर्ति

पश्चिम से एक और सबक उनके कार्य-व्यवहार में व्यावसायिकता के विषय में सीखा जाना है। वैयक्तिक समीकरणों से ज्यादा अहम आम भलाई है। पश्चिम में व्यावसायिक कामों में लोग निजी संबंधों को आड़े नहीं आने देते। वे किसी सहयोगी के अयोग्य काम के बारे में ईमानदारी फीडबैक देने में जरा भी नहीं हिचकिचाएंगे,भले ही वह सहयोगी उनका निजी मित्र हो। भारत में हम कार्य संबंधी संवाद को निजी परिप्रेक्ष्य में देखते हैं।

व्यवसायिकता का एक और पक्ष श्रेष्ठता को लागू करना है। श्रेष्ठता निजी वरीयताओं और पूर्वाग्रहों को किसी व्यक्ति के प्रदर्शन का आकलन करने में हमें प्रभावित नहीं करेगी। जैसे-जैसे हम खुद को विश्व-मानकों के समकक्ष लाना शुरू करेंगे,हमें श्रेष्ठता को अपनाना होगा। हम दुनिया में सबसे पतली चमड़ी वाला समाज हैं। हम वहां भी अपमान देख लेते हैं जहां अपमान की मंशा नहीं होती। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि हम करीब हजार साल तक आजाद नहीं रहे थे।

व्यावसायिकता का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है समय की पाबंदी और दूसरे लोगों के समय की कद्र करना। पश्चिम में समय की पाबंदी सभी लेन-देनों में एक महव्तपूर्ण कसौटी होती है। मगर भारतीय मानक समय पता नहीं क्यों हमेशा पीछे चलता है। डेडलाइन कभी पूरी नहीं की जाती हैं। कितने सार्वजनिक प्रोजेक्ट समय से पूरे नहीं होते हैं ? निराश करने वाली बात यह है कि हमने इसे अपवाद की जगह नियम मान लिया है।

भारत में मीटिंग में देर से आना महत्वपूर्ण होने की निशानी समझा जाता है। आप पद में जितना ऊँचा होंगे,आप आपसे किसी भी मीटिंग में उतना ही लेट पहुंचने की उम्मीद की जाती है !  बेशक,अगर आप वीवीआईपी है तब तो मीटिंग में आने की जरूरत ही नहीं है,भले ही आपने उसमें शामिल होने का वादा किया हो !

पश्चिम में,बहुत कम उम्र से ही माता-पिता बच्चों को स्वतंत्र रूप से सोचने सिखाते हैं। इस प्रकार वे मजबूत आत्मविश्वासी व्यक्ति बनते हैं। हमारी संस्कृति में आपसे अपने बास या बड़ों लोगों से अलग सोचने की अपेक्षा नहीं की जाती। ज्यादातर स्कूल कालेजों में अध्यापकों को सवाल पूछने वाले विद्यार्थी पसंद नहीं आते। जहीन लोगों को भी मैंने स्वतंत्र रूप से सोचने को नकारते और बास द्वारा कहे अनुसार काम करना पसंद करते ही देखा है। अगर हमें विश्व में सफल होना है तो इस व्यवहार पर काबू पाना होगा।

पश्चिम में समझौते की शर्तों का शायद ही कभी उल्लघंन होता हो। विश्व-बाजार में व्यापार करने के इच्छुक किसी भी राष्ट्र की विश्वसनीयता को बढ़ाने का सबसे अहम पहलू कानूनी अधिकरों और समझौतों को लागू करना है। भारत में हम शादी के वचनों को पवित्र मानते हैं। मगर इस मानसिकता को सार्वजनिक क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए भारत का एनरान के साथ लाभहीन समझौता था। इस समझौते के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने के बजाय हमने समझौते को ही पूरा नहीं किया। यह उचित होता कि हम समझौते को रद्द कर देते,क्योंकि एनरान नाजायज गतिविधियों में लिप्त था। मगर हमने तो एनरान की नाजायज गतिविधियों के बारे में पता लगने से बहुत पहले ही समझौते से हाथ खींच लिया था।

अमेरिकी विश्वद्यिालयों में उच्च शिक्षा के लिए दी जाने वाली राष्ट्रीय छात्रवृत्ति के लिए मैंने कई छात्रों की सिफारिश की है। उनमें से अधिकांश भारत लौटे ही नहीं,जबकि समझौते के अनुसार उन्हें अपनी डिग्री पाने के बाद कम से कम पांच वर्ष भारत में बिताने चाहिए थे।

वास्तव में,एक प्रसिद्ध अमेरिकी विश्विद्यालय के एक प्रोफेसर के अनुसार ऋण अदा न करने वालों में सबसे ज्यादा तादाद भारतीयों की होती है,ये सब छात्र अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होते हैं और बढ़िया नौकरियां पाते हैं,मगर अपना ऋण चुकाने को तैयार नहीं होते। उनकी इस हरकत की वजह से भारत से अब जाने वाले छात्रों के लिए ऋण पाना मुश्किल हो गया है। हमें इस रवैये को भी बदलना होगा।
जारी...

22 जनवरी 2011

पश्चिम से हम क्या सीख सकते हैं ? - 3


एन आर नारायण मूर्ति

हमारे बौद्धिक अहं ने भी हमारे समाज का कोई भला नहीं किया है। मैंने बहुत ज्यादा यात्राएं की हैं और अपने अनुभव में मैंने कोई दूसरा ऐसा समाज नहीं देखा है जहां लोग इतनी कम प्रगति करके जितनी कि हमने की है,बेहतर समाजों के प्रति घृणा रखते हों जितनी की हम रखते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि अहं पाखण्ड को जन्म देता है। कोई और समाज वर्तमान में इतनी कम उपलब्धियां हासिल करके,अपने अतीत की इतनी डींगे नहीं हांकता जितना कि हम हांकते हैं।

यह कोई नई घटना नहीं है,बल्कि कम से कम हजार साल पुरानी है। मध्य पूर्व से दसवीं सदी में आए यात्री और तर्कशास्त्री अल बरूनी ने,  भारत में तीस साल रहे थे,भी भारतीयों की इस खासियत का जिक्र किया है। उनके अनुसार,उनकी यात्रा के दौरान ज्यादातर भारतीय पण्डित उनसे शास्त्रार्थ करना तक अपनी शान के खिलाफ समझते थे। वास्तव में,कुछेक बार जब किन्हीं पण्डितों ने उनकी बातें सुनने की इच्छा दिखाई और उनके तर्कों को बहुत सशक्त पाया,तो हमेशा ही बरूनी से पूछा कि किस भारतीय पण्डित ने उन्हें इतनी प्रभावशाली बातें सिखाईं हैं !

किसी प्रगतिशील समाज का सबसे महत्वपूर्ण गुण उन लोगों के प्रति सम्मान है,जिन्होंने उससे ज्यादा उपलब्धि हासिल की है,और उनसे सीखने की इच्छा है। इसके विपरीत,हमारे नेता हमें विश्वास दिलाते हैं कि दूसरे समाज ऐसा कुछ नहीं जानते जो अपनाने लायक हो। साथ ही,मीडिया में रोज आप हमारे नेताओं के बेशुमार दावे पाएंगे कि हमारा देश दुनिया में सबसे महान है। बेहतर होगा ये लोग थामस कार्लायल के शब्द याद कर लें कि "हमारी सबसे बड़ी गलती किसी अन्य के प्रति सचेत न होना है।"

अगर हमें प्रगति करनी है तो हमें यह रवैया बदलना होगा,उन लोगों की बात सुननी होगी जिन्होंने हमसे बेहतर प्रदर्शन किया है,उनसे सीखना और उनसे बेहतर प्रदर्शन करना होगा। हम अपनी असफलताओं का तर्कसंगत ठहराते रहते हैं। हमारे समान किसी और समाज ने इस गुण में महारत हासिल नहीं की है। जाहिर है,यह हमारी अक्षमता,भ्रष्टाचार और उदासीनता को न्यायसंगत ठहराने का एक बहाना है। इस रवैये को बदलना होगा। सर जोसिया स्टैंप की बात याद रखना बेहतर होगा,जिन्होंने कहा था,अपने दायित्वों से मुकरना आसान है,लेकिन हम अपने दायित्वों से मुकरने के परिणामों से नहीं मुकर सकते।

एक और महत्वपूर्ण गुण जो हम भारतीय पश्चिम से सीख सकते हैं,वह है जवाबदेही। पश्चिम में,आपका चाहे जो भी पद हो,आप अपने कामों के लिए जवाबदेह होते हैं। भारत में, आप जिने ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं उतना ही कम जवाबदेह होते हैं। उदाहरण के लिए,एक वरिष्ठ नेता ने एक बार घोषणा की कि वो लगातार दस साल से अपना टैक्स रिटर्न भरना भूल जा रहे हैं - और उनका कुछ नहीं बिगड़ा !  भारत में सौ से ज्यादा नुकसान में जा रही सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां  (केन्द्रीय) हैं। मैंने इन संस्थाओं के किसी मंत्री,अफसर या टाप मैनेजर के खिलाफ बुरे प्रदर्शन के लिए कोई कार्रवाई की जाते हुए नहीं देखी।

श्रम की गरिमा पश्चिमी मूल्य प्रणाली का एक और अभिन्न हिस्सा है,लोग अपने काम पर गर्व कर सकते हैं फिर चाहे वे जो भी काम करें। दूसरी ओर भारत में हम शारीरिक श्रम अनुशासित क्रियान्वयन या जवाबदेही के काम करने वालों को नीची निगाह से देखते हैं। भारत में हर कोई विचारक बनना चाहता है,कर्ता नहीं,क्योंकि कुछ भी करने के लिए मेहनत करनी होती है और उसे नीचा समझा जाता है।

मैं बहुत से इंजीनियरों से मिला हूं,कालेज से नए-नए निकले इंजीनियर,जो बस आराम की नौकरी करना चाहते हैं,ऐसा काम नहीं जो कारोबार या देश के लिए महत्व का हो। हमने यह नहीं समझा है कि दफ्तर को साफ रखना भी उतना ही जरूरी और गरिमापूर्ण है जितना कि कंपनी को ठीक से चलाना। जब तक संस्था का हर व्यक्ति अपना बेहतरीन नहीं देगा,तब तक कोई संस्था सफल नहीं हो सकती। हमें ऐसी मानसिकता चाहिए जो ईमानदारी से काम करने वाले हर व्यक्ति का सम्मान करे।

भारतीय दोस्ताना हुए बगैर अंतरंग हो सकते हैं। वे बेहिचक अजनबियों से भी अहसान की मांग कर देते हैं। अभी उसी दिन जब मैं बंगलौर से मंत्रालय जा रहा था,तो ट्रेन  में एक साथी मुसाफिर से मुलाकात हुई। मुश्किल से पांच मिनट बातचीत हुई होगी कि उसने इल्तेजा की कि मैं उसके मैनेजिंग डाइरेक्टर से बात करूं कि अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत कम्पनी के निचले दस फीसदी की सूची में आया उसका नाम हटा दें। मुझे रुडयार्ड किपलिंग का कथन याद हो आया,"पश्चिमी व्यक्ति बिना अंतरंग हुए मित्रवत हो सकता है,मगर एक पूर्वी व्यक्ति बिना मित्र हुए अंतरंग हो सकता है।"
जारी...

21 जनवरी 2011

पश्चिम से हम क्या सीख सकते हैं? - 2

एन आर नारायण मूर्ति

मैं उन कुछ सबकों की बात करुंगा जो हम भारतीय पश्चिम से सीख सकते हैं और अपने शानदार मूल्यों में उन्हें शामिल कर सकते हैं कि ताकि अपने समाज को बेहतर बना सकें पश्चिम में, समाज के लिए बहुत सम्मान है। पार्क गंदगी से मुक्त होते हैं, सड़कें साफ होती हैं, सार्वजनिक शौचालय में कुछ लिखा नहीं होता , ये ऐसे समाज के उदाहरण हैं जो समुदाय और उसकी जगहों का सम्मान करता है। दूसरी ओर, भारत में हम रोज़ अपने घरों को साफ़ करते हैं, अपने बागों में पानी देते हैं, लेकिन जब किसी सार्वजनिक पार्क में जाते है, तो उसे गंदा करने से पहले एक बार भी नहीं सोचते।

भ्रष्टाचार, जिस तरह हम इसे भारत में पसरा हुआ देखते हैं, एक और मिसाल है कि किस तरह हम अपने , ज्यादा से ज्यादा अपने परिवार के हितों को समाज के हितों से ऊपर रखते हैं। पश्चिम में समाज किसी हद तक भ्रष्टाचार से मुक्त है। मिसाल के लिए, वहां तेज़ गति के चालान से बचने के लिए किसी पुलिसवाले को रिश्वत देना बहुत मुश्किल है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वहां लोग सामाजिक हितों से ऊपर निजी हितों को रखने की समाज की कीमज को समझते हैं। मगर भारत में भ्रष्टाचार, टैक्स चोरी, धोखाधड़ी और रिश्वत हमें खोखला कर रहे हैं।

ठेकेदार अफ़सरों को रिश्वत देते हैं और सस्ते किसम की सड़कें और पुल बनाते हैं। नतीजा होता है कि कम पैसा खर्च हाने की वजह से समाज को दोयम दर्ज की सड़क मिलती हैं। यही कहानी रक्षा उपकरण़ों की खरीद, लाईसेंस हासिल करने और सरकारी पदों पर भर्ती के मामले में सच है। और ये महज कुछ उदाहरण हैं। दुर्भाग्य से, यह व्यवहार इतना व्यापक हो गया है कि लगभग सभी इसे मूक सहमती दे देते हैं।

समुदायिक मामलों को सम्बोद्धित करने में उदासीनता ने हमें प्रगति करने से रोक ररखा है, जो कि अन्य परिस्थितियों में हमारी पहुंच में होती।हम अपने आस-पास गंभीर समस्याओं को देखते हैं, मगर उन्हें हल करने की कोशिश नहीं करते। हम इस तरह बतार्व करते हैं मानो समस्याओं का अस्तित्व ही न हो या जैसे वे किसी और समस्याएं हों। दूसरी ओर, पश्चिम में लोग समाज की समस्याओं से सक्रियता से निबटते हैं। हमारे स उदासीन रवैये के अनेक उदाहरण हैं। मिसाल के लिए हम सब भारत में सूखे की समस्या से परिचित हैं। चालीस साल से भी पहले एक सिंचाई विशेषज्ञ डा. के एल राव ने परामर्श दिया था कि इस समस्या के हल के लिए उत्तर और दक्षिण भारत में सारी नदियों को जोड़ते हुए वाटर-ग्रिड बनाए जाएं। दुर्भाग्य से, इस दिशा में कुछ नहीं किया गया।

बंगलौर में बिजली की कमी एक और उदाहरण है। 1983 में यह तय किया गया था कि बंगलौर की बिजली की मांग पूरी करने के लिए एक पावर प्लांट बनाया जाएगा। बदकिस्मती से हमने अभी तक इसे शुरू नहीं किया है। मुम्बई का मिलन सबवे पिछले चार दशक से नारकीय हालत में है,मगर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। साफ्टवेयर इंडस्ट्री में जल्दी-जल्दी यात्राएं करने को देखते हुए,पांच साल पहले मैंने परामर्श दिया था कि 240  पेज का पासपोर्ट शुरू किया जाए। इससे बार-बार पासपोर्ट दफ्तर के चक्कर लगाना बच जाएगा। दरअसल,हम इसके लिए भुगतान करने को भी तैयार थे। मगर इस विषय में विदेश मंत्रालय के जवाब का मुझे अभी भी इंतजार है।

हम भारतीयों के लिए थामस हंटर के शब्दों को याद रखना बेहतर होगा कि "निष्क्रियता बहुत धीमे चलती है और गरीबी बहुत जल्दी उससे आगे निकल जाती है।" हमारी उदासीनता की क्या वजह हो सकती थी ? हजार साल से ज्यादा समय तक हमारे ऊपर विदेशियों का शासन रहा था। इसलिए हमने हमेशा से यह माना है कि सार्वजनिक या सामाजिक मुद्दे किसी विदेशी शासक की परेशानी है और उन्हें हल करना हमारी जिम्मेदारी नहीं है। हम बस किसी और के आदेश को पूरे करने के आदी हो गए हैं। हम वो होते हैं जो हम बार-बार करते हैं",अरस्तु ने कहा था। पिछले हजार साल से यह इंतजार करतने हुए कि कोई विदेशी हमें बताए कि क्या करना है,हमारे समाज के फैसला लेने वाले खुद फैसले लेने के आदी नहीं रहे हैं। वे किसी और का मुंह देखते हैं कि उनकी ओर से वह फैसले ले। दुर्भाग्य से,मुंह देखने के लिए कोई होता नहीं है और यही हमारी त्रासदी है।
जारी...

20 जनवरी 2011

पश्चिम से हम क्या सीख सकते हैं ?

नारायण मूर्ति हमारे समय के सर्वाधिक सफल उद्यमियों में से एक हैं। उनके भाषणों की एक पुस्तक समीक्षा के लिए आई थी। इसकी अनुवादक शुचिता मीतल हैं। । किताब का यह लेख मुझे रुचिकर लगा। यात्रा बुक्स  (पेंगुइन) से साभार मैं यह लेख प्रस्तुत कर रहा हूं। लेख लम्बा है इसलिए कई किस्तों में प्रस्तुत किया जाएगा - रंगनाथ

एन आर नारायण मूर्ति

मैं एक ऐसे महत्वपूर्ण विषय को उठाने जा रहा हूं जिस पर मैं सालों से मनन कर रहा हूं-  आज के भारतीय समाज में पश्चिम मूल्यों की भूमिका। दृढ मूल्यों पर निर्मित कंपनी के होने की वजह से यह विषय मेरे दिल के बहुत करीब है। इसके अलावा, एक संस्था अपने समाज का प्रतिनिधित्व करती है और कुछ सबक जो मैने अपनी कंपनी को चलाने के दौरान सीखे हैं, वे राष्ट्रीय संदर्भ में भी लागू होते हैं।

अंग्रेजी का ‘कम्युनिटी’ शब्द लैटिन के दो शब्दों के मेल से बना हैः काॅम साथ और उनस एक। यानी एक कम्युनिटी एक और बहुत दोनों ही है। यह लोगों का समूह भर नही, बल्कि एकीकृत बाहुल्य है। वेद कहते हैं ‘‘मनुष्य अकेले जी सकता है, लेकिन जिंदा केवल समूह में ही रह सकता है।’’ इसलिए, चुनौती वैयक्तिक और सामाजिक हितों में संतुलन बिठाते हुए एक प्रगतिशील समुदाय बनाने की है। इस चुनौती से निपटने के लिए हमें एक ऐसी मूल्य प्रणाली विकसीत करनी होगी जिसमें लोग सामान्य हित के लिए छोटे-छोटे त्यागों को स्वीकार करें।

मूल्य प्रणाली क्या है?  यह व्यवहार का ऐसा ब्योरा है जो मनुष्य के सदस्यों का भरोसा, विश्वास और प्रतिबद्धता बढ़ाता है। यह वैधता के दायरे से परे जाता है। यह हमारा शिष्ट एवं वाछित व्यवहार है। यह हमारे अपने हितों से पहले समुदाय के हितों को रखता है। दस प्रकार, हमारी सपासमुहिम जीवन रक्षा और उन्नति ठोस मूल्यों से निदिष्ट होती है।

हमारी मूल्य प्रणाली के दो स्तंभ हैं- परिवार के प्रति वफादारी और समाज के प्रति वफादारी। दोनों में से कोई भी दूसरे से अलग नही हो सकता क्योंकि सफल समाज वही हैं जो दोनों को सामंजस्यता से जोड़ता है। मगर, भारतीय समाज ने,  पिछले करीब एक हजार वर्षों से ज्यादा वर्षों से परिवार की वफादारी को सामाजिक वफादारी से ऊपर रखा है। दूसरी ओर, पश्चिम परिवार की अपेक्षा समाज के प्रति वफादारी पर कहीं ज्यादा ध्यान देता है इन दोनों समाजों के अच्छे पहलुओं को जोड़कर,  मेरा विश्वास है कि हम किसी वांछित हल पर पहुंच सकते हैं। इसी संदर्भ में मैं आज के भारतीय समाज में पश्चिमी मूल्यों की भूमिका पर चर्चा करुंगा।

आपमें से कुछ लोग सोचेंगे कि यहां मैं ज्यादातर बातें वास्तव में सदियों पुराने भारतीय मूल्यों की कर रहा हूं, पश्चिम मूल्यों की नहीं। लेकिन मैं वर्तमान में जीता हूं,किसी बीते हुए युग में नहीं और इन मूल्यों को मैने प्रमुखतः पश्चिम में प्रयुक्त होते देखा है, भारत में नही। इस आलेख के शीर्षक की यही वजह है। अगर इन मूल्यों को व्यवहार में लाया जाता है तो मुझे खुशी होगी, फिर चाहे इन्हें पश्चिमी मूल्य कहें या पुराने भारतीय मूल्य।

एक भारतीय के तौर पर, मुझे एक संस्कृति का भाग बनकर गर्व है जिसकी जड़ें पारिवारिक मूल्यों में गहरी पैठ हुई हैं। परिवार के प्रति हमारी जबरदस्त वफादारी है। माता-पिता अपने बच्चों के लिए बहुत त्याग करते हैं। वे उन्हें तब तक मदद देते हैं जब तक कि वे अपने पांव पर खड़े नहीं हो जाते। इसी के साथ,  बच्चे भी अपने बुर्जुग माता-पिता की देखभाल करना अपना फ़र्ज समझते हैं। हम इन कहावतों में विश्वास करते हैं- ‘‘मातृ देवो भव’’ मां ही ईश्वर है और ‘‘पितृ देवो भव’’ पिता ही ईश्वर है। भाई-बहनों को एक-दूसरे के लिए त्याग करने को पे्ररित किया जाता है और बड़े भाई या बड़ी बहन को दूसरे भाई- बहनों से सम्मान प्राप्त होता है। शादी को एक पवित्र संबंध समझा जाता है। पति-पत्नी से जीवन भर साथ रहने की उम्मीद की जाती है। संयुक्त परिवारों में, पूरे परिवार को परिवार के कल्याण के लिए काम करना होता है। हमारे पारिवारिक जीवन में बहुत ज्यादा प्यार और स्नेह होता है।

यही भारतीय मूल्यों का सार है और हमारी एक मुख्य ताकत है। हमारे परिवार हमारे लिए महत्वपूर्ण सहयोग तंत्र की तरह काम करने हैं। वास्तव में, इंफोसिस की सफलता का श्रेय इसके संस्थापकों के साथ ही उनके परिवारों को भी जाता है कि मुश्किल समस्या में भी उन्होंने उनका साथ दिया।

दुर्भाग्य से,  पारिवारिक जीवन के प्रति हमारा रवैया समुदाय के प्रति हमारे रवैया में नहीं झलकता है। सड़कों को गंदा करने से लेकर भ्रष्टाचार और संविदात्मक दायित्वों की अवहेलना करने तक, हम समाज की भलाई के प्रति उदासीन हैं। पश्चिम में, लोग परिवार के प्रति वफादारी के समान ही समाज के प्रति वफादारी को भी महत्वपूर्ण समझते हैं। वे हमसे ज्यादा समाज की परवाह करते हैं। वे आम तौर पर हमसे ज्यादा समाज के लिए त्याग करते हैं। नतीजा होता है सार्वजनिक और सामुदायिक जीवन की बेहतर गुणवत्ता।
 जारी...

18 जनवरी 2011

प्रथम अरब क्रान्ति

धरती के बिल्कुल ही दूसरे छोर पर एक छोटा सा देश है टयूनिशिया। इस छोटे से  इस्मालिक देश में करीब एक महीने से उथल-पथल मची हुई थी। टयूनिशिया में 23 साल से अपनी तानाशाही चला रहे बेन अली के खिलाफ आम जनता सड़क पर उतर आई थी। अंततोगत्वा जनता की जीत हुई। तानाशाह को गद्दी छोड़नी पड़ी। दि गार्डियन में मोना अल्ताहवी ने इस सफल जनआंदोलन पर लिखते हुए इसे "प्रथम अरब क्रान्ति" कहा है।

अल्ताहवी ने ध्यान दिलाया है कि इस आंदोलन की सबसे खास बात यह है कि इसमें सेना या किसी विदेशी सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। यह एक स्वतःस्फूर्त जनविद्रोह था। अरब देशों में तानाशाही के लम्बे इतिहास को देखते हुए इसे ऐतिहासिक घटना माना जा रहा है। बेन अली जैसे तानाशाह को जनता ने सत्ता से हटाकर एक नजीर बना दी है।

इस जनआंदोलन में विकीलिक्स की भी सकारात्मक भूमिका रही है। जूलियन असांज और उनके साथियों ने टयूनिशिया सम्बन्धित जिन अमरीकी तार को जारी किया था उसने जनता के गुस्से की आग में घी का काम किया। जूलियन असांज और विकीलिक्स के लिए यह बड़ी नैतिक जीत है। इस तरह यह सफल जनविद्रोह आम जनता और स्वतंत्र मीडिया दोनों के लिए प्रेरणादायक है।

तानाशाही के खिलाफ जनता की जीत को हमारा सलाम।

17 जनवरी 2011

कंकर स्तोत्र

कुछ दिन पहले बनारस जाना हुआ। वहाँ की सड़के इतनी कंकड़मय हो रखीं थी कि भारतेन्दु का यह सवा सौ साल पहले लिखा व्यंग्य स्मरण हो आया। - माडरेटर

 भारतेंदु हरिश्चन्द्र

कंकड़ देव को प्रणाम है.  देव नहीं महादेव क्योंकि काशी के कंकड़ शिव शंकर समान हैं.
हे कंकड़ समूह! आजकल आप नई सड़क से दुर्गाजी तक बराबर छाये हो इससे काशी खण्ड “तिले-तिले” सच हो गया, अतएव तुम्हें प्रणाम है.

हे लीलाकारिन् !  आप केशी शंकट वृषभ खरादि के नाशक हो, इससे माने पूर्वार्द्ध की कथा हो अतएव व्यासों की जीविका हो.

आप सिर समूह भंजन हो क्योंकि कीचड़ में लोग आप पर मुँह के बल गिरते हैं.
आप पिष्ट पशु की व्यवस्था हो क्योंकि लोग आप की कढ़ी बनाकर आप को चूसते हैं.

आप पृथ्वी के अंतरगर्भ के उत्पन्न हो. संसार के गृह निर्माण मात्र के कारण भूत हो. जलकर भी सफेद होते हो.  दुष्टों के तिलक हो. ऐसे अनेक कारण हैं जिनसे आप नमस्कारणीय हो.

हे प्रबल वेग अवरोधक!  गरूड़ की गति भी आप रोक सकते हो, और की कौन कहे, इससे आपको प्रणाम है.

हे सुंदरी सिंगार!  आप बड़ी के बड़े हो क्योंकि चूना पान की लाली का कारण है और पान रमणीगण मुख शोभा का सेतु है, इससे आपको प्रणाम है.

हे चुंगी नंदन! ऐन सावन में आपको हरियाली सूझी है क्योंकि दुर्गाजी पर इसी महीने में भीड़ विशेष होती है, तो हे हठ मूर्ते! तुमको दंडवत् है.

हे प्रबुद्ध! आप शुद्ध हिंदू हो क्योंकि शहर विरुद्ध हो आव (बाढ़ का पानी) आया और आप न बर्खास्त हुए, इससे आपको प्रणाम है.

हे स्वेच्छाचारिन्! इधर-उधर जहाँ आप ने चाहा अपने को फैलाया है. कहीं पटरी के पास हो कहीं बीच में अड़े हो, अतएव हे स्वतंत्र! आपको नमस्कार है.

हे उबड़-खाबड़ शब्द सार्थ-कर्ता! आप कोणमिति के नाशकारी हो क्योंकि आप अनेक विचित्र कोण सम्बलित हो, अतएव हे ज्योतिषारि! आपको नमस्कार है.

हे शस्त्र समष्टि! आप गोली-गोला के चचा, छर्रों के परदादा, तीर के फल, तलवार की धार और गदा के गोला हो, इससे आपको प्रणाम है.

आहा! जब पानी बरसता है तब सड़क रूपी नदी में आप द्वीप रूप में दर्शन देते हो. इससे आप के नमस्कार में सब भूमि को नमस्कार हो जाता है.

आप अनेकों के वृद्धतर प्रपितामह हो क्योंकि ब्रह्मा का नाम पितामह है उनका पिता पंकज है.  उसका पिता पंक है आप उसके भी जनक हैं इससे आप पूजनीयों में पूज्यनीय हो.

हे जोगा जिवलाल रामलालादि मिश्री समूह जीविकादायक! आप कामिनी भंजक धुरीश विनाशक, बारनिश चूर्णक हो. केवल गाड़ी ही नहीं, घोड़े की नाल, सुम, बैल के खुर और कंटक चूर्ण को भी आप चूर्ण करने वाले हो इससे आपको नमस्कार है.

आप में सब जातियों और आश्रमों का निवास है. आप वानप्रस्थ हो क्योंकि जंगलों में लुढ़कते हो. ब्रम्हचारी हो क्योंकि बटु हो. गृहस्थ हो चूना रूप से, संन्यासी हो क्योंकि घुट्टघट्ट हो. ब्राह्मण हो क्योंकि प्रथम वर्ण होकर भी गली-गली मारे-मारे फिरते हो. क्षत्री हो क्योंकि खत्रियों की एक जाति हो. वैश्य हो क्योंकि कांट-वांट दोनों तुम में है. शूद्र हो क्योंकि चरण सेवा करते हो. कायस्थ हो क्योंकि एक तो कंकर का मेल दूसरे कचहरी पथावरोधक तीसरे क्षत्रियत्व हम आपका सिद्ध कर ही चुके हैं. इससे हे सर्ववर्ण स्वरूप! तुमको नमस्कार है.

आप ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, अग्नि, जम, काल, दक्ष और वायु के कर्ता हो, मन्मथ की ध्वजा हो, राजा पददायक हो, तन मन धन के कारण हो, प्रकाश के मूल शब्द की जड़ और जल के जनक वरञ्ज भोजन के भी स्वादु कारण हो,  क्योंकि आदि व्यंजन के भी बाबा जान हो. इसी से हे कंकड़! तुमको प्रणाम है.

आप अंग्रेजी राज्य में श्रीमती महाराणी विक्टोरिया और पार्लामेंट महासभा के आछत प्रबल प्रताप श्रीयुत गवर्नर जनरल और लेफ़्टेण्ट गवर्नर के वर्तमान होते, साहिब कमिश्नर साहिब मजिस्ट्रेट और साहिब सुपरिन्टेंडेंट के इसी नगर में रहते और साढ़े तीन हाथ के पुलिस इंसपेक्टरों और कांसिटेबुलों के जीते भी गणेश चतुर्थी की रात को स्वच्छंद रूप से नगर में भड़ाभड़ लोगों के सिर-पाँव पड़कर रुधिर धारा से नियम और शांति का अस्तित्व बहा देते हो अतएव हे अंगरेजी राज्य में नवाबी स्थापक! तुमको नमस्कार है.

यहाँ लम्बा-चौड़ा स्तोत्र पढ़कर हम विनती करते हैं कि अब आप यह सिकंदरी बाना छोड़ो, या हटो या पिटो.

13 जनवरी 2011

अभिशापित

थक जाता हूँ मैं
थक जाता है मेरा शरीर
थक जाती है मेरी आत्मा

वह कौन सा बोझ है, जो ढोता हूँ मैं
वह कौन सी थकान है, जो पसर जाती है पलकों पर
कौन सा है दर्द वह, जो जाग जाता है हड्डियों में
कौन सा दबाव है, जो पस्त कर देता है मुझे
कैसे हैं वो स्वप्न, जो सो जाते हैं आँखों में

रिक्त हो जाता हूँ मैं
रिक्त हो जाता है मेरा शरीर
रिक्त हो जाती है मेरी आत्मा

कैसी है वो डाकिनी, जो सोख लेती है मेरी ऊर्जा
कौन सी हैं जड़ें वो, जो चूस लेती हैं मेरी प्रेरणा
कैसी है वह जमीन, जो पचा लेती है मेरा रक्त
कौन सा है विवर वह, रिस जाती है जिससे मेरी जिद

डर जाता हूँ मैं
डर जाता है मेरा शरीर
डर जाती है मेरी आत्मा

आसमान से टपकती हुई रात, घुला देती है मेरी अस्थियाँ
क्षितिज के पीछे का अज्ञात, खा जाता है मेरी नाव
नेपथ्य से आती परछाईयाँ, चाट जाती हैं मेरा हौसला
नीला शून्य चमक कर मेरी आँखों में
खींचता है मुझे, तान कर पीटता है मेरी आत्मा

बह जाता हूँ मैं
बह जाता है मेरा शरीर
बह जाती है मेरी आत्मा

एक रति है, जो पिघला देती है मेरा पौरुष
एक संगीत है, जो पकाता है मेरी चेतना
एक उड़ता हुआ बादल है जो,
ढँक कर गढ़ता है मेरी रुग्ण प्रतिभा

बढे हुए फोड़े की तरह
बह जाता हूँ मैं,
क्यों ढोता हूँ वह पीब
मार कर प्रेम को,
क्यों हूँ अभिशप्त मैं, अपनी महानता से
बस एक सूर्य और मेरी गाढ़ छाया
एक बलिवेदी, एक बलिदान
और एक मिथकीय कीर्ति.

- दीपांकर

9 जनवरी 2011

सबके दाता राम

दया धरम हिरदे बसै, बोलै अमरित बैन।
तेई ऊँचे जानिये, जिनके नीचे नैन॥

आदर मान, महत्व, सत, बालापन को नेहु।
यह चारों तबहीं गए जबहिं कहा कछु देहु॥

इस जीने का गर्व क्या, कहाँ देह की प्रीत।
बात कहत ढर जात है, बालू की सी भीत॥

अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास 'मलूका कह गए, सबके दाता राम॥

7 जनवरी 2011

चट्टान

चट्टान को तोड़ो
वह सुन्दर हो जायेगी
उसे तोड़ो
वह और, और सुन्दर होती जायेगी

अब उसे उठालो
रख लो कन्धे पर
ले जाओ शहर या कस्बे में
डाल दो किसी चौराहे पर
तेज़ धूप में तपने दो उसे

जब बच्चे हो जायेंगे
उसमें अपने चेहरे तलाश करेंगे
अब उसे फिर से उठाओ
अबकी ले जाओ उसे किसी नदी या समुद्र के किनारे
छोड़ दो पानी में
उस पर लिख दो वह नाम
जो तुम्हारे अन्दर गूँज रहा है
वह नाव बन जायेगी

अब उसे फिर से तोड़ो
फिर से उसी जगह खड़ा करो चट्टान को
उसे फिर से उठाओ
डाल दो किसी नींव में
किसी टूटी हुई पुलिया के नीचे
टिको दो उसे
उसे रख दो किसी थके हुए आदमी के सिरहाने

अब लौट आओ
तुमने अपना काम पूरा कर लिया है
अगर कन्धे दुख रहे हों
कोई बात नहीं
यक़ीन करो कन्धों पर
कन्धों के दुखने पर यक़ीन करो

यकीन करो
और खोज लाओ
कोई नई चट्टान !

- केदारनाथ सिंह

5 जनवरी 2011

तो चाँद क्या करेगा

जब सारे तारे चले जायेंगे
न जाते जाते;रात भी चली जायेगी
तो चाँद क्या करेगा

जब दुःख की चादर इतनी फ़ैल जायेगी
कि उससे बाहर निकलने की कोई सूरत नहीं बचेगी
जब पूरे आकाश का भार,अकेले उठाना मुश्किल हो जायेगा
जब किसी के आने का इंतजार लम्बा और लम्बा होता जायेगा
और आँखे, दिए के कोर की तरह स्याह से स्याहतर होती चली जायेंगी
तो चाँद क्या करेगा

- सुधांशु

4 जनवरी 2011

मेरे पति के लिए देश का मतलब देश की जनता है

आवेश तिवारी ने बिनायक सेन की पत्नि इलिना सेन के साथ थोड़ी देर पहले बातचीत की. हम उसी बातचीत को प्रस्तुत कर रहे हैं। 

इलिना आप अदालत के फैसले को किस तरह से देखती हैं ?

बिनायक ने पैसे और सारी चीजें छोड़कर गरीबों–आदिवासियों के लिए काम किया ,उनके ऊपर ऐसा आरोप लगाना कि वो देशद्रोही है गलत हैं.  उन्होंने हमेशा देश के लिए काम किया ,मेरे और मेरे पति के लिए देश का मतलब देश की जनता है. आश्चर्य ये है कि चोर ,लूटेरे ,गेंगेस्टर खुलेआम घूम रहे हैं ,और बिनायक सलाखों के पीछे हैं.

आपके पति को जिस कानून के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई गयी वो देश का ही कानून है ,आप हिंदुस्तान में लोकतंत्र को कितना सफल मानती हैं ?

विकास के दौर में गरीबी और अमीरी की खाई लगातार बढ़ी है ,संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में साफ़ तौर पर कहा गया है कि इस खाई को ख़त्म करने की कोशिश की जायेगी ,लेकिन आजादी के साथ सालों बाद भी ये खाई निरंतर गहरी होती जा रही है ,आज देश में विशाल माध्यम वर्ग है जिसके हाँथ में पूरा बाजार हैं लेकिन जितना विशाल माध्यम वर्ग है उतना ही बड़ा वो वर्ग है जो बाजार तक नहीं पहुँच पाता ये लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा हैं

बिनायक सेन का मामले ने एक और नए खतरे को दिखाया वो खतरा देश में अदालतों और प्रशासन की मिलीभगत से पैदा हो रहा है ,कई बार झूठे मामले बनाये जा रहे हैं और फिर अपनी नाक बचाने के लिए लगातार झूठ को सच बनाने का खेल खेलने में लग जाते हैं और फिर वो अपनी झूठी दलीलों से अदालतों को भी प्रभावित करने लगते हैं ,जैसा बिनायक सेन के मामले में हुआ

छत्तीसगढ़ में बिनायक सेन की गिरफ्तारी हुई ,उत्तर प्रदेश में सीमा आजाद की गिरफ्तारी होती हैं ,वही दूसरी तरफ अरुंधती रॉय छतीसगढ़ के जंगलों में जाती हैं ,नक्सली हिंसा का समर्थन करती हैं ,उनका इंटरव्यू छपता है ,क्या आपको लगता है राज्य माओवाद के सम्बंध में दोहरे मापदंड अपना रहा हैं ?

सीमा आजाद को मै अख़बारों के माध्यम से ही जानती हूँ ,फिर भी कहूँगी चाहे बिनायक सेन हों या सीमा आजाद ,साजिशन की जा रही कार्यवाहियां लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं.

जहाँ तक अरुंधती का सवाल है मैंने उन्हें पढ़ा हैं कहीं कहीं अरुंधती और बिनायक सेन के विचारों से समानता हो सकती है ,लेकिन विचारों में अंतर भी है ,हर व्यक्ति के विचारों में ये विभिन्नता है हमें विचारों का समान करना चाहिए ,हम काला सफ़ेद देखने लगते हैं कि क्या काला है क्या सफ़ेद है ,ऐसा नहीं होना चाहिए

मै देश के कई विश्वविद्यालयों में गया,युवा पीढ़ी विनायक को अपना आदर्श मानने लगी है उनकी गिरफ्तारी को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं आन्दोलन हो रहे हैं ,आप बिनायक को कितना साहसी मानती हैं ?

मेरे हिसाब से बिनायक साहसी जरुर है कई बार उन्होंने लोकप्रिय बातें न कहकर वो बातें कहीं जो कडवी लेकिन आम आदमी के हित की बात कही,जो उन्हें सही लगा उन्होंने बोला ये बात अलग है कि आप उनकी बात से सहमत और असहमत हों

आपको क्या लगता है कि छत्तीसगढ़ में अघोषित आपातकाल की स्थिति हैं ?

इसे हम घोषित आपातकाल कहेंगे

आपको क्या लगता है कि बार– बार सरकार आपके पति को ही निशाना क्यूँ बना रही है ,केंद्र सरकार की भी इस कार्यवाही में मूक सहमति है.

दो दिन पहले हमारे डीजीपी ने कहा कि सारे एनजीओ शक के दायरे में है उन्होंने कहा कि पीयूसीएल पर प्रतिबन्ध लगाएगी तो जनता लगाएगी ,जनता के बारे में इस तरह के ब्यान देना बेहद खतरनाक है कुछ दिनो पहले संदीप पांडे और मेधा पाटेकर शान्ति का पैगाम लेकर दंतेवाड़ा गए थे वहां उन पर अंडे और टमाटर फेंके गए थे ,जब वो गए थे तो राज्य के मंत्रियों ने कहा कि इनके लिए हम कुछ नहीं कहेंगे इनका फैसला जनता करेगी

ये बातें मुझे विचलित करती हैं कि वो कौन सी जनता है और उसे क्या इशारा किया जा रहा ,ये साफ़ है कि वो पीयूसीएल के खिलाफ जनता को सन्देश दे रहे हैं

आपको क्या लगता है वो कौन सी जनता है ?

वो उस जनता के बारे में बात कर रहे हैं जो उनके इशारे पर कुछ भी करने को तैयार हो

जेल जाने से पहले बिनायक सेन ने आखिरी बात क्या कही ?

मेरी मुलाक़ात उनसे २६ को हुई थी जब कोर्ट ने ये खेदपूर्ण निर्णय सुनाया,अब चुकी सजा हो चुकी है मुझे १५ दिन में सिर्फ एक बार मिलने दिया जायेगा ,मैंने उने कहा कि हम लड़ेंगे ,हम जहाँ तक ले जा सकेंगे ले जायेंगे जीतेंगे या नहीं जीतेंगे हम नहीं जानते.

इस पर बिनायक ने कहा कि जनतंत्र में बहुत गलतियाँ होती हैं सालों बाद पता लगता है कि किसी के साथ नाइंसाफी हुई है अगर हमारे साथ ऐसा हुआ तो ये मान लेना कि इसमें जनता का हित जुड़ा है

क्या आपको लगता है कि हिंदुस्तान में जनता और मीडिया आदालतों के फैसलों की आलोचना करने से डरती हैं ,अदालतें साम्राज्यवाद का प्रतीक बन गयी है ?

अदालती व्यस्था ने जो इस केस में भूमिका अदा की वो बेहद चिंताजनक है कानून की मौलिक समझ भी इस फैसले में नहीं दिखती ,बिनायक के खिलाफ फैसला सुननाने वाले जस्टिस वर्मा पहले वकील थे जो एक परीक्षा पास करके जज बन गए मुझे भी लगता ये कि लोकतंत्र है कोई राजशाही नहीं कि हम फैसलों के खिलाफ आवाज न उठा सके ,मुझे लगता है कि अदालतों के निर्णयों के मामले में भी अगर जनता सवाल कर रही है तो गलत नहीं कर रही है.

3 जनवरी 2011

साधु की कमाई

एक जाट बैलगाड़ी से कहीं जा रहा था. रास्ते में उसे एक साधु मिला.चौधरी भला था गाड़ी रोकते हुए कहा,"महाराज,जय राम जी की ! गाड़ी के रहते आप पैदल क्यों जा रहे हैं ! रास्ता आराम से कटे उतना ही अच्छा. आईए,गाड़ी पर बैठ जाईए ! आपकी सांगत से मुझे भी थोड़ा धरम-लाभ हो जायेगा"

महाराज के पास एक वीणा थी.  पहले उसे गाड़ी पर रखा और फिर खुद भी बैठ गया.

चौमासे के कारन रास्ता बहुत उबड़ खाबड़ था. हिचकोलों से गाड़ी का चूल-चूल हिल गया.चौधरी ने बैलों को पुचकारकर रास खींची.

नीचे उतारकर देखा-पहिये की पुट्ठीयाँ खिसक कर बाहर निकल आई थी. ठोंकने के लिए और कुछ नहीं दिखा तो उसने महाराज की वीणा उठा ली.एक तरफ बड़ा-सा तूंबा देख कर उसे लगा यह ठोंकने के लिए अच्छा औजार है.उसने पूरे जोर से पुठी पर वीणा का प्रहार किया तूंबा भितर से थोथा था.  पुट्ठी और पाचरे पर पड़ते हीं उसके परखच्चे उड़ गए.

चौधरी ने महाराज को उलाहना दिया, "वह महाराज,सारी उम्र भटककर एक ही औजार सहेजा और वह भी थोथा ! आपकी इस भगति में मुझे कुछ सार दिखा नहीं"

-विजयदान देथा