31 मार्च 2011

मुझे जिन्दा रखो कि मैं आत्मा हूँ तुम्हारी

मुझे जिन्दा रखो कि मैं आत्मा हूँ तुम्हारी
मुझे मत मरने दो कि मैं जिन्दा रखूंगी
तुम्हारे गीत, तुम्हारे शब्द, तुम्हारी सार्थकता

जब तुम बाज़ार में बिक जाओगे
कौड़ियों के मोल
नंगा हो जायेगा तुम्हारा शरीर
बह जायेगा तुम्हारा गेहूवां रंग
रेत बन कर तमाशे में सरेआम
तब भी जगा कर रखूंगी तुम्हारा गर्व
बचा कर रखूंगी थोड़ी सी लाज

जब अँधेरी रात में बुझ जायेंगे सारे दीये
भय का घुन खुरच खुरच कर खा जायेगा
तुम्हारा साहस, तुम्हारा धैर्य
तब भी बचा कर रखूंगी
तुम्हारे आँखों के कोवो में कुछ स्वप्न-बूँद

जब आँखों में तुम्हारे छा जाएगी
घमंड की चरबी
ईर्ष्या की झांयीं मार देगी टोना
तब दिखाउंगी तुम्हारे इतिहास का दर्पण
आँखों में झांक कर बताउंगी मैं
कि कैसे रेंगते थे तुम भी कभी पनीले काली नालियों में
कि कैसे किसी अँधेरी सुबह
चुपचाप दबे पाँव तुमने
दफना दिये थे अपने गंदले कपड़े
कि कैसे बंद कमरों में भीख मंगाते थे तुम दांत निपोरकर
तब मैं बचा कर रखूंगी थोड़ी सी प्यास
तुम्हारे आँखों के नमकीन पानी की खातिर

नाम की भूख में जब तिल तिल कर जलेगा तुम्हारा विवेक
सोने-चांदी जब हिला देंगे तुम्हारा ईमान
देह की आग जला देगी तुम्हारा संचित ज्ञान,
जब गल जाएगी तुम्हारी लौह प्रतिज्ञाएँ
मैं रोक दूंगी तुम्हें
पकड़ लूंगी तुम्हारी कलाई
पैरों में गिर कर लिपट जाउंगी
आँचल फैला कर मांग लूंगी सच की भीख, उसे कहने का साहस

जब अहम् तुम्हारा ठुकरा देगा
किसी अज्ञात प्रेम की छोटी सी याचना
और फिर उसकी ठंढी ग्लानि में
रो पड़ेगा तुम्हारा दर्प
तब भी जिन्दा रहूंगी मैं बन कर एक मीठी सी खलिश
मैं जिन्दा रखूंगी वह ताजी पुलक

समाज जब नोच लेगा सारे कीर्ति-रोम
जब शीशे के अन्दर बर्फ के फाहों में हजारों साल बाद गल जाएगी तुम्हारी देह
मिट्टी में दफ़न हो जायेंगे तुम्हारे लाव-लश्कर
समय के साथ जब झड़ जायेंगे
तुम्हारी कविताओं के अर्थ
तब भी

मैं भटकती रहूंगी अनीह, निस्पृह, अनिरुद्ध
बचा कर रखूंगी उनकी मर्यादा
ढोउंगी उनके सघन अंतर्द्वंद्व
जगाये रखूंगी उनका संशय
संजो कर रखूंगी उनके शाश्वत प्रश्न

मुझे जिन्दा रखो कि मैं आत्मा हूँ तुम्हारी
मैं नहीं मरने दूंगी तुम्हारा पौरुष
कि मैं जिन्दा रखूंगी उसकी विराट कल्पना.

- दीपांकर

25 मार्च 2011

हिन्दी ने एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता खो दिया


कमला प्रसाद जी को आलोचक,प्रगतिशील लेखक संघ के संगठनकर्ता और साहित्यिक पत्रिका वसुधा के संपादक के रूप में जाना जाता था। कमला प्रसाद जी सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके काम और व्यक्तित्व के प्रशंसक हिन्दी के सभी धाराओं के लोग थे। उनके निधन से हिन्दी ने एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता खो दिया है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

23 मार्च 2011

सिनेमा,समाज और राजनीति

जाह्नू बरूआ आधा दर्जन से ज्यादा राष्ट्रीय पुरस्कार और उतने ही अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों के विजेता हैं। असमिया सिनेमा में उन्हें सार्थक सिनेमा का पुरोधा माना जाता है। हिन्दी में बनाई उनकी फिल्म 'मैंने गाँधी को नहीं मारा' काफी प्रशंसित हुई थी।

जाह्नू बरूआ

सिनेमा अन्य माध्यमों की तुलना में सबसे ताकतवर माध्यम है। हर व्यक्ति समाज और राजनीति से जुड़ा हुआ है। मनुष्य जो कुछ भी करता है उसका समजा और राजनीति से रिश्ता होता है। क्षेत्र चाहे व्यापार हो या सिनेमा। मैंने जो कुछ भी सीखा है वह समाज से ही। समाज के साथ सिनेमा का गहरा संबंध है।

मेरी फिल्में समाज से जुड़ी होती हैं। मेरा विश्लेषण भी समाज से शुरू होता है। मैं अपनी फिल्म के लिए बजाय कहानी चुनने के किसी सामाजिक मुद्दे को अपना विषय बनाता हूँ। वह मुद्दा समसामयिक और डाक्यूमेंटरी महत्व का होता है। मेरी फिल्म का विषय जितना समाज से संबंधित होता है उतना ही राजनीति से भी। लेकिन मेरी फिल्म का राजनीतिक टोन डायरेक्ट नहीं होता। डायरेक्ट राजनीतिक टोन भड़काता है। बात राजनीतिक शोषण की हो तो भी मैं उसका विश्लेषण करके लोगों को दिखाता हँू। मैं निष्कर्ष नहीं निकालता। यह मैं अपने दर्शकों पर छोड़ देता हूँ। अगर मेरी फिल्म में ऐसा कोई अपराधी है,जिसने हत्या की है,तो मैं उसे अन्तिम दृश्य में सजा नहीं दिलवाता। आज की राजनीति के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। अक्सर कोई अपराधी किसी मंत्री से मिलकर अपने को सजा से मुक्त कर लेता है। आवश्यक्ता इसके विश्लेषण की है,और मैं यही करता हूँ।

मेरी फिल्मों में राजनीतिक विचार विश्लेषण अधिक होता है,मगर वह प्रत्यक्ष नहीं होता। वह विचार-विमर्श की प्रक्रिया में दिखता है। मेरा एक मकसद ऐसी बहस को प्रेरित करना भी है। हिन्दी सिनेमा बहस को रोकता है। यहां तक कि गोविंद निहलानी की फिल्में भी। क्योंकि इनके यहां पोलिटिकल टोन्स डायरेक्ट हैं। वे निष्कर्ष भी निकालते हैं जो जनता को भड़काने का काम तो करता है मगर किसी विचार-विमर्श के लिए प्रेरित नहीं करता। जो काम मैं दर्शकों से कराता हूँ वह काम गोविंद स्वयं करते हैं। मैं दर्शकों को शामिल करता हूँ और गोविन्द दर्शकों को माध्यम बनाते हैं।

सिनेमा का एक राजनीति दायित्व भी है। राजनीति निर्भर करती है लोगों के चुनाव और खारिज पर। किसी नेता को समझाना मेरा काम नहीं है। नेता ऐसे हैं जान-बूझ कर ऐसा या वैसा काम करते हैं। ऐसे नेताओं को समझाया नहीं जा सकता। लेकिन जब जनता ऐसे किसी नेता को चुनती है उसमें कहीं धोखा नहीं होता है। जनता की यह मासूमियत है कि वह उसका विश्लेषण नहीं करती। जनता को विश्लेषण करने के तैयार करने की जरूरत है। अगर हम राजनीति पर कुछ कर रहे हैं तो हमें यह प्रयास करना चाहिए। मैं अपनी फिल्मों में यह करता हूँ। सिनेमा राजनीतिक दायित्व ऐसे ही निभा सकता है।

एक गंभीर फिल्म भी लोगों को स्वस्थ मनोरंजन दे सकती है। मनोरंजन केवल हास्य नहीं है। या केवल हास्य से ही मनोरंजन उत्पन्न नहीं होता। वह कहीं भी मिल सकता है,मगर ढूढ़ना पड़ता है। आम जनता के लिए मनोरंजन बहुत आवश्यक है। मनोरंजन की कई दिशाएं हैं। ब्ल्यू फिल्में और चार्ली चैपलिन की फिल्में-दोनों मनोरंजन करती हैं। मगर दोनों में अन्तर है। एक कृत्रिम है और दूसरा कलाकार द्वारा सिरजा हुआ है। यह उस कलाकार की सोच और सृजनशीलता का परिणाम है।

हिन्दी सिनेमा वाले हमेशा यह दलील देते हैं कि वे जनता क नोरंजन के लिए फिल्म करते हैं या बनाते हैं। अमिताभ अभी भी सुपर स्टार है। उसने अपने तरीके से हिन्दी सिनेमा को समृद्ध किया है। वह अच्छा अभिनेता है,उसका अभिनय भी उच्च स्तर का है। वह ऐसा,अभिनेता था,जो घटिया से घटिया भूमिका को भी अच्छा बना देता था। उसकी अभिनय प्रतीभा ऐसी थी। वह सुपर स्टार ऐसे ही नहीं बन गया। उसमें बहुत कुछ था। लेकि वह सुपर स्टार बनकर ही रह गया। उसने फिल्म के लिए कुछ नहीं किया। उसमें इतनी क्षमता थी कि वह फिल्म उद्योग में परिवर्तन ला सके। परंतु यह सिर्फ अतिमाभ की समस्या नहीं है। यह दूसरे फिल्मकार,अभिनेता और अहभिनेत्रियों की समस्या भी है। दर्शकों को धोखा नहीं देना चाहिए। अमिताभ तथा दूसरे लोगों ने धोखा दिया है। एक तरीके से मणिरत्नम भी धोखा दे रहे हैं,लेकिन उनका तरीका छठे दशक का है। उस काल में स्टारडम और ग्लैमर के साथ विषय भी प्रमुख हुआ करता था। मणिरत्नम की फिल्में देखकर ऐसा लगता है कि वे विषय को बिकने की वस्तु मानते हैं। उनकी फिल्मों में समाज है लेकिन गौण,बाजार ही प्रमुख है। हिन्दी सिनेमा या उद्योग से साफगोई गायब है,क्योंकि वहाँ सिर्फ बाजार है,समाज लगभग लुप्त है।

समाज और बाजार एक दूसरे से जुड़े हैं। बाजार समाज का ही एक अंग है। बाजार भी हमें चाहिए। आज का आधुनिक समाज ऐस है,जिसके बाजर में सब कुछ बिक रहा है। अभी समाज में बाजर के प्रति आकर्षण बढ़ा रहा है। आधुनिक समाज में मैटेरियलइज्म बढ़ रहा है। लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें। यह अच्छा है या बुरा,हमें तय करना है। हमारे पास ऐसी कसौट भी होनी चाहिए,जिसके आधार पर हम मैटैरियलिइज्म का मूल्यांकन कर सकें और उसी के आधार पर उसका विरोध भी। हिन्दी सिनेमा के पास न तो कोई कसौटी है और न ही इस प्रवृत्ति के खिलाफ कोई कुछ कर रहा है। हिन्दुस्तान में अभी जितनी भी फिल्में बन रही हैं,उनका पन्चानबे प्रतिशत समाज के लिए कुछ नहीं कर रही हैं।

फिल्म बनाने वालों को सोचना चाहिए कि वह सृजनशील व्यक्ति है,वह कलाकार है। कलाकार का काम है कि लोगों की पसंद को बदले,बनाए और इसके स्तर को ऊँचा उठाए। कालाकर को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि वह एक कलाकार है। उसके पास बहुत कुछ है कहने के लिए। कलाकार का अर्थ ही है पथ-प्रदर्शक। जो कलाकार यह सोचे कि जनता जो पसंद करती है,वही उसे दे,तो वह कलाकार नहीं है। कलाकार को हमेशा समाज के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। आजकल केवल पाँच प्रतिशत ऐसे कलाकार है। जो समाज को अपनी फिल्मों से जोड़ते हैं।

हिन्दी सिनेमा अपने मूक चरण में दृश्य स्तर पर बहुत साफ हुआ करता था। आवाज के प्रवेश के साथ लोगों में एक नयी उत्सुकता जगी। यह चालीस के दषक की बात है। इस काल में जितनी फिल्में बनीं,उनमें से अधिकांश अच्छे विषय पर बनीं। विषय समाज से लिए गए,जैसे अछूत कन्या। इस काल की फिल्में समाज से, इतिहास से कहानी पेश करती थीं। जनता को जागरुक बनाती थीं। इस दशक के अंत में ही स्टारडम की शुरुआत होती है,  लेकिन विषय नहीं छूटा,बचा हुआ था। स्टारडम की वजह से हीरो और हीरोइन अकेले ही सब कुछ संभालते थे,मगर फिल्म ऊँचे स्तर की होती थी। मसलन गुरुदत्त,राजकपूर और मेहबूब खान की फिल्में।

गुरुदत्त की सी.आई.डी. एक अलग किस्म की फिल्म है,मगर उसमें भी विषय है। कागज के फूल,साहब बीबी और गुलाम तथा प्यास ऐसी फिल्में हैं जो एक व्यक्ति पर बनीं और एक व्यक्ति के दृष्टिकोण से बनी हैं। लेकिन विषय से जुड़ी हुई हैं। इसीलिए वहाँ व्यक्ति होने के साथ-साथ समाज भी है। इन फिल्मों के चरित्रों के आपसी संबंधों को जनता पहचान सकती है। इनकी फिल्मों में समाज हमेशा मौजूद है। साहब,बीबी और गुलाम में मीना कुमारी और भूतनाथ का संबंध। भूतनाथ को खुदाई के समय जब छोटी बहु कका नरकंकाल दीखता है तो वह अपने संबंध को फिर से याद करता है। उसकी याद में खो जाता है। यह मानवीयता है। गुरुदत्त की फिल्मों में विचार तत्व है और रिश्तों की व्याख्या भी है।

बावजूद इसके कि राजकपूर ने राम तेरी गंगा मैली जैसी फिल्म बनाईं,वे सिनेमा माध्यम का बहुत सम्मान करते थे। उनके पचास के दशक की फिल्मों में विषय है। साठ के दशक में उन्होंने वैयक्तिक अनुभूतियों की फिल्में बनाईं। पर इस दशक में ही हिन्दी सिनेमा विषय से बाहर निकल आता है और व्यक्तिगत कहानी उभर कर सामने आती है। व्यक्तिगत कहानी का अर्थ है व्यक्तिगत रिश्ते-माँ-बाप,भाई-बहन। यहीं से विशुद्ध प्रेम कहानी की शुरुआत होती है,जो आजकल देखने को मिलती है,और फिल्मों से समाज गायब हो जाता है। सत्तर तक कुछ हद तक तार्किकता बची हुई थी। सत्तर के बाद हिन्दी सिनेमा से समाज और तार्किकता दोनों खत्म हो जाती है।

21 मार्च 2011

कहानी की कहानी

प्रेमचंद

मनुष्य जाति के लिए मनुष्य ही सबसे विकट पहेली है। वह खुद अपनी समझ में नहीं आता। किसी-न-किसी रूप् में वह अपनी ही आलोचना किया करता है,अपने ही मन के रहस्य खोला करता है। इसी आलोचना को,इस रहस्योद्घाटन को और मनुष्य ने जगत् में जो कुछ सत्य और सुंदर पाया है और पा रहा है उसी के साहित्य कहते हैं। और कहानी या आख्यायिका साहित्य का एक प्रधान अंग है। आज से नहीं,आदिकाल से ही। हाँ,आजकल ही आख्यायिक में समय की गति और रुचि से बहुत कुछ अंतर हो गया है। प्राचीन आख्यायिका कुतूहल-प्रधान होती थी,या अध्यात्मविषयक। वर्तमान आख्यायिका साहित्य के दूसरे अंगों की भाँति मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और मनोरहस्य के उद्घाटन को अपना ध्येय समझती है। यह स्वीकारकर लेने में संकोच न होना चाहिए कि उपन्यासों ही की तहर आख्यायिका की कला भी हमने पश्चिम शैली से ली है। मगर पाँच सौ वर्ष पहले यूरोप भी इस कला से अनभिज्ञ था। बड़े-बड़े उच्चकोटि के दार्शनिक तथा ऐतिहासिक उपन्यास लिखे जाते थे, लेकिन छोटी-छोटी कहानियों की ओर किसी का ध्यान न जाता था। हाँ,कुछ परियों तथा भूतों की कहानियों अलबत्ता प्रचलित थीं। किंतु इसी एक शताब्दी के अंदर या उससे भी कम में समझिए,छोटी कहानियों ने साहित्य के और सभी अंगों पर विजय प्राप्त कर ली है। कोई पत्रिका ऐसी नहीं जिसमें कहानियों की प्रधानता न हो। यहाँ तक कि कई पत्रिकाओं में केवल कहानियाँ ही दी जाती हैं।

कहानियों की इस प्राबल्य का मुख्य कारण आजकल का जीवन-संग्राम और समयाभाव है। अब वह जमाना नहीं रहा कि हम बोस्ताने-ख्याल लेकर बैठ जाएँ और सारा दिन उसी में कुंजों में विचरते रहें। अब तो हमें मनोरंजन के लिए समय ही नहीं मिलता। अगर कुछ मनोरंजन स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य न होता,और हम विक्षिप्त हुए बिना नित्य अटठ्ारह घंटे काम कर सकते तो शायद हम मनोरंजन का नाम भी न लेते। लेकिन प्रकृति ने हमें विवश कर दिया है,हम चाहते हैं कि थोड़े-से-थोड़े समय में अधिक से अधिक मनोरंजन हो जाए। इसीलिए सिनेमा-गृहों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जाती है। जिस उपन्यास के पढ़ने में महीनों लगते उसका आनंद हम दो घंटों में उठा लेते हैं। कहानी के लिए पंद्रह-बीस मिनट ही काफी हैं। अतएव हम कहानी ऐसी चाहते हैं कि वह थोड़े से थोड़े शब्दों में कही जाए,उसमें एक वाक्य,एक शब्द भी अनावश्यक न आने पाए,उसका पहला ही वाक्य मन को आकर्षित कर ले,और अंत तक हमें मुग्ध किए रहे,और इसके साथ ही कुछ तत्व भी हों। तत्वहीन कहाने से चाहे मनोंरज भले हो जाए,मानसिक तृप्ति नहीं होती। यह सच है कि हम कहानियों में उपदेश नहीं चाहते,लेकिन विचारों को उत्तेजित करने के लिए,मन के संुदर भावों को जागृत करने के लिए कुछ-न-कुछ अवश्य चाहते हैं। वही कहानी सफल होती है,जिसमें इन दोनों में से एक अवश्य उपलब्ध हो।

सबसे उत्तम कहानी वह होती है जिसका आधार किसी मनोवैज्ञानिक सत्य पर हो। साधु पिता का अपने कुव्यसनी पुत्र की दशा से दुःखी होना मनोवैज्ञानिक सत्य है। इस आवेग में पिता के मनोवेगों को चित्रित करना और तद्नुकूल उनके व्यवहारों को प्रदर्शित करना कहानी को आकर्षक बना सकता है। बुरा आदमी भी बिल्कुल बुरा नहीं होता,उसमें कहीं न कहीं देवता अवश्य छिपा होता है,यह मनोवैज्ञानिक सत्य है। उस देवता को खोलकर दिखा देना सफल आख्यायिका-लेखक का काम है। विपत्ति-पर-विपत्ति पड़ने से मनुष्य कितना दिलेर हो जात है। यहाँ तक कि वह बड़े से बड़े संकटों का सामना करने के लिए ताल ठोंककर तैयार हो जाता है,उसकी दुर्वासना भाग जाती है,उसके हृदय के किसी गुप्त स्थान में छिपे हुए जौहर निकल आते हैं और हमें चकित हमें चकित कर देते हैं। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है। एक ही घटना या दुर्घटना भिन्न-भिन्न प्रकृति के मनुष्य को भिन्न-भिन्न रूप से प्रभावित करती है। हम कहानी में इसको सफलता के साथ दिखा सकें तो कहानी अवश्य आकर्षक होगी। किसी समस्या का समावेश कहानी को आकर्षक बनाने का सबसे उत्तम साधन है। जीवन में ऐसी समस्याएँ नित्य ही उपस्थित होती रहती हैं और उनसे पैदा होने वाला द्वंद्व आख्यायिका को चमका देता है। सत्यवादी पिता को मालूम होता है कि उसके पुत्र ने हत्या की है। वह उसे न्याय की वेदी पर बलिदान कर दे या अपने जीवन-सिद्धांतों की हत्या कर डाले ? कितना भीषण द्वंद्व है। पश्चाताप ऐसे द्वंद्वों का अखण्ड स्रोत है। एक भाई ने अपने दूसरे भाई की संपत्ति छल-कपट से अपहरण कर ली है। उसे भिक्षा माँगते देख कर क्या छली को जरा भी पश्चाताप न होगा ? अगर ऐसा न हो तो वह मनुष्य नहीं है।

उपन्यासों की भाँति कहानियों भी कुछ घटना-प्रधान होती हैं,कुछ चरित्र-प्रधान। चरित्र-प्रधान कहानी का पद ऊँचा समझा जाता है,मगर कहानी में बहुत विस्तृत विश्लेषण की गुंजाइश नहींे होती। यहाँ हमारा उद्देश्य सम्पूर्ण मनुष्य को चित्रित करना नहीं,वरन् उसके चरित्र का एक अंग दिखाना है। यह परमावश्यक है कि हमारे कहानी से जो परिणाम या तत्व निकले,वह सर्वमान्य हो और उसमें कुछ बारीकी हो। यह एक साधारण नियत है कि हमें उसी बात में आनन्द आता है जिससे हमारा कुछ संबंध हो। जुआ खेलने वाले को जो उन्माद और उल्लास होता है, वह दर्शक को कदापि नहीं हो सकता। जब हमारे चरित्र इतने सजीव और आकर्षक होते हैं कि पाठक अपने को उनके स्थान पर समझ लेता है तभी उसे कहानी में आनन्द प्राप्त होता है। अगर लेखक ने अपने पात्रों के प्रति पाठक में यह सहानुभूति नहीं उत्पन्न कर दी तो वह अपने उद्देश्य में असफल है।

मगर यह समझना भूल होगी कि कहानी जीवन का यथार्थ चित्र है। यथार्थ जीवन का चित्र तो मनुष्य स्वयं हो सकता है। कहानी कहानी है,जब यह वांछनीय नहीं होता। लेकिन कथा-साहित्य मनुष्य का रचा हुआ जगत् है और परिमित होने के कारण संपूर्णतः हमारे सामने आ जाता है और यहाँ वह हमारी न्यायबुद्धि या अनुभूति का अतिक्रमण करता हुआ पाया जाता है,हम उसे दण्ड देने के लिए तैयार हो जाते हैं। कथा में अगर किसी को सुख प्राप्त होता है,तो इसका कारण बताना होगा,दुःख भी मिलता है तो उसका कारण बताना होगा। यहाँ कोई चरित्र मर नहीं सकता,जब तक कि मानव-बुद्धि उसकी मौत न माँगे। स्रष्टा को जनता की अदालत में अपनी हर एक कृति के लिए जवाब देना पड़ेगा। काल का रहस्य भ्रांति है,पर वह भ्रांति जिस पर यथार्थ का आवरण पड़ा हो।

19 मार्च 2011

क्या ये फिल्में हमें आइना दिखा रही हैं ?

निखिल का यह लेख जब मैंने पढ़ा तो थोड़ी देर के लिए हतप्रभ रह गया। क्योंकि इसकी स्थापनाएँ स्वयं मेरी अवधारणाओं को प्रश्नाकिंत करती हैं। हमारा विश्वास है कि वैचारिक असहजता पैदा करने वाले आलेख ही किसी सार्थक नए संवाद की जमीन तैयार करते हैं। निखिल का यह लेख ऐसी ही उम्मीद के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है - रंगनाथ

आजकल फिल्मों को लेकर खासे प्रयोग शुरू हो चुके हैं हालाँकि ऐसे प्रयोग करने वाले प्रयोगधर्मी निर्देशकों को पारंपरिक फ़िल्मी दुनिया में सम्मान नहीं दिया जा रहा है. इसके पीछे उनका डर भी हो सकता है और जलन भी.

विडंबना ये है कि हमारे समाज का एक बड़ा तबका भी इनको गले नहीं लगा रहा है. बात हो रही है अनुराग कश्यप, दिबाकर और कौशिक मुखर्जी जैसे फिल्म निर्माताओं की.  इनकी बदौलत फिल्मों का स्वरुप अचानक कुछ अलग सा दिखने लगा है. करन जौहर और चोपड़ा घराने की प्रेम कहानियों और सूरज बरजात्या टाइप घरेलू कहानियों के बीच से एक किरण निकलने की कोशिश करते दिख रही है.  तमाम फिल्मों की तरह ये सतरंगी नहीं है,  बल्कि इसका रंग खालिस ब्लैक एंड ह्वाईट है. इसकी कोशिश है,  पूरी तरह एक प्रकाश पुंज के रूप में उभर कर सामने आने की, लेकिन आड़े आ रहा है हमारा समाज, हमारा सिस्टम और हमारी सोच. सेंसर बोर्ड की कैंची ऐसी किरणों के पंख हमेशा से कतरती रही है और आज भी ये इनके ख्वाबों के पंख क़तर रही है. सवाल जो बार बार कौंध रहा है वो ये कि आखिर आगे हम कैसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं.  चंद टुटपुन्जिये संगठनों की और हमें क्यूँ देखना पड़ता है समाज की सच्चाई दिखाने से पहले ? क्यूँ हमें राजनीति के भदेस चेहरों से स्वीकृति मांगनी पड़ती है जबकि खुद उनका इतिहास कालिख से पुता हुआ है ?  आखिर क्यूँ हैं हम इतने हिप्पोक्रेट ? क्या इंसान के तौर पर इतने कमजोर और खोखले हो चुके हैं कि अपने समाज की सच्चाई देखने से कतराते हैं ? हम घर की चहारदीवारी के भीतर कुछ हैं और बाहर कुछ और बनने और दिखने की कोशिश करते हैं और उसे कोई चलचित्र में ढाल दे,तो चीख पुकार क्यूँ होती है? डरते हैं हम अपने ही चेहरों से ?

ये सब सवाल उठते हैं जब फायर, वाटर, लव सेक्स और धोखा, नाइन हावर्स टू रामा, सिक्किम, किस्सा कुर्सी का, काम सूत्र और गांडू द लूज़र जैसी फिल्में सिनेमा हाल की स्क्रीन पर आने के लिए तरस जाती हैं, कुछ को सेंसर बोर्ड रोक देता है तो कुछ को इस देश के राजनितिक संगठन. खासी लड़ाई लड़नी पड़ती हैं इन्हें अपने ही वजूद को साबित करने के लिए.  मुझे डर है कि अनुराग की अगली फिल्म दैट गर्ल इन यलो बूट्स को भी लोग अपना पाएँगे या नहीं.  वेनिस फिल्म फेस्टिवल और टोरंटो इंटरनेश्नल फिल्म फेस्टिवल में फिल्म को काफी सराहा गया है लेकिन फिल्म की विषयवस्तु और दृश्यांकन भारतीय समझ और इसकी कुंठित सोच को बार बार चुनौती देगा, इसमें भी दो राय नहीं. फिल्म में ''आ मुझे चोद'' जैसे शब्दों और कुछ ऐसे दृश्यों का इस्तेमाल हुआ है जिसपर कई संगठनों को झंडा और त्रिशूल लेकर चिल्ल पों करने का मौका मिलेगा.

कौशिक की फिल्म ''गांडू द लूज़र'',  क्या है ? इसकी विषयवस्तु क्या है और इसका हमारी ज़िन्दगी में कितना महत्व है, ये शायद ही लोग जानने में रूचि लेंगे.  उन्हें रूचि है तो गांडू नाम को सुनकर जोर से ''हौ'' बोलकर खिलखिलाने में. किसी को मतलब नहीं कि आखिर कोई तो वजह रही होगी जो इसका नाम यही रखा गया. ये कोई नहीं जानना चाहता कि हमारे इस विचित्र समाज में ऐसे ना जाने कितने गांडू घुट घुट कर बस जिए जा रहे हैं. हर तीसरे घर में एक गांडू है, लेकिन वो सबके सामने कैसे आ सकता है,  उसके दिल की बात हम कैसे सुन सकते हैं, कैसे उसे समझ सकते हैं हम ?

समस्या यही है, हम एक अरब से भी ज्यादा जनसँख्या वाले देश हैं ना,  यहाँ हम कुछ लोगों को अधिकार दे चुके हैं कि अब वो ही हमारी तरफ से सही गलत का फैसला लेंगे.  पांच साल में एक बार वोट डालकर हम एक प्रतिनिधि बनाते हैं और अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं. वो सही कर रहा है तो वाह वाह कर देते हैं और वो गलत कर रहा है तो इधर उधर बुदबुदा कर आगे बढ़ जाते हैं. स्लमडॉग मिलिनेयर झुग्गियों में बसर कर रहे लोगों की कहानी विदेशी चश्मे से दिखाती है तो हम बिना आव ताव देखे तारीफों के पुल बाँधने लगते हैं लेकिन गांडू की ब्लैक एंड ह्वाईट ज़िन्दगी में रंग भरने की कोशिश नहीं करते.  जबकि गांडू की ख़ामोशी चीख चीख कर हमारे समाज को आइना देखने को कहती रहती है. भारत के किसी गझिन मोहल्ले की मोड़ पर एक छोटे से घर से निकली ''गांडू द लूज़र''  न्यूयॉर्क इंटरनेश्नल साउथ एशियन फिल्म फेस्टिवल में क्या कर पाई होगी, समझ नहीं आता, जब

अपने घर में ही इसका कोई मोल नहीं है. चार इंटरनेश्नल अवार्ड जीतकर क्या मिलेगा ''क्यू'' को? ये फिल्म हमें भीतर झाँकने को कहती है और हर मोड़ पर ये बताती है कि हमारे समाज की संरचना और इसकी घटिया सोच के क्या परिणाम हैं.

हमेशा की तरह लीक से हटकर चलते हुए अनुराग ने फिल्म दैट गर्ल इन यलो बूट्स फिल्म में भी एक सच परोसा है,  ज़िन्दगी का सच. पुरुष प्रधान समाज में एक मजबूर लड़की होने का सच.  कल्कि कोच्लिन के रूप में एक विदेशी लड़की की कहानी को हमारे समाज के नंगे सच से जोड़कर जिस तरह अनुराग ने परोसने की कोशिश की है, वो काबिलेतारीफ है लेकिन कितनो को ये नागवार गुजरेगी,  इसका अंदाज़ा फिल्म के ट्रेलर्स देखकर ही लगाया जा सकता है.  फिल्म के कुछ दृश्य और संवाद कचोटते हैं लेकिन जिस खूबसूरती से अनुराग ने इसे कलात्मक बनाया है, वो गज़ब है.  इन फिल्मों को देखकर लग रहा है कि एक बार फिर हम सामानांतर फिल्मों के दौर को देखेंगे, कुछ अलग अंदाज़ में.

मुझे युवा के तौर पर, पत्रकार के तौर पर और देश के पढ़े लिखे नागरिक के तौर पर हमेशा ये लगता है कि हम ''गांडू'', ''गांड'', ''सेक्स'' और ''चोद'' जैसे शब्दों को जब तक टैबू समझेंगे, तब तक अज्ञानता के अँधेरे से बाहर नहीं निकाल पाएंगे. ये फिल्में जिन दर्शकों के लिए बनायीं जा रही हैं वो बच्चे नहीं है, वो ग्रोन अप्स हैं.

अंग्रेजी कपडे पहनने और अंग्रेजी शराब पीने से ही हमारी सोच वेस्टर्न नहीं होगी, ये बात हम जितनी जल्दी मान लें अच्छा होगा. चाहरदीवारी के भीतर अकेले  पोर्न फिल्म देखकर अपना हाथ जगन्नाथ करने वाले और बात बात पर मां-बहन  को सेक्स सिम्बल बनाने वाले इस समाज के करोड़ों लोग किसी फिल्म में ऐसे किसी सीन को देखकर मुहं पर हाथ रख लेते हैं, और आलोचना करने में कोई कसार नहीं छोड़ते. आखिर क्यूँ ?

इन शब्दों को गाली के समतुल्य बनाने वाले हम जब हम ही हैं, यही समाज ही है तो इन शब्दों को हम सामान्य रूप से क्यूँ नहीं ले सकते ? क्यूँ नहीं इसे समाज का एक अंग मान लेते ? ये फिल्में हमें आइना दिखा रही हैं...इन्हें परदे पर आने देने में समझदारी होगी...और ये तभी संभव है जब हम अपनी ताकत जानें और उसका सही इस्तेमाल करें. क्यूंकि पब्लिक सब जानती है और ये कुछ भी कर-करवा सकती है...

हाल ही में, एक खबर में पढ़ा कि इंटरनेट की चर्चित भारतीय सेक्स सिम्बल सविता भाभी कॉमिक कार्टून सिरीज़ पर भी एक रेगुलर रीडर सी एम जैन साहब शीतलभाभी डोट कॉम नाम से फिल्म बना रहे हैं.  समझ नहीं आ रहा है कि ये क्रिएटिव कही जाएगी या भदेस ?  ये सवाल दर्शकों पर छोड़ रहा हूँ लेकिन मुझे ये अंदाज़ा जरुर है की फिल्म क्या गुल खिलाएगी. ये भी लग रहा है कि इसके बोल्ड सीन्स और विषयवस्तु सेंसर बोर्ड शायद ही पचा पाएगा.  कुछ भी हो, ये भी आइना हमारे समाज का ही है.

- निखिल श्रीवास्तव

16 मार्च 2011

'जिंदगी खूबसूरत है'

इस फिल्म के निर्देशक,सह-लेखक और मुख्य अभिनेता रोबेर्टो बिनीनी हैं। फिल्म को तीन आस्कर  मिले। जिनमें बिनीनी को मिला सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का आस्कर तथा सर्वश्रेष्ठ गैर-अंग्रेजी फिल्म का आस्कर भी है। जीवन के सबसे दुखद क्षणों में भी यदि आप इस फिल्म को देखेंगे तो मुस्कराने की एक वजह मिलेगी। एक शब्द में कहें तो यह एक 'शानदार'  फिल्म है। ऐसी फिल्म जो सबसे विकट समय में भी जीवन में आस्था का संचार करती है। जहाँ से मिले,जैसे मिले यह फिल्म जरूर देखें। - रंगनाथ

कुछ किरदार ऐसे होते हैं कि उनके आस पास कहानियाँ खुद ब खुद बन जाती हैं. ऐसा ही एक किरदार लगा मुझे 'गुइदो'. एक इतालवी फिल्म "लाइफ इज ब्यूटीफुल " का यह चरित्र ज़िन्दगी से भरा पड़ा है ठीक उसी तरह जैसे हमारा "आनंद". आनंद याद तो होगा आप सबको, हृषिकेश मुखर्जी की बनाई फिल्म "आनंद"  का मुख्य चरित्र. 

बहरहाल बात करते हैं गुइदो की.  गुइदो एक वेटर है.  वो एक गैर मजहबी लड़की से प्यार करता है जो ऊँचे खानदान से है और एक टीचर है. लड़की के घर वाले नहीं चाहते कि वो गुइदो से ब्याह करे लेकिन वह लड़की को उसके घर से भगा ले आता है और शादी कर लेता है.

सुनने में तो ये कहानी किसी बॉलीवुड की 'राज वाली कहानिओं' जैसी ही लगती है पर गुइदो राज नहीं है !  फिल्म का यह रोमांटिक हिस्सा जिस तरह से फिल्माया गया है.  वो आश्चर्यजनक है.  गुइदो में जादू नज़र आने लगता है.  इंटरवल के बाद फिल्म अलग ही मोड़ लेती है.  गुइदो और डोरा ( गुइदो की बीवी ) को एक बेटा होता है जिसका नाम है जोशुआ. उनका छोटा और सुखी परिवार है .

 इसी बीच द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाता है और यह परिवार युद्ध का शिकार हो जाता है.  इस परिवार को concentration camp ले जाया जाता है. जहां नाज़ी सैनिक सिर्फ ज़वान लोगों को जिन्दा रखते हैं. डोरा और गुइदो को वहाँ अलग अलग रखा जाता है. गुइदो जोशुआ को अपने पास छुपा लेता है. और जोशुआ को यह यकीन दिलाता है की यह कैंप एक खेल है. १००० पॉइंट्स मिल के उन दोनों लोगों को इकठ्ठा करने होंगे ..अगर वो इस खेल में आखिर तक इन सनिकों की नज़र में नहीं आया तो वह ये खेल जीत जायेगा और उसे एक टैंक मिलेगा. और अगर जोशुआ उसे माँ के पास जाने की बात, भूख लगने की बात करेगा तो भी वो लोग यह खेल हार जायेंगे.. अब इस पूरी फिल्म में..गुइदो जोशुआ को छिपाते हुए ..डोरा को ढूंढता है ...और गुइदो का किरदार निभाने वाले अभिनेता /निर्देशक रोबेर्तो बेनिगनी अभिनय की नयी ऊंचाई को छूते हैं ..

ह़र तरफ मौत फैली है ..इस बीच गुइदो की जीवन्तता कई जगह आप की आँखों में पानी भर देगी. ठीक वैसे ही जैसे आनंद अपने भीतर मौत लिए चलता है लेकिन हंसाने की कोई जगह नहीं छोड़ता.. लेकिन इस हास्य के साथ जो करुणा मिली हुई है उस तक नज़र पहुँचते ही दिल उदास हो जाता है. आनंद की तरह गुइदो भी इस फिल्म के आखिर में मर जाता है लेकिन यकीन करना मुश्किल होता है की वह मर गया..गुइदो अपने मरने के बाद भी अपने बेटे जोशुआ को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहता है की ये सब एक खेल है .. गुइदो के मरने की अगली सुबह जोशुआ को concentration कैंप से छुड़ा लिया जाता है और वह सेना के टैंक पे ही चढ़ के वहाँ से जाता है .टैंक पे चढ़े हुए जोशुआ का अत्मिविश्वास सातेवं आसमान पे होता है क्यूंकि उसे लगता है कि वह ये खेल जीत चुका है. कैंप से जाते हुए रस्ते में उसकी माँ डोरा मिलती है ..

बरसों बाद उसे समझ आता है कि उसके पिता ने उसके मन में डर न आने देने के लिए के क्या किया और कैसे उसे बचाए रखा..

हमारे बॉलीवुड में भी "मुसीबत के पल को एक खेल" बताते हुए एक फिल्म बनायीं गयी थी...ता रा रम पम पम ...लेकिन इस फिल्म की करुणा भी मुझे हास्यास्पद लगी. यह फिल्म लाइफ इज ब्यूटीफुल के आस पास भी नहीं पहुँचती.

कभी मूड ख़राब हो. कुछ अच्छा न लग रहा हो या कुछ अच्छा देखना चाहते हों तो 'लाइफ इज ब्यूटीफुल' आप को अच्छी लगेगी. गुइदो का चरित्र हमेशा याद रहेगा.

- स्वप्निल तिवारी

15 मार्च 2011

पहली बोलती फिल्म

हर शुक्रवार एक फिल्म रिलीज़ होती है, हम जाते हैं, देखते हैं, (किसी किसी फिल्म को छोड़ कर जिन्हें कोई नहीं देखता),  फिल्म में किरदार इधर उधर दौड़ते नाचते-गाते हैं, लड़ते झगड़ते हैं, प्यार मुहब्बत की बातें करते हैं, आज कल गाली-गलौज (कुत्ते-कमीने मैं तेरा खून पी जाऊंगा वाली गालियों से अलग) भी करते हैं और फिर एक सुखद, दुखद या मिश्रित अंत के साथ फिल्म खत्म हो जाती है.

इस बीच हमें शायद ही ध्यान आता है कि फ़िल्में कभी बिना आवाज़ के भी होती थीं। कैमरे में जो कुछ भी फिल्माया जाता उसमें दिखने वाली भाव भंगिमाओं के सहारे ही हमें फिल्म में घटित होने वाले घटनाक्रम का अंदाज़ा लगाना पड़ता था, ऐसा मान लीजिए कि कैमरा चुपचाप होते हुए भी इतना बोलता था कि दर्शकों को फिल्म को समझने में कोई कठिनाई नहीं आती थी और इसी तरह से फ़िल्में देखी जाती थीं। लेकिन कैमरा कितना भी बोले आवाज़ की कमी तो कहीं न कहीं खलती होगी और इसी वजह से बोलता हुआ सिनेमा बनाने का सपना देखा गया होगा.

भारतीय जनता के सामने यह सपना 80 साल पहले यानि 14 मार्च 1931 को साकार हो कर मुंबई के मैजेस्टिक थियेटर में “आलम आरा” के रूप में आया। इस फिल्म के निर्माता थे इम्पीरियल मूवीटोन और इसका निर्देशन किया था अर्देशिर इरानी नें, फिल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई मास्टर विट्ठल, जुबैदा, जिल्लू, सुशीला और पृथ्वी राज कपूर नें थीं। यह फिल्म एक जिप्सी लड़की और एक राजकुमार की प्रेम कहानी थी जिसकी पृष्ठभूमि में अपने भीतर ही हुए षड्यंत्रों का शिकार एक राजपरिवार था।

एक बच्चा जैसे अपना खोया हुआ झुनझुना मिल जाने पर उसे जी भर के बजाता है, उसी तरह जब भारतीय सिनेमा को आलम-आरा के जरिये जब आवाज़ मिली तो उसने उस आवाज़ का सबसे खूबसूरत प्रयोग जी भर कर किया और वह प्रयोग हमारे सामने आलम आरा के सुखद संगीत के रूप में था। प्रख्यात निर्देशक श्याम बेनेगल नें आलम-आरा के बारे में कहा था कि “यह सिर्फ टाकी नहीं थी बल्कि बातचीत करने वाली और गाने वाली ऐसी फिल्म थी जिसमें गाने अधिक थे और बातचीत कम थी”। भारत की पहली ही बोलती फिल्म नें एक ये मानक तय कर दिया कि भई अगर अब हिंदुस्तान में सिनेमा बनेगा तो उसमें गीत-संगीत अनिवार्य रूप से रहेंगे.

आज भी हमारी फ़िल्में गीत संगीत भरपूर होती हैं,  बहुत बार तो ऐसा हुआ है कि फिल्म पिट गयी है लेकिन उसके गीत संगीत नें लोगों के दिलों पर राज किया है। आलम आरा के गीत “दे दे खुदा के नाम पे प्यारे”  को भारतीय सिनेमा का पहला गीत माना जाता है जिसे गाया था फिल्म में फ़कीर का किरदार अदा करने वाले अभिनेता वज़ीर मोहम्मद खान नें, चूँकि उस समय पार्श्व गायन की तकनीक नहीं आई थी इसलिए खुद अभिनेता नें ही गीत गाया था.

आपको यह भी बताता चलूं कि पूरी फिल्म की शूटिंग रात में की गयी थी क्यूंकि दिन में शूटिंग के वक्त अभिनेताओं के आस पास छिपा कर रखे गए माइक्रो फोन (जिससे उनकी आवाज़ रिकॉर्ड हुई थी) के द्वारा आस पास के शोर के भी रिकॉर्ड हो जाने का खतरा था। गीत के मुखड़े और इस बात से कि इसे एक फकीर नें गाया था यह बात पता चल जाती है कि यह एक सूफियाना गीत था, दुखद तो यह है कि अब इस गीत के सिर्फ मुखड़े ही उपलब्ध हैं वो भी सिर्फ लिखित इसका संगीतबद्ध रूप नष्ट हो चुका है। 2003 में पुणे स्थित National film archiev of India में आग लग जाने की वजह से राजा हरिश्चंद्र तथा अछूत कन्या जैसी फिल्मों के साथ आलम आरा का आखिरी प्रिंट भी नष्ट चुका है और हमारे सिने इतिहास का पहला ही पन्ना गायब हो चुका है। फिल्म की महत्ता को देखते हुए भारत भर में इसके एक प्रिंट के लिए काफी खोज बीन की गयी लेकिन कोई सफलता हाथ नहीं लगी.

आज आलम आरा की अस्सीवीं वर्षगाँठ पर हम उसके साक्षी नहीं बन सकते। दर असल यह हमारी धरोहरों की प्रति हमारी उदासीनता का प्रतीक है और जब तक हम हमारी ये उदासीनता नहीं छोड़ेंगे तब तक ऐसे ही अपनी धरोहरों से हाथ धोते रहेंगे। आकाईव में रख कर फिल्मों को सड़ाने (बेहतर शब्द जलाने) से बेहतर ये होगा कि उनको संरक्षित करने के दूसरे तरीके अपनाए जाएँ ताकि हम अपने इतिहास के गवाह बन सकें।

- स्वप्निल तिवारी

14 मार्च 2011

सच्चाई का भ्रम

किस्मत की मारी एक बामनी ने जटिये से घरवास किया.

कुण्ड में भीगे हुए कच्चे चमड़े की दुर्गन्ध से नाकोंदम होने लगा,जी मितलाता, उबकाई आने लगती,सर चकराता न पूरी भूख लगे और न रात को अच्छी तरह नींद आये आँखें हरदम जलती रहतीं हर वक्त नाक में इत्र के फोहे रखती और मुह पर कपड़ा.

दिन बीतने में बरस नहीं लगते

एक दिन बामनी ने गुमान के स्वर में जटिये से कहा, "देखी मेरी करामत!

मेरे आने से तेरे घर की बदबू ही मिट गई, ऊँची जात का तो चमत्कार ही ऐसा होता है!"

पति ने तनिक व्यंग्य से भरे परिहास में कहा," बदबू तो वैसी ही है, पर तू उसकी आदी हो गई है. तेरे नाक कि कोंपल इती जल्दी मर जायेगी, मुझे ऐसी आशा नहीं थी
अब तो इत्र-फुलेल का खरच कम करदे"

" तुम मुझे अकल देने चले हो? वह तो कभी का कम कर दिया, अपने घर का भला मैं नहीं सोचूँगी तो और कौन सोंचेगा?"

-विजयदान देथा

12 मार्च 2011

हिन्दी साहित्य में वीरबालकवाद- अंतिम किस्त

वीरबालकवाद के विदेश पक्ष का ऐसा है कि जहाँ ऋषि होने के नाते वीरबालक पश्चिम विरोधी होता है वहाँ क्रान्तिकारी होने के होने के नाते वह आधुनिकता और मार्क्सवाद दानों का पक्षधर भी होता है और ये दोनों ही चीजें आप जानिए पश्चिमी ही हैं। इसलिए उसका आग्रह रहता है कि जस हद तक मैं जीवन और लेखन में आधुनिक हुआ हूँ उस हद तक ठीक है लेकिन उसमें ज्यादातर पश्चिम के रंग में रग जाना बहुत बुरा है। मेरे पाँव देश की माटी में मजबूती से जमे हुए हैं और मेरी जड़ें गाँव में गहरी गई हुई हैं। इसलि मैं पश्चिमी-प्रदूषण की चपेट में आ ही नहीं सकता। लेकिन साथ ही वीरबालक को यह बोध भी रहता है कि मुझे गरीब,गँवई और आउट आफ डेट समझ लिए जाने का खतरा है इसीलिए वह सीकरी से कोई काम न रखत हुए भ सकीरी में अपने लिए एक ठो फ्लैट बनवा लेता है क्योंकि गाँव वाला घर तो वह फूँककर निकला होता है। सीकरी में प्रतीकात्मक माटी से सने हाथ वह ओ डि क्लोन से धुलाने और प्रतीकात्मक पत्थर तोड़ते हुए सूखे कंठ को स्काच से तर करने की तथा बीच-बीच में फारेन कंट्रीज में हिन्दी का झण्डा गाड़ आने की व्यवस्था करता है।

वीरबालकों की इस विदेश ग्रंथि का जनक अज्ञेय जी को माना जा सकता है जिनके अभिजात्य से लोग-बाग उतने ही आक्रान्त थे जितने कि उनके विदेश में प्रवास करते रहने से। मुझे लगता है कि जो लोग यह कहते सुने जाते थे कि अज्ञेय सी.आई.ए. के पैसे से विदेश जाकर नोबेल पुरस्कार के जुगाड़ में लगे रहते हैं,वे साथ ही इस बात के लिए भी ललक रहे थे कि हमारा भी कोई अन्तर्राष्ट्रीय चक्कर चले और हमारा भी दूसरों पर उतना ही रौब गालिब हो जितना कि अज्ञेय का हम पर हो रहा है। यही वजह है कि वीरबालक अपने साहित्यिक व्यायाम के लिए अन्तर्राष्ट्रीय आयाम तलाशते रहते हैं और अपनी हर उपलब्धि की सूचना अन्य वीरबालकों तक किसी न किसी तरह पहुँचाते रहते हैं ताकि जलने वाले जला करें।

तो हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श पर बोलते हुए आप किसी वी.आई.वी.वी. को यह बोलते हुए सुन सकते हैं, ”अभी मेरे पूर्व वक्ता आयोवा की अन्तर्राष्ट्रीय कार्यशाला का जिक्र कर रहे थे,अमरीका के ही एक अन्य राज्य वरमोंट में उससे भी बड़ा आयोजन होता है जिसमें साहित्यकारों समेत चन्द चुने हुए रचना-धर्तमी व्यक्ति शान्त,सुनम्य वन-प्रदेश में बनी कोटेजेज में साल-छ महीने रहने और विचार-विमर्श करने के लिए आमन्त्रित किए जाते हैं। पिछले साल मुझे भी वहां बुलाया गया था जहाँ मेरी भेंट एस्ट्रोनिया की प्रसिद्ध कवयित्री जालीमा योन्यारी से हुई जो आजकल मेरी कविताओं का अपनी भाषा में अनुवाद कर रही हैं। तो जालिमा की छोटी सी कविता की ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ जिसमें सारा स्त्री-विमर्श समा गया है- स्त्री अहा,आ स्त्री आ,स्त्री बला,जा स्त्री जा,स्त्री हाय-हाय,हाय स्त्री।“ इस पर तालियाँ बजती हैं क्योंकि वीरबालक की कविता में अब इतना भी उक्ति चमत्कार दुर्लभ हो चला है।

तो सभी वीरबालकों विदेशों में कहीं-न-कहीं बुलाए जा रहे हैं और वहाँ कोई न कोई उनकी रचनाओं का अपनी भाषा में अनुवाद भी कर रहा है। थोड़ी सी दिक्कत है तो यही कि विदेशों में हिन्दी लेखकों की साहित्यिक उपस्थिति कहीं दर्ज हो नहीं रही है जबकि अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखकों को वहाँ तगड़ी रायल्टी और कलमतोड़ दाद मिल रही है। इसे चलते सहसा वीरबालकों का पश्चिम विरोध और अंग्रेजी विरोध भड़क उठता है। एक गोष्ठी में मैंने एक वी.आई.वी.वी. को यह सिद्ध करते हुए सुना कि अंग्रेजी में लिखने वाल सारे भारतीय लेखक चालू किस्म का लेखन करने वाली शोभा डे के भाई-बन्द ही हैं। उन्होंने सारे उदाहरण शोभा डे के लेखन से ही दिए। वीरबालकवादियों के पश्चिम-विरोध का एक पक्ष यह भी है कि वे एक-दूसरे को पश्चिम की नकल करने वाला ठहराते रहते हैं। तो वीरबालक आधुनिक तो होता है लेकिन पश्चिम का पिछलग्गु नहीं। कृपया उसके पश्चिम के पिछलग्गु न होने का यह अर्थ भी न लगाया जाए कि वह पोंगापन्थी होता है और साहित्य के सन्दर्भ में भारतीयता की बात करता है।

तो वयोवृद्ध वीरबाकों की कृपा से तरुण वीरबालकों की एक ऐसी पीढ़ी पनप रही है जो अंग्रेजी और संस्कृत दोनों से समान रूप से कटी हुई है और जो पांडित्य और इंटेलेक्टचुअलता दोनों की विरोधी है। वह हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाएँ पढ़ लेना ही पर्याप्त समझती है और इन पत्रिकाओं में भी सबसे ज्यादा ध्यान से वी.आई.वी.वी. के वक्तव्य और गोष्ठी-समाचार पढ़ती है। अधिकतर वीरबालक अब अपने को जनवादी कहते हैं लेकिन उमें से अधिकतर के शास्त्रार्थ से कहीं यह संकेत नहीं मिलता कि उन्होनें मार्क्सवादी-लेनिनवादी शास्त्रों का बाकायदा कभी अध्ययन किया है। बल्कि स्थिति यह है कि मार्क्सवादी-लेनिनवादी पोथे बाँचे हुए लोग अब वी.आई.वी.वी.  को थोड़े हास्यास्पद प्रतीत होने लगते हैं। मैं समझता हूँ कि कात्यायनी बहुत अच्छी कवयित्री होने के साथ-साथ मार्क्सवाद-लेनिनवाद की गहन समझ रखने वाली विदुषी भी हैं। इसलिए मेरे आश्चर्य का तब कोई ठिकाना नहीं रहा जब मैंने एक वी.आई.वी.वी. बहुल निर्णायक समिति में उनका नाम किसी पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया और पाया कि अनुमोदन करने के लिए कोई तैयार नहीं है।

वीरबालकवाद पर अपने इस वीरबालकवादी लेख की समाप्ति में एक काल्पनिक वीरबालक के बारे में एक ऐसे काल्पनिक संस्मरण से करना चाहता हूँ जो वास्तविकता के काफी निकट है और जो इस ओर इशारा करता है कि वीरबालकवादी तेवर हमें किन ऊँचाईयों की आरे ले जा रहे हैं। किसी कस्बे के हिन्दी विभागाध्यक्ष ने ‘अस्तित्ववाद’ पर संगोष्ठी की अध्यक्षता के लिए ऐसे सम्पादक वीरबालक को आमन्त्रित किया जिसने स्वर्गीय सार्त्र और लगभग स्वर्गीय अस्तित्ववाद का नाम नहीं सुना था लेकिन जो अपनी पत्रका में हर उस गोष्ठी का वृतान्त सचित्र छापता था जिसकी उससे अध्यक्षता करायी गयी हो। अब पूछिए कि अस्तित्ववाद से अनजान वह वीरबालक अध्यक्ष पद पर विराजमान होकर क्या करता है ?

वह ऊँघता है। सभी वीरबालक व्यस्तातिव्यस्त किस्म के व्यक्ति होते हैं और अध्यक्षताओं के सिलसिले में बादल आवारा को मात करते हैं। उन्हें सोने और साँस लेने की फर्सत तक अध्यक्ष पर विराजमान होने के बाद ही मिलती है। ऊँघने को वीरबालकों के संसार में ध्यान से सुनने का पर्याय ठहराया जाता है। और हर वीरबालक ऊँघते-ऊँघते भी बीच-बीच में दो-चार फिकरे सुन ही लेता है ताकि अगर विरोधी खेमे का कोई वीरबालक उसके सो जाने पर चुटकी ले तो फौरन डेढ़ आँख खोले और कहे,  ”अरे आप कहते न रहिए महाराज,हम ध्यान से सुन रहे हैं और जल्दी से मेन पांइट पर आइए नहीं तो हम सचमुच सो जावेंगे। खैर तो जब हमारे वीरबालक अध्यक्ष की बोलने की बारी आती है त बवह ऊँघते-ऊँघते सुनी हुई बातों के आधार पर अपने को वीरबालक सिद्ध करने वाली कुछ बातें कहकर तालियाँ बजवा ही लेता है।“

यथा,हमें यह बहुत गड़बड़ लगता है कि हिन्दी के आधुनिक लेखक पश्चिम के बड़े लेखकों की नकल मारकर अपने को बड़ा कहलवाना चाहते हैं। उससे भी ज्यादा गड़बड़ बात यह है कि नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी टाइप हमारे मार्डन मठाधीश इन नकली लोगों की पीठ ठोंकते रहते हैं। देखिए हमें भी बहुत लालच दिया गया कि मार्डन बनने के लिए एक्जस्टेन्सवाद अपनाओ। बट हमने कह दिया नो। आप पूछेंगे नो क्यों कहा ?  हमने नो इलिए किया कि हम जानते हैं कि जो भी एक्जिस्टेन्सवाद है,वह भारतीयों के मार्डन नहीं एन्सिएंट है। भगवान बुद्ध हमारे यहाँ बहुत पहले कह चुके थे। फ्रांस के सारतरे ने उनके आइडिया की नकल मारकर अपने को बड़ा भारी राइटर और फिलसफर साबित करने की कोशिश की है। इस मरे सारतरे का रौब भारत भवन वाले खाते हों,हम जेनुआइन भारतीय नहीं खाते क्योंकि हम प्रेमचन्द की परम्परा के लेखक हैं।

इस पर देशभक्ति और हिन्दीभक्ति में लीन रहने वाले लोग इतनी तालियाँ बजाते हैं कि गदगदायमान वीरबालक को सहसा याद आता है कि सम्पादक की हैसियत से पिछली गर्मियों में मुझे पेरिस-प्रवास करने का सुख भी मिला था। अस्तु वह अब दूसरी ताली-तलब बात भी कह डालता है,पिछली गर्मियों में पेरिस विश्वविद्यालय ने हमें एक सेमिनार पर प्रिसाइड करने के लिए बुलाया था। वहाँ अंग्रेजी में लिखने वाले कुछ इण्डियन राइटर्स भी थे। लंच ब्रेक में हमने देखा कि वे सब के सब हमें अकेला छोड़कर किसी अभी-अभी पहुँचे आदमी से बात करने के लिए चले गए हैं। तो हमने अपनी फ्रांसिसी मेजबान को बुलाया और उनसे फ्रेंच में कहा,’हलो एक्सक्यूज मी’,हू दैट मैन देयर ?’ मेजबान फ्रेंच में बोली,’अरे दै ! ही इज तो अपना सारतरे। सुनते ही हमने फैसला किया कि इसको यहीं सबके सामने खरी-खरी सुनाएंगे ताकि इसे पता चल जाए कि हिन्दी राइटर इण्डियन इंग्लिश राइटर्स की तरह पश्चिम का थूका हुआ चाटने वाला चाटुकार नहीं है।

इस पर तालियाँ बजती हैं वीरबालक अपनी विनम्रता और दुस्साहस दोनों का परिचय देते हुए बताता है,तो हम अपनी प्लेट लेकर सरतरे के पास पहुँचे। पहले सोच रहे थे कि उससे फ्रेंच बोलें लेकिन एक तो हमारी फ्रेंच इतनी अच्छी नहीं है कि उसमें गूढ़ साहित्यिक चर्चा कर सकें। दूसरे हम चाहते थो कि अदर इंडियन राइटर्स भी हमारी बात समझ सकें। तो हमने सारतरे से कहा,”हलो एक्स्क्यूज मी,आई आल्सो इंडियन राइटर बट मैं आपका रौब नहीं खाता। बिन्क पोजीशन यह है कि अब आप यहाँ आ गए हैं तो मैं खाना भी नहीं खाऊँगा। इसका रीजन यह है कि आपने सारा सहित्य उल्टी करने की इच्छा पर लिखा है। इसलिए आकपो देखते ही मुझे उल्टियाँ आने लगी हैं। हम इंडियन्स हैं और हमें बड़ों की इज्जत करना सिखाया जाता है इसलिए मैं आपसे बहुत आदरपूर्वक यह कहना चाहता हूँ कि आपको बुद्ध से चुरायी हुई एक्जिस्टेन्सवाद की फिलासफी सैकेंड हैंड है और आपका लिटरेचर थर्ड रेट। थैंक्यु एंड गुड बाई। इतना कहकर हम वाकआउट कर गए।"

हमारा वीरबालक तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मंच से उतरता है और जिस स्थानिक कवियित्री के वह दो मुक्तक छाप चुका होता है वह भाव-विभोर होकर उसकी ओर बढ़ती है। एक मुसरचन्द-मार्का मूर्खबालक हमारे वीरबालक के आगे वह शंका रखने की धृष्टता करता है,लेकिन सर सार्त्र तो बहुत पहले ही मर चुके थे। वीरबालक बहुत आश्वासन के साथ कहता है, हाँ,मारे शर्म के।
समाप्त

11 मार्च 2011

हिन्दी साहित्य में वीरबालकवाद - 6

ऋषि-ग्रन्थि के अन्तर्गत वीरबालक बिरादरी में राजाश्रय और सेठाश्रय दोनों बड़ी घटिया किस्म की चीजें मानी जाती है। इसीलिए वीरबालक अपने लिए एक ठो स्टैंडर्ड बायोग्राफी गढ़ चुका होता है। मामूली हैसियकत वाले परिवार में जन्म,संघर्षरत माता अथवा पिता अथवा दोनों से प्रेरणा प्राप्त,निर्दय समाज से निर्भीक टक्कर,प्रलोभन ठुकरा क्रान्ति पथ पर अग्रसर,सीकरी को ठेंगा दिखाने के दंड-स्वरूप मान-सम्मान से वंचित,तिकड़मबाजों द्वारा उपेक्षित किन्तु आश्वस्त कि हिस्ट्री बोलेगी ही वाज सिम्पली ग्रेट बट हिस्ट्री की डिफिकल्टी यह है कि वह ससुरी मरणोपरान्त शुरू होगी। तो वीरबालक दारू से महकती एक आह भरकर कहता है अपने से और अपनों से कि 'अइसे तो हम निराला,मुक्तिबोध की तरह अनचीन्हे मर जावेंगे' इसलिए नौकरी-वौकरी करनी पड़ जाती है और अपना स्थान बानने के लिए भी संघर्षरत रहना पड़ता है।

बता ही चुका हूँ कि वीरबालक-बिरादरी में यह माना जाता है कि दूसरों को नौकरी भ्रष्ट विचारधारा और उत्कृष्ट चमचागीरी के कारण मिली है। इसमें इतना और जोड़ना आवश्यक है कि इस बिरादरी में अगर किसी की कुर्सी जाती है तो वह यही कहता है कि मुझे अपनी क्रान्तिकारी विचारधारा के कारण प्रतिक्रियावादी प्रतिष्ठान ने पद से हटाया। खैर इतना निर्विवाद है कि वीरबालक नौकरी सरकार की कर रहे हों या सेठ की वे सच्चे सेवक क्रान्ति के ही होते हैं। जैसा कि सरकारी नौकरी वाले एक नवोदित वीरबालक ने भरी सभा में मुझे 'सिनिसिज्म' के लिए लताड़ते हुए घोषणा की थी,जैसे तुलसी ने राम की चपरास गले में डाल ली थी वैसे हमने क्रान्ति की चपरास गले में डाल ली है। गोया वीरबालक राज हो या सेठ के दिए कपड़े भले ही पहन ले नीचे क्रान्ति की कोई जनेऊनुमा चपरास बराबर डाले रहते हैं कि नौकरी जाते ही कपड़े उतार के उसे दिखा दें।

राजाश्रय या सेठाश्रय की अनिवार्यता से तिलमिलाते वीरबालक फिर एक क्रान्तिकारी स्थापना यह करते हैं कि हमें साहित्य में सेठों और नेताओं की घुसपैठ स्वीकार नहीं करनी चाहिए। अस्तु,न सरकारों और सेठों के दिए पुरस्कार ग्रहण किए जाएं और न ऐसे किसी साहित्यिक आयोजन में सम्मिलित हुआ जाए जिसमें किसी मन्त्री या सेठ को बुलाया जा रहा हो। लेकिन इसमें भी कुछ व्यावहारिक दिक्कतें आ जाती हैं। जैसे यह कि नेता न आए तो टी.वी. कवरेज नहीं होता,और तमाम जिस चीज का टी . वी. में कवरेज न हुआ हो वह न हुई मान ली जाती है। पुरस्कारों का ऐसा है कि सरकारों या सेठों द्वारा ही दिए जाते हैं। उन्हें ग्रहण न किया जाए तो बेटी की शादी से लेकर फ्लैट की खरीद तक कई काम अटके रह जाते हैं और कायदे का बायोडाटा भी नहीं बन पाता। 'अस्तु,लेने ही पड़ जाते हैं बन्धू।' और फिर आप यह भी तो समझिए ना कि अगर कौनो बड़का मन्त्री या कैपिटलिस्टुआ हमको सम्मानित करे के बदे आता है तब हमारा अस्टेटस उससे हाई ही न कहा जाएगा ?

इसके बाद ले-देकर यह बचता है कि साधारण साहित्यिक आयोजन में नेता या सेठ न बुलाए जाएं। महमूर्ख किस्म के लोग ही यह शंका कर सकते हैं कि जब वीरबालकों कोनेताअें के दरबार में स्वयं हाजिरी लगाते कोई आपत्ति नहीं होती तब साहित्य के दरबार में उनकीउपस्थित से इतना कष्ट क्यों होता है। हमारे वीरबालक सिद्धान्तवादी है। इसलिए उनके तमाम विरोध सैद्धान्तिक स्तर पर ही होते आए हैं,व्यावहारिक स्तर पर नहीं। सुनता हूँ कि एक वीरबालक अपने घनिष्ठ मित्र और संरक्षक छोटा सेठ से कहा,"भाई मेरे बुरा मत मानियो सिद्धान्त का मामला है आज मैं भरी सभा में तेरा जौत्य-कर्म करूँगा।" इस पर छोटा सेठ ने कहा, "कर लियो भई लेकिन मीटिंग के बाद मन्त्री जी से मेरा सौदा जरूर करवा दीयो।" इस तरह के तमाम दिलचस्प किस्से मुझे नवोदित वीरबालकों के मुँह से सुनने को मिलते रहते हैं क्योंकि अब मैं वीरबालक बिरादरी में स्वयं ज्यादा चलायमान नहीं रह गया हूँ।

तरूण वीरबालकों के कई किस्से सुनकर अपने कानों पर विश्वास नहीं होता और यही प्रमाणित होता है कि हमारे नेताओं की तरह साहित्यिक मठाधीशों ने भी ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें सब एक-दूसरे को और जाहिर है कि अपने को भी चोर मान रहे हैं। तरूण वीरबालक अधेड़ और वयोवृद्ध वीरबालकों की अनैतिकता,चाटुकारिता,भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के किस्से सुनाते जाते हैं और बेसब्री से मुझ वयोवृद्ध वीरबालक की किसी टिप्पणी की प्रतिक्षा करते हैं कि जाके सम्बद्ध व्यक्ति को सुना आए। मैं अपनी जबान को भरसक लगाम देता हूँ लेकिन मैं जानता हूँ कि चुप रहने से भी वीरबालक बिरादरी में कोई बात बनती नहीं है क्योंकि आपके मुँह से निकला कोई-न-कोई उद्गार सुविधानुसार गढ़ लिया जा सकता है। मुझे आश्चर्य होता है कि तरुण वीरबालक आकर कभी कोई साहित्यिक चर्चा नहीं करते। उनकी सारी बातचीत साहित्यिकार चर्चा को समर्पित रहती है। वह यही बताना चाहते हैं कि किसको जमाने-उखाड़ने के सिलसिले में वयोवृद्ध वीरबालकों में क्या सौदेबाजी हुई है।

उनके अनुसार कभी-कभी ये सौदे साहित्य के दायरे तक सीमित होते हैं जैसे यह कि वीरबालक 'ए' ने वीरबालक 'बी'' के लेखन की पहली बार निन्दा की जगह प्रशंसा इसलिए की है कि वीरबालक बी ने वीरबालक 'ए' के विवादास्पद व्यक्तव्य के समर्थन में कुछ लिख दिया है। लेकिन अकसर ये सौदे अहोरूपम अहो ध्वनि के दायरे से बाहर होते हैं। प्रशंसा की कीमत कैश या कांइड में वसूल की जाती है। तरुण वीरबालक आते हैं और आश्चर्य करते हैं कि सर क्या आपको इतना भी नहीं पता कि अलाँ ने फलाँ को अपने खर्चे से विदेश यात्रा करायी है। अलाँ को तो फलाँ ने अपनी मिस्ट्रेस बना लिया है। अलाँ ने फलाँ के लिए उसकी कृति के विदेश अनुवाद किए जाने का या उसे विदेश में कोई फेलोशिप मिल जाने का जुगाड़ करवा दिया है। यह विदेश वाली बात तरुण वीरबालकों की चर्चा में अक्सर आ जाती है।
जारी...

10 मार्च 2011

हिन्दी साहित्य में वीरबालकवाद - 5

मनोहरश्याम जोशी

किसी छोटे या बड़े नेता,किसी छोटे या बड़े सेठ की कृपा से किसी गद्दी पर आसीन साहित्यिक सामन्त वीरबालक का जलवा देखना हो तो उसके साथ कभी दौरे पर निकलिए। जहां जाइएगा स्टेशन या हवाईअड्डे पर स्थानिक वीरबालकों की सलामी गारद अटेंशन में पाइएगा। उसका स्थानिक मन-सबदार उसे हार पहनाएगा और वेरी इम्पोर्टेन्ट वयोवृद्ध वीरबालक वी. आई.वी. वी. की चरण रज अपने माथे लगाएगा। फिर अपने यहां के सबसे बड़े नेता,सेठ या अधिकारी की कार में वी.आई.वी.वी. को अपने यहां के सबसे बढ़िया होटल या सरकारी विश्राम गृह में ले जाइएगा जहां कार-दाता एक और सलामी-गारद,एक और हार के साथ प्रस्तुत होगा। सलामी की रस्म पूरी हो जाने के बाद कारदात अपना स्काचदाता रूप दिखाते हुए एक बोतल सेवा में प्रस्तुत करेगा। जो सभा होगी उसमें वी.आई.वी.वी अपनी वीरता और शत्रुओं की कायरता का बखान करके स्थानीय वीरबालकों की दाद पाएगा और स्थानीक साहित्यकारों के वीरबालकवादी तेवरों पर स्वयं दाद देगा। साहित्य चर्चा अन्तर्गत इतना ही होगा कि स्थानिक वीरबालक वी.आई.वी.वी. को अपनी कोई पुस्तक थमाते जाएंगे कि सर पढ़कर दो शब्द लिखने की कृपा करें। सर प्रोत्साहन के दो शब्द वहीं बगैर पढ़े कह डालेंगे और दिनभर में मिली कई किलो रद्दी स्थानीक मनसबदार के लिए छोड़ आएंगे।

वी.आई.वी.वी. तरूण वीरबालकों को यह नेक सीख दे जाता है कि अच्छा साहित्यकार होने के लिए अच्छा वीरबालक होना जरूरी है,कुछ अच्छा पढ़ना या लिखना नहीं। जहां तक हो सके लिखो ही मत। लिखो तो अच्छा मत लिखो क्योंकि रूपवादी समझ लिए जाओगे। और देखो तुम्हें लिखने के जिद ही हो तो ऐसी छोटी-मोटी कविताएं लिखे जिनकी तारीफ में मित्र आलोचक जितना भी कहें वो कम हो लेकिन जिनके बारे में इतना कहना ही काफी हो कि याद न रखी जा सकने के मामले में ये सर्वथा यादगार है। ऐसी कविताएं लिखने में समय कम लगता है और संग्रह जल्दी तैयार हो जाता है। संग्रह पढ़ने में भी ज्यादा समय नहीं लगता। उपन्यास लिखोगे तो सभी वीरबालक लोकार्पण गोष्ठी में बिना पढ़े ही पहुंच जाएंगे। लेकिन दि बेस्ट तो यह है कि कुछ भी मत लिखो। बस विवादस्पद वक्तव्य, साक्षात्कार देते रहो। इस बात को समझो कि वीरबालकों के साहित्य-दरबार में राजा इन्द्र का रोल ऐसे रिवोल्युशनरी ऋषि को ही नसीब हो पाता है जो आसार-संसार में आकंठ लिप्त होते हुए भी साहित्य संसार में सन्यास ले चुका हो। अब लगे हाथों कुछ बातें वीरबालकवाद के ऋषि पक्ष के संदर्भ में भी कर ली जाए। सािहत्यिक हाजमा ठीक रखने के लिए सत्यम,शिवम,सुंदरम की डोज नियमित रूप से पीने और पिलाने वाले हमारे वीरबालकों का ऐसा विश्वास है कि ऋषिगण सुरा-सुंदरी और राजदरबार में मिलने वाले मान-सम्मान तीनों से सख्त बरतते आए हैं। सांसारिक भोग-विलास से यह परहेज ही उन्हें समाज की आंखों में राजा से ऊँचा स्थान दिलाता आया था। अब सुरा का ऐसा है कि उसका अविष्कार हुआ ही इस लिए की कतिपय कविमन किस्म के प्राणियों ने पाया कि नशे के अभाव में सही सुर लग नहीं पाता है। और सुंदरी का ऐसा है कि मानव जाति ने लंगोट का इजाद किया ही तब जब आमराय यह बनी कि जो मर्द बच्चा सो लंगोट कच्चा।

प्राचीन ऋषियों के बारे में मेरी जानकारी नहीं के बराबर है इसलिए मैं पंडित वागीश शुक्ल से पूछकर ही आपको बता सकूंगा कि वे सुरा और सुन्दरी से कितना परहेज बरतते थे। सम्भव है तब भी न बता पाऊँ क्योंकि प्राचीन भारत के बारे में किसी तरह की गड़बड़ बात बोलना निरापद नहीं है। दो नवीन ऋषियों उर्फ वीरबालकों में से ज्यादातर सुरा-सुन्दरी त्याग नहीं पा रहे हैं बेचारे। तो इस सन्दर्भ में सारा वीरबालकत्व यह सिद्ध करने में है कि मैं पीता भी हूं तो अपने पैसे की जबकि दूसरे मुफ्त की पीते हैं ? जी हाँ,और अगर कौनो जन बहुत पीछे पड़ जाए तो हमहु पी लेते हैं। इस सन्दर्भ में वयोवृद्ध वीरबालकों के बारे में तरुण वीरबालक दिलचस्प जानकारियां देते रहे हैं मुझे। जैसे यह कि उनमें से एक सुरा-प्रेमियों को दर्शन देने बहुधा आ जाते हैं लेकिन मधुशाला को उनसे एक कानी कौड़ी भी लेने का आज तक कष्ट नहीं उठाना पड़ा है। कलम का कोई भी मजदूर शराब पीने में अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई बरबाद नहीं कर सकता,अपना जिगर भले कर दे।

जहां तक सुन्दरियों का सम्बन्ध है कदाचित इतना ही कह देना पर्याप्त हो कि साहित्यकार होने के नाते वीरबालक में आरम्भ से ही उत्कट सौन्दर्यबोध रहता है और आयु के साथ-साथ उक्त सौन्दर्यबोध तीव्रतर होता चला जाता है। स्वाभाविक है कि जो सुन्दरियां युवा वीरबालक को माताएं-बहनें लगती रहीं थीं वे वृद्धावस्था में बेटियां प्रतीत होने लगती हैं। पूर्णाहुत से ठीक पहले या ठीक बाद के क्षण में। नितान्त प्रीतिकर रूप से पारिवारिक यह सौन्दर्यप्रियता वीरबालकों के ऋषिपद की सुरक्षा करती रहती हैं। अब ऐसा है कि वीरबालक ऋषि के साथ-साथ क्रान्तिकारी भी होते हैं और क्रान्तिकारी आप जानिए आधुनिक भी होता है और आधुनिकता के मारे आप जानिए कि जैनेन्द्र जी जैसे गांधीवादी लेखक तक को पत्नी के साथ-साथ प्रेमिका भी आवश्यक प्रतीत होने लगी थी। तो वीरबालक को क्रान्तिकारी रूप में एक ठो प्रेमिका भी अपेक्षित रहती है। बल्कि दो ठो क्योंकि अज्ञेय नदी के द्वीप में अपने साथ रेखा और गौरा दूनों को ले गए थे और सौन्दर्याबोध के क्षेत्र में अज्ञेय ही क्रान्तिकारियों के आदर्श हैं। वीरबालकवादी साहित्यकार अपने आसपास से जुड़ा रहता है इसलिए जोड़ीदार प्रेमिका को भी आस-पास से ही प्राप्त करना चाहता है। इसके चलते साहित्य-साधिका को ही प्रेमिका बनाने की परिपाटी चली आ रही है। आज वीरबालकवादी डींगें वीरबालकवादी ढोंग के अनुपात में ही इतनी बढ़ चली हैं कि अब हर साहित्य-साधिका किसी न किसी वीरबालक को प्रेमिका ठहरायी जा रही है। प्रतिपक्ष के वीरबालक हर सफल साहित्य-साधिका के विषय में यहां तक कहते सुने जाते हैं कि वह स्वयं नहीं लिखती,भले घर की औरतों को बिगाड़ने वाला अमुक लम्पट वीरबालक उसके लिए लिख दिया करता है। यह शंका करना अपनी मूर्खता का परिचय देना होगा कि अगर वह लम्पट-लंगोट-लुच्चा इतना अच्छा लिख सकता है तो अपने नाम से ही क्यों नहीं लिख लेता ?

वीरबालक अपनी प्रेमिका का इस अर्थ में भी संरक्षक होता है कि वह उस पर दूसरों की बुरी नजर नहीं पड़ने देता। एक साहित्य-सभा के बाद चाय-पान के दौरान मैं अपना परिपक्व सौन्दर्याबोध एक नवोदिता पर आजमाने लगा तो एक वयोवृद्ध वीरबालक विशेष मुझे बाँह पकड़कर एकान्त में ले गए और उन्होंने फुसफुसाकर मुझसे कहा कि अइसा है ये बहुत ही सम्भ्रांत घर की महिला हैं और इनसे हमारा पारिवारिक सा सम्बन्ध रहा है। आप इनसे कुछ इस टाइप....आप समझ रहे हैं ना ? अब इतना नासमझ तो बन्धुवर मैं भी नहीं हूँ। इधर कुछ अन्य वीरबालक जो कोई ओर क्रान्तिकारी चीज लिखने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं,अपनी प्रेम-लीलाओं का सार्वजनिक स्वीकार करके अपनी वीरता का प्रमाण दे रहे हैं। सिद्ध कर रहे हैं कि भले ही वे अपने आराध्य पश्चिमी लेखकों जैसा कुछ रच न सके हों प्रेमिकाएं अपनाने-छोड़ने के मामले में उनसे कभी पीछे नहीं रहे हैं।
जारी...

9 मार्च 2011

"मैं री मैं"

एक मालदार जाट मर गया तो उसकी घरवाली कई दिन तक रोती रही जात -बिरादरी वालों ने समझाया तो वह रोते-रोते ही कहने लगी,  "पति के पीछे मरने से तो रही ! यह दुःख तो मरूँगी तब तक मिटेगा नहीं रोना तो इस बात का है कि घर में कोई मरद नहीं मेरी छः सौ बीघा जमीन कौन जोतेगा, कौन बोएगा?"
हाथ में लाठी लिए और कंधे पर खेस रखे एक जाट पास ही खड़ा था वह जोर से बोला,"मैं री मैं"

जाटनी फिर रोते-रोते बोली,"मेरी तीन सौ गायों और पांच सौ भेड़ों की देखभाल कौन करेगा?

उसी जाट ने फिर कहा, "मैं री मैं"

जाटनी फिर रोते रोते बोली, "मेरे चारे के चार पचावे और तीन ढूंगरियाँ हैं और पांच बाड़े हैं उसकी देखभाल कौन करेगा?"

उस जाट ने किसी दूसरे को बोलने ही नहीं दिया तुरंत बोला,"मैं री मैं "

जाटनी का रोना तब भी बंद नहीं हुआ सुबकते हुए कहने लगी,"मेरा पति बीस हज़ार का कर्जा छोड़ गया है,उसे कौन चुकाएगा?"

अबके वह जाट कुछ नहीं बोला पर जब किसी को बोलते नहीं देखा तो जोश से कहने लगा, "भले आदमियों,इतनी बातों की मैंने अकेले जिम्मेदारी ली तुम इतने जन खड़े हो, कोई तो इसका जिम्मा लो! यों मुँह क्या चुराते हो!"

-विजयदान देथा

8 मार्च 2011

तेरे माथे पे यह आँचल बहुत ही खूब है लेकिन

हिजाबे फतना परवर अब उठा लेती तो अच्छा था।
खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था

तेरी नीची नजर खुद तेरी अस्मत की मुहाफज है।
तू इस नश्तर की तेजी आजमा लेती तो अच्छा था

यह तेरा जर्द रुख, यह खुश्क लब, यह वहम, यह वहशत।
तू अपने सर से यह बादल हटा लेती तो अच्छा था

दिले मजरुह को मजरुहतर करने से क्या हासिल?
तू आँसू पोंछ कर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था

तेर माथे का टीका मर्द की किस्मत का तारा है।
अगर तू साजे बेदारी उठा लेती तो अच्छा था

तेरे माथे पे यह आँचल बहुत ही खूब है लेकिन।
तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।

- मजाज लखनवी

7 मार्च 2011

हिन्दी साहित्य में वीरबालकवाद - 4

श्रीकान्त मिनिस्टर तो नहीं बाद में एम.पी. जरूर बन गया और खुद यह देख सका कि जहां तक वीरबालकों का सवाल है उनके लिए संसद की सत्ता साहित्यकार की सत्ता से कहीं ज्यादा बड़ी है। श्रीकान्त एक बढ़िया कवि के रूप में हमेशा याद किया जाएगा लेकिन उस दौर में वह पी.एम. के निकट होने और बड़ी दरियादिली से स्काच पिलाने के लिए याद किया जाता था। उसे भाव-विह्वल श्रद्धांजलि देते हुए एक वीरबालक ने कहा था, 'अब श्रीकान्त जैसा स्काच पिलाने वाला कहां मिलेगा।' खैर तो वीरबालक एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए यह मानकर चलते हैं कि राजनेता सर्वशक्तिशाली हैं और कुर्सियां उनकी कृपा से ही मिलती हैं और जब हमसे छिनती हैं तो राजनेताओं के कोप के कारण ही। बिरादरी में किसी घटिया साबित करने का सबसे बढ़िया उपाय यह समझा जाता है कि उसे राजनेता की चापलूसी करके कुर्सी पाने और बचाने वाला सिद्ध कर दिया जाए।

अब जैसा रामशरण जोशी ने मुझे आपातकाल में कायरता दिखाने का प्रमाण पत्र देने के साथ-साथ यह भी बताया है कि इन्दिरा गांधी के हार जाने के बाद अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए मैंने अटल जी की कुंडलियां छापनी शुरू कर दीं। सफाई देना इसलिए व्यर्थ नहीं है कि किस्सा खासा दिलचस्प है। हुआ यह कि जेल से अटल जी ने एक कुंडली सम्पादक के नाम पत्र के रूप में भेजी जिसमें मारीशस में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन पर कटाक्ष किया गया था। पत्र जेल-सेंसर से पास हो कर आया था इसलिए मैंने छाप दिया लेकिन इसके छापे जाने पर सूचना मंत्रालय के सेंसर ने मुझे फटकार सुनायी। फिर विदेशमन्त्री बन जाने के बाद अटल जी ने अपने कुछ गीत प्रकाशनार्थ भेजे जिन्हें मैंने तुरन्त नहीं छापा। इस पर उन्होंने सम्पादक पर व्यंग्य करते हुए एक कुंडली भेजी। फिर मैंने उनके गीत छापे और उनकी भेजी कुंडली और जवाबी सम्पादकीय कुंडली भी साथ ही साथ छाप दिए। सम्पादकीय कुंडली में कहा गया था कि मंत्री पद पा जाने पर कवि हो जाना सहज सम्भाव्य है।

मुझे सचमुच बहुत अफसोस है कि मुझे अपनी कुर्सी बचाने के लिए ऐसे घटिया काम करने पड़े। जहां तक रामशरण जोशी का सवाल है मेरे लिए यह अपार सन्तोष का विषय है कि उन्हें अपने नक्सलवादी विचारों के कारण माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कार्यकारी निर्देशक का पद मिल गया है और इसे पाने या बचाने के लिए उन्हें कभी किसी कांग्रेसी सी.एम.,पी.एम. की चाटुकारिता करने की कोई आवश्यक्ता नहीं पड़ी। खैर शत्रुतापूर्ण मैत्री और मैत्रीपूर्ण शत्रुता में विश्वास करने वाले वीरबालकों में एक-दूसरे के बारे में झूठ बोल देने से परहेज उतना ही कम किया जाता है जितना कि अपने बारे में सच्चाई स्वीकार करने से। दूसरों के बारे में कहीं से कोई गड़ा मुर्दा उखाड़कर ले आया जाता है तो अपने बारे में यह तक भुला दिया जाता है कि अभी कल ही हम कहीं और क्या कह अथवा कर चुके हैं। अरे परिपक्वता आने के साथ-साथ आदमी का विचार बदलता है कि नहीं ? कुछ वयोवृद्ध वीरबालक तो इस मामले में इतने भुलक्कड़ हैं कि एक ही गोष्ठी में बोलते-बोलते परिपक्व हुए चले जाते हैं। वीरबालक बिरादरी में कुर्सी इसलिए भी बहुत जरूरी समझी जाती है कि यद्यपि हर वीरबालक अपने को कलम का मजदूर कहता है तथापि वह लिखकर पैसा कमाने को कलम बेच देने का पर्याय मानता है। इसलिए कभी वीरबालकों को पत्रकारिता से भी परहेज था। अब उससे तो नहीं लेकिन फिल्म और टीवी के लिए लिखने से है। खैर पत्रकार या लेखक के रूप् में मीडिया से जुड़ने वाला हर वीरबालक यह कहते रहने जरूरी समझता है कि मैंने अपनी कलम बेची नहीं है और सरकार या सेठ से किसी तरह का समझौता नहीं किया है। पूंजीपतियों से जोड़े जाने के कलंक से बचने के लिए कुछ सयाने वीरबालकों ने किसी ऐसे छोटे-मोटे सेठ को पकड़ लेने की युक्ति अपनायी है जो साहित्य का मारा हुआ हो और बुद्धिजीवियों की सोहबत करा देने की एवज में सारे खर्चे-पानी का जुगाड़ खुशी-खुशी कर देता हो।

जो वीरबालक बड़े सेठों के लिए काम करते हैं वे इस बात को छिपा जाते हैं कि मालिक को नौकर की वैचारिक क्रान्तिकारिता से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह तो केवल जी-हजूरी और हितरक्षा चाहता है। जब तक आप विज्ञापन से आय बढ़वाते और सत्तावान लोगों से सम्बन्ध सुधरवाते रहेंगे तब तक सेठ आपको सांस्कृतिक पृष्ठों पर कुछ भी लिखने-छापने की पूरी छूट देता रहेगा। दूसरे वीरबालक आपकी शिकायत करें तो वह अनसुनी कर देगा। जी हां,सेठ से यह शिकायत की जाती थी कि आपका सम्पादक कम्युनिस्ट है और पश्चिमी रंग में रंगा हुआ है। अब यह शिकायत की जाती है कि आपका सम्पादक पोंगापन्थी हिन्दी वाला है जो भूमण्डलीकरण के तकाजों से अनजान है।

कभी मेरे द्वारा साप्ताहिक हिन्दुस्तान कि आवरण पर कांगड़ा-शैली के श्री राधा जी के चित्र के बारे में कृष्ण कुमार जी से यह शिकायत की गई कि पश्चिमी रंग में रंगे कम्युनिस्ट सम्पादक ने राधा का नग्न चित्र छापकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचायी है। कृष्ण कुमार जी ने मुझे बुलाकर कहा था,कांगड़ा शैली का है वह तो मैं समझ गया लेकिन भई देखो अपन ऐसे फोटो निकालें ही क्यों की लोग नाराज होवें और सर्कुलेशन घटे। मैं समझता हूं कि अब नई पीढ़ी के सेठ भी नयी पीढ़ी के सम्पादक जी को बुलाकर कुछ यों कहते होंगे, पोर्नोग्राफी के लिए कौन कह रहा है भई लेकिन अपने प्रोडक्ट की अपमार्केट इमेज तो बनानी ही चाहिए। हिंग्लिश यूज करके और लुगाइयों के सेमीन्यूड फोटो निकालकर। नहीं तो अपनी तो एड-रेवेन्यु निल रह जाएगी। जिसे पुराना सेठ अपसंस्कृति की जननी समझता था उसे नया सेठ अपमार्केट की मदर बताता है।
जारी...

6 मार्च 2011

हिन्दी साहित्य में वीरबालकवाद - 3

हर समझदार वीरबालक यह जानता है कि प्रतिरक्षा का श्रेष्ठ उपाय प्रहार है। इसीलिए वह 'जो पहले मारे सो मीर' के सिद्धांत पर पूरी आस्था रखता है। पहले हमला करने वाला अपने पर जवाबी हमला करने वाले को लचर सफाई देने वाला ठहराते हुए पूछ सकता है कि अगर आपको मैं पतित और प्रतिक्रियावादी लग रहा था तो आप अब तक चुप्पी काहे साधे थे ? इस पर सफाई देने वाला यदि अतिरिक्त सफाई देते हुए यह कहे कि मैं तो शालीनतावश चुप था तो कोई बात बनती नहीं। कारण,वीरबालक बिरादरी में 'शालीनता'  की तो होती है लेकिन शालीनता की नहीं। शालीनता अर्थात अपनी समस्त प्रगतिशीलता के बावजूद सरस्वती-वन्दना सुनने और शंख-ध्वनि के बीच शाल,श्रीफल,प्रतिमा और चेक लेने की स्वीकृति। मैं बराबर इस प्रतीक्षा में रहा हूं कि कोई वीरबालक 'शालीनता'  पर सैद्धांतिक और व्यावहारिक आपत्ति उठाएगा। व्यावहारिक यह कि जब हम न शाल ओढ़ते हैं और न हमें नारियल गिरी की बर्फी पसंद है तब आप शाल-श्रीफल ही क्यों दिए चले जाते हैं ? सूट लेंथ और स्काच नहीं दे सकते क्या ? सैद्धांतिक यह कि हम क्रान्तिकारियों को इस तरह की भारतीयता अर्थात प्रतिक्रियावाद से जुड़ी चीजें क्यों दी और सुनाई जा रही हैं।

यहां उल्लेखनीय है कि वीरबालक बिरादरी के लिए 'भारतीयता' खासी गड़बड़ सी चीज रही है। किसी के पतित ठहरा देने का अचूक तरीका वीरबालकों में यही माना जाता रहा है कि उसे पुरातपन्थियों या हिन्दुत्ववादियों से जोड़ दिया जाए। जब से भाजपा भी सत्ता की भागीदारी होने लगी है तब से वीरबालकों के लिए उससे जुड़ने का लालच और उससे जोड़ दिए जाने का खतरा दोनों ही बहुत बढ़ गए हैं। एक संस्मरण ठोकने की अनुमति चाहता हूं। मुझे व्यंग्य लेखन के लिए पुरस्कार दिया जाना था। आयोजकों ने कहा कि अपनी पसन्द का कोई वक्ता बता दीजिए। मैंने ऐसे अधेड़ वीरबालक का नाम सुझाया जिसकी रचनाएं मैं बहुत पसंद करता हूं। आयोजन से हफ्ताभर पहले उसका मेरे पास फोन आया कि जोशी जी मैं दो रात से सो नहीं सका हूं। आप ही बताइए मैं क्या करूं ?

मैं बड़े चक्कर में पड़ गया,पूछा, "क्या हुआ भाई ?" पता चला कि पुरस्कार देने अटल जी आ रहे हैं। और अनके वयोवृद्ध बालकों ने कहा है कि संघ परिवार से जुड़े पी एम के साथ मंच शेयर करना ठीक नहीं रहेगा। मैंने उनसे न यह पूछा कि सी पी एम के नेता संघियों के साथ क्यों पर्लियामेंट शेयर कर रहे हैं और न यह कि वयोवृद्ध वीरबालक संघीय पी एम की सरकार द्यारा गठित समितियों और आयोजित गोष्ठियों में क्यों चले जा रहे हैं ? मैंने उससे सिर्फ इतना कहा कि परेशान क्यों होते हो मना कर दो। इस पर उसने राहत और हैरानी दोनों एक साथ व्यक्त की। वीरबालकवादियों के लिए सही मन्त्रों का जाप करना और राजनीतिक छुआछूत बरतना बहुत आवश्यक माना गया है। इसके अभाव में आपकी वीरता संदिग्ध हो जाएगी क्योंकि वीरता दिखाने के लिए कोई और अवसर न प्रस्तुत हुआ है और मुक्तमंडी ने चाहा तो आगे भी प्रस्तुत नहीं होगा। परम प्रसन्नता का विषय है कि स्वाधीनता के बाद से अब तक हिन्दी भाषी प्रदेश में कुल एक बार ऐसा अवसर आया जब वीरता के प्रदर्शन से कष्ट में पड़ने का कोई खतरा पैदा हो सकता था।

वह था आपातकाल। लेकिन उसके दौरान वीरबालकों ने कोई खास वीरता प्रदर्शित की नहीं। शायद इसलिए कि वे जेल नहीं जाना चाहते थे या शायद इसलिए कि वे इन्दिरा गांधी को वामपन्थी समझते थे। खैर जो हो,उसके वर्षों बाद कुछ वीरबालक आपातकाल के सन्दर्भ में भी वीरता और कायरता के प्रमाण पत्र बांटते रहे। मेरी कायरता असंदिग्ध है क्योंकि मैंने कुर्सी नहीं छोड़ी। लेकिन यह भी असंदिग्ध है कि उस दौर में वीरबालक बिरादी में कुर्सी छोड देने की कोई प्रतियोगिता नहीं चली हुई थी। मेरे मित्र साहित्यकारों में केवल कमलेश ही ऐसे थे जो इन्दिरा गांधी के विरोध में कुछ कर दिखाने के लिए निकले थे। प्रसंगवश बाद में कमलेश वीरबालक बिरादरी के लिए समर्थ कवि और प्रकांड विद्वान से ज्यादा इस रूप में सांय स्मरणीय हुए कि समर्थ मेजबान हैं। मेरे दोस्तों में कुल निर्मल वर्मा ने ही 'जोशी हाउ कैन यू....' वाली शैली में लताड़ते हुए तब कायर सम्पादक कहा था। औंरो को तो यह इलहाम इन्दिरा गांधी के हार बल्कि मर जाने के बाद हुआ।

वीरबालक कुर्सी छोड़ना नहीं,कुर्सी पाना चाहते हैं। औसत वीरबालक ने ज्यादा नही ंतो इतना समझने लायक मार्क्सवाद तो पढ़ ही रखा होता है कि हम एक अर्द्धसामन्ती समाज में जी रहे हैं जिसमें कलम से कहीं ज्यादा महिमा कुर्सी की है। रुतबा,रौब,रुपया,कुर्सी पर बैठने के बाद ही मिलता है। कुर्सी ही जमाने और उखाड़ने के लिए अधिकार दिलाती है,जो भक्तों को आकर्षित शत्रुओं को आतंकित करती है। वीरबालक भयंकर रूप से सत्ता-ग्रंथि का मारा हुआ होता है क्योंकि हिन्दीभाषी क्षेत्र में साहित्य और साहित्यकार की अपनी अलग से कोई सत्ता बची ही नहीं है। मुझे अपने दोस्त श्रीकान्त का एक सवाल याद आता है जो उसने मुझसे एक दिन दिनमान कार्यालय में पूछा था,यह बताओ जोशी कि ज्यादा पावर किस में होती है-पोस्ट में कि पालिटिशियन में ? अगर मैं अपने कसबे बिलासपुर में पावरफुल पोस्ट होकर लौटूं तो मुझे ज्यादा सम्मान मिलेगा कि पावरफुल मिनिस्टर बनकर लौटने में ?
जारी...

5 मार्च 2011

हिन्दी साहित्य में वीरबालकवाद -2

कुछ पाठकों को शंका हो सकती है कि जब वो वाले 'सर' सत्तावान अथवा प्राणवान अथवा दोनों ही थे तब वीरबालकों ने जाकर उनसे यह नम्र निवदेन क्यों नहीं किया कि 'सर' अन्यथा न लें लेकिन हमारी समझ से आज रिएक्शनरी और डिकाडेंट दूनों हैं। वीरबालक रिवोल्युशनरी के साथ-साथ ऋषि भी होता है और ऋषियों को बड़ों का निरादर करना शोभा नहीं देता। अब शंकालु यह पूछ सकता है कि क्या ऋषियों को गाली-गलौच करना शोभा देता है ? अरे ऋषियों कोन देता हो रिवोल्युशनरियों को तो देता है ना। इस तरह की क्रान्तिकारी कार्रवाई ही तो वीरबालक-बिरादरी के जाग्रतावस्था में पहुँची है वर्ना उसमें तो ऊँघते रहने की महामारी व्याप्त है। वीरबालकों की आँखे तभी खुलती हैं जब कान में गालियों की आवाज पड़े या काकटेल्स के लिए पुकार।

रीडर कटगरी के वीरबालकों के लिए यह भी निरापद समझा जाता है कि वह परोक्ष प्रहार करें अर्थात कोई ऐसी कहानी या कविता लिख दें जिसमें कुछ वीरबालक विशेष या एक वीरबालक विशेष नितान्त घृणित किस्म का पात्र बना दिया गया/दिए गए हों। ऐसी हर रचना की बहुत चर्चा होती है और सभी वीरबालक उसके विषय में एक-दूसरे को फुनियाते हैं। इस तरह का प्रच्छन्न प्रहार इसलिए निरापद माना गया है कि जिस किसी पर प्रहार किया गया हो वह तो मानेगा ही नहीं कि इस रचना का निशाना मैं हूँ। स्वयं रचनाकार को भी यह सुविधा मिल जाती है कि आवश्यक्ता पड़ने पर अपने निशाने से कह दें कि सर आपके श़त्रु इतने घृणित हैं कि मेरे और आपके सम्बन्ध बिगाड़ने के लिए कहते डोल रहे हैं कि अपनी रचना में मैंने उनका नहीं,आपका पर्दाफाश किया है।

समझदार वीरबालक एक समय में एक से ज्यादा हेड आफ डिपाट को नहीं जूतियाता। और उसे जूतियाने से पहले भी किसी अन्य हेड आफ डिपाट से वचन ले लेता है कि आपको हमको एक जोड़ा नया जूता तो दिलवा दीजिएगा ना ? सभी सरों के सिर पर ताबड़तोड़ जूते बरसाने में दो खतरे पेश आते हैं। पहला यह कि आप पागल समझ लिए जाएंगे। दूसरा यह कि आपका जूता टूट जाएगा और आप जानिए नंगे पाँव चलने वालें का वीरबालकों के साहित्य में भले ही अनन्य स्थान हो वीरबालकों की बिरादी में वे नगय समझे जाते हैं। उनके बारे में यह तक नहीं माना जाता कि वे वे मकबूल फिदा हुसैन मार्का बेहतरीन स्टंटबाज हैं। सीरियस वीरबालक बिरादरी में स्टंटबाजी नहीं चलती तो सुजान वीरबालक किसी सर के सिर पर जूता तभी बरसाता है जब किन्हीं अन्य सर की वरदा हथेली उसके अपने सिर पर टिकी हुई हो। ज्ञातव्य है कि हिन्दी में जूनियर वीरबालक डाक्साब और सीनियर वीरबालक सर कहकर सम्बोधित किए जाते हैं। जौत्यकर्म के विषय में विधान यह है कि इसे दो अवस्थाओं में ही अधिक करना उचित है। या तो तब जब आप करियर बनाने के लिए हाथ-पाँव मार रहे हों या फिर जब आप हेड आफ डिपाट बन चुके हों। करियर की तलाश में लगभग घिस चुका फटा-पुराना जूता धड़ाधड़ प्रतिष्ठितों के सिर पर बरसाएंगे तभी वयोवृद्ध वीरबालकों की नोटिस में आएंगे। उनमें से हर हेड आफ डिपाट ललचाएगा कि क्यों नहीं इस बलिष्ठ-बाहु को फैलोशिप दिलवाकर पटा लूँ कि यह मेरे दिए जूते से मेरे प्रतिद्वंद्वियों को तसल्लीबख्श ढंग से गंजा करता रहे। फैलोशिप मिल जाने के कुछ ही समय बाद गुरुजनों की संगत में तरुण वीरबालक को यह बात समझ में आती है कि राजनीति की तरह साहित्य में भी स्थायी दोस्त दुश्मन-जैसी कोई चीज नहीं होती। शत्रुता का एक बहुत ही मैत्रीपूर्ण मैच चलता रहता है। सौदेबाजी चलती रहती है और समीकरण बदलते रहते हैं। इसलिए आपसी गाली-गलौच को बहुत सिर-यसली में नहीं टेक किया जाता।

सच तो यह है कि जौत्यकर्म को मनोरंजक रूप से उत्तेजक और उत्तेजक रूप से मनोरंजक विधा का दर्जा दिया जाता है। 70 के दशक से उस मुक्तमंडी का वर्चस्व बढ़ना शुरू हुआ जिसकी संस्कृति ओर राजनीति दोनों में ही इस तरह के उत्तेजक-मनोरंजक जौत्यकर्म का अच्छा भाव लगता है। मुझे याद है कि ज्ञानपीठ पुरस्कार की स्थापना के अवसर पर साहू जैनों द्वारा आयोजित महासम्मेलन में बहैसियत तरुण वीरबालक मैं थोड़ा गरजा-बरसा और मेरे बाद श्रीकान्त ने तो उसी हैसियत से सत्ता-प्रतिष्ठान और उससे जुड़े साहित्यकारों पर इतना जोरदार प्रहार किया कि बोलते हुए उसकी कमजोर काया अपने दुस्साहस पर स्वयं ही काँपती रही। वह तब हैरान हो गया जब बाद में श्रीमती रमा जैन ने उसे बुलवाया और बहुत प्यार से समझाया कि जोश बहुत अच्छी चीज है लेकिन थोड़ा संयम भी जरूररी होता है। कुछ ही समय बाद श्रीकान्त भी मेरे साथ साहू जैनों के दिनमान में काम करता नजर आया।

अगर मैं भूला नहीं होऊँ तो लगभग उन्हीं दिनों पेरिस में पी ई एन के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में अध्यक्ष पद से बोलते हुए अमरीकी नाटककार आर्थर मिलर ने ने इस विडम्बना की ओर ध्यान दिलाया था कि लोकतन्त्र वाले देशों में सत्ता प्रतिष्ठान को मुँह बिराते संस्कृतकर्मी अब जेलों में नहीं,भव्य दफ्तरों में कैद किए जा रहे हैं। उनकी हैसियत खतरनाक क्रान्तिकारियों की नहीं,मनोरंजक उछल-कूद करने वाले बन्दरों की रह गयी है इसलिए वे जितना ही ज्यादा गाली-गलौच करते हैं उन्हें उतना ही ज्यादा प्यार से गले लगाया जाता है। उन्हें अपनाकर सत्ता प्रतिष्ठान अपनी छवि सुधार लेता है और साथ ही स्वयं उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान का ही एक हिस्सा बना देता है। कृपया ध्यान दें कि मिलर ने यह बात विचारधारा की समाप्ति और मुक्तमंडी की विश्वविजय के मौजूदा दौर से कई दशक पहले कही थी।

आज तो पूँजीवादी मीडिया हर कहीं वामपन्थी वीरबालकों को वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर सर्वहारा की पैरवी और मुक्तमंडी की भर्त्सना करने के लिए तगड़ा वेतन और हर तरह की सुख-सुविधा दे रहा है। लोकतन्त्र और मुक्तमंडी के अन्तर्गत स्वयं राजनीति भी कुल मिलाकर वीरबालकवादी हो चली है इसलिए आज भारत जैसे असामन्ती देश तक यह सम्भव है कि आप किसी सेठ की या सरकार की नौकरी करते हुए भी अपने को सत्ता-प्रतिष्ठान-विरोधी क्रान्तिकारी मान और मनवा सकें। कभी कम्युनिस्ट होने पर सरकारी नौकरी नहीं मिलती थी,आज विचारधारा की समाप्ति के बाद यह आलम है कि पूँजीपति मीडिया में काम करने वाले पत्रकार और आई ए एस,आई पी एस अधिकारी भी अपने को कम्युनिस्ट बता रहे हैं। बहरहाल वीरबालक बिरादरी सेठाश्रय और राजाश्रय का मुक्तकंठ से विरोध करती पायी जाती है उसमें एक-दूसरे पर सेठाश्रय या राजाश्रय लेने का आरोप लगाने का रिवाज है।
जारी...

4 मार्च 2011

हिन्दी साहित्य में वीरबालकवाद

मनोहरश्याम जोशी का यह व्यंगात्मक निबंध बहुत लम्बा है। क्लासिक शृंखला में  इस निबंध का शुरुआती हिस्सा कथादेश मासिक पत्रिका से साभार लगा रहा हूं। 

वीरबालकवाद क्या होता है ?  यह प्रश्न आपके उर में विह्वलता भरने लगे उससे पहले यह समझ लें कि वीरबालकवाद वह होता है जो समझदार वीरबालकों द्वारा किया जाता है और समझदार वीरबालक वे होते हैं जो अपने को वीरगति को प्राप्त नहीं होने देते। अब पूछिए कि समझदार वीरबालकों द्वारा क्या किया जाता है ? और समझ लीजिए अपने को जमाया और और दूसरों को उखाड़ा जाता है। और हां,हर बात का श्रेय स्वयं ले लिया जाता है। तो इस लेख के आरम्भ मं ही स्वयं वीरबालकवाद का अच्छा नमूना पेश करते हुए मैं 'वीरबालक' और 'वीरबालकवाद' दोनों फिकरे चलाने का श्रेय लेते हुए विषय-निरूपण के नाम पर संस्मरण सुनाऊँगा और आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहूंगा कि सभी वीरबालक विषय-निरूपण के नाम पर संस्मरण अवश्य सुनाते हैं क्योंकि आखिर ऐसा हो क्या हो सकता है जिससे वह व्यक्तिगत रूप से जुड़े हुए न रह हों ?

तो साहब हुआ यह कि मैं जब साठ के दशक में मुम्बई आया तब शुरू में अपने मित्र उमेश माथुर के यहां रहा। बम्बइया इंडस्ट्री में किस्मत आजमाने हुए संघर्षरत लड़कों के लिए मैंने वीरबालक सम्बोधन प्रस्तावित किया और उमेश जी ने उसे अनुमोदित कर दिया। उन्हीं दिनों देवानन्द के एक सहायक अमरजीत को जुहू में में टायर पंचर लगाते हुआ एक किशोर मिला जो बहैसियत लेखक बम्बइया फिल्मों में किस्मत आजमाने अपने घर से भागकर आया था। उस वीरबालक को उमेश जी ने समझाया कि अभी तुम्हारी पढ़ने-लिखने की उम्र है इसलिए पहले पढ़ाई पूरी करो फिर बम्बई आओ। उस वीरबालक की वापसी के लिए चन्दा इकट्ठा करके हमने उसे बम्बई से विदा किया। लगभग सात वर्ष बाद साप्ताहिक हिन्दुस्तान में एक नौजवान पत्रकार मुझसे मिलने आया और उसे देखते ही मेरे मुंह से निकला, "कहो वीरबालक तुम यहां कैसे ?"

रामशरण जोशी जयपुर में अपनी पढ़ाई पूरी करके बहैसियत फिल्म-लेखक बम्बई में किस्मत आजमाने आ गए थे। मैंने उस वीरबालक का स्वागत किया और उसकी सारगर्भित पत्रकारिता के कई नमूने छापे। शुरू में रामशरण जनसंघियों की न्यूज एजेंसी 'हिन्दुस्तान समाचार' से जुड़े हुए थे। फिर वह एक नक्सलवादी के रूप में प्रकट हुए। उनकी बातचीत और पत्रकारिता से यह संकेत मिलने लगा कि संघर्ष है जहां,वीरबालक है वहां। इसके साथ ही नेताओं के बारे में उनकी व्यक्तिगत जानकारी में बड़ी तेजी से इजाफा होता चला गया। सत्ता-प्रतिष्ठान के पत्रों के लिए लिख तो पहले से ही रहे थे फिर वह उनमें से एक में अच्छे पद पर नियुक्ति भी पा गए। और इसके साथ ही उनका संघर्षरत क्रान्तिकारी वाला स्वरूप ज्यादा जोर पकड़ने लगा।

तो फिर मैंने एक फिकरा गढ़ा-वीरबालकवाद। वीरबालकवादी का जीवन बगैर क्रान्ति की क्रान्तिकारिता को,बगैर संघर्ष के संघर्ष को और बगैर जोखिम के जोखिम को समर्पित रहता है। कलम का सिपाही होने के नाते वह सारी लड़ाई शब्दों में लड़ता है अर्थात उसकी वीरता वाचा के आयाम तक सीमित रहती है। मनसा और कर्मणा वह सयाना बनता चला जाता है और जितना सयाना होता जाता है उतना ही बोलने और दिखने में वीरता को प्र्राप्त होता है। इसी के चलते आज हिन्दी में सारी सत्ता वयोवृद्ध वीरबालकों के हाथ में है और उनकी छत्रछाया में तरूण वीरबालक तेजी से पनप रहे हैं। वह समझ गए हैं कि वाचा ही वीरबालक बनना चाहिए। और अपना कद बढ़ाने के लिए दूसरे वीरबालकों का कद घटाना चाहिए। दस रीत को अपनाकर 'करियरिस्ट' और 'क्रान्तिकारी' दोनों एक साथ हुआ जा सकता है।

अगर आप मनसा और कर्मणा भी वीरबालक बने रहें तो आप झगड़ालू,सिरफिरे औ सिनिकल समझ लिए जाएंगे। शैलेश मटियानी की तरह किसी भी गुट में फिट नहीं हो पाएंगे और सभी के हाथों पीटे जाएंगे। आपको अपने जीते जी किसी तरह की कोई मान्यता,पद-प्रतिष्ठा,पुरस्कार-पुरस्कार राशि और सुख सुविधा कभी नहीं मिल सकेगी। मरने के बाद मिलेगी इस भरोसे भी आप तभी मर सकेंगे जअ आपको यह विश्वास हो कि दो-चार वीरबालकवादी आपकी आत्मा की शान्ति के लिए अनुष्ठान कर-करके अतिरिक्त प्रतिष्ठा अर्जित करने को लालयित होंगे। मनसा और कर्मणा वीरता को आप जितना ही छोड़ते जाएं उतनी ही 'वाचा' के स्तर पर अपनी वीरता को उद्घोष शुरू कर दें। ऐसा न करने पर आप अपनी नजरों में भी गिर जाएंगे,दूसरों की नजरों में तो खैर आप गिरे हुए होंगे ही।

कारण सच्चा वीरबालक उसे ही माना जाता है जो भौतिक सुखों को जूते की नोंक पर रखने वाला ऋषि और लेनिन के पद-चिन्हों पर चलने वाला रिवोल्युशनरी दानों हो। इस कसौटी पर खरा उतर सकने वाला साहित्यकार मिल सकना कहीं भी कठिन है और हमारे अर्द्धसामन्ती समाज में तो असम्भवप्राय है। अपने इस इतने लम्बे साहित्यिक जीवन में मैंने अब तक कुल एक ऐसा लेखक देखा है जो अच्छी खासी नौकरी छोड़कर नक्सवादी बनने चला गया। वह था दिनमान में मेरे साथ काम कर चुका रामधनी। लेकिन अभी पिछले दिनों में कोई बात रहा था कि वह भी अब मुख्यधारा में शामिल हो गया है। अपने मित्र मुद्राराक्षस को छोड़ मैंने किसी और लेखक को नहीं देखा जिसने किसान या मजदूर मोर्चे पर काम किया हो। और तो और स्वतंत्र लेखन कर सकने और अपनी बात बेरोक-टोक कहने की खातिर नौकरी छोड़ने वाले पंकज बिष्ट-जैसे लोग भी गिने-चुने ही मिल पाएंगे। लुत्फ ये है कि सभी वीरबालक अपने बायोडाटा में एक इन्दराज सम्प्रति अवश्य रखते हैं। यथा-सम्प्रति-गुरु घासिदास विश्वविद्यालय में अध्यापनरत। मानो इससे पूर्व एवरेस्ट अभियान में रत थे और इसके बाद पेरू के जंगलों में छापामारों के कन्धे से कन्धा मिलाकर युद्धरत हो जाएंगे।

तो जहाँ सभी अपनी ही मान्यताओं के अनसार छोंगी,कायर और पतित तीनों ही हों,वहाँ सारा खेल इस बात तक सीमित रह जाता है कि साहित्यिक राजनीति की आवश्यक्ता और अपने स्वार्थ को अध्यान में रखते हुए कब किसको कितना ज्यादा गिरा हुआ बताना है अथवा मन की बात मन में ही रखते हुए कब कितना उठा देना है ? हर समझदार वीरबालक इस बात को समझता है कि अगर मैं कुछ दूसरों को गिरा कुछ दूसरों को उठा हुआ बताऊँगा तो कुछ नासमझ तीसरे मुझे इसलिए उठा हुआ मान लेंगे कि ऊँचाई पर बैठा हुआ इन्सान ही इस तरह के प्रमाण पत्र बाँट सकता है,यही नहीं,जिन वीरबालकों को मैंने उठा हुआ बताया है वे सब मुझे हाथोंहाथ उठा लेंगे। कुछ नादान पाठक शंक कर सकते हैं कि क्या दूसरों को पतित बताने वाला वीरबालक यह जोखिम उठा रहा होता है कि वे पलटकर उस पर वार कर देंगे ?

इन शंकालुओं को यह समझना चाहिए कि हर वीरबालक जहाँ तक हो सके हेड आफ डिपाट कटगरी के किसी ऐसे व्यक्ति पर प्रहार नहीं करता जो पलटकर उसका कोई नुकसान कर सकता हो। अगर वह ऐसे व्यक्ति पर प्रहार करता भी है तो किसी अन्य हेड आफ डिपाट के आशीर्वाद और कृपादृष्टि आश्वासन ले लेने के बाद ही। रीडर और लेक्चररह कटगरी के वीरबालकों पर प्रहार करना निरापद ही नहीं,आवश्यक भी समझा गया है। नयी पीढ़ी के वीरबालक पुरानी पीढ़ी के अब वयोवृद्ध हो चले ऐसे नामवर वीरबालकों पर निर्भय होकर प्रहार करने लगे हैं जिनके पास अब कोई खास सत्ता रह न गयी हो। लेकिन पुरानी पीढ़ी के वीरबालक इतने सयाने हैं कि टाप पोजिशन पर रह चुके किसी अन्य वृद्ध वीरबालक पर तब तक वार नहीं करते जब तक उसकी तेरहवीं क्या,बरसी न हो गयी हो।

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3 मार्च 2011

आत्म-हत्या !

आज सुबह इस खबर ने सभी का ध्यान खींचा होगा। पत्रकार निरुपमा पाठक के हत्या/आत्महत्या को लेकर वेब दुनिया में काफी बहस-मुबाहिसा हुआ था। निरुपमा पाठक पत्रकार थीं इसलिए यह मुद्दा एक 'मुद्दा' बन पाया था। उस बहस में ज्यादातर प्रतिभागी वादी-प्रतिवादी की तरह पेश आए थे। एक पक्ष निरुपमा के परिवार को दोषी मान रहा था और उसके कथित प्रेमी प्रियभांशु को निर्दोष। दूसरा पक्ष निरुपमा के कथित प्रेमी को दोषी मान रहा था और उसके परिवार को निरपराध मान रहा था। किसी तीसरी संभावना पर विचार करने के लिए दोनों पक्ष तैयार नहीं थे। उस बहस का स्तर काफी नीचा था इसलिए उसकी ज्यादा चर्चा भी ठीक नहीं।

निरुपमा पाठक के मामले में पुलिस ने अपनी जांच रिपोर्ट सौंपते हुए एम्स की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर इसे आत्महत्या माना है। खासबात यह कि पुलिस ने निरुपमा के पिता,भाई और कथित प्रेमी तीनों को ही आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का आरोपी माना है। पुलिस के अनुसार उसके भाई और पिता उसे मजबूर कर रहे थे कि वो नौकरी छोड़ कर वापस आए। वो दोनों उसके विवाह के भी खिलाफ थे। इतनी ही नहीं, निरुपमा के कथित प्रेमी ने उसके गर्भाधान की बात को जानते हुए भी उससे विवाह से इनकार कर दिया था।

निरुपमा जैसी आत्मनिर्भर पत्रकार का सामाजिक और भावनात्मक तौर पर अकेला पड़ जाना हमारे समाज में लड़कियों की असुरक्षित  स्थिति की एक नजीर है। कई ऐसी स्थितियां होती हैं जब एक लड़की एक 'अकेली'  लड़की ही रह जाती है। परिवार,मित्र,प्यार सभी उससे किनारा कर लेते हैं। जिसकी परिणति ऐसी दुखद घटनाओं के रूप में होती है।

ऐसे किसी भी मामले में कोई प्रतिक्रिया देने से पहले परिवार वालों,भाईयों,मित्रों और प्रेमियों को अपनी राय पर पुनर्विचार करना चाहिए। यदि आप लड़कियों को आत्मनिर्भर देखना चाहता हैं तो उनके निर्णयों को स्वीकारने करना भी सीखना होगा। वो बहुत से फैसले ऐसे करेंगी जो आपको अस्वीकार्य होंगे। जो हमारे तत्कालिक समाज की नजरों में अस्वीकार्य होंगे। ऐसे वक्त में विवेकपूर्ण व्यवहवार करना ही उचित है। किसी भी तरह की स्वतंत्रता आत्म-निर्णय के अधिकार के बिना अधूरी है। जीवन भूल-गलतियों से बुनी हुई चादर है। किसी भी तथाकथित भूल-गलती के प्रति इस कदर असहिष्णु होना कि किसी मासूम की जान पर बन आए एक पाशविक वृत्ति है। इसकी जितनी निंदा की जाए वो कम होगी।

पुनर्विचार करने की जरूरत उन लड़के-लड़कियों को भी है जो समाज के प्रचलित प्रतिमानों के विपरीत जाने का साहस रखते हैं। सामाजिक बदलाव के संक्रमणकाल में अप्रचलित,असामान्य साहसिक निर्णय लेने वालों को सामान्य से ज्यादा आत्मविश्वास और समझदारी  दिखाना चाहिए। उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि मानवीय समाज कोई नदी का सादा जल नहीं जो धारा के विपरीत तैरने वाली मछलियों को शांति से गुजर जाने दे।

1 मार्च 2011

माया का मायावी दौरा

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती इन दिनों प्रदेशव्यापी भ्रमण पर निकली हैं. वो जहां जाती हैं प्रशासनिक महकमा हलकान रहता है. किसी को नहीं पता रहता की मुख्यमंत्री कब किसकी क्लास लगा दें.

मुख्यमंत्री निकली हैं विकास कार्यों का जायजा लेने. हालांकि जानकार उनकी इस यात्रा के कई मायने निकाल रहे हैं. कुछ लोग इसे राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं तो कुछ लोग इसे अफसरशाही पर लगाम लगाने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं. वो जहाँ भी गई कैबिनेट सचिव और उनके सबसे ज्यादा विश्वास पात्र शशांक शेखर उनके साथ रहे.

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में सन 2012 में चुनाव होने हैं इसलिए मुख्यमंत्री का ये दौरा कई मायनों में अहम माना जा रहा है.  मुख्यमंत्री जहां भी गई उनका स्वागत आला अधिकारियों ने ही किया. उनकी यात्रा से बसपा नेताओं को दूर ही रखा गया. इससे लगता है मुख्यमंत्री एक संदेश साफ तौर पर देना चाहती हैं कि उनकी इस यात्रा से राजनीति का कुछ लेना देना नहीं है और वो सिर्फ विकास से जुड़ी साफ सुथरी राजनीति करना चाहती हैं. 

अंदरखाने से छन-छन कर आ रही ख़बरों पर यकीन करें तो बहन जी ने अधिकारियों को साफ-साफ आदेश दे रखे हैं कि उनकी यात्रा  के  दौरान सिर्फ और सिर्फ पार्टी का झंडा ही दिखाई देना चाहिए किसी नेता विशेष का नहीं. लेकिन इन सबके बावजूद लाख टके  का सवाल बनता है की आखिर बहन जी अपने इन दौरों से क्या संदेश देना चाहती हैं. इसलिए उनका पूरा का पूरा दौरा मायावी बना हुआ है.

संदेश साफ है 2012  में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और मुख्यमंत्री  जमीनी जायजा लेने निकली हैं साथ ही वो अपनी इस यात्रा से ये भी संदेश देना चाहती हैं कि दोषी चाहे जो भी उसे बक्शा नहीं जाएगा. इसे साबित करने के लिए उन्होंने यात्रा के दौरान कई इसे सख्त कदम भी उठाए हैं जिससे जनता के बीच  सुशासन का सन्देश जाए.

शायद मुख्यमंत्री को ये भी डर है की उनके पंडित प्रेम की वजह से उनका परम्परागत वोट बैंक उनके दूर होता जा रहा है. इसीलिए वो जिस जिले में भी गई वहां उन्होंने दलित बस्तियों और विशेषकर मान्यवर काशीराम की स्मृति में बनाए गए शहरी गरीब आवासीय कालोनियों का दौरा जरुर किया. उन्होंने इन कालोनियों में बिजली, पानी, पार्क  और सफाई का विशेष ध्यान दिया.

हालांकि उनका पूरा कार्यक्रम हवाई ही ज्यादा था वो हर जिले में लगभग एक घंटे से ज्यादा नहीं रही. इससे एक सवाल उठना लाजमी है की क्या उनकी हवाई यात्रा सही में जमीन में हो रहे विकास कार्यों का जायजा लेने के लिए थी या दलितों या यूं कहें जानता को दोबारा अपने आप से जोड़ने की कवायद. 

बहरहाल माया जहां-जहां गई प्रशासन ने उनकी खातिर में कोई कसर नहीं छोड़ी. लोगों के  जो काम कई सालों से रुके थे और जिनके लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे थे वो चुटकी भर में हो गए. इसी से जनता खुश है. 

हालांकि उसे इस बात की मायूसी भी है की मुख्यमंत्री ने उनकी शिकायतें नहीं सुनी. लेकिन वो खुश हैं  उन्होंने अपनी मुख्यमंत्री को करीब से देखा. अब ये ख़ुशी माया के बैलेट बॉक्स तक पहुचेगी या नहीं यह देखना  दिलचस्प होगा .