26 अप्रैल 2011

वो भी मेरे ही जैसा है

वो भी मेरे ही जैसा है 
हंसते-हंसते रो पड़ता है 

मिलना-जुलना और बिछड़ना 
इसके सिवा दुनिया में क्या है 

लिख लो हथेली पर चाहो तो 
इतना सा तो नाम-पता है 

कल की रात कहां काटूंगा
इक बंजारा सोच रहा है 

और ज़रा दस्तक दो, शायद 
दरवाज़ा खुलने वाला है

-मदन मोहन दानिश

24 अप्रैल 2011

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी।

सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी।।

-कैफ़ी आज़मी 

20 अप्रैल 2011

एरिन ब्रोकोविच

"एरिन ब्रोकोविच' मेरी पसंदीदा फिल्म है. पर जब जब इसे देखती हूँ (और Zee Studio n Star Movies की कृपा से कई बार देखी है) मुझे 'भोपाल गैस त्रासदी ' याद आ जाती है और लगता है कोई मिस्टर या मिस ब्रोकोविच यहाँ क्यूँ नहीं हुए? जो इस बड़ी कम्पनी को घुटने टेकने पर मजबूर कर देते और पीड़ितों को सही कम्पेंसेशन तो हासिल होता. इस बार पुनः पीड़ितों के साथ हुए इस अन्याय ने इस फिल्म की फिर से याद दिला दी.

यह फिल्म 'एरिन ब्रोकोविच' की ज़िन्दगी पर आधारित है और यह दर्शाती है कि कैसे सिर्फ स्कूली शिक्षा प्राप्त तीन बच्चों की तलाकशुदा माँ ने सिर्फ अपने जीवट और लगन के सहारे अकेले दम पर 1996 में PG & E कम्पनी को अमेरिका के साउथ कैलिफोर्निया में बसे एक छोटे से शहर 'हीन्क्ले' के लोगों को 333 करोड़ यू.एस.डॉलर की क्षतिपूर्ति करने को मजबूर कर दिया,जो कि अमेरिकी इतिहास में अब तक कम्पेंसेशन की सबसे बड़ी रकम है.

फिल्म में एरिन ब्रोकोविच की भूमिका जूलिया रॉबर्ट ने निभाई है और उन्हें इसके लिए,ऑसकर, गोल्डेन ग्लोब, एकेडमी अवार्ड,बाफ्टा, स्टार्स गिल्ड ,या यूँ कहें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का प्रत्येक पुरस्कार मिला .रोल ही बहुत शानदार था और जूलिया रॉबर्ट ने इसे बखूबी निभाया है.

स्कूली शिक्षा प्राप्त 'एरिन' एक सौन्दर्य प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीतती है. उसके बाद ही एक लड़के के प्यार में पड़कर शादी कर लेती है और दो बच्चों के जन्म के बाद उसका तलाक भी हो जाता है. वह छोटी मोटी नौकरी करने लगती है,फिर से किसी के प्यार में पड़ती है,पर फिर से धोखा खाती है और एक बच्चे के जन्म के बाद दुबारा तलाक हो जाता है. अब वह, ६ साल का बेटा और ४ साल और नौ महीने की बेटी के साथ अकेली है और अब उसके पास कोई नौकरी भी नहीं है. वह नौकरी की तलाश में है,उसी दौरान एक दिन एक कार दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो जाती है, कम्पेंसेशन के लिए वह एक वकील की सहायता लेती है जिनक एक छोटा सा लौ फर्म है. लेकिन वो यह मुकदमा हार जाती है क्यूंकि विपक्षी वकील दलील देता है कि "उस कार को एक डॉक्टर चला रहा था,वह लोगों को जीवन देता है,किसी का जीवन ले कैसे सकता है? और एरिन के पास नौकरी नहीं है इसलिए वह इस तरह से पैसे पाना चाहती है.यह दुर्घटना उसकी गलती की वजह से हुई"

नौकरी के लिए हज़ारो फोन करने के बाद हताश होकर वह उसी Law Firm में जाती है और जोर देती है कि वे उसका केस हार गए हैं,इसलिए उन्हें एरिन को नौकरी पर रख लेना चाहिए. बहुत ही अनिच्छा से वह बहुत ही कम वेतन पर , उसे 'फ़ाइल क्लर्क' की नौकरी दे देते हैं. फिर भी उसे ताकीद करते हैं कि वह अपने फैशनेबल कपड़े पहनना छोड़ दे.इस पर एरिन ढीठता से कहती है कि "उसे लगता है वह इसमें सुन्दर दिखती है" .एरिन की भाषा भी युवाओं वाली भाषा है,एक पंक्ति में तीन गालियाँ,जरा सा गुस्सा आता है और उसके मुहँ से गालियों की झड़ी लग जाती है. बॉस उसे हमेशा डांटा करता है पर एक बार गुस्से आने पर बॉस के मुहँ से भी गाली निकल जाती है और दोनों एक दूसरे को देखकर हँसते हैं.बॉस और एरिन में बॉस और कर्मचारी के अलावा कोई और रिश्ता नहीं दिखाया गया है.

एक दिन फ़ाइल संभालते समय एक फ़ाइल पर उसकी नज़र पड़ती है,जिसमे एक घर को बेचने सम्बन्धी कागजातों में घर में रहने वालों की बीमारी का भी जिक्र था. उत्सुक्तता वश वह उस परिवार से जाकर मिलती है.और उस पर यह राज जाहिर होता है कि उस इलाके में हर घर के लोग खतरनाक बीमारियों से ग्रस्त हैं क्यूंकि pG & E कम्पनी अपने Industrial waste वहाँ के तालाबों में डालते हैं ,जिस से वहाँ का पानी दूषित हो जाता है. और वहाँ के वासी उसी पानी का उपयोग करते हैं. पानी में chrome 6 का लेवल बहुत ही ज्यादा होता है,जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही खतरनाक है.एरिन उस इलाके के हर घर मे जाकर लोगों से मिलती है,उसके आत्मीयतापूर्ण व्यवहार से लोग, अपने दिल का हाल बता देते हैं.किसी का बच्चा बीमार है,किसी के पांच गर्भपात हो चुके हैं. किसी के पति को कैंसर है. वह डॉक्टर से भी मिलती है और उनसे विस्तृत जानकारी देने का अनुरोध करती है.

जब वह ऑफिस लौटती है ,तब पता चलता है इतने दिन अनुपस्थित रहने के कारण उसे नौकरी से निकाल दिया गया है. वह कहती है, मैने मेसेज दिया था,फिर भी बॉस नहीं पिघलते.घर आकर फिर वह अखबारों में नौकरी के विज्ञापन देखने लगती है,इसी दरम्यान उस हॉस्पिटल से सारी जानकारीयुक्त एक पत्र कम्पनी में आता है और उसके बॉस को स्थिति की गंभीरता का अंदाजा होता है.वे खुद 'एरिन' के घर जाकर उसकी investigation  की पूरी कहानी सुनते हैं और उसे नौकरी दुबारा ऑफर करते हैं.इस बार 'एरिन' मनमानी तनख्वाह मांगती है,जो उन्हें माननी पड़ती है.

अब एरिन पूरी तरह इस investigation  में लग जाती है.वह आंख बचा कर वहाँ का पानी परीक्षण के लिए लेकर आती है,मरे हुए मेढक,  मिटटी सब इकट्ठा करके लाती है.और जाँच से पता चल जाता है,कि poisonous chromium का लेवल बहुत ही ज्यादा है. और यह बात कम्पनी को भी पता है,इसलिए वह लोगों के घर खरीदने का ऑफर दे रही है.

एरिन पूरी तरह काम में डूबी रहती है पर उसके तीन छोटे बच्चे भी हैं...शायद किसी अच्छे काम में लगे रहो तो बाकी छोटे छोटे कामों का जिम्मा ईश्वर ले लेता है, वैसे ही उसका एक पड़ोसी 'एड ' बच्चों की देखभाल करने लगता है और 'एरिन' के करीब भी आ जाता है. एरिन का बड़ा बेटा कुछ उपेक्षित महसूस करता है और उस से नाराज़ रहता है पर जब एक दिन वह 'एरिन' के फ़ाइल में अपने ही उम्र के एक बच्चे की बीमारी के विषय में पढता है और उसे पता चलता है की 'एरिन' उसकी सहायता कर रही है. तो उसे अपनी माँ पर गर्व होता है.

एरिन की पीड़ितों का दर्द समझने की क्षमता और उन्हें न्याय दिलाने का संकल्प और उसके बॉस 'एड' की क़ानून की समझ और उनका उपयोग करने की योग्यता ने PG & E को 333 करोड़ डॉलर क्षतिपूर्ति के रूप में देने को बाध्य कर देती है .

इस फिल्म का निर्देशन अभिनय,पटकथा तो काबिल-ए-तारीफ़ है ही. सबसे अच्छी बात है.कि नायिका कोई महान शख्सियत नहीं है,बिलकुल एक आम औरत है,सारी अच्छाइयों और बुराइयों से ग्रसित.

इस फिल्म के रिलीज़ होने के बाद 'एरिन ब्रोकोविच' अमेरिका में एक जाना माना नाम हो गयीं उन्होंने 'ABC पर Challenge America with Erin Brockovich Lifetime. में Final Justice नामक प्रोग्राम का संचालन किया.आजकल वे कई law firm से जुडी हुई हैं. जहाँ पीड़ितों को न्याय दिलाने के कार्य को अंजाम दिया जाता है.

- रश्मि रविजा

18 अप्रैल 2011

चक्रव्यूह के जटिल तंत्र

दबी हुई आवाज हूँ मैं
ठोक दो मुझे बना कर कील
खलिहानों में बहुत गहरे
चिमटों से उखाड़ लो मेरे दांत
काट दो मेरी जबान
भोंक दो गर्म सलाखें आँखों में मेरी
डाल दो पिघला हुआ शीशा मेरे कानों में
खौलते तेल के कटाहे में भून दो मुझे
जिन्दा दफ़न कर दो मुझे
खोद कर मेरी कब्र
फिर उग आउंगी मैं
बन कर मजार की हरी दूब
संगेमरमर को फोड़ कर
उग आएगा भिंची मुट्ठियों वाला मेरा हाथ
उठाने को वह डूबती हुई मशाल

बंजारन वेश्या हूँ मैं
गूंथ दो मेरी देह
दुह लो सारी नसें मेरी
चटका दो मेरी हड्डियाँ
रुई की मानिंद धुन दो मेरे अस्थि पिंजर
इस छोर से उस छोर तक नाप दो मेरा शरीर
ढीले कर दो मेरे पुर्जे
ढक कर दो मेरी हर गाँठ
हलों से रौंद दो मेरी जमीन
फिर लौट आउंगी मैं
धोउंगी तुम्हारे सारे घाव
मल कर शीतल अंगराग
बन कर एक छोटी सी याद
उग आउंगी तुम्हारे रंध्रों से
बन कर पुलकित रोम

छिपी हुई प्रतिभा हूँ मैं
बोरे से ढँक कर रख दो मुझे
भूसे से भरी हुई मिट्टी की कोठरी में
चिनवा दो मुझे कुएं की दीवारों में जिन्दा
फिर भी मैं उग आउंगी बन कर हरे शैवाल
उठ आउंगी मैं गहरे दलदलों से भी
सड़े गले पत्तों की पीठ पर
उग आउंगी मैं बन कर नीले फूलों वाली लता

मखमली वासना हूँ मैं
मूसलों से कूट दो मेरी काया
खन्तियों से खोद दो यह देह
ईख की माफिक निचोड़ लो यह एंठन
मद्धम आंच में पिघला दो वह पीर
नदी में बहा दो वह दर्द
फिर लौट आउंगी मैं
पेडुओं में उभरता हुआ भीषण दर्द बन कर
अटक जाउंगी हलक में तुम्हारे
झुनझुनी सी बिखर जाउंगी बदन पर
सिहरन बन कर पैठ जाउंगी अंतर्मन में
उग आउंगी बन कर नए गीत

रहस्यमयी छाया हूँ मैं
चीर दो सुइयों से मेरी काली चमड़ी
रींध दो गरम भाप में मेरा प्रारूप
घोंट दो मेरा गला
झिटक कर भगा दो मुझे
फिर जुड़ जाउंगी मैं अपनी तरलता से
फिर उठ आउंगी मैं चांदनी रात में
दबे पाँव पीछा करुँगी तुम्हारा
षड्यंत्रों के भग्न खंडहरों तक
दबे हुए खजाने की डूबती हुई साँसों में
जिन्दा रखूंगी तुम्हारे सारे गहन राज
भरुंगी नयी चेतना स्वप्नों में
गुप्त रखूंगी तुम्हारे सिद्ध मंत्र
चक्रव्यूह के जटिल तंत्र

- दीपांकर

15 अप्रैल 2011

महिलाओं की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा?

रेप की घटना...छेड़खानी की कोशिश...नाबालिग से बालात्कार...और ना जाने क्या-क्या ऐसी ही ख़बरों से होती है दिन की शुरुआत.   कहा जाता है देश में महिलाएं असुरक्षित हैं महिलाओं के साथ हो रहे हादसों से ये बात सही साबित हो रही है.  

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में बलात्कार के मामले बढ़ रहे हैं. हमारे देश में  हर 29 मिनट में किसी न किसी महिला के साथ बलात्‍कार हो रहा है. महिलाओं कें साथ होने वाले बलात्‍कार के मामले में भारत दुनिया के तीन प्रमुख बदनाम देशों में शामिल है. सबसे अधिक बलात्कार के मामले में बदनाम अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के बाद भारत का नम्बर है. 

 ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़ ही हमारे देश में ही हर 77 मिनट पर एक बहु दहेज के लिए मारी जा रही है. हर 9 वें मिनट पर एक महिला अपने पति या रिश्‍तेदारों द्वारा क्रूरता की शिकार बन रही है और हर 240 मिनट पर एक महिला मजबूरन आत्‍महत्‍या कर रही है. ये  वो आंकड़े हैं जिनसे कोई भी सोचने को मजबूर हो जाएगा.
 
आज भले ही समाज बदल रहा हो लेकिन महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं भले ही घर की चाहर दिवारी हो या बाहर महिलाएं डर के साये में जीने को मजबूर हैं.
 
दो दिन पहले ही एक राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी को कुछ बदमाशों के कारण अपना पांव गंवाना पड़ा. और बदले में सरकार ने उसे दिए पच्चीस हजार रूपये. जो किसी मजाक से कम नहीं था. राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल और फुटबॉल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा को बरेली के निकट सोमवार को चलती ट्रेन से बदमाशों ने धक्का दे दिया था. गौरतलब है कि ये घटना उसी ट्रेन में हुई जिसकी प्रमुख एक महिला है और जिस सूबे में यह हादसा हुआ उसकी मुखिया (मायावती)भी एक महिला ही है. ममता जब रेल मंत्री बनी थीं तो लगा था ट्रेनें महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाई जाएंगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.
 
 यहां सवाल दो हैं आखिर ट्रेनों में हो रहे इन हादसों के लिए जिम्मेदार कौन है. भारतीय रेल या फिर जिस सूबे में ये घटना घटी उसका प्रशासनिक अमला. रेलवे में तीन स्तरों की सुरक्षा दी जाती है आरपीएफ, जीआरपी और लोकल पुलिस. 

 लेकिन जिसने भी भारतीय रेल से यात्रा की है उसे शायद ही इस बात का अहसास होगा कि वो तीन स्तरों की सुरक्षा से होकर गुजर रहा है.  ये सुरक्षा नाकाफी है. आए दिन ट्रेनों में लूट और महिलाओं से छेड़खानी की  घटनाएं आम हो गई हैं. लेकिन नतीजा ढांक के तीन पात. अरुणिमा ने तो अपना पांव खो दिया संभवतया सरकारी नौकरी भी मिल जाए लेकिन भविष्य में ऐसा ना हो यह कौन सुनिश्चित करेगा. क्योंकि अब ये सिर्फ अरुणिमा का सवाल नहीं  रहा ये सवाल उन लाखों अरुणिमाओं का है जो देश हैं असुरक्षित हैं. आखिर कौन देगा इन्हें सुरक्षा.

14 अप्रैल 2011

रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं

दिन गए बरस गए यातना गई नहीं
रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं

एक ही तो प्रश्न है, रोटियाँ के पीर का
पर उसे भी आसरा है आंसुओं के नीर का
राज है गरीब का ताज दानवीर का
तख्त भी पलट गए पर कामना गई नहीं
रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं

वेणु श्याम की बजी,राम का धनुष चढ़ा
युद्ध भी लड़े गए,ज्ञान बुद्ध का बढ़ा
पर खड़ा रहा नहीं,निर्धनों का झोपड़ा
अर्थियां चली गईं पर योजना गई नहीं
रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं।

जो स्वयं भटक रहे, राह वह दिखा रहे
जो रमे महल-महल त्याग वह सिखा रहे
जग हुआ शहीद तो नाम वह लिखा रहे
पंच के प्रपंच में प्रवंचना गई नहीं
रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं

भूप संत रहनुमाँ,यह कभी तो वह कभी
मंच से उतर गए एक-एक कर सभी
प्यास है अभी वहीं भूख है अभी वहीं
साँस है तो भूख की पर वासना गई नहीं
रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं

- गोपाल सिंह 'नेपाली'

12 अप्रैल 2011

भारत का प्रधानमन्त्री मतदान नहीं करता

भारत एक लोकतांत्रिक देश है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस लोकतान्त्रिक देश के नागरिक हैं.  भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र  है. यहां जन प्रतिनिधियों का चुनाव जनता द्वारा किया जाता है. 

भारत गणराज्य का हर नागरिक जो अठारह वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो मतदान करने का अधिकारी होता है.और इसमें हर ख़ास और आम नागरिक को हिस्सा लेना होता है. हालांकि ये मतदाता के विवेक पर होता है की वो वोट करे या ना करे.

चुनाव आयोग के सन 2010 के आंकड़ों मुताबिक़ भारत में कुल वोटरों की संख्या  730,887,511 है. इन्ही वोटरों में से एक हैं वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी का नाम दिसपुर विधान सभा सीट के केंद्र क्रमांक 156 की लिस्ट में क्रमश: 720वें और 721वें स्थान पर मतदाता सूची में लिखा है. लेकिन असम विधानसभा के लिए हुए मतदान में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा उनकी पत्नी गुरशरन कौर ने मताधिकार का प्रयोग नहीं किया.

यहां तक की प्रधानमंत्री और उनकी पत्नी ने डाक मतपत्र के लिए किसी तरह का आवेदन करना भी जरुरी नहीं समझा. अब  इसे प्रधानमंत्री की भूल कहें या लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर उनका अविश्वास. 

गौरतलब है कि  मनमोहन सिंह 1991 से ही असम के नागरिक हैं, राज्यसभा में असम का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. आधिकारिक रूप से वह असम के पूर्व मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया की विधवा हेमप्रभा सैकिया के किराएदार हैं. हालांकि कभी भी वह इस मकान में नहीं रहे. 

 अब ऐसे प्रधानमंत्री के लिए क्या कहेंगे जो अपने ही मताधिकार का प्रयोग नहीं करता है. उन्हें तो वोटिंग करके इस देश के युवाओं के सामने एक उदाहरण पेश करना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा करना जरुरी नहीं समझा. यहां तो प्रधानमन्त्री का बचाव करने वाले ये नहीं कह सकते कि प्रधानमन्त्री ईमानदार हैं.  खुद प्रधानमन्त्री भी इसे गठबंधन राजनीति की मजबूरी नहीं कह सकते. साथ ही भारत निर्वाचन आयोग को भी सोचना चाहिए कि वोटिंग में हिस्सा लेने वाले उसके विज्ञापन या उसके द्वारा चलाए जा रहे वोटर अवेयरनैस कार्यक्रम देश प्रधानमन्त्री को भी इंस्पायर नहीं पाए कि वो मतदान करें. 

11 अप्रैल 2011

क्या भ्रष्टाचार हमारे खून में बसता है ?

अपना गांव छोड़ कर अन्ना हजारे को दिल्ली आकर आमरण अनशन क्यों करना पड़ा ? देश की युवा पीढ़ी को सड़कों पर क्यों उतरना पड़ा ? क्यों इन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगे? आखिर क्या जरुरत आन पड़ी है ये सब करने कीक्या क्यों सब अन्ना जैसे 72 साल के बुजुर्ग के समर्थन में आ खड़े हुए ? ये ऐसे सवाल हैं जो सोचने पर मजबूर करते हैं.

दरअसल इसके पीछे कई कारण हैं. पहला और सबसे बड़ा कारण देश में बढता भ्रष्टाचार और दूसरा लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बेलगाम अफसर शाही. ये दो ऐसे मुद्दे हैं जिनसे हर आम नागरिक त्रस्त है. हर किसी के मन में इन दोनों बातों को लेकर गुबार भरा पड़ा है. बस अन्ना ने उसे चिंगारी दे दी. 

दरअसल हमारे यहां घोटालों का इतिहास
  संविधान लागू होने से पहले का है. सन 1948  में हुआ जीप घोटाला यह आज़ाद भारत का पहला घोटाला था. उसके बाद संविधान लागू होते ही 1951 में हुआ साइकिल घोटाला जिसमें वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के सचिव फंसे थे. तब से लेकर आजतक इस क्षेत्र में हमने दिन दुगुनी और रात चौगुनी तरक्की की है. 

घोटालों का इतिहास देख कर ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या भ्रष्टाचार और हमारा कोई खून का संबंध है. या ये कोई हेरिडिटी है जो पीड़ी दर पीड़ी हमारे खून में चला आ रहा है. करप्शन के एरिया तो देखिए देश कि सुरक्षा तैनात कि जाने वाली मिसाइलों से लेकर जानवरों के खाने वाले चारे तक हमारे नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स ने कुछ नहीं छोड़ा. इससे एक बात साफ हो गई की इन घोटाले बाजों के लिए देश नाम की कोई चीज नहीं है. 

वोट बैंक और कुर्सी प्रेम की राजनीति में उलझी सरकारों ने इस रोग की जड़ें और मजबूत की हैं. जिस देश का प्रधानमंत्री गठबंधन राजनीति की मजबूरी की दुहाई देकर अपने ही मंत्री द्वारा किए गए घोटाले को छिपाने की कोशिश करता हो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है.  दरअसल वर्तमान सरकार ने भ्रष्टाचार और लूट के ऐसे मानक गड़ दिए हैं जिससे साक्षात् मुहम्मद गजनवी सरीखा लूटेरा भी शरमा जाए.

 
कथित घोटालों की मार झेल रहे भारत को हांगकांग की प्रमुख सलाहकार फर्म पीईआरसी ने सबसे भ्रष्ट देशों की लिस्ट में चौथा स्थान दिया है. भ्रष्टाचार के मामले में भारत अब फिलिपीन और कंबोडिया जैसे देशों की पंक्ति में खड़ा है.

पीईआरसी की एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिकएशिया-प्रशांत क्षेत्र के 16 देशों में भ्रष्टाचार के पैमाने भारत तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है. भ्रष्टाचार के मामले में भारत को दस में से  8.67 अंक मिले. भारत से सन्दर्भ में रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि लोकल राजनीतिक नेताओं कि तुलना में  राष्ट्रीय स्तर के नेता अधिक भ्रष्ट हैं. फर्म ने एशियन इंटेलिजेंस रिपोर्ट ऑन एशियन बिजनेस एंड पॉलिटिक्स में कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के दूसरे कार्यकाल में  भ्रष्टाचार बढ़ा है.

इतना सब होने के बावजूद कांग्रेस कह रही थी कि अन्ना को आमरण अनशन की कोई जरुरत नहीं थी. यहां तक कि देश का कोई भी राजनीतिक दल खुल कर इस एंटी करप्शन मूमेंट का खुल कर समर्थन नहीं कर रहा था. 

दरअसल जिस लोकपाल बिल को देश की जनता चाहती है उससे इन राजनेताओं और भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी के हित टकरा रहे हैं.  लोकपाल बिल में क्रीमी लेयर अपराधियों के लिए जिस तरह के सख्त कानून की बात हो रही है उससे नेताओं और राजनीतिक पार्टियों की नींद हराम हो गई है. 

सरकार को शायद ही उम्मीद रही होगी कि अन्ना द्वारा शुरू की गई इस मुहीम को इतना भारी जनसमर्थन मिलेगा. पहले से मुसीबत में घिरी केंद्र सरकार अपनी बची खुची इज्जत बचाने के लिए वैकल्पिक रास्तों की तलाश की. और जब बात नहीं बनी तो सरकार झुक गई. क्योंकि देश का युवा झुकने को तैयार नहीं था वो खुल कर अन्ना के साथ आया उसने साफ-साफ कहा वी वॉन्ट क्लीन इंडिया. हालांकि सरकार के एक मंत्री और कमेटी के एक सदस्य कपिल सिब्बल को लोकपाल बिल अभी भी फालतू ही लग रहा है.

10 अप्रैल 2011

जनता ने बरखा दत्त को इंडिया गेट से भगाया

लोकपाल बिल पर आम जनता और अन्ना हजारे को मिली प्राथमिक  सफलता से पूरे देश में उत्सव सा माहौल था। दिल्ली में इण्डिया गेट पर कई हजार लोगों की भीड़ जुटी थी। आमतौर पर ऐसी भीड़ किसी त्यौहार पर ही दिखती है। ऐसी ही भीड़ विश्वकप विजय के दिन भी जुटी थी। किसी सामाजिक आंदोलन की सफलता की खुशी मनाने के लिए लोगों का सड़क पर उतर आना अभूतपूर्व है।

जब भ्रष्टाचार विरोधी जनता इण्डिया गेट पर जश्न मना रही थी तभी एनडीटीवी की कुख्यात पत्रकार बरखा दत्त अपने लाव-लश्कर समेत इण्डिया गेट से सजीव प्रसारण की तैयारी कर रही थी। दूरसंचार घोटाले के राडिया टेप में बरखा दत्त का नाम आने के बाद लोगों ने फेसबुक,ब्लाग,इंटरनेट इत्यादि पर बरखा दत्त के प्रति अपना आक्रोश जाहिर किया था। जनता के व्यापक विरोध के बावजूद एनडीटीवी के मालिक प्रणव राय ने बरखा को चैनल से नहीं निकाला। उन्होंने बरखा को चैनल पर एंकरिंग करने से भी नहीं रोका। एनडीटीवी का यह रवैया बिल्कुल सरकारी था, जैसे राजनीतिक पार्टियां दागी नेताओं पर कोई कार्रवाई नहीं करती ठीक उसी तरह एनडीटीवी ने बरखा को अभयदान दे दिया। बरखा के खिलाफ कोई कार्रवाई होने से जनता में जबरदस्त रोष था। बरखा के खिलाफ जनता का अव्यक्त गुस्सा इण्डिया गेट पर उन्हें देखते ही फूट पड़ा।

बरखा दत्त वापस जाओ....बरखा दत्त हाय-हाय...बरखा दत्त मुर्दाबाद... भ्रष्ट पत्रकारों को जेल में डालो.... ऐसे नारों से इण्डिया गेट की फिजा गूंज उठी।

एनडीटीवी के संजय अहिरवाल ने लोगों को मनाना चाहा। जनता ने यह कहकर उन्हें निरुत्तर कर दिया कि एनडीटीवी हमारा पारिवारिक चैनल है। हम अपने परिवार में किसी दागी को नहीं बर्दास्त कर सकते। संजय ने फिर प्रयास किया कि जनता बरखा को उनका शो करने दे, तो जनता ने कहा कि आप शो कीजिए हम सभी इसमें शामिल होंगे,आप नहीं कर सकते तो किसी अन्य पत्रकार से यह शो करा लीजिए हम भागीदारी करेंगे...लेकिन बरखा दत्त जैसों को अब हम बर्दाश्त नहीं कर सकतेअंततोगत्वा एनडीटीवी को जनता के सामने झुकना पड़ा और मजबूरन अपना तामझाम बटोरना पड़ा। गौरतलब है की इसी आन्दोलन के दौरान जनता ने शरद यादव, उमा भारती और ओमप्रकाश चौटाला को भी भगा दिया था.   


8 अप्रैल 2011

चिंगारी का सफ़र

देर सवेर चिंगारी आग में बदलेगी
और
गलियों के लैम्प -पोस्टों को
रौशन करते हुए,
झोपड़ों में किरण
उगाते हुए,
देखते ही देखते
ताज-ओ-तख़्त तक पहुंचेगी...
भीषण आग बन कर
झुलसाएगी सोने का सिंहासन,
पिघलायेगी जंजीरें...
इतनी तपिश होगी
कि बर्फ-सा जमा लहू,
फिर
तैरने लगेगा रगों में...

- फौजिया रियाज़

अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं ..वाह अन्ना!

वाह क्या अदभुत नजारा ! क्या भीड़ ! चारों तरफ उम्मीद ही उम्मीद आशा ही आशा. ये नजारा है जंतर-मंतर का. जी हां उसी जंतर-मंतर का जिसका निर्माण राजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1724 में कठिन खगोलीय गणित को सुलझाने के उद्देश्य से किया था. आज उसी जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार की गुत्थी सुलझाने के लिए समाजसेवीगांधीवादी और भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना हजारे बैठे हुए हैं.

अन्ना के समर्थन में हजारों लोग जंतर-मंतर स्थित धरना स्थल पर पहुच रहे हैं. क्या बूड़े क्या बच्चे और क्या जवान सभी अन्नामय हैं. अन्ना जब मंच पर खड़े हो जाते हैं तो भीड़ का उत्साह देखते ही बनता है. अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं....जय हिंद....वंदे मातरम्....इन्कलाब जिंदाबाद जैसे ना जाने कितने ही नारे दिल्ली की फिंजा में गूँज रहे हैं.

पहली बार इतनी बड़ी संख्या में दिल्ली वालों को अल्लाह तेरो नाम...वैष्णव जन को...रघुपति राघव राजा राम...जैसे गांधी भजनों को एक साथ गाते हुए देखा या यूं कहें पहली बार देश को दिल्ली में गाते हुए देखा. अन्ना को उनकी इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम में देश भर में भारी जन समर्थन मिल रहा है. भ्रष्टाचार के खिलाफ ये पहला मौक़ा है जब इतने सारे लोग एक साथ आए हैं. 

आज मैं अपने मित्र सुनील के इंतजार में कोई आधे घंटे तक जंतर-मंतर वाली सड़क पर खडा रहा और मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं कि जंतर-मंतर से होकर निकलने वाला हर  पांचवा ऑटो और कार चालक धरना स्थल के बारे में पूछ रहा था. मैं जब सड़क पर खडा था तो एक ऑटो सवार सवारी ने पूछा वो अन्ना कहां बैठा है ? मैंने उससे कहा बैठा नहीं बैठे कहिए. उसे अपनी गलती का अहसास हुआ. मैंने उससे कहा आगे से लैफ्ट...इससे पहले की ऑटो आगे बढता वहां पर एक कार आ रुकी. कार में सवार बुजुर्ग ने पूछा धरना स्थल कहां है? ऑटो वाले ने फट से कहा आगे से लैफ्ट. ये देख कर ऑटो में सवार व्यक्ति ने तुरंत प्रतिक्रया दी क्या सारी दुनिया वहीं जा रहे हैं.  उस व्यक्ति की ये बात मुझे गुदगुदाती रही.  

अन्ना को मिले अभूतपूर्व जन समर्थन से केंद्र सरकार अवाक है  या यूं कहें बैकफुट पर है. किसी राजनीतिक दल को नहीं सूझ रहा अन्ना का समर्थन करें या विरोध. इसलिए कोई भी अपना स्टैंड क्लीयर नहीं रख रहा. अभी केंद्र सरकार और कांग्रेस धोनी एंड कम्पनी को इस बात के लिए ठीक ढंग से धन्यवाद भी नहीं दे पाई थी कि उन्होंने भारतीय जनता का ध्यान महंगाईटू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले और ना जाने कितने बड़े-बड़े घोटालों से हटा दिया. और इसी बीच अन्ना अनगिनत मुसीबत लेकर हाजिर हो गए. लेकिन अन्ना को अभी और जनसमर्थन की दरकार है. आइए आगे बढ़िए. अन्ना के साथ खड़े होने का मतलब है भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होना.

4 अप्रैल 2011

मेहनत का सार


एक बार भोले शंकर ने दुनिया पर बड़ा भारी कोप किया पार्वती को साक्छी बनाकर संकल्प किया कि जब तक यह दुष्ट दुनिया सुधरेगी नहीं, तब तक शंख नहीं बजाएँगे शंकर भगवान शंख बजाएँ तो बरसात हो

अकाल-दर-अकाल पड़े पानी की बूँद तक नहीं बरसी न किसी राजा के क्लेश व सन्ताप की सीमा रही न किसी रंक दुनिया में त्राहिमाम-त्राहिमाम मच गया लोगों ने मुँह में तिनका दबाकर खूब ही प्रायश्चित किया, पर महादेव अपने प्रण से तनिक भी नहीं डिगे

संजोग की बात ऐसी बनी की एक दफ़ा शंकर-पार्वती गगन में उड़ते जा रहे थे उन्होंने एक अजीब ही दृश्य देखा कि एक किसान भरी दोपहरी जलती धूप में खेत कि जुताई कर रहा है पसीने में सराबोर, मगर आपनी धुन में मगन जमीन पत्थर की तरह सख्त हो गयी थी

फिर भी वह जी जोड़ मेहनत कर रहा था, जैसे कल-परसों ही बारिश हुई हो उसकी आँखों और उसके पसीने की बूंदों से ऐसी ही आशा चू रही थी भोले शंकर को बड़ा आश्चर्य हुआ कि पानी बरसे तो बरस बीते, तब यह मूर्ख क्या पागलपन कर रहा है

शंकर पार्वती विमान से नीचे उतरे उससे पूछा," अरे बावले! क्यूं बेकार कष्ट उठा रहा है? सूखी धरती में केवल पसीने बहाने से ही खेती नहीं होती बरसात का तो अब सपना भी दूभर है"

किसान ने एक बार आँख उठा कर उनकी और देखा,और फिर हल चलाते-चलाते ही जवाब दिया," हाँ बिलकुल ठीक कह रहे हैं आपमगर हल चलने का हुनर भूल न जाऊँ, इसलिए मैं हर साल इसी तरह पूरी लगन के साथ जुताई करता हूँ जुताई करना भूल गया तो केवल वर्षा से ही गरज सरेगी ! मेरी मेहनत का अपना आनंद भी तो है फ़कत लोभ की खातिर हीं मैं खेती नहीं करता "

किसान के ये बोल कलेजे को पार करते हुए शंकर भगवान के मन में ठेठ गहरे बिंध गए सोचने लगे," मुझे भी शंख बजाये बरस बीत गए कहीं शंख बजाना भूल तो नहीं गया! बस,उससे आगे सोचने कि जरुरत ही उन्हें नहीं थी खेत में खड़े-खड़े ही झोली से शंख निकला और जोर से फूंका चारो और घटायें उमड़ पडी- मतवाले हाथिओं के सामान  आकाश में गडगडाहट पर गडगडाहट गूँजने लगी और बेशुमार पानी बरसा- बेशुमार जिसके स्वागत में किसान के पसीने की बूँदें पहले ही खेत में मौजूद थीं

-विजयदान देथा