27 मई 2011

देसवा


देसवा क्या है? कैसी है ? इसकी समीक्षा तो आने वाले समय में दर्शक करेंगे, लेकिन चूँकि मै एक ऐसी फिल्म का गवाह बना हूँ जिससे एक बदलाव आने की उम्मीद की जा रही थी इसीलिए इस पर अपना नजरिया रखना ज़रूरी हो गया है. और यह लेख इस फिल्म के प्रति मेरा अपना नजरिया है.

भोजपुरी मेरी मातृ भाषा है इस वजह से इससे एक नैसर्गिक स्नेह है मुझे. लेकिन जितना ही इस भाषा से प्रेम है मुझे उतना ही इस भाषा में बनने वाली फिल्मों से दूरी बनाये रखता हूँ, मुझे डर लगता है कि ये फ़िल्में अपनी विषयवस्तु की वजह से इस भाषा से मेरा मोहभंग कर सकती हैं. 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' को छोड़ कर कोई भी दूसरी फिल्म मुझ पर प्रभाव छोड़ने में असफल रही या ये कहना बेहतर होगा कि बहुत बुरा प्रभाव छोड़ा.

पिछले दिनों भोजपुरी गीत संगीत/ फिल्म उद्योग से जुड़े मेरे कुछ मित्रों नें कहा कि तुम भी इसी क्षेत्र में आ जाओ, अपनी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए मैंने भी उनका आग्रह स्वीकार कर लिया. अब बारी थी भोजपुरी फिल्मों की मेकिंग को समझने की और इस चक्कर में मैंने ४-५ फ़िल्में देख डालीं. उन फिल्मों में कहानी, कैमरा, अभिनय सब कुछ स्तरविहीन था. कैमरे की मूव्मेंट में भी अपनी तरह की एक अश्लीलता थी अभिनय और नृत्य तो दूसरी बातें हो गयीं. मैंने उन लोगों से बात की कि कुछ अच्छी कहानी पर भी फ़िल्में बनायीं जाएँ लेकिन बात बनी नहीं और मैं उस तरह का काम करना नहीं चाहता था इसलिए बात बनी नहीं और मैंने उस बारे में सोचना छोड़ दिया.

फिर एक दिन किसी से सुना के देसवा नाम की एक फिल्म बन रही है जो भोजपुरी फिल्मों के परंपरागत ढाँचे से अलग और बढ़िया होगी. उसी वक़्त से फिल्म से एक उम्मीद बंध गयी और ये तय हुआ कि इस फिल्म के प्रीमियर में जरूर जाऊँगा. ऑफिस से समय से पहले निकला और प्रीमियर के समय पर पहुँच गया. नितिन चंद्रा सामने आये और उन्होंने देसवा से जुडी एक जानकारी दी कि यह फिल्म उन्ही की बनाई एक डॉक्युमेंट्री फिल्म का विस्तार है. और फिल्म में यह बात साफ़ नज़र आती है.

बिहार में पूर्व में (फिल्म के मुताबिक ये चीज़ें बिहार में अब नहीं हैं) फैले हुए भ्रष्टाचार, घूसखोरी, अपहरण, छिनैती, अवैध वसूली, अशिक्षा, अस्पतालों का आभाव, ख़राब सड़क, बिहार से नौजवानों का रोज़गार के लिए पलायन, गुवाहाटी में परीक्षा देने गए लोगों की पिटाई, मुंबई में बिहार के लोगों की पिटाई, भोजपुरी गानों /फिल्मों की फूहड़ता आदि चीज़ों को सिलसिलेवार तरीके से छुआ गया है..ध्यान देने लायक बात ये है कि इसे सिर्फ छुआ भर गया है इनकी कोई पड़ताल नहीं की गयी है...तो इन्ही में से कुछ चीज़ों से दुखी होकर फिल्म के नायक पैसा कमाने के लिए अपहरण का रास्ता चुनते हैं और एक बिसनेस-मैन के चक्कर में एक नक्सलवादी नेता को उठा लाते हैं, और यहाँ से फिल्म नक्सल समस्या पर भी एक लेक्चर दे कर अपना रस्ता मोड़ लेती है. किसी और के चक्कर में किसी गुंडे का अपहरण कर लेना, यह कोई नई कहानी नहीं है.

फिल्म में कहानी कहने के लिए ज़रूरत से ज्यादा छूट ली गयी है, नायिका जिस दृश्य में यह जानती है कि नायक अपहरण की साजिश रच रहा है वो दृश्य अति नाटकीयता का शिकार है,  ठीक इसी तरह से नक्सली नेता की तस्वीर का बिसनेसमैन की तस्वीर से बदल जाना भी अति नाटकीयता का शिकार है. फिल्म में नायकों को जेल से छुडाने के लिए जान-आन्दोलन होता है, नायक दुखी हैं, मजबूर हैं, गलत कदम वो मजबूरी में उठा रहे हैं लेकिन क्या नक्सली नेता का अपहरण करना और उससे पैसे लेना और जेल चले जाना जनता को इतना उद्वेलित कर सकता है कि वो जन आन्दोलन कर दे? फिल्म का अंत हुआ है बिहार में इन दिनों चल रहे सुशासन को दर्शाते हुए और उस दृश्य को देख कर ऐसा महसूस होता है कि पुराने शासन की कमियाँ दिखाने और वर्तमान शासन को भला बताने के लिए इस फिल्म का निर्माण हुआ है.फिल्म की एडिटिंग और भी बेहतर हो सकती थी, कई दृश्यों के झोल साफ़ नज़र आते हैं.


गीत संगीत का पक्ष वाकई बेहतर है शारदा सिन्हा और भरत शर्मा के गए गए गीत बहुत अच्छे लगे. फिल्म में शंकर नाम के नायक का अपने बड़े भाई से बहस करने का पहला दृश्य बहुत प्रभावित करता है, साथ ही साथ रोजगार समाचार वाले अख़बार में तमंचे को लिपटा हुआ दिखाकर एक दृश्य में बहुत कुछ कह दिया गया.. अभिनय का स्तर भोजपुरी फिल्मों के स्तर से ऊँचा था. भोजपुरी फ़िल्में जिस तरह की होती हैं उसे देखकर तो लगता है कि यह फिल्म ठीक है लेकिन जैसे ही सिर्फ एक फिल्म मान कर सोचना चाहता हूँ यह फिल्म औसत से भी कम लगती है. पटकथा विहीन इस फिल्म से भोजपुरी फिल्म उद्योग में कोई बदलाव आएगा या नहीं यह तो समय बताएगा लेकिन यह फिल्म मुझपर तो प्रभाव छोड़ने में असफल रही. देसवा बनाये जाने का उद्देश्य अच्छा था, लेकिन इस कहानी को चुनने के पीछे क्या उद्देश्य था समझ नहीं आया.

- स्वप्निल तिवारी

19 मई 2011

सबसे बढ़िया कमाई !

जिन पाँच राज्यों में अभी विधानसभा चुनाव हुए हैं उनमें दोबारा चुन के आए विधायकों की घोषित सम्पत्ति के आँकड़े उनके वास्तविक 'चरित्र' को जाहिर करते हैं।

Association For Democratic Reforms (ADR) और National Election Watch(NEW) के हवाले से The Times Of India ने बताया है कि इन विधायकों ने इस चुनाव से पहले वाले चुनाव में अपनी जितनी सम्पत्तियाँ घोषित की थी,पाँच साल की विधायकी के बाद उनकी सम्पत्ति में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई है। TOI के मुताबिक विधायकों की सम्पत्ति में जो बढोत्तरी हुई है वो किसी भी अन्य मद में धन लगाने से होने वाली बढ़ोत्तरी से ज्यादा ठहरती है। TOI के मुताबिक पिछले सालों में गोल्ड की खरीददारी सर्वाधिक लाभकारी इन्वेस्टमेंट रहा है। लेकिन गोल्ड भी कमाई के मामले में पश्चिम बंगाल को छोड़कर किसी अन्य राज्य के विधायकी में किए गए इन्वेस्टमेंट के आगे फीका साबित हुआ है !

विभिन्न राज्यों में विधायकों की कमाई में हुई बढ़ोत्तरी का प्रतिशत कुछ यूँ है -

तमिलनाडू- 195%

आसाम- 187%

केरला- 175%

पुडुचेरी- 136%

प. बंगाल- 71%

यह भी ध्यान रखें कि ये आँकड़े विधायकों की घोषित सम्पत्ति मात्र में हुई बढ़ोत्तरी को दिखाते हैं। अघोषित के बारे में सिर्फ अंदाज भर लगाया जा सकता है !

6 मई 2011

मौत के बाद

कैसे जीए कैसे मरे
क्या फर्क पड़ा,
इमारतें गिराईं, बुनियादें हिलाईं
दूध-बारूद घोल बच्चों
को पिलाईं...
तुम्हारी शुरुआत ने हमें देखो कहाँ पहुँचाया,
तुम बैठे थे
आलिशान महल में,
हमें नसीब नहीं होती
नए शहर में नयी पनाहगाह..
तो अब जब मिल गया है तुम्हें
परमानेंट ठिकाना,
तो एक विडिओ टेप ज़रूए भिजवाना...
कहाँ गए तुम, कहाँ जा पाए
अपने जिहाद से क्या
जन्नत पा पाए,
खबर देना हमें कि
ऊपर बारूद है क्या,
गर नहीं तो दोज़ख में
तेज़ाब है क्या...
जन्नत पहुंचे
तो बताना हूरे असल में कैसी हैं,
क्या अलिफ़ लैला जैसी
अरबी पौशाक पहनती हैं या
लंबा सा नकाब ओढ़ती हैं...
जिस शरबत का कुरान में जिक्र है
बताना क्या वो शराब है...
बता सको तो ये भी बताना
कि हिटलर का दरवाज़ा कौन सा है,
क्या महात्मा को वहां भी लाठी की जगह
हूरें नसीब हैं,
कहना ये भी कि सद्दाम सुन्नियों की जन्नत में गया
या वहां शियाओं का राज है...
बुद्ध भगवान् हैं या आम इंसान है इसकी खबर देना
ओशो और साईं क्या पडोसी है ...
सबकी खबर लेना...
क्यूंकि
कैसे जीए कैसे मरे
क्या फर्क पड़ा
ज़िन्दगी को पकड़ने की
कोशिश करते हुए,
तुम भी गए तड़पते हुए
जैसे सभी गए मौत से लड़ते हुए..


- फौज़िया रियाज़