31 जुलाई 2011

कथा सम्राट को हार्दिक नमन

आज कथा सम्राट प्रेमचंद का जन्मदिन है. हिन्दी लिखने वालों के लिए प्रेमचंद धर्म-पिता सदृश हैं. इस अवसर पर  इससे ज्यादा क्या कहा जाए ! इन्हीं शब्दों के साथ उन्हें शत-शत नमन..

तस्वीर गूगल से 

30 जुलाई 2011

कोई तो है जिसे अपने में पलते मैंने देखा है

धड़कते, सांस लेते, रुकते-चलते मैंने देखा है,
कोई तो है जिसे अपने में पलते मैंने देखा है.

तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों में ख़्वाब रोशन हैं,
तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढ़लते मैंने देखा है.

मेरी ख़ामोशियों में तैरती हैं तेरी आवाज़ें,
तेरे सीने में अपना दिल मचलते मैंने देखा है.

किसी की रहनुमाई की मुझे अब क्या ज़रूरत है,
तुम्हारा नूर अपने साथ चलते मैंने देखा है.

मुझे मालूम है उनकी दुआएं साथ चलती हैं,
सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है.

तुम्हारा अज़्म है जो ख़्वाब में आवाज़ देता है,
ख़ुद अपने आपको नींदों में चलते मैंने देखा है.


आलोक श्रीवास्तव

28 जुलाई 2011

नामवर जी को शुभकामनायें

आज (२८ जुलाई) सुविख्यात आलोचक नामवर सिंह का जन्मदिन है. जन्मदिन  की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ,पाठकों के लिए हम उनका यह साक्षात्कार प्रस्तुत कर रहे हैं,जिसे शैलेय ने लिया है और हमने उनके ब्लॉग से. शैलेय के ब्लॉग तक जाने के लिए यहाँ क्लिक करें. शैलेन्द्र पांडे  की  ली  हुई  तस्वीर गूगल से.





प्र. मार्क्स के बाद का विश्व काफी बदल चुका है पर मार्क्सवाद के सिद्धांतो में फेर-बदल नहीं हुए हैं। कम्यूनिस्ट पार्टियों की असफलता के पीछे यही कारण तो नहीं ?

उ. एक दौर था जब संसार के अधिकतर भाग में कम्यूनिस्ट पार्टी की सरकार थी। भारत में भी सबसे सशक्त विपक्षी पार्टी कम्यूनिस्ट पार्टी ही थी। पर धीरे-धीरे रूस,चीन में खात्मा हुआ और दूसरी जगहों पर भी। एक समय भारत में कई राज्यों में कम्यूनिस्ट पार्टी काफी मजबूत अवस्था में थी। बाद में विकास की अवधारणा बदली। राजनीति का स्वरूप् बदला और आरक्षण जैसी चीजें आ गईं। दूसरी पार्टियां कम्यूनिस्ट पार्टी के एजेण्डे को लेकर सामने आ रही हैं। अब कम्यूनिस्ट आन्दोलन के लिए गुंजाइश कम है।


प्र. अब पूंजीवाद अपने नए रूप में सामने आ गया है। इससे कैसे निकला जाएगा ?

उ. नए अर्थतन्त्र के कारण परिवर्तन तो आया है। एक शेर इस मसले पर सटीक है-

शेख ने मस्जिद बना,मिस्मार को बुतखाना किया
तब तो एक सूरत भी थी,अब साफ वीराना किया

यही हाल है अब और पूंजीवाद का नया स्वरूप कुछ ऐसा है। मार्क्स ने कहा था पूंजीवाद के अन्दर ही इसका इलाज है। यूं विकास के लिए पूंजीवाद जरूरी है लेकिन पूंजीवाद कैपिटलाइज करती है। चीजों को निर्जीव बना देती है। ताजा उदाहरण आईपीएल प्रकरण है। पूंजीवाद के छूते ही बल्ले से सोना उछलने लगा और परिणाम सामने है। इसलिए सावधानी अपेक्षित है।


प्र. ज्ञानरंजन के प्रलेस छोड़ने को आप किस रूप में देखते हैं ?

उ. ज्ञानरंजन पहल के लिए समर्पित रहे हैं। उनका कोई साहित्यिक संगठन नहीं भी था और अब तो पहल बंद भी हो गई है। जाने कब से उन्होंने प्रलेस की मीटिंग,संगोष्ठी में जाना बन्द कर दिया था। इसलिए उनका प्रलेस से जाना कोई बड़ी क्षति नहीं रहा।


प्र. प्रलेस की प्रगति सन्तुष्ट करने योग्य है ?

उ. वर्तमान में तीन संगठन कार्य कर रहे हैं- प्रलेस,जलेस और जसम। इनमें सबसे अधिक सक्रिय प्रलेस ही है। इसकी पार्टी से भी बड़ा इसका कद है और मंच भी बड़ा है। इसकी पत्रिका वसुधा काफी अच्छी निकल रही है। आधार बड़ा हो तो अधिरचना बड़ी होती ही है। जलेस का पार्टी की अपेक्षा सांस्कृतिक मंच बड़ा है और नए लेखक इससे जुड़े भी हैं। लेकिन इसकी सक्रियता प्रलेस से काफी कम है। और जसम तो काफी पीछे है।


प्र. क्या परसाई जी के बाद व्यंग्य विधा का उत्तरोत्तर विकास हुआ है या वो वहीं ठहरी हुई है ?

उ. परसाई व्यक्ति न होकर संस्था थे। कोई भी विषय उनकी पैनी नजर से छूटा नहीं,खास कर राजनीति में उनका पैनापन देखने योग्य है। और यह सब उन्होंने जबलपुर में रहते हए किया। वे लेखक के प्रति जितने समर्पित थे और जितना लिखा उतना तो किसी ने लिखा भी नहीं है। हिन्दी में दूसरा परसाई होने की संभावना नहीं है।


प्र. समालोचना में नई प्रतिभाएं सामने आ रही हैं लेकिन पाठ्यक्रम से समालोचना गायब हो रही है ?

उ. पाठ्यक्रम से समालोचना गायब करके कुद हासिल नहीं होगा क्योंकि परीक्षा से गायब करना किसी के वश में नहीं है। हां,यह एक बड़ी अच्छी बात है कि युवा समालोचक काफी अच्छा लिख रहे हैं। और समालोचना के अच्छे भविष्य की ओर इशारा कर रहे हैं।


प्र. पत्रकारिता की आज की स्थिति पर क्या कहना चाहेंगे ?

उ. इंटरनेट क्रान्ति ने पत्रकारिता का नक्शा और ढांचा बदल दिया है। छापे वाली पत्रकारिता दूसरी तरह की चीज हो गई है। पत्रकारिता का सच यह है कि अब पेड न्यूज छप रही है। पत्राकर नाम की संस्था खत्म हो गई। पूंजीवाद हावी हो गया है। भाषायी पत्रकारिता का हाल बुरा है। सम्भवतः मलयालम पत्रकारिता ठीक है। बल्कि में कहूंगा कि हिन्दी पत्रकारिता ने मुझे बहुत निराश किया है।


प्र. पत्रकारिता की भाषा को लेकर कई सवाल उठते रहते हैं। पत्रकारिता कहती है वो आम आदमी की भाषा से जुड़ रही है आप इस विषय पर क्या कहना चाहेंगे ?

उ. कौन कहता है कि यह आम आदमी की भाषा है। आज तो हिंग्लिश लिखा जा रहा है। आज के पत्रकार भूल गए हैं कि मुंह से पहले कान खुले रखने चाहिए। भाषा की ताकत से अनजान कुछ भी लिखते-कहते रहते हैं। कमाल खान और विनोद दुआ जैसे पत्रकार भी हैं। उनकी लोकप्रियता बताती है कि आम आदमी अच्छा पसंद करता है।


प्र. नक्सलवाद से देश भर के लेखक जुड़े रहे हैं। हिन्दी साहित्य में इस पर रचनाएं क्यों नहीं आ रही हैं ?

उ. क्रान्तिकारी विचार कई शक्ल में आते हैं। ऐसी रचना तब बाहर आती है जब गुस्सा दर्द में बदलता है। हालांकि कुछ काम हुआ है पर अभी और बाकी है। क्रोध और करुणा दोनों एक साथ होगी तो इससे सम्बन्धित चीजें बाहर आएंगी।



26 जुलाई 2011

कौन कहता है कि जमाना बदल गया है ?


कल्पना कीजिए उस आदिम वक्त की,जब आदमी जंगलों में,गुफाओं में  रहता था। जिस  वक्त वह अन्य जीवों,पशुओं की तरह नंगा ही रहता था। फिर किसी नौजवान के  दिमाग में किसी पशु का चमड़ा देखकर उसे कमर के इर्द-गिर्द लपेटने का विचार आया। उसने वह विचार कार्यान्वित किया।

तब उसकी मां ने या किसी और बुजुर्ग महिला या पुरुष ने कहा होगा, 'आग लगे ऐसे फैशन में' !

देखादेखी और नौजवानों ने भी चमड़ा या पेड़ों के पत्ते लपेटने शुरु कर दिए होंगे। धीरे-धीरे यह बात दूर तक फैली होगी और तब उस जमाने के बजरंग दल या जमाते इस्लामी वालों को यह महसूस हुआ  होगा कि इससे तो मानव की संस्कृति प्रदूषित हो रही है। उन्होंने चमड़ा या पत्ते लपेटने के खिलाफ मुहिम छेड़ दी होगी। नौजवानों के तत्कालीन वस़्त्र एक बड़ा  सांस्कृतिक मुद्दा बन गए होंगे। 

हो सकता है किसी इलाके में तत्कालीन प्रगतिशीलों को तन ढकने के फैशन में बाजार और मुनाफे का षडयंत्र नजर आया हो। इस उपभोक्ता संस्कृति की वजह से प्रगतिशील मूल्यों के खतरे में  पड़ने की आशंका ने उन्हें आग-बबूला कर दिया हो। तब के किसी प्रगतिशील विचारक ने कहा हो (अलबत्ता तब लिखने का आविष्कार नहीं हुआ होगा) -  "भूखे नंगों की चेतना को हमेशा दबाया नहीं जा सकता। इस पतनशील संस्कृति का अंत निश्चित है।"

तन  ढकने का  फैशन धीरे-धीरे चारों तरफ लोकप्रिय होता गया होगा। नए-नए किस्म के पशुओं के चमड़े और अलग-अलग किस्म के पत्ते पहनकर लोग होंगे। लोगों ने अपनी सुविधा और सौदर्याभिरुचि के मुताबिक इन आवरणों को कांटना-छांटना शुरू कर दिया होगा। कुछ लोगों ने इन आवरणों के बदले मांस या फल या पत्थर के औजारों के लेन-देन का धंधा शुरू कर दिया होगा।

कुछ अतिदुस्साहसी नौजवानी स्त्री-पुरुष कुछ दुस्साहसी किस्म के आवरणों से शरीर ढककर निकलते होंगे ,तो निर्वस्त्र बूढे स्त्री-पुरुष कहते होंगे, 'आजकल शर्म लाज तो बची ही नहीं,हमारे जमाने में ऐसा नहीं था।'

कौन कहता है कि जमाना बदल गया है ?

राजेन्द्र धोड़पकर

(हिंदुस्तान दैनिक में प्रकाशित व्यंग्य)

24 जुलाई 2011

ब्लू वेल्वेट


अगर आपने अल्फ्रेड हिचकौक की फिल्म साईको देखी हो और आपको उस जॉनर की फिल्में पसंद हों तो तो ब्लू वेल्वेट आपके लिये ही बनी है। एक अजीब सा साईकोटिक संसार जहां जी रहे कैरेक्टर्स को उनकी विचित्र मेंटल स्टेट बेहद वियर्ड तरीके से बिहेव करने के लिये मजबूर कर देती है। वो आपके या हमारे जैसे लोगों की तरह मामूली बर्ताव नहीं करते। एक एक्स्ट्रीम वाली स्थिति है जहां कोई इसलिये इतना विचित्र हो जाता कि या तो वो निहायत मजबूर हो गया है या इसलिये कि वो निहायत क्रूर हो गया है। वर्ड सिनेमा में फिल्म 'नोआर' एक पूरा दौर रहा है। उस दौर में ऐसी कई फिल्में बनी जिसके किरदार या गैंगस्टर थे या फिर साईकोटिक या फिर दोनों ही। ये चरित्रों के भीतर के काले गहरे ग्रे शेडस उभारने वाली फिल्में थी। नेगेटिव करेक्टर्स इन फिल्मों में बड़ी अहमियत रखते थे। टैक्सी ड्राईवर, डबल इन्डेम्निटी, टच औफ इविल, सिटीजन केन, वर्टिगो, साईको जैसी कई फिल्में इस दौर में बनी। इन सारी फिल्मों के चरित्र कहीं कहीं साईकोटिक थे। इन फिल्मों में सिम्बोलिजम बड़ी अहम भूमिका निभाता था। फेम फेटाल यानि नकारात्मक महिला किरदार इन फिल्मों में अहम भूमिका में रहती थी। डेविड लिंच की इस फिल्म को भी उसी श्रेणी में रखा जाता है।


एक कॉलेज स्टूडेंट जेफरी को ल्यूम्बर्टन नाम के एक छोटे से कस्बे के अपने घर के पास के खेतों में एक आदमी का कान गिरा हुआ मिलता है। इसी खेत में कुछ समय पहले उसके पिता को एक अटैक आया था और वो बीमार हो गये थे। इस कान को लेकर वो एक डिटेक्टिव के पास जाता है ताकि इसके बारे में जांच पड़ताल की जा सके। दूसरे दिन डिटेक्टिव की बेटी सेंडी से उसकी मुलाकात होती है और वो उसको अपने पिता से मिलने वाली कुछ खुफिया जानकारियां देने का वादा करती है। वो उसे उसके पड़ौस में मौजूद एक घर के बारे में बताती है जहां एक विचित्र औरत रहती है। जैफरी सैंडी की मदद से उस औरत के बारे में पता लगाने का फैसला करता है।


जेफरी पेस्ट कंट्रोल वाला आदमी बनकर उसके घर में घुसता है लेकिन पहले दिन वो कुछ खास जानकारी हासिल नहीं कर पाता पर वहां से एक चाबी चुरा लेता है। अगले दिन वो चुपचाप उस कमरे में घुसता है। कुछ खोज ही रहा होता है कि उस घर में अकेले रहने वाली एक सिंगर डौर्थी अपने घर लौटती है। वो एक कबर्ड में छुप जाता है और उसे कपड़े बदलते हुए बिल्कुल नग्न अवस्था में देखता है। डौर्थी सोने को होती है कि उसे कबर्ड में हलचल सुनाई देती है। वो चाकू लेकर कबर्ड का दरवाजा खोलती है और जेफरी पकड़ा जाता है। वो जेफरी से पूछती है कि उसने क्या देखा। जेफरी बताता है। वो जेफरी से पूरे कपड़े उतारने के लिये कहती है और चाकू की नोक पर उसके साथ शारीरिक सम्बंध बनाती है। पर जेफरी को खुद का स्पर्श भी नहीं करने देती। तभी दरवाजे पर दस्तक होती है। वो जेफरी से कबर्ड में छुप जाने के लिए कहती है। वो दरवाजे के पीछे से एक आदमी को कमरे में आते देखता है। और वहां उसके सामने खुलती है एक बेहद विचित्र और डरावनी दुनिया। वो देखता है कि  डौर्थी नामकी ये खूबसूरत गायिका जो अब तक उसके साथ जबरदस्ती कर रही थी   निर्ममता की किस हद तक इस कमरे के अन्दर फ्रेंक नामके उस अन्डरवर्ड डान से प्रताड़ित हो रही है।


फ्रेंक एक साईकोटिक करेक्टर है जिसे डौर्थी को एक खास तरह से प्रताड़ित करने में मज़ा आता है। अपने चेहरे पे मास्क लगाकर और डौर्थी के मुंह में कपड़ा ठूंसकर वो उसके साथ जबरदस्ती करता है। डौर्थी असहाय है। बिल्कुल लाचार। एकदम कमजोर। जेफरी ये सब देखके डौर्थी के लिये सहानुभूति से भर जाता है। जैसे ही फ्रेंक वापस जाता है जेफरी कबर्ड से बाहर निकलता है। वो बिल्कुल टूट चुकी सी डौर्थी को हमदर्दी देता है। डौर्थी को इस हमदर्दी की बहुत जरुरत है क्योंकि फ्रेंक उसके साथ एक जानवर सा व्यवहार करता है। जेफरी फिर इस घर में रोज आना शुरु करता है।


वो रोज फ्रेंक को उसके साथ जानवरों सा व्यवहार करते देखता है। एक दिन फ्रेंक उसे देख लेता है और उसे पकड़कर अपने गुंडों के साथ अपने अड्डों पे ले जाता है। यहां जेफरी को पता चलता है कि फ्रेंक एक अन्डरवर्ड से जुड़ा शातिर अपराधी है। वो उसके बेहद असामान्य दोस्तों से रुबरु होता है। फ्रेंक अपने दोस्तों के सामने ही कार के अन्दर फिर अपने वहशियाना अंदाज़ में डौर्थी को प्रताड़ित करने लगता है। इस बार जेफरी उसका विरोध करता है। फ्रेंक अपने गुडों की मदद से उसको बुरी तरह पीटता है। वो बदहवाश हो जाता है। यहां सेंडी को पता लगता है कि जेफरी और डौर्थी के बीच किसी तरह का रिश्ता पनप रहा है। इस रिश्ते की गंध उसे अच्छी नहीं लगती। एक दिन सेंडी और जेफरी अपनी कार में कहीं जा रहे हैं। एक दूसरी कार उनका पीछा करती है। उससे कुछ लड़के बाहर निकलते हैं और एक महिला को जेफरी के सुपुर्द करते हैं। ये महिला डौर्थी है। जो बिल्कुल नग्न अवस्था में है। बिल्कुल बदहवास सी। उसके साथ फिर बुरी तरह से मारपीट की गई और उसे रास्ते में कहीं फेंक दिया गया। जेफरी को अपने पास पाते ही वो उससे लिपट जाती है। जैसे उसकी समीपता उसकी जिन्दगी की केवल और केवल उम्मीद हो। वो उसे लेकर सेंडी के घर में जाते हैं। और फिर उसी कान के एक क्लोजअप के साथ फिल्म समाप्त हो जाती है जो कान जैफरी को फिल्म की शुरुआत में मिलता है।


डेविड लिंच की इस फिल्म में न्यूडिटी तो है लेकिन उसे देखके एक अजीब सा सेंसेशन होता है। ऐसा सेंसेशन जो लस्ट के बिल्कुल करीब नहीं है। मानव स्वभाव के बेहद अंधेरे कोनों से ये फिल्म रुबरु कराती है। विकृत सी मनोवैज्ञानिक दुनिया में ले जाती है। एक खास किस्म का थ्रिल आपके अन्दर बहने लगता है। डेविड लिंच की ये फिल्म एब्सट्रेक्ट होने के बेहद करीब है। ऐसी फिल्मों को देखने के तुरंत बाद एक बेहद नकारात्मक किस्म का अहसास होने लगता है। उस खास किस्म की विकृत दुनिया के लिये घृणा पैदा होने लगती है। ऐसी फिल्में बेचैन करने लगती हैं। विश्व सिनेमा के एक पूरे दौर में ऐसी फिल्में बनी हैं। जिससे एक बात बेहद साफ हो जाती है कि हमारे आम जनजीवन के इर्द गिर्द या उसके बीच ही कहीं एक ऐसी विकृत दुनिया रहती है जहां पीड़ित करने और पीड़ा सहने की हदें पार होती हैं। फिल्म नोआर के दौर की ये फिल्में उसी दुनिया की उपज हैं।

उमेश पन्त 
लेखक सिनेमा,टीवी और रेडियो के लिए पटकथा लिखते हैं.

23 जुलाई 2011

बर्फ और आग


कुछ लोग कहते हैं, दुनिया आग में जलकर खत्म होगी
कुछ कहते हैं, बर्फ में गलकर 
अपनी इच्छाओं से, जो जाना है, 
मैं उनके साथ हूँ, जो आग की तरफ हैं
लेकिन यदि इसे दो बार मिटना हो,
मुझे लगता है, मैं ईर्ष्या से भी इतना परिचित हूँ
कि जान  सकूँ,नष्ट होने के लिए बर्फ भी  
शानदार विकल्प है
और पर्याप्त भी 

रोबर्ट फ्रोस्ट (१८७४-१९६३)





अनुवाद: रंगनाथ सिंह 

21 जुलाई 2011

विचित्र अधिकार


एक महात्मा फेरी पर जा रहे थे। एक नवेली बहू ने  न  तो  उन्हें दक्षिणा में आटा डाला और न उन्हें रोटियाँ ही दीं। महात्मा को काफी गुस्सा आया। उनको ऐसी शान तो पहली बार ही बिगड़ी। रास्ते भर उसे कोसते हुए ,बुरा-भला कहते हुए बड़बड़ाते जा रहे थे कि सर पर लकड़ियों की भारी उठाए बहू की सास मिल गई।

उसे रोककर कहने लगे कैसी कुलच्छनी बहू लाई होए जो हाथ की बजाए सन्तों को मुँह से उत्तर दे। क्या एक अंजलि  भर आटे व एक रोटी से भी साधु सस्ता हो  गया ? महात्मा के भेख में एक कुत्ते जितनी भी इज्जत नहीं रखी। मुँह के सामने ही साफ मना कर दिया कि मुफ्तखोर साधुओं को देने के लिए आटा नहीं पीसा। अब तो घर-घर बहुओं का राजहोने लगा  है। थोड़े दिन बाद तो खुद भगवान भी भूखे मरे लगेंगे।

महात्मा की बात सुनकर सास आगबबूला हो गई। अविश्वास के भाव से पूछाए सच कह रहे हैं ?

नहीं तो  क्या झूठ बोल रहा हूँ। लगता है अब इन  बहुओं के कारण हमें भी झूठ सीखना पड़ेगा।
फिर तो य दुनिया जीने के काबिल नहीं रहेगी। नहीं महारराज,आप  अपने  मुँह से ऐसी बात न करें,सुनने से ही  पाप लगता है। चलिए मेर साथ। बड़ी आई नवाबजादी,जीभ न खींच लूँ तो मेरे नाम पर जूती। खड़े-खड़ेे देख क्या रहे  हैं,चलिए न मेरे साथ।

महात्मा ने सास का यह रंग-ढंग देखा तो बड़े प्रसन्न हुए। बार-बार मना करने पर उसके सर की भारी अपने कन्धे पर धरने के बाद ही वे उसके पीछे-पीछे चले। सास गुस्से में तेज चलती हुई बहू को दनादन गालियाँ निकाल रही थी। सुनकर महात्मा को भी अचरज हुआ कि इत्ती गालियाँ तो वो भी नहीं जानते। पर मन-ही-मन बड़े खुश थे कि सास-हू के झगड़े में उनके पौ-बारह हो जाने हैं। लकड़ियों का भारी बोझ उन्हें फूलों की डलिया जैसा हल्का लगा और उधर भार उतरने से सास का मुँह और ज्यादा खुल गया था।

घर पहुँचते ही महात्मा जी से भारी लेकर वह दनदनाती अन्दर पहुँची। गले की पूरी ताकत से बहू को झिड़कते हुए उसने अन्त में पूछा,बोल तूने, सचमुच महात्मा जी को मना किया ?

बहू ने धीमे से अपराधी के नाईं हामी भरी। सास की आँच और तेज हो गई,बेशऊर कहीं की ! तेरी इतनी हिम्मत कि मेरे रहते तू मना करे ?

महात्मा मन ही मन सोचने लगे कि आज तो यह झोली छोटी पड़ जाएगी। बड़ी लाते तो अच्छा रहता। उन्हें क्या पता कि सास इतनी भली है ! उबलती हाँडी के ढक्कन के तरह फदफदाते सास बाहर आई। पर खाली हाथ। गुस्से के उसी लहजे में बोली,भला आप ही बताइए,मेरे रहते वह मना करनेवाल कौन होती है ? मरने के बाद भी उसकी ऐसी हिम्मत क्या हो जाए ! मना करूँगी तो मैं करूँगी। यूँ मुँह बाए क्यूँ खड़े हैं ? हाथ-पाँव हिलाते मौत आती है ! खबरदार कभी इधर मुँह किया तो। इस घर की मालकिन हूँ तो मैं हूँ,एक बार नहीं सौ बार मना करूँगी। फौरन,अपना काला मुँह करिए यहाँ से। बेकार झिकझिक करने की मुझे फुरसत नहीं है।

बेचारे महात्मा ने डरते-सहमते अपने सर पर हाथ फेरा। सचमुच,लकड़ियों का गट्ठर तो सास उतार ले गई थी,फिर यह असह्य बोझ कहो का है ? उनके पाँव मानो धरती से चिपक गए हों।

विजयदान देथा

20 जुलाई 2011

तन्हा-तन्हा रोने वालों कौन तुम्हे याद आया

आज पेश है मेहँदी हसन की आवाज़ में फरहत शहजाद की गज़ल.  



क्या टूटा है अंदर अंदर क्यूँ चेहरा कुम्हलाया है
तन्हा-तन्हा रोने वालों कौन तुम्हे याद  आया

चुपके-चुपके सुलग रहे थे,याद में उनकी दीवाने
एक तारे ने टूट के यारों क्या उनको समझाया है 

रंग-बिरंगी इस महफ़िल में तुम क्यूँ इतने चुप-चुप हो
भूल भी जाओ पागल लोगों क्या खोया क्या पाया है 

शे'र कहाँ है खून है दिल का जो लफ्जों में बिखरा है
दिल के जख्म दिखा कर हमने महफ़िल को बहलाया है

अब शहजाद ये झूठ न बोलो,वो इतना बेदर्द नहीं
अपनी चाहत को भी परखो,गर इल्जाम लगाया है

- फरहत शहजाद 


जिन साथियों को डाउनलोड करने में दिक्कत हो वो हम से मेल से ऑडियो फाइल ले सकते हैं.

19 जुलाई 2011

टका सेर भाजी टका सेर खाजा

अंधेर नगरी अनबूझ राजा
टका सेर भाजी टका सेर खाजा
नीच ऊँच सब एकहि ऐसे
जैसे भडुए पंडित तैसे

कुल मरजाद न मान बड़ाई
सबैं एक से लोग लुगाई

जात पांत पूछै नहिं कोई
हरि को भजे सो हरि को होई
वेश्या जोरू एक समाना
बकरी गऊ एक करि जाना
सांचे मारे मारे डाल
छली दुष्ट सिर चढ़ि चढ़ि बोलैं
प्रगट सभ्य अन्तर छलहारी
सोइ राजसभा बलभारी
सांच कहैं ते पनही खावैं
झूठे बहुविधि पदवी पावै
छलियन के एका के आगे
लाख कहौ एकहु नहिं लागे
भीतर होइ मलिन की कारो
चहिये बाहर रंग चटकारो
धर्म अधर्म एक दरसाई
राजा करै सो न्याव सदाई
भीतर स्वाहा बाहर सादे
राज करहिं अमले अरु प्यादे
अन्धाधुन्ध मच्यौ सब देसा
मानहुं राजा रहत बिदेसा
गो द्विज श्रुति आदर नहिं होई
मानहुं नृपति बिधम्र्मी कोई
ऊँच नीच सब एकहि सारा
मानहुं ब्रह्म ज्ञान बिस्तारा
अंधेर नगरी अनबूझ राजा
टका सेर भाजी टका सेर खाजा

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

18 जुलाई 2011

इकिरू

काफ़ी सारे लोग इकिरू को कुरोसावा की सबसे अच्छी कृति मानते हैं। जबकि कुरोसावा की बनाई गई इकत्तीस फ़िल्मों में रोशोमॉन, मदादायो, रान, देरसू उज़ाला, कागेमुशा, योजिम्बो, स्ट्रे डॉग और सेवेन समुराई शामिल हैं- सब मास्टरपीस। अगर मैंने इनमें से कोई फ़िल्म नहीं देखी होती तो मैं विश्वास से कह देता कि इकिरू ही कुरोसावा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म होगी। आधार यह होता कि इससे बेहतर क्या बनाएगा कोई। मगर मैंने इनमें से कुछ फ़िल्में देखीं है और मैं फ़ैसला नहीं कर सकता कि कौन सी सबसे अच्छी है।

दिलचस्प है मज़ेदार बस निहायत मामूली आदमी- जिसने तीस बरस तक बिलानागा सिटी हॉल में एक सेक्शन चीफ़ की नौकरी बजाई है- कहानी है इस आदमी की जिसे पता चलता है कि उसके जीवन के सिर्फ़ छै माह और बचे हैं। मृत्यु को अपने इतना करीब पा कर इस आदमी के भीतर यह एहसास जागता है कि उसने अभी तक कितना अर्थहीन जीवन जिया है या जिया ही नहीं है। पहले ही जीने की कला भूल चुका यह आदमी अब अपने बचे हुए जीवन को पूरी उमंग से जीना चाहता है लेकिन नहीं जानता कैसे!


हम देखते हैं उसे रात की रंगीनियों में ज़िन्दगी को खोजते, शराब पीते, लहराते, गिरते, वेश्याओं के बीच चिल्लाते.. मगर जीवन नहीं मिलता उसे। मिलता है एक ऐसी जगह जहाँ उसने उम्मीद की थी.. और वहीं से मिलती है प्रेरणा अपने शेष दिनों को एक सार्थक रूप देने की।

इकिरू का यह अभिशप्त नायक आधी फ़िल्म में ही मर जाता है और उसके बाद भी फ़िल्म एक घण्टे तक जारी रहती है। आप पहले से भी ज़्यादा साँस साध कर देखते रहते हैं उसकी मृत्यु पर आयोजित शोक-सभा का कार्य-व्यापार। उस लम्बे सीक्वेन्स को देखते हुए मुझे मुहर्रम की याद हो आई है- इमाम हुसेन की शहादत को आँखों से देखने वालों का कलेजा इतना नहीं कटा होगा, जितना उनकी कहानी को साल-दर-साल सुनते हुए कटता है। ये कहानी सुनाने की ताक़त ही होती है जो पत्थर-दिल मर्दों को भी सिनेमा हॉल के भीतर आँसुओं में पिघला देती है।

इकिरू का अंग्रेज़ी नाम मिलता है- टु लिव। समझ में आता है- मगर किस तरह जिया जाय इस बात को कुरोसावा कहीं किसी संवाद में किसी किरदार से कहलाते नहीं। जीवन के प्रति उनका विचार इकिरू देखने के अनुभव के बाद स्वतः उपज आता है आप के मन में।

आज की तारीख में भी लोग इस तरह का स्क्रिप्ट डिज़ाइन अपनाने में घबराएंगे उस समय तो यह निश्चित ही क्रांतिकारी रहा होगा। कुरोसावा कहानी सुनाते-दिखाते हुए कभी हड़बड़ी में नहीं रहते। जिस पल में रहते हैं, उस में रमे रहते हैं और अपने दर्शक को भी रमा देते हैं। समय को साधने की यह कला ही उन्हे एक महान निर्देशक बना देती है।

इकिरू व्यक्ति, समाज और जीवन तीनों के भीतर एक गहन दृष्टि डालती है। ऋत्विक घटक की सुबर्णरेखा का एक महत्वपूर्ण सीक्वेन्स और ऋषिकेश मुखर्जी की आनन्द इकिरू के प्रभाव में बनाई गई थी।

अभय तिवारी
cinema-सिलेमा ब्लॉग से साभार