30 अगस्त 2011

एक अनशन राजू का

भारतीय सिनेमा में हीरो वो होता है जो दस गुन्डों से अकेले लड़ जाए, जो इन्सानियत की मूरत हो और जो कभी गलत न हो. काला रंग बॉलीवुड के ’हीरो’को छू कर भी नहीं गुज़रता. वहीं अभिनेत्री आदर्श पत्नी या प्रेमिका होती है. वो बस कुरबानियां देती है वो नाचने वाली नहीं होती. अगर होती है तो उसे उस शख़्स से प्यार हो जाता है जो उसके कुंवारेपन को विदा करता है. मसलन उमराव जान या अनारकली. यहां तक कि ’नो एन्ट्री’की बिपाशा बसु जैसे किरदारों को भी किसी मजबूरी से जोड़ कर जस्टीफ़ाय किया जाता है. अगर कोई बार डांसर है तो वो बेशक ही बुरी औरत होगी जो चालाकियां करती है और बेचारी सती-सावित्री हिरोइन को सताती है.


फ़िल्म गाइड इन सभी स्टीरिओ टाइप किस्सों और हिस्सों से परे है. यहां वहीदा अपने पति को छोड़ती है, पैरों में घूंघर बांधती है पर किसी मजबूरी के तहत नहीं बल्कि अपने शौक और अपनी कला के लिए. अपने प्रेमी यानि राजू की मदद और प्रोत्साहन से खूब पैसा कमाने के बाद भी वो उसके चरणों की दासी नहीं बनती. बल्कि उलटा वो उससे ऊबने लगती है. राजू को शराब से झूलता और जूए में झूमता देख वो उसे लौटा लाने की कोशिशें नहीं करती. गाइड का राजू शरत चन्द्र का देवदास नहीं है वो अपनी अकड़ का गुलाम नहीं है ना ही उसे इस बात पर गुरूर है कि वो कभी झुकता नहीं. उसकी कमज़ोरियां उस पर हावी नहीं है. वो बहुत ही आम सा शख़्स है अपनी ज़िन्दगी में मौजूद औरत के लिए धोखाधड़ी कर सकता है,अपने यहां काम करने वाले लोगों पर गुस्से में चिल्ला सकता है यहां तक की मुसीबत में डर कर भाग सकता है. राजू की कमज़ोरियां उतनी ही आम या खास हैं जितनी किसी भी ऐसे मध्यवर्गी आदमी की होंगी जिसके पास अचानक से खूब सारा पैसा आ जाए. तो ऐसा क्या है जो देवसाहब की गाइड हिन्दी सिनेमा की क्लासिक है.

जेल, प्रेम, दुनिया और फिर स्वामी. फ़िल्म ’गाइड’ का राजू अहसासों से होता हुआ, पैसे में तैरता हुआ, ताश के पत्तों में भटकता हुआ, प्रेम की डोर को कभी थामता हुआ कभी काटता हुआ इन्सान के अनगिनत रूपों का मेल है बल्कि इन्सान के अन्दर छुपे कई इन्सानों को समेटता हुआ वो सबके जैसा होते हुए भी सबसे अलग है. रोज़ी उर्फ़ नलिनी शादी के बंधन को तोड़ते हुए, खुद की ज़िन्दगी और इच्छाओं के लिए खड़े होते हुए फिर प्रेम में गिरफ़्त होकर कमज़ोर होने वाली मगर प्रेम पर आंखें बंद कर विश्वास ना करने वाली, प्रेमी के शराब और जूए में डूबने से रोने नहीं झल्लाने वाली आम होते हुए भी बेहद खास औरत है.

सच और झूठ से चरित्र का निर्माण नहीं होता, चरित्र का निर्माण इन्सान के उठाए कदमों से होता है. इस एक बात से ही राजू किताबी और फ़िल्मी पुरुष से ऊपर उठ जाता है. वो एक शादीशुदा औरत से प्रेम करता है, उसके सो चुके ख़्वाबों को जगाता है. उससे दूर हो जाने के डर से धोखाधड़ी करता है. पकड़ा जाता है जेल पहुंचता है फिर लौट कर नहीं आता, चला जाता है एक ऐसी दुनिया में जहां लोग उसे महात्मा मानते हैं.वहां राजू मन्दिर में रहता है, गांव की तरक्क़ी के लिए काम करता है तो भोलेभाले लोग गांव में स्कूल और अस्पताल खुलने को चमत्कार समझ बैठते हैं. सूखा पड़ने पर जब मौत गांव पर अपने पंख फ़ैला देती है तो गांव वालों का अपने महात्मा पर किया अटूट विश्वास हिम्मत बंधाने लगता है. उम्मीद जब विश्वास से जुड़ती है तब आखों के सामने का सच बेमायने हो जाता है, आखें वही देखती हैं जिसकी परछाई ज़हन में तैर रही होती है. कई दफ़ा खुद का सच दूसरे के यकीन के आगे दम तोड़ देता है राजू भी अपने सच को किनारे रख चल पड़ता है उम्मीद और विश्वास के उस रास्ते पर जहां से गुज़रना उसे ढोंगी भी बना सकता था. बिलखती गिड़गिड़ाती आस्था के आगे राजू झुकता है और उस आस्था को ओढ़ बारिश के लिये उपवास रखता है.

सही-गलत, सच-झूठ, विश्वास-अंधविश्वास इन्सान के अन्दर होने वाले लड़ाईयों से शुरू होकर दुनिया में जंग का रूप लेता है. अगर मन में सवाल ही ना रहें तो जवाब के लिए ना भटकना होगा ना तड़पना होगा. हम क्यूं हैं, ज़िन्दगी का मतलब क्या है, सैंकड़ों लोगों में हमारे दर्द कितनी एहमियत रखते हैं, क्यूं दिन रात महनत करके कमाना है, क्यूं फिर उस कमाई को खुद पर ही उड़ाना है. ज़िन्दगी माना क़ीमती है पर जीना है क्या ? क्या यूंही पैदा होने, पढ़ने-लिखने, नौकरी की तलाश करने, टीवी देखने, खरीदारी करने, खूब घी-तेल खाने, जिम में जाकर वज़न घटाने, मीठे के लिए बेसब्र होने और फिर डायबटीज़ से जूझने...दिली ख्वाहिशों के पीछे भागते हुए एक दिन दिल के दौरे से ख़त्म हो जाने के लिये। ये चक्कर पूरी दुनिया को हर सांस को, हर आत्मा को दबोचे हुए है।

इसी चक्कर से मुक्त होते हुए राजू की आवाज़ बहुत तेज़ गूंजती है पर उसका शरीर इतना विशाल हो जाता है कि वो गूंज उसके अंदर ही ऊंची, धीमी,बेहद धीमी और फिर विलीन हो जाती है. राजू को मरने से पहले एक साफ़ रास्ता दिख जाता है जहां वो गर्म ठंडक और सर्द गर्मी महसूस करता हुआ. बारिश ले आता है, ज़मीन उसे समा लेती है जैसे बारिश की बूंदों को सोख लेती है.

29 अगस्त 2011

मर्डरर का विवेक, मदांध का अविवेक


लीना मेहेन्दले की यह टीप दो दिन पहले आई थी. यह छोटी सी टीप हमारे समाज के एक स्याह पक्ष  को उजागर करती है. एक सवाल उठाती है कि क्या आज के कुछ नेताओं में पेशेवर हत्यारों जितनी नैतिकता भी नहीं बची है ! - संचालक  

"मैंने मनीष तिवारी का वह मदांध वक्तव्य सुना जिसमें कुछ दिनों पहले उसने अण्णा पर कीचड उछालते हुए सवाल पूछा था कि "अरे, तुम किस मुँहसे भ्रष्टाचार मिटानेकी बात करते हो, तुम तो खुद सरसे पाँव तक भ्रष्टाचारमें डूबे हो ।" एक तरफ यह अविवेकी वक्तव्य है। दूसरी तरफ मुझे दिखता है उस हार्डण्ड क्रिमिनल और मर्डरर का पुलिसमें दिया गया बयान जिसमें उसने कबूला कि उसने मंत्रीवर पदमसिंह पाटीलसे सुपारी लेकर एक आदमीका खून किया था, पर दूसरी सुपारी लेनेसे इसलिये इनकार किया कि वह सुपारी अण्णा हजारे के लिये थी और इस मर्डररकी आत्मा ने कहा – नही, ऐसे संत मनुष्यकी सुपारी मैं नही ले सकता।"



27 अगस्त 2011

जानिए, अन्ना हजारे कौन है


लीना मेहेन्दले 

पिछले दिनों में अण्णा हजारे के बाबत काफी कीचड उछालने का प्रयास हुआ तो मुझे लगा कि एक मराठी माणूस ( मराठी व्यक्ति) होनेके नाते मुझे जो थोडी अधिक जानकारी है, उसे अन्य प्रांतवासियों तक पहुँचाऊँ। पर यह कहानी कुछ पीछे से शुरु करनी पडेगी --  1947 से  । लेकिन पहले यह कहना होगा कि अपना पक्ष रखनें में अण्णा समर्थ हैं, सो यह कोई मैं उनकी ओरसे नही लिख रही। न ही मैं उनके जनलोकपाल बिल वाली संस्थासे संबंधित हूँ -- बल्कि कुछ मुद्दों पर मेरा मत अलग भी है।

आजादी के बाद शायद महाराष्ट्रमें ही ऐसी अधिकतम घटनाएँ हुईं जिसने विस्तृत परिणाममें उथलपुथल मचाई। उनका परिणाम 1978 के लोकसभा चुनावों पर भी था जिसमें कॉंग्रेस पक्ष हारा । यशवंतराव चव्हाण और उनके राजकीय वारिस शरद पवारने पक्ष छोडा। अगले वर्ष महाराष्ट्र विधानसभा चुनावमें और उसके बादसे विधानसभा  चार  प्रमुख पक्षोंमें बँट गई -- कॉंग्रेस, NCP, भाजपा, शिवसेना । केवल एक बार NCP,ने भाजपासे हाथ मिलाकर सरकार बनाई अन्यथा हमेशा NCP के साथ कॉंग्रेसी सरकार ही रही। शरद पवार का कद बढते बढते वे सबसे बडे साहब बन गये।

इस बीच बहुत छोटे पैमाने पर एक छोटेसे गाँवमें अण्णा हजारेने ग्रामोत्थान का काम आरंभ किया -- ग्राम सफाई, फिर जलसंधारण (अर्थात पानी बचाना), पानीका न्यायसंगत बँटवारा, वृक्षारोपण। अब लोग सम्मान करने लगे।जब अण्णाने देखा कि गाँव की मेहनत की कमाई तो शराब में जा पही है, तो कार्यक्रमकी दिशा बदली।

हालमें कुछ पाँच-सितारा पत्रकारों ने लिखा है कि उस जमानेमें अण्णाने गुंडागिरी की, कानून हाथमें लिया और गाँववालोंको पीटा। वास्तव यह है कि जब उन्होंने महिलाओंसे पूछा तो सबने दुहाई दी कि हमारे बच्चे रोज भूखे सो जाते हैं। विदेशी शराबपर घंटेभरमें 5-6 हजार रुपये उडा पानेवाले पत्रकार को कहाँ यह समझ होगी कि 25 रु रोज कमानेवाला जब उतने पैसेकी शराब खरीदता है तो उसके घरमें क्या होता है। सो महिलाओंकी क्षमता को अण्णा ने एक नया आयाम दिया। महिलाओंने अपने पतियोंकी शराब छुडवाई। पर जब कोई अत्यधिक दुराग्रही पति बहकने लगा तो अण्णा घरवाली स्त्रियोंसे पूछते कि इसकी सजा क्या हो। कईयोंकी माँ और पत्नीने सजा सुनाई की इनकी पिटाई हो। पर धीरे धीरे गाँव सुधर रहा था, संपन्न हो रहा था और अण्णाका विरोध   बंद हो गया। राळेगणसिद्धी अब एक आदर्श ग्राम बन गया कुछ इनाम जीते और अमुल संस्थाने भी इस प्रयास का महत्व समझकर अपने ट्रेनी भेजे। ग्राम-विकास विभागके अधिकारी, सरकारी ट्रेनिंग इन्स्टिट्यूट के अधिकारी यह प्रयोग देखने आते कि इस प्रयोग को कैसे रेप्लिकेट किया जाय। कुछ वर्षों बाद इसी गाँवके पगचिह्नोंपर चलकर हिवरे-बाजार नामक दूसरे गाँवने यही प्रयोग सफलतापूर्वक किया। वो पत्रकार जान लें कि गुंडागिरीसे फॉलोअर नही पैदा होते।

लेकिन जब ये ग्रामसुधारके काम हो रहे थे तो अण्णा व गाँववालोंने करप्शन को भी झेला है। चाहे वह सिंचाई-निभागके डिप्टी इंजिनियरका हो या शराबके ठेकेको रिन्यू करनेवाले अधिकारी हों। कभी कभी उनके विरुद्ध सरकार का ध्यान खींचने के लिये छोटामोटा उपोषण भी किया। अब अण्णाको लगने लगा कि करप्शन की बिमारी जो बडे पैमानेपर फैली है उसे समाजसे निकलना होगा और यह संभव भी है।



1980 -1990 के कालखंड में महाराष्ट्र की सहकारिता-आधारित चीनी मिलें और कॅपिटेशन-फीस-आधरित शिक्षा-व्यवस्था दोनों ही भ्रष्टाचार के केंद्र बन रहे थे। साथही घरेलू ट्रस्ट बनाकर सरकारी जमीनें आबंटित करवानेकी शगल नें भी जोर पकडा था।भूखंडका श्रीखंड -- ये एक मुहावरा बन गया। मंत्रीगणों की जमीन बटोरनेकी प्यास बढती गई। जब अण्णाने अपने गाँवके स्तरसे उठकर राज्यस्तर पर भ्रष्टाचार का विरोध करना चाहा तो सबसे पहला टकराव शरद पवारके साथ होना था। वह इतना तेज हुआ कि इतिहास में पहली बार 1994 के विधान-सभा चुनाव में भ्रष्टाचारके मुद्देपर कॉंग्रेस व पवार-कॉंग्रेस हारे और शिवसेना-भाजपाकी सरकार आई। आगे चलकर यही बात लेकर अण्णा को मरवाने के लिये 1 लाख रुपये की सुपारी दी गई --  एक ऐसे क्रमिनलको जिसने दुसरी सुपारी  के टार्गेटको तो मार डाला। पिछले वर्ष वह पकडा गया तो उसने बताया कि अण्णाकी सुपारी का पैसा उसने इसलिये ठुकरा दिया था कि उस जैसे क्रिमिनलको भी लगा कि इस संत आदमीको मैं क्यों मारूँ । सुपारी देनेवालेका नाम उसने बताया –पदमसिंह पाटील, अर्थात् शरद पवार के बहनोई जो सुपारी देनेके समय मंत्री थे और अब इस आरोपके कारण जेलमें हैं। लेकिन ये अब की बात है।

1995 में शिवसेना-भाजपा सरकारने अण्णासे प्रेरणा लेकर सरकारने 125 गाँवोंको रालेगण-सिद्धी के तर्ज पर आदर्श गाँव बनाने का टार्गेट तय किया । उधर अण्णाकी प्रेरणा लेकर कई जिलों में भ्रष्टाचार विरोधी समितियाँ बनीं और एक प्रकारकी सरलता  की रौ में अण्णाने भी उनका मौन या प्रकट समर्थन किया। 

सरकारी आदर्श-ग्राम योजना फेल हुई क्योंकि असल मुद्दा ये था कि गाँववाले अपना सुधार किस दिशामें चाहते हैं और क्या उसमें अंत्योदयकी संकल्पना शामिल है। सरकारी स्कीममें अधिकारियोंपर ये जिम्मा था कि गाँवके विकास की दिशा व राह वे ढूँढेंगे,  वह भी सेवाभावी संस्थाओंसे प्रोजेक्ट प्रपोजल बनवाकर। ऐसेमें कई रंगीन, आकर्षक, परन्तु काल्पनिक प्रोजेक्ट प्रपोजल बने, बजेट खर्च  होता रहा और स्कीम फ्लॉप हुई। उधर भ्रष्टाचार-विरोधी जिला -समितियाँ भी कई बार बदनाम लोगोंके हाथ चढ गईं और अन्ततः सारी बंद भी हो गईं। परन्तु इनके आधार पर यह कहना कि अण्णाने भ्रष्टाचार किया है -- गलत होगा। यह मुद्दा इसलिये महत्वपूर्ण है कि इस कारण अण्णाको बदनामी व दिक्कतें उठानी पडी हैं।

शिवसेना-भाजपा सरकारके मंत्रियोंने भी जल्दी ही भ्रष्टाचार के गुर जान लिये और हालत इतनी बिगडी कि चार भ्रष्ट मंत्रियोंके विरुद्ध अण्णाने मुहिम छेडी। एक शिवणकर चुपचाप रिजाईन होकर चले गये, दूसरे सुतारको मंत्रीपदसे हटाकर सुनवाई कराई गई और उन्हे निर्दोष करार दिया क्योंकि हर बडी संपत्ति पर उनका जबाब था कि वह तो मैंने कार्पोरेटर था तब कमाई थी और आपकी अधिकार कक्षा में आपको केवल मंत्रीकालीन संपत्ती को खोजना है।

तीसरे मंत्री बबन घोलप अधिक तेज-तर्रार थे उन्होंने मानहानी का दावा ठोंक दिया । अण्णाने सरकारसे गुहार लगाई कि यह जाँच तो तुम्हे करनी है। पर सरकार मुकर गई – इसीसे बात समझमें आती है कि क्यें जाँच एजन्सी को सरकारी दायरेसे बाहर रखना जरूरी है। खैर, अदालतने अण्णापर जुर्माना ठोंका और जब अण्णाने कहा कि मेरे पास पैसे तो हैं नही, तो उन्हे जेल भेजा गया। इस प्रकार मुँह बाई जनता और हमारे जैसे वरिष्ठ अधिकारियोंने देखा कि कैसे सज्जनोंको जेल और आरोप रखनेवालोंको मंत्रीपद मिलता है।
चौथे मंत्री उससे भी अधिक तेज थे, पार्टी बदल-बदल कर सत्तामें रहना ही उनका धर्म था। कई वर्ष पूर्व अंतुले के इलेक्शन एजेंट रहते हुए एक अभूतपूर्व चाल से उन्हें जिताया था। पहले शरद पवारके मंत्री थे और अब शिवसेनाके। अपने ही जिलेके एस.पी और कलेक्टरको गोलीसे उडा देनेकी भाषा कर चुके थे। उन्होंने दे दनादन अण्णा पर भ्रष्टाचारके आरोप गढने शुरू किये। एफ.आय.आर. किये। इधर अण्णाको जेल में रखनेके कारण लोकक्षोभ बढ रहा था तो मनोहर जोशीने कोई खास सरकारी प्रिविलेज इस्तेमाल करते हुए उन्हें रिहा करवा दिया।

इस बीच फिरसे सरकार बदली फिरसे शरद पवारकी सत्ता आई और फिरसे टकराव आरंभ हुआ जिसमें फिर एक बार अण्णा द्वारा उठाये मुद्दोंपर और नबाब मलिक को मंत्रीपदसे हटना पडा। पदमसिंह पाटीलने ही सुपारी कांड किया जो आगे चलकर उजागर हुआ। लेकिन एक-दो को हटानेसे क्या होता है। करप्शनका राक्षस तो रक्तबीजकी हमारे समाजपर छा गया है। एक पकडा जाता है तबतक दसियों मंत्री भ्रष्टाचारकी चालसे सौ कदम आगे बढ चुके होते हैं। नतीजा है कि आज महाराष्ट्रके कई ऐसा राजनेता  हैं जो हजारों एकड जमीनके मालिक हो चुके हैं और उनकी भूख अभी मिटी नही है। इस खेलमें भी मिलबाँटकर खानेका चलन है जिससे विरोधी पक्ष भी अपनी अपनी कीमत वसूल कर चुप्पी लगा जाते हैं।

यही वजह है कि एप्रिल माहके आंदोलन के दौरान अण्णाने आपत्ति जताई थी कि उनसे बातचीत करने वाली सरकारी टीममें शरद पवार न हों। यही वजह है कि वे चाहते हैं कि जल्दीसे जल्दी एक सशक्त लोकपालबिल बने और वह सरकारके हाथकी कठपुतली न हो जिस तरह सीबीआय होती है। कर्नाटक के सशक्त लोकायुक्तने हमें दिखा दिया है कि सरकारसे अलग लोकायुक्त थे इसीलिये येडियुरप्पा और उनके भ्रष्टाचारी मंत्रियोंको हटाया जा सका। आज केंद्र सरकार डरती है कि यही लगाम उनपर भी लगे तो इलेक्शन जीतनेके लिये पैसा कहाँ से आयेगा – शायद पूरी घरानेशाही को ही राजकीय मंच छोडना पडे। भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों को शायद इसी बातका डर है।

समय आ गया है जब संसद से ऊपर लोगों की प्रभुसत्ता को समझा जाय और उसे समय-समय पर किस प्रकार अभिव्यक्ति का मौका मिले इसकी भी चर्चा हो। हम अब देख चुके हैं कि इस प्रश्नका ऊत्तर संसद की स्थाई समिती भी नही है। इसीलिये जैसे आज हमें करप्शन के लिये संसद व सरकार से  संस्था की आवश्यकता हुई है, उसी प्रकार अण्णा के मौजूदा आंदोलन जैसे मौके को एक प्लॅटफॉर्म देने के लिये भी कोई नई व्यवस्था सोचनी पडेगी। भले ही संसद से बाहर हो,पर फिर भी उसपर अप्रजातांत्रिक होनेका आक्षेप न आ सके, ऐसा उस व्यवस्थाको होना पडेगा -- ऐसी व्यवस्था हमें ढूँढनी पडेगी।

26 अगस्त 2011

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
 

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
 

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए



दुष्यंत कुमार

25 अगस्त 2011

'बेइमानी के खिलाफ़ खड़े नहीं हो सकते तो ईमानदार नहीं हैं’


इस देश में मन्दिरों-मस्जिदों के लिए दंगे हुए हैं, टेक्स बढ़ाए जाने पर आवाज़ें उठी हैं, किसी फ़िल्म को बैन करने की मांग को लेकर तोड़-फोड़ हुई है. यहां तक की वैलेन्टाइन डे के विरोध में भी चीखना चिल्लाना हुआ है. लेकिनभ्रष्टाचारको आज़ादी के 65 साल बाद भी लड़ाई का बड़ा मुद्दा नहीं माना जाता था. आज बिना किसी स्वार्थ के पांच साल के बच्चे से लेकर सत्तर साल के बुज़ुर्ग भी एक साथ, एक मुद्दे के लिए, एक आवाज़ में साथ आए हैं. इसे जोश कहा जा सकता है वक़्ती जुनून भी कहा जा सकता है. लेकिन इसे हलका नहीं माना जा सकता. उन हालात में जब प्रधानमंत्री अपने पास जादुई छड़ी ना होने का अफ़सोस करते रहते हैं और गठबंधन की सरकार होने की मजबूरी पर रोते रहते हैं ऐसे में सिर्फ़ यही कहा जा सकता है कि अगर आप बेइमानी के खिलाफ़ खड़े नहीं हो सकते तो आप  ईमानदार नहीं हैं.

आज कई लोग जन लोकपाल बिल के साथ खड़े नहीं हैं उनका मानना है कि किसी एक कानून से बदलाव नहीं लाया जा सकता या फिर देश में पहले ही भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये कई कानून हैं ज़रूरत है उनको मज़बूत बनाने की. अन्ना को नौटंकी बताने वाले अलग अलग तबकों से हैं जैसे ओबामा के भारत आने पर सड़कों पर उतरने वाले लोग, नक्सल कार्यवाई के विरोध में ग्रहमंत्री को काले झंडे दिखाने वाले लोग, इंडिया के क्रिकेट मैच हार जाने पर भिन्नाने वाले लोग. कई लोगों का ये भी मानना है कि अन्ना के पीछे विदेशी ताकतें हैं वर्ना कोई समाजिक कार्यकर्ता इतना समर्थन कैसे जुटा सकता है. कई ये भी कहते हैं कि ये आंदोलन ब्राहमणवादी है इसमे दलितों और अल्पसंख्यकों की जगह नहीं है. यहां तक कि ससंद पर भरोसा करने की हिदायत भी दी जा रही है


पहली बात, किसी भी बड़े बदलाव की शुरूआत एक छोटे से कदम से ही होती है, ऐसा नहीं है कि एक कानून बना, कुछ कागज़ात साइन हुए और समाज बदल जाएगा, देश में हर कोई स्वस्थ और सुखी हो जाएगा. सवाल है पहला कदम बढ़ाने की. राइट टू इन्फ़ॉरमेशन या इलेक्शन कमिशन का अपने पैरों पर खड़ा होना इस बात का सुबूत है. संविधान में बेशक ऐसे कानून हैं जो भ्रष्टाचार की नकेल खींच सकते हैं पर एक छोटा सा छेद भी नाव को डुबाने के लिए काफ़ी होता है. उस छेद कोलूप होलकहते हैं


दूसरी बात, अमरीका हमारा दुश्मन है या चीन हम पर भारी हो रहा है मानने वाला तबका ये क्यूं भूल जाता है कि घर का भेदी लंका ढाए. जब तक हम खुद अपने बीच से अपनी ही जड़ें खोखली करने वालों को ढूंढ-ढूंढ कर नहीं निकाल लेते तब तक किसी भी दुश्मन से लड़ने में हम नाकाम ही होंगे. हर शख़्स यही मानता है कि भ्रष्टाचार एक दीमक है पर इसके लिए हमें आपसी मतभेद को किनारे रखना होगा, दो अलग अलग सोच रखने वाले भाई अगर अपनी मां को मौत की कगार पर देखें तो पहला हाथ उसे अस्पताल ले जाने के लिए बढ़ना चाहिए नाकि ये तय करने के लिए कि पड़ोसी हमारे आंगन में पैर पसार रहा है

तीसरी बात, लोगों के बीच जोश भरना सबसे आसान काम भी है और सबसे मुश्किल भी. नौकरी पेशा लोग जब अपने ऑफ़िस के बाद कंधे पर बैग लटकाए केंडलमार्च करते हैं, घर में बैठ कर टीवी पर सास-बहू सीरियल देखने वाली औरतें या फिर छात्र-छात्राएं कॉलेज कैंपस की जगह तिहाड़ जेल के सामने रात बिताते हैं तो इतना तो तय हो जाता है कि ये लड़ाई सबकी है. शहर के आस-पास बसे गांव से लोग जब खुद चल कर अन्ना को देखने आते हैं. बूढ़ी औरतें, मां-बाप अपने बच्चों को साथ लिए जब एक इन्सान में उम्मीद की किरन देखते हैं तो ये भी साफ़ होता है कि भ्रष्टाचार वाकई आम इंसान को चोट देता है. ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि जन लोकपाल के लिए हो रहे आंदोलन में शामिल सभी लोग इसकी पेचीदगियों को समझें, इनकी सीधी समझ तो इतना ही बताती है कि जब मैं किसी सरकारी दफ़्तर में जाऊं तो सौ रुपय चपरासी को और हज़ार रुपय अफ़सर को ना देने पड़ें. राजनितिक पार्टियां अगरराजनैतिकपार्टियां होतीं तो वो ज़रूर समझतीं कि भाषण सुनने के लिए लोगों को पैसा देकर बुलाना ज़रूरी नहीं होता

चौथी बात, जैसे हर मुसलमान उग्रवादी नहीं होता वैसे ही हर ब्राहमण गोल पेट वाला खाऊ इन्सान नहीं होता. जब हम स्त्रियों, मुसलमानों या दलितों के लिए किसी भी तरह के पुर्वाग्रहों का विरोध करते हैं तो उच्चजाति के लिए दीवार क्यूं नहीं तोड़ सकते. कुर्सी पर बैठने वाला किसी क्षेत्र और जाति का नहीं होता, वो बस अपनी जेबें भरना जानता है यही उसका मज़हब है

पांचवी बात, किसी भी बड़े आंदोलन में एक नेता ज़रूर होता है. जिसे देख कर आम जन समूह आगे बढ़ सके. अन्ना और उनके सहयोगी इस बात को बखूबी जानते हैं. लोगों के बीच कोई भी फ़ैसला अन्ना के नाम से ही जाना चाहिए वो इस बात की बारीकी को समझते हैं, यहांपहले मैंकी होड़ नहीं है. इतिहास के पन्नों पर नज़र दौड़ाएं तो पता चलेगा कि हर बड़े आन्दोलन के पीछे एक आवाज़ होती है जो उसे दिशा देती है. बिना आवाज़ के समूह का मतलब ही नहीं रह जाता

ये बात भी सही है कि भ्रष्टाचार को खुद से मिटाने की ज़रूरत है तभी समाज से इसका खात्मा हो सकेगा लेकिन हम ये क्यूं भूल जाते हैं कि यहां आरटीआई के लिए काम करने वालों को गोली मारी जाती है, यहां अपनी ज़मीन के लिए लड़ने वाले किसानों की दिन-दहाड़े पिटाई होती है, यहां मंत्रियों की बड़ी-बड़ी मूर्तियां बनती हैं और आम इन्सान को सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, पढ़ाई के लिए लोन मांगने पर बैंक मैनेजर को घूस खिलानी पड़ती है, यहां मिड-डे मील अफ़सर खा जाते हैं और सारी इमानदारी सड़कों के गढ्ढों में लुड़क जाती है. ऐसे में आप अकेले इमानदारी की मशाल कब तक जलाए रख सकते हैं. ज़रूरत है एक-जुट होने की नाकि एक दूसरे पर टूटने की

किसी इन्सान की अच्छाई या बुरायी को कैसे आंका जाता है? उसके काम से, उसके पिछले कर्मों से या उसके सामाजिक जीवन की उप्लब्धियों से. रालेगांव सिद्धि की कामयाबी में अन्ना की लगन को लोग याद नहीं करना चाहते ना करें, 1990 में पद्मश्री और 1992 में पद्मभूषण पाने में भी गड़बड़ी देखते हैं तो भी ठीक है, उनके अनशनों के सबब आज तक 4 से 5 मंत्रियों को मंत्रीपद से हटाया जा चुका है वो भी लोग चाहें तो नकार सकते हैं. सूचना के अधिकार कानून में भी उनके योगदान को भुलाना चाहते हैं तो भुला दें. पर क्या मेग्सेसे पुरुस्कार पाने वाले, आरटीआई के मूवमेंट में अहम भूमिका निभाने वाले और टाटा स्टील में अपनी नौकरी छोड़ कर समाज के लिए काम करने वाले अरविन्द केजरीवाल को भी शक की नज़र से ही देखेंगे. या दिल्ली पुलिस में जान फूंकने वाली, सैंकड़ों पुरस्कार पाने वाली और हमेशा सही और सटीक बात कहने-करने वाली किरन बेदी को भी अगर शक्की निगाहों से देखेंगे तो बस एक ही बात कही जा सकती है. मेरी मां हमेशा कहती हैजिसका खुद का इमान कमज़ोर होता है वो हर किसी पर शक करता है’.